अभी बड़े विस्तार से बताया गया कि मैं गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में कई वर्षों तक काम करके, अब भारत के प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला है। लेकिन इसमें ये सबसे बड़ी महत्वपूर्ण बात यह है कि गुजरात में काम करते समय मेरा सबसे अधिक संबंध जापान के इंडस्ट्रियल हाउस से हुआ, जापान के बिजनेस ग्रुप के साथ हुआ। पिछले 6-7 साल में शायद ही कोई ऐसा सप्ताह होगा, जब की जापान का डेलिगेशन गुजरात में न आया हो और इस संबंधों के कारण शासन में बैठे हुए लोगों का दृष्टिकोण कैसा होना चाहिए, ईज़ आफ बिजनेस के लिए इनीशिएटिव कौन से होने चाहिए ? सिम्पलिफिकेशन ऑफ पालिसीज, इसके लिए कौन से कदम महत्वपूर्ण होते हैं, इन बातों को मैं सामान्य रूप से तो जानने लगा हूँ लेकिन साथ-साथ स्पेसिफिक जापान के लिए रिक्वायरमेंट क्या है, उसको भी मैं समझने लगा हूँ।
मैं जब गुजरात का मुख्यमंत्री था, हमारे यहां गुजरात में गोल्फ क्या होता है, गोल्फ कोर्स क्या होता है, कुछ पता नहीं था। लेकिन, जब से जापान का डेलीगेशन आना हुआ, तो हमें लगा कि एक सरकार के नाते, बिजनेस के नाते, शायद मेरे एजेंडा में यह होगा नहीं। लेकिन एक बिजनेस के नाते जापान को फेसिलिटेट करना है तो और चीजों के साथ मुझे इसकी इस बारीकी का भी ध्यान रखना होगा और आज मैं गर्व से कह रहा हूं कि मेरे गुजरात में वर्ल्ड क्लास गोल्फ कोर्सेस बना दिए हैं। ये इस बात का सबूत है कि एक प्रो-एक्टिव गवर्नमेंट, शासन और इंवेस्टर के बीच में कैसा तालमेल होना चाहिए, कितनी बारीकी से देखना चाहिए, इसको मैं भली-भांति समझता हूं।
मेरे लिए खुशी की यह भी बात है कि मैं पहले भी जापान आया हूं। आप सबों ने मेरा स्वागत-सम्मान मुख्यमंत्री था, तब भी किया। जापान सरकार ने भी बहुत किया। जापान के लोगों के बीच में, मोदी कौन है और गुजरात में क्या करता है? इसकी बात मैंने जितनी बताई है, उससे ज्यादा जापान के जो लोग गुजरात से जुड़े हुए हैं, उन्होंने बताई है और इस कार्य में जो लोग गुजरात एक्सपेरीमेंट को जानते हैं, उनके मन में, जब मैं भारत का प्रधानमंत्री बना हूं, तो आशाएं बहुत ज्यादा होना स्वाभाविक है। इतना ही नहीं, ज्यादा अपेक्षा भी हैं, और जल्दी से सारी बातें हो, यह भी अपेक्षा है।
मैं आपको आज विश्वास दिलाने आया हूं कि पिछले 100 दिन के मेरे कार्यकाल को अगर देखा जाए। मैं राष्ट्रीय राजनीति में नया था, इतने बड़े पद के लिए, मैं उस प्रोसेस में कभी रहा नहीं था। मैं छोटे राज्य से आया। इन सारी मर्यादाओं के बावजूद भी 100 दिन के भीतर-भीतर जो इनीशिएटिव हमने लिए हैं, एक के बाद एक जो कदम हमने उठाएं हैं, उसके परिणाम आज साफ नज़र आ रहे हैं। हम लोग जापान में जो मैनेजमेंट सिस्टम है, उसके रिफार्म में, ‘करजाई सिस्टम’ को बड़ा महत्व देते हैं। आपको जान कर के खुशी होगी, मैंने आते ही, मेरे पीएमओ को और इफीशिएंट बनाने के लिए, और प्रोडक्टिव बनाने के लिए, ‘करजाई सिस्टम’ से कंसल्ट करके उसे मैंने इंडक्ट किया है और आलरेडी मेरे यहां पिछले तीन महीने से भिन्न-भिन्न डिपार्टमेंट की ट्रेनिंग चल रही है। जापान का जो एफिसिएंसी लेवल है, वह एटलिस्ट शुरू में, मेरे पीएमओ में कैसे आए, उस पर मैं लगातार तीन महीने से काम कर रहा हूं। आपकी एक टीम मेरे यहां काम कर रही है।
इससे आपको ध्यान में आएगा, कि गुड गवर्नेंस यह मेरी प्रोयोरिटी है। और जब मैं गुड गवर्नेंस कहता हूं तब आखिरकर इज ऑफ बिजनेस के लिए पहली शुरूआत क्या होती है, यही तो होती है। कोई भी कंपनी आए तो उसको सिंगल विंडो क्लियरेंस की अपेक्षा रहती है। सिंगल विंडो क्लियरेंस अल्टीमेटली इज ए मैटर आफ गुड गवर्नेंस। इसलिए हमने गुड गवर्नेंस को बल दिया है। उसी प्रकार से प्रोसेस क्विक कैसे हो? ऑनलाइन प्रोसेस को बल कैसे मिले? गवर्नेंस में टेक्नोलोजी को इंपोर्टेंस कैसे बढ़े, उस पर हमने बल दिया है। कई ऐसे पेंडिंग सवाल, मुझे याद है जब मैं 2012 में यहां आया तो मेरे सामने कुछ बातें रखी गई थी। तब तो मेरे कार्यक्षेत्र में वह विषय नहीं था, तब भी मुझसे अपेक्षाएं की जाती थी, मोदी जी ये करिये। लेकिन वो मुझसे ज्यादा भारत सरकार से संबंधित थे। लेकिन शायद आप लोगों को कुछ अंदाजा होगा, इसी वर्ष 2012 से ही मुझे लिस्ट देना शुरू कर दिया था।
आप चाहते थे, एक बैंक की ओपनिंग हमारे यहां अहमदाबाद में हो जाए, मैंने आते ही पहला काम वो कर दिया। मैंने उस बैंक के लिए परमिशन दे दी। ‘रियल अर्थ’ के लिए कई दिनों से चर्चा चल रही थी। वह काम पूरा हो गया। ऐसे कई डिसीजन एक के बाद एक। जापानीज बैंकों का भारत में और ब्रांचेज खोलने की अनुमति आल रेडी हमने दे दी। यानी एक के बाद एक निर्णय इतनी तेजी से हो रहे हैं ।अल्टीमेटली मेरा ये ही इंप्रेशन है,क्योंकि बीइंग ए गुजराती, मेरे ब्लड में कामर्स है। जैसे ब्लड में मनी होता है और इसलिए मेरा इन चीजों को समझना स्वाभाविक है। मैं नहीं मानता हूं कि बिजनेसमैन को बहुत ज्यादा कन्सैशन चाहिए। मैं ये समझता हूं कि बिजनेसमैन को ग्रो करने के लिए प्रोपर इन्वायरमेंट चाहिए। और इन्वायरमेंट प्रोवाइड करना, ये सिस्टम की जिम्मेवारी है, शासन की जिम्मेवारी है, पालिसीमेकर्स की जिम्मेवारी है। एक बार सही पालिसी मेकिंग का फ्रेमवर्क बन जाता है, तो चीजें अपने आप चलती हैं।
कभी-कभार डिले होने का एक कारण यह होता है कि हम नीचे के तबके के अधिकारियों पर चीजें छोड़ देते हैं। अगर हम पालिसी ड्रीवन स्टेट चलाते हैं, तो निर्णय करने में नीचे कोई भी झिझक नहीं रहती। छोटे से छोटा व्यक्ति भी आराम से डिसीजन ले सकता है। इसलिए हमने प्रायोरिटी दी है, पालिसी ड्रीवन स्टेट गवर्नेंस चलाने की। अगर पालिसी ड्रीवन स्टेट होता है तो डिसक्रिमीनेशन का स्कोप नहीं रहता है। पहले आप, पहले आप वाला मामला नहीं रहता है। और उसके कारण हर एक को समान न्याय मिलता है। हर एक को समान अवसर मिलता है और उस बात पर भी हमने बल दिया है।
अभी हमारी सरकार को तीन महीने हुए है। आप व्यापार जगत के लोग है तो आप जानते हैं ग्लोबल इकोनोमी, और ग्लोबल इकोनोमी का इंपेक्ट क्या होता है और किस नेशन की इकोनोमी कैसे चल रही है। पिछला एक दशक, हमारा कठिनाइयों से गुजरा है। मैं उसके विवाद में जाने के लिए इस फोरम का उपयोग नहीं करना चाहता हूं। लेकिन पहले क्वार्टर में 5.7 प्रतिशत के ग्रोथ के साथ हमने एक बहुत बड़ा जम्प लगाया है। इसने एक बहुत बड़ा विश्वास पैदा किया है। क्योंकि हम 4.4- 4.5- 4.6 के आस-पास लुढ़कते रहते थे। और एक निराशा का माहौल था। इससे बहुत बड़ा बदलाव आता है।
आप जानते हैं, ‘गो- नो गो’, यह एक ऐसी स्थिति होती है जो किसी को भी डिसीजन लेने के लिए उलझन में डाल देती है। जब जनता का क्लियर कट मैंडेट होता है, और एक खुशनसीबी है, जापान और भारत के बीच कि जापान में भी बहुत अरसे के बाद एक स्पष्ट बहुमत के साथ, पीपल्स मैंडेट के साथ एक स्टेबल गवर्नमेंट आई है। लोअर हाउस, अपर हाउस दोनों में, एक स्टेबल गवर्नमेंट आई है। भारत में भी करीब 30 साल के बाद एक पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार आई है। पूर्ण बहुमत की सरकार आने के कारण दो चीजें साफ बनती हैं। एक, हमारी अकाउंटिबिलिटी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है। हमारी रिस्पांसिबिलिटी और ज्यादा बढ़ जाती हैं। ये दो चीजें ऐसी है जो हमारे काम करने के की जिम्मेवारी को भी बढ़ाती है प्रेरणा भी देती है, गति भी देती है। ये जो पोलिटिकल स्टेबिलिटी की सिचुएशन दोनों कंट्री में खड़ी हुई है, वो आगे वाले दिनों में बहुत बड़ी उपकारक होने वाली है, ये मैं साफ मानता हूं।
मैं और एक विषय पर जाना चाहता हूं। आप जानते हैं, भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। 65 परसेंट आफ पोपुलेशन बिलो थर्टी एज ग्रुप की है। 2020 में पूरे विश्व को जो वर्क फोर्स की जरूरत है, अभी से मैपिंग करके, ग्लोबल वर्क फोर्स की जो रिक्वायरमेंट है, उसकी पूर्ति करने के लिए हम स्किल डेवलपमेंट पे बल देना चाहते हैं, ताकि 2020 में हम ग्लोगल वर्क फोर्स रिक्वायरमेंट को मीट करने में भारत बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता है। लेकिन हम स्किल डेवलपमेंट जापान के तर्ज पर करना चाहते हैं, जहां क्वालिटी, जीरो डिफेक्ट, इफीशिएंसी, डिसिप्लिन, इन सारे विषयों में हम कोई कभी न बरतें। मैं मानता हूं, जापान हमें इसमें बहुत बड़ी मदद कर सकता है। मैं जापान के गवर्नमेंट के जिन लोगों से मिलता हूं, मैं उनसे बात कर रहा हूं,मुझे उस स्किल डेवलपेंटमेंट के लेवल पे जाना है जो ग्लोबल रिक्वायरमेंट के लेवल पे करें। हम ग्लोबल रिक्वायरमेंट की मैपिंग भी करना चाहते हैं और एकार्डिंग टू देट, हम लोग हमारे यहां स्किल डेवलपमेंट पे फोकस करना चाहते हैं।
उसी प्रकार से, जापान के साथ मिल करके हम रिसर्च के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं। मानव स्वभाव ऐसा है, कि निरंतर रिसर्च अनिवार्य होती है। देयर इज नो इंड ऑफ दि रोड, रिसर्च के क्षेत्र में। और ये अगर करना है तो दुनिया में इस प्रकार की जो इन्टेलक्चुअल प्रॉपर्टी है, उसे आगे बढ़ाने में कौन कितना मदद कर सकता है। भारत इस प्रवाह में जुड़ना चाहता है। वहां भी एक बहुत बड़ा स्कोप है। 125 करोड़ की जनसंख्या। वहां भी एक अर्ज पैदा हुई है। वे भी अपनी क्वालिटी ऑफ लाइफ में चेंज चाहते हैं। जब 125 करोड़ लोग क्वालिटी ऑफ लाइफ में चेंज चाहते हैं तो ये अर्ज भीतर से उठती है तो हम कल्पना कर सकते हैं कि रिक्वारमेंट भी कितनी बड़ी होगी।
अगर हम एक एनर्जी सेक्टर ले लें, आज क्लीन एनर्जी हमारी सबसे बड़ी रिक्वायरमेंट है। क्योंकि हम कोई हाइड्रो-कार्बन रिच कंट्री नहीं हैं। हम प्रकृति से, एक्सपलाइटेशन ऑफ नेचर में विश्वास नहीं करते हैं। हम एन्वायरमेंट फ्रैंडली डेवलपमेंट में विश्वास करते हैं। और इसीलिए हमारे लिए बहुत जरूरी है कि हम क्लीन एनर्जी के क्षेत्र में आगे बढ़े। और उसमें जापान से हम जितना सहयोग कर सकते, जितना जापान का हमें सहयोग मिलेगा, हम ग्लोबली बहुत बड़ी सेवा कर सकते हैं। क्योंकि सवा सौ करोड़ देशवासियों का एनर्जी कंजम्पशन की तुलना में, उनकी क्लीन एनर्जी से ग्लोबल वार्मिंग को बचाने में भी उनकी मदद होना बहुत स्वाभाविक है।
हम इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में, अभी बजट में हमने काफी इनिशिएटिव लिए हैं। रेलवे में हमने 100 पर्सेन्ट एफडीआई के लिए बहुत हिम्मत का निर्णय किया है। डिफेंस में हमने 49 पर्सेन्ट का बहुत बड़ा महत्वपूर्ण निर्णय किया है। इन्फ्रास्ट्रक्चर में हमने 100 पर्सेन्ट एएडीआई की बात कही है और इसके लिए जो भी आवश्यक है उन आवश्यक कानूनी व्यवस्थाओं में परिवर्तन लाना होगा। नियमों में परिवर्तन लाना होगा। एक के बाद एक हम कर रहे हैं। मैं मानता हूं कि इसका लाभ भी आने वाले दिनों में मिलने वाला है।
मैं चाहता हूं अगर आप गुजरात एक्सपीरियंस को अपना एक पैरामीटर मानते हैं तो मैं आपसे आग्रह करूंगा कि आने वाले दिनों में भारत में भी आपको वही रिस्पान्स, वही सुविधाएं, वही गति और वही परिणामकारी पस्थितियां मिलेंगी। ये मैं जापान के सभी उद्योग जगत के मित्रों को विश्वास दिलाने के लिए आया हूं। मैं यह भी मानता हूं कि भारत और जापान में आर्थिक समन्वय का बनना, वो क्या हमारी बैलेंस शीट में इजाफा करने के लिए है? क्या हमारा बैंक बैलेंस बढ़े, इसके लिए है? या हमारी कंपनी का बड़ा वोल्यूम है इसलिए हमारी ऊंचाई बढ़े, ये है? मैं मानता हूं कि भारत और जापान का संबंध इससे भी कही ज्यादा और है।
इस बात में ना आप में से किसी को शंका है ना मुझे कोई शक है और ना ही ग्लोबल कम्युनिटी को शक है कि 21वीं सदी एशिया की सदी है। ये सारी दुनिया मानती है। उसमें कोई दुविधा नहीं है। 21वीं सदी एशिया की है ये सारी दुनिया मानती है। लेकिन मेरे मन में सवाल दूसरा है और सवाल ये है कि 21वीं सदी एशिया की हो, लेकिन 21वीं सदी कैसी हो, किस की हो इसको तो जवाब तो मिल चुका है, कैसी हो इसका जवाब हम लोगों को देना है। मैं यह मानता हूं कि 21वीं सदी कैसी हो, ये उस बात पर निर्भर करता है कि भारत और जापान के संबंध कितने गहरे बनते है, कितने प्रोग्रेसिव हैं। पीस एंड प्रोग्रेस के लिए कितना कमिटमेंट है और भारत और जापान के संबंध पहले एशिया पर और बाद में ग्लोबली किस पर प्रकार का इम्पेक्ट क्रिएट करते हैं, उस पर निर्भर करता है। इसलिए 21वीं सदी की शांति के लिए, 21वीं सदी की प्रगति के लिए, 21वीं सदी के जन सामान्य मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, भारत और जापान की बहुत बड़ी जिम्मेवारी है और किसी न किसी कारण से उन जिम्मेवारियों को निभाने के लिए जन सामान्य ने बहुत बड़ा निर्णय किया है, पॉलिटिकल स्टेबिलिटी का। अब दायित्व उन चुनी हुई सरकारों का है। उन दो देशों के पालिसी मेकर्स का है, ओपीनियन मेकर्स का है। इंडस्ट्रियल और फाइनेंशियल वर्ल्ड के लीडर्स का है। और ये यदि हम कर पाते हैं तो हम आने वाले दिनों में किस प्रकार से विश्व को जाना है तो उसका रास्ता तय कर सकते हैं।
दुनिया दो धाराओं में बंटी हुई है। एक, विस्तारवाद की धारा है और दूसरी विकासवाद की धारा है। हमें तय करना है विश्व को विस्तारवाद के चंगुल में फंसने देना है या विश्व को विकासवाद के मार्ग पर जा करके, नई ऊंचाइयों पर जा करके नई ऊंचाइयों को पाने के अवसर पैदा करना है। जो बुद्ध के रास्ते पर चलते हैं जो विकासवाद में विश्वास करते हैं, वह शांति और प्रगति की गारंटी लेकर के आते हैं। लेकिन आज हम चारों तरफ देख रहे हैं कि 18वीं सदी की जो स्थिति थी, वो विस्तारवाद नजर आ रहा है। किसी देश में एन्क्रोचमेंन्ट करना, कहीं समुद्र में घुस जाना, कभी किसी देश के अंदर जाकर कब्जा करना। ये विस्तारवाद कभी भी मानव जाति का कल्याण 21वीं सदी में नहीं कर सकता है। विकासवाद ही अनिवार्य है और मैं मानता हूं कि 21वीं सदी में विश्व का नेतृत्व यदि एशिया को करना है तो भारत और जापान ने मिलकर विकासवाद की गरिमा को और ऊंचाई पर ले जाना पड़ेगा। अगर इसको करना है तो मैं चाहूंगा कि इन्ड्रस्ट्रियल वर्ल्ड हो, फाइनेंसियल वर्ल्ड हो, बिजनेस सर्कल हो, हमारे इंटरलेक्चुअल फील्ड के लोग हों। हम सबको मिलकर करें, भारत और जापान की एक वैश्विक जिम्मेदारी है। ये सिर्फ भारत की भलाई के लिए कुछ करे या जापान की भलाई के लिए कुछ करें, इस कंपनी की भलाई के लिए कुछ करे या उस कंपनी की भलाई के लिए कुछ करें, यहां तक का सीमित दायरा मिट चुका है, हम उससे बड़ी जिम्मेदारियों के साथ जुड़े हुए हैं।
मुझे विश्वास है कि मैं ऐसे महत्वपूर्ण लोगों के बीच मैं खड़ा हूं, जो एक प्रकार से, दुनिया की इकोनोमी में बहुत बड़ा ड्राइविंग फोर्स, इस कमरे में बैठे हैं, जो विश्व की इकोनोमी को दिशा देने वाले लोग हैं। विश्व की इकोनोमी में प्रभुत्व पैदा करने वाले लोग मेरे सामने बैठे हैं। इतने बड़े सामर्थवान लोगों के बीच में मैं आज ऐसी बात कर रहा हूं, जो मानव कल्याण के लिए है, विश्व शांति के लिए है, विश्व के गरीबों की प्रगति के लिए है। और उस एक महान दायित्व को पूर्ण करने के लिए भारत अपनी भूमिका निभाना चाहता है। नई सरकार आवश्यक सभी रिफार्म करते हुए आगे बढ़ना चाहता है।
मैं जापान के उद्योगकार मित्रों से एक और भी बात बताना चाहता हूं। हमने तय किया है डायरेक्टली पीएमओ के अंडर में, एक जापान प्लस, इस भूमिका से एक स्पेशियल मैनेजमेंट टीम में क्रिएट करने जा रहा हूं। जो एबसेल्यूटली जापान को फेसिलिटेट करने के लिए डेडिकेटिड होगी और उसके कारण उनकी सुविधा बढ़ेगी। और एट दि सेम टाइम, हमारे यहां जो इन्डस्ट्रियल कामों को देखने वाली जो टीम है, उसके साथ हमारी टीम में, मैं जापान जो दो लोगों को पसंद करे उस टीम में मैं जोड़ना चाहता हूं। जो परमानेंट उसके साथ बैठेंगे, जो आपकी बात को बहुत आसानी से समझ पायेंगे और हमारे निर्णय प्रक्रिया के हिस्से होंगे। ये एक ऐसी सुविधा होगी जिसके कारण ‘ईज़ आफ बिजनेस’ है, ‘ईज़ फोर जापान’ भी हो जाएगा। इस प्रकार से एक स्पेशल इनोसिएटिव भी लेने का हमने निर्णय लिया है। मुझे आप सबके बीच आने का अवसर मिला, आपने समय निकाला। आपका बहुत-बहुत आभारी हूं।
भारत से मेरे साथ एक बहुत ही बड़ा डेलीगेशन आया है। आप लोग तो परिचित होंगे, कोई ना कोई से परिचित होगा, लेकिन सब लोग सबसे परिचित नहीं होंगे। मैं कह सकता हूं कि हिन्दुस्तान का इन्डस्ट्रियल वर्ल्ड का जो मेरा ‘हू इज हू’ है, वो आज यहां इस कमरे में हैं। मैं चाहूंगा कि आप लोग उनसे बाद में मिलना चाहेंगे तो मैं एक बार उनसे प्रार्थना करूंगा कि अगर हमारे लोग एक बार अपनी जगह पर खड़े हो जायें, भारत से आये हुए मेरे सब साथी। तो और लोगों को ध्यान में रहेगा ताकि हाथ मिलाना उनको बात करना उनको सबको सुविधा रहेगी। ये बहुत ही हैवीवेट, मेरे देश की टीम है। मुझे भी कभी मिलना है, तो मुझे भी उनसे समय लेना पड़े, इतने बड़े लोग हैं।
मैं इनका भी आभारी हूं कि मेरे साथ वो आये हैं और भारत की प्रगति के एक महत्वपूर्ण वो हिस्से हैं। वी आर पार्टनर। हम सरकार और वो अलग ऐसी भूमिका हमें मंजूर नहीं। हम सभी एक पार्टनर है। पार्टनर रूप से आगे बढ़ा रहे हैं। मैं चाहता हूं कि जापान और भारत पार्टनर बने। हम मिलकर एशिया के लिए और एशिया के माध्यम से विश्व के लिए विकास के मार्ग पर आगे बढ़े।
इसी अपेक्षा के साथ फिर आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
केंद्रीय मंत्रिमंडल के मेरे साथी श्रीमान प्रहलाद जोशी जी, डीयू के वीसी योगेश सिंह जी, SRCC की प्रिंसिपल सिमरित कौर जी, अजय जी, मल्लिका जी, रजत जी, SRCC से जुड़े हुए सभी साथी, फैकल्टी, स्टाफ, SRCC alumni और मेरे युवा साथियों!
मैं छठा खिलाड़ी हूं। आज का ये अवसर श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के लिए बहुत ऐतिहासिक है, ये देश के शिक्षा जगत के लिए भी उतना ही अहम है। यहां SRCC का हिस्सा रहीं अनेक पीढ़ियां एक साथ जुटी हैं। मैं आप सभी को, SRCC के इस शताब्दी समारोह के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं। मैं इसके संस्थापक सर श्रीराम जी को आदरपूर्वक श्रृद्धांजलि देता हूं, उनके विजन को नमन करता हूं।

साथियों,
जब कोई इंसान 100 वर्ष जीता है, तो उसे अनुभवों का सागर माना जाता है। और जब कोई संस्थान 100 वर्ष का होता है, तो वो उपलब्धियों और प्रेरणाओं का महासागर हो जाता है। अपनी 100 वर्षों की इस यात्रा में, SRCC ने पीढ़ियों को गढ़ा है, उन्हें उज्ज्वल भविष्य से जोड़ा है। जो आए उन्होंने पढ़ा, और जो निकले वो गढ़े हुए निकले। इस कॉलेज की यात्रा दरियागंज की, वहां एक छोटे से स्थान से शुरु हुई थी, और आज वही छोटा सा कॉलेज, एक विशाल वृक्ष बन चुका है। एक ऐसा विशाल वृक्ष जिसने कई पीढ़ियों को छांव भी दी है, और अपनी शीतलता से समृद्ध भी किया है। आज भी DU में जब कोई पूछता है कि कौन सा college, तो SRCC कहना ही, SRCC कहना ही अपने आप में ही एक flex होता है।
साथियों,
SRCC के alumni भी बहुत special रहे। अगर मैं आपकी भाषा में कहूं, तो यहां के alumni, OG हैं, जिन्होंने SRCC का नाम दुनिया भर में पहुँचाया, अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी एक पहचान बनाई। और रजत जी ने बड़ी लंबी सूची बताई थी। और इनमें से कुछ के साथ मुझे भी काम करने का अवसर मिला है। हमारे अरुण जेटली जी, यहीं पढ़े थे। और मैं कह सकता हूं कि शायद हमारी कोई मुलाकात ऐसी नहीं होती थी, कि वो SRCC की घटना न सुनाते हों। और कभी-कभी मैं तंग आ जाता था, कि एक ही घटना बार-बार सुनाते थे। अभी मेरी टीम में भाई संजीव सान्याल भी, यहीं से पढ़े हुए हैं। बाकी भी काफी साथी हैं यहां मेरे। और ऐसा नहीं है कि यहां से सिर्फ अर्थ-जगत के ही लोग निकले, कितने ही आर्टिस्ट्स से लेकर नेता, वकील, जस्टिस सब यहां से निकले हैं। यानी SRCC के लोगों ने हर क्षेत्र में अपनी धूम मचाई है। धुरंधर न हो लेकिन धूम तो मचाई है।
साथियों,
बीते कुछ दिनों से इस कार्यक्रम की बहुत चर्चा चल रही है। खासतौर पर लोग 2013 के मेरे संबोधन को याद कर रहे हैं। लोगों ने उसको फिर से सुना है, फिर से पढ़ा है, संभव है, इस नई पीढ़ी के लोगों ने भी उसको री-विजिट किया होगा। उस स्पीच के एक प्रकार से मैं कह सकता हूं कि Wave बन गई थी, एक लहर सी चल पड़ी थी। और आज भी, 13-14 साल बाद भी, उस सभा का, उस संबोधन का प्रभाव बरकरार है।

साथियों,
तब आपकी जगह आपके सीनियर बैठे थे। और मैं तब सीएम तो था, लेकिन मैं देश की मुख्य विपक्षी पार्टी का एक सदस्य भी था। और संभवत: तब लोग ये उम्मीद कर रहे थे, कि मैं तब की केंद्र सरकार पर लंबे-चौड़े अटैक करूंगा, आरोपों की झड़ी लगा दूंगा।
लेकिन साथियों,
विपक्ष में होने के बाद भी, तत्कालीन सरकार का आलोचक होने के बावजूद, मैंने इस मंच का वो उपयोग नहीं किया था, मैंने एक विजन रखा, सकारात्मक बातें कहीं। मैंने तब जो कुछ भी कहा, वो मेरा कन्विक्शन था। मैं उन बातों को, उन सपनों को हमेशा से जीता आया हूँ, उस रास्ते पर ही चलता रहा हूँ, देश के लिए जी-जान से जुटना, देश के लिए जीने का जज्बा, जो मेरे भीतर का भाव-विश्व है, वो उस दिन 2013 में इसी मंच से, मेरा वो भाव-विश्व शब्दों की माला में एक एक करके प्रकट होता चला गया था। और मैं देर तक बोला था फिर मैंने मैंने स्टूडेंट्स से पूछा कि क्या मैं continue कर दूं, उन्होंने जोर से कहा हाँ continue कीजिए।
साथियों,
मैंने उस दिन पानी के ग्लास का एक उदाहरण दिया था, और देश में उसकी खूब चर्चा भी हुई थी। मैंने बताया था कि पानी से आधे भरे ग्लास को देखने के तीन नज़रिए क्या होते हैं। एक, जिनको ग्लास पानी से आधा भरा दिखता है, दूसरा, जिनको ग्लास आधा खाली दिखता है, और तीसरा, जिनको ग्लास पूरा भरा हुआ दिखता है, आधा पानी और आधा हवा से भरा।

साथियों,
ये वो समय था, जब देश निराशा के दलदल में धंसा हुआ था। मैंने तब भी कहा था, कि मैं ग्लास को आधा नहीं देखता, अधूरा नहीं देखता, गिलास को पूरा भरा हुआ देखता हूं। आधा पानी से, आधा हवा से। और उस समय आप सब तो स्कूल में रहे होंगे, लेकिन आज इंटरनेट पर जाकर के 2013 और उसके आसपास की खबरें अगर पढ़ेंगे, तो आपको अंदाजा आएगा, तब सिचुएशन क्या थी? और मैं तो आपसे आग्रह करूंगा नौजवानों से, कि जरा 2013 के उस कालखंड की तरफ इंटरनेट पर जाकर के नजर करिए। 2013 में मेरे उस भाषण के आसपास के कालखंड की उस समय जो हेडलाइन्स हुआ करती थीं। अखबारों की हो या टीवी चैनल्स की हो। मैं जरा आज उस हेडलाइन्स में क्या क्या था, उसकी एक झलक आपको दिखाना चाहता हूं। अब एक गैंग है, जो क्या करेगी, मैं जो बोल रहा हूं ना उसके छोटे-छोटे टुकड़े करके मेरे खाते में डाल देगी। और इसलिए मैं पहले से आगाह करता हूं कि मैं जो बातें बता रहा हूं 2013 के उस कालखंड में मीडिया में क्या छाया रहता था जैसे-
LoC पर भारतीय सैनिकों की हत्या, अब इस पीढ़ी को जरा अजूबा लगता होगा ऐसा भी होता था। होता था।
वर्ल्ड बैंक ने GDP ग्रोथ रेट का अनुमान घटाया
करंट अकाउंट डेफिसिट ऑल टाइम हाई
महंगाई दर करीब दस परसेंट पर
इडस्ट्रियल सेक्टर मंदी की चपेट में
हेलीकॉप्टर सौदे में घूसखोरी का पर्दाफाश
हैदराबाद में बम धमाके
ये सारी उस समय की हेडलाइन्स थीं। मैं पक्का मानता हूं, ये जो हमारे आज जो विद्यार्थी हैं, उनको इन सारी बातों का पता नहीं होगा। ये सारी बातें बताती हैं कि तब देश की क्या हालत थी। ग्रोथ फर्श पर थी और महंगाई अर्श पर थी। घोटाले चरम पर थे और भ्रष्टाचारी बेखौफ घूमते थे। अर्थव्यवस्था बेहाल थी, चारों तरफ पॉलिसी पैरालिसिस की ही चर्चा थी। दुनिया भारत को फ्रैजाइल फाइव में गिन रही थी। आतंकी बेलगाम थे और पाकिस्तान बेकाबू था। यानी तब निराशा और हताशा के अलावा कुछ नहीं था।
साथियों,
एक वो दिन था जब हर मोर्चे पर, देश में स्ट्रगल ही स्ट्रगल था, और एक आज का दिन है, आज आतंकवाद फैलाने वाले पस्त पड़े हैं। पाकिस्तान कोई नापाक हरकत करता है, तो भारत की सेनाएं घर में घुसकर मारती हैं। जम्मू-कश्मीर से लेकर नॉर्थ ईस्ट तक शांति बढ़ी है। माओवादी आतंक, नक्सलवाद की कमर तोड़ दी गई है। जो दुनिया तब भारत में पॉलिसी पैरालिसिस से चिंतित थी, वो दुनिया आज भारत के पॉलिसी डायनामिज्म की चर्चा कर रही है। तब दुनिया भारत को फ्रजाइल फाइव बता रही थी, आज दुनिया भारत को फास्टेस्ट ग्रोइंग मेजर इकॉनॉमी बनते हुए देख रही है। अभी हफ्तेभर में ही, भारत की इकॉनॉमी को लेकर कई सारी पॉजिटिव खबरें आई हैं। Seven point eight percent क्वाटर्ली ग्रोथ ने देश का जोश बढ़ाया है, और इसी बीच जैपनीज़ Credit Rating Agency ने भारत की रेटिंग अपग्रेड कर दी है।
और साथियों,
ये Seven point eight percent की ग्रोथ भी ऐसे समय में आई है, जब west asia का युद्ध चल रहा है, जब ट्रेड से जुड़ी कई तरह की अड़चनें रही हैं, उस समय ऐसी ग्रोथ हासिल करना, ये अपने आप में भारत के सामर्थ्य को दिखाता है।
साथियों,
मैं जानता हूं, आप भी जानते हैं, जो लोग, भारत को फ्रैजाइल फाइव में धकेलने के लिए बदनाम रहे हैं, उनको ये आंकड़े हज़म नहीं हो रहे हैं। लेकिन आप सभी आंकड़ों को गंभीरता से समझते हैं। अप्रैल से जून के बीच, बिजली उत्पादन, नाइन परसेंट बढ़ा, गाड़ियों की सेल में ट्वेंटी परसेंट से अधिक की वृद्धि हुई। इसमें भी, टू-व्हीलर में, ट्वेंटी परसेंट, और थ्री व्हीलर की बिक्री में करीब करीब थर्टी परसेंट की ग्रोथ रही है। यानी consumer demand भी चल रही है, और commercial activity भी तगड़ी हो रही है। Steel और सीमेंट कंजम्शन की ग्रोथ में 8 परसेंट की वृद्धि हुई है। यानी construction, housing, infrastructure और industrial activity, ये सब बढ़ रहा है। यानी भारत, ग्रो भी कर रहा है, और रोजगार के नए अवसर भी बना रहा है। बावजूद इसके, जिन लोगों के लिए साल 2013 में ग्लास आधा खाली था, उनकी सोच आज भी वैसी ही है। उनके लिए ग्लास हमेशा आधा खाली रहेगा। मैं ग्लास की बात करता हूं, और कुछ खाली रहने की बात नहीं कर रहा हूं।
साथियों,
2013 में यहां SRCC में बात करते हुए, मैंने P2G2 यानी प्रो-पीपल गुड-गवर्नेंस की भी चर्चा की थी। जिन्होंने लंबे समय तक देश में सरकारें चलाई हैं, उनका एक स्टाइल था, जब आग लगे तभी नींद से जागो, जब सूखा पड़े तब जाकर कुआं खोदो। मैंने इसी अप्रोच को बदलने की बात कही थी। और 2014 में सरकार बनने के बाद हमने ये करके दिखाया है। मैं आपको एक उदाहरण देता हूं।

साथियों,
हाल में ही, जनधन योजना को 12 साल पूरे हुए हैं। आज आप फिनटेक के अलग ही दौर में जी रहे हैं, लेकिन 2013 के वो दिन भी थे जब गांव या छोटे शहरों के स्टूडेंट्स को, सेविंग बैंक अकाउंट्स खुलवाने के लिए भी कई पापड़ बेलने प़ड़ते थे। उस समय हमारी आबादी सवा सौ करोड़ के पार थी, लेकिन मार्च 2014 तक, देश की 50 प्रतिशत से ज्यादा आबादी के पास बैंक अकाउंट्स तक नहीं थे। और जो बैंकिंग सिस्टम से बाहर थे, वो ज्यादातर गरीब थे, महिलाएं थीं, माइग्रेंट लेबरर थे, स्टूडेंट्स थे। इसलिए हम जनधन स्कीम लेकर आए, और बीते 12 वर्षों में जनधन योजना की वजह से, करीब 60 करोड़ नए बैंक अकाउंट खुले। आज देश में लगभग हर परिवार बैकिंग सिस्टम से जुड़ा हुआ है। यही भारत की फिनटेक क्रांति का आधार बना है।
साथियों,
अब आप उन लोगों के बारे में भी सोचिए, जो करोड़ों लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने का भी विरोध कर रहे थे। दरअसल ऐसे लोगों को, आधे भरे ग्लास में ही मज़ा आता है, ताकि देश के गरीब सामान्य नागरिक उनके आगे-पीछे घूमते रहें, यही माई-बाप कल्चर ये दशकों से चला रहे थे। लेकिन ये मोदी है, माई-बाप कल्चर पसंद करने वालों के सामने वो चट्टान की तरह खड़ा है।
साथियों,
पुरानी कहावत है, सांच को आंच नहीं। मुझमें हिम्मत है, इसीलिए मैं उस दिन कही बातों को याद करा रहा हूं, अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर आया हूं आपके पास। मैं जानता हूं, सच की हुंकार के आगे, झूठ की गूंज टिक नहीं सकेगी।
साथियों,
2013 के उसी कार्यक्रम में जब मैंने कहा कि हमें मेड इन इंडिया पर काम करना है, तो पुराने उस समय के इकोसिस्टम के लोगों को ये समझ ही नहीं आया था। उनको लगता था, कि निराशा के उस दौर में मेड इन इंडिया संभव ही नहीं होगा! और उस सोच में पले-बड़े लोग आज भी, मेड इन इंडिया का मजाक करते हैं।
लेकिन साथियों,
आज आप मेक इन इंडिया की ब्रैंड वैल्यू देख रहे हैं। आपसे मैं एक उदाहरण के साथ बात बताना चाहता हूं। आज हर हाथ में स्मार्टफोन है, दुनिया के बड़े से बड़े फोन ब्रैंड, आज भारत को अपना बेस बना रहे हैं। मेड इन इंडिया स्मार्टफोन, दुनिया के कोने-कोने में पहुंच रहा है। 2014 में भारत अपने ज्यादातर मोबाइल फोन इंपोर्ट करता था। आज भारत ढाई लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के मोबाइल एक्सपोर्ट करता है।

साथियों,
मैं छोटे और आसान लक्ष्य लेकर चलने वाला व्यक्ति नहीं हूं। मैं देश के लिए बड़े लक्ष्य रखता हूं, और उन्हें पूरा करने के लिए जी-जान लगा देता हूं। आप डिफेंस का सेक्टर देखिए, पहले भारत की सेनाओं के लिए ज्यादातर चीज़ें बाहर से खरीदी जाती थीं। मैंने आते ही डिफेंस वालों को बोला नेगेटिव लिस्ट बनाईये। पहले उन्होंने 500 नेगेटिव लिस्ट बनाई, बोले ये हम बाहर से नहीं लाएंगे। फिर हजार बनाई, फिर तीन हजार बनाई। आर्मी, नेवी, एयरफोर्स को, कई बार छोटे से किसी इक्विप्मेंट के लिए भी महीनों इंतजार करना पड़ता था। हमने देश की सेनाओं के साथ मिलकर एक प्लान बनाया, चीज़ों की लिस्ट बनाई, फिर भारतीय कंपनियों को कहा कि ये सब बनाओ, और आज आप देखिए, देश की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग, अपने ऑल टाइम हाई पर है। आज भारत करीब-करीब 2 लाख करोड़ रुपये का डिफेंस प्रोडक्शन कर रहा है। 2013-14 में, हम 600-700 करोड़ रुपये का डिफेंस एक्सपोर्ट करते थे। आज ये आंकड़ा, करीब-करीब 40 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। और ये अचीवमेंट्स इसलिए हो पा रहे हैं, क्योंकि आज देश में एक वाइब्रेंट डिफेंस मैन्युफेक्चरिंग इकोसिस्टम बन रहा है।
साथियों,
मुझे देश पर भरोसा है, देश के सामर्थ्य पर भरोसा है, आप युवाओं पर मेरा भरोसा है, और इसी भरोसे के आधार पर मैं विकसित भारत की बात भी कहता हूं। मुझे विश्वास है, हम 140 करोड़ भारतीय मिलकर अपने देश को विकसित भी बनाएंगे, आत्मनिर्भर भी बनाएंगे।
आने वाले समय में, भारत, मैन्यूफैक्चरिंग का हब होगा।
आने वाले समय में रिसर्च एंड इनोवेशन का हब हिन्दुस्तान होगा।
भारत,एग्रीकल्चर एक्सपोर्ट की सुपर पावर होगा।
मेरे नौजवान दोस्तों,
भारत का अपना स्पेस स्टेशन होगा,
और वो दिन भी आप देखेंगे, जब भारत एक दिन ऐसे ओलंपिक्स का आयोजन करेगा कि दुनिया देखती रह जाएगी।
और ये केवल बातें नहीं है, ये हमारे संकल्प हैं। और इन संकल्पों को सिद्धि में बदलने के लिए देश में लगातार काम हो रहा है।
साथियों,
अभी तो आपकी ज़िंदगी SRCC मोड में चल रही है। को-ऑप में चाय हो, या cold coffee पर होने वाली discussions हों, exam में last-minute notes, और printouts के लिए भाग-दौड़ करना, या फिर Crossroads और Business Conclave पर की गई मेहनत है, आप सब ने यहाँ के हर मोमेंट को अपने जीवन की एक memory बनाया है। लेकिन इस कैंपस के बाहर एक नई दुनिया आपको मिलेगी। आपको दो तरह के लोग मिलेंगे। एक वो लोग, जो पॉजिटिव तरीके से समाज की शक्ति को राष्ट्र की शक्ति में बदलते हैं। दूसरी प्रजाति उन लोगों की है, जो कोई भी काम शुरू होने पर नाराज़ फूफा बन जाते हैं, उनका फेवरेट काम होता है, हर काम का विरोध करना। इनका एक ही डायलॉग होता है, इसकी क्या ज़रूरत है?, इसकी क्या ज़रूरत है?, ये हर फूफा का परमानेंट डॉयलोग होता है। जब हम दुनिया का सबसे बड़ा Statue बना रहे थे, तो फूफा जी ने कमर कस ली, कहा इसकी ज़रूरत ही क्या है? हमने High-Speed Train पर काम शुरू किया, तो फूफा जी फिर बोले, इसकी ज़रूरत ही क्या है? हम UPI लेकर आए, तो यही फूफा लोग कहते थे - Why UPI? UPI की ज़रूरत ही क्या है? हमने चिप बनाने की बात की, तो फिर कहा गया, कि ज़रूरत ही क्या है? हमने नई पार्लियामेंट बिल्डिंग बनाई, तो ये फिर बोले - इसकी जरूरत ही क्या है? हमने देश के लिए मरने मिटने वाले, सर्वश्रेष्ठ बलिदान देने वाले हमारे वीर सेनानायकों का मेमोरियल बनवाया, फूफा फिर मैदान में आ गए, इसकी क्या जरूरत थी? लेकिन भारत ने ऐसे सारे फूफाओँ को जवाब दिया, जो देश के लिए जरूरी है, वो भारत को करने से कोई रोक नहीं सकता।
साथियों,
आज भारत एक अलग मिजाज के साथ आगे बढ़ रहा है। जो काम पहले दशकों में होता था, अब वो कुछ वर्षों में ही हो रहा है। मैं पूरे Facts के साथ एक और उदाहरण दूंगा। भारत की पहली Electric ट्रेन 1925 में चली थी। आपकी कॉलेज 1926 में शुरू हुई, Electric ट्रेन 1925 में चली थी। 1925 में चली थी ये ट्रेन, इसके बाद 2014 तक, यानी 90 इयर्स, 90 साल में सिर्फ 30 परसेंट से भी कम काम हुआ। 30 परसेंट से भी कम रेलवे लाइनों का इलेक्ट्रिफिकेशन हो पाया था। हमने सिर्फ 12 साल में, 12 साल में रेलवे लाइनों का करीब-करीब Hundred Percent इलेक्ट्रिफिकेशन करके दिखा दिया।
साथियों,
भारत की नीति-निर्णयों में आई ये गति दुनिया के बाकी देश भी देख रहे हैं, समझ रहे हैं। इसलिए वो भारत के साथ अपनी पार्टनरशिप बढ़ा रहे हैं। बीते दशक में करीब 40 देशों के साथ व्यापार समझौते हुए हैं, Free Trade Agreement हुए हैं। इससे लेदर हो, टेक्स्टाइल हो, फ्रूट-वेजिटेबल हो, हमारा प्रोसेस्ड फूड हो, श्रिंप हो, ऐसी हर चीज के लिए नए-नए बाज़ार खुल रहे हैं। आपसे बेहतर कौन जानता है कि जब नए बाज़ार खुलते हैं, भारत के गुड्स और सर्विसेज़ के लिए टैरिफ कम होते हैं, तो उसका क्या मतलब होता है। ये भारत के नौजवानों के लिए, अवसरों का नया आसमान बन रहा है।

साथियों,
आज 2013 के मुकाबले, देश आर्थिक रूप से, सामाजिक रूप से कहीं अधिक सुरक्षित है। लेकिन ये देखकर कुछ लोगों की छटपटाहट बढ़ रही है, बौखलाहट बढ़ रही है। अभी 15 अगस्त का मेरा भाषण आपने सुना होगा, ऐसे लोगों के लिए अभी मैंने लाल किले से, एक होम्योपैथी का डोज दिया था, होम्योपैथी की गोली एक छोटी सी गोली दी थी लाल किले से, और आप जानते हैं होम्योपैथी के कहते हैं कि स्वभाव ऐसा है कि होम्योपैथी की दवाई जब शुरू करते हैं, तो शुरू के दौर में बीमारी एक दम से ज्यादा बढ़ जाती है, ये होम्योपैथी का स्वभाव है। तो मैंने लाल किले से एक होम्योपैथी की गोली दी थी - दिमाग़ी नक्सल। ये दिमागी नक्सल होम्योपैथी का इलाज, जैसा मैंने कहा बीमारी को कुछ समय के लिए और उभार देता है। और उसके बाद उसका इलाज शुरू करता है। इसी तरह जैसे ही मैंने दिमाग़ी नक्सल वाली होम्योपैथी की गोली दी, सारे दिमागी नक्सल निकल-निकल के बाहर आने लगे। और जो इस बीमारी को बढ़ावा दे रहे हैं, अब जनता उनका भी असली रंग देख रही है।
साथियों,
मैंने इतनी सारी बातें बताईं, कुछ लोगों को लग सकता है, अरे क्या है भाई, 140 करोड़ का देश है, बहुत आसान था, मोदी ने क्या नया किया? लेकिन क्या ये वाकई इतना आसान था? मैं आपको फिर एक बार पुराने दिनों में ले जाना चाहता हूं। याद कीजिए आप जब स्कूल में पढ़ते होंगे। 2013 में केदारनाथ में आपदा आई थी। तो पूरी सरकार हिल गई थी। उनको समझ ही नहीं आ रहा था कि, क्या किया जाए? कैसे किया जाए? 2008 में बैंकों का संकट आया था, तो तब की सरकार ने 2014 तक उस संकट के पीछे छुपने की कोशिश की थी, हाथ तक लगाने की हिम्मत नहीं की। भारत का पूरा बैंकिंग सिस्टम, तबाह होने के कगार पर पहुंचा दिया गया था। 2008 में ही मुंबई में भयंकर आतंकी हमला हुआ था, तो तब की सरकार पर बाहर से दबाव पड़ा, और उसने पाकिस्तान को सबक सिखाने की हिम्मत तक नहीं दिखाई।
साथियों,
पिछले 12 वर्षों में तो देश में कई सारी आपदाएं आईं, इतने बड़े-बड़े साइक्लोन हमने झेलें हैं, लेकिन देश ने बहुत मजबूती से उनका सामना किया। पिछले 6 वर्षों में तो बहुत बड़े संकट आए हैं। पहले कोरोना जैसी महामारी आई, जिसने पूरी दुनिया को ठप कर दिया। फिर रूस और यूक्रेन में युद्ध छिड़ गया। उसके बाद, ट्रेड को, सप्लाई चैन को ही वेपनाइज करने का दौर शुरु हो गया। फिर वेस्ट एशिया का ये संकट आया, हर बार ये कहा गया कि अब तो भारत नहीं बचेगा और जो मेरे ज्यादा ही प्रशंसक हैं, वो ये सोचकर खुश थे कि अब तो मोदी फंसा, अब तो मोदी गिरा, अब तो उसे कुचल ही देंगे, लेकिन मेरे देश के लोगों के आशीर्वाद में इतना दम है, इतना दम है कि, भारत का बुरा चाहने वालों की हर हसरत धरी की धरी रह जा रही है।
दोस्तों,
अब 21वीं सदी में नए अवसरों की दुनिया हमारे सामने है। मुझे खुशी है कि आप ambitious हैं, क्योंकि ambition किसी textbook से नहीं सिखाई जा सकती। Ambitions उस माहौल से आती है, जो आपको बड़े सपने देखने के लिए आपको प्रेरित करती है। आज हमारा नौजवान साथी कहता है कि अपना कुछ काम करुंगा, तो स्टार्ट-अप करुंगा, कंपनी बनाऊँगा, तो unicorn बनाऊँगा। स्पेस और ड्रोन जैसे सेक्टर में जुडूंगा, कुछ बड़ा करूंगा। Cutting-edge AI सोल्यूशन्स बनाऊँगा, खेती में इनोवेशन करूंगा। 13 साल पहले आपके सीनियर्स, ऐसे सपने नहीं देख पाते थे। लेकिन आज आप ये सपने भी देख रहे हैं, क्योंकि आज के भारत में उन सपनों को सपोर्ट करने वाला इकोसिस्टम भी बन गया है।
साथियों,
अब समय बड़े लक्ष्य बनाने और उन्हें प्राप्त करने का है। अभी मैंने लाल किले से कुछ बातें कहीं थीं। मैं आपके बीच भी उन्हें दोहराना चाहूंगा। आप संकल्प लीजिए, भारत की global consulting firms क्यों नहीं हो सकतीं? हमारी accounting Firms, हमारी legal firms, हमारी financial firms, ये सब global leaders क्यों नहीं बन सकतीं? हम गर्व से कहते हैं कि आज भारतीय दुनिया की टॉप कंपनीज़ को लीड कर रहे हैं, अगर भारतीय दुनिया की टॉप कंपनियों को लीड कर रहे हैं, तो भारतीयों की बनाई कंपनियां, दुनिया को क्यों लीड न करें?
साथियों,
ये सब संभव है, इसके लिए आपके पास networks भी हैं और knowledge भी है।
साथियों,
हमारी आपकी प्रेरणा SRCC का ये कॉलेज क्रेस्ट भी है। इसमें दो सुंदर प्रतीक हैं। एक है- उगता हुआ सूरज, और दूसरा है - समुद्र में आगे बढ़ता हुआ जहाज। सूरज, जो दिशा दिखाता है और जहाज, जो उस दिशा में आगे बढ़ता है। हमें ऐसे नए रास्ते पर चलना है, जिसमें सूरज हमारा हो, समंदर भी हमारा हो। नाव हमारी हो, नाविक भी हमारा हो। लहरों पर विजय लिखे, वो हौसला हमारा हो। उड़ान हमारी हो, आसमान हमारा हो। तेज हवाओं से टकराए, वो जज़्बा हमारा हो। सपना हमारा हो, संकल्प हमारा हो, आत्मनिर्भर भारत का परचम हमारा हो। विकसित भारत की राह में, विकसित भारत की राह में तेजी से उठता हर कदम हमारा हो। एक बार फिर इस विशेष अवसर पर SRCC से जुड़े सभी लोगों को मेरी ढेर सारी शुभकामनाएँ।
वंदेमातरम्


