गांधीनगर, दि. 23/8/2013

उपस्थित सभी महानुभाव,

अहमदाबाद और गांधीनगर जिले से पधारे हुए शिक्षा क्षेत्र के साथ जुड़े सभी मित्रों, और इसी कार्यक्रम के साथ अभी गुजरात के सभी जिलों में ऐसा ही कार्यक्रम चल रहा है, मंत्रिमंडल के मेरे सभी साथी उस कार्यक्रम में अभी उपस्थित हैं और टैक्नोलॉजी की मदद से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के द्वारा राज्य के सभी जिलों में अभी सारे मित्र मेरी बात सुन रहे हैं और इसलिए जिले के कोने-कोने में बैठे सभी लोगों को भी मैं इस समारोह में याद करता हूँ, मंत्रिमंडल के मेरे सभी साथियों को भी याद करता हूँ..!

मित्रों, देश भ्रष्टाचार से तंग आ चुका है, चारों ओर भ्रष्टाचार के अच्छे-अच्छों को हिला दे ऐसी खबरें रोजमर्रा की घटना हो गई है और लोगों के मन में सवाल उठता है कि क्या भ्रष्टाचार पर काबू किया जा सकेगा..? और आज जब मैं शिक्षक मित्रों की भर्ती के कार्यक्रम में आया हूँ तब हम सब को पता है मित्रों, हिन्दुस्तान में यह बहुत ही सामान्य बात है कि इस नौकरी के लिए यह दाम, उस नौकरी के लिए यह दाम, तबादला करना हो तो यह दाम... इसका पूरा बाजार चलता है..! मित्रों, मैं बहुत ही हिम्मत के साथ कहता हूँ कि आज राज्य में 8800 शिक्षकों की भर्ती का निर्णय हो रहा है और कहीं से भी एक पैसे के भ्रष्टाचार की भी कोई शिकायत आई नहीं है..! आज भी यहाँ जो लोग बैठे हैं उनको भी मैं कहता हूँ कि कहीं भी किसी को कुछ भी करना पड़ा हो तो बिना किसी हिचकिचाहट के वो बात मुझ तक पहुँचाना। मित्रों, ये हिम्मत मुझ में इसलिए है कि अगर एक बार निर्णय करते हैं तो इस व्यापक रोग से देश को मुक्त किया जा सकता है इसका जीता-जागता उदाहरण मेरे सामने बैठा है। पारदर्शी प्रणाली के साथ सरकारी नौकरी में भर्ती संभव है, बिना एक पैसे की लेनदेन के बगैर, पूर्ण पारदर्शी प्रक्रिया के साथ भी तबादले हो सकते हैं। और मेरे लिए एक अच्छी बात है मित्रों, मुझे किसी सगे-संबंधियों की चिंता करनी नहीं है..! यह छह करोड़ गुजरातियों ही मेरा परिवार है और इसलिए ये सारा लाभ मेरे परिवार को ही है..!

हम शिक्षा को अग्रता क्रम देते हैं..! चीन में एक कहावत है कि यदि आप एक साल के लिए सोचते हैं तो अनाज बोइए, दस साल के लिए सोच रहे हैं तो फलों को बोइए, लेकिन अगर आप पीढ़ियों के बारे में सोच रहे हैं तो मनुष्य को बोइए..! शिक्षा मनुष्य को बोने का एक महाअभियान है..! उत्तम मनुष्य के निर्माण का, उत्तम नागरिक के निर्माण का एक महाअभियान यानि शिक्षा..! जो एक शिक्षक के रूप में जिम्मेदारी लेता है वह एक पूरी पीढ़ी का सर्जन करता है..! उसके नीचे एक पीढ़ी तैयार होती है। इस राष्ट्र का भविष्य कैसा होगा वह इस पीढ़ियों की शिक्षा और संस्कार पर निर्भर करता है और उनकी शिक्षा और संस्कार शिक्षा को समर्पित सभी पर निर्भर करता है। और ऐसे एक पवित्र काम के साथ आज आप जुड़ रहे हो, मैं आपका स्वागत करता हूँ, आपको अनेक-अनेक शुभकामनाएं देता हूँ..!

2001 में जब मैंने गुजरात में मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था तब आम चर्चा ऐसी थी के इस आदमी को कोई अनुभव तो है नहीं, नगरपालिका का सदस्य भी नहीं रहा है, किसी गाँव में पंचायत का सरपंच भी रहा नहीं है, ये भाई करेंगे क्या..? और उन लोगों की बात सही भी थी कि मेरे पास सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं था। सरकार किसे कहते हैं, प्रशासनिक तंत्र क्या होता है उसकी मुझे कोई समझ नहीं थी। लेकिन मित्रों, आज गुजरात गर्व के साथ कह सकता है कि अच्छी सरकार किसे कहते हैं..! और इसका मुख्य कारण है मेरे भीतर जीवित विद्यार्थी..! आज भी मेरे अंदर एक विद्यार्थी के जैसी तत्परता है, जिज्ञासा है, आतुरता है..! और जिसके भीतर एक विद्यार्थी जिंदा हो उसकी विकास यात्रा अटूट रहती है, अखंड रहती है..! और मित्रों, शिक्षक तभी सच्चा शिक्षक बन सकता है जिसके भीतर एक विद्यार्थी की आत्मा बसती हो। जिस पल को वह ये सोचता है कि अब मैं विद्यार्थी नहीं रहा, अब तो मैं शिक्षक बन गया हूँ तो समझना कि वह विद्यार्थी तो रहा ही नहीं है, लेकिन शिक्षक के रूप में भी समाप्त हो चूका है..! सच्चे, अच्छे शिक्षक की गारंटी ही यह है कि उसके भीतर विद्यार्थी भाव बसता है या नहीं, उसके अंतरमन में विद्यार्थी जीवित है या नहीं..! वही जिज्ञासा, वही तत्परता, वही उमंग, वही उत्साह, पूरा भावजगत जो एक विद्यार्थी के आसपास लिपटा हुआ रहता है, वो भावजगत उसके भीतर जीवित हो..! और मित्रों, विद्यार्थी भाव का भीतर जीवित होने का अर्थ है कि हमारे सामने बैठा हुआ विद्यार्थी भी हमारा शिक्षक हो सकता है..! उसकी भी कोई बात ऐसी हो सकती है जो हमारे लिए सीखने जैसी हो..! उसका एक आचरण भी हमारे लिए शिक्षक का काम कर जाए..! और जब सर्वदूर से ज्ञान प्राप्ति, जानकारी की प्राप्ति, अनुभव की प्राप्ति, यह सारा क्रम जारी रहे तो उत्तम शिक्षक बनने की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। पी.टी.सी. कर लिया, बी.एड. कर लिया, एम.एड. कर लिया मतलब जीवन का पूर्ण विराम नहीं आता है, वहाँ से तो हमें एक ‘सेन्स ऑफ रिस्पॉन्सिबिलिटी’ की भावना जाग्रत होती है। यदि मैं बी.एड. या एम.एड. करता हूँ तो वो कोई अंतिम नहीं है, पूर्णता नहीं है। वह मुझे ‘सेन्स ऑफ रिस्पॉन्सिबिलिटी’, एक शिक्षक के रूप में अपनी जिम्मेदारी का एहसास कराता है और वह सिर्फ बीजारोपण होता है, उसके आधार पर मेरे भीतर शिक्षक का वटवृक्ष उगाने की जिम्मेदारी मेरी होती है। नित्य अभ्यास के द्वारा मुझे खाद-पानी डालना पड़ता है और तब ही उत्तम शिक्षक बना जा सकता है..!

Shri Narendra Modi Hands Over Employment Letters to Vidya Sahayaks

मैंने ऐसे शिक्षक देखे हैं के जिनके पिताजी शिक्षक हो, वह खुद भी शिक्षक हो और पढ़ाने जाए तब पिताजी के जमाने की नोट साथ में ले जाए..! क्योंकि सिलेबस वही चलता हो..! कोई विद्यार्थी कभी उस शिक्षक को स्विकार कर ही नहीं सकता। लेकिन अगर शिक्षक प्राणवान हो, उसकी उपस्थिति मात्र से ही चैतन्य उत्पन्न होता हो, उसकी मौजूदगी ही माहौल को बदल देती हो तो वह शिक्षक असरदार होता है, प्रभावकारी होता है और प्रेरक भी होता है..! मित्रों, कई बार ईश्वर ने शरीर सौष्ठव दिया हो तो प्रभाव पैदा किया जा सकता है, माँ-बाप के पास अच्छे पैसे हों तो अच्छे कपडे पहनकर भी प्रभाव तो पैदा किया जा सकता है। लेकिन प्रभाव पैदा करने से प्रेरक नहीं बना जा सकता..! प्रेरक तभी बना जा सकता है जब अपने जीवन के भीतर से कोई आवाज दूसरों को सुनाई देती हो, किसी मूल्य का अनुभव कोई कर सकता हो, उसे शब्दों की आवश्यकता ना हो, नि:शब्द हो..! और ये अगर मन की अवस्था हो तो हम इस काम को पूरा कर सकते हैं..!

2001 में मैंने जब कार्य यात्रा शुरू की, तब शुरुआत में जब मैंने सरकार के अधिकारियों से पूछा कि क्या हाल है और उसमें भी जब ‘कन्या केलवणी’ (कन्या शिक्षा) के बारे में जाना तो मुझे झटका लगा कि हमारे इस गुजरात में कन्या शिक्षा की ये हालत..? और तब से हमने एक अभियान उठाया कि सरकारी प्राथमिक स्कूल का माहात्म्य बढ़े। अब तो आठवीं कक्षा तक भी सरकारी स्कूल बन गई है, ग्रांट वाली माध्यमिक स्कूल हैं और सरकारी स्कूल भी है। समाज में एक हवा बन गई है कि सरकारी मतलब सब बेकार..! सरकारी अस्पताल, नहीं जा सकते, प्राइवेट में जाना अच्छा है, ज्यादा खर्च करना पड़े तो भी... सरकारी बस में नहीं बैठना, जीप में पैंतीस भरे हो तो भी जाने का... यह धारणा बन गई है..! मित्रों, उसमें विश्वास कैसे पैदा हो..! और मैं इसका सर्वोत्तम उदाहरण हूँ, मित्रों..! यह नरेन्द्र मोदी नामक व्यक्तित्व जो आपके सामने खड़ा है ना, वो सरकारी स्कूल की ही प्रोडक्ट है..! आपके जैसे ही सरकारी स्कूल के शिक्षकों ने मुझे पढ़ाया-लिखाया, बड़ा किया..! इसका अर्थ ये हुआ मित्रों, कि यह सामर्थ्य पड़ा है। आज भी, मैं तीन-चार साल पहले अहमदाबाद म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन के एक कार्यक्रम में गया था। कॉर्पोरेशन की स्कूल और 1 से 10 कक्षा के छात्रों में एक सरकारी म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन की प्राथमिक स्कूल का विद्यार्थी नंबर ले आया था..! इसका मतलब कि वहाँ आने वाले छात्रों में भी तेज और ओज होता है, सिर्फ मूर्तिकार की जरुरत होती है, गढ़ाई करने वाले की जरूरत होती है, मित्रों..! और एक शिक्षक के नाते मैं जब विद्यार्थी को गढ़ता हूँ, समाज का गठन करता हूँ तब राष्ट्र का गठन करता हूँ, यह अगर मन का भाव हो तो काम करने का आनंद भी विशेष होता है..!

मित्रों, गुजरात में बच्चे पढ़ने के लिए स्कूल जाए इसके लिए हमने आवाहन किया। शत प्रतिशत बच्चे स्कूल में भरती क्यों ना हो..? हमें सफलता मिली..! लेकिन भरती हुई तो हमारे ध्यान में आया कि शिक्षक कम पड़ रहे हैं। पूरानी सरकारों को तो आसान था कि विद्यार्थी स्कूल में ही नहीं आते थे तो शिक्षकों की चिंता ही नहीं थी..! हम विद्यार्थियों को लाए, तो फिर शिक्षकों को भी लाना पड़ा..! मित्रों, लाखों की संख्या में शिक्षकों की भर्ती की। विद्यार्थी आए, शिक्षक आए तो ध्यान में आया कि कमरे चाहिए..! हजारों कमरे बनाए..! गुजरात में लगभग 32,000 स्कूल और मुझे लगता है कि 74,000 से अधिक नए कमरे बनाए..! कारण, नीचे से ही संख्या बढ़ने लगी..! फिर ध्यान में आया कि सातवीं के बाद बच्चे पढ़ाई छोड़ देते हैं, तो आठवीं शुरू करो, भाई..! फिर ध्यान में आया कि पड़ोसी गांवों में पढ़ने के लिए जाते हैं तो साइकिल दो, लड़कियों को बस के मुफ्त पास दो..! कुछ भी करो लेकिन शिक्षित करो, ये अभियान चलाया..! फिर लगा कि स्कूलों को थोड़ा आधुनिक बनाना चाहिए, तो प्रत्येक स्कूल को बिजली मिले इसकी चिंता की, कम्प्यूटर मिले इसकी चिंता की, ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी मिले इसकी चिंता की..! स्कूल आधुनिक बने इसके लिए लॉंग डिस्टन्स एज्युकेशन के लिए कोशिश की..! उत्तम कार्यक्रमों और उत्तम शिक्षकों के द्वारा विभिन्न स्कूलों में कम्प्यूटर पर सीख सकें इसके लिए प्रयास किए। एक के बाद एक सुधार, एक के बाद एक बुनियादी सुविधाओं में वृद्धि का पूरा क्रम चला। फिर ध्यान में आया कि प्रिन्सिपल की एक अलग कैडर हो तो बेहतर रहेगा, वरना उस शिक्षक का ज्यादातर समय कागजी कार्यवाही में ही चला जाता है और बच्चों को नुकसान होता है, अकसर उस क्लास के विद्यार्थी पीछे रह जाते हैं। प्राचार्यों की अलग कैडर बनाई, उनकी अलग से भर्ती करने लगे, प्रमोशन से भी कुछ लोगों को लेने लगे..! कुल मिलाकर बुनियादी शिक्षा को व्यवस्था की दृष्टि से, बुनियादी सुविधाओं की दृष्टि से, मैनपावर की दृष्टि से, टैक्नोलॉजी की दृष्टि से, बजट की दृष्टि से, हर तरह से सुसज्ज करने का एक अभियान शुरू किया..! और हमने देखा मित्रों, कि 2001 से जिन बच्चों को स्कूल में भरती करने लगे और जोर लगाया, उसके कारण अब स्थिति यह बन गई कि उनमें से ज्यादातर ने दसवीं-बारहवीं कक्षा पास कर ली, अब उसे गाँव छोड़ कर कहीं और पढ़ने जाना है। तो उसमें अगला स्टेज क्या आया कि पूरे गुजरात में हजारों विद्यार्थी रह सके ऐसी हॉस्टल बनाओ..! और हमने हजारों विद्यार्थियों की हॉस्टल बनाने के लिए पिछले बजट में 200 करोड़ रुपयों का विशाल बजट खर्च किया..! क्यों..? यह जो बुनियादी स्तर से बच्चों को स्कूल में लाने की जिद्दोजहद शुरू की है, उसकी शिक्षा छूटनी नहीं चाहिए, जिसे पढ़ना है उसे अवकाश मिलना चाहिए..! और उस दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं..! बच्चे आगे जाने लगे तो उनको उच्चतर शिक्षा चाहिए..! एक जमाना था 2001 में कि इस राज्य में 11 युनिवर्सिटियां थी, आज 46 युनिवर्सिटियां हैं..! 1960 में गुजरात का जन्म हुआ, 1960 से 2001, 40 वर्ष में 11 युनिवर्सिटी, आज दस साल में 46 युनिवर्सिटी..! इसे विकास कहा जा सकता है..? आप समझ सकते हैं, दूसरे नहीं समझ पाते हैं..!

मित्रों, शिक्षा के उपर इतना ध्यान केन्द्रित किया है हमने, इतने सारे नवीनतम प्रयोग किए हैं और हमारा प्रयास है कि गुजरात में बुनियादी शिक्षा उत्तमता की ओर बढ़े..! और ये सारी व्यवस्थाएं करने के बाद हमने देखा कि भाई, शिक्षक है, विद्यार्थी है, क्लास रूम है, कम्प्यूटर है, बिजली है, पंखे हैं, पानी है, किताबें हैं, सब है... लेकिन बच्चे की स्थिति क्या है वो तो जांच करो..! मूलभूत आधार कहाँ है..? और इसके लिए हमने शुरू किया, ‘गुणोत्सव’..! मुख्यमंत्री सहित सभी लोग तीन दिन स्कूल में जाते हैं, हरेक बच्चे को पूछते हैं कि भाई, तुम्हें पढ़ना आता है, लिखना आता है, गणित आता है, स्पेलिंग आते हैं..? और हिन्दुस्तान में गुजरात पहला ऐसा राज्य है जहाँ सरकारी स्कूलों का ग्रेडेशन किया गया है..! इस देश में बिजनेस स्कूल का ग्रेडेशन होता है, ‘ए’ ग्रेड, ‘बी’ ग्रेड, ‘सी’ ग्रेड, की बिजनेस स्कूल। इस देश में इंजीनियरिंग कॉलेज का ग्रेडेशन होता है, मेडिकल कॉलेज का ग्रेडेशन होता है, आई.आई.टी. का ग्रेडेशन होता है, आई.आई.एम. का ग्रेडेशन होता है, लेकिन यह राज्य ऐसा है कि जिसने प्राथमिक स्कूलों का ग्रेडेशन किया और कलेक्टर कलेक्टर समेत सब लोगों को शामिल किया कि आपके जिले में ‘ए’ ग्रेड की स्कूल कितनी हैं, ‘बी’ ग्रेड की कितनी, ‘सी’ ग्रेड की कितनी, ‘डी’ ग्रेड की कितनी, ‘ई’ और ‘एफ’ तक गए..! और निर्धारित करवाया गया कि अब ‘सी’ में से ‘बी’ में कैसे आओगे, बताईए..? ‘बी’ में से ‘ए’ ग्रेड में कैसे लाओगे आपकी स्कूल को..? और उसमें से कुछ स्कूलों का तो डी.एन.ए. ही ऐसा था कि कमजोरी जाए ही नहीं..! तो हमने ऐसे शिक्षकों को खोजा और उनकी स्पेशल ट्रेनिंग करवाई। कहीं लगा कि थोड़ा मिक्स-अप करो, दो यहाँ से उठाओ, दो अच्छे यहाँ लाओ, दो वहाँ ले जाओ, लेकिन कुछ करो..! मित्रों, इतने सूक्ष्म प्रयास इसलिए किए हैं कि गुजरात के आने वाले कल को गढ़ना है..! मित्रों, इस गुजरात को विश्व की नई ऊंचाईयों तक पहुंचाना है और उसकी नींव में प्राथमिक स्कूल की शिक्षा है। शहर हो या गाँव, जंगल हो, आदिवासी क्षेत्र हो या मछुआरों का समुद्री किनारा, हर जगह सर्वोत्तम शिक्षा मिले इसकी कोशिश की है..!

मित्रों, जीवन में शिक्षक बनना सौभाग्य की बात होती है..! कुछ लोगों को लगता होगा कि जब छोटे थे और घर पर मेहमान आते थे तो मम्मी-पापा कहते थे कि इसे डॉक्टर बनाना है, इसे इंजीनियर बनाना है, तब तो अभी हम पाँचवीं में भी ना आए हों..! दिमाग में रहता है, यहाँ बैठे लगभग सभी के मन में होगा कि माँ-बाप की इच्छा थी कि डॉक्टर या इंजीनियर बने, अब बने गये शिक्षक..! तो बहुत सारा समय आपका इसी में जाएगा कि यार, नहीं हो पाया, डॉक्टर नहीं बना..! अरे, जाने दो यार, उस साल पेपर्स इतने कठिन थे ना... परीक्षक ही ऐसे थे ना... यानि, बहाने तो बहुत मिल जाते हैं..! मित्रों, जो हुआ सो हुआ, अब आपको तय ही करना पड़े, बीते हुए कल को भूलकर आज जहाँ खड़े हो वहीं से भव्य सपने कैसे देखें, भव्य इमारत कैसे बनाई जाए, इसकी शुरुआत करनी चाहिए..! नहीं तो आप उस बोझ ले करके चलोगे कि मुझे तो ये बनना था, वो बनना था, अब क्या करें, जैसी किस्मत..! फिर घड़ी देखता रहता है..! मित्रों, हमें तय करना पड़े कि हमें करना क्या है..? मित्रों, जब स्कूल की घंटी बजती है तो ऊर्जा मिलती है या मानसिक तनाव पैदा होता है उसका निर्णय करना पड़े..! स्कूल की घंटी बजते ही पूरा माहौल पक्षीयों के कलरव जैसा बन जाता हो तो मित्रों, वह घंटारव जीवन का नया नाद बनता है..! लेकिन अगर वही आपको बोझ लगता है कि यार, ये अभी कहाँ... तो हो गया समजो..! और जिसको शाम की आखिरी घंटी बजे उसका आनंद हो तो समझने का कि उसे अभी शिक्षक बनना बाकी है..! उसे ऐसा होना चाहिए कि अरे, अभी तो मुझे पढ़ाना बाकी है और घंटी बज गई..? मित्रों, ये सारे हमारे मन की अवस्था के मापदंड हैं..! मित्रों, हमारा विद्यार्थी रविवार की छुट्टी आते ही दु:खी हो जाए कि अरे, कल तो छुट्टी है, मुझे नहीं आना है, आप नहीं मिलेंगे..? अगर ऐसा होता है तो आप समझना कि आप सही मायने में उसके गार्डियन बने हैं। लेकिन शनिवार को स्कूल के छूटने के समय अगर विद्यार्थी को लगे कि वाह, अब तो सोमवार को आना है..! तो मान लेना मित्रों, ना ही वह स्कूल की इमारत, ना मुख्यमंत्री, ना बजट, ना शिक्षा विभाग, अगर इसके लिए कोई जिम्मेदार है तो वह शिक्षक है..! अगर उमंग के साथ बच्चे आते हैं तो उसका श्रेय मुख्यमंत्री को नहीं जाता है, उसका श्रेय सरकार के बजट को नहीं जाता है, उसका श्रेय उस शिक्षक को जाता है जिसने अपनी जान उस बच्चे में डाल दी है..! अगर इस भावना के साथ शिक्षक की भूमिका निभाएंगे तो मित्रों, मुझे विश्वास है कि आने वाले कल के गुजरात के लिए जो सपने हमने संजोए हैं उन सपनों को पूरे करने का सामर्थ्यवान मानव बल आपके द्वारा निर्माण होगा, एक अर्थ में आप गुजरात के सच्चे निर्माता बनोगे ऐसी मेरी आप सभी को शुभकामनाएं हैं..!

गुजरात के सभी कोने में जो मित्र बैठे हैं, सभी जिलों में जो बैठे हैं और आज जिन्हें नियुक्ति पत्र मिलने वाले हैं उन सभी मित्रों को बहुत बहुत अभिनंदन और मुझे भरोसा है कि वे सभी इस राज्य के निर्माण के लिए सभी संभव प्रयास करेंगे, ऐसी शुभकामना के साथ,

जय जय गरवी गुजरात..!

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Your Highness,
Excellencies,
नमस्कार!

भारत में आप सभी का स्वागत और अभिनंदन करते हुए मुझे अत्यंत खुशी हो रही है।

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता people-centric और humanity first approach पर आधारित है। Resilience, Innovation, Cooperation और Sustainability हमारी प्राथमिकताएं रही हैं। इन प्राथमिकताओं के साथ, हमने BRICS सहयोग को सामान्य जन से जोड़ने पर विशेष बल दिया है।

इसी सोच के साथ साढ़े तीन सौ से अधिक बैठकों का आयोजन किया गया। लगभग तीस शहरों में आपकी टीम्स का स्वागत करने का हमें अवसर मिला। भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता को सफल बनाने में सक्रिय योगदान और समर्थन के लिए मैं आप सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।

Friends,

इस वर्ष की ब्रिक्स Summit एक ऐतिहासिक पड़ाव है। हम ब्रिक्स की बीसवीं वर्षगांठ मना रहे हैं। मानव जीवन में बीस वर्ष की आयु, maturity और responsibility के नए चरण का आरंभ होती है। यह वह अवस्था होती है, जब सपनों के साथ जिम्मेदारियाँ जुड़ती हैं, सामर्थ्य को नई दिशा मिलती है।

आज ब्रिक्स भी अपने ‘coming of age’ के क्षण में है। पिछले बीस वर्षों में ब्रिक्स ने वैश्विक मंच पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। हम एक-दूसरे के दृष्टिकोण का सम्मान करते हैं और consensus से आगे बढ़ते हैं। हम किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने की सोच के साथ आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं।

अब समय है, कि हम ब्रिक्स में हमारी एकता और सहमति को वैश्विक मंच पर ठोस परिणामों में बदलें। अगले बीस वर्षों के लिए हमें एक नए और ambitious agenda पर काम करना होगा। इसकी शुरुआत हमें अपने खुद के वर्किंग सिस्टम से करनी होगी।

ब्रिक्स की अध्यक्षता हर वर्ष बदलती है, किन्तु इसकी वजह से हमारा institutional momentum नहीं रुकना चाहिए। मैं BRICS Continuity and Implementation Mechanism का प्रस्ताव रखता हूँ। इसके तहत Troika के माध्यम से सभी initiatives और outcomes का follow up हो सकेगा।

हम एक secure digital repository बना सकते हैं। इसमें हर निर्णय के साथ nodal point, समय-सीमा और implementation status दर्ज किया जा सकता है।

Friends,

ब्रिक्स को मजबूत करते हुए, हमें global reform की दिशा भी तय करनी होगी। Global Governance का वर्तमान structure, एक pyramid जैसा दिखाई देता है। इसके ऊपरी भाग में power और decision making केंद्रित हैं, और निचले भाग में वे देश हैं जो इन decisions से प्रभावित तो होते हैं, लेकिन उन्हें आकार नहीं दे पाते।

Global South आज वैश्विक संकटों की front row में है, लेकिन decision-making की back row में। हमें इस “pyramid of privilege” को “platform of partnership” में बदलना है, जहां हर देश की आवाज़ हो, हर सदस्य का stake हो और हर प्रयास के केंद्र में मानवता का विकास हो।

इस उद्देश्य से मैं प्रस्ताव रखता हूँ कि हम मिलकर global governance reform के दस proposals तैयार करें, जिसे हम अगली Summit तक एक BRICS Reform Roadmap का रूप देने का प्रयास कर सकते हैं।

इस roadmap को बनाने में हमें तीन मुख्य पहलुओं- Representation, Responsiveness and Rule-making का ध्यान रखना होगा।

पहला, Representation के संबंध में मैं कहना चाहूंगा, UN Security Council में reform अब और टाला नहीं जा सकता। इस विषय पर text-based negotiations को निश्चित समय-सीमा और स्पष्ट परिणाम से जोड़ना होगा।

उसी तरह, financial institutions में voting power, leadership positions और policy priorities आज की इकोनॉमिक रियेलिटीज़ के अनुसार होनी चाहिए। जो देश global economic growth को गति देते हैं, उन्हें global economic governance को दिशा देने में भी उचित भूमिका मिलनी चाहिए।

दूसरा, Responsiveness। वैश्विक संस्थानों में मानवता का विश्वास तभी बनेगा जब वे समस्याओं का प्रभावी समाधान करने में सक्षम होंगे। हमें collective response के speed, scale और last mile impact पर ध्यान देना होगा।

Seafarers का वैश्विक व्यापार में बहुत बड़ा योगदान है, किन्तु अक्सर मुश्किल समय में उन्हें सहारे की कमी महसूस होती है। मेरा प्रस्ताव है कि क्या हम Seafarers Emergency Support Network बना सकते हैं? इसके माध्यम से संबंधित देशों की Maritime authorities और missions को जोड़ा जाएगा। इससे distress alerts, medical assistance, परिवारों को सूचना तथा evacuation में सहयोग दिया जा सकता है।

और तीसरी मैं कहना चाहता हूँ Rule Making के संबंध में। भविष्य के global rules तय करने में समान भागीदारी सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

AI, cyberspace, outer space, biotechnology और critical technologies, भविष्य के अवसरों के साथ भविष्य के नियम भी तय कर रहे हैं।

हमें ग्लोबल साउथ को rule-taker से rule-shaper बनाने के लिए प्रयास करने होंगे। ब्रिक्स के माध्यम से हम ग्लोबल साउथ के देशों के युवा diplomats और policymakers को negotiations skills, practical training और legal expertise प्रदान कर सकते हैं।

सुखद संयोग से आज United Nations Day for South-South Cooperation है। Global South को समर्पित इस दिन पर ऐसा निर्णय लिया जाना विशेष महत्व रखता है। भारत इस विषय में lead लेने के लिए तैयार है।

Friends,

भारत में आयोजित इस ब्रिक्स समिट का संदेश स्पष्ट होना चाहिए: यदि हमारा भविष्य साझा है, तो उसके निर्माण का अधिकार भी साझा होना चाहिए।

From voice to impact. From privilege to partnership.

यही ब्रिक्स at 20 का संकल्प हो।

बहुत-बहुत धन्यवाद।