मैं राष्‍ट्रपति जी का बहुत आभारी हूं कि मुझे आप सबसे मिलने का अवसर मिला और राष्‍ट्रपति जी का ये इनीशिएटिव है, खास करके शिक्षा क्षेत्र के लिए और मैं देख रहा हूं कि लगातार वो इस विषय की चिंता भी कर रहे हैं, सबसे बात कर रहे हैं, और बहुत विगिरसली, इस काम के पीछे समय दे रहे हैं। उनका ये प्रयास, उनका मार्गदर्शन आने वाले दिनों के, और आने वाली पीढि़यों के लिए बहुत ही उपकारक होगा, ऐसा मेरा विश्‍वास है। हमारे देश में आईआईटी ने एक प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त की है। जिस कालखंड में इसका प्रारंभ हुआ, जिन प्रारंभिक लोगों ने इसको जिस रूप में इस्‍टे‍बलिश किया, उसकी एक ग्‍लोबल छवि बनी हुई है, और आज विद्यार्थी जगत में भी, और पेरेंट में भी एक रहता है कि बेटा आईआईटी में एडमिशन ले और एक प्रकार से आप का ब्रांडिंग हो चुका है। अब कोई ब्रांडिंग के लिए आपको ज्‍यादा कुछ करना पड़े, ऐसी स्थिति नहीं है। लेकिन कभी-कभी संकट लगता है कि इस ब्रांड को बचायें कैसे? और इसके कुछ लिए कुछ पारामीटर्स तय करना चाहिए ताकि कहीं कोई इरोजन न हो और कोशिश यह हो कि ज्‍यादा अपग्रेडेशन होता रहे।

आपका मैंने एजेंडा आज देखा, जितने विषय अपने सोचे हैं, उतने अगर आप तय करते हैं, तो मुझे नहीं लगता है कि आने वाले दस साल तक आपको कोई नए विचार की जरूरत पड़ेगी या कोई कमियां महसूस होगी, काम के लिए। इतना सारा एजेंडा आपने रखा है आज। ग्‍लोबल रैंकिंग से लेकर के आईआईटियन के उपयोग तक की सारी इसकी रेंज है। एक, मुझे ऐसा लगता है कि एक तो हमें ग्‍लोबल रैंकिंग के लिए जरूर कुछ कर लेना चाहिए क्‍योंकि आइसोलेटेड वर्ल्‍ड में हम रह नहीं सकते। लेकिन एक बार हमारे अपने पारामीटर तय करके, देश की अंदरूनी व्‍यवस्‍था में हम कोई रैंकिंग की व्‍यवस्‍था विकसित कर सकते हैं क्‍या? वही हमको फिर आगे हमें ग्‍लोबल रैंकिंग की तरफ ले जाएगा। हमीं कुछ पारामीटर तय करें कि हमारी सारी आईआईटी उस पारामीटर से नीचे नहीं होंगी, और इससे ऊपर जाने का जो प्रयास करेगा, उसकी रैंकिंग की व्‍यवस्‍था होगी, रेगुलरली उसकी मानिटरिंग की व्‍यवस्‍था होगी। और उसकी जब प्रक्रिया बनती है तो एक कांस्‍टेंट इनबिल्‍ट सिस्‍टम डेवलप कर सकते हैं जो हमें इंप्रूवमेंट की तरफ ले जाता है।

दूसरा एक मुझे विचार आता है कि आईआईटियन्‍स होना, ये अपने आप में एक बड़े गर्व की बात है, रिटायरमेंट के बाद भी वह बड़ा गर्व करता है। ये अपने आप में एक बहुत बड़ी ताकत है आईआईटी की, उसका हर स्‍टूडेंट जीवन के किसी भी काल में आईआईटियन होने का गर्व करता है। ये बहुत ही बड़ी हमारी पूंजी है। आईआईटी अलूमनी का हम उपयोग क्‍या करते हैं ? डू यू हैव अवर ऑन रीजन? वो हमारे कैम्‍पस के लिए कोई आर्थिक मदद करें, कभी आयें, अपने जीवन में बहुत ऊंचाइयां प्राप्‍त किये हैं तो अपने स्‍टूडेंट्स को आकर अपने विचार शेयर करें, इंस्‍पायर करें।

मैं समझता हूं कि इससे थोड़ा आगे जाना चाहिए। हम अलूमनी पर फोकस करें और उनसे आग्रह करें कि साल में कितने वीक वो हमारे स्‍टूडेंट्स के लिए देंगे। उनके रुपये-डॉलर से ज्‍यादा उनका समय बहुत कीमती है। कोई जरूरी नहीं है कि वह जिस आईआईटी से निकला है, वहीं आए। इंटरचेंज होना चाहिए। एक्‍सपीरियेंस शेयर करने का अवसर मिलना चाहिए। यह अपने आपमें बेहतरीन अनुभव है, क्‍योंकि स्‍टूडेंट जीवन से बाहर जाने के बाद 20 साल , 25 साल में उन्‍होंने दुनिया देखी है। कुछ आईआईटियन्‍स होंगे जो अपने आप में कुछ करते होंगे, मेरे पास डाटा नहीं है। करते होंगे।

लेकिन, मैंने डाक्‍टरों को देखा है, दुनिया के भिन्‍न-भिन्‍न देशों में अपना स्‍थान बनाने के बाद वह डॉक्‍टर वहां इकट्ठे होकर एक टीम बनाते है। एक दूसरे के उपयोगी हों, ऐसी टीम बनाते है। टीम बना करके हिन्‍दुस्‍तान में आ करके रिमोटेस्‍ट से रिमोट एरिया में वह चले जाते हैं। 15 दिन के लिए कैंप लगाते हैं, मेडिकल चेकअप करते हैं, आपरेशन्‍स करते हैं, एक-आध दिन वह स्‍टूडेंट्स को वो सिखाने के लिए चले जाते हैं। कई ऐसे डाक्‍टरों की टीमें हैं जो ऐसी काम करती है। क्‍या आईआईटी अलुमनी की ऐसी टीमें बन सकती है?

दूसरा मुझे लगता है कि आईआईटी अलुमनी की एक मैपिंग करें, कि हमारे जो पुराने स्‍टूडेंट्स थे, उनकी आज किस विषय में किसकी क्‍या कैपिबिलिटी है। हम उनका ग्रुपिंग करें। मान लीजिए कि आज वो कुछ आईआईटी के स्‍टूडेंट्स दुनिया में कहीं न कहीं हेल्‍थ सेक्‍टर में काम कर रहे हैं। हेल्‍थ सेक्‍टर से जुड़े हुए आईआईटियन्‍स को बुलाकर के उनका नॉलेज जो है, उनके एक्‍सपर्टीज जो हैं, हिन्‍दुस्‍तान में हेल्‍थ सेक्‍टर में वो कैसे कंट्रीब्‍यूट कर सकते हैं। उनके आईडियाज, उनका समय, उनकी योजनाएं, एक बहुत बड़ी जगह है, जिनको हम जोड़ सकते हैं। उसका हमें प्रयास करना चाहिए।

मुझे लगता है, हर बच्‍चा आईआईटी में नहीं जा पाएगा और अकेले आईआईटी से देश बन नहीं पाएगा। इस बात को हमें स्‍वीकार करना होगा। आज आईआईटीज की वो ताकत नहीं है कि रातें-रात हम कैनवास बहुत बड़ा कर दें। फैकल्‍टी भी नहीं मिलती है। क्‍या आईआईटीज हमारी, अपने नजदीकी एक या दो कॉलेज को अडॉप्‍ट कर सकती है ? और वो अपना समय देना, स्‍टूडेंट्स भेजना, सीनियर स्‍टूडेंट्स भेजना, प्रोफेसर भेजना, उनको कभी यहां बुलाना, उनकी क्‍वालिटी इम्‍प्रूवमेंट में आईआईटी क्‍या भूमिका निभा सकता है? बड़ी सरलता से किया जा सकता है। अगर हमारे आईआईटियन अपने नजदीक के एक-दो इंजीनियरिंग कॉलेज को ले लें तो हो सकता है कि आज हम 15 होंगे तो हम 30-40 जगह पर अपना एक छोटा-छोटा इम्‍प्रूवेंट कर सकते हैं। हो सकता है कि वहां से बहुत स्‍टूडेंट्स होंगे जो किसी न किसी कारण से आईआईटी में एडमिशन नहीं ले पाये होंगे लेकिन उनमें टैलेंट की कमी नहीं होगी। अगर थोड़ा उनको अवसर मिल जाए तो हो सकता है कि वो स्‍टूडेंट भी देश के काम आ जाएं।

एक बात मैं कई दिनों से अनुभव करता हूं कि हमें ग्‍लोबल टैलेंट पुल पर सोचना चाहिए। मैं ग्‍लोबल टैलेंट की बात इसलिए करता हूं कि सब जगह फैकल्‍टी इज ए इश्‍यू । सब जगह फैकल्‍टी ‍मिलती नहीं है। क्‍या दुनिया में जो लोग इन-इन विषयों को पढ़ाते थे, अब रिटायर हो गये, उन रिटायर लोगों का एक टैलेंट पूल बनाएं और उनके यहां जब विंटर हों, क्‍योंकि उनके लिए वेदर को झेलना बहुत मुश्किल होता है, उस समय हम उनको ऑफर करें कि आइए इंडिया में तीन महीने, चार महीने रहिए। वी विल गिव यू द बेस्‍ट वेदर और हमारे बच्‍चों को पढ़ाइये। वी बिल गिव यू द पैकेज। अगर हम इस प्रकार के एक पूरा टैलेंट पूल ग्‍लोबल बनाते हैं, और वहां जब विंटर हो, क्‍योंकि वह जिस एज ग्रूप में हैं, वहां की विंटर उन्‍हें परेशान करती है। इकोनोमिकली वो इतना साउंड नहीं हैं कि दस नौकर रख पायें घर में। वो सब उन्‍हें खुद से करना पड़ता है। उनको मिलते नहीं नौकर। वह अगर हिंदुस्‍तान आए तो हम अच्‍छी फेसिलिटी दें और मैं मानता हूं कि उसकी कैपिसिटी है हमारे स्‍ट्रडेंट को पढ़ाने की और एक फ्रेश एयर हमें मिलेगी। हम इस ग्‍लोबल टेलेंट पूल को बना कर के अगर हम लाते हैं। कहीं से शुरू करें, दो, पांच, सात से, आप देखिए धीरे-धीरे-धीरे और नॉट नेसेसिरली आईआईटी, और भी इंस्‍टीट्यूशंस हैं, जिसको इस प्रकार के लोगों की आवश्‍यकता है। इस पर हम सोच सकते हैं। मैं मानता हूं कि साइंस इज यूनिवर्सल बट टेक्‍नोलॉजी मस्‍ट बी लोकल। और यह काम आईआईटियन्‍स कर सकते हैं।

मैं एक बार नॉर्थ ईस्‍ट गया, अब नॉर्थ ईस्‍ट के लोग, कुएं से पानी निकालना है, तो पाइपलाइन का उपयोग नहीं करते हैं, बंबू का उपयोग करते हैं। मतलब उसने, जो भी वैज्ञानिक सोच बनी होगी, बंबू लाइफलोंग चलता है, उसको रिप्‍लेस भी नहीं करना पड़ता है। उसमें जंग भी नहीं लगती है, ऐसी बहुत सी चीजें हैं। हम आधुनिक विज्ञान के सिद्धांतों को उपलब्‍ध व्‍यवस्‍थाओं के साथ जोड़कर के, हमारे सामान्‍य जीवन में क्‍वालिटेटिव चेंज लाने के लिए, हम रिसर्च का काम, प्रोजेक्‍ट अपने यहां ले सकते हैं क्‍या ? हम ज्‍यादा कंट्रीब्‍यूट कर पाएंगे, ऐसा मुझे लगता है।

आईआईटी में जो बैच आते हैं, उसी वर्ष उसके लिए प्रोजेक्‍ट तय होने चाहिए। पांच प्रोजेक्‍ट लें, छह प्रोजेकट लें, 10 प्रोजेक्‍ट लें। 10-10 का ग्रुप बना दें, लाइक माइंडेड। जब वो एजुकेशन पूरा करे, तब तक एक ही प्रोजेक्‍ट पर काम करे। मैं मानता हूं, वे पढ़ते ही पढ़ते ही देश को काफी कुछ कंट्रीब्‍यूट कर के जाएंगे। मान लीजिए, किसी ने ले लिया रूरल टॉयलेट। रूरल टॉयलेट करना है तो क्‍या होगा, पानी नहीं है, क्‍या व्‍यवस्‍था करेंगे। किस प्रकार के डिजाइन होंगे, कैसे काम करेंगे, वो अपना पढ़ाई पूरी करते-करते इतने इनोवेशन के साथ वो देगा, कॉस्‍ट इफेक्टिव कैसे हो, यूटिलिटी वाइज अच्‍छा कैसे हो, मल्‍टीपल यूटीलिटी में उसका बेस्‍ट उपयोग कैसे होगा, सारी चीजें वह सोचना शुरू कर देगा। लेकिन हम प्रारंभ में ही तय करें कि 25 प्रोजेक्‍ट है, यू विल सलेक्‍ट, उसका एक एक ग्रुप बन जाए। वह अपना काम करते रहें। मैं समझता हूं कि हर बैच जाते समय देश को 5-10 चीजें देकर जाएंगे। जो बाद में, हो सकता है कि एक इनक्‍यूबेशन सेंटर की जरूरत पड़ेगी, हो सकता है कि एक कर्मशियल मॉडल की जरूरत पड़ेगी, यह तो एक्‍सटेंशन उसका आगे बढ़ सकता है। लेकिन यह परमानेंट कंट्रीब्‍यूशन होगा।

दूसरा ये होगा कि जो बाइ इन लार्ज आज कैरिअर ओरिएंटेड जीवन हो चुका है और कैरिअर का आधार भी डॉलर और पाउंड के तराजू पर तौला जाता है, सटिसफेक्‍शन लेवल के साथ जुड़ा हुआ नहीं है, ईट इज ट्रेजेडी ऑफ द कंट्री। लेकिन ये अगर करेगा, तो उसके मन में जॉब से भी बढ़कर, कैरिअर से भी बढ़कर, एक सटिसफेक्‍शन लेवल की एक रूचि बनेगी। उसका एक मॉल्डिंग होगा। हम उस पर यदि कुछ बल देते हैं तो करना चाहिए। मैंने 15 अगस्‍त को एक बात कही थी, जो प्राइवेट में काम करता है, तो कहते हैं, जॉब करता है, सरकार में जो काम करता है सर्विस करता है। यह जॉब कल्‍चर से सर्विस कल्‍चर से लाने का एनवायरमेंट हम आईआईटी में बनाएं। देश के लिए कुछ तो करना चाहिए। आज देखिए, डिफेंस सेक्‍टर, इतना अरबों-खरबों रुपये का हम इंपोर्ट करते हैं। मैं नहीं मानता है कि हमारे देश के पास ऐसे टेलेंट नहीं है, जो यह न बना पाएं। अश्रु गैस, बाहर से इमपोर्ट करते हैं, क्‍या हम नहीं बना सकते ? यू विल बी सरप्राइज, हमारी जो केरेंसी है, केरेंसी की इंक हम इंपोर्ट करते हैं और छापते है हम गांधी जी की तस्‍वीर।

यह चैलेंजेज क्‍यों न उठाएं हम, क्‍यों न उठाएं ? मैं मानता हूं कि एक-एक चीज को उठाकर के हम अब उसके लिए कोई एक व्‍यक्ति बनाएं, आप खुद सोच लें तो सैकड़ों चीज हो जाए, मान लीजिए डिफेंस में है, हो सकता है कि हम कम पड़ जाते हैं। बहुत बड़ी चीजें रिसर्च करके हम नहीं दे पाते है। हेल्‍थ सेक्‍टर में ले लीजिए, एक थर्मामीटर भी हम बाहर से इमपोर्ट करते है।

हेल्‍थ आज टोटली टेक्‍नोलॉजी आधारित हो गई है। अन्‍य का रोल 10 परसेंट है, तो 90 परसेंट रोल टेक्‍नोलॉजी का है। अगर टेक्‍नोलॉजी का रोल हेल्थ सेक्‍टर को रिप्‍लेस कर रही है तो वाट इज अवर इनिशिएटिव? मैं जब गुजरात में जब था, तो एक डॉक्‍टर को जानता था, जिन्‍होंने हर्ट के लिए स्‍टैंट बनाया था, इंजीनियरिंग के स्‍टूडेंट को लेकर के। मार्केट में स्‍टैंट की जो कीमत थी, उसके मुकाबले उसने जो स्‍टैंट बनाया था उसकी 10 परसेंट कीमत थी और फूल प्रूफ हो चुका है, 10 साल हो गए हैं, देयर इज नो कम्‍पलेंट एट ऑल। एक डॉक्‍टर ने अपने प्रोफेशन के साथ-साथ हर्ट के लिए स्‍टैंट बनाया – हि इज हार्ट सर्जन, लेकिन इस काम को किया, अपने आइडियाज से इंजीनियरिंग फील्‍ड के लोगों को बुलाया। एंड ही इज ट्राइंग हिज लेवल बेस्‍ट कि हमारा इंटरफेस हो सकता है क्‍या ? मेडिकल फैक‍ल्‍टी एंड आईआईटियन्‍स और स्‍पेशियली इक्‍विपमेंट मैन्‍यूफैक्‍चरिंग में भारत को हेल्‍थ सेक्‍टर के लिए अपनी बनाई हुई चीजें क्‍यों न मिले ? इस चैलेंज को मैं समझता हूं, हमारे आईआईटियंस उठा सकते है।

आज भी हमारे देश में लाखों लोगों के पास छत नहीं है, रहने के लिए। हमारी कल्‍पना है कि भारत जब आजादी के 75 साल मनाए तो कम से कम देश में बिना छत के कोई परिवार न हो। क्‍या यह काम करना है तो बहुत गति से मकानों का निर्माण कैसे हो ? जो मकान बनें वे सस्‍टेन करने की दृष्टि से बहुत अच्‍छा बने। मैटिरियल भी बेस्‍ट से बेस्‍ट उपयोग करने की आदत कैसे बने, इन सारी चीजों को लेकर के, क्‍या आईआईटी की तरफ से मॉडल आ सकते हैं क्‍या। डिजाइंस आ सकते हैं क्‍या? मैटिरियल, उसका स्‍ट्रक्‍चर, सारी चीजें आ सकती है। हम समस्‍याओं को खोजने का प्रयास करे।

दुनिया में जैसे हम आईआईटी के लिए गर्व कर सकते हैं, भारत एक बात पर गर्व कर सकता है, लेकिन पता नहीं कि हमने उसको पर्दें के पीछे डालकर रखा हुआ है। और वे है हमारी रेलवे। हम दुनिया के सामने अकेले हमारे रेलवे की ब्रांडिंग एवं मार्केटिंग कर सकते हैं। अकेला इतना बड़ा नाम है, इतना बड़ा नेटवर्क, इतना डेली लोगों का आना-जाना, इतने टेलेंट का, मैं मानता हूं कि सामान्‍य से सामान्‍य व्‍यक्ति से हाईली क्‍वालिफाईड इंसान, सबका सिंक्रोनाइज एक्टिविटी है। लेकिन हमने उस रूप में देखा नहीं है। इसी रेलवे को अति आधुनिक, एक्जिस्टिंग व्‍यवस्‍था को, बुलट ट्रेन वगैरह तो जब होगी, तब होगी लेकिन एक्जिस्टिंग व्‍यवस्‍था यूजर फ्रेंडली कैसे बने, सारी व्‍यवस्‍था को हम विकसित कैसे करें, टेक्‍नोलॉजी इनपुट कैसे दें, उन्‍हीं व्‍यवस्‍थाओं को कैसे हम बढ़ाएं ?

छोटी-छोटी चीजें हैं, हम बदलाव कर सकते हैं।, आज हमारा रेलवे ट्रैक पर जो डिब्‍बा होता है, 16 टन का होता है। उसका अपना ही बियरिंग कैपिसिटी है। क्‍या आईआईटियन उसको छह टन का बना सकते हैं? फिर भी सेफ्टी हो आप कल्‍पना करके बता सकते हैं, कैपेसिटी कितनी बढ़ जाएगी। नई रेल की बजाए इसकी कैपेसिटी बढ़ जाएगी। मेरे कहने का तात्‍पर्य है कि हम भारत की आवश्‍यकताओं को सिर्फ किताबी बात नहीं आईआईटी से निकलने वाला और समाज को एक साथ कुछ न कुछ देकर जाएगा। इस विश्‍वास के साथ हम कुछ कर सकते हैं।

मैं मानता हूं कि हमारे देश में दो चीजों पर हम कैसे बढ रहे हैं और जो सामान्‍य मानविकी जीवन में भी है, एक साइंस ऑफ थिकिंग और एक आर्ट ऑफ लिविंग। यह कम्‍बीनेशन देखिए, इवन आईआईटी के स्‍टूडेंट को भी पूछना, प्रवोक करना है।

एक घटना सुनिए, बड़ी घटना है। एक साइंटिस्‍ट एक यूनिवर्सिटी में गए। स्‍टूडेंट्स भी बड़े उनसे अभिभूत थे, बहुत ही ओवर क्राउडेड रूम हो गया था। उन्‍होंने पूछा, भाई, हमें अगर आगे बढ़ना है, तो आब्‍जर्ब करने की आदत बढ़ना चाहिए। तो समझा रहे थे, हम देखते हैं, लेकिन आब्‍जर्ब नहीं करते और साइंटिफिक टेंपर वहीं से आता है। तो उसने कहा कि ऐसा करो भाई, एक टेस्‍ट ट्यूब लेकर के कोई नौजवान बाथरूम में जाओ, और उसमें अपना यूरिन ले कर के आओ। उन्‍होंने एक स्‍टूडेंट को भेजा, वह बाथरूम गया, टेस्‍ट ट्यूब में यूरिन ले कर आया। यूरिन लिया। यूरिन में अपनी अंगुली डाली, और फिर मुंह में डाली। सारे स्‍टूडेंट्स परेशान, यह कैसा साइंसटिस्‍ट है, दूसरे का यूरिन अपने मुंह में डालता है। हरेक के मुंह से – हैं ए ए ए – बड़ा निगेटिव आवाज निकली। फिर ये हंस पड़े। बोलो, आपको अच्‍छा नहीं लगा ना। क्‍यों, क्‍योंकि आपने आब्‍जर्ब नहीं किया। आपने सिर्फ देखा। मैंने टेस्‍ट ट्यूब में ये अंगुली डाली थी, और मुंह में ये (दूसरी अंगुली) लगाई थी। बोले, अगर आप आब्‍जर्ब करने की आदत नहीं डालते हैं, सिर्फ देखते हैं, तो आप शायद उस साइंटिफिक टेंपर को इवाल्‍व नहीं कर सकते हैं, अपने आप में। मेरा कहने का तात्‍पर्य यह है कि इन चीजों को कैसे करें। और एक विषय है, आखिर में अपनी बात समाप्‍त करूंगा।

हमारे देश में बहुत से लोग होते हैं, जो स्‍कूल-कॉलेज कहीं नहीं गए, पर बहुत चीजें नई वो इनोवेट करते हैं। बहुत चीजें बनाते हैं। क्‍या हम, जिस इलाके में हमारे आईआईटी हों, कम से कम उस इलाके के 800-1000 गावों में ऐसे लोग हैं क्‍या? किसान भी अपने तरीके से व्‍यवस्‍था को नया डाइमेंशन दे देता है। थोड़ा सा मोडिफाई कर देता है। कभी हमारे स्‍टूडेंट्स को प्रोजेक्‍ट्स देना चाहिए, यदि हमारे किसान ने यह काम कर दिया है, तो तुम इसे साइंटिफिकली परफेक्‍ट कैसे कर सकते हो, फुलप्रुफ कैसे विकसित कर सकते हो ? क्‍योंकि बड़ी खोज की शुरूआत, एक स्‍पार्क् से होती है। यह स्‍पार्क् कोई न कोई प्रोवाइड करता है। हम अगर उनको एक प्रोजेक्‍ट दें, हर आईआईटी को ऐसे 25 लोगों को ढूढ़ना है जो अपने तरीके से जीवन में कुछ न कुछ करते हैं, कुछ न कुछ कर दिया है। उन 25 को कभी बुलाइए, उनके एक्‍सपीरियेंस स्‍टूडेंट़स के साथ शेयर कीजिए। वह पढ़ा लिखा नहीं है, उनको भाषा भी नहीं आती है। लेकिन वो उनको नई प्रेरणा देगा।

अहमबदाबाद आईआईएम में मिस्‍टर अनिल गुप्‍ता इस दिशा में कुछ न कुछ करते रहते हैं। लेकिन यह बहुत बड़ी मात्रा में आईआईटी स्‍टूडेंट के द्वारा किया जा सकता है। ऐसी बहुत सी बातें हैं, जिसको लेकर के बात समझता हूं, हम करें तो माने एक अलग इाडमेंशन पर ही अपनी बातें रखने का प्रयास किया है। लेकिन कई दिशाओं पर आप चर्चा करने वाले हैं। और मुझे विश्‍वास है, आईआईटी ने इस देश को बहुत कुछ दिया है, और बहुत कुछ देने की क्षमता भी है। सिर्फ उसको उपयोग में कैसे लायें, इस दिशा में प्रयास करें।

मैं फिर से एक बार राष्‍ट्रपति जी का हृदय से अभिनंदन करता हूं, आभार व्‍यक्‍त करता हूं कि इस प्रकार का अवसर मिला।

थैंक्‍यू।

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উত্তর প্রদেশের হরদোই-এ গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ের উদ্বোধনী অনুষ্ঠানে প্রধানমন্ত্রীর ভাষণ
April 29, 2026
This transformative infrastructure project will boost connectivity and drive progress across Uttar Pradesh: PM
Just as Maa Ganga has been the lifeline of UP and this country for thousands of years, similarly, in this era of modern progress, this expressway passing near her, will become the new lifeline of UP's development: PM
Recently, I had the opportunity to dedicate the Delhi-Dehradun Expressway to the nation.
I had then remarked that these emerging expressways are the lifelines shaping the destiny of a developing India, and these modern pathways are today heralding India's bright future: PM
Ganga Expressway will not only connect one end of UP to the other, it will also bring limitless possibilities of the NCR closer: PM

ভারত মাতার জয়।

 

মা গঙ্গার জয় ।

 

মা গঙ্গার জয় ।

 

মা গঙ্গার জয় । 

 

উত্তরপ্রদেশের রাজ্যপাল আনন্দীবেন প্যাটেল, মুখ্যমন্ত্রী শ্রী যোগী আদিত্যনাথজি, উপ-মুখ্যমন্ত্রী কেশব প্রসাদ মৌর্যজি, ব্রিজেশ পাঠকজি, কেন্দ্রীয় মন্ত্রিসভায় আমার সহকর্মী জিতিন প্রসাদজি, পঙ্কজ চৌধুরীজি, উত্তরপ্রদেশ সরকারের মন্ত্রী্রা, সাংসদ ও বিধায়করা, অন্যান্য জনপ্রতিনিধিরা এবং আমার প্রিয় ভাই ও বোনেরা, যাঁরা বিপুল সংখ্যায় এখানে সমবেত হয়েছেন। 

সবার প্রথমে, আমি ভগবান নরসিংহের এই পবিত্র ভূমিতে শ্রদ্ধা নিবেদন করি। মা গঙ্গা এখান দিয়ে বয়ে গেছেন। মাত্র কয়েক কিলোমিটার দূরেই তাঁর আশীর্বাদ বর্ষিত হচ্ছে। তাই, এই পুরো অঞ্চলটি কোনো তীর্থস্থানের চেয়ে কম নয়। আমি বিশ্বাস করি উত্তর প্রদেশকে দেওয়া এক্সপ্রেসওয়ের উপহারটিও মা গঙ্গারই একটি আশীর্বাদ। এখন, আপনারা মাত্র কয়েক ঘণ্টার মধ্যেই সঙ্গমে যেতে পারবেন এবং কাশীতে বাবার দর্শন সেরে ফিরেও আসতে পারবেন। 

 

বন্ধুগণ, 

 

হাজার হাজার বছর ধরে মা গঙ্গা যেমন উত্তর প্রদেশ এবং এই দেশের জীবনরেখার ভূমিকা পালন করছেন, তেমনি এই আধুনিক উন্নয়নের যুগে তাঁর পাশ দিয়ে যাওয়া এই এক্সপ্রেসওয়েটি উত্তর প্রদেশের বিকাশের জন্য একটি নতুন লাইফলাইন হয়ে উঠবে। কাকতালীয় ভাবে, গত চার-পাঁচ দিন ধরে আমি মা গঙ্গার সান্নিধ্যে রয়েছি। ২৪শে এপ্রিল, যখন আমি বাংলায় ছিলাম, তখন মা গঙ্গার দর্শন করেছিলাম, এবং তারপর গতকাল ছিলাম কাশীতে। আজ সকালে আবারও বাবা বিশ্বনাথ, মা অন্নপূর্ণা এবং মা গঙ্গার দর্শনের সৌভাগ্য আমার হয়েছে। আর এখন মা গঙ্গার নামাঙ্কিত এই এক্সপ্রেসওয়েটি উদ্বোধন করার সুযোগ পেয়েছি। উত্তর প্রদেশ সরকার এই এক্সপ্রেসওয়েটির নামকরণ মা গঙ্গার নামে করেছে, এর জন্য আমি আনন্দিত। এটি আমাদের উন্নয়নের স্বপ্নর প্রতিফলন। আমাদের ঐতিহ্যও এর মাধ্যমে প্রকাশিত হয়। গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ের জন্য আমি উত্তর প্রদেশের লক্ষ লক্ষ মানুষকে অভিনন্দন জানাই। 

 

বন্ধুরা,

 

গণতন্ত্রের উৎসবের নিরীখেও আজ একটি গুরুত্বপূর্ণ দিন। বাংলায় এখন দ্বিতীয় দফার ভোটগ্রহণ চলছে এবং যে খবর আমরা পাচ্ছি , তাতে জানা যাচ্ছে এবার ভোটারদের উপস্থিতি অনেক বেশি। প্রথম পর্বের মতোই, মানুষ দলে দলে ভোট দিতে বাড়ি থেকে আসছেন; সামাজিক মাধ্যমগুলিতে দীর্ঘ লাইনের ছবি ছড়িয়ে পড়ছে। বাংলায় ভোটগ্রহণ হচ্ছে এক ভয়মুক্ত পরিবেশে, যা গত ছয়-সাত দশকে অকল্পনীয় ছিল। মানুষ নির্ভয়ে ভোট দিচ্ছেন। এটি দেশের সংবিধান এবং শক্তিশালী গণতন্ত্রের পবিত্র প্রতীক। নিজেদের অধিকারের প্রতি সচেতন হয়ে বিপুল সংখ্যায় ভোট দেওয়ার জন্য আমি বাংলার মহান জনসাধারণকে কৃতজ্ঞতা জানাই। ভোটগ্রহণ শেষ হতে এখনও বেশ কয়েক ঘন্টা বাকি। আমি বাংলার জনগণকে গণতন্ত্রের এই উৎসবে সমান উৎসাহে অংশগ্রহণ করার জন্য আহ্বান জানাচ্ছি।

 

বন্ধুগণ,  

 

কিছুদিন আগে বিহারে অনুষ্ঠিত নির্বাচনে বিজেপি-এনডিএ বিপুল ভোটে জয়লাভ করে ইতিহাস সৃষ্টি করেছে। গতকালই গুজরাটের পুর নিগম, পৌরসভা, জেলা পঞ্চায়েত, টাউন কাউন্সিল এবং ব্লক স্তরে পঞ্চায়েত নির্বাচনের ফলাফল ঘোষিত হয়েছে। আর আপনারা, উত্তর প্রদেশে আমার সহনাগরিকরা, এটা জেনে আনন্দিত হবেন যে বিজেপি ৮০ থেকে ৮৫ শতাংশ পৌরসভা ও পঞ্চায়েতে জয়লাভ করেছে। এই পাঁচটি রাজ্য নির্বাচনেও বিজেপি ঐতিহাসিক বিজয়ের হ্যাটট্রিক অর্জন করবে সেই বিশ্বাস আমার রয়েছে। ৪ঠা মে-র ফলাফল বিকশিত ভারত গড়ার সংকল্পকে আরও শক্তিশালী করবে এবং দেশের উন্নয়নে নতুন উৎসাহের সঞ্চার করবে। 

 

বন্ধুগণ,  

দেশের দ্রুত উন্নয়নের জন্য আমাদের দ্রুততার সঙ্গে আধুনিক পরিকাঠামোও তৈরি করতে হবে। ২০২১ সালের ডিসেম্বরে আমি গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ের শিলান্যাস করতে শাহজাহানপুরে এসেছিলাম। আপনারা দেখছেন, উত্তর প্রদেশের দীর্ঘতম গ্রিন করিডোর এক্সপ্রেসওয়ে, এবং দেশের অন্যতম বৃহত্তম এক্সপ্রেসওয়ে তৈরির কাজ, পাঁচ বছরের মধ্যেই শেষ হয়েছে। শীঘ্রই গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ে মিরাট ছাড়িয়ে হরিদ্বার পর্যন্ত সম্প্রসারিত হবে। এর সুবিধা যাতে অন্যরাও পান, তার জন্য, ফারুখাবাদ লিঙ্ক এক্সপ্রেসওয়ে তৈরি করা হবে, যা এটিকে অন্যান্য এক্সপ্রেসওয়ের সঙ্গে যুক্ত করবে। এটিই ডাবল-ইঞ্জিন সরকারের স্বপ্ন! এই গতিতেই বিজেপি সরকার কাজ করে! এটিই বিজেপি সরকারের কাজ করার ধরণ! আজ হারদোইতে এর উদ্বোধন করা হচ্ছে। আবার গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ের নির্মাণকাজ সম্পন্ন হওয়ার পাশাপাশি এর সম্প্রসারণ পরিকল্পনার কাজও শুরু হয়ে গেছে। 

ভাই ও বোনেরা, 

মাত্র কিছুদিন আগে দিল্লি-দেরাদুন এক্সপ্রেসওয়ে উদ্বোধন করার সুযোগ আমার হয়েছিল। আমি তখন বলেছিলাম , এই নবনির্মিত এক্সপ্রেসওয়েগুলো উন্নয়নশীল ভারতের হস্তরেখার মতো, এই আধুনিক হস্তরেখাগুলো ভারতের উজ্জ্বল ভবিষ্যতের সূচনা করছে। 

বন্ধুগণ, 

এখন আর সেই দিন আর নেই যখন একটা রাস্তার জন্য দশকের পর দশক অপেক্ষা করতে হতো! একবার ঘোষণা করা হলে, ফাইলগুলো বছরের পর বছর পড়ে থাকত! নির্বাচনের আগে শিলান্যাস হত, আর তারপর সরকার আসত আর যেত, কিন্তু কোনো কাজই হতো না। কখনও কখনও, পুরোনো ফাইল খুঁজে বের করতে ঊর্ধ্বতন কর্মকর্তাদের বছর দুয়েক লেগে যেত।  

 

বন্ধুগণ,  

 

ডাবল-ইঞ্জিন সরকারের সময়ে নির্ধারিত সময়ের মধ্যেই প্রকল্পের শিলান্যাস ও উদ্বোধন হয়। তাই, আজ যদি উত্তরপ্রদেশের এক্সপ্রেসওয়েগুলোর চেয়েও দ্রুতগামী কিছু থেকে থাকে, তবে তা হলো এই রাজ্যের উন্নয়নের গতি।

বন্ধুগণ,  

এই এক্সপ্রেসওয়েটি শুধু একটি হাইস্পিড রাস্তা নয়। এটি নতুন সম্ভাবনা, স্বপ্ন এবং সুযোগের প্রবেশদ্বার। গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ে প্রায় ৬০০ কিলোমিটার লম্বা। পশ্চিম উত্তর প্রদেশের মিরাট, বুলন্দশহর, হাপুর, আমরোহা, সম্ভল ও বাদাউন; মধ্য উত্তর প্রদেশের শাহজাহানপুর, হারদোই, উন্নাও ও রায়বেরেলি; এবং পূর্ব উত্তর প্রদেশের প্রতাপগড় ও প্রয়াগরাজসহ পার্শ্ববর্তী জেলাগুলিতে যোগাযোগ তৈরি করে গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ে এই অঞ্চলের লক্ষ লক্ষ মানুষের জীবন বদলে দেবে।

 

বন্ধুগণ,  

এই অঞ্চল গঙ্গা নদী ও তার উপনদীগুলোর উর্বর মাটিতে আশীর্বাদপুষ্ট। কিন্তু পূর্ববর্তী সরকারগুলোর অবহেলার কারণে এখানকার কৃষকরা চরম দুর্দশার সম্মুখীন হতেন! তাদের ফসল প্রধান বাজারগুলোতে পৌঁছাতে পারছিল না। হিমঘরের অভাব ছিল, সরবরাহ ব্যবস্থা ছিল অপর্যাপ্ত, এবং কৃষকরা তাদের কঠোর পরিশ্রমের ন্যায্য মূল্য পেতেন না। এখন, সেই অসুবিধাগুলো দ্রুত সমাধান হয়ে যাবে। গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ের মাধ্যমে কম সময়ে প্রধান বাজারগুলোতে পৌছে যাবার সুযোগ তৈরি হবে। এখানে কৃষির জন্য প্রয়োজনীয় পরিকাঠামো গড়ে তোলা সম্ভব হবে। এতে আমাদের কৃষকদের আয় বাড়বে।  

বন্ধুগণ,  

গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ে শুধু উত্তরপ্রদেশের এক প্রান্তকে অন্য প্রান্তের সঙ্গে যুক্ত করবে না, এটি এনসিআর অর্থাৎ জাতীয় রাজধানী অঞ্চলের বিপুল সম্ভাবনাকে আরও কাছে নিয়ে আসবে। গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ের ওপর দিয়ে গাড়ি চলাচল করবে এবং এর দুই পাশে নতুন শিল্পের সুযোগ তৈরি হবে। এর জন্য হারদোইয়ের মতো জেলাগুলিতে শিল্প করিডোর গড়ে তোলা হচ্ছে। হারদোই, শাহজাহানপুর, উন্নাও সহ ১২টি জেলাতেই নতুন শিল্প আসবে। ওষুধ, বস্ত্রের মতো বিভিন্ন শিল্পের ক্লাস্টার গড়ে উঠবে। যুবসম্প্রদায়ের জন্য কর্মসংস্থানের নতুন সুযোগও তৈরি হবে। 

 

বন্ধুগণ,

মুদ্রা যোজনা এবং ওডিওপি-র মতো প্রকল্পের ফলে আমাদের যুবসমাজ নতুন নতুন রেকর্ড গড়ছে। এখানে ক্ষুদ্র শিল্প এবং অতি ক্ষুদ্র, ক্ষুদ্র ও মাঝারী শিল্পোদ্যোগ-কে উৎসাহিত করা হচ্ছে। উন্নত যোগাযোগ ব্যবস্থার ফলে এই উদ্যোগগুলির জন্যও নতুন নতুন সুযোগ তৈরি হবে। মিরাটের ক্রীড়া শিল্প, সম্ভলের হস্তশিল্প, বুলন্দশহরের মৃৎশিল্প, হরদোইয়ের তাঁতশিল্প, উন্নাওয়ের চর্মশিল্প, প্রতাপগড়ের আমলকী থেকে উৎপাদিত সামগ্রী —এ সবই দেশ বিদেশের বাজারে পৌঁছাবে। এর ফলে লক্ষ লক্ষ পরিবারের আয় বাড়বে। বলুন তো, পূর্ববর্তী সমাজবাদী পার্টির সরকারের আমলে কেউ কি ভেবেছিলেন, হরদোই এবং উন্নাওয়ের মতো জেলায় শিল্প করিডোর তৈরি হবে? কেউ কি কখনো ভেবেছিলেন, আমাদের হরদোইয়ের মধ্যে দিয়ে একটি এক্সপ্রেসওয়ে যাবে? এই কাজ শুধুমাত্র বিজেপি সরকারের আমলেই সম্ভব।  

বন্ধুগণ, 

একসময় উত্তর প্রদেশকে একটি অনগ্রসর এবং “বিমারু” রাজ্য বলা হতো। সেই উত্তর প্রদেশই আজ ১ লক্ষ কোটি ডলারের অর্থনীতি হওয়ার পথে এগিয়ে চলেছে। এটি অনেক বড় এক লক্ষ্য। কিন্তু এর পেছনে রয়েছে সমানভাবে নানা উদ্যোগ গ্রহণ। কারণ উত্তর প্রদেশের রয়েছে বিপুল সম্ভাবনা। দেশের বিপুল যুবক যুবতীর সম্ভাবনা রয়েছে উত্তর প্রদেশে। আমরা এই শক্তিকে কাজে লাগিয়ে উত্তর প্রদেশকে একটি উৎপাদন কেন্দ্র হিসেবে গড়ে তুলছি। উত্তর প্রদেশে নতুন শিল্প ও কারখানা গড়ে উঠবে। যখন এখানে বড় আকারের বিনিয়োগ হবে, কেবল তখনই অর্থনৈতিক বিকাশের দরজা খুলবে এবং যুবসম্প্রদায়ের জন্য কর্মসংস্থানের সুযোগ তৈরি হবে। 

 

ভাই ও বোনেরা,   

এই পরিকল্পনাগুলি বাস্তবায়নের জন্য সাম্প্রতিক বছরগুলোতে নিরন্তর কাজ করা হচ্ছে। আপনারা নিজেরাই বুঝতে পারছেন, যে উত্তর প্রদেশ থেকে আগে সকলে কাজের খোজে অন্য জায়গায় চলে যেতেন, আজ তা বিনিয়োগকারীদের সম্মেলন এবং শিল্প করিডোরের জন্য পরিচিতি লাভ করছে। উত্তর প্রদেশে বিনিয়োগকারী সম্মেলনে দেশ ও বিশ্বের বিভিন্ন কোম্পানি আসে। উত্তর প্রদেশে হাজার হাজার কোটি টাকা বিনিয়োগ করা হচ্ছে। আজ যদি ভারত বিশ্বের দ্বিতীয় বৃহত্তম মোবাইল নির্মাতা হয়, তবে এতে উত্তর প্রদেশের বড় অবদান রয়েছে। ভারত আজ যত মোবাইল তৈরি করছে, তার অর্ধেকই আমাদের উত্তর প্রদেশে তৈরি হচ্ছে। মাত্র কয়েক সপ্তাহ আগে, আমি নয়ডায় একটি সেমিকন্ডাক্টর প্ল্যান্টের শিলান্যাস করেছি। 

 

বন্ধুগণ, 

আপনারা সকলেই জানেন, এআই-এর এই যুগে সেমিকন্ডাক্টর একটি বিরাট ক্ষেত্র হয়ে উঠছে। উত্তর প্রদেশ এক্ষেত্রেও নেতৃত্ব দিচ্ছে। ভবিষ্যতে এই রাজ্যের মানুষের জন্য প্রচুর সুযোগ-সুবিধা তৈরি হবে। 

 

বন্ধুগণ, 

আজ উত্তর প্রদেশের শিল্পোন্নয়ন ভারতের কৌশলগত শক্তিতে পরিণত হচ্ছে। বর্তমানে দেশের দুটি প্রতিরক্ষা করিডোরের মধ্যে একটি উত্তর প্রদেশে । বড় বড় প্রতিরক্ষা সরঞ্জাম উৎপাদনকারী সংস্থাগুলো এখানে তাদের কারখানা স্থাপন করছে। বিশ্বজুড়ে স্বীকৃত ব্রাহমোসের মতো ক্ষেপণাস্ত্র আজ উত্তর প্রদেশেই তৈরি হচ্ছে। প্রতিরক্ষা সরঞ্জাম তৈরির জন্য প্রয়োজনীয় ছোট ছোট যন্ত্রাংশ সরবরাহ করছে অতি ক্ষুদ্র, ক্ষুদ্র ও মাঝারি শিল্প উদ্যোগ বা এমএসএমই। এতে উত্তর প্রদেশের এমএসএমই ক্ষেত্র প্রভূত লাভবান হচ্ছে। এমনকি ছোট ছোট জেলার যুবসম্প্রদায়ও এখন বড় শিল্পের সঙ্গে যুক্ত হওয়ার স্বপ্ন দেখতে পারেন।  

 

বন্ধুগণ,   

আজ উত্তর প্রদেশ এত দ্রুত উন্নতি করছে কারণ ইউপি পুরনো রাজনীতি বদলে একটি নতুন পরিচয় তৈরি করেছে। মনে রাখবেন, একটা সময় ছিল যখন ইউপি মানেই ছিল রাস্তার গর্ত। আজ সেই ইউপিই দেশের সবচেয়ে বেশি এক্সপ্রেসওয়ের রাজ্যে পরিণত হয়েছে। আগে পার্শ্ববর্তী জেলাগুলিতে যাওয়াও খুব ঝামেলার ছিল। কিন্তু আজ উত্তর প্রদেশে ২১টি বিমানবন্দর রয়েছে, যার মধ্যে ৫টি আন্তর্জাতিক বিমানবন্দর। এখন নয়ডা আন্তর্জাতিক বিমানবন্দরেরও উদ্বোধন হয়ে গেছে। গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ে থেকে নয়ডা আন্তর্জাতিক বিমানবন্দর মাত্র কয়েক ঘণ্টার দূর।  

 

ভাই ও বোনেরা,  

আমাদের উত্তর প্রদেশ ভগবান রাম ও ভগবান কৃষ্ণের ভূমি। কিন্তু পূর্ববর্তী সরকারগুলির অপকর্মের জন্য উত্তর প্রদেশ অপরাধ ও জঙ্গলরাজের মাধ্যমে পরিচিত হত। উত্তর প্রদেশের মাফিয়াদের নিয়ে সিনেমা তৈরি হত। কিন্তু এখন উত্তর প্রদেশের আইন-শৃঙ্খলা পরিস্থিতি সারা দেশে উদাহরণ হিসেবে তুলে ধরা হয়।

 

ভাই ও বোনেরা, 

সমাজবাদী পার্টির সদস্যদের হাত থেকে সম্পদ বণ্টনের ক্ষমতা চলে গেছে, তাই তারা উত্তর প্রদেশের এই বিকাশ পছন্দ করছেন না। তারা উত্তর প্রদেশকে আবার পুরনো যুগে ফিরিয়ে নিয়ে যেতে চান। তারা আবারও সমাজকে বিভক্ত করতে চান।

 

বন্ধুগণ,  

 

সমাজবাদী পার্টি যেমন উন্নয়ন-বিরোধী, একই ভাবে মহিলা-বিরোধীও । সম্প্রতি দেশ আবারও এসপি এবং কংগ্রেসের মতো দলগুলোর আসল চেহারা দেখেছে। কেন্দ্রে এনডিএ সরকার সংসদে নারী শক্তি বন্দন সংশোধনী এনেছিল। এই সংশোধনীটি পাশ হলে, ২০২৯ সালের নির্বাচন থেকেই বিধানসভা এবং লোকসভায় মহিলাদের জন্য সংরক্ষণের সুযোগ তৈরি হত! আমাদের অনেক মা ও বোন দিল্লি এবং লখনৌতে পৌঁছে সাংসদ ও বিধায়ক হতেন। সেটিও আবার অন্য কোনো শ্রেণীর আসন না কমিয়েই! কিন্তু সমাজবাদী পার্টি —এসপি এই সংশোধনী বিলের বিরুদ্ধে ভোট দিয়েছে।    

 

বন্ধুগণ, 

 

এই বিলটি সব রাজ্যেও আসন সংখ্যা বাড়িয়ে দিত। আমরা সংসদে স্পষ্টভাবে বলেছিলাম , সব রাজ্যে আসন সংখ্যা একই অনুপাতে বাড়বে। কিন্তু ডিএমকে-র মতো দল, যারা উত্তরপ্রদেশকে কটু কথা বলে রাজনীতি করে, তারা আপত্তি জানিয়েছিল যে উত্তরপ্রদেশের আসন কেন বাড়বে। দেখুন, সমাজবাদী পার্টিও সংসদে একই সুরে কথা বলছিল। এই এসপি সদস্যরা এখান থেকে আপনাদের ভোট নেয়, আর সংসদে তাদের পক্ষ নেয় যারা উত্তরপ্রদেশের মানুষকে গালি দেয়। এই কারণেই উত্তরপ্রদেশের মানুষ বলেন, সমাজবাদী পার্টি কখনও উন্নতি করতে পারবে না। এই লোকেরা সবসময় মহিলা-বিরোধী রাজনীতি করবে। তারা সবসময় তোষণ এবং অপরাধীদের পক্ষ নেবে। এসপি কখনও পরিবারতন্ত্র এবং জাতপাতের রাজনীতির ঊর্ধ্বে উঠতে পারবে না। তারা সবসময় উন্নয়ন-বিরোধী রাজনীতি করবে। উত্তরপ্রদেশকে অবশ্যই এসপি এবং তার সহযোগীদের বিষয়ে সতর্ক থাকতে হবে। 

বন্ধুগণ, 

   

আজ দেশ একটি সংকল্প নিয়ে এগিয়ে চলেছে—বিকশিত ভারত গড়ার সংকল্প! এই সংকল্প পূরণে উত্তর প্রদেশের একটি অত্যন্ত বড় ভূমিকা রয়েছে। আপনারা দেখছেন, আজ সমগ্র বিশ্ব যুদ্ধ, অশান্তি এবং অস্থির এক পরিস্থিতির মধ্যে রয়েছে। বিশ্বের বড় বড় দেশগুলিতে অবস্থা বেশ খারাপ। কিন্তু ভারত ঠিক একই গতিতে উন্নয়নের পথে এগিয়ে চলেছে। বাইরের শত্রুদের জন্য এটা পছন্দের নয়। দেশের মধ্যে থাকা ক্ষমতালোভী কিছু মানুষও ভারতকে ছোট করার চেষ্টা করছে। তবুও, আমরা কেবল সুরক্ষিতই নই, উন্নয়নের নতুন রেকর্ডও তৈরি করছি। আমরা আত্মনির্ভর ভারতের অভিযানকে বাস্তবায়িত করছে। আমরা সবচেয়ে আধুনিক পরিকাঠামো নির্মাণ করছি। গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ে এই পথে আরও একটি শক্তিশালী পদক্ষেপ। গঙ্গা এক্সপ্রেসওয়ে আমাদের কাছে যে সম্ভাবনা নিয়ে আসবে, উত্তর প্রদেশের মানুষ তাদের কঠোর পরিশ্রম এবং প্রতিভা দিয়ে তাকে যে কাজে লাগাবেন, সে বিষয়ে আমি আত্মবিশ্বাসী। এই আশা রেখে, আমি আবারও আপনাদের সকলকে অনেক অভিনন্দন জানাই। অনেক ধন্যবাদ!     

 

ভারত মাতার জয়।

 

ভারত মাতার জয়।

 

বন্দে মাতরম। বন্দে মাতরম। বন্দে মাতরম। বন্দে মাতরম। বন্দে মাতরম।

 

আপনাদের অনেক ধন্যবাদ!