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मंच पर बिराजमान एन.एम.ओ. के सभी पदाधिकारी, भारत के भिन्न-भिन्न भागों से आए हुए सभी प्रतिनिधि बंधु और नौजवान मित्रों..!

हम लोग एक ही अखाड़े से आए हैं और इसलिए हम सबको अपनी भाषा का पता है, भावनाओं का पता है, रास्ता भी मालूम है, लक्ष्य का भी पता है और इसलिए कौन किसको क्या कहे, कौन किससे क्या सुने..? और इसलिए मैं कुछ ना भी बोलूं तो भी बात पहुँच जाएगी। मैं अनुमान लगा सकता हूँ कि मेरे यहाँ आने से पहले सुबह से अब तक आपने क्या किया होगा और मैं ये भी अनुमान लगा सकता हूँ कि कल क्या करोगे। मैं ये भी अंदाज कर सकता हूँ कि अगले अधिवेशन का आपका ऐजेन्डा क्या होगा, क्योंकि हम सब लोग एक ही अखाड़े से आए हैं..!

मित्रों, स्वामी विवेकानंद जी की जब बात होती है तो एक बात उभर करके आती है कि वो परिस्थिति के बहावे में बहने वाले शख्सियत नहीं थे। जिन लोगों ने स्वामी विवेकानंद जी को पढ़ा होगा और जिन्होंने उस कार्यकाल की समाज व्यवस्था के सूत्रधारों को पढ़ा होगा, तो वे भलीभाँति अंदाजा लगा सकते हैं कि विवेकानंद जी को कोई काम सरलता से करने का सौभाग्य ही नहीं मिला था। हर पल, हर छोटी बात के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ा था। कोई चीज उन्हें सहज मिली नहीं थी और जब मिली तब स्वीकार्य नहीं थी। यह उनकी एक और विशेषता थी। रामकृष्ण परमहंस मिले, तो उनको भी उन्होंने सहज रूप से स्वीकार्य नहीं किया, उनकी भी उन्होंने कसौटी की..! काली के पास गए, रामकृष्ण देव की ताकत थी कि काली मिली, लेकिन स्वीकार करने से इनकार कर दिया। तो एक ऐसी शख्सियत की तरफ हम जाएं। हम जीवन में संघर्ष के लिए कितने कटिबद्घ हैं, कितने प्रतिबद्घ हैं..! थोड़ा सा भी हवा का रूख बदल जाए तो कहीं बैचेनी तो नहीं अनुभव करते, ऐसा तो नहीं लगता आपको कि यार, अब क्या होगा, हालात तो कुछ अनुकूल नहीं हैं..! तो मित्रों, वो जिंदगी नहीं जी सकते हैं, और जो खुद जिंदगी नहीं जी सकते वो औरों को जिंदगी जीने की ताकत कैसे दे सकते हैं..! और डॉक्टर का काम होता है औरों को जिंदगी जीने की ताकत देना। कोई डॉक्टर नहीं चाहेगा कि उसका पेशेन्ट हमेशा उस पर निर्भर रहे। डॉक्टर और वकील में यही तो फर्क होता है..! और वहीं पर सोचने की प्रवृति में अंतर नजर आता है। और अगर हमने उसको आत्मसात किया... मित्रों, जो सफल डॉक्टर है, उसका बंगला कितना बड़ा है, घर के आगे गाड़ियाँ कितनी खड़ी हैं, बैंक बैलेंस कैसा है... उसके आधार पर कभी भी किसी डॉक्टर की सफलता का निर्धारण नहीं हुआ है। डॉक्टर की सफलता का निर्धारण इस बात पर हुआ है कि उसने कितनी जिंदगी को बचाया, कितनों को नया जीवन दिया, किसी असाध्य रोग के मरीज के लिए उसने जिंदगी कैसे खपा दी, एक डिज़ीज़ के लिए चैन कैसे खोया..! मित्रों, इसलिए अगर मैं एन.एम.ओ. से जुड़ा हुआ हूँ, राष्ट्रीय भावना से भरा हुआ हूँ, सुबह-शाम दिन-रात भारत माँ की जय कहता हूँ, लेकिन भारत माँ के ही अंश रूप एक मरीज जो मेरे पास खड़ा है, वो मरीज सिर्फ एक इंसान नहीं है, मेरी भारत माँ का जीता-जागता अंश है और उस मरीज की सेवा ही मेरी भारत माँ की सेवा है, ये भाव जब तक भीतर प्रकटता नहीं है तब तक एन.एम.ओ. की भावना ने मेरी रगो में प्रवेश नहीं किया है..!

मित्रों, अभी देश 1962 की लड़ाई के पचास साल को याद कर रहा था। मीडिया में उसकी चर्चा चल रही थी। कौन दोषी, कौन अपराधी, किसकी गलती, क्या गलती... इसी पर डिबेट चल रहा था। मित्रों, अगर पचास साल के बाद भी इस पीढी को एक कसक हो, एक दर्द हो, एक पीड़ा हो कि कभी उस लड़ाई में हम हारे थे, हमारी मातृभूमि को हमने गंवाया था, तो उसमें विजय को प्राप्त करने के बीज भी मौजूद होते हैं। मित्रों, जिस स्वामी विवेकानंद जी की हम बात करते रहते हैं, जो सदा सर्वदा हमें प्रेरणा देते रहते हैं, लेकिन क्या कभी हमने सोचा कि जब आज उनके 150 साल मना रहे हैं और 125 साल पहले 25 साल की आयु में जिस नौजवान संन्यासी ने एक सपना देखा था कि मैं अपनी आंखों के सामने देख रहा हूँ कि मेरी भारत माता जगदगुरू के स्थान पर विराजमान होगी, मैं उसका भव्य, दिव्य रूप खुद देख रहा हूँ..! ये विवेकानंद जी ने 25 साल की आयु में दुनिया के सामने डंके की चोट पर कहा था। किसके भरोसे कहा था..? उन्होंने व्याख्यायित किया था कि इस देश के नौजवान ये परस्थिति पैदा करेंगे..! 150 साल मनाते समय क्या दिल में कसक है, दिल में दर्द है, पीड़ा है कि ऐसे महापुरुष जिसके प्रति हमारी इतनी भक्ति होने के बावजूद भी, 25 साल की आयु में जिन शब्दों को उन्होंने कहा था, 125 साल उन शब्दों को बीत गए, वो सपना अभी तक पूरा नहीं हुआ, क्या उसकी पीड़ा है, दर्द है..? पीढ़ियाँ पूरी हो गई, हम भी आए हैं और चले जाएंगे, क्या वो सपना अधूरा रहेगा..? अगर वो सपना अधूरा रहना ही है तो 150 साल मनाने से शायद ये कर्मकांड हो जाएगा और इसलिए मैं चाहता हूँ कि 150 साल जब मना रहे हैं तब, हम कुछ पा सकें या ना पा सकें, कुछ परिस्थितियां पलट सकें या ना पलट सकें, लेकिन कम से कम दिल में एक दर्द तो पैदा करें, एक कसक तो पैदा करें कि हमने समय गंवा दिया..!

मित्रों, ये महापुरूष ने जीवन के अंतकाल के आखिरी समय में कहा था कि समय की माँग है कि आप अपने भगवान को भूल जाओ, अपने ईष्ट देवता को भूल जाओ। अपने परमात्मा, अपने ईश्वर को डूबो दो। एकमात्र भारत माता की पूजा करो। एक ही ईष्ट देवता हो..! और पचास साल के लिए करो। और विवेकानंद जी के ऐसा कहने के ठीक पचास साल के बाद 1947 में ये देश आजाद हुआ था। मित्रों, कल्पना करो कि 1902 में जब स्वामी विवेकानंद जी ने ये बात कही थी, उस समय आज का मीडिया होता तो क्या होता..? आज के विवेचक होते तो क्या होता..? आज के आलोचक होते तो क्या होता..? चर्चा यही होती कि ये कैसा व्यक्ति है, जिसने ऐजेंडा बदल दिया और सिद्घांतो को छोड़ दिया..! जिस भगवान के लिए पांच-पांच हजार साल से एक कल्पना करके पीढ़ियों तक जो समाज चला, ये कह रहे हैं कि इसको छोड़ दो..! ये तो डूबो देगा देश को और संस्कृति को। सब छोड़ने के लिए कह रहा है, सब भगवान को छोड़ने के लिए कह रहा है..! पता नहीं उन पर क्या-क्या बीतती और बीती भी होगी, थोड़ा बहुत तो तब भी किया ही होगा..! हम जिस परिवार से आ रहे हैं, जिस परंपरा से आ रहे हैं, क्या हम इसमें से कुछ सबक सीखने के लिए तैयार हैं..? अगर सबक सीखने की ताकत होगी तो रास्ते अपने आप मिल जाएगें और मंजिल भी मिल जाएगी..! लेकिन इसके लिए बहुत बड़ा साहस लगता है दोस्तों, बहुत बड़ा साहस लगता है। अपनी बनी बनाई दुनिया को छोड़ कर के निकलने के लिए एक बहुत बड़ी ताकत चाहिए और अगर वो ताकत खो दें, तो हम शरीर से तो जिंदा होंगे लेकिन प्राण-शक्ति का अभाव होगा..! इसलिए जब विवेकानंद जी को याद करते हैं तब उस सामर्थ्य के आविष्कार की आवश्यकता है। उस सामर्थ्य को लेकर के जीना, सपनों को देखना, सपनों को साकार करना, उस सामर्थ्यता की आवश्यकता है।

आप एक डॉक्टर के नाते काम कर रहे हैं। आने वाले दिनों में जो विद्यार्थी मित्र हैं, वे डॉक्टर बनने वाले हैं। यहाँ तक पहुँचने के लिए आपने क्या कुछ नहीं छोड़ा होगा..! दसवीं कक्षा में इतने मार्क्स लाने के लिए कितनी रात जगे होंगे..! 12वीं के लिए माँ-बाप को रात-रात दौड़ाया होगा। देखिए पेपर्स कहाँ गए हैं, देखिए रिजल्ट क्या आ रहा है..! डोनेशन से सीट मिले तो कहाँ मिले, मेरिट पर मिले तो कहाँ मिले..! कोई बात नहीं, एम.बी.बी.एस. नहीं तो डेन्टल ही सही..! अरे, वो भी ना मिले तो कोई बात नहीं, फिज़ीयोथेरेपी सही..! ना जाने कितने-कितने सपने बुने होंगे..! और अब एक बार वहाँ प्रवेश कर गए..! मैं मेडिकल स्टूडेंट्स से प्रार्थना करता हूँ कि आप सोचिए कि 12वीं की एक्जाम तक की आपकी मन:स्थिति, रिजल्ट आने तक की आपकी मन:स्थिति या मेडिकल कॉलेज में एंट्रेंस तक की मन:स्थिति... जिन भावनाओं के कारण, जिन प्रेरणा के कारण आप रात-रात भर मेहनत करते थे, क्या मेडिकल में प्रवेश पाने के बाद वो ऊर्जा जिंदा है, दोस्तों..? वो प्रेरणा आपको पुरूषार्थ करने के लिए ताकत देती है..? अगर नहीं देती है तो फिर आप भी कहीं पैसे कमाने का मशीन तो नहीं बन जाओगे, दोस्तों..? इतनी तपस्या करके जिस चीज को आपने पाया है, ये अगर धन और दौलत को इक्कठा करने का एक मशीन बन जाए तो

मित्रों, 10, 11, 12वीं कक्षा की आपकी जो तपस्या है, आपके लिए आपके माँ-बाप रात-रात भर जगे हैं, आपके छोटे भाई ने भी टी.वी. नहीं देखा, क्यों..? मेरी बड़ी बहन के 12वीं के एक्जाम हैं। आपकी माँ उसके सगे भाई की शादी में नहीं गई, क्यों..? बेटी की 12वीं की एक्जाम है। मित्रों, कितना तप किया था..! मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ दोस्तों, उस तप को कभी भूलना मत। इस चीज को पाने के लिए जो कष्ट आपने झेला है, हो सकता है वो कष्ट खुद ही आपके अंदर समाज के प्रति संवेदना जगाने का कारण बन जाए, आपको बाहर से किसी ताकत की आवश्यकता नहीं रहे..! मित्रों, एक ऑर्थोपेडिक डॉक्टर के पास जब एक मरीज आता है, तो उस ऑर्थोपेडिक डॉक्टर को तय करना होगा कि उस मरीज में उसे इंसान नजर आता है कि हड्डियाँ नजर आती हैं..! मित्रों, अगर उसे हड्डियाँ नजर आती हैं तो बड़े एक्सपर्ट डॉक्टर के रूप में उसकी हड्डियाँ ठीक करके उसे वापिस भेज भी देगा, लेकिन अगर इंसान नजर आएगा तो उसका जीवन सफल हो जाएगा।

मित्रों, जीवन किस प्रकार से बदल रहा है, जीवन के मूल्य किस प्रकार से बदल रहे हैं..! अर्थ प्रधान जीवन बनता जा रहा है और अर्थ प्रधान जीवन के कारण स्थितियाँ क्या बनी हैं..? डॉक्टर ने गलत इंजेक्शन दे दिया, हाथ को काटना पड़ा, हाथ चला गया... ठीक है, दो लाख का इन्श्योरेंस है, दो लाख का बीमा मंजूर हो जाएगा..! एक आंख चली गई, ढाई लाख का बीमा मंजूर हो जाएगा..! एक्सीडेंट हुआ, एक पैर कट गया... पाँच लाख मिल जाएंगे..! मित्रों, क्या ये शरीर, ये अंग-उपांग रूपयों के तराजू से तोले जा सकते हैं..? हाथ कटा दो लाख, पैर कटा पाँच लाख, आँख चली गई डेढ लाख दे दो..! मित्रों, आँख चली जाती है तो सिर्फ एक अंग नहीं जाता है, जिंदगी का प्रकाश चला जाता है। पैर कटने से शरीर का एक अंग नहीं जाता है, पैर कटता है तो जिंदगी की गति रूक जाती है। क्या जीवन को उस नजर से देखने का प्रयास किया है हमने..? और इसलिए मित्रों, सामान्य मानवी के मन में डॉक्टर की कल्पना क्या है..? सामान्य मानवी डॉक्टर को भगवान का दूसरा रूप मानता है, सामान्य मानवी मानता है कि जैसे भगवान मेरी जिंदगी बचाता है, वैसे ही अगर डॉक्टर के भरोसे मेरी जिंदगी रख दूँ तो हो सकता है कि वो मेरी जिंदगी बचा ले..! आप एक पेशेंट को बचाते हैं ऐसा नहीं है, आप कईयों के सपनों को संजो देते हैं, जब किसी कि जिंदगी बचाते हैं..! लेकिन ये महात्मा गांधी की तस्वीर वाली नोट से नहीं होता है, महात्मा गांधी के जीवन को याद रखने से होता है और ये भाव जगाने का काम एन.एम.ओ. के द्वारा होता है।

मित्रों, मुझे भूतकाल में गुजरात के एन.एम.ओ. के कुछ मित्रों से बातचीत करने का अवसर मिला है और विशेष कर के ये जब नार्थ-ईस्ट जाकर के आते हैं तो उनके पास कहने के लिए इतना सारा होता है, जैसे कंप्यूटर के ऊपर आप किसी स्विच पर क्लिक करो और सारी दुनिया उतर आती है, वैसे ही उनको पूछो कि नार्थ-ईस्ट कैसा रहा तो समझ लीजिए आपका दो-तीन घंटा आराम से बीत जाएगा..! वो हर गली-मोहल्ले की बात बताता है। मित्रों, नार्थ-ईस्ट के मित्रों को हमसे कितना लाभ होता होगा उसका मुझे अंदाजा नहीं है, लेकिन उनके कारण जाने वाले को लाभ होता होगा ये मुझे पूरा भरोसा है। अपनों को ही जब अलग-अलग रूप में देखते हैं, मिलते हैं, जानते हैं, उनकी भावनाओं को समझते हैं तो वो हमारी पूंजी बन जाती है, वो हमारी अपनी ऊर्जा शक्ति के रूप में कन्वर्ट हो जाती है और उसको लेकर के हम अगर आगे चलते हैं तो हमें एक नई ताकत मिलती है।

मित्रों, कभी-कभी हमारी विफलता का एक कारण ये होता है कि हमें अपने आप पर आस्था नहीं होती है, हमें खुद पर भरोसा नहीं होता है और ज्यादातर समस्या की जड़ में ये प्रमुख कारण होता है। अगर आपको अपनी ही बात पर आस्था नहीं हो और आप चाहो कि दुनिया इसको माने तो ये संभव नहीं है। होमियोपैथी डॉक्टर बन गया क्योंकि वहाँ एडमिशन नहीं मिला था। लेकिन क्योंकि अब डॉक्टर का लेबल लग गया है तो मैं होमियोपैथी नहीं, अब तो मैं जनरल प्रेक्टिस करूंगा और एलोपैथी का भी उपयोग करूँगा..! अगर मेरी ही मेरी स्ट्रीम पर आस्था नहीं है, तो मैं कैसे चाहूँगा की और पेशेंट भी होमियोपैथी के लिए आएँ..! मैं आयुर्वेद का डॉक्टर बन गया। पता था कि उसमें तो हमारा नंबर लगने वाला नहीं है तो पहले से ही संस्कृत लेकर रखी थी..! मुझे जानकारियाँ हैं ना..? मैं सही बोल रहा हूँ ना..? आप ही की बात बता रहा हूँ ना..? नहीं, आपकी नहीं है, जो बाहर है उनकी है..! आयुर्वेद डॉक्टर का बोर्ड लगा दिया, फिर इंजेक्शन शुरू..! हमारी अपनी चीजों पर हमारी अगर आस्था नहीं है तो हम जीवन में कभी सफल नहीं हो सकते। मैं एन.एम.ओ. से जुड़े मित्रों से आग्रह करूंगा कि जिस रास्ते को हमने जीवन में पाया है, जहाँ हम पहुंचे हैं उसकी प्रतिष्ठा बढ़ाना भी हमारा काम है।

मित्रों, ये तो अच्छा हुआ है कि पूरी दुनिया में होलिस्टिक हैल्थ केयर का एक माहौल बना हुआ है। साइड इफैक्ट ना हो इसकी कान्शसनेस आई है और इसके कारण लोगों ने ट्रेडिशनल मार्ग पर जाना शुरू किया है और उसका बेनिफिट भी मिला है सबको। लेकिन व्यावसायिक सफलता एक बात है, श्रद्धा दूसरी बात है। और कभी-कभी डॉक्टर को तो श्रद्घा चाहिए, लेकिन पेशेंट को भी श्रद्घा चाहिए..! मैं जब संघ के प्रचारक के नाते शाखा का काम देखता था, तो बड़ौदा जिले में मेरा दौरा चल रहा था। वहां एक चलामली करके एक छोटा सा स्थान है, तो वहाँ एक डॉक्टर परिवार था जो संघ से संपर्क रखता था तो वहाँ हम जाते थे और उन्हीं के यहाँ रहते थे। वहाँ सभी ट्राइबल पेशेंट आते थे और सबसे पहले इंजेक्शन की माँग करते थे। और उनकी ये सोच थी कि डॉक्टर अगर इन्जेक्शन नहीं देता है तो डॉक्टर निकम्मा है, इसको कुछ भी आता नहीं है..! ये उनकी सोच थी और इन लोगों को भी उसको इंजेक्शन की जरूरत हो, ना हो, कुछ भी हो, मगर इंजेक्शन देना ही पड़ता था..! कभी-कभी पेशेंट की मांग को भी उनको पूरा करना पड़ता है। मित्रों, मेरे कहने का मतलब ये था कि हमें इन चीजों पर श्रद्घा होना बहुत जरूरी है। एक पुरानी घटना हमने सुनी थी कि पुराने जमाने में जो वैद्यराज होते थे, वो अपना सारा सामान लेकर के भ्रमण करते रहते थे। और अगर उनको पता हो कि इस इलाके में इतनी जड़ी-बूटियों का क्षेत्र है तो उसी गाँव में महीना, छह महीना, साल भर रहना और जड़ी-बूटियों का अभ्यास करना, दवाइयाँ बनाना, प्रयोग करना, उसमें से ट्रेडिशन डेवलप करना, फिर वहां से दूसरे इलाके में जाना, वहां करना... पुराने जमाने में वैद्यराज की जिंदगी ऐसी ही हुआ करती थी। एक बार एक गाँव में एक वैद्यराज आए तो एक पेशेंट उनको मिला, उसकी कुछ चमडी की बिमारी थी, कुछ कठिनाइ थी, कुछ ठीक नहीं हो रहा था। वैद्यराज जी को उसने कहा कि मैं तो बहुत दवाई कर-कर के थक गया, दुनिया भर की जड़ी-बूटी खा-खा कर मर रहा हूँ, मेरा तो कोई ठिकाना नहीं रहा है और मैं बहुत परेशान रहता हूँ..! तो वैद्यराज जी ने कहा कि अच्छा भाई, कल आना..! हफ्ते भर रोज आए-बुलाए, कोई दवाई नहीं देते थे, केवल बात करते रहते थे..! आखिर उसने कहा कि वैद्यराज जी, आप मुझे बुलाते हो लेकिन कोई दवाई वगैरह तो करो..! बोले भाई, दवाई तो है मेरे पास लेकिन उसके लिए परहेज की बड़ी आवश्यकता है, तुम करोगे..? तो बोला अरे, मैं इतना जिंदगी में परेशान हो चुका हूँ, जो भी परहेज है उसे मैं स्वीकार कर लूंगा..! तो वैद्यराज बोले कि चलो मैं दवाई शुरू करता हूँ। तो उन्होंने दवाई शुरू की और परहेज में क्या था..? रोज खिचडी और कैस्टर ऑइल, ये ही खाना। खिचड़ी और कैस्टर ऑयल मिला कर के खाना..! अब आपको सुन कर भी कैसा लग रहा है..! तो उसने कहा कि ठीक है। अब वो एक-दो महीना उसकी दवाई चली और उतने में वो वैद्यराज जी को लगा कि अब किसी दूसरे इलाके में जाना चाहिए, तो वो चल पड़े और उसको बता दिया कि ये ये जड़ी-बूटियाँ हैं, ऐसे-ऐसे दवाई बनाना और ऐसे तुमको करना है..! बीस साल के बाद वो वैद्यराज जी घूमते घूमते उस गाँव में वापस आए। वापिस आए तो वो जो पुराना मरीज था उसको लगा कि हाँ ये ही वो वैद्यराज है जो पहले आए थे। तो उसने जा कर के उनको साष्टांग प्रणाम किया। साष्टांग प्रणाम किया तो वैद्यराज जी ने सोचा कि ये कौन सा भक्त मिल गया जो मुझे साष्टांग  प्रणाम कर रहा है..! तो बोले भाई, क्या बात है..? तो उसने पूछा कि आपने मुझे पहचाना..? बोले नहीं भाई, नहीं पहचाना..! अरे, आप बीस साल पहले इस गाँव में आए थे और आपने एक मरीज को ऐसी-ऐसी दवाई दी थी, मैं वही हूँ और मेरा सारा रोग चला गया और मैं ठीक-ठाक हूँ..! तो वैद्यराज जी ने पूछा कि अच्छा भाई, वो परहेज तूने रखी..? अरे साब, परहेज को छोड़ो, आज भी वही खाता हूँ..! मित्रों, उस वैद्यराज की आस्था कितनी और इस पेशेंट की तपश्चर्या कितनी और उसके कारण परिणाम कितना मिला, आप अंदाज लगा सकते हैं। और इसलिए हम जिस क्षेत्र में हैं उस क्षेत्र को हमें उस प्रकार से देखना होगा।

मित्रों, हमारे यहाँ विवेकानंद जी की जब बात आती है तो दरिद्र नारायण की सेवा, ये सहज बात निकल कर आती है। आज हम स्वामी विवेकानंद जी के 150 वर्ष मना रहे हैं तब हम विवेकानंद जी की उसी भावना को अपने शब्दों में प्रकट करके आगे बढ़ सकते हैं क्या? विवेकानंद जी के लिए जितना माहात्म्य दरिद्र नारायण की सेवा का था, एक डॉक्टर के नाते मेरे लिए भी दर्दी नारायण है, ये दर्दी नारायण की सेवा करना और दर्दी ही भगवान का रूप है, ये भाव लेकर के अगर हम आगे बढ़ते हैं तो मुझे विश्वास है कि जीवन में हमें सफलता का आंनद और संतोष मिलेगा। विवेकानंद जी की 150 वीं जयंती हमारे जीवन को मोल्ड करने के लिए एक बहुत बड़ा अवसर बन कर के रहेगी।

बहुत सारे मित्रों गुजरात के बाहर से आए हैं। कई लोग होंगे जिन्होंने गुजरात पहली बार देखा होगा। और अब आपको कभी अगर अमिताभ बच्चन जी मिल जाए तो उन्हें जरूर कहना कि हमने भी कुछ दिन गुजारे थे गुजरात में..! आप आए हैं तो जरूर गिर के लायन देखने के लिए चले जाइए, आए हैं तो सोमनाथ और द्वारका देखिए, कच्छ का रन देखिए..! इसलिए देखिए क्योंकि मेरा काम है मेरे राज्य के टूरिज्म को डेवलप करना..! और हम गुजरातियों के ब्लड में बिजनेस होता है, तो मैं आया हूँ तो बिजनेस किये बिना जा नहीं सकता। मेरा इन दिनों का बिजनेस यही है कि आप मेरे गुजरात में टूरिज्म का मजा लिजीए, आप गुजरात को देखिए, सिर्फ इस कमरे में मत बैठे रहिए। अधिवेशन के बाद जाइए, बीच में से मत जाइए..!

बहुत-बहुत धन्यवाद, मित्रों..!

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भारत और मालदीव के संबंध इतिहास से भी पुराने हैं, सागर की लहरें हम दोनों देशों के तटों को पखार रही हैं, ये लहरें हमारे लोगों के बीच मित्रता का संदेश-वाहक रही हैं: प्रधानमंत्री

मालदीव की मजलिस के सम्माननीय अध्यक्ष,
मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति और मेरे मित्र मोहम्मद नशीद जी,
मजलिस के सम्माननीय सदस्य गण,

Excellencies,

आमंत्रित माननीय अतिथि गण,

नमस्कार।

आप सबको मैं अपनी और 130 करोड़ भारतीयों की शुभकामनाएँ देता हूँ। ईद-उल-फितर के पावन पर्व का आनंद और उत्साह अभी भी हमारे साथ हैं। आप सबको और मालदीव के सभी लोगों को मैं इस उपलक्ष्य पर बहुत-बहुत बधाई देता हूँ।

अध्यक्ष महोदय,

मालदीव – यानि हज़ार से अधिक द्वीपों की माला – हिन्द महासागर का ही नहीं, पूरी दुनिया का एक नायाब नगीना है। इसकी असीम सुंदरता और प्राकृतिक संपदा हजारों साल से आकर्षण का केंद्र रही हैं। प्रकृति की ताकत के सामने मानव के अदम्य साहस का यह देश एक अनूठा उदाहरण है। व्यापार, लोगों और संस्कृति के अनवरत प्रवाह का मालदीव साक्षी रहा है। और यह राजधानी माले, विशाल नीले समंदर का प्रवेश-द्वार ही नहीं है। स्थायी, शांतिपूर्ण और समृद्धशाली हिंद महासागर क्षेत्र की यह कुंजी भी है।

अध्यक्ष महोदय,

आज मालदीव में, और इस मजलिस में, आप सबके बीच उपस्थित होकर मुझे बहुत हर्ष हो रहा है। मजलिस ने सर्वसम्मति से मुझे निमंत्रण देने का निर्णय, सम्माननीय नशीद जी के स्पीकर बनने के बाद अपनी पहली ही बैठक में लिया। आपके इस gesture ने हर भारतीय के दिल को छू लिया है। और उनका सम्मान और गौरव बढ़ाया है। इसके लिए, अध्यक्ष महोदय, मैं आपको, और इस गरिमामय सदन के सभी सम्माननीय सदस्यों को अपनी ओर से, और समूचे भारत की ओर से बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूँ।

अध्यक्ष महोदय,

आज मैं दूसरी बार मालदीव आया हूँ। और एक प्रकार से, दूसरी बार मजलिस की ऐतिहासिक कार्यवाही का साक्षी हूँ। पिछले वर्ष मैं बहुत खुशी और गर्व के साथ राष्ट्रपति सोलिह के पद-ग्रहण समारोह में शामिल हुआ था । लोकतन्त्र की जीत का वह उत्सव खुले स्टेडियम में आयोजित किया गया था। चारों ओर, हजारों उत्साहित लोग मौजूद थे। उन्हीं की शक्ति और विश्वास, साहस और संकल्प उस जीत का आधार थे। उस दिन मालदीव में लोकतन्त्र की ऊर्जा को महसूस कर मुझे एक रोमांच सा अनुभव हो रहा है । उस दिन मैंने मालदीव में लोकतन्त्र के प्रति आम नागरिक के समर्पण को और, अध्यक्ष महोदय, आप जैसे नेताओं के प्रति उनके प्यार और आदर को भी देखा। और आज, इस सम्माननीय सदन में, मैं लोकतन्त्र के आप सब पुरोधाओं को हाथ जोड़ कर नमन करता हूँ।

अध्यक्ष महोदय,

यह सदन, यह मजलिस, ईंट-पत्थर से बनी सिर्फ एक इमारत नहीं है। यह लोगों का महज़ मजमा नहीं है। यह लोकतन्त्र की वो ऊर्जा भूमि है जहां देश की धड़कने आपके विचारों और आवाज़ में गूँजती हैं। यहां आप के माध्यम से लोगों के सपने और आशायेँ सच में बदलते हैं।

यहाँ अलग-अलग विचारधारा और दलों के सदस्य देश में लोकतन्त्र, विकास और शांति के लिए सामूहिक संकल्प को सिद्धि में बदलते हैं। ठीक उसी तरह, जैसे कुछ महीने पहले मालदीव के लोगों ने एकजुट हो कर दुनिया के सामने लोकतंत्र की एक मिसाल कायम की। आपकी वो यात्रा चुनौतियों से भरी थी।

लेकिन मालदीव ने दिखाया, आपने दिखा दिया, कि जीत अंतत: जनता की ही होती है। यह कोई मामूली सफलता नहीं थी। आपकी यह कामयाबी दुनिया भर के लिए एक मिसाल और प्रेरणा है। और मालदीव की इस सफलता पर सबसे अधिक गर्व और खुशी किसे हो सकती थी? उत्तर स्वाभाविक है। आपके सबसे घनिष्ठ मित्र, आपके सबसे नजदीकी पड़ौसी और दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र - भारत को। आज आपके बीच मैं ज़ोर देकर कहना चाहता हूँ कि मालदीव में लोकतन्त्र की मजबूती के लिए भारत और हर भारतीय आपके साथ था और साथ रहेगा।

अध्यक्ष महोदय,

भारत ने भी हाल ही में मानव इतिहास की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पूरी की है। 130 करोड़ भारतीयों के लिए यह सिर्फ चुनाव नहीं, लोकतन्त्र का महोत्सव यानि मेगा फेस्टिवल था। दो तिहाई से अधिक, यानि 60 करोड़ मतदाताओं ने वोट डाले। उन्होंने विकास और स्थिरता के पक्ष में भारी जनादेश दिया।

अध्यक्ष महोदय,

मेरी सरकार का मूलमंत्र - ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि विश्व में, और खासकर अपने पड़ोस में, मेरी सरकार की विदेश नीति का भी आधार है।

‘Neighbourhood First’ हमारी प्राथमिकता है। और neighbourhood में, मालदीव की प्राथमिकता बहुत स्वाभाविक है। इसलिए, आपके बीच आज मेरी उपस्थिति संयोग मात्र नहीं है। पिछले दिसम्बर में, राष्ट्रपति सोलिह ने भारत को अपना पहला गंतव्य बनाया था। और अब मालदीव का स्नेहपूर्ण निमंत्रण, मुझे मेरे इस कार्यकाल में पहली विदेश यात्रा पर मालदीव ले आया है। इस यात्रा में, विदेशियों के लिए आपके देश के सबसे बड़े सम्मान से भी मुझे नवाज़ा गया है। मेरे पास धन्यवाद देने के लिए शब्द नहीं हैं।

अध्यक्ष महोदय,

भारत और मालदीव के संबंध इतिहास से भी पुराने हैं। अनादि काल से, सागर की लहरें हम दोनों देशों के तटों को पखार रही हैं। ये लहरें हमारे लोगों के बीच मित्रता का संदेश-वाहक रही हैं। हमारी सभ्यता और संस्कृति इन तरंगों की शक्ति लेकर फली-फूली हैं। हमारे रिश्तों को सागर की गहराई और विस्तार का आशीर्वाद मिला है। विश्व के सबसे पुराने बन्दरगाहों में से एक लोथल मेरे home state गुजरात में था। ढाई हज़ार साल से भी पहले लोथल, और बाद के समय में सूरत जैसे शहरों के साथ, मालदीव के व्यापारिक संबंध रहे हैं।

मालदीव की कौड़ियां भारत के बच्चों तक की प्रिय रही हैं। संगीत, वाद्य यंत्र, रस्मो-रिवाज – ये सब हमारी साझा विरासत के ज्वलंत उदाहरण हैं। दिवेही भाषा को लें। Week को भारत में हफ्ता कहते हैं, दिवेही में भी। दिनों के नाम देखें। Sunday is Aadittha (आदीथा) in Divehi॰ यह आदित्य यानि, सूरज से जुड़ा है। सोमवार यानी मंडे, दिवेही में है HOMA। जो सोम से यानि चंद्रमा से समानता रखता है।

और world को दिवेही में कहते हैं ‘धुनिये’ और भारत में ‘दुनिया’। मालदीव में ‘दुनिया’ एक प्रसिद्ध नाम भी है। दुनिया की तो बात ही क्या, भाषा की यह समानता यहाँ से परे ‘स्वर्ग’ और ‘नरक’ तक भी फैली हुई है। इनके लिए दिवेही में ‘सुवरुगे’ और ‘नरका’ शब्द हैं। List बहुत लंबी है, बोलता गया तो पूरा शब्दकोष बन जाएगा। लेकिन संक्षेप में कहूँ तो हर कदम पर साफ है कि हम एक ही गुलशन के फूल हैं। इसलिए, मालदीव की सांस्कृतिक धरोहर के संवर्धन, manuscripts के सरंक्षण और दिवेही भाषा के शब्दकोष के विकास जैसे projects में मालदीव को सहयोग देना हमारे लिए बहुत महत्व रखता है।

और इसीलिए, Friday Mosque के conservation में भारत के सहयोग की घोषणा करते हुए आज मुझे बेहद खुशी हुई। CORAL से बनी इस ऐतिहासिक मस्जिद जैसी दूसरी मालदीव के बाहर दुनिया में कहीं नहीं हैं। मालदीव के निवासियों ने सैकड़ों साल पहले समुद्र की नेमत से मस्जिद के अद्वितीय architecture की रचना की। इससे प्रकृति के प्रति उनके सम्मान और सामंजस्य का पता चलता है।

खेद का विषय है कि आज सामुद्रिक सम्पदा पर प्रदूषण के बादल छा रहे हैं। ऐसे में, इस विलक्षण मस्जिद का conservation इतिहास ही नहीं, हमारे पर्यावरण के संरक्षण का संदेश विश्व को देगा।

अध्यक्ष महोदय,

मालदीव में स्वतंत्रता, लोकतन्त्र, खुशहाली और शान्ति के समर्थन में भारत मालदीव के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहा है। चाहे वह 1988 की घटना हो, या 2004 की Tsunami जैसी प्राकृतिक आपदा या फिर हाल का पानी-संकट। हमें गर्व है कि भारत हर मुश्किल में, आपके हर प्रयास में हर घड़ी हर कदम आपके साथ खड़ा है आपके साथ चला है। और अब हमारे दोनों देशों में विकास, समृद्धि और स्थिरता के पक्ष में भारी जनादेश ने आपसी सहयोग के लिए नए रास्ते खोले हैं।

राष्ट्रपति सोलिह की पिछली यात्रा में 1.4 बिलियन डॉलर के इकोनॉमिक पैकेज पर सहमति हुई थी। उसके क्रियान्वयन में उत्साहजनक प्रगति हुई है। मालदीव के विकास के लिए भारत के सहयोग का अटल focus है - मालदीव के लोगों का सामाजिक-आर्थिक विकास। चाहे द्वीपों में पानी और सफाई के विषय हों या इनफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण। चाहे स्वास्थ्य सेवा हो या शिक्षा। भारत के सहयोग का आधार होगा लोक-कल्याण, और मालदीव की ज़रूरतें और प्राथमिकताएँ।

हमारे दर्जनों Social Impact projects और अन्य सहयोग कार्यक्रम मालदीव के लोगों के जीवन को नजदीक से छू रहे हैं। और उनके जीवन को बेहतर बनाने के आपके प्रयासों का पूरक बन रहे हैं। मालदीव में लोकतन्त्र और समृद्धि के लिए भारत एक विश्वसनीय, मज़बूत और अग्रणी सहयोगी बना रहेगा। और हमारा यह सहयोग आप सभी जन-प्रतिनिधियों के हाथ मज़बूत करेगा।

अध्यक्ष महोदय,

देशों के संबंध सिर्फ सरकारों के बीच नहीं होते। लोगों के बीच संपर्क उनका प्राण होते हैं। इसलिए, मैं उन सभी उपायों को विशेष महत्व देता हूँ जिनसे people-to-people exchanges को बढ़ावा मिले। अत: मुझे विशेष खुशी है कि हमने आज दोनों देशों के बीच ferry service पर समझौता किया है। मुझे इस बात की भी खुशी है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, बिज़नेस, आदि के लिए भारत आने वाले मालदीवियों को वीज़ा facilitation agreement से और सुविधा हुई है।

अध्यक्ष महोदय,

आपसी सहयोग को आगे बढ़ाते हुए हमें आज के संसार की गहन अनिश्चितताओं और गंभीर चुनौतियों का भी ध्यान रखना है। Technology में भारी प्रगति से उत्पन्न ‘disruptions’, बहुध्रुवीय विश्व में आर्थिक और सामरिक धुरियों में बदलाव, प्रतिद्वंदिता और प्रतिस्पर्धा, साइबर स्पेस आदि से संबन्धित यूं तो बहुत से विषय हैं। परंतु में उन तीन चुनौतियों का ज़िक्र करना चाहूँगा जो हम दोनों देशों के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं।

अध्यक्ष महोदय,

आतंकवाद हमारे समय की एक बड़ी चुनौती है। यह खतरा एक देश या क्षेत्र के लिए नहीं, पूरी मानवता के लिए है। कोई दिन नहीं जाता जब आतंकवाद कहीं, किसी जगह अपना भयानक रूप दिखा कर किसी निर्दोष की जान ना लेता हो। आतंकवादियों के न तो अपने बैंक होते हैं न टकसाल और ना ही हथियारों की factory। फिर भी उन्हें धन और हथियारों की कभी कमी नहीं होती।

कहाँ से पाते हैं वे यह सब? कौन देता है उन्हें ये सुविधाएं? आतंकवाद की State sponsorship सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है। यह बहुत बड़ा दुर्भाग्य है कि लोग अभी भी good terrorist और bad terrorist का भेद करने की गलती कर रहे हैं। कृत्रिम मतभेदों में पड़ कर हमने बहुत समय गवाँ दिया है। पानी अब सिर से ऊपर निकल रहा है। आतंकवाद की चुनौती से भली प्रकार निपटने के लिए सभी मानवतावादी शक्तियों का एकजुट होना ज़रूरी है। आतंकवाद और radicalisation से निपटना विश्व के नेतृत्व की सबसे खरी कसौटी है।

जिस प्रकार विश्व समुदाय ने climate change के खतरे पर सक्रिय रूप से विश्व-व्यापी convention और सम्मेलन किए हैं, वैसे आतंकवाद के विषय में क्यों नहीं हो सकते?

मैं विश्व-संगठनों और सभी प्रमुख देशों से अपेक्षा करूंगा कि एक समय सीमा के भीतर आतंकवाद पर global conference आयोजित करें। ताकि आतंकवादियों और उनके समर्थक जिन loopholes का फायदा उठाते हैं उन्हें बंद करने पर सार्थक विचार किया जा सके। अगर हमने अब और देर की तो आज और आज के बाद आने वाली पीढ़ियाँ हमें माफ नहीं करेंगी।

अध्यक्ष महोदय,

मैंने climate change का उल्लेख किया। इसमें संदेह नहीं कि इस सच्चाई को हम रोज़ जी रहे हैं। सूखती नदियां और मौसम की अनिश्चितता हमारे किसानों को प्रभावित कर रही हैं। पिघलते हिमखंड और समुद्र का बढ़ता स्तर मालदीव जैसे देशों के के लिए अस्तित्व का खतरा बन गए हैं। कोरल द्वीपों और समुद्र से जुड़ी आजीविका पर pollution कहर बरपा रहा है।

अध्यक्ष महोदय, आपने समुद्र की गहराई में विश्व की पहली कैबिनेट बैठक करके इन खतरों की ओर संसार का ध्यान खींचा था। उसे कौन भूल सकता है?

मालदीव ने sustainable development के लिए और कई पहल की हैं। मुझे खुशी है कि मालदीव इंटरनेशनल सोलर Alliance में शामिल हुआ है। भारत की इस संयुक्त पहल ने पर्यावरण के संरक्षण के लिए दुनिया के देशों को एक व्यावहारिक मंच प्रदान किया है। Climate change के कई परिणामों का समाधान renewable energy के सशक्त विकल्प से मुमकिन है।

सन 2022 तक 175 गीगा वाट renewable energy के लिए भारत के लक्ष्य और उसे हासिल करने में हुई आशातीत प्रगति से यह सम्माननीय सदन भली प्रकार परिचित है। और अब भारत के सहयोग से माले की सड़कें ढाई हज़ार LED street lights के दूधिया प्रकाश में नहा रही हैं। और 2 लाख LED बल्ब मालदीव वासियों के घरों और दुकानों को जगमगाने के लिए आ चुके हैं।

इनसे बिजली बचेगी और खर्चा भी। और ये पर्यावरण के अनुकूल भी रहेंगे। पर्यावरण के संबंध में छोटे द्वीपों की भारत ने विशेष चिंता की है। उनकी विशिष्ट समस्याओं के समाधान के लिए हमने सहयोग ही नहीं किया, बल्कि दुनिया के तमाम मंचों पर आवाज़ भी उठाई है। लेकिन, सम्मिलित प्रयास और बड़े पैमाने पर करने की ज़रूरत है।

लेकिन अगर कोई यह सोचे की सिर्फ technology से यह समस्या हल हो जाएगी, तो यह सही नहीं होगा। Climate change का प्रतिकार मूल्यों में, सोच में, जीवन-शैली में और समाज में बदलाव के बिना संभव नहीं है। प्राचीन भारतीय दर्शन में माना गया कि, "माता भूमि:, पुत्रोहं पृथ्वीया:”। अगर हम पृथ्वी को अपनी माता मानेंगे, तो हम उसका सम्मान और सरंक्षण ही करेंगे, नुकसान नहीं। हमें ध्यान रखना होगा कि यह पृथ्वी, आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है। हम इसके स्वामी नहीं, सिर्फ trustee हैं।

अध्यक्ष महोदय,

तीसरा विषय है हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र, जो हमारा साझा क्षेत्र है। यहाँ दुनिया की 50% जनसंख्या निवास करती है। और धर्मों, संस्कृतियों, भाषाओं, इतिहास तथा राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्थाओं की विविधता है। परंतु, इस क्षेत्र में बहुत से अनुत्तरित प्रश्न और अनसुलझे विवाद हैं।

Indo-Pacific क्षेत्र हमारी जीवन रेखा है और व्यापार का राजमार्ग भी है। यह हर मायने में हमारे साझा भविष्य की कुंजी है। इसलिए, मैंने जून 2018 में सिंगापुर में बोलते हुए Indo-Pacific Region में खुलेपन, एकीकरण एवं संतुलन कायम करने के लिए सबके साथ मिलकर काम करने पर ज़ोर दिया था। ऐसा करने से ही राष्ट्रों के बीच विश्वास बनेगा। और नियम-सम्मत व्यवस्थाएँ तथा multilateralism कायम रहेंगे।

अध्यक्ष महोदय,

चार वर्ष पूर्व मैंने हिंद महासागर क्षेत्र के लिए SAGAR के विज़न और प्रतिबद्धता को रेखांकित किया था। इस शब्द SAGAR का हिन्दी में अर्थ है समुद्र। SAGAR, यानि Security And Growth for All in the Region हमारे लिए Indo-pacific में सहयोग का blueprint है। समावेशिता के इस सिद्धांत पर आज मैं फिर ज़ोर देना चाहूँगा। मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि भारत अपनी शक्ति और क्षमताओं का उपयोग केवल अपनी समृद्धि और सुरक्षा के लिए ही नहीं करेगा।

बल्कि इस क्षेत्र के अन्य देशों की क्षमता के विकास में, आपदाओं में उनकी मानवीय सहायता के लिए, तथा सभी देशों की साझा सुरक्षा, संपन्नता और उज्ज्वल भविष्य के लिए करेगा। समर्थ, सशक्त और समृद्ध भारत दक्षिण एशिया और Indo-Pacific में ही नहीं, पूरे विश्व में शांति, विकास और सुरक्षा का आधार स्तम्भ होगा।

अध्यक्ष महोदय,

इस विज़न को साकार करने में, और Blue Economy में सहयोग के लिए, भारत को मालदीव से बढ़कर कोई भागीदार नहीं मिल सकता। क्योंकि हम सामुद्रिक पड़ोसी हैं। क्योंकि हम मित्र हैं। और दोस्तों में कोई छोटा और बड़ा, कमज़ोर और ताकतवर नहीं होता। शांत और समृद्ध पड़ौस की नींव भरोसे, सद्भावना और सहयोग पर टिकी होती है।

और यह भरोसा इस विश्वास से आता है कि हम एक-दूसरे की चिंताओं और हितों का ध्यान रखें। जिससे हम दोनों ही और अधिक समृद्ध हों, और अधिक सुरक्षित रहें। ऐसा तभी संभव है जब हम अच्छे वक्त में और बुरे में भी, आपसी विश्वास को और पुख्ता करें।

अध्यक्ष महोदय,

हमारा दर्शन और हमारी नीति है: वसुधैव कुटुंबकम। यानि सारी दुनिया एक परिवार है। युगपुरुष महात्मा गांधी ने कहा था: "There is no limit to extending our services to our neighbours.” भारत ने अपनी उपलब्धियों को हमेशा विश्व के साथ और खास कर पड़ौसियों के साथ साझा किया है।

इसलिए, भारत की विकास साझेदारी लोगों को सशक्त करने के लिए है। उन्हें कमजोर करने के लिए नहीं। और न ही हम पर उनकी निर्भरता बढ़ाने के लिए। या भावी पीढ़ियों के कंधों पर कर्ज़ का असंभव बोझ डालने के लिए।

अध्यक्ष महोदय ,

यह समय चुनौतियों से भरा एक जटिल संक्रांति काल है। परन्तु, चुनौतियां अवसर भी लाती हैं। आज भारत और मालदीव के पास अवसर है:

o पड़ोसियों के बीच मित्रतापूर्ण संबंधों का आदर्श बनने का;
o आपसी सहयोग से हमारे लोगों की आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक आकांक्षाओं को पूरा करने का;
o अपने क्षेत्र में स्थायित्व, शांति और सुरक्षा स्थापित करने के लिए मिलकर काम करने का;
o विश्व की सर्वाधिक महत्वपूर्ण समुद्री लेन को सुरक्षित रखने का;
o आतंकवाद को हराने का;
o आतंकवाद और अतिवाद का पोषण करने वाली शक्तियों को दूर रखने का;
o और स्वस्थ तथा स्वच्छ परिवेश और पर्यावरण के लिए आवश्यक बदलाव लाने का।

इतिहास को, और हमारे नागरिकों को हमसे अपेक्षा है कि हम ये अवसर जाने नहीं देंगे, और इनका पूरा लाभ उठायेंगे। इस प्रयास में पूरा-पूरा सहयोग करने के लिए, और मालदीव के साथ अपनी अनमोल मैत्री को और गहन करने के लिए भारत दृढ़ प्रतिज्ञ है।

यह पावन संकल्प मैं आज आपके बीच दोहराता हूँ। मुझे आपने अपने बीच आने का मौका दिया।

एक बार फिर इस बड़े सम्मान के लिए धन्यवाद।
आपकी मित्रता के लिए धन्यवाद।
बहुत-बहुत धन्यवाद।