मा. मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के वरद हस्तों से

६३वें वन महोत्सव तथा श्री गोविंद गुरु स्मृति वन का लोकार्पण कार्यक्रम

मानगढ़ हिल, संतरामपुर तालुका, पंचमहाल

३० जुलाई, २०१२

 गोविंद गुरू की प्रेरणा से देश की आजादी की लड़ाई में जिन्होंने अपना रक्त बहाया है ऐसी इस पवित्र भूमि पर आए हुए मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा गुजरात से आए हुए मेरे सभी प्यारे आदिवासी भाइयों और बहनों...

हली बार ऐसा हो रहा होगा कि वन में कोई सरकार वन महोत्सव कर रही हो..! गुजरात सरकार ने एक विशेषता खड़ी की है, और विशेषता यह है कि वन महोत्सव के जरिए मात्र पर्यावरण और वृक्षों की बात करके रूकने के बजाए इस वन महोत्सव को सांस्कृतिक विरासत के साथ जोड़ा जाये, आम आदमी की श्रद्घा के साथ जोड़ा जाये और एक बार कोई बात श्रद्घा के साथ जुड़ जाती है, तो फिर उसके बाद उसके लिए कोई अभियान चलाने नहीं पड़ते। क्या आपने कहीं भी देखा है कि भाई, तुलसी को नुकसान न पहुँचाएं ऐसा बोर्ड कभी लगाना पड़ता है? नहीं, कारण कि सभी के मन में यह बात बैठ गई है कि तुलसी अत्यंत पवित्र होती है, भगवान का रूप होती है इसलिए उसे नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए। यह सब के दिमाग में बैठ गया है। एक बार किसी बात को लेकर श्रद्घा पैदा हो जाती है तो फिर समाज खुद ही उसका संरक्षण भी करता है, संर्वधन भी करता है। और इसलिए इस राज्य सरकार ने वन महोत्सव की कल्पना को ही बदल दिया है। दूसरी बात ये कि ये वन महोत्सव इतने सालों से चल रहे हैं तो वे समाज के लिए स्थायी रूप से उपयोगी गहना क्यों न बने? मात्र एक समारोह करके पांच-पचास वृक्षों को लगा कर चला जाया जाए या उसे एक यादगार स्मृति के रूप में तैयार करें, राज्य की संपत्ति को बढ़ाएं, सामाजिक जीवन की आवश्यकताओं में एक सुविधा प्रदान करना, ऐसे एक शुभ उद्देश्य को लेकर, एक सुखद उद्देश्य के लिए यह सरकार वन माहोत्सव कार्यक्रमों को भी समाज के लिए स्थायी रूप से व्यवस्थाएं विकसीत करने वाले एक नए रूप के साथ आई है।

प अंबाजी जाओ तो अंबाजी में धर्मशाला मिल जाती है, अंबाजी में मंदिर का आसरा मिल जाता है, पर परिवार के साथ किसी जगह पर खुले में बैठना हो तो जगह नहीं मिलती। वन महोत्सव तो करना ही था, तो हमने तय किया सालों पहले, कि अंबाजी के पास में कोई एक पहाड़ी हो, जिसे कोई देखता भी नहीं था और जाता भी नहीं था, वहाँ हम मांगल्य वन बनाएं। धीरे धीरे मांगल्य वन इनता बड़ा हो गया कि भादव की पूनम पर लाखों लोग जब अंबाजी के दर्शन के लिए जाते हैं तो ये मांगल्य वन उनके लिए मंगलकारी साबित हो गया है, आर्शीवाद रूप बन गया है। जैन समाज के यात्री, खास तौर पर दिगम्बर समाज, तारंगाजी की यात्रा करने जाते हों। तारंगा जा कर आप पहाड़ी को देखें तो एक भी झाड़ वहाँ देखने को नहीं मिलता और एक पट्टा तो एसा है कि जहाँ धूल ही उड़ती हो, वीरान भूमि, पत्थरों के ढेर... उसके बीच कोने खोपचे में पड़े मंदिर, ऐसी भग्नावस्था..! तांरगाजी जैसा तीर्थ स्थल, वहाँ हमने तय किया कि ‘तीर्थंकर वन’ बनाया जाएगा और 24 वें तीर्थंकर जिनको जिस पेड़ के नीचे बोध हो गया था, उस वृक्ष को बोया जाएगा और जो तीर्थ यात्री वहाँ भगवान महावीर की उपासना के लिए तांरगाजी आते हैं उन्हें कहा गया कि उन पौधों में थोड़ा-थोड़ा पानी चढ़ाते हुए जाएं, ये भी एक पुण्य का काम है और आज तीर्थंकर वन तैयार हो गया है। भाइयों और बहनों, श्रावण का महिना चल रहा है, भोलेनाथ को सब याद करते हैं। आप सोमनाथ जाओ तो समुद्र की खारी हवा चलती है, वहाँ भी हराभरा क्यों ना हो? सोमनाथ के मंदिर में कोई आता है, देश भर के लोग आते हैं तो सोमनाथ के मंदिर का वातावरण मनभावन क्यों ना बनाएं? एक वन महोत्सव हमने सोमनाथ में किया। हरिहर वन बनाया और केवल हरिहर वन ही नहीं बनाया, भगवान सोमनाथ को, भोलेनाथ को जो वृक्ष पसंद हों ऐसे वृक्ष भी लगाए गए, बेल के वृक्षों का घन खड़ा कर दिया गया। शामलाजी में हमारा कालिया, आपके आदिवासी भील समाज का कालिया, शामलाजी में विराजता है। उदयपुर या श्रीनाथजी आते जाते लोग अगर समय हो तो शामलाजी का चक्कर लगाते हैं, पर रूकते नहीं हैं। हमने शामलाजी में इस कालिया का वन बनाया, शामल वन बनाया और केवल इतना ही नहीं, विष्णु भगवान को रोज सुबह कमल के पुष्प चढ़ाए जाते हैं, ये ताजे पुष्प इस कालिया वन में मिले इसके लिए व्यवस्था की गई। आज कोई भी यात्री वहाँ जाए और अब तो वहाँ कैसा सुमेल है, टेक्नोलोजी का उपयोग किया गया है जिसके उपयोग से वहाँ जानेवाले बच्चे बॉटनी का अध्ययन कर सके और कियोस्क में एक्जाम देने के बाद स्वयं मार्क्स भी मिल सके ऐसी व्यवस्था की गई है। बच्चे शामलाजी के दर्शन भी करते हैं और साथ साथ इस बॉटनिकल गार्डन का दर्शन भी कर लेते हैं। भाइयों और बहनों, पालिताणा। तीर्थ क्षेत्र की यात्रा के लिए लोग आते हैं, पालिताणा के ऊपर जाते हैं, रास्ते में एक सुंदर अच्छी जगह चाहिए। हमने वहाँ पावक वनबनाया और पावक वन की विशेषता ऐसी की गई कि उसमें पूरे शरीर की रचना की गई और कौन सा औषधीय वृक्ष किस प्रकार के रोग के लिए काम में आता है... जैसे घुटना हो, तो शरीर में घुटने के पास वृक्ष लगाया, ह्दय की बीमारी में काम आने वाले वृक्ष को जहाँ ह्दय हो वहाँ बना दिया, आंख की बीमारी में काम करने वाला वृक्ष हो तो जहाँ आंख होती है वहाँ बना दिया..! गरीब से गरीब, अनपढ़ से अनपढ़, सामान्य से सामान्य व्यक्ति को भी समझ में आ सकता है कि शरीर के लिए उपयोगी कौन कौन से वृक्ष हैं, औषधी के रूप में कैसे उपयोग होता है और आज लोग इसके अभ्यास के लिए वहाँ आते हैं। घंटे दो घंटे वन में घूमें तो उन्हें ये पता चल जाता है कि इस वृक्ष का क्या महत्व है..! भाइयों और बहनों, ऐसे तो अनेक अभिनव प्रयोग किए हैं। चोटीला जाओ तो भक्ति वनदेखने को मिलता है। आप पावागढ़ आईये तो यहाँ पावागढ़ के अंदर विरासत वनबनाया गया है। वर्ल्ड हेरिटेज की जगह हो चंपानेर की, एक तरफ मां काली विराजमान हो और इन दोनों की साक्षी के रूप में खड़ा हो ऐसा हमने विरासत वन बनाया है।

र आज जब वन महोत्सव की बात आई तब गोविंद गुरू, भाइयों आदिवासियों की छाती गज भर फूल जाए ऐसा नाम, किसी भी भारत भक्त का सिर ऊंचा हो जाए ऐसा नाम। लेकिन बदकिस्मती से इतिहास के पन्नों में इस नाम को मिटा दिया गया। ज़्यादा से ज़्यादा पांच-पचास परिवार, या दो-चार महंत ही इन्हें याद करते होंगे इतना सीमित कर दिया था। इस क्षेत्र के लोग बारह महीने में एक बार शायद भक्तिभाव के कारण पूर्णिमा के मेले में आते हों उतनी ही उनकी गणना रह गई।  भाइयों और बहनों, यह एक एतिहासिक घटना है और इसकी शताब्दी पूरी होने जा रही है तब 1913 में, आज से निन्यानवे साल पहले, जिनका अब शताब्दी वर्ष शुरू हुआ है, इसी भूमि पर गोविंद गुरु की प्रेरणा से नि:शस्त्र समाज सुधारक के रूप में काम करने वाले भक्तों का समूह, संत सभा के लोग, इस संत सभा के लोग समाज को सुधारने का काम करते थे, अंग्रेज सल्तनत के सामने अपनी आवाज उठाते थे और गोविंद गुरू से ये अंग्रेज सल्तनत काँप गई। पंचमहल जिले के संतरामपुरा-दाहोद क्षेत्र में भेखधारी एक समाज सुधारक, वह चलता जाये, फिरता जाये, मिलता जाये, बात करता जाये और लोगों में एक नई चेतना जगाता जाये और उसका परिणाम क्या आया? सीधे लंदन तक खबर पहुंची कि यह एक ऐसा आदमी है जिसके पीछे पीछे ये आदिवासी भाईयों अपना जीवन कुर्बान कर देने के लिए तैयार हो गये हैं, आदिवासी अपनी जिंदगी देने को तैयार हो गये हैं और ये जो इतना बड़ा तोप का गोला यदि अंग्रेजों की ओर घूम गया तो उनका कत्लेआम हो जाएगा ऐसा डर था। गोविंद गुरू को सीधा करने के लिए षडंयत्र रचे गए। स्पेशल लोग नियुक्त किए गए, और यह तय किया गया कि गोविंद गुरू को खत्म कर दिया जाए। लेकिन गोविंद गुरू के भक्त ऐसे थे कि वे आदिवासी भाइयों ने भारत माता की आजादी के लिए अंग्रेजों के सामने झुकना पंसद नहीं किया, अंग्रेजों की फौज आई तो भागना पंसद नहीं किया, अंग्रेजो की फौज आई तो गोविंद गुरू को अकेला छोड़ कर भाग जाने की कोशिश नहीं की, बल्कि अंग्रेजों के सामने गए मेरे वीर आदिवासी, अंग्रेजों के सामने लड़े। उनकी तोप की नलियाँ थीं और बंदूक की नलियाँ थीं, गोलियोँ की बौछार चल रही थी और एक के बाद एक मेरे आदिवासी भाई शहीद होते गए पर गोविंद गुरू पर आंच ना आए इसके लिए अपना बलिदान देते गए। लाशों के ढेर लग गए। आप सोचो, जलियांवाला बाग से दोगुने लोग यहाँ शहीद हुए थे। जलियांवाला बाग का नाम तो इतिहास के पन्नों में शामिल है, पर मानगढ़ का कोई उल्लेख न हो इस तरीके से इतिहास को भूला दिया गया है, मेरे आदिवासी भाइयों को भूला दिया गया है। देश की आजादी के लिए मरने वाले बिरसा मुंडा हो कि गोविंद गुरू की प्रेरणा से शहीद होने वाले पन्द्रह सौ से ज्यादा मेरे भील युवा हों, इन सभी लोगों ने भारत माता को आजाद करवाने के लिए अपने जीवन समर्पित कर दिये थे, बलिदान दिया था पर इतिहास में इन्हें भुला दिया गया। और आज इस बात को ठोक बजाकर दुनिया के सामने मुझे लाना है। जब उनकी शताब्दी जब मनाई जाएगी, पूरा वर्ष आदिवासी समाज के लोग यहाँ आएगें, यात्राएं निकलती रहेंगी, लगातार यात्राएं चलेंगी और 2013 में जब शताब्दी वर्ष पूर्ण होगा तब हमें गर्व होगा कि महात्मा गांधी की शताब्दी हर कोई मनाता है, पंडित नेहरू की शताब्दी हर कोई मनाता है, महापुरुषों की शताब्दी हर कोई मनाता है पर कोई तो चाहिए जो गोविंद गुरू को, इस महान विरासत को, इस शहादत को, उन 1500 से ज्यादा अनाम लोग जिनकी किसी को खबर नहीं है वे अगर यहाँ शहीद हुए हों तो उन शहादत की शताब्दी भी मनानी चाहिए। गुजरात में कोई तो ऐसा है जिसको उनकी याद आयी है और उसे मनाना है। कुछ लोगों को ये लगता है कि ये सब तो चुनाव आ रहे हैं इसलिए हो रहा है। अब भैया, यह शताब्दी क्या हमने तय की थी..? चुनाव और शताब्दी दोनों साथ में आ जाएं तो क्या वह हमारा कसूर है..? वह 1912 में हुआ था और ये 2012 में आया, इसमें हमारा कोई अपराध है, भाई? और इन सारी बातों को चुनाव के साथ जोड़ कर, उसे राजनीति का रूप देकर, इन बलिदानों के महत्व को छोटा करने वाले लोग शहीदों का अपमान कर रहे हैं..!

भाइयों और बहनों, श्यामजी कृष्ण वर्मा, हिंदुस्तान में सशस्त्र क्रांति का जिसने नेतृत्व किया, वीर सावरकर जैसे महापुरूष जिसने दिए, मदन लाल धींगरा जैसे लोगों में वीरता को प्रेरित किया, भगतसिंह-सुखदेव-आजाद जैसे लोग जिनको प्रेरणा मानते थे वे श्याम कृष्ण वर्मा, अपने गुजरात के कच्छ का बेटा, अंग्रेजों के सामने लंदन में अंग्रेजों की नाक के नीचे आजादी की लड़ाई लड़ते थे, इस देश की सशस्त्र क्रांति करने वाले लोगों को शिष्यवृत्ति के द्वारा तैयार करते थे। वह श्यामजी कृष्ण वर्मा 1930 में जब गुजर गए तब लिख कर गए थे कि मुझे तो जीते जी आजादी देखने को नहीं मिल सकी, पर मेरी अस्थियों को संभाल कर रखना, मेरी हड्डियों को संभाल कर रखना और जब मेरा देश आजाद हो जाए तो मेरी अंतिम इच्छा है कि मेरी अस्थियां मेरे आजाद हिंदुस्तान की धरती पर ले जाई जाए, जिससे मुझे मोक्ष मिले, मुझे शांति मिले। ऐसा श्यामजी कृष्ण वर्मा लिख कर गए थे। 1930 में उनका स्वर्गवास हुआ और 1947 में देश आजाद हुआ। 15 अगस्त को तिरंगा झंडा फहराया गया उसके दूसरे ही दिन दिल्ली सरकार ने आदमी को भेज कर अस्थियां हिंदुस्तान लानी चाहिए थीं। मगर उन्हें शहीदों की पड़ी ही नहीं थी, देश के लिए जीने वाले, देश के लिए मरने वालों की परवाह नहीं थी और इसलिए श्यामजी कृष्ण वर्मा की अस्थियां वहाँ पड़ी रहीं। भाइयों और बहनों, ये सौभाग्य मुझे मिला, भारतमात के इस सपूत की अस्थियां मैं कंधे पर उठा कर विदेश की धरती से 2003 में यहाँ लेकर आया। और आज श्याम कृष्ण वर्मा का एक अत्यंत प्रेरक स्मारक कच्छ के मांडवी में बनाया गया है। कोई भी भारत माता को प्रेम करने वाला नागरिक वहाँ जाएं तो उसे देखते ही लगेगा कि ऐसे ऐसे थे हमारे वीर पुरूष..! आज हर साल हजारों की संख्या में विद्यार्थी श्यामजी कृष्ण वर्मा के इस स्मारक की मुलाकात लेते हैं, देश-दुनिया के पर्यटक श्यामजी कृष्ण वर्मा के इस स्मारक को देखने आते हैं। एक दिन ऐसा आएगा कि गोविंद गुरू की स्मृति में यहाँ जो स्मारक बना है, उनकी शहादत को याद किया है ऐसा ये शहीद वन स्मृति वन बना है, यहाँ भी देश और दुनिया के लोग उन पन्द्रह सौ से ज्यादा मेरे शहीद भील कुमारों पर हमेशा पुष्प वर्षा करने के लिए इस धरती पर आएंगे, ऐसा वातावरण बनाने का काम मैंने किया है।

भाइयों और बहनों, आजादी को इतने साल हो गए, इतने सारे समाज सुधारक हुए। आप देखिए  हमने वहाँ एक  छोटा सा प्रदर्शन रखा है। उस जमाने में गोविंद गुरू की कैसी प्रेरणा देते थे, कैसे वचन कहते थे..! ये वचन आज भी काम में आए ऐसे शब्द वे उस समय कहते थे,एक-एक बात पर अमल हो इसके लिए भगत पंथ चला कर भक्तों को तैयार करके समाज सुधार का काम करते थे। और जीवन के कितने साल जेल में बिताए, अहमदाबाद की साबरमती जेल में भी रहे। अंग्रेज सरकार को डर लगा तो हैदराबाद की जेल में भेज दिया, हैदराबाद की जेल में जिंदगी गुजारने पर मजबूर किये गए थे। ये गोविंद गुरू, उन्हें भूला दिया गया है। आदिवासियों के कल्याण के लिए अपना जीवन खपा देने वाले व्यक्ति को इस देश में भूलाया नहीं जाएगा। आने वाली पीढिय़ां याद रखे इसके लिए हमने सकंल्प किया है और यह बात हम पहुँचाना चाहते हैं। शहादत व्यर्थ नहीं जा सकती और जब भील कुमारों को पता चलेगा कि उनके पूर्वजों ने कितना बड़ा बलिदान दिया था, तब जैसे एकलव्य से प्रेरणा ली जाती है वैसे ही गोविंद गुरू से भी प्रेरणा मिलेगी ऐसा मुझे विश्वास है।

भाइयों और बहनों, आजादी के इतने सारे सालों में आदिवासियों का कल्याण करने में ये सभी सरकारें निष्फल रही हैं। आदिवासियों के नाम पर विपुल मात्रा में वोट ले गए, पर आदिवासियों के जीवन में बदलाव नहीं आया। इस सरकार ने प्रयास किया है कि आदिवासियों के घर तक पीने का पानी कैसे पहुंचे, आदिवासियों के खेतों तक सिंचाई का पानी कैसे पहुंचे, आदिवासियों को रहने के लिए घर कैसे मिले, पेड़ों के नीचे जिंदगी गुजारने वाले आदिवासियों को अपना घर किस तरह से मिले ये चिंता इस सरकार ने की है। भाइयों और बहनों, शून्य से सोलह तक के गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजारने वाले सभी आदिवासियों को मकान देने का काम पूरा कर दिया गया है। और अब उठाने वाले हैं, सत्तरह से बीस के बीच आने वाले लगभग दो लाख से ज्यादा आदिवासीयों को घर देने का काम, जो आने वाले दिसंबर तक हम पूरा करने वाले हैं। आप सोचिए, पचास सालों में जो काम कोई नहीं कर सका है, वो काम करने के लिए संघर्ष उठाया है और ये काम का लाभ लोगों को मिले इसके लिए काम किया है। 15,000 करोड़ रूपये का पैकेज, वनबंधु कल्याण योजना में नियत किए गए थे 15,000 करोड़ और पहुँचाया 18,000 करोड़ और अब तो मामला 40,000 करोड़ रूपये तक पहुँच गया है, 40,000 करोड़ रुपये मेरी आदिवासी जनता के लिए। भाइयों और बहनों, समाज को लड़वाने के लिए आरक्षण के नाम पर दंगे करवाते हैं, सब कुछ करते हैं, दूसरों को उकसाने की बातें करते हैं। लेकिन मेरे आरक्षण का लाभ कैसे मिल सकता है, भाइयों? मेरे आदिवासी बेटे को डॉक्टर बनना है, मेरे आदिवासी बेटे को इंजीनियर बनना है, तो पहले बारहवीं कक्षा तक की विज्ञान प्रवाह की स्कूल तो होनी चाहिए की नहीं..? आपको जानकर दु:ख होगा भाइयों-बहनों, उमरगांव से अंबाजी तक की पूरी आदिवासी पट्टी में विज्ञान संकाय की एक भी बारहवीं कक्षा नहीं थी। मैं जब 2001 में आया तब इस राज्य में 45 तालुके ऐसे थे जहाँ पर बारहवीं कक्षा में विज्ञान संकाय वाला विद्यालय ही नहीं था। जब बारहवीं कक्षा में विज्ञान संकाय ही नहीं है तो डॉक्टर या इंजीनियर कैसे बना जा सकता है? आरक्षण का लाभ कैसे मिलेगा? और आरक्षण के नाम पर झगड़ा करके अपनी राजनीति चलाते रहते हो लेकिन आदिवासियों का भला कभी नहीं किया। भाइयों और बहनों, हमने उन 45 के 45 तालुकाओं में विज्ञान संकाय की बारहवीं कक्षा के विद्यालय प्रारंभ करवाए और इसका परिणाम ये आया कि आज मेडिकल, इंजीनियरिंग की आदिवासियों की सभी सीटें भरने लगी। आदिवासी लडक़े इंजीनियर बने, आदिवासी लडक़े डॉक्टर बने इस दिशा में हमने काम किया। नर्सिंग की कॉलेज प्रारंभ की, आदिवासी क्षेत्र में आई.टी.आई. प्रारंभ की, आदिवासियों के बच्चे आज पढ़ें और आगे बढें इसकी चिंता की।

क जमाना था, मेरे पंचमहाल तालुका के आदिवासी 44 डिग्री तापमान होने पर भी रोड का काम करने के लिए, डामर का काम करने के लिए शहरों में तपते थे, चिलचिलाती धूप में डामर की सड़क बनाने का काम करते थे, ऐसे दिन थे। आज मुझे गर्व के साथ कहना है कि दाहोद और पंचमहाल जिले का एक भी ऐसा तालुका नहीं है कि जहाँ पर मेरे आदिवासी आज रोड कांन्ट्रेक्टर नहीं बने हो। जेसीबी लाने लगे हैं । अभी एक सदभावना मिशन के कार्यक्रम में मेरे इस गरीब समाज के लोग मुझे मिलने आए थे, बक्षीपंच के गधे चराने वाले और गधे पर मिट्टी उठा कर ले जाने वाले लोग मुझे मिलने आए थे। और मेरे लिए एक खिलौना लेकर आए थे, सदभावना मिशन में प्लास्टिक का खिलौना मुझे भेंट दिया। मैं हँस पड़ा, मैंने कहा कि आप लोगों ने मुझे यह प्लास्टिक की जेसीबी मशीन का खिलौना क्यों दिया? मेरे परिवार में तो खेलने वाला कोई नहीं है, मुझे हँसी आ गई। तो मुझे कहा कि साहब, हम ये जेसीबी का खिलौना इसलिए लाए हैं कि पहले हम गधे चराते थे, आपकी सरकार में ऐसी प्रगति हुई कि हमारे घर में भी जेसीबी आ गई उसका नमूना आपको बताने के लिए लाए हैं, उसका आभार व्यक्त करने के लिए आएं हैं। आज मेरे पंचमहाल के, दाहोद के आदिवासी तथा सभी तालुका में देखना मित्रों, आज मेरे आदिवासी रोड के कान्ट्रेक्टर बन गए हैं, कल तक मजदूरी करते थे। मेरा डांग जिला, आदिवासी भाइयों, इनके कल्याण के लिए कोई योजना ही नहीं थी। हमने डांग जिले में दूध  उत्पादन के काम शुरू किए, गाय-भैंसे देने की दिशा में काम किए। आज मेरे डांग जिले का आदिवासी स्वावलम्बी हो गया है। हमने दाहोद जिले में अभियान शुरू किया है, दूध उत्पादन करने की क्षमता बढ़े, दुधारी पशु उपलब्ध हों इसके लिए काम शुरू किए। हम एक ओर आदिवासी भाइयों को दूध उत्पादन के लिए गाय-भैंस प्रदान कर रहे हैं, वहीं दिल्ली सरकार ने क्या शुरू किया है, जानते हैं? दिल्ली सरकार ने कसाईखानों को सब्सिडी देने का काम शुरू किया है। पचास करोड़ रूपया कसाईखानों के लिए सब्सिडी दे रहे हैं तथा गाय का मांस विदेश में भेजो तो सब्सिडी दी जाती है और लाखों टन गाय का मांस विदेश भेजने का काम ये दिल्ली की सरकार कर रही है। यह देश तो ऐसा है कि जब 1857 की क्रांति हुई थी, वह गाय की चर्बी के ऊपर क्रांति हुई थी, बुलेट पर गाय की चर्बी है इतनी बात मात्र से हिंदुस्तान जाग गया था। इसी हिन्दुस्तान में आज दिल्ली की सरकार गाय का मांस विदेश भेजने के लिए प्रोत्साहक इनाम दे रही है..! इस बदकिस्मती के साथ देश जी रहा है तब मेरे भाइयों-बहनों, गौ माता की रक्षा के लिए गोविंद गुरू ने जिदंगी दे दी थी। गाँव-गाँव जाकर गौ पालन के लिए ज्ञान देने का काम गोविंद गुरू ने किया था। इन गोविंद गुरू से प्रेरणा लेकर इतने लोग शहीद हो गए और अंग्रेज सरकार के नाक में दम कर दिया था उस मानगढ़ भूला नहीं सकते। इस मानगढ़ ने ही गुजरात का सम्मान बढ़ाया है, इस गुजरात का गौरव बढ़ाने का काम मानगढ़ के मेरे शहीदों ने किया है। उस शहादत याद करते हुए यह ‘शहीद स्मृति वन’ हमने समर्पित किया है।

भाइयों और बहनों, पर्यावरण के सामने लडऩा है तो वृक्ष बचाने पड़ेंगे, वृक्ष लगाने पड़ेंगे। बारिश की खींच के चलते जीव कैसा व्याकुल हो जाता है..? समाज का कोई ऐसा वर्ग नहीं है जो बारिश की खींच के चलते दु:खी नहीं होता हो। राजा हो या रंक हो, बरसात कम हो तो हर कोई दु:खी होता है, हर एक के मन में पीड़ा होती है कि भाई, अब बरसात हो तो अच्छा है। कुछ निकम्मे लोग भी होते हैं, ये लोग यज्ञ करते हैं, यज्ञ करके भगवान से प्रार्थना करते हैं कि बरसात न हो तो अच्छा है, तो हमें चुनाव में आसानी रहे, बोलो ऐसी बात..! अरे भाई, चुनाव जीतने के लिए इस जनता को दु:ख में नहीं डाल सकते, इस जनता को कष्ट हो ऐसा नहीं कर सकते। अरे, चुनाव तो आएंगे और जाएंगे, पर मेरा ये समाज तो अविनाशी है। यदि इसे पानी ईश्चर की कृपा से नहीं मिलेगा तो कितनी विपदाएं आएंगी, हम सब प्रार्थना करें, गोविंद गुरू के धाम में प्रार्थना करें कि ईश्वर हमें बरसात का प्रसाद दें और हमारा गुजरात हराभरा बनने कि दिशा में आगे बढ़े, इसका अवसर हम लें। बरसात तो ईश्वर की दी हुई सबसे बड़ी कृपा है, इसके बिना जीवन संभव ही नहीं हो सकता। इस पानी के लिए पूजा इस समाज के भविष्य की गारंटी का एक साधन है। भाइयों और बहनों, विकास का मार्ग हमने लिया है, विकास के मार्ग पर जाना है, हमारे आदिवासियों की जिंदगी बदलनी है..! अभी भारत सरकार ने एक आंकड़ा जारी किया। भारत सरकार ने कहा कि पूरे देश में जो बेरोजगारी है, इसमें कम से कम बेरोजगारी कहीं है तो उस राज्य का नाम है गुजरात। यदि हमने विकास नहीं किया होता तो राज्य के नौजवानों को रोजगार नहीं मिला होता। और अगर नौजवानों को रोजगार नहीं मिलता है तो उनके परिवार की स्थिति नहीं बदलेगी और इसलिए हमारा प्रयास है कि युवाओं को रोजगार मिले। वनबंधु कल्याण योजना के जरिए, स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रम के जरिए, कौशल वर्धन के कार्यक्रमों के जरिए प्रत्येक नौजवान को काम सिखाना है ताकि पत्थर पर लात मार कर पानी निकाल सके ऐसी ताकत इनमें आए। इस ताकत को खड़ी करने का काम उठाया है।

भाइयों और बहनों, मानगढ़ जैसा वीरान प्रदेश, यहाँ पहुँचना भी कठिन है और एक पर्वत की छोटी सी चोटी पर जिस तरह से मैंने जन सैलाब देखा, हैलिकाप्टर से मैं देख रहा था कि कितने सारे आदमी खड़े थे, अंदर तो कुछ भी नहीं है। इतना बड़ा जन सैलाब, गोविंद गुरू की याद ताजा करने का हमारा जो सपना था उसका बीज बोया गया है, दोस्तों। अब गोविंद गुरू को कैसा भी ताकतवर आदमी आए तो भी भूला नहीं पाएगा। इतिहास के पन्नों से शहादत की बात को मिटाने की कोशिश करने वाले लोग अब नाकाम होंगे ऐसा ये दृश्य मुझे नजर आ रहा है। इतिहास के पन्नों से शहादत को कोई मिटा नहीं सकेगा, सशस्त्र क्रांति के वीरों को भूला नहीं जा सकता, भारत के वीरत्व को भूला नहीं जा सकता, आदिवासियों के बलिदान का भूला नहीं जा सकता, आदिवासियों की यशगाथा को भूला नहीं जा सकता और ये बड़ा काम गोविंद गुरू की धरती पर हमने किया है। मेरे आदिवासी भाइयों और बहनों, आओ, सिर्फ जंगलों को बचाना ही नहीं है, वृक्ष भी बढ़ाने हैं। यहाँ आपने देखा होगा कि एक एक गाँव को, किसी को पन्द्रह लाख, किसी को बीस लाख रूपये मिल रहे हैं। ये सरकार की योजना का लाभ लें। इतने सारे वृक्ष उगाओ, प्रत्येक वृक्ष से पैसा कमाओ, ये सरकार आपको पैसे देती है, लाखों रूपये देती है। एक एक गाँव को पन्द्रह-पन्द्रह, बीस-बीस लाख रूपया मिलता है वो आपने देखा मेरे सामने। इतने सारे रूपयों की वर्षा हो रही हो तो वृक्ष उगाने की बात में हम कमी न बरतें। वन विभाग के मित्रों को भी मानगढ़ जैसी इस जगह पर गोविंद गुरू की याद में... और यह सारी नौकरी से ऊपर की बात है। नौकरी में तो सब चलता है, पर आपने आज एतिहासिक काम किया है, सिर्फ नौकरी नहीं की है, दोस्तों। और किसी एतिहासिक काम के साक्षी बनने में जीवन का अपूर्व आनंद मिलता है। आप भी भविष्य में आपके संतानों को यहाँ दिखाने लाएंगे कि मैं जब नौकरी करता था तब हमने यह एक महान एतिहासिक काम किया था, ऐसा भाव पैदा होने वाला है। पीढ़ी दर पीढ़ी ये संस्कार पहुँचने वाले हैं और इस काम को जब हमने महसूस किया है तब फिर एक बार मेरे साथ ‘गोविंद गुरू अमर रहे’ का नारा लगाएं, फिर मैं कहूँगा ‘शहीदों’ तब आप ‘अमर रहो’ कहना...

 

गोविंद गुरू, अमर रहो... गोविंद गुरू, अमर रहो...!

हीदो, अमर रहो...हीदो, अमर रहो...हीदो, अमर रहो...!

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जीवन में अपनी जिज्ञासा को हमेशा जीवित रखें: IIT दिल्ली के दीक्षांत समारोह में पीएम मोदी
August 08, 2026
जिन लोगों में चुनौतियों के नए समाधान खोजने का साहस होता है, उनके लिए चुनौतियाँ अवसर बन जाती हैं: प्रधानमंत्री
जीवन में अपनी जिज्ञासा को जीवित रखें, सीखने की प्रवृत्ति को बनाए रखें: प्रधानमंत्री
बिना सोचे-समझे स्वीकार की गई बातों पर सवाल उठाएँ, लेकिन केवल सवाल उठाने तक ही सीमित न रहें; उनके समाधान खोजने का भी साहस रखें: प्रधानमंत्री
आज भारत इकोनॉमिक, टेक्नोलॉजी और इंडस्ट्रियल जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, यह प्रयास विकसित भारत की मजबूत नींव का सबूत है: पीएम मोदी
आज देश में हमारे युवाओं के लिए नए क्षेत्र उभर रहे हैं: प्रधानमंत्री

शिक्षा मंत्री प्रहलाद जोशी जी, मेरे मित्र हरीश साल्वे जी, प्रोफेसर अभय करंदिकर, IIT दिल्ली के डायरेक्टर प्रोफेसर रंगन बैनर्जी, सभी प्रोफेसर्स, अन्य महानुभाव और सभी स्टूडेंट्स साथियों।

आज देश के आप सभी प्रतिभाशाली युवाओं के जीवन की नई यात्रा शुरू हो रही है। आप इस समय जीवन के एक यादगार moment को जी रहे हैं। उत्साह, उमंग, सपनों और भावनाओं से सराबोर, इस moment का हिस्सा बनना, IIT दिल्ली के इस कैंपस में आना, आपके साथ ये अनुभव शेयर करना मेरे लिए भी बहुत खास है। पिछली बार जब मैं Convocation में शामिल हुआ था, तब पूरा देश कोविड के दौर से गुजर रहा था। तब मैं वर्चुअल माध्यम से जुड़ा था, लेकिन मैं आज आप सब युवाओं के बीच उपस्थित हूँ। और इसलिए, मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा है।

साथियों,

आज जैसे आपके परिवार के लोग proud फील कर रहे हैं, वैसे ही मुझे भी आप सब पर गर्व है। क्योंकि, आप सब केवल एक डिग्री नहीं ले रहे, आप देश के लिए बहुत कुछ करने का सपने लेकर के यहाँ से निकल रहे हैं। आज कई स्टूडेंट्स, उनको उनकी उपलब्धियों के लिए मेडल्स भी मिले हैं। मैं आप सभी को इसके लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं। लेकिन एक-दो बेटियां होती तो जरा ज्यादा अच्छा होता। सॉरी, एक-दो क्यों, ज्यादा होनी चाहिए थी। आज IIT दिल्ली में AI से जुड़े कुछ नए initiatives भी शुरू हुये हैं, मैं इसके लिए आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएँ देता हूँ।

साथियों,

आज आप सभी, और सारे students इस कार्यक्रम में उपस्थित हैं, लेकिन मन के किसी कोने में कुछ और चल रहा होगा, मैं तो बाबा बागेश्वर नहीं हूं, लेकिन कुछ तो चलता होगा। हर स्टूडेंट के मन में आने वाले कल की अपनी-अपनी तस्वीर होगी। कई छात्र अपनी पहली सैलरी का इंतजार कर रहे होंगे। कोई नए शहर में नई शुरुआत की तैयारी में होगा। कई साथी अपने पहले स्टार्टअप का सपना देख रहे होंगे। किसी ने अगले Competitive Exams का लक्ष्य बनाया होगा। हर किसी का रास्ता अलग है, हर किसी का सपना अलग है, लेकिन इन सबके बाद भी एक एहसास ऐसा है जो आप सभी के मन में एक सा होगा, वो दिन याद करिए, जब आपका IIT दिल्ली में पहला दिन था और एक ये आज का दिन है। आप सोच रहे होंगे कि अभी कल की ही तो बात है, जब ओरिएंटेशन हुआ था और अब ये कॉन्वोकेशन का समय भी आ गया, तो ओरिएंटेशन से कॉन्वोकेशन की इस यात्रा का आपको भरपूर satisfaction भी होगा। और साथ ही आप सभी में जीवन के एक नए चैप्टर की शुरुआत का उत्साह भी होगा। और इसलिए मैं तो यही कहूंगा, आज के इस पल को पूरी तरह जी लीजिए। आने वाले समय में जब आप पर बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियाँ होंगी, तब यहाँ की पुरानी यादें आपको पुराने दिनों में जरूर ले जाएंगी। ये आपको energise भी करेंगी। हर हॉस्टल के साथ आपकी memories, कुमाऊं, आरा, कारा, विंडी, नील, कैलाश, हिमाद्री, इंटर-हॉस्टल कॉम्पिटिशंस के किस्से, पुरानी नोंक-झोंक, ऐसा कितना कुछ होगा, जो विदा होने से पहले एक बार फिर आप जरूर याद करिए।

और दोस्तों,

बात सिर्फ पढ़ाई की नहीं है, ये भी हो सकता है, जिया सराय का पोहा भी आज कुछ लोगों को बुला रहा हो। अभी समय तो हो गया है, सतपुरा मेस के पराठे याद आ रहे हों। आपमें से कई साथी विंड टी पर भी कुछ और पल भी बिताना चाहते होंगे, और विंड टी पर जाए तो मुझे भी याद करना। कोई अपने डिपार्टमेंट में एक बार फिर जाना चाहेगा। कोई अपने पसंदीदा अड्डे पर कुछ देर और बैठना चाहेगा।

और साथियों,

इन भावुक पलों में, मैं एक बात आपसे जरूर कहूंगा, जब-जब जीवन आपको पीछे मुड़कर देखने का अवसर देगा, तो ये कैंपस लाइफ, आपके दोस्त, टीचर्स, मेंटोर्स और सपोर्ट स्टाफ, जो आपका परिवार बन गए हैं, आपके प्रोफेसर्स, जिन्होंने आप जैसी प्रतिभाओं को गढ़ने की ज़िम्मेदारी उठाई और आपका ये 'इंस्टी', जो धीरे-धीरे आपका अपना घर बन गया। आप अपनी हर सक्सेस में इन सबको याद करेंगे। इन सबके लिए thankful होंगे। और इसलिए, इन्हें एक asset के तौर पर यहाँ से लेकर के निकलना, भूल मत जाना, छोड़ मत जाना, साथ ले जाना। मेरा सुझाव होगा कि जाते-जाते यहाँ के हर सदस्य से मिल करके जाइए, और आप कहीं भी रहें, कोशिश करिएगा, ये रिश्ता हमेशा-हमेशा ताजा बना रहे।

साथियों,

आज आप ऐसे समय में इस Institute से निकल रहे हैं, जब दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है। आज दुनिया की Strategic Equations बहुत तेजी से बदल रही हैं। Global Power Balance भी प्रति पल बदल रहा है। और इसके पीछे सबसे बड़ी फोर्स है -टेक्नोलॉजी की स्पीड। आज कोई भी निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि अगले 20-30 वर्षों की दुनिया कैसी होगी।

लेकिन साथियों,

जब-जब बदलाव का दौर आता है, तब-तब चुनौतियां भी आती हैं और नए अवसर भी पैदा होते हैं। दुनिया बदलेगी, टेक्नोलॉजी भी बदलेगी, इंडस्ट्रीज़ बदलेगी, प्रोफेशन्स भी बदलेंगे। लेकिन, इन सबके बीच मेरी बात याद रखिएगा, जो सीखेगा, वो जीतेगा। जो नए challenges के नए solutions खोजने का साहस रखेगा, Challenges उसके लिए chances बन जाएंगे। और आपने, यही तो IIT दिल्ली से सीखा है। आख़िर आपकी ये डिग्री क्या कहती है? क्या ये सिर्फ़ इस बात का प्रमाण है कि आपने एग्जाम पास किया? अच्छा CGPA हासिल किया? या एक अच्छा Placement हासिल किया? निश्चित रूप से इन सबका अपना महत्व है, लेकिन मुझे लगता है, आपकी डिग्री दुनिया को ये बताती है कि आप कठिन समस्याओं का समाधान करना जानते हैं। आप अपने IIT दिल्ली के सफर को याद कीजिए, यहां तक पहुंचना आसान नहीं था, यहां की पढ़ाई भी आसान नहीं थी। लेकिन आपने हार नहीं मानी। ये डिग्री आपको एक दिन में नहीं मिली, एक-एक विषय, एक-एक प्रोजेक्ट, मिड सेम, एंड सेम, इन्हीं छोटे-छोटे कदमों ने आपको यहां तक पहुंचाया है। जीवन भी इसी सिद्धांत पर चलता है। जब कभी कोई चुनौती बहुत बड़ी लगे, तो उससे घबराइए मत, उसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दीजिए। आपने खुद देखा है, कैसे लैब में कोई problem dead end तक, यानी लगने लगती थी। Simulation में solution खोजने में घंटे या दिन निकल जाते थे। लेकिन फिर आपने problem solve भी की और कुछ नया लेकर भी आए। इसी तरह, लाइफ में भी मुश्किलें आएंगी, लेकिन मुश्किलों का स्वभाव होता है, वो अकेली नहीं आती है, मुश्किल जब आती है ना, तो साथ-साथ मौके भी लेकर आती है। सबको बस अलर्ट रहना है, सतर्क रहना है। इस संस्थान ने जो सिखाया है, उसे बार-बार याद रखना है।

साथियों,

मैं लाइफ की कुछ प्रैक्टिकल बातें भी आपसे शेयर करना चाहता हूं। कैंपस का जीवन और कैंपस के बाहर का जीवन, इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर होता है। IIT की परीक्षा में सिलेबस होता है, लेकिन जिंदगी की परीक्षा में सबकुछ Out of Syllabus होता है। आप याद करिए, कैंपस लाइफ में सारे फंडे Clear होते थे। क्या पढ़ना है, कौन-सा असाइनमेंट पूरा करना है, कौन-सी परीक्षा देनी है, सब पहले से तय होता था। लेकिन जिंदगी कुछ अलग तरह से चलती है, वहां न कोई तय Course होता है, न कोई Question Paper होता है। कई बार तो, ये भी कोई नहीं बताता कि असली सवाल क्या था, वो सवाल भी आपको खुद पहचानना पड़ता है। मैंने IIT के अनेक Alumni की यात्रा को देखा है। उनकी सक्सेस का कारण सिर्फ ये नहीं था कि उन्होंने सही जवाब दिए, उनकी सक्सेस का कारण ये था कि उन्होंने वो सवाल पहचाने, जिन्हें दुनिया ने सवाल मानना ही छोड़ दिया था। उन्होंने उन समस्याओं का समाधान खोजा, जिनके साथ बाकी लोग समझौते कर चुके थे। और इसलिए, लाइफ में curiosity बनाए रखिए, अपनी learning instinct को जगाए रखिए, चेतना बनाए रखिए। जो बातें बिना सोचे-समझे स्वीकार कर ली जाती हैं, जरा उन्हें परखिए, उन पर सवाल उठाइए। लेकिन सिर्फ सवाल पूछकर मत रुकिए, उनका समाधान खोजने का साहस भी रखिए। यही सोच, आपकी अलग पहचान बनाएगी।

साथियों,

आप सब जानते हैं, हर पीढ़ी के सामने उस Time Period की अपनी चुनौतियां होती हैं और हर पीढ़ी का अपना एक राष्ट्रीय दायित्व भी होता है। हमारे देश ने गुलामी का वो समय भी देखा है, जब उस पीढ़ी के सामने सिर्फ एक ही लक्ष्य था- भारत की आजादी। उसके लिए उन्होंने sacrifice किया, लंबा struggle किया। आज हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, इसके पीछे उस पीढ़ी का तप, त्याग और बलिदान है।

और साथियों,

आज के इस दौर में हमारे सामने चुनौतियाँ भी अलग हैं, और इसलिए हमारे दायित्व भी अलग हैं। अपने जीवन के अगले 30-35 साल में आप जो कुछ भी करेंगे, वो विकसित भारत की हमारी यात्रा को प्रभावित करेगा। इसलिए, आपके हर निर्णय का आधार ये भी होना चाहिए कि इससे देश को क्या फायदा होगा? इससे देश की कौन सी जरूरत पूरी होगी। आज भारत Economic Self-Reliance, Technological Self-Reliance, Industrial Self-Reliance ऐसे हर सेक्टर में आत्मनिर्भर बनने के लिए काम कर रहा है। यही विकसित भारत की मजबूत नींव का सबूत है। इस मजबूत नींव पर आपको एक भव्य-सुंदर विकसित भारत का निर्माण करना है।

साथियों,

विकसित भारत की इस यात्रा में आपकी भूमिका बहुत बड़ी है। देश का युवा जितना सशक्त होगा, उतना ही देश सशक्त होगा। इसी सोच के साथ हमने कई ऐसे सेक्टर्स Open किए हैं, जहां युवाओं के लिए Entry ही एक तरह से बंद हुआ करती थी। सरकार की आधुनिक नीतियों की वजह से आज देश में युवाओं के लिए नए-नए सेक्टर्स भी बन रहे हैं।

साथियों,

पिछली बार जब मैं आपके सीनियर्स के Convocation से virtually जुड़ने का मुझे अवसर मिला था, तब मैंने युवाओं के लिए Space Sector में हो रहे रिफॉर्म्स की चर्चा की थी। तब तक इस सेक्टर में लगभग पूरा काम सरकार ही करती थी। लेकिन आज, वही Space Sector हजारों युवाओं के लिए नए अवसरों का आकाश बन चुका है। आज हमारे युवा अपने Launch Vehicles बना रहे हैं, रॉकेट लॉन्च कर रहे हैं और ऐसी उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं, जो दुनिया के गिने-चुने देश ही हासिल कर पाए हैं। मुझे विश्वास है, आज कहीं न कहीं, देश का कोई युवा इंजीनियर गर्व से कह रहा है- "First in my bloodline to build a rocket". Semiconductor Sector का उदाहरण भी हमारे सामने है। जब हमने इस दिशा में कदम बढ़ाया, तो कुछ लोगों ने सवाल उठाए। कहा गया, भारत ये नहीं कर पाएगा। लेकिन आज, पहली सेमीकंडक्टर यूनिट्स में प्रोडक्शन शुरू हो चुका है। मैं साफ मानता हूं, चिप से लेकर के शिप तक सब कुछ यहीं पर, आप ही के हाथों से बनेगा। और कहीं कोई युवा पूरे आत्मविश्वास से कह रहा है- "First in my bloodline to make a chip in India".

साथियों,

आज आप हमारे Drone Sector को भी देखिए, आज इस सेक्टर में युवा नई-नई संभावनाएं तैयार कर रहे हैं। कहीं ड्रोन से खेतों में काम लिया जा रहा है, ड्रोन दवाइयां पहुंचा रहा है, ड्रोन देश की रक्षा-सुरक्षा में मदद कर रहा है। और आज कहीं कोई युवा कह रहा है -"First in my bloodline to make a drone”.

साथियों,

भारत की Startup Revolution को इसी पीढ़ी के आप जैसे युवाओं ने ही तराशा भी है, ताकत भी दी है। इसी Institute से कितने ही Founders निकले हैं। अगर एक Institute से इतना कुछ हो सकता है, तो सोचिए, पूरे देश में कितनी बड़ी ताकत तैयार हो रही है। Unicorns, Digital Payments, FinTech Revolution इन सभी ने देश के लाखों युवाओं को पहली बार कुछ नया करने का अवसर दिया है।

साथियों,

अभी ऐसे भी अनेक सेक्टर्स हैं, जहां भारत अपनी नई यात्रा शुरू कर रहा है और बड़ी जिम्मेदारी के साथ और बड़ी उम्मीदों के साथ देश आप जैसे युवाओं की ओर देख रहा है। Artificial Intelligence, डेटा सेंटर्स, क्रिटिकल मिनरल्स, Deep Sea Exploration, Batteries, Power Storage, एनर्जी सिक्योरिटी, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, Quantum Computing ऐसे अनेक क्षेत्र आपके talent, आपके इनोवेशन और आपकी लीडरशिप का इंतजार कर रहे हैं, और मैं भी इंतजार कर रहा हूं।

साथियों,

अब एक और बड़ी संभावना आप सबके सामने है, और वो नया अवसर है- रिसर्च। आज देश को नई-नई research की बहुत जरूरत है और research पर हमारा उतना ही फोकस भी है। Prime Minister's Research Fellowship हमारे प्रतिभाशाली युवाओं को Research करने का अवसर दे रही है। आइडियाज को आगे बढ़ने का मौका मिले, इसके लिए Research Development and Innovation Scheme शुरू की गई है। अनुसंधान National Research Foundation की स्थापना भी हुई है, ताकि देश में Science और Research को नई ताकत मिल सके। रिसर्च सेक्टर में एक लाख करोड़ रुपए तक की फंडिंग की व्यवस्था की जा रही है। अंग्रेजी में बोलूं, One Lakh Crore. ये आपके लिए बता रहा हूं।

इसी तरह साथियों,

Academic resources की access को भी आसान बनाया गया है। One Nation One Subscription के माध्यम से आज दुनिया की प्रतिष्ठित Research Journals देश के छोटे से छोटे शहर में बिना किसी अतिरिक्त लागत के पहुंच रही हैं।

साथियों,

मुझे पता है, अभी इस दिशा में हमें लंबी दूरी तय करनी है और ये काम रिसर्च को लेकर आप सबके कमिटमेंट से ही हो सकता है। इसके लिए देश को आपसे अपेक्षा भी है और सबसे बड़ी बात, आप पर भरोसा भी है।

साथियों,

अब मैं आपसे थोड़ा distraction की बात करूंगा। जब हम बड़े गोल्स को achieve करने के लिए प्रारंभ करते हैं, निकलते हैं, तो एक बड़ा distraction भी हमारे सामने आता है। ये distraction होता है - एक दूसरे से comparison का, किसी को क्या Package मिला, कौन किस कंपनी में गया, किस शहर में गया, किस देश में गया, किसने Startup शुरू किया। आज के Social Media के दौर में, ये तुलना कभी खत्म नहीं होती। लेकिन याद रखिए, जिंदगी कोई लीडर-बोर्ड नहीं है, आपकी असली दौड़ किसी और से नहीं, खुद अपने आप से है। हर दिन कल से बेहतर बनने की कोशिश करते रहिएगा। साथ ही, अपनी Physical Health, अपनी Mental Health का भी ध्यान रखिएगा।

साथियों,

मैं सभी स्टूडेंट्स को एक बार फिर बहुत-बहुत बधाई देता हूं। आपके माता-पिता को, परिवारजनों को विशेष बधाई देता हूं, आपके शिक्षकों को और उन सभी लोगों को भी मेरी बहुत-बहुत शुभकामनाएं हैं, जो इस पूरी यात्रा में हर कदम पर आपके साथ खड़े रहे। आप सभी का भविष्य उज्ज्वल हो, आप निरंतर नई ऊंचाइयों को छुएं, इसी मंगलकामना के साथ बहुत-बहुत धन्यवाद।

नमस्कार!