साझा करें
 
Comments 2 Comments

गांधीनगर, दि. 23/8/2013

उपस्थित सभी महानुभाव,

अहमदाबाद और गांधीनगर जिले से पधारे हुए शिक्षा क्षेत्र के साथ जुड़े सभी मित्रों, और इसी कार्यक्रम के साथ अभी गुजरात के सभी जिलों में ऐसा ही कार्यक्रम चल रहा है, मंत्रिमंडल के मेरे सभी साथी उस कार्यक्रम में अभी उपस्थित हैं और टैक्नोलॉजी की मदद से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के द्वारा राज्य के सभी जिलों में अभी सारे मित्र मेरी बात सुन रहे हैं और इसलिए जिले के कोने-कोने में बैठे सभी लोगों को भी मैं इस समारोह में याद करता हूँ, मंत्रिमंडल के मेरे सभी साथियों को भी याद करता हूँ..!

मित्रों, देश भ्रष्टाचार से तंग आ चुका है, चारों ओर भ्रष्टाचार के अच्छे-अच्छों को हिला दे ऐसी खबरें रोजमर्रा की घटना हो गई है और लोगों के मन में सवाल उठता है कि क्या भ्रष्टाचार पर काबू किया जा सकेगा..? और आज जब मैं शिक्षक मित्रों की भर्ती के कार्यक्रम में आया हूँ तब हम सब को पता है मित्रों, हिन्दुस्तान में यह बहुत ही सामान्य बात है कि इस नौकरी के लिए यह दाम, उस नौकरी के लिए यह दाम, तबादला करना हो तो यह दाम... इसका पूरा बाजार चलता है..! मित्रों, मैं बहुत ही हिम्मत के साथ कहता हूँ कि आज राज्य में 8800 शिक्षकों की भर्ती का निर्णय हो रहा है और कहीं से भी एक पैसे के भ्रष्टाचार की भी कोई शिकायत आई नहीं है..! आज भी यहाँ जो लोग बैठे हैं उनको भी मैं कहता हूँ कि कहीं भी किसी को कुछ भी करना पड़ा हो तो बिना किसी हिचकिचाहट के वो बात मुझ तक पहुँचाना। मित्रों, ये हिम्मत मुझ में इसलिए है कि अगर एक बार निर्णय करते हैं तो इस व्यापक रोग से देश को मुक्त किया जा सकता है इसका जीता-जागता उदाहरण मेरे सामने बैठा है। पारदर्शी प्रणाली के साथ सरकारी नौकरी में भर्ती संभव है, बिना एक पैसे की लेनदेन के बगैर, पूर्ण पारदर्शी प्रक्रिया के साथ भी तबादले हो सकते हैं। और मेरे लिए एक अच्छी बात है मित्रों, मुझे किसी सगे-संबंधियों की चिंता करनी नहीं है..! यह छह करोड़ गुजरातियों ही मेरा परिवार है और इसलिए ये सारा लाभ मेरे परिवार को ही है..!

हम शिक्षा को अग्रता क्रम देते हैं..! चीन में एक कहावत है कि यदि आप एक साल के लिए सोचते हैं तो अनाज बोइए, दस साल के लिए सोच रहे हैं तो फलों को बोइए, लेकिन अगर आप पीढ़ियों के बारे में सोच रहे हैं तो मनुष्य को बोइए..! शिक्षा मनुष्य को बोने का एक महाअभियान है..! उत्तम मनुष्य के निर्माण का, उत्तम नागरिक के निर्माण का एक महाअभियान यानि शिक्षा..! जो एक शिक्षक के रूप में जिम्मेदारी लेता है वह एक पूरी पीढ़ी का सर्जन करता है..! उसके नीचे एक पीढ़ी तैयार होती है। इस राष्ट्र का भविष्य कैसा होगा वह इस पीढ़ियों की शिक्षा और संस्कार पर निर्भर करता है और उनकी शिक्षा और संस्कार शिक्षा को समर्पित सभी पर निर्भर करता है। और ऐसे एक पवित्र काम के साथ आज आप जुड़ रहे हो, मैं आपका स्वागत करता हूँ, आपको अनेक-अनेक शुभकामनाएं देता हूँ..!

2001 में जब मैंने गुजरात में मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था तब आम चर्चा ऐसी थी के इस आदमी को कोई अनुभव तो है नहीं, नगरपालिका का सदस्य भी नहीं रहा है, किसी गाँव में पंचायत का सरपंच भी रहा नहीं है, ये भाई करेंगे क्या..? और उन लोगों की बात सही भी थी कि मेरे पास सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं था। सरकार किसे कहते हैं, प्रशासनिक तंत्र क्या होता है उसकी मुझे कोई समझ नहीं थी। लेकिन मित्रों, आज गुजरात गर्व के साथ कह सकता है कि अच्छी सरकार किसे कहते हैं..! और इसका मुख्य कारण है मेरे भीतर जीवित विद्यार्थी..! आज भी मेरे अंदर एक विद्यार्थी के जैसी तत्परता है, जिज्ञासा है, आतुरता है..! और जिसके भीतर एक विद्यार्थी जिंदा हो उसकी विकास यात्रा अटूट रहती है, अखंड रहती है..! और मित्रों, शिक्षक तभी सच्चा शिक्षक बन सकता है जिसके भीतर एक विद्यार्थी की आत्मा बसती हो। जिस पल को वह ये सोचता है कि अब मैं विद्यार्थी नहीं रहा, अब तो मैं शिक्षक बन गया हूँ तो समझना कि वह विद्यार्थी तो रहा ही नहीं है, लेकिन शिक्षक के रूप में भी समाप्त हो चूका है..! सच्चे, अच्छे शिक्षक की गारंटी ही यह है कि उसके भीतर विद्यार्थी भाव बसता है या नहीं, उसके अंतरमन में विद्यार्थी जीवित है या नहीं..! वही जिज्ञासा, वही तत्परता, वही उमंग, वही उत्साह, पूरा भावजगत जो एक विद्यार्थी के आसपास लिपटा हुआ रहता है, वो भावजगत उसके भीतर जीवित हो..! और मित्रों, विद्यार्थी भाव का भीतर जीवित होने का अर्थ है कि हमारे सामने बैठा हुआ विद्यार्थी भी हमारा शिक्षक हो सकता है..! उसकी भी कोई बात ऐसी हो सकती है जो हमारे लिए सीखने जैसी हो..! उसका एक आचरण भी हमारे लिए शिक्षक का काम कर जाए..! और जब सर्वदूर से ज्ञान प्राप्ति, जानकारी की प्राप्ति, अनुभव की प्राप्ति, यह सारा क्रम जारी रहे तो उत्तम शिक्षक बनने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। पी.टी.सी. कर लिया, बी.एड. कर लिया, एम.एड. कर लिया मतलब जीवन का पूर्ण विराम नहीं आता है, वहाँ से तो हमें एक ‘सेन्स ऑफ रिस्पॉन्सिबिलिटी’ की भावना जाग्रत होती है। यदि मैं बी.एड. या एम.एड. करता हूँ तो वो कोई अंतिम नहीं है, पूर्णता नहीं है। वह मुझे ‘सेन्स ऑफ रिस्पॉन्सिबिलिटी’, एक शिक्षक के रूप में अपनी जिम्मेदारी का एहसास कराता है और वह सिर्फ बीजारोपण होता है, उसके आधार पर मेरे भीतर शिक्षक का वटवृक्ष उगाने की जिम्मेदारी मेरी होती है। नित्य अभ्यास के द्वारा मुझे खाद-पानी डालना पड़ता है और तब ही उत्तम शिक्षक बना जा सकता है..!

Shri Narendra Modi Hands Over Employment Letters to Vidya Sahayaks

मैंने ऐसे शिक्षक देखे हैं के जिनके पिताजी शिक्षक हो, वह खुद भी शिक्षक हो और पढ़ाने जाए तब पिताजी के जमाने की नोट साथ में ले जाए..! क्योंकि सिलेबस वही चलता हो..! कोई विद्यार्थी कभी उस शिक्षक को स्विकार कर ही नहीं सकता। लेकिन अगर शिक्षक प्राणवान हो, उसकी उपस्थिति मात्र से ही चैतन्य उत्पन्न होता हो, उसकी मौजूदगी ही माहौल को बदल देती हो तो वह शिक्षक असरदार होता है, प्रभावकारी होता है और प्रेरक भी होता है..! मित्रों, कई बार ईश्वर ने शरीर सौष्ठव दिया हो तो प्रभाव पैदा किया जा सकता है, माँ-बाप के पास अच्छे पैसे हों तो अच्छे कपडे पहनकर भी प्रभाव तो पैदा किया जा सकता है। लेकिन प्रभाव पैदा करने से प्रेरक नहीं बना जा सकता..! प्रेरक तभी बना जा सकता है जब अपने जीवन के भीतर से कोई आवाज दूसरों को सुनाई देती हो, किसी मूल्य का अनुभव कोई कर सकता हो, उसे शब्दों की आवश्यकता ना हो, नि:शब्द हो..! और ये अगर मन की अवस्था हो तो हम इस काम को पूरा कर सकते हैं..!

2001 में मैंने जब कार्य यात्रा शुरू की, तब शुरुआत में जब मैंने सरकार के अधिकारियों से पूछा कि क्या हाल है और उसमें भी जब ‘कन्या केलवणी’ (कन्या शिक्षा) के बारे में जाना तो मुझे झटका लगा कि हमारे इस गुजरात में कन्या शिक्षा की ये हालत..? और तब से हमने एक अभियान उठाया कि सरकारी प्राथमिक स्कूल का माहात्म्य बढ़े। अब तो आठवीं कक्षा तक भी सरकारी स्कूल बन गई है, ग्रांट वाली माध्यमिक स्कूल हैं और सरकारी स्कूल भी है। समाज में एक हवा बन गई है कि सरकारी मतलब सब बेकार..! सरकारी अस्पताल, नहीं जा सकते, प्राइवेट में जाना अच्छा है, ज्यादा खर्च करना पड़े तो भी... सरकारी बस में नहीं बैठना, जीप में पैंतीस भरे हो तो भी जाने का... यह धारणा बन गई है..! मित्रों, उसमें विश्वास कैसे पैदा हो..! और मैं इसका सर्वोत्तम उदाहरण हूँ, मित्रों..! यह नरेन्द्र मोदी नामक व्यक्तित्व जो आपके सामने खड़ा है ना, वो सरकारी स्कूल की ही प्रोडक्ट है..! आपके जैसे ही सरकारी स्कूल के शिक्षकों ने मुझे पढ़ाया-लिखाया, बड़ा किया..! इसका अर्थ ये हुआ मित्रों, कि यह सामर्थ्य पड़ा है। आज भी, मैं तीन-चार साल पहले अहमदाबाद म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन के एक कार्यक्रम में गया था। कॉर्पोरेशन की स्कूल और 1 से 10 कक्षा के छात्रों में एक सरकारी म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन की प्राथमिक स्कूल का विद्यार्थी नंबर ले आया था..! इसका मतलब कि वहाँ आने वाले छात्रों में भी तेज और ओज होता है, सिर्फ मूर्तिकार की जरुरत होती है, गढ़ाई करने वाले की जरूरत होती है, मित्रों..! और एक शिक्षक के नाते मैं जब विद्यार्थी को गढ़ता हूँ, समाज का गठन करता हूँ तब राष्ट्र का गठन करता हूँ, यह अगर मन का भाव हो तो काम करने का आनंद भी विशेष होता है..!

मित्रों, गुजरात में बच्चे पढ़ने के लिए स्कूल जाए इसके लिए हमने आवाहन किया। शत प्रतिशत बच्चे स्कूल में भरती क्यों ना हो..? हमें सफलता मिली..! लेकिन भरती हुई तो हमारे ध्यान में आया कि शिक्षक कम पड़ रहे हैं। पूरानी सरकारों को तो आसान था कि विद्यार्थी स्कूल में ही नहीं आते थे तो शिक्षकों की चिंता ही नहीं थी..! हम विद्यार्थियों को लाए, तो फिर शिक्षकों को भी लाना पड़ा..! मित्रों, लाखों की संख्या में शिक्षकों की भर्ती की। विद्यार्थी आए, शिक्षक आए तो ध्यान में आया कि कमरे चाहिए..! हजारों कमरे बनाए..! गुजरात में लगभग 32,000 स्कूल और मुझे लगता है कि 74,000 से अधिक नए कमरे बनाए..! कारण, नीचे से ही संख्या बढ़ने लगी..! फिर ध्यान में आया कि सातवीं के बाद बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं, तो आठवीं शुरू करो, भाई..! फिर ध्यान में आया कि पड़ोसी गांवों में पढ़ने के लिए जाते हैं तो साइकिल दो, लड़कियों को बस के मुफ्त पास दो..! कुछ भी करो लेकिन शिक्षित करो, ये अभियान चलाया..! फिर लगा कि स्कूलों को थोड़ा आधुनिक बनाना चाहिए, तो प्रत्येक स्कूल को बिजली मिले इसकी चिंता की, कम्प्यूटर मिले इसकी चिंता की, ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी मिले इसकी चिंता की..! स्कूल आधुनिक बने इसके लिए लॉंग डिस्टन्स एज्युकेशन के लिए कोशिश की..! उत्तम कार्यक्रमों और उत्तम शिक्षकों के द्वारा विभिन्न स्कूलों में कम्प्यूटर पर सीख सकें इसके लिए प्रयास किए। एक के बाद एक सुधार, एक के बाद एक बुनियादी सुविधाओं में वृद्धि का पूरा क्रम चला। फिर ध्यान में आया कि प्रिन्सिपल की एक अलग कैडर हो तो बेहतर रहेगा, वरना उस शिक्षक का ज्यादातर समय कागजी कार्यवाही में ही चला जाता है और बच्चों को नुकसान होता है, अकसर उस क्लास के विद्यार्थी पीछे रह जाते हैं। प्राचार्यों की अलग कैडर बनाई, उनकी अलग से भर्ती करने लगे, प्रमोशन से भी कुछ लोगों को लेने लगे..! कुल मिलाकर बुनियादी शिक्षा को व्यवस्था की दृष्टि से, बुनियादी सुविधाओं की दृष्टि से, मैनपावर की दृष्टि से, टैक्नोलॉजी की दृष्टि से, बजट की दृष्टि से, हर तरह से सुसज्ज करने का एक अभियान शुरू किया..! और हमने देखा मित्रों, कि 2001 से जिन बच्चों को स्कूल में भरती करने लगे और जोर लगाया, उसके कारण अब स्थिति यह बन गई कि उनमें से ज्यादातर ने दसवीं-बारहवीं कक्षा पास कर ली, अब उसे गाँव छोड़ कर कहीं और पढ़ने जाना है। तो उसमें अगला स्टेज क्या आया कि पूरे गुजरात में हजारों विद्यार्थी रह सके ऐसी हॉस्टल बनाओ..! और हमने हजारों विद्यार्थियों की हॉस्टल बनाने के लिए पिछले बजट में 200 करोड़ रुपयों का विशाल बजट खर्च किया..! क्यों..? यह जो बुनियादी स्तर से बच्चों को स्कूल में लाने की जिद्दोजहद शुरू की है, उसकी शिक्षा छूटनी नहीं चाहिए, जिसे पढ़ना है उसे अवकाश मिलना चाहिए..! और उस दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं..! बच्चे आगे जाने लगे तो उनको उच्चतर शिक्षा चाहिए..! एक जमाना था 2001 में कि इस राज्य में 11 युनिवर्सिटियां थी, आज 46 युनिवर्सिटियां हैं..! 1960 में गुजरात का जन्म हुआ, 1960 से 2001, 40 वर्ष में 11 युनिवर्सिटी, आज दस साल में 46 युनिवर्सिटी..! इसे विकास कहा जा सकता है..? आप समझ सकते हैं, दूसरे नहीं समझ पाते हैं..!

मित्रों, शिक्षा के उपर इतना ध्यान केन्द्रित किया है हमने, इतने सारे नवीनतम प्रयोग किए हैं और हमारा प्रयास है कि गुजरात में बुनियादी शिक्षा उत्तमता की ओर बढ़े..! और ये सारी व्यवस्थाएं करने के बाद हमने देखा कि भाई, शिक्षक है, विद्यार्थी है, क्लास रूम है, कम्प्यूटर है, बिजली है, पंखे हैं, पानी है, किताबें हैं, सब है... लेकिन बच्चे की स्थिति क्या है वो तो जांच करो..! मूलभूत आधार कहाँ है..? और इसके लिए हमने शुरू किया, ‘गुणोत्सव’..! मुख्यमंत्री सहित सभी लोग तीन दिन स्कूल में जाते हैं, हरेक बच्चे को पूछते हैं कि भाई, तुम्हें पढ़ना आता है, लिखना आता है, गणित आता है, स्पेलिंग आते हैं..? और हिन्दुस्तान में गुजरात पहला ऐसा राज्य है जहाँ सरकारी स्कूलों का ग्रेडेशन किया गया है..! इस देश में बिजनेस स्कूल का ग्रेडेशन होता है, ‘ए’ ग्रेड, ‘बी’ ग्रेड, ‘सी’ ग्रेड, की बिजनेस स्कूल। इस देश में इंजीनियरिंग कॉलेज का ग्रेडेशन होता है, मेडिकल कॉलेज का ग्रेडेशन होता है, आई.आई.टी. का ग्रेडेशन होता है, आई.आई.एम. का ग्रेडेशन होता है, लेकिन यह राज्य ऐसा है कि जिसने प्राथमिक स्कूलों का ग्रेडेशन किया और कलेक्टर कलेक्टर समेत सब लोगों को शामिल किया कि आपके जिले में ‘ए’ ग्रेड की स्कूल कितनी हैं, ‘बी’ ग्रेड की कितनी, ‘सी’ ग्रेड की कितनी, ‘डी’ ग्रेड की कितनी, ‘ई’ और ‘एफ’ तक गए..! और निर्धारित करवाया गया कि अब ‘सी’ में से ‘बी’ में कैसे आओगे, बताईए..? ‘बी’ में से ‘ए’ ग्रेड में कैसे लाओगे आपकी स्कूल को..? और उसमें से कुछ स्कूलों का तो डी.एन.ए. ही ऐसा था कि कमजोरी जाए ही नहीं..! तो हमने ऐसे शिक्षकों को खोजा और उनकी स्पेशल ट्रेनिंग करवाई। कहीं लगा कि थोड़ा मिक्स-अप करो, दो यहाँ से उठाओ, दो अच्छे यहाँ लाओ, दो वहाँ ले जाओ, लेकिन कुछ करो..! मित्रों, इतने सूक्ष्म प्रयास इसलिए किए हैं कि गुजरात के आने वाले कल को गढ़ना है..! मित्रों, इस गुजरात को विश्व की नई ऊंचाईयों तक पहुंचाना है और उसकी नींव में प्राथमिक स्कूल की शिक्षा है। शहर हो या गाँव, जंगल हो, आदिवासी क्षेत्र हो या मछुआरों का समुद्री किनारा, हर जगह सर्वोत्तम शिक्षा मिले इसकी कोशिश की है..!

मित्रों, जीवन में शिक्षक बनना सौभाग्य की बात होती है..! कुछ लोगों को लगता होगा कि जब छोटे थे और घर पर मेहमान आते थे तो मम्मी-पापा कहते थे कि इसे डॉक्टर बनाना है, इसे इंजीनियर बनाना है, तब तो अभी हम पाँचवीं में भी ना आए हों..! दिमाग में रहता है, यहाँ बैठे लगभग सभी के मन में होगा कि माँ-बाप की इच्छा थी कि डॉक्टर या इंजीनियर बने, अब बने गये शिक्षक..! तो बहुत सारा समय आपका इसी में जाएगा कि यार, नहीं हो पाया, डॉक्टर नहीं बना..! अरे, जाने दो यार, उस साल पेपर्स इतने कठिन थे ना... परीक्षक ही ऐसे थे ना... यानि, बहाने तो बहुत मिल जाते हैं..! मित्रों, जो हुआ सो हुआ, अब आपको तय ही करना पड़े, बीते हुए कल को भूलकर आज जहाँ खड़े हो वहीं से भव्य सपने कैसे देखें, भव्य इमारत कैसे बनाई जाए, इसकी शुरुआत करनी चाहिए..! नहीं तो आप उस बोझ ले करके चलोगे कि मुझे तो ये बनना था, वो बनना था, अब क्या करें, जैसी किस्मत..! फिर घड़ी देखता रहता है..! मित्रों, हमें तय करना पड़े कि हमें करना क्या है..? मित्रों, जब स्कूल की घंटी बजती है तो ऊर्जा मिलती है या मानसिक तनाव पैदा होता है उसका निर्णय करना पड़े..! स्कूल की घंटी बजते ही पूरा माहौल पक्षीयों के कलरव जैसा बन जाता हो तो मित्रों, वह घंटारव जीवन का नया नाद बनता है..! लेकिन अगर वही आपको बोझ लगता है कि यार, ये अभी कहाँ... तो हो गया समजो..! और जिसको शाम की आखिरी घंटी बजे उसका आनंद हो तो समझने का कि उसे अभी शिक्षक बनना बाकी है..! उसे ऐसा होना चाहिए कि अरे, अभी तो मुझे पढ़ाना बाकी है और घंटी बज गई..? मित्रों, ये सारे हमारे मन की अवस्था के मापदंड हैं..! मित्रों, हमारा विद्यार्थी रविवार की छुट्टी आते ही दु:खी हो जाए कि अरे, कल तो छुट्टी है, मुझे नहीं आना है, आप नहीं मिलेंगे..? अगर ऐसा होता है तो आप समझना कि आप सही मायने में उसके गार्डियन बने हैं। लेकिन शनिवार को स्कूल के छूटने के समय अगर विद्यार्थी को लगे कि वाह, अब तो सोमवार को आना है..! तो मान लेना मित्रों, ना ही वह स्कूल की इमारत, ना मुख्यमंत्री, ना बजट, ना शिक्षा विभाग, अगर इसके लिए कोई जिम्मेदार है तो वह शिक्षक है..! अगर उमंग के साथ बच्चे आते हैं तो उसका श्रेय मुख्यमंत्री को नहीं जाता है, उसका श्रेय सरकार के बजट को नहीं जाता है, उसका श्रेय उस शिक्षक को जाता है जिसने अपनी जान उस बच्चे में डाल दी है..! अगर इस भावना के साथ शिक्षक की भूमिका निभाएंगे तो मित्रों, मुझे विश्वास है कि आने वाले कल के गुजरात के लिए जो सपने हमने संजोए हैं उन सपनों को पूरे करने का सामर्थ्यवान मानव बल आपके द्वारा निर्माण होगा, एक अर्थ में आप गुजरात के सच्चे निर्माता बनोगे ऐसी मेरी आप सभी को शुभकामनाएं हैं..!

गुजरात के सभी कोने में जो मित्र बैठे हैं, सभी जिलों में जो बैठे हैं और आज जिन्हें नियुक्ति पत्र मिलने वाले हैं उन सभी मित्रों को बहुत बहुत अभिनंदन और मुझे भरोसा है कि वे सभी इस राज्य के निर्माण के लिए सभी संभव प्रयास करेंगे, ऐसी शुभकामना के साथ,

जय जय गरवी गुजरात..!

मोदी सरकार के #7YearsOfSeva
Explore More
'चलता है' नहीं बल्कि बदला है, बदल रहा है, बदल सकता है... हम इस विश्वास और संकल्प के साथ आगे बढ़ें: पीएम मोदी

लोकप्रिय भाषण

'चलता है' नहीं बल्कि बदला है, बदल रहा है, बदल सकता है... हम इस विश्वास और संकल्प के साथ आगे बढ़ें: पीएम मोदी
India to share Its CoWIN success story with 20 countries showing interest

Media Coverage

India to share Its CoWIN success story with 20 countries showing interest
...

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
योग हमें स्ट्रेस से स्ट्रेंथ और निगेटिविटी से क्रिएटिविटी का रास्ता दिखाता है : पीएम मोदी
June 21, 2021
साझा करें
 
Comments
प्रधानमंत्री ने हर देश, समाज और व्यक्ति के स्वास्थ्य की कामना की
प्रधामंत्री ने एम-योग एप्प की घोषणा की, कहा यह एप्प ‘एक विश्व-एक स्वास्थ्य’ को हासिल करने में मदद करेगा
दुनिया भर में महामारी से लड़ने में योग ने लोगों को आत्मविश्वास और शक्ति दीः प्रधानमंत्री
अग्रिम मोर्चे के कोरोना योद्धाओं ने योग को बनाया अपना कवच, उन्होंने अपने मरीजों की भी मदद कीः प्रधानमंत्री
समत्वं योग उच्यते ही योग है; एकात्म का अनुभव और उसकी चेतना का प्रामाणिक मार्ग हैः प्रधानमंत्री
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के मंत्र को पूरे विश्व में स्वीकृतिः प्रधानमंत्री
ऑनलाइन कक्षाओं के दौरान योग से बच्चों को कोरोना से लड़ने में शक्ति मिलती हैः प्रधानमंत्री

नमस्कार !

आप सभी को सातवें 'अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस' की बहुत बहुत शुभकामनाएं।

आज जब पूरा विश्व कोरोना महामारी का मुकाबला कर रहा है, तो योग उम्मीद की एक किरण भी बना हुआ है। दो वर्ष से दुनिया भर के देशो में और भारत में भले ही बड़ा सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित नहीं हुआ हों लेकिन योग दिवस के प्रति उत्साह ज़रा भी कम नहीं हुआ है. कोरोना के बावजूद , इस बार की योग दिवस की थीम "Yoga for wellness" ने करोड़ों लोगों में योग के प्रति उत्साह को और भी बढाया है .मैं आज योग दिवस पर ये कामना करता हूं की हर देश, हर समाज और हर व्यक्ति स्वस्थ हो, सब एक साथ मिलकर एक दूसरे की ताकत बनें.

साथियों,

हमारे ऋषियों-मुनियों ने योग के लिए "समत्वम् योग उच्यते" ये परिभाषा दी थी। उन्होंने सुख-दुःख में समान रहने, संयम को एक तरह से योग का पैरामीटर बनाया था। आज इस वैश्विक त्रासदी में योग ने इसे साबित करके दिखाया है। कोरोना के इन डेढ़ वर्षों में भारत समेत कितने ही देशों ने बड़े संकट का सामना किया है।

साथियों,

दुनिया के अधिकांश देशों के लिए योग दिवस कोई उनका सदियों पुराना सांस्कृतिक पर्व नहीं है। इस मुश्किल समय में, इतनी परेशानी में लोग इसे आसानी से भूल सकते थे, इसकी उपेक्षा कर सकते थे। लेकिन इसके विपरीत, लोगों में योग का उत्साह और बढ़ा है, योग से प्रेम बढ़ा है। पिछले डेढ़ सालों में दुनिया के कोने कोने में लाखों नए योग साधक बने हैं। योग का जो पहला पर्याय, संयम और अनुशासन को कहा गया है, सब उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयास भी कर रहे हैं।

साथियों,

जब कोरोना के अदृष्य वायरस ने दुनिया में जब दस्तक दी थी, तब कोई भी देश, साधनों से, सामर्थ्य से और मानसिक अवस्था से, इसके लिए तैयार नहीं था। हम सभी ने देखा है कि ऐसे कठिन समय में, योग आत्मबल का एक बड़ा माध्यम बना। योग ने लोगों में ये भरोसा बढ़ाया कि हम इस बीमारी से लड़ सकते हैं।

मैं जब फ्रंटलाइन वारीयर्स से, डॉक्टर्स से बात करता हूँ, तो वो मुझे बताते हैं कि, कोरोना के खिलाफ लड़ाई में उन्होंने योग को भी अपना सुरक्षा-कवच बनाया। डॉक्टरों ने योग से खुद को भी मजबूत किया, और अपने मरीजों को जल्दी स्वस्थ करने में इसका उपयोग भी किया। आज अस्पतालों से ऐसी कितनी ही तस्वीरें आती हैं जहां डॉक्टर्स, नर्सेस, मरीजों को योग सिखा रहे हैं, तो कहीं मरीज अपना अनुभव साझा कर रहे हैं। प्राणायाम, अनुलोम-विलोम जैसी breathing exercises से हमारे respiratory system को कितनी ताकत मिलती है, ये भी दुनिया के विशेषज्ञ खुद बता रहे हैं।

साथियों,

महान तमिल संत श्री थिरुवल्लवर ने कहा -

"नोइ नाडी, नोइ मुदल नाडी, हदु तनिक्कुम, वाय नाडी वायपच्चयल" अर्थात्, अगर कोई बीमारी है तो

उसे diagnose करो, उसकी जड़ तक जाओ, बीमारी की वजह क्या है ये पता करो, और फिर उसका इलाज सुनिश्चित करो। योग यही रास्ता दिखता है ।आज मेडिकल साइंस भी उपचार के साथ साथ हीलिंग पर भी उतना ही बल देता है और योग हीलिंग प्रोसेस में उपकारक है .मुझे संतोष है कि आज योग के इस पहलू पर दुनिया भर के विशेषज्ञ अनेक प्रकार के scientific रीसर्च कर कर रहे हैं उस पर काम कर रहे हैं।

कोरोना काल में, योग से हमारे शरीर को होने वाले फ़ायदों पर, हमारी immunity पर पड़ने वाले सकारात्मक प्रभावों पर कई स्टडीज़ हो रही हैं। आजकल हम देखते है कई स्कूलों में ऑनलाइन क्लासेस की शुरुआत में

10-15 मिनट बच्चों को योग - प्राणायाम कराया जा रहा है। ये कोरोना से मुकाबले के लिए भी बच्चों को शारीरिक रूप से तैयार कर रहा है।

साथियों,

भारत के ऋषियों ने हमें सिखाया है-

व्यायामात् लभते स्वास्थ्यम्,

दीर्घ आयुष्यम् बलम् सुखम्।

आरोग्यम् परमम् भाग्यम्,

स्वास्थ्यम् सर्वार्थ साधनम् ॥

अर्थात्, योग-व्यायाम से हमें अच्छा स्वास्थ्य मिलता है, सामर्थ्य मिलता है, और लंबा सुखी जीवन मिलता है। हमारे लिए स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा भाग्य है, और अच्छा स्वास्थ्य ही सभी सफलताओं का माध्यम है। भारत के ऋषियों ने, भारत ने जब भी स्वास्थ्य की बात की है, तो इसका मतलब केवल, शारीरिक स्वास्थ्य नहीं रहा है। इसीलिए, योग में फ़िज़िकल हेल्थ के साथ साथ मेंटल हेल्थ पर इतना ज़ोर दिया गया है। जब हम प्राणायाम करते हैं, ध्यान करते हैं, दूसरी यौगिक क्रियाएँ करते हैं, तो हम अपनी अंतर-चेतना को अनुभव करते हैं। योग से हमें ये अनुभव होता है कि हमारी विचार शक्ति, हमारा आंतरिक सामर्थ्य इतना ज्यादा है कि दुनिया की कोई परेशानी, कोई भी negativity हमें तोड़ नहीं सकती। योग हमें स्ट्रेस से स्ट्रेंथ की ओर, नेगेटिविटी से क्रिएटिविटी का रास्ता दिखाता है। योग हमें अवसाद से उमंग और प्रमाद से प्रसाद तक ले जाता है।

Friends,

Yoga tells us that so many problems might be out there, but we have infinite solutions within ourselves. We are the biggest source of energy in our universe. We do not realise this energy because of the many divisions that exist. At times, the lives of people exist in silos. These divisions reflect in the overall personality as well. The shift from silos to union is Yoga. A proven way to experience, a realisation of oneness is Yoga. I am reminded of the words of the great Gurdev Tagore, who said and I quote:

"the meaning of our self is not to be found in its separateness from God and others, but in the ceaseless realization of yoga, of union."

The mantra of वसुधैव कुटुम्बकम्’ which India has followed since ages, is now finding global acceptance. We all are praying for each other's wellbeing, If there are threats to humanity,

Yoga often gives us a way of holistic health. Yoga also gives us a happier way of life. I am sure, Yoga will continue playing its preventive, as well as positive role in healthcare of masses.

साथियों,

जब भारत ने यूनाइटेड नेशंस में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव रखा था, तो उसके पीछे यही भावना थी कि ये योग विज्ञान पूरे विश्व के लिए सुलभ हो। आज इस दिशा में भारत ने यूनाइटेड नेशंस, WHO के साथ मिलकर एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया है।

अब विश्व को, M-Yoga ऐप की शक्ति मिलने जा रही है। इस ऐप में कॉमन योग प्रोटोकॉल के आधार पर योग प्रशिक्षण के कई विडियोज दुनिया की अलग अलग भाषाओं में उपलब्ध होंगे। ये आधुनिक टेक्नोलॉजी

और प्राचीन विज्ञान के फ्यूजन का भी एक बेहतरीन उदाहरण है। मुझे पूरा विश्वास है, m -Yoga app, योग का विस्तार दुनिया भर में करने और One World, One Health के प्रयासों को सफल बनाने में बड़ी भूमिका निभायेगा।

साथियों,

गीता में कहा गया है-

तं विद्याद् दुःख संयोग-

वियोगं योग संज्ञितम्।

अर्थात्, दुखों से वियोग को, मुक्ति को ही योग कहते हैं। सबको साथ लेकर चलने वाली मानवता की ये योग यात्रा हमें ऐसे ही अनवरत आगे बढ़ानी है। चाहे कोई भी स्थान हो, कोई भी परिस्थिति हो, कोई भी आयु हो,

हर एक के लिए, योग के पास कोई न कोई समाधान जरूर है। आज विश्व में, योग के प्रति जिज्ञासा रखने वालों की संख्या बहुत बढ़ रही है। देश-विदेश में योग प्रतिष्ठानों की संख्या में भी वृद्धि हो रही है। ऐसे में योग का जो मूलभूत तत्वज्ञान है, मूलभूत सिद्धांत है, उसको कायम रखते हुए, योग, जन-जन तक पहुँचे, अविरत पहुँचे और निरंतर पहुँचे, ये कार्य आवश्यक है। और ये कार्य योग से जुड़े लोगों को, योग के आचार्यों को, योग प्रचारकों को साथ मिलकर करना चाहिए। हमें खुद भी योग का संकल्प लेना है, और अपनों को भी इस संकल्प से जोड़ना है।'योग से सहयोग तक 'का ये मंत्र हमें एक नए भविष्य का मार्ग दिखाएगा, मानवता को सशक्त करेगा।

इन्हीं शुभकामनाओं के साथ, आज अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर पूरी मानव जाति को आप सभी को बहुत बहुत शुभकामना

बहुत बहुत धन्यवाद!