मा. मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के वरद हस्तों से

६३वें वन महोत्सव तथा श्री गोविंद गुरु स्मृति वन का लोकार्पण कार्यक्रम

मानगढ़ हिल, संतरामपुर तालुका, पंचमहाल

३० जुलाई, २०१२

 गोविंद गुरू की प्रेरणा से देश की आजादी की लड़ाई में जिन्होंने अपना रक्त बहाया है ऐसी इस पवित्र भूमि पर आए हुए मध्य प्रदेश, राजस्थान तथा गुजरात से आए हुए मेरे सभी प्यारे आदिवासी भाइयों और बहनों...

हली बार ऐसा हो रहा होगा कि वन में कोई सरकार वन महोत्सव कर रही हो..! गुजरात सरकार ने एक विशेषता खड़ी की है, और विशेषता यह है कि वन महोत्सव के जरिए मात्र पर्यावरण और वृक्षों की बात करके रूकने के बजाए इस वन महोत्सव को सांस्कृतिक विरासत के साथ जोड़ा जाये, आम आदमी की श्रद्घा के साथ जोड़ा जाये और एक बार कोई बात श्रद्घा के साथ जुड़ जाती है, तो फिर उसके बाद उसके लिए कोई अभियान चलाने नहीं पड़ते। क्या आपने कहीं भी देखा है कि भाई, तुलसी को नुकसान न पहुँचाएं ऐसा बोर्ड कभी लगाना पड़ता है? नहीं, कारण कि सभी के मन में यह बात बैठ गई है कि तुलसी अत्यंत पवित्र होती है, भगवान का रूप होती है इसलिए उसे नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए। यह सब के दिमाग में बैठ गया है। एक बार किसी बात को लेकर श्रद्घा पैदा हो जाती है तो फिर समाज खुद ही उसका संरक्षण भी करता है, संर्वधन भी करता है। और इसलिए इस राज्य सरकार ने वन महोत्सव की कल्पना को ही बदल दिया है। दूसरी बात ये कि ये वन महोत्सव इतने सालों से चल रहे हैं तो वे समाज के लिए स्थायी रूप से उपयोगी गहना क्यों न बने? मात्र एक समारोह करके पांच-पचास वृक्षों को लगा कर चला जाया जाए या उसे एक यादगार स्मृति के रूप में तैयार करें, राज्य की संपत्ति को बढ़ाएं, सामाजिक जीवन की आवश्यकताओं में एक सुविधा प्रदान करना, ऐसे एक शुभ उद्देश्य को लेकर, एक सुखद उद्देश्य के लिए यह सरकार वन माहोत्सव कार्यक्रमों को भी समाज के लिए स्थायी रूप से व्यवस्थाएं विकसीत करने वाले एक नए रूप के साथ आई है।

प अंबाजी जाओ तो अंबाजी में धर्मशाला मिल जाती है, अंबाजी में मंदिर का आसरा मिल जाता है, पर परिवार के साथ किसी जगह पर खुले में बैठना हो तो जगह नहीं मिलती। वन महोत्सव तो करना ही था, तो हमने तय किया सालों पहले, कि अंबाजी के पास में कोई एक पहाड़ी हो, जिसे कोई देखता भी नहीं था और जाता भी नहीं था, वहाँ हम मांगल्य वन बनाएं। धीरे धीरे मांगल्य वन इनता बड़ा हो गया कि भादव की पूनम पर लाखों लोग जब अंबाजी के दर्शन के लिए जाते हैं तो ये मांगल्य वन उनके लिए मंगलकारी साबित हो गया है, आर्शीवाद रूप बन गया है। जैन समाज के यात्री, खास तौर पर दिगम्बर समाज, तारंगाजी की यात्रा करने जाते हों। तारंगा जा कर आप पहाड़ी को देखें तो एक भी झाड़ वहाँ देखने को नहीं मिलता और एक पट्टा तो एसा है कि जहाँ धूल ही उड़ती हो, वीरान भूमि, पत्थरों के ढेर... उसके बीच कोने खोपचे में पड़े मंदिर, ऐसी भग्नावस्था..! तांरगाजी जैसा तीर्थ स्थल, वहाँ हमने तय किया कि ‘तीर्थंकर वन’ बनाया जाएगा और 24 वें तीर्थंकर जिनको जिस पेड़ के नीचे बोध हो गया था, उस वृक्ष को बोया जाएगा और जो तीर्थ यात्री वहाँ भगवान महावीर की उपासना के लिए तांरगाजी आते हैं उन्हें कहा गया कि उन पौधों में थोड़ा-थोड़ा पानी चढ़ाते हुए जाएं, ये भी एक पुण्य का काम है और आज तीर्थंकर वन तैयार हो गया है। भाइयों और बहनों, श्रावण का महिना चल रहा है, भोलेनाथ को सब याद करते हैं। आप सोमनाथ जाओ तो समुद्र की खारी हवा चलती है, वहाँ भी हराभरा क्यों ना हो? सोमनाथ के मंदिर में कोई आता है, देश भर के लोग आते हैं तो सोमनाथ के मंदिर का वातावरण मनभावन क्यों ना बनाएं? एक वन महोत्सव हमने सोमनाथ में किया। हरिहर वन बनाया और केवल हरिहर वन ही नहीं बनाया, भगवान सोमनाथ को, भोलेनाथ को जो वृक्ष पसंद हों ऐसे वृक्ष भी लगाए गए, बेल के वृक्षों का घन खड़ा कर दिया गया। शामलाजी में हमारा कालिया, आपके आदिवासी भील समाज का कालिया, शामलाजी में विराजता है। उदयपुर या श्रीनाथजी आते जाते लोग अगर समय हो तो शामलाजी का चक्कर लगाते हैं, पर रूकते नहीं हैं। हमने शामलाजी में इस कालिया का वन बनाया, शामल वन बनाया और केवल इतना ही नहीं, विष्णु भगवान को रोज सुबह कमल के पुष्प चढ़ाए जाते हैं, ये ताजे पुष्प इस कालिया वन में मिले इसके लिए व्यवस्था की गई। आज कोई भी यात्री वहाँ जाए और अब तो वहाँ कैसा सुमेल है, टेक्नोलोजी का उपयोग किया गया है जिसके उपयोग से वहाँ जानेवाले बच्चे बॉटनी का अध्ययन कर सके और कियोस्क में एक्जाम देने के बाद स्वयं मार्क्स भी मिल सके ऐसी व्यवस्था की गई है। बच्चे शामलाजी के दर्शन भी करते हैं और साथ साथ इस बॉटनिकल गार्डन का दर्शन भी कर लेते हैं। भाइयों और बहनों, पालिताणा। तीर्थ क्षेत्र की यात्रा के लिए लोग आते हैं, पालिताणा के ऊपर जाते हैं, रास्ते में एक सुंदर अच्छी जगह चाहिए। हमने वहाँ पावक वनबनाया और पावक वन की विशेषता ऐसी की गई कि उसमें पूरे शरीर की रचना की गई और कौन सा औषधीय वृक्ष किस प्रकार के रोग के लिए काम में आता है... जैसे घुटना हो, तो शरीर में घुटने के पास वृक्ष लगाया, ह्दय की बीमारी में काम आने वाले वृक्ष को जहाँ ह्दय हो वहाँ बना दिया, आंख की बीमारी में काम करने वाला वृक्ष हो तो जहाँ आंख होती है वहाँ बना दिया..! गरीब से गरीब, अनपढ़ से अनपढ़, सामान्य से सामान्य व्यक्ति को भी समझ में आ सकता है कि शरीर के लिए उपयोगी कौन कौन से वृक्ष हैं, औषधी के रूप में कैसे उपयोग होता है और आज लोग इसके अभ्यास के लिए वहाँ आते हैं। घंटे दो घंटे वन में घूमें तो उन्हें ये पता चल जाता है कि इस वृक्ष का क्या महत्व है..! भाइयों और बहनों, ऐसे तो अनेक अभिनव प्रयोग किए हैं। चोटीला जाओ तो भक्ति वनदेखने को मिलता है। आप पावागढ़ आईये तो यहाँ पावागढ़ के अंदर विरासत वनबनाया गया है। वर्ल्ड हेरिटेज की जगह हो चंपानेर की, एक तरफ मां काली विराजमान हो और इन दोनों की साक्षी के रूप में खड़ा हो ऐसा हमने विरासत वन बनाया है।

र आज जब वन महोत्सव की बात आई तब गोविंद गुरू, भाइयों आदिवासियों की छाती गज भर फूल जाए ऐसा नाम, किसी भी भारत भक्त का सिर ऊंचा हो जाए ऐसा नाम। लेकिन बदकिस्मती से इतिहास के पन्नों में इस नाम को मिटा दिया गया। ज़्यादा से ज़्यादा पांच-पचास परिवार, या दो-चार महंत ही इन्हें याद करते होंगे इतना सीमित कर दिया था। इस क्षेत्र के लोग बारह महीने में एक बार शायद भक्तिभाव के कारण पूर्णिमा के मेले में आते हों उतनी ही उनकी गणना रह गई।  भाइयों और बहनों, यह एक एतिहासिक घटना है और इसकी शताब्दी पूरी होने जा रही है तब 1913 में, आज से निन्यानवे साल पहले, जिनका अब शताब्दी वर्ष शुरू हुआ है, इसी भूमि पर गोविंद गुरु की प्रेरणा से नि:शस्त्र समाज सुधारक के रूप में काम करने वाले भक्तों का समूह, संत सभा के लोग, इस संत सभा के लोग समाज को सुधारने का काम करते थे, अंग्रेज सल्तनत के सामने अपनी आवाज उठाते थे और गोविंद गुरू से ये अंग्रेज सल्तनत काँप गई। पंचमहल जिले के संतरामपुरा-दाहोद क्षेत्र में भेखधारी एक समाज सुधारक, वह चलता जाये, फिरता जाये, मिलता जाये, बात करता जाये और लोगों में एक नई चेतना जगाता जाये और उसका परिणाम क्या आया? सीधे लंदन तक खबर पहुंची कि यह एक ऐसा आदमी है जिसके पीछे पीछे ये आदिवासी भाईयों अपना जीवन कुर्बान कर देने के लिए तैयार हो गये हैं, आदिवासी अपनी जिंदगी देने को तैयार हो गये हैं और ये जो इतना बड़ा तोप का गोला यदि अंग्रेजों की ओर घूम गया तो उनका कत्लेआम हो जाएगा ऐसा डर था। गोविंद गुरू को सीधा करने के लिए षडंयत्र रचे गए। स्पेशल लोग नियुक्त किए गए, और यह तय किया गया कि गोविंद गुरू को खत्म कर दिया जाए। लेकिन गोविंद गुरू के भक्त ऐसे थे कि वे आदिवासी भाइयों ने भारत माता की आजादी के लिए अंग्रेजों के सामने झुकना पंसद नहीं किया, अंग्रेजों की फौज आई तो भागना पंसद नहीं किया, अंग्रेजो की फौज आई तो गोविंद गुरू को अकेला छोड़ कर भाग जाने की कोशिश नहीं की, बल्कि अंग्रेजों के सामने गए मेरे वीर आदिवासी, अंग्रेजों के सामने लड़े। उनकी तोप की नलियाँ थीं और बंदूक की नलियाँ थीं, गोलियोँ की बौछार चल रही थी और एक के बाद एक मेरे आदिवासी भाई शहीद होते गए पर गोविंद गुरू पर आंच ना आए इसके लिए अपना बलिदान देते गए। लाशों के ढेर लग गए। आप सोचो, जलियांवाला बाग से दोगुने लोग यहाँ शहीद हुए थे। जलियांवाला बाग का नाम तो इतिहास के पन्नों में शामिल है, पर मानगढ़ का कोई उल्लेख न हो इस तरीके से इतिहास को भूला दिया गया है, मेरे आदिवासी भाइयों को भूला दिया गया है। देश की आजादी के लिए मरने वाले बिरसा मुंडा हो कि गोविंद गुरू की प्रेरणा से शहीद होने वाले पन्द्रह सौ से ज्यादा मेरे भील युवा हों, इन सभी लोगों ने भारत माता को आजाद करवाने के लिए अपने जीवन समर्पित कर दिये थे, बलिदान दिया था पर इतिहास में इन्हें भुला दिया गया। और आज इस बात को ठोक बजाकर दुनिया के सामने मुझे लाना है। जब उनकी शताब्दी जब मनाई जाएगी, पूरा वर्ष आदिवासी समाज के लोग यहाँ आएगें, यात्राएं निकलती रहेंगी, लगातार यात्राएं चलेंगी और 2013 में जब शताब्दी वर्ष पूर्ण होगा तब हमें गर्व होगा कि महात्मा गांधी की शताब्दी हर कोई मनाता है, पंडित नेहरू की शताब्दी हर कोई मनाता है, महापुरुषों की शताब्दी हर कोई मनाता है पर कोई तो चाहिए जो गोविंद गुरू को, इस महान विरासत को, इस शहादत को, उन 1500 से ज्यादा अनाम लोग जिनकी किसी को खबर नहीं है वे अगर यहाँ शहीद हुए हों तो उन शहादत की शताब्दी भी मनानी चाहिए। गुजरात में कोई तो ऐसा है जिसको उनकी याद आयी है और उसे मनाना है। कुछ लोगों को ये लगता है कि ये सब तो चुनाव आ रहे हैं इसलिए हो रहा है। अब भैया, यह शताब्दी क्या हमने तय की थी..? चुनाव और शताब्दी दोनों साथ में आ जाएं तो क्या वह हमारा कसूर है..? वह 1912 में हुआ था और ये 2012 में आया, इसमें हमारा कोई अपराध है, भाई? और इन सारी बातों को चुनाव के साथ जोड़ कर, उसे राजनीति का रूप देकर, इन बलिदानों के महत्व को छोटा करने वाले लोग शहीदों का अपमान कर रहे हैं..!

भाइयों और बहनों, श्यामजी कृष्ण वर्मा, हिंदुस्तान में सशस्त्र क्रांति का जिसने नेतृत्व किया, वीर सावरकर जैसे महापुरूष जिसने दिए, मदन लाल धींगरा जैसे लोगों में वीरता को प्रेरित किया, भगतसिंह-सुखदेव-आजाद जैसे लोग जिनको प्रेरणा मानते थे वे श्याम कृष्ण वर्मा, अपने गुजरात के कच्छ का बेटा, अंग्रेजों के सामने लंदन में अंग्रेजों की नाक के नीचे आजादी की लड़ाई लड़ते थे, इस देश की सशस्त्र क्रांति करने वाले लोगों को शिष्यवृत्ति के द्वारा तैयार करते थे। वह श्यामजी कृष्ण वर्मा 1930 में जब गुजर गए तब लिख कर गए थे कि मुझे तो जीते जी आजादी देखने को नहीं मिल सकी, पर मेरी अस्थियों को संभाल कर रखना, मेरी हड्डियों को संभाल कर रखना और जब मेरा देश आजाद हो जाए तो मेरी अंतिम इच्छा है कि मेरी अस्थियां मेरे आजाद हिंदुस्तान की धरती पर ले जाई जाए, जिससे मुझे मोक्ष मिले, मुझे शांति मिले। ऐसा श्यामजी कृष्ण वर्मा लिख कर गए थे। 1930 में उनका स्वर्गवास हुआ और 1947 में देश आजाद हुआ। 15 अगस्त को तिरंगा झंडा फहराया गया उसके दूसरे ही दिन दिल्ली सरकार ने आदमी को भेज कर अस्थियां हिंदुस्तान लानी चाहिए थीं। मगर उन्हें शहीदों की पड़ी ही नहीं थी, देश के लिए जीने वाले, देश के लिए मरने वालों की परवाह नहीं थी और इसलिए श्यामजी कृष्ण वर्मा की अस्थियां वहाँ पड़ी रहीं। भाइयों और बहनों, ये सौभाग्य मुझे मिला, भारतमात के इस सपूत की अस्थियां मैं कंधे पर उठा कर विदेश की धरती से 2003 में यहाँ लेकर आया। और आज श्याम कृष्ण वर्मा का एक अत्यंत प्रेरक स्मारक कच्छ के मांडवी में बनाया गया है। कोई भी भारत माता को प्रेम करने वाला नागरिक वहाँ जाएं तो उसे देखते ही लगेगा कि ऐसे ऐसे थे हमारे वीर पुरूष..! आज हर साल हजारों की संख्या में विद्यार्थी श्यामजी कृष्ण वर्मा के इस स्मारक की मुलाकात लेते हैं, देश-दुनिया के पर्यटक श्यामजी कृष्ण वर्मा के इस स्मारक को देखने आते हैं। एक दिन ऐसा आएगा कि गोविंद गुरू की स्मृति में यहाँ जो स्मारक बना है, उनकी शहादत को याद किया है ऐसा ये शहीद वन स्मृति वन बना है, यहाँ भी देश और दुनिया के लोग उन पन्द्रह सौ से ज्यादा मेरे शहीद भील कुमारों पर हमेशा पुष्प वर्षा करने के लिए इस धरती पर आएंगे, ऐसा वातावरण बनाने का काम मैंने किया है।

भाइयों और बहनों, आजादी को इतने साल हो गए, इतने सारे समाज सुधारक हुए। आप देखिए  हमने वहाँ एक  छोटा सा प्रदर्शन रखा है। उस जमाने में गोविंद गुरू की कैसी प्रेरणा देते थे, कैसे वचन कहते थे..! ये वचन आज भी काम में आए ऐसे शब्द वे उस समय कहते थे,एक-एक बात पर अमल हो इसके लिए भगत पंथ चला कर भक्तों को तैयार करके समाज सुधार का काम करते थे। और जीवन के कितने साल जेल में बिताए, अहमदाबाद की साबरमती जेल में भी रहे। अंग्रेज सरकार को डर लगा तो हैदराबाद की जेल में भेज दिया, हैदराबाद की जेल में जिंदगी गुजारने पर मजबूर किये गए थे। ये गोविंद गुरू, उन्हें भूला दिया गया है। आदिवासियों के कल्याण के लिए अपना जीवन खपा देने वाले व्यक्ति को इस देश में भूलाया नहीं जाएगा। आने वाली पीढिय़ां याद रखे इसके लिए हमने सकंल्प किया है और यह बात हम पहुँचाना चाहते हैं। शहादत व्यर्थ नहीं जा सकती और जब भील कुमारों को पता चलेगा कि उनके पूर्वजों ने कितना बड़ा बलिदान दिया था, तब जैसे एकलव्य से प्रेरणा ली जाती है वैसे ही गोविंद गुरू से भी प्रेरणा मिलेगी ऐसा मुझे विश्वास है।

भाइयों और बहनों, आजादी के इतने सारे सालों में आदिवासियों का कल्याण करने में ये सभी सरकारें निष्फल रही हैं। आदिवासियों के नाम पर विपुल मात्रा में वोट ले गए, पर आदिवासियों के जीवन में बदलाव नहीं आया। इस सरकार ने प्रयास किया है कि आदिवासियों के घर तक पीने का पानी कैसे पहुंचे, आदिवासियों के खेतों तक सिंचाई का पानी कैसे पहुंचे, आदिवासियों को रहने के लिए घर कैसे मिले, पेड़ों के नीचे जिंदगी गुजारने वाले आदिवासियों को अपना घर किस तरह से मिले ये चिंता इस सरकार ने की है। भाइयों और बहनों, शून्य से सोलह तक के गरीबी रेखा के नीचे जीवन गुजारने वाले सभी आदिवासियों को मकान देने का काम पूरा कर दिया गया है। और अब उठाने वाले हैं, सत्तरह से बीस के बीच आने वाले लगभग दो लाख से ज्यादा आदिवासीयों को घर देने का काम, जो आने वाले दिसंबर तक हम पूरा करने वाले हैं। आप सोचिए, पचास सालों में जो काम कोई नहीं कर सका है, वो काम करने के लिए संघर्ष उठाया है और ये काम का लाभ लोगों को मिले इसके लिए काम किया है। 15,000 करोड़ रूपये का पैकेज, वनबंधु कल्याण योजना में नियत किए गए थे 15,000 करोड़ और पहुँचाया 18,000 करोड़ और अब तो मामला 40,000 करोड़ रूपये तक पहुँच गया है, 40,000 करोड़ रुपये मेरी आदिवासी जनता के लिए। भाइयों और बहनों, समाज को लड़वाने के लिए आरक्षण के नाम पर दंगे करवाते हैं, सब कुछ करते हैं, दूसरों को उकसाने की बातें करते हैं। लेकिन मेरे आरक्षण का लाभ कैसे मिल सकता है, भाइयों? मेरे आदिवासी बेटे को डॉक्टर बनना है, मेरे आदिवासी बेटे को इंजीनियर बनना है, तो पहले बारहवीं कक्षा तक की विज्ञान प्रवाह की स्कूल तो होनी चाहिए की नहीं..? आपको जानकर दु:ख होगा भाइयों-बहनों, उमरगांव से अंबाजी तक की पूरी आदिवासी पट्टी में विज्ञान संकाय की एक भी बारहवीं कक्षा नहीं थी। मैं जब 2001 में आया तब इस राज्य में 45 तालुके ऐसे थे जहाँ पर बारहवीं कक्षा में विज्ञान संकाय वाला विद्यालय ही नहीं था। जब बारहवीं कक्षा में विज्ञान संकाय ही नहीं है तो डॉक्टर या इंजीनियर कैसे बना जा सकता है? आरक्षण का लाभ कैसे मिलेगा? और आरक्षण के नाम पर झगड़ा करके अपनी राजनीति चलाते रहते हो लेकिन आदिवासियों का भला कभी नहीं किया। भाइयों और बहनों, हमने उन 45 के 45 तालुकाओं में विज्ञान संकाय की बारहवीं कक्षा के विद्यालय प्रारंभ करवाए और इसका परिणाम ये आया कि आज मेडिकल, इंजीनियरिंग की आदिवासियों की सभी सीटें भरने लगी। आदिवासी लडक़े इंजीनियर बने, आदिवासी लडक़े डॉक्टर बने इस दिशा में हमने काम किया। नर्सिंग की कॉलेज प्रारंभ की, आदिवासी क्षेत्र में आई.टी.आई. प्रारंभ की, आदिवासियों के बच्चे आज पढ़ें और आगे बढें इसकी चिंता की।

क जमाना था, मेरे पंचमहाल तालुका के आदिवासी 44 डिग्री तापमान होने पर भी रोड का काम करने के लिए, डामर का काम करने के लिए शहरों में तपते थे, चिलचिलाती धूप में डामर की सड़क बनाने का काम करते थे, ऐसे दिन थे। आज मुझे गर्व के साथ कहना है कि दाहोद और पंचमहाल जिले का एक भी ऐसा तालुका नहीं है कि जहाँ पर मेरे आदिवासी आज रोड कांन्ट्रेक्टर नहीं बने हो। जेसीबी लाने लगे हैं । अभी एक सदभावना मिशन के कार्यक्रम में मेरे इस गरीब समाज के लोग मुझे मिलने आए थे, बक्षीपंच के गधे चराने वाले और गधे पर मिट्टी उठा कर ले जाने वाले लोग मुझे मिलने आए थे। और मेरे लिए एक खिलौना लेकर आए थे, सदभावना मिशन में प्लास्टिक का खिलौना मुझे भेंट दिया। मैं हँस पड़ा, मैंने कहा कि आप लोगों ने मुझे यह प्लास्टिक की जेसीबी मशीन का खिलौना क्यों दिया? मेरे परिवार में तो खेलने वाला कोई नहीं है, मुझे हँसी आ गई। तो मुझे कहा कि साहब, हम ये जेसीबी का खिलौना इसलिए लाए हैं कि पहले हम गधे चराते थे, आपकी सरकार में ऐसी प्रगति हुई कि हमारे घर में भी जेसीबी आ गई उसका नमूना आपको बताने के लिए लाए हैं, उसका आभार व्यक्त करने के लिए आएं हैं। आज मेरे पंचमहाल के, दाहोद के आदिवासी तथा सभी तालुका में देखना मित्रों, आज मेरे आदिवासी रोड के कान्ट्रेक्टर बन गए हैं, कल तक मजदूरी करते थे। मेरा डांग जिला, आदिवासी भाइयों, इनके कल्याण के लिए कोई योजना ही नहीं थी। हमने डांग जिले में दूध  उत्पादन के काम शुरू किए, गाय-भैंसे देने की दिशा में काम किए। आज मेरे डांग जिले का आदिवासी स्वावलम्बी हो गया है। हमने दाहोद जिले में अभियान शुरू किया है, दूध उत्पादन करने की क्षमता बढ़े, दुधारी पशु उपलब्ध हों इसके लिए काम शुरू किए। हम एक ओर आदिवासी भाइयों को दूध उत्पादन के लिए गाय-भैंस प्रदान कर रहे हैं, वहीं दिल्ली सरकार ने क्या शुरू किया है, जानते हैं? दिल्ली सरकार ने कसाईखानों को सब्सिडी देने का काम शुरू किया है। पचास करोड़ रूपया कसाईखानों के लिए सब्सिडी दे रहे हैं तथा गाय का मांस विदेश में भेजो तो सब्सिडी दी जाती है और लाखों टन गाय का मांस विदेश भेजने का काम ये दिल्ली की सरकार कर रही है। यह देश तो ऐसा है कि जब 1857 की क्रांति हुई थी, वह गाय की चर्बी के ऊपर क्रांति हुई थी, बुलेट पर गाय की चर्बी है इतनी बात मात्र से हिंदुस्तान जाग गया था। इसी हिन्दुस्तान में आज दिल्ली की सरकार गाय का मांस विदेश भेजने के लिए प्रोत्साहक इनाम दे रही है..! इस बदकिस्मती के साथ देश जी रहा है तब मेरे भाइयों-बहनों, गौ माता की रक्षा के लिए गोविंद गुरू ने जिदंगी दे दी थी। गाँव-गाँव जाकर गौ पालन के लिए ज्ञान देने का काम गोविंद गुरू ने किया था। इन गोविंद गुरू से प्रेरणा लेकर इतने लोग शहीद हो गए और अंग्रेज सरकार के नाक में दम कर दिया था उस मानगढ़ भूला नहीं सकते। इस मानगढ़ ने ही गुजरात का सम्मान बढ़ाया है, इस गुजरात का गौरव बढ़ाने का काम मानगढ़ के मेरे शहीदों ने किया है। उस शहादत याद करते हुए यह ‘शहीद स्मृति वन’ हमने समर्पित किया है।

भाइयों और बहनों, पर्यावरण के सामने लडऩा है तो वृक्ष बचाने पड़ेंगे, वृक्ष लगाने पड़ेंगे। बारिश की खींच के चलते जीव कैसा व्याकुल हो जाता है..? समाज का कोई ऐसा वर्ग नहीं है जो बारिश की खींच के चलते दु:खी नहीं होता हो। राजा हो या रंक हो, बरसात कम हो तो हर कोई दु:खी होता है, हर एक के मन में पीड़ा होती है कि भाई, अब बरसात हो तो अच्छा है। कुछ निकम्मे लोग भी होते हैं, ये लोग यज्ञ करते हैं, यज्ञ करके भगवान से प्रार्थना करते हैं कि बरसात न हो तो अच्छा है, तो हमें चुनाव में आसानी रहे, बोलो ऐसी बात..! अरे भाई, चुनाव जीतने के लिए इस जनता को दु:ख में नहीं डाल सकते, इस जनता को कष्ट हो ऐसा नहीं कर सकते। अरे, चुनाव तो आएंगे और जाएंगे, पर मेरा ये समाज तो अविनाशी है। यदि इसे पानी ईश्चर की कृपा से नहीं मिलेगा तो कितनी विपदाएं आएंगी, हम सब प्रार्थना करें, गोविंद गुरू के धाम में प्रार्थना करें कि ईश्वर हमें बरसात का प्रसाद दें और हमारा गुजरात हराभरा बनने कि दिशा में आगे बढ़े, इसका अवसर हम लें। बरसात तो ईश्वर की दी हुई सबसे बड़ी कृपा है, इसके बिना जीवन संभव ही नहीं हो सकता। इस पानी के लिए पूजा इस समाज के भविष्य की गारंटी का एक साधन है। भाइयों और बहनों, विकास का मार्ग हमने लिया है, विकास के मार्ग पर जाना है, हमारे आदिवासियों की जिंदगी बदलनी है..! अभी भारत सरकार ने एक आंकड़ा जारी किया। भारत सरकार ने कहा कि पूरे देश में जो बेरोजगारी है, इसमें कम से कम बेरोजगारी कहीं है तो उस राज्य का नाम है गुजरात। यदि हमने विकास नहीं किया होता तो राज्य के नौजवानों को रोजगार नहीं मिला होता। और अगर नौजवानों को रोजगार नहीं मिलता है तो उनके परिवार की स्थिति नहीं बदलेगी और इसलिए हमारा प्रयास है कि युवाओं को रोजगार मिले। वनबंधु कल्याण योजना के जरिए, स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रम के जरिए, कौशल वर्धन के कार्यक्रमों के जरिए प्रत्येक नौजवान को काम सिखाना है ताकि पत्थर पर लात मार कर पानी निकाल सके ऐसी ताकत इनमें आए। इस ताकत को खड़ी करने का काम उठाया है।

भाइयों और बहनों, मानगढ़ जैसा वीरान प्रदेश, यहाँ पहुँचना भी कठिन है और एक पर्वत की छोटी सी चोटी पर जिस तरह से मैंने जन सैलाब देखा, हैलिकाप्टर से मैं देख रहा था कि कितने सारे आदमी खड़े थे, अंदर तो कुछ भी नहीं है। इतना बड़ा जन सैलाब, गोविंद गुरू की याद ताजा करने का हमारा जो सपना था उसका बीज बोया गया है, दोस्तों। अब गोविंद गुरू को कैसा भी ताकतवर आदमी आए तो भी भूला नहीं पाएगा। इतिहास के पन्नों से शहादत की बात को मिटाने की कोशिश करने वाले लोग अब नाकाम होंगे ऐसा ये दृश्य मुझे नजर आ रहा है। इतिहास के पन्नों से शहादत को कोई मिटा नहीं सकेगा, सशस्त्र क्रांति के वीरों को भूला नहीं जा सकता, भारत के वीरत्व को भूला नहीं जा सकता, आदिवासियों के बलिदान का भूला नहीं जा सकता, आदिवासियों की यशगाथा को भूला नहीं जा सकता और ये बड़ा काम गोविंद गुरू की धरती पर हमने किया है। मेरे आदिवासी भाइयों और बहनों, आओ, सिर्फ जंगलों को बचाना ही नहीं है, वृक्ष भी बढ़ाने हैं। यहाँ आपने देखा होगा कि एक एक गाँव को, किसी को पन्द्रह लाख, किसी को बीस लाख रूपये मिल रहे हैं। ये सरकार की योजना का लाभ लें। इतने सारे वृक्ष उगाओ, प्रत्येक वृक्ष से पैसा कमाओ, ये सरकार आपको पैसे देती है, लाखों रूपये देती है। एक एक गाँव को पन्द्रह-पन्द्रह, बीस-बीस लाख रूपया मिलता है वो आपने देखा मेरे सामने। इतने सारे रूपयों की वर्षा हो रही हो तो वृक्ष उगाने की बात में हम कमी न बरतें। वन विभाग के मित्रों को भी मानगढ़ जैसी इस जगह पर गोविंद गुरू की याद में... और यह सारी नौकरी से ऊपर की बात है। नौकरी में तो सब चलता है, पर आपने आज एतिहासिक काम किया है, सिर्फ नौकरी नहीं की है, दोस्तों। और किसी एतिहासिक काम के साक्षी बनने में जीवन का अपूर्व आनंद मिलता है। आप भी भविष्य में आपके संतानों को यहाँ दिखाने लाएंगे कि मैं जब नौकरी करता था तब हमने यह एक महान एतिहासिक काम किया था, ऐसा भाव पैदा होने वाला है। पीढ़ी दर पीढ़ी ये संस्कार पहुँचने वाले हैं और इस काम को जब हमने महसूस किया है तब फिर एक बार मेरे साथ ‘गोविंद गुरू अमर रहे’ का नारा लगाएं, फिर मैं कहूँगा ‘शहीदों’ तब आप ‘अमर रहो’ कहना...

 

गोविंद गुरू, अमर रहो... गोविंद गुरू, अमर रहो...!

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स्वर साधना, मनोकामना, आराधना। एक बहुत ही शुभ शुरुआत के बाद। अच्छा होता आप ही का कार्यक्रम चलता। आप सबको नमस्कार।

रिपब्लिक टीवी नेटवर्क के सभी दर्शक और अब तो बहुत सारी भाषाओं में भी है, तो उन सबको भी मेरा प्रणाम! मैं इस समिट में हिस्सा लेने आए सभी साथियों का भी अभिनंदन करता हूं। 24 घंटे चलने वाले चैनलों में ब्रेकिंग न्यूज इसका बहुत बड़ा महत्व होता है। और आजकल तो दुनिया में ही, पूरी दुनिया में कहीं पर भी नजर डालो, पूरी दुनिया ब्रेकिंग न्यूज के मोड पर ही है, और इतनी भागदौड़ में आप सभी, इस समिट को होस्ट कर रहे हैं, इसका हिस्सा बने हैं। और इसलिए आप विशेष बधाई के पात्र हैं। और इस बार आपकी चर्चा का विषय भी उतना ही अहम है...Great Power India: Nation First...

साथियों,

हमारे यहां शास्त्रों में कहा गया है...यतो धर्मस्ततो जयः ! यानि जय का, शक्ति का, मूल धर्म है। और धर्म यानि ड्यूटी, धर्म यानि जस्टिस, धर्म यानि समभाव, धर्म यानि संवाद, धर्म यानि संवेदना और यही तो नेशन फर्स्ट की भावना में भी समाहित है। भारत, अपनी पावर को इसी लैंस से देखता है, इसी तराज़ू पर तौलता है।

साथियों,

भारत की एक और विशेषता है और अब तो दुनिया ने भी मान लिया है। हम किसी क्षणिक घटना पर उतावले होने वाले देश नहीं है, हम वो हैं जिसने विकास और विनाश, देखा भी झेला भी है। हम वो देश हैं, जिसके जेहन में युगों की मेमरी चिप लगी हुई है, हम युगों की मेमरी चिप वाले नेशन हैं। और इसलिए भारत आज जो कर रहा है, और ये मैं बहुत जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूँ, भारत जो कर रहा है वो आने वाले एक हज़ार वर्ष का फ्यूचर लिखने वाला है। और यही दुनिया के लिए सबसे बड़ी भारत की गारंटी है। भारत, Fast-Growing Economy भी है। एक Credible Economy भी है। और भारत, rising power के साथ-साथ और अभी आप तो ढेर सारी डिक्शनरी लेकर बैठ गए थे, सुपर पावर तक ले गए। लेकिन मैं इतना जरूर कहूँगा कि भारत Reliable power है। मैं अभी दो-तीन दिन पहले G7 समिट से लौटा हूं और दुनिया का हर नेता हर देश इस बात को भली-भांति समझता है कि आज के भारत के लिए नेशन फर्स्ट ही सबसे बड़ा मंत्र है, सबसे बड़ा सिद्धांत है।

साथियों,

कुछ दिन पहले ही, हमारी सरकार को 12 साल पूरे हो चुके हैं। उसके लिए भी अर्नब ने आपको तालियाँ बजाने के लिए मजबूर कर दिया। पिछले बारह वर्षों की जो भी सिद्धियां देश की रही हैं, उनके मूल में अगर आप तराजू से तौलोगे, हर निर्णय, हर कदम, हर प्रयास उनके मूल में राष्ट्र प्रथम की भावना ही केंद्र में है। स्वच्छ भारत अभियान से लेकर मेक इन इंडिया खादी खरीदने पर जोर स्थानीय वस्तुएं खरीदने पर जोर ये सारे Initiative इसलिए सफल हुए क्योंकि देश की जनता ने देश को सबसे ऊपर रखते हुए अपना कर्तव्य निभाया। देश के नागरिकों को मैं सलाम करता हूँ।

साथियों,

यहां हमारे साथी श्रीधर वेंबु जी बैठे हैं। जब हमारे उद्यमी नेशन फर्स्ट की भावना के साथ चलते हैं, जब वो देश की आवश्यकताओं को समझते हुए अपने लक्ष्य बनाते हैं तो संस्थाएं भी बनती हैं और देश भी समृद्ध होता है। श्रीधर वेंबु जी ने क्या काम किया है, शायद यहाँ बातों में कितना निकला होगा मुझे मालूम नहीं, लेकिन अभी मैं फ़्रांस में vivatech में गया था, करीब डेढ़ 2 लाख नौजवान वहाँ होंगे, चलने के लिए भी मैं और फ्रांस के राष्ट्रपति अलग अलग स्टॉल पर जा रहे थे, देखने के लिए भई नौजवानों ने क्या काम किया है। तो हम जोहो के स्टॉल पर गए, मैं हैरान था जी, और गर्व होता था कि जोहो के स्टाल पर यूरोप के नौजवानों की जो भीड़ लगी थी और वो समझना चाहते है कि क्या है ये दुनिया में नई चीज, भारत में शायद उतनी चर्चा नहीं होगी, जितनी मैंने वहाँ फ्रांस में देखी, बधाई हो आपको।

साथियों,

सरकार की नीति और निर्णयों में नेशन फर्स्ट का क्या प्रभाव होता है, इसका एक उदाहरण हमारा आदिवासी क्षेत्र है। मैं आज कोई फिलोस्फी झाड़ने वाला नहीं हूँ, कुछ बातें जो हुई है वो हल्की फुल्की बता दूंगा और उससे आप अंदाज लगा लेंगे कि काम कैसे होता है। मैं आदिवासी क्षेत्र की बात करता हूँ। भारत के 10 करोड़ से अधिक आबादी की चर्चा, मतलब कि आदिवासी समाज की चर्चा और हम सबको पता है कि दशकों से माओवादी आतंक वहाँ अपने डेरा तंबू डालकर बैठ हुआ था। जहां 21वीं सदी में भी इन आतंकियों ने एक भी सुविधा पहुंचने नहीं दी, सरकारी एक वेहिकल नहीं गुजर सकता था वहाँ से। गोलियों से भून दिया जाता था। अनेक सरकारें आई-गईं, कई पीढ़ियां आई-गईं, लगता था कि हिंसा का ये दुर्भाग्य ऐसे ही रहेगा। आप कल्पना कर सकते हैं, 2004 से 2014 के बीच, मैं उस दस साल का हिसाब बताता हूँ, 2004 से 2014 के बीच माओवादी आंतक के कारण, 17 हज़ार से भी अधिक हिंसक घटनाएं हुईं थीं। और करीब-करीब 7 हज़ार से ज्यादा जानें गईं थी।

साथियों,

आज आपके लिए वन लाइन न्यूज होगा या टीवी पर आधे घंटे डिबेट होगी कि माओवाद आतंकवाद खत्म हो गया, चीजें ऐसी नहीं होती। उसके लिए खपना पड़ता है और इसलिए मैं बताना चाहता हूँ। और इसलिए मैं बताना चाहता हूं और आजकल जो लोग, कुछ लोग संविधान दिखाते रहते हैं, लेकिन जब ये लोग सरकार में थे और नक्सल प्रभावित इलाकों में संविधान का नाम लेने पर गोली मार दी जाती थी और तब ये लोग चुप बैठे थे, तब उनके हाथो में संविधान नहीं दिखता था, कांप रहे थे उनके हाथ। उस दर्दनाक स्थिति से कांग्रेस को कोई खास फर्क नहीं पड़ता था।

साथियों,

2014 के बाद, हालात को बदलने के लिए हम राष्ट्र प्रथम के भाव से आगे बढ़े, हम निकल पड़े। बोलते नहीं थे, बताते भी नहीं थे, करते जरूर थे। हमने संकल्प लिया कि नक्सलवाद-माओवाद को जड़ से उखाड़ फेकेंगे और आज पूरा देश नतीजा देख रहा है, आज देश में माओवादी आतंक, अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है।

और साथियों,

कई बार अंतिम परिणाम इतना बड़ा और व्यापक होता है कि उसके पीछे की मेहनत पर ध्यान नहीं जाता। रिपब्लिक टीवी के दर्शकों को मैं खासतौर पर इसके बारे में बताना चाहता हूं।

साथियों,

जिन नक्सल प्रभावित इलाकों में दिन में जाने से भी, यानी सामान्य मानवी डरा रहता था, उसको लगता था कहीं अपहरण हो जाएगा तो, कभी वसूली का डर रहता था, कभी साथ में जो कुछ भी है वो लूट लेने का डर रहता था। और जहां पर विकास की बात बोल तक नहीं सकते थे आप, लेकर के जा नहीं सकते थे, सब नामुमकिन था, ऐसे क्षेत्रों में हम हम विकास का संकल्प लेकर आगे बढ़े। वहां बीते 12 वर्षों में हमारी सरकार ने 12 हज़ार किलोमीटर से अधिक की सड़कें बनाईं। और कई बार तो हमने देखा, कई बार तो हमने देखा कि सड़क बनाने के जो हमारा साजो सामान होता है उसको जला दिया जाता था। कांट्रेक्टर को भगा दिया जाता था। अगर 25 लोग रोड पर काम करते तो 200 लोग पुलिस सुरक्षा रखते थे ताकि काम चले। यह सब इसलिए करते थे- तय किया था।

साथियों,

साढ़े 9 हज़ार से अधिक मोबाइल टावर बनाए। एक टावर नहीं लगने और लगा हुआ टावर तोड़ देते थे। क्योंकि उनको हमेशा वहां आक्रोश पैदा करना था। करीब 45,000 गांव में मोबाइल कनेक्टिविटी पहुंचाई। नक्सल प्रभावित जिलों में 1800 से अधिक बैंक ब्रांच खोली गई। करीब 75,000 बैंकिंग कॉरेस्पॉन्डेंट और 6000 से अधिक नए पोस्ट ऑफिस बनाए गए। सिर्फ बम, बंदूक और गोली के सहारे काम नहीं किया है साथियों, हमने दिलों को जीतने के लिए, ईश्वर ने जो भी शक्ति दी थी उसको खपाया था।

साथियों,

हम बुलंद इरादों के साथ नक्सल प्रभावित इलाकों में जनसामान्य की आशा, आकांक्षाओं को पूर्ण करने के लिए जा रहे थे। आप हैरान हो जाएंगे एक मशहूर नक्सली, करोड़ों रुपए का इनाम थे उसके, उसकी मां के पास हम पहली बार राशन कार्ड लेकर गए। बेटा अपनी मां को राशन कार्ड लेने नहीं देता था, आतंकवाद अपना चलाने के लिए। इतनी घटनाएं हैं, मैं हैरान था। और सरकार चुप बैठी थी, उनको संविधान उस समय तो दिखता नहीं था। लेकिन इन सारे प्रयासों का परिणाम यह आया कि जन सामान्य में एक विश्वास का नया दौर आया। आज आप देखिए बस्तर जैसे इलाकों में बम बंदूक नहीं बस्तर ओलंपिक्स की धूम है। और अब तक इस ओलंपिक के दो एडिशन हो चुके हैं। पहली बार डेढ़ लाख से अधिक युवाओं ने और दूसरी बार करीब 4 लाख युवाओं ने बस्तर ओलंपिक्स में हिस्सा लिया। यानी जहां कभी टेरर था, वहां टैलेंट को अवसर मिल रहा है, वहां स्पोर्ट्स फल-फूल रहा है।

साथियों,

12 वर्षों के इस सेवाकाल की एक और बड़ी सिद्धि रही है, यह सिद्धि है, निराशा से निकलकर आशा-आकांक्षा सबसे भरे भारत का निर्माण।

साथियों,

नक्सल कहीं और होगा लेकिन घटनाओं की पीड़ा हिंदुस्तान के हर कोने में होती थी और जिस समय नक्सल खत्म होने की बातें आने लगी तो विश्वास सिर्फ नक्सली इलाके का नहीं, हिंदुस्तान के कोने-कोने में जगने लगा। 2014 से पहले के 10 वर्षों में जो कांग्रेस सरकार चली, उससे नाराजगी केवल गवर्नेंस की नहीं थी। तब देश की निराशा इससे कहीं अधिक थी, देश उम्मीद खो चुका था, लोगों को लगता था कि कुछ हो ही नहीं सकता, कुछ बदल ही नहीं सकता।

साथियों,

पिछले 12 वर्षों में भारत ने उसी निराशा को आशा में बदला है और मुझे इस बात का सबसे ज्यादा संतोष है। आज हर किसी को यह लगता है कि थोड़ी और मेहनत करेंगे, तो यह हो सकता है। वो दिन चले गए जब एक ही बात सुनाई देती थी, कतई नहीं हो सकता, कतई नहीं हो सकता, वो जमाना चला गया, आज ये होकर रहेगा। ये जो भाव आया है यही भारत की असली सिद्धि है, और यही रियल पावर है। चुनौतियां तो आज भी बहुत है और हमेशा रहेगी और चुनौतियां बहुरूपिया होती है, वो नए-नए अवतार में सामने आती रहती है, अरे आएगी, जिस रूप में आएगी, जंग उससे भी लड़ लेंगे जी और जीत भी लेंगे। लेकिन यह हो सकता है और हम यह करके रहेंगे, जब इस भाव से देश आगे बढ़ता है, तब सपने पूरे होते हैं।

साथियों,

मैं यहां भारत के 100 से ज्यादा जिलों और 500 से ज्यादा ब्लॉक्स की चर्चा करना चाहूंगा। यह विकास के हर पैरामीटर पर पीछे छूट गए थे और पहले की सरकार ने इन पर पिछड़ा होने का ठप्पा लगा दिया था, यह तो बैकवर्ड डिस्ट्रिक्ट है, ये तो बैकवर्ड इलाका है। हमने देश के इस बहुत बड़े क्षेत्र को पिछड़ेपन की निराशा से बाहर निकालकर डेवलपमेंट की एस्पिरेशन जगाई। सबसे पहले तो हमने पहचान ही बदल दी, हमने कहा ये एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट है, ये एस्पिरेशनल ब्लॉक है, हमने एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट का प्रोग्राम बनाया, एस्पिरेशनल ब्लॉक का प्रोग्राम बनाया और सरकार ने विकास के हर पैरामीटर पर बहुत बारीकी से काम शुरू किया। इस डिस्ट्रिक्ट में ये तीन पहलू है, पहले उसमें से बाहर निकलो। यहां छह पहलू है, पहले इसमें से बाहर निकलो। बड़ा फोकस वे में काम शुरू किया। आज यह एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट और ब्लॉक्स राज्य की ओवरऑल ग्रोथ को आगे बढ़ाने का काम करने लगे हैं। जो पहले ग्रोथ को पीछे खींचते थे, इन एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट में बहुत बड़ी आबादी गरीब थी, अभाव में थी। बीते वर्षों में 25 करोड़ गरीबों ने गरीबी को परास्त किया है। तो इसमें इन एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट की एक बहुत बड़ी भूमिका है।

साथियों,

हम देखते हैं कि जब एक व्यक्ति बीमारी से मुक्त होता है, तो सिर्फ घर का वो व्यक्ति ठीक होता है ऐसा नहीं है। जब एक व्यक्ति बीमारी से मुक्त होता है, तो पूरा परिवार ठीक हो जाता है। ऐसे ही, जब घर का कोई एक बेटा-बेटी कुछ अचीव करता है, तो सिर्फ वो व्यक्ति अचीव करके नहीं आता, वो पूरा परिवार, पूरा परिवार अचीवमेंट से भर जाता है, विश्वास बदल जाता है। ऐसे ही, जब कोई गरीबी से बाहर आता है, तो सम्पूर्ण समाज का फायदा होता है, देश का फायदा होता है। 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं, निओ मिडिल क्लास में आए हैं, तो इसका फायदा केवल उन परिवारों तक नहीं रहता, बल्कि मिडिल क्लास का भी इसमें फायदा होता है। क्योंकि यह नया कंज्यूमर है, जो इकोनॉमी को ड्राइव करता है, उससे अल्टीमेटली मिडिल क्लास के लिए अवसर बनते हैं। यानी गरीबी कम होना केवल वेलफेयर का ही विषय नहीं है, यह अवसरों के विस्तार की गाथा है, नई एस्पिरेशंस की प्रेरणा है।

साथियों,

पिछले 12 वर्ष में जो इतना विशाल मिडिल क्लास देश में तैयार हुआ है, वो सरकार की बहुत बड़ी प्राथमिकता रहा है। मिडिल क्लास की Ease of Living के लिए सरकार ने हर स्तर पर काम किया है। अब जैसे अपने घर का सपना है। हर मिडिल क्लास परिवार की एक इच्छा रहती है कि भई खुद का घर हो, हर किसी को पूछोगे एक मन में रहता है मेरा अपना घर हो। 2014 में अगर किसी परिवार को अपना घर खरीदना होता था, तो होम लोन डबल डिजिट के इंटरेस्ट रेट पर मिलता था। लेकिन आज किसी भी बैंक से होम लोन 7-8 परसेंट के रेट पर मिल जाता है। पहले लोन लेना भी किसी युद्ध जीतने जैसा था, युद्ध जीतने में जितनी ताकत लगती थी, उतनी लोन लेने में लगती थी। आज यह घर बैठे ही संभव हो पा रहा है। मैं यहीं की बात बताता हूं, यह दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले लोग जानते हैं कि कैसे शहरी मिडिल क्लास के हजारों घर अधूरे अटके हुए थे। पैसे दे दिए थे, पूरे जिंदगी भर की कमाई बिल्डर को दे दी थी। उसने भी बढ़िया-बढ़िया पम्पलेट दिखाए, सपने दिखाए। अभी किराए पर घर में रहते हैं, तो किराया भी देना है, घर जल्दी मिलेगा। उधर किराया रहता है, घर मिल नहीं रहा, घर बन नहीं रहा, यह बहुत बुरा हाल था। इन अधूरे घरों को पूरा करने के लिए हमने 25 हजार करोड़ रुपए का स्पेशल फंड बनाया। और आपको जानकर खुशी होगी कि देश में बरसों से अटके करीब 60 हजार घरों को डिलीवरी किया जा चुका है।

साथियों,

एक और चीज है, जो रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती है। यह जरूरत है, कनेक्टिविटी की, ट्रांसपोर्ट की। आज आप सोशल मीडिया में देखिए, दुनियाभर से जो भी टूरिस्ट आता है, भारत आता है, वो हमारे मेट्रो सिस्टम को देखकर हैरान रह जाता है।

साथियों,

वर्ष 2014 में करीब 28 लाख लोग, हर रोज मेट्रो से सफर करते थे। आज करीब एक करोड़ अठाइस लाख लोग हर रोज मेट्रो से सफर कर रहे हैं। अब वंदे भारत, नमो भारत और अमृत भारत जैसी हाई स्पीड ट्रेन्स देश को कनेक्ट कर रही हैं। अच्छी सड़कों, अच्छे हाईवे से, समय तो बच ही रहा है, गाड़ियों की मैंटेनेंस पर होने वाला खर्चा भी कम हुआ है। बीते वर्षों में एयरपोर्ट्स की संख्या डबल हुई है। इससे कई छोटे-छोटे शहरों में भी मिडिल क्लास को हवाई यात्रा की सुविधा पहली बार मिली है।

साथियों,

पिछले 12 साल, मिडिल क्लास के लिए कमाई के साथ-साथ बचत के भी रहे हैं। 2013-14 में, लगभग 2 लाख रुपए तक की आय होने पर टैक्स लगता था, आप सबको वो नसीब रहा होगा। और यह टैक्स मिडिल क्लास देता रहता था। आज 12 लाख रुपए तक की आय पर कोई टैक्स नहीं है। यानी टैक्स फ्री इनकम कई गुणा बढ़ गई है।

साथियों,

GST रिफॉर्म्स के कारण भी मिडिल क्लास को बहुत सुविधा हुई है। टैक्स फाइलिंग का समय और खर्चा भी बच गया है। क्योंकि यह बहुत ही आसान हो गया है। घर बैठे ही ITR फाइल हो रहे हैं, अगर कोई सेटलमेंट का इश्यू है, तो वो फेसलेस हो रहा है।

साथियों,

मिडिल क्लास परिवारों में एक बड़ा खर्चा डायबिटीज या ऐसी लाइफस्टाइल से जुड़े इलाज का भी रहता है। जन औषधि केंद्रों पर 80 परसेंट डिस्काउंट पर ऐसी दवाएं मिल रही हैं। अगर आपका पहले हजार रुपया खर्चा होता था, तो आज 200 रुपये में काम हो जाता है, 800 रुपये बच रहा है और इससे बीते वर्षों में करीब 40 हज़ार करोड़ रुपए की बचत देश के अनेक परिवारों की हुई है। मिडिल क्लास के बजट का एक बड़ा हिस्सा बुजुर्गों के इलाज पर भी जाता है। आज 70 वर्ष से ऊपर के हर नागरिक के लिए 5 लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज उपलब्ध है।

साथियों,

एक सामान्य स्वभाव है कि जब कोई सुविधा लगातार मिलती है, तो इंसान पहले की परेशानी भूल जाता है। अब 2 लाख रुपये पर आप टैक्स देते थे, अब 12 लाख तक नहीं देना पड़ रहा, लेकिन जब मैं कहूं, तब ताली बजती है। और बस में, ट्रेन में थोड़ी देर भी अगर कुछ मुसीबत आ गई, तो ढेर सारी गालियां देना शुरू हो जाते हैं और यही क्‍लास सबसे ज्यादा बोलता है।

साथियों,

मैंने जैसा कहा ना कि भई पुरानी तकलीफे भूल जाता है आदमी। आप लोगों को आज ड्राइविंग लाइसेंस और पासपोर्ट से जुड़ी परेशानियां बिल्कुल याद नहीं होंगी। पहले ड्राइविंग लाइसेंस लेना होता था, तो कितनी दिक्कत होती थीं, पासपोर्ट लेना होता था, तो क्‍या-क्‍या कुछ नहीं करना पड़ता था, कितने पापड़ बेलने पड़ते थे। आज ड्राइविंग लाइसेंस लेना भी आसान हुआ है और तत्काल पासपोर्ट भी औसतन 3 दिन में ही मिल जाता है।

साथियों,

मैं जानता हूं, हमारी सरकार जिस तरह काम कर रही है, उसने देश के लोगों की एस्पिरेशन बहुत बढ़ा दी है। एक काम हुआ, तो लोगों की डिमांड वहीं खत्म नहीं हो जाती है। वो उससे भी बेहतर काम चाहते है, उससे भी अपग्रेड सुविधा चाहते हैं। अगर पहले डिमांड नई सड़क की थी, तो सड़क बनने के बाद लोग पूछते हैं, मेट्रो कब आएगी? पहले अपेक्षा होती थी कि ट्रेन समय पर पहुंच जाए, ट्रेन में बैठने की साफ-सुथरी जगह मिल जाए। आज डिमांड है कि हमारे रूट पर वंदे भारत क्यों नहीं चल रही है?

साथियों,

कुछ लोगों को ये असंतोष लगता है, यह एस्पिरेशन है, हमारे देश में एक फौज ऐसी है, उसको लगता है कि यह सब मामला कुछ गड़बड़ है। लेकिन लोग आखिरकार यह अपेक्षाएं किसके पास करेंगे भई, जो करता है, उससे ही करेंगे ना! सामान्‍य लोग हीनहीं, पूरी कांग्रेस पार्टी कहती है कि जरा मोदी जी, यह हो जाना चाहिए, यह होना चाहिए, कहते रहते हैं ना! उनको भरोसा है, करेगा तो ये ही करेगा!

साथियों,

एस्पिरेशंस वहीं होती है, जहां लोगों को लगता है कि सपने पूरे हो सकते हैं। और भारत के युवाओं की, भारत के गरीब और मिडिल क्लास की यही एस्पिरेशन है। आज भाजपा-एनडीए सरकारों की ऊर्जा बनी हुई है।

साथियों,

एक तरफ, देश का बहुत बड़ा वर्ग एस्पिरेशनल है, तो दूसरी तरफ, राजनीति की एक टोली है, जिसका जीवन मंत्र बन गया है- ऑलवेज अगेंस्ट! यह टोली, क्रॉनिक डिससैटिस्फैक्शन यानी स्थाई असंतोष से भरी हुई है। आज मैं रिपब्लिक टीवी के दर्शकों को जरा इस टोली के लक्षण बताने जा रहा हूं। Symptoms पता चलेगा, तो आपको समझ आ जाएगा कि मैं क्या कह रहा हूं। आप आसानी से पहचान लेंगे। जैसे मैं उदाहरण देता हूं, आप समझ जाएंगे। इनको आप अक्सर कहते सुनेंगे, अरे फलां जगह तो चौबीस घंटे बिजली आती है, यहां क्यों नहीं? और अगले ही दिन ये लोग डैम्स का, सोलर पार्क का, थर्मल का, न्यूक्लियर प्लांट का विरोध करने के लिए ढपली लेकर के आ जाएंगे। यानी पहले दिन बिजली क्‍यों नहीं और दूसरे दिन तुम हाइड्रो पावर का डैम क्यों बना रहे हो, यह जमात ऐसी है। यह वो लोग हैं, जो खनिजों के खनन का विरोध करते थे, लेकिन आज पूछते हैं कि भारत का रेयर अर्थ मिनरल्स भंडार कहां है, सप्लाई चेन कहां है? और भारत में फलाने देश की तरह, इलेक्ट्रिक व्हीकल का इकोसिस्टम क्यों नहीं है? यह वही लोग हैं, जो कभी डेटा या आटा, इसकी डिबेट चलाते थे। पहले डाटा कि आटा, डाटा कि आटा, बड़ा मजा आता था। आज यही लोग पूछते हैं कि बताओ मोदी जी, AI में क्या काम हुआ? हद देखिए, एक सांस में कहते हैं, एक ही सांस में कहते हैं कि AI में यह होना चाहिए था, वो होना चाहिए था, हुआ क्यों नहीं? लेकिन दूसरी सांस में वही लोग कहते मिलेंगे, अरे यह डेटा सेंटर क्यों बना रहे हो? यह सेमीकंडक्टर प्लांट क्यों लगा रहे हो? और फिर यह लोग उसके 100 नुकसान गिनाने के लिए घंटे-घंटे भर सोशल मीडिया के स्‍क्रीन पर दिखेंगे, टीवी डिबेट पर दिखेंगे, अखबारों में भरे रहेंगे।

साथियों,

यह लोग करप्शन को लेकर दुनियाभर के इंडेक्स उठाकर लाते हैं, भारत को कटघरे में खड़ा करते हैं, इनके इकोसिस्टम का मीडिया भी 24-24 घंटे उछालता रहता है, लेकिन जब करप्शन के विरुद्ध एक्शन होता है, जब कार्रवाई होती है, तो यही लोग चिल्लाते हैं, सबसे पहले हल्ला मचाने का काम कौन करते हैं, यही गलत हो रहा है, फलाना गया ढीकना गया, रेड कर दी, जांच कर दी, harass कर दिया। सवाल उठाए जाते हैं, कार्रवाई ऐसे क्यों हो रही है, वैसे क्यों नहीं, अब क्यों हो रही है, तब क्यों नहीं, A पर क्यों हो रही है, B पर क्यों नहीं हो रही है, यही उनका खेल है।

साथियों,

इन लोगों का कैरेक्टर समझना देश के लिए बहुत जरूरी है। खासतौर पर मेरे देश के युवाओं को इनको पहचानने की जरूरत है और हमारी जेन जी को तो बहुत जल्दी समझना चाहिए, जल्दी समझो वरना अब सूर्यवंशी आया है, वो तेज गति से समझाता है।

साथियों,

यह लोग एक तरफ कहेंगे कि देश की सेनाओं को छूट नहीं है, हथियार नहीं मिल रहे हैं, लेकिन जब सरकार कोई डिफेंस डील करेगी, कोई आधुनिक हथियार खरीदती है, तो सबसे पहले आकर कहते हैं कि यह क्यों खरीदा? यह दुनिया भर में भारत की कूटनीति पर सवाल करेंगे, लेकिन जब भारत कूटनीति के लिए, सुरक्षा के लिए कहीं कोई इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट बनाने लगेगा, तो यह लोग ढोल-ढपली लेकर हल्ला मचाना शुरू कर देते हैं।

साथियों,

आज भारत जिस अहम कालखंड में है, इसमें ऐसे लोगों को पहचानना होगा, उनके कुतर्क को समझना होगा और उनसे सतर्क रहना बहुत जरूरी होगा। और आज दुर्भाग्य से, आज देश के मुख्य विपक्षी दल, कांग्रेस पर, ऐसे ही लोगों का कब्जा हो गया है। कांग्रेस कभी नेशन फर्स्ट की बात करेगी, यह सोचना भी अब झूठे सपने जैसा हो गया है। कल्पना ही नहीं कर सकते क्या कभी कांग्रेस में यह फिर से आएगी बात, जो गांधी जी के जमाने में थी।

साथियों,

आज दुनिया पुरानी धाराओं को चैलेंज कर रही है, डिसरप्शन्स की स्केल बहुत बड़ी हो गई है, लेकिन इसका एक और पक्ष है। यह चुनौतियां, नए अवसर भी ला रही है। भारत के हर युवा, हर उद्यमी, हर इनोवेटर, हर स्टार्टअप को, इन्हीं अवसरों पर फोकस करना है और इसमें सरकार, नेशन फर्स्ट की भावना के साथ पूरी तरह देश के लोगों के साथ है। भारत आज रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार हो चुका है। यह गति आगे और तेज होगी, मैं रिपब्लिक टीवी के इस मंच से देशवासियों से फिर कहूंगा कि हमारा सपना जितना बड़ा है, हमारे प्रयास भी उतने ही विराट होंगे और 140 करोड़ देशवासियों का यही साझा प्रयास, विकसित भारत बनाकर रहेगा। और आप सब लोग, मैं विश्वास से कहता हूं, अपनी आंखों से विकसित भारत देखने वाले हैं। आने वाली पीढ़ियों तक इंतजार करना पड़े, इस प्रकार से मैं काम नहीं करता, आप खुद अपनी आंखों से देखकर के जाएंगे। इसी विश्वास के साथ, मैं फिर एक बार रिपब्लिक टीवी को, उसके दर्शकों को और आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं! बहुत-बहुत धन्यवाद!