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मैं राष्‍ट्रपति जी का बहुत आभारी हूं कि मुझे आप सबसे मिलने का अवसर मिला और राष्‍ट्रपति जी का ये इनीशिएटिव है, खास करके शिक्षा क्षेत्र के लिए और मैं देख रहा हूं कि लगातार वो इस विषय की चिंता भी कर रहे हैं, सबसे बात कर रहे हैं, और बहुत विगिरसली, इस काम के पीछे समय दे रहे हैं। उनका ये प्रयास, उनका मार्गदर्शन आने वाले दिनों के, और आने वाली पीढि़यों के लिए बहुत ही उपकारक होगा, ऐसा मेरा विश्‍वास है। हमारे देश में आईआईटी ने एक प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त की है। जिस कालखंड में इसका प्रारंभ हुआ, जिन प्रारंभिक लोगों ने इसको जिस रूप में इस्‍टे‍बलिश किया, उसकी एक ग्‍लोबल छवि बनी हुई है, और आज विद्यार्थी जगत में भी, और पेरेंट में भी एक रहता है कि बेटा आईआईटी में एडमिशन ले और एक प्रकार से आप का ब्रांडिंग हो चुका है। अब कोई ब्रांडिंग के लिए आपको ज्‍यादा कुछ करना पड़े, ऐसी स्थिति नहीं है। लेकिन कभी-कभी संकट लगता है कि इस ब्रांड को बचायें कैसे? और इसके कुछ लिए कुछ पारामीटर्स तय करना चाहिए ताकि कहीं कोई इरोजन न हो और कोशिश यह हो कि ज्‍यादा अपग्रेडेशन होता रहे।

आपका मैंने एजेंडा आज देखा, जितने विषय अपने सोचे हैं, उतने अगर आप तय करते हैं, तो मुझे नहीं लगता है कि आने वाले दस साल तक आपको कोई नए विचार की जरूरत पड़ेगी या कोई कमियां महसूस होगी, काम के लिए। इतना सारा एजेंडा आपने रखा है आज। ग्‍लोबल रैंकिंग से लेकर के आईआईटियन के उपयोग तक की सारी इसकी रेंज है। एक, मुझे ऐसा लगता है कि एक तो हमें ग्‍लोबल रैंकिंग के लिए जरूर कुछ कर लेना चाहिए क्‍योंकि आइसोलेटेड वर्ल्‍ड में हम रह नहीं सकते। लेकिन एक बार हमारे अपने पारामीटर तय करके, देश की अंदरूनी व्‍यवस्‍था में हम कोई रैंकिंग की व्‍यवस्‍था विकसित कर सकते हैं क्‍या? वही हमको फिर आगे हमें ग्‍लोबल रैंकिंग की तरफ ले जाएगा। हमीं कुछ पारामीटर तय करें कि हमारी सारी आईआईटी उस पारामीटर से नीचे नहीं होंगी, और इससे ऊपर जाने का जो प्रयास करेगा, उसकी रैंकिंग की व्‍यवस्‍था होगी, रेगुलरली उसकी मानिटरिंग की व्‍यवस्‍था होगी। और उसकी जब प्रक्रिया बनती है तो एक कांस्‍टेंट इनबिल्‍ट सिस्‍टम डेवलप कर सकते हैं जो हमें इंप्रूवमेंट की तरफ ले जाता है।

दूसरा एक मुझे विचार आता है कि आईआईटियन्‍स होना, ये अपने आप में एक बड़े गर्व की बात है, रिटायरमेंट के बाद भी वह बड़ा गर्व करता है। ये अपने आप में एक बहुत बड़ी ताकत है आईआईटी की, उसका हर स्‍टूडेंट जीवन के किसी भी काल में आईआईटियन होने का गर्व करता है। ये बहुत ही बड़ी हमारी पूंजी है। आईआईटी अलूमनी का हम उपयोग क्‍या करते हैं ? डू यू हैव अवर ऑन रीजन? वो हमारे कैम्‍पस के लिए कोई आर्थिक मदद करें, कभी आयें, अपने जीवन में बहुत ऊंचाइयां प्राप्‍त किये हैं तो अपने स्‍टूडेंट्स को आकर अपने विचार शेयर करें, इंस्‍पायर करें।

मैं समझता हूं कि इससे थोड़ा आगे जाना चाहिए। हम अलूमनी पर फोकस करें और उनसे आग्रह करें कि साल में कितने वीक वो हमारे स्‍टूडेंट्स के लिए देंगे। उनके रुपये-डॉलर से ज्‍यादा उनका समय बहुत कीमती है। कोई जरूरी नहीं है कि वह जिस आईआईटी से निकला है, वहीं आए। इंटरचेंज होना चाहिए। एक्‍सपीरियेंस शेयर करने का अवसर मिलना चाहिए। यह अपने आपमें बेहतरीन अनुभव है, क्‍योंकि स्‍टूडेंट जीवन से बाहर जाने के बाद 20 साल , 25 साल में उन्‍होंने दुनिया देखी है। कुछ आईआईटियन्‍स होंगे जो अपने आप में कुछ करते होंगे, मेरे पास डाटा नहीं है। करते होंगे।

लेकिन, मैंने डाक्‍टरों को देखा है, दुनिया के भिन्‍न-भिन्‍न देशों में अपना स्‍थान बनाने के बाद वह डॉक्‍टर वहां इकट्ठे होकर एक टीम बनाते है। एक दूसरे के उपयोगी हों, ऐसी टीम बनाते है। टीम बना करके हिन्‍दुस्‍तान में आ करके रिमोटेस्‍ट से रिमोट एरिया में वह चले जाते हैं। 15 दिन के लिए कैंप लगाते हैं, मेडिकल चेकअप करते हैं, आपरेशन्‍स करते हैं, एक-आध दिन वह स्‍टूडेंट्स को वो सिखाने के लिए चले जाते हैं। कई ऐसे डाक्‍टरों की टीमें हैं जो ऐसी काम करती है। क्‍या आईआईटी अलुमनी की ऐसी टीमें बन सकती है?

दूसरा मुझे लगता है कि आईआईटी अलुमनी की एक मैपिंग करें, कि हमारे जो पुराने स्‍टूडेंट्स थे, उनकी आज किस विषय में किसकी क्‍या कैपिबिलिटी है। हम उनका ग्रुपिंग करें। मान लीजिए कि आज वो कुछ आईआईटी के स्‍टूडेंट्स दुनिया में कहीं न कहीं हेल्‍थ सेक्‍टर में काम कर रहे हैं। हेल्‍थ सेक्‍टर से जुड़े हुए आईआईटियन्‍स को बुलाकर के उनका नॉलेज जो है, उनके एक्‍सपर्टीज जो हैं, हिन्‍दुस्‍तान में हेल्‍थ सेक्‍टर में वो कैसे कंट्रीब्‍यूट कर सकते हैं। उनके आईडियाज, उनका समय, उनकी योजनाएं, एक बहुत बड़ी जगह है, जिनको हम जोड़ सकते हैं। उसका हमें प्रयास करना चाहिए।

मुझे लगता है, हर बच्‍चा आईआईटी में नहीं जा पाएगा और अकेले आईआईटी से देश बन नहीं पाएगा। इस बात को हमें स्‍वीकार करना होगा। आज आईआईटीज की वो ताकत नहीं है कि रातें-रात हम कैनवास बहुत बड़ा कर दें। फैकल्‍टी भी नहीं मिलती है। क्‍या आईआईटीज हमारी, अपने नजदीकी एक या दो कॉलेज को अडॉप्‍ट कर सकती है ? और वो अपना समय देना, स्‍टूडेंट्स भेजना, सीनियर स्‍टूडेंट्स भेजना, प्रोफेसर भेजना, उनको कभी यहां बुलाना, उनकी क्‍वालिटी इम्‍प्रूवमेंट में आईआईटी क्‍या भूमिका निभा सकता है? बड़ी सरलता से किया जा सकता है। अगर हमारे आईआईटियन अपने नजदीक के एक-दो इंजीनियरिंग कॉलेज को ले लें तो हो सकता है कि आज हम 15 होंगे तो हम 30-40 जगह पर अपना एक छोटा-छोटा इम्‍प्रूवेंट कर सकते हैं। हो सकता है कि वहां से बहुत स्‍टूडेंट्स होंगे जो किसी न किसी कारण से आईआईटी में एडमिशन नहीं ले पाये होंगे लेकिन उनमें टैलेंट की कमी नहीं होगी। अगर थोड़ा उनको अवसर मिल जाए तो हो सकता है कि वो स्‍टूडेंट भी देश के काम आ जाएं।

एक बात मैं कई दिनों से अनुभव करता हूं कि हमें ग्‍लोबल टैलेंट पुल पर सोचना चाहिए। मैं ग्‍लोबल टैलेंट की बात इसलिए करता हूं कि सब जगह फैकल्‍टी इज ए इश्‍यू । सब जगह फैकल्‍टी ‍मिलती नहीं है। क्‍या दुनिया में जो लोग इन-इन विषयों को पढ़ाते थे, अब रिटायर हो गये, उन रिटायर लोगों का एक टैलेंट पूल बनाएं और उनके यहां जब विंटर हों, क्‍योंकि उनके लिए वेदर को झेलना बहुत मुश्किल होता है, उस समय हम उनको ऑफर करें कि आइए इंडिया में तीन महीने, चार महीने रहिए। वी विल गिव यू द बेस्‍ट वेदर और हमारे बच्‍चों को पढ़ाइये। वी बिल गिव यू द पैकेज। अगर हम इस प्रकार के एक पूरा टैलेंट पूल ग्‍लोबल बनाते हैं, और वहां जब विंटर हो, क्‍योंकि वह जिस एज ग्रूप में हैं, वहां की विंटर उन्‍हें परेशान करती है। इकोनोमिकली वो इतना साउंड नहीं हैं कि दस नौकर रख पायें घर में। वो सब उन्‍हें खुद से करना पड़ता है। उनको मिलते नहीं नौकर। वह अगर हिंदुस्‍तान आए तो हम अच्‍छी फेसिलिटी दें और मैं मानता हूं कि उसकी कैपिसिटी है हमारे स्‍ट्रडेंट को पढ़ाने की और एक फ्रेश एयर हमें मिलेगी। हम इस ग्‍लोबल टेलेंट पूल को बना कर के अगर हम लाते हैं। कहीं से शुरू करें, दो, पांच, सात से, आप देखिए धीरे-धीरे-धीरे और नॉट नेसेसिरली आईआईटी, और भी इंस्‍टीट्यूशंस हैं, जिसको इस प्रकार के लोगों की आवश्‍यकता है। इस पर हम सोच सकते हैं। मैं मानता हूं कि साइंस इज यूनिवर्सल बट टेक्‍नोलॉजी मस्‍ट बी लोकल। और यह काम आईआईटियन्‍स कर सकते हैं।

मैं एक बार नॉर्थ ईस्‍ट गया, अब नॉर्थ ईस्‍ट के लोग, कुएं से पानी निकालना है, तो पाइपलाइन का उपयोग नहीं करते हैं, बंबू का उपयोग करते हैं। मतलब उसने, जो भी वैज्ञानिक सोच बनी होगी, बंबू लाइफलोंग चलता है, उसको रिप्‍लेस भी नहीं करना पड़ता है। उसमें जंग भी नहीं लगती है, ऐसी बहुत सी चीजें हैं। हम आधुनिक विज्ञान के सिद्धांतों को उपलब्‍ध व्‍यवस्‍थाओं के साथ जोड़कर के, हमारे सामान्‍य जीवन में क्‍वालिटेटिव चेंज लाने के लिए, हम रिसर्च का काम, प्रोजेक्‍ट अपने यहां ले सकते हैं क्‍या ? हम ज्‍यादा कंट्रीब्‍यूट कर पाएंगे, ऐसा मुझे लगता है।

आईआईटी में जो बैच आते हैं, उसी वर्ष उसके लिए प्रोजेक्‍ट तय होने चाहिए। पांच प्रोजेक्‍ट लें, छह प्रोजेकट लें, 10 प्रोजेक्‍ट लें। 10-10 का ग्रुप बना दें, लाइक माइंडेड। जब वो एजुकेशन पूरा करे, तब तक एक ही प्रोजेक्‍ट पर काम करे। मैं मानता हूं, वे पढ़ते ही पढ़ते ही देश को काफी कुछ कंट्रीब्‍यूट कर के जाएंगे। मान लीजिए, किसी ने ले लिया रूरल टॉयलेट। रूरल टॉयलेट करना है तो क्‍या होगा, पानी नहीं है, क्‍या व्‍यवस्‍था करेंगे। किस प्रकार के डिजाइन होंगे, कैसे काम करेंगे, वो अपना पढ़ाई पूरी करते-करते इतने इनोवेशन के साथ वो देगा, कॉस्‍ट इफेक्टिव कैसे हो, यूटिलिटी वाइज अच्‍छा कैसे हो, मल्‍टीपल यूटीलिटी में उसका बेस्‍ट उपयोग कैसे होगा, सारी चीजें वह सोचना शुरू कर देगा। लेकिन हम प्रारंभ में ही तय करें कि 25 प्रोजेक्‍ट है, यू विल सलेक्‍ट, उसका एक एक ग्रुप बन जाए। वह अपना काम करते रहें। मैं समझता हूं कि हर बैच जाते समय देश को 5-10 चीजें देकर जाएंगे। जो बाद में, हो सकता है कि एक इनक्‍यूबेशन सेंटर की जरूरत पड़ेगी, हो सकता है कि एक कर्मशियल मॉडल की जरूरत पड़ेगी, यह तो एक्‍सटेंशन उसका आगे बढ़ सकता है। लेकिन यह परमानेंट कंट्रीब्‍यूशन होगा।

दूसरा ये होगा कि जो बाइ इन लार्ज आज कैरिअर ओरिएंटेड जीवन हो चुका है और कैरिअर का आधार भी डॉलर और पाउंड के तराजू पर तौला जाता है, सटिसफेक्‍शन लेवल के साथ जुड़ा हुआ नहीं है, ईट इज ट्रेजेडी ऑफ द कंट्री। लेकिन ये अगर करेगा, तो उसके मन में जॉब से भी बढ़कर, कैरिअर से भी बढ़कर, एक सटिसफेक्‍शन लेवल की एक रूचि बनेगी। उसका एक मॉल्डिंग होगा। हम उस पर यदि कुछ बल देते हैं तो करना चाहिए। मैंने 15 अगस्‍त को एक बात कही थी, जो प्राइवेट में काम करता है, तो कहते हैं, जॉब करता है, सरकार में जो काम करता है सर्विस करता है। यह जॉब कल्‍चर से सर्विस कल्‍चर से लाने का एनवायरमेंट हम आईआईटी में बनाएं। देश के लिए कुछ तो करना चाहिए। आज देखिए, डिफेंस सेक्‍टर, इतना अरबों-खरबों रुपये का हम इंपोर्ट करते हैं। मैं नहीं मानता है कि हमारे देश के पास ऐसे टेलेंट नहीं है, जो यह न बना पाएं। अश्रु गैस, बाहर से इमपोर्ट करते हैं, क्‍या हम नहीं बना सकते ? यू विल बी सरप्राइज, हमारी जो केरेंसी है, केरेंसी की इंक हम इंपोर्ट करते हैं और छापते है हम गांधी जी की तस्‍वीर।

यह चैलेंजेज क्‍यों न उठाएं हम, क्‍यों न उठाएं ? मैं मानता हूं कि एक-एक चीज को उठाकर के हम अब उसके लिए कोई एक व्‍यक्ति बनाएं, आप खुद सोच लें तो सैकड़ों चीज हो जाए, मान लीजिए डिफेंस में है, हो सकता है कि हम कम पड़ जाते हैं। बहुत बड़ी चीजें रिसर्च करके हम नहीं दे पाते है। हेल्‍थ सेक्‍टर में ले लीजिए, एक थर्मामीटर भी हम बाहर से इमपोर्ट करते है।

हेल्‍थ आज टोटली टेक्‍नोलॉजी आधारित हो गई है। अन्‍य का रोल 10 परसेंट है, तो 90 परसेंट रोल टेक्‍नोलॉजी का है। अगर टेक्‍नोलॉजी का रोल हेल्थ सेक्‍टर को रिप्‍लेस कर रही है तो वाट इज अवर इनिशिएटिव? मैं जब गुजरात में जब था, तो एक डॉक्‍टर को जानता था, जिन्‍होंने हर्ट के लिए स्‍टैंट बनाया था, इंजीनियरिंग के स्‍टूडेंट को लेकर के। मार्केट में स्‍टैंट की जो कीमत थी, उसके मुकाबले उसने जो स्‍टैंट बनाया था उसकी 10 परसेंट कीमत थी और फूल प्रूफ हो चुका है, 10 साल हो गए हैं, देयर इज नो कम्‍पलेंट एट ऑल। एक डॉक्‍टर ने अपने प्रोफेशन के साथ-साथ हर्ट के लिए स्‍टैंट बनाया – हि इज हार्ट सर्जन, लेकिन इस काम को किया, अपने आइडियाज से इंजीनियरिंग फील्‍ड के लोगों को बुलाया। एंड ही इज ट्राइंग हिज लेवल बेस्‍ट कि हमारा इंटरफेस हो सकता है क्‍या ? मेडिकल फैक‍ल्‍टी एंड आईआईटियन्‍स और स्‍पेशियली इक्‍विपमेंट मैन्‍यूफैक्‍चरिंग में भारत को हेल्‍थ सेक्‍टर के लिए अपनी बनाई हुई चीजें क्‍यों न मिले ? इस चैलेंज को मैं समझता हूं, हमारे आईआईटियंस उठा सकते है।

आज भी हमारे देश में लाखों लोगों के पास छत नहीं है, रहने के लिए। हमारी कल्‍पना है कि भारत जब आजादी के 75 साल मनाए तो कम से कम देश में बिना छत के कोई परिवार न हो। क्‍या यह काम करना है तो बहुत गति से मकानों का निर्माण कैसे हो ? जो मकान बनें वे सस्‍टेन करने की दृष्टि से बहुत अच्‍छा बने। मैटिरियल भी बेस्‍ट से बेस्‍ट उपयोग करने की आदत कैसे बने, इन सारी चीजों को लेकर के, क्‍या आईआईटी की तरफ से मॉडल आ सकते हैं क्‍या। डिजाइंस आ सकते हैं क्‍या? मैटिरियल, उसका स्‍ट्रक्‍चर, सारी चीजें आ सकती है। हम समस्‍याओं को खोजने का प्रयास करे।

दुनिया में जैसे हम आईआईटी के लिए गर्व कर सकते हैं, भारत एक बात पर गर्व कर सकता है, लेकिन पता नहीं कि हमने उसको पर्दें के पीछे डालकर रखा हुआ है। और वे है हमारी रेलवे। हम दुनिया के सामने अकेले हमारे रेलवे की ब्रांडिंग एवं मार्केटिंग कर सकते हैं। अकेला इतना बड़ा नाम है, इतना बड़ा नेटवर्क, इतना डेली लोगों का आना-जाना, इतने टेलेंट का, मैं मानता हूं कि सामान्‍य से सामान्‍य व्‍यक्ति से हाईली क्‍वालिफाईड इंसान, सबका सिंक्रोनाइज एक्टिविटी है। लेकिन हमने उस रूप में देखा नहीं है। इसी रेलवे को अति आधुनिक, एक्जिस्टिंग व्‍यवस्‍था को, बुलट ट्रेन वगैरह तो जब होगी, तब होगी लेकिन एक्जिस्टिंग व्‍यवस्‍था यूजर फ्रेंडली कैसे बने, सारी व्‍यवस्‍था को हम विकसित कैसे करें, टेक्‍नोलॉजी इनपुट कैसे दें, उन्‍हीं व्‍यवस्‍थाओं को कैसे हम बढ़ाएं ?

छोटी-छोटी चीजें हैं, हम बदलाव कर सकते हैं।, आज हमारा रेलवे ट्रैक पर जो डिब्‍बा होता है, 16 टन का होता है। उसका अपना ही बियरिंग कैपिसिटी है। क्‍या आईआईटियन उसको छह टन का बना सकते हैं? फिर भी सेफ्टी हो आप कल्‍पना करके बता सकते हैं, कैपेसिटी कितनी बढ़ जाएगी। नई रेल की बजाए इसकी कैपेसिटी बढ़ जाएगी। मेरे कहने का तात्‍पर्य है कि हम भारत की आवश्‍यकताओं को सिर्फ किताबी बात नहीं आईआईटी से निकलने वाला और समाज को एक साथ कुछ न कुछ देकर जाएगा। इस विश्‍वास के साथ हम कुछ कर सकते हैं।

मैं मानता हूं कि हमारे देश में दो चीजों पर हम कैसे बढ रहे हैं और जो सामान्‍य मानविकी जीवन में भी है, एक साइंस ऑफ थिकिंग और एक आर्ट ऑफ लिविंग। यह कम्‍बीनेशन देखिए, इवन आईआईटी के स्‍टूडेंट को भी पूछना, प्रवोक करना है।

एक घटना सुनिए, बड़ी घटना है। एक साइंटिस्‍ट एक यूनिवर्सिटी में गए। स्‍टूडेंट्स भी बड़े उनसे अभिभूत थे, बहुत ही ओवर क्राउडेड रूम हो गया था। उन्‍होंने पूछा, भाई, हमें अगर आगे बढ़ना है, तो आब्‍जर्ब करने की आदत बढ़ना चाहिए। तो समझा रहे थे, हम देखते हैं, लेकिन आब्‍जर्ब नहीं करते और साइंटिफिक टेंपर वहीं से आता है। तो उसने कहा कि ऐसा करो भाई, एक टेस्‍ट ट्यूब लेकर के कोई नौजवान बाथरूम में जाओ, और उसमें अपना यूरिन ले कर के आओ। उन्‍होंने एक स्‍टूडेंट को भेजा, वह बाथरूम गया, टेस्‍ट ट्यूब में यूरिन ले कर आया। यूरिन लिया। यूरिन में अपनी अंगुली डाली, और फिर मुंह में डाली। सारे स्‍टूडेंट्स परेशान, यह कैसा साइंसटिस्‍ट है, दूसरे का यूरिन अपने मुंह में डालता है। हरेक के मुंह से – हैं ए ए ए – बड़ा निगेटिव आवाज निकली। फिर ये हंस पड़े। बोलो, आपको अच्‍छा नहीं लगा ना। क्‍यों, क्‍योंकि आपने आब्‍जर्ब नहीं किया। आपने सिर्फ देखा। मैंने टेस्‍ट ट्यूब में ये अंगुली डाली थी, और मुंह में ये (दूसरी अंगुली) लगाई थी। बोले, अगर आप आब्‍जर्ब करने की आदत नहीं डालते हैं, सिर्फ देखते हैं, तो आप शायद उस साइंटिफिक टेंपर को इवाल्‍व नहीं कर सकते हैं, अपने आप में। मेरा कहने का तात्‍पर्य यह है कि इन चीजों को कैसे करें। और एक विषय है, आखिर में अपनी बात समाप्‍त करूंगा।

हमारे देश में बहुत से लोग होते हैं, जो स्‍कूल-कॉलेज कहीं नहीं गए, पर बहुत चीजें नई वो इनोवेट करते हैं। बहुत चीजें बनाते हैं। क्‍या हम, जिस इलाके में हमारे आईआईटी हों, कम से कम उस इलाके के 800-1000 गावों में ऐसे लोग हैं क्‍या? किसान भी अपने तरीके से व्‍यवस्‍था को नया डाइमेंशन दे देता है। थोड़ा सा मोडिफाई कर देता है। कभी हमारे स्‍टूडेंट्स को प्रोजेक्‍ट्स देना चाहिए, यदि हमारे किसान ने यह काम कर दिया है, तो तुम इसे साइंटिफिकली परफेक्‍ट कैसे कर सकते हो, फुलप्रुफ कैसे विकसित कर सकते हो ? क्‍योंकि बड़ी खोज की शुरूआत, एक स्‍पार्क् से होती है। यह स्‍पार्क् कोई न कोई प्रोवाइड करता है। हम अगर उनको एक प्रोजेक्‍ट दें, हर आईआईटी को ऐसे 25 लोगों को ढूढ़ना है जो अपने तरीके से जीवन में कुछ न कुछ करते हैं, कुछ न कुछ कर दिया है। उन 25 को कभी बुलाइए, उनके एक्‍सपीरियेंस स्‍टूडेंट़स के साथ शेयर कीजिए। वह पढ़ा लिखा नहीं है, उनको भाषा भी नहीं आती है। लेकिन वो उनको नई प्रेरणा देगा।

अहमबदाबाद आईआईएम में मिस्‍टर अनिल गुप्‍ता इस दिशा में कुछ न कुछ करते रहते हैं। लेकिन यह बहुत बड़ी मात्रा में आईआईटी स्‍टूडेंट के द्वारा किया जा सकता है। ऐसी बहुत सी बातें हैं, जिसको लेकर के बात समझता हूं, हम करें तो माने एक अलग इाडमेंशन पर ही अपनी बातें रखने का प्रयास किया है। लेकिन कई दिशाओं पर आप चर्चा करने वाले हैं। और मुझे विश्‍वास है, आईआईटी ने इस देश को बहुत कुछ दिया है, और बहुत कुछ देने की क्षमता भी है। सिर्फ उसको उपयोग में कैसे लायें, इस दिशा में प्रयास करें।

मैं फिर से एक बार राष्‍ट्रपति जी का हृदय से अभिनंदन करता हूं, आभार व्‍यक्‍त करता हूं कि इस प्रकार का अवसर मिला।

थैंक्‍यू।

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On May 2 Didi will get certificate of Bengal ex-chief minister by the people of the state: PM Modi
April 17, 2021
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People from all corners of India are seen in Asansol. But the misgovernance of Bengal governments affected Asansol: PM Modi
PM Modi says on May 2, which is the day of assembly election results, Didi will be given the certificate of Bengal ex-chief minister by the people of the state
In Asansol, PM Modi says Mamata Banerjee has skipped several meetings called by the Centre to discuss many key issues
PM Modi promises to implement all the welfare schemes of the central government in West Bengal if BJP is elected to power in the state

 

नमोष्कार !

मां कल्याणेश्वरी और घाघर बूढ़ी चंडी...आज मेरे लिए अवसर है इस पवित्र धरती को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करने का। बांग्ला नव वर्ष शुरू होने के बाद आज बंगाल में मेरी ये पहली सभा है। नव वर्ष में बंगाल में बीजेपी की डबल इंजन की सरकार बनने जा रही है।

चार दोफार मोतोदान, टीएमसी होलो खान-खान !

(चार दौर का मतदान, टीएमसी खंड-खंड हो गई)। 

बाकी चार दोफार मोतोदान, दीदी-भाइपो टिकिट कटान ! 

(बाकी चार बार का मतदान, दीदी भाइपो का पत्ता साफ)।

पांचवें चरण के मतदान में भी कमल के फूल पर बटन दबा करके भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनाने के लिए आज सुबह से बहुत बड़ी तादाद में लोग निकले हैं। बहुत भारी मतदान हो रहा है। मैं अब तक मतदान करने वाले सभी मतदाताओं का हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं और उनका धन्यवाद करता हूं।  

साथियो

आसनसोल हो, दुर्गापुर हो, इस पूरे क्षेत्र में बंगाल ही नहीं, बल्कि देश के औद्योगिक विकास का प्रमुख केंद्र बनने की क्षमता बहुत पहले से है हमेशा से है। द्वारकानाथ टैगोर जी, राजेन मुखर्जी, बीरेंद्रनाथ मुखर्जी जैसे अनेक व्यक्तित्वों ने इस क्षेत्र की संपदा को देश की आत्मनिर्भरता के संकल्प के रूप में आगे बढ़ाया।

साइकिल से लेकर रेल तक, पेपर से लेकर स्टील तक, एल्यूमिनियम से लेकर ग्लास तक, ऐसे अनेक कारखानों में, यहां की फैक्ट्रियों में काम करने के लिए पूरे देश से लोग यहां आते हैं। आसनसोल एक प्रकार से लघु भारत है, हिन्दुस्तान का हर व्यक्ति यहां मिल जाएगा। लेकिन बंगाल में जो सरकारें रहीं, उनके कुशासन ने आसनसोल को कहां से कहां पहुंचा दिया। जहां लोग चाकरी के लिए आते थे, आज यहां से पलायन कर रहे हैं। मां-माटी-मानुष की बात करने वाली दीदी ने, यहां हर तरफ माफिया राज फैला दिया है। आसनसोल की प्राकृतिक संपदा को लूटने के लिए कोयला माफिया, नदियों की बालू को लूटने के लिए अवैध खनन माफिया, सरकारी जमीन पर कब्जे के लिए भू-माफिया।

साथियो

यहां सालनपुर, बाराबनी, जमुरिया रानीगंज, उखड़ा, बल्लालपुर से लेकर बांकुड़ा बॉर्डर तक अवैध कोयला खनन का साम्राज्य फैला हुआ है। यहां के कोयला, रेत और दूसरे खनिजों का काला माल कहां तक पहुंचता है, किस-किस तक पहुंचता है, ये हर कोई जानता है। बंगाल के ट्रक वालों को, ट्रांसपोर्ट से जुड़े साथियों को, यहां के उद्यमियों को जो भाइपो टैक्स देना पड़ता है, वो भी बंगाल के लोग भली-भांति जानते हैं। 

साथियो

इस चुनाव में आपका एक वोट सिर्फ टीएमसी को साफ करेगा, इतना ही नहीं है बल्कि आपका एक वोट यहां से माफिया राज को भी साफ करेगा। आपको पता है आपके वोट की ताकत क्या है? आपका एक वोट पूरे माफिया राज को यहां साफ कर देगा। ये ताकत है आपके वोट की।  

भाइयो-बहनो 

आज आपसे शिकायत करना चाहता हूं...करूं ?...आपके खिलाफ है शिकायत...करूं ?...बुरा तो नहीं मानोंगे न...लेकिन मेरी शिकायत जरा देखिए…मैं यहां दोबार आया हूं.... लोकसभा के चुनाव में....जब मुझे प्रधानमंत्री बनना था और आप से वोट मांगने आया था। बाबुल जी के लिए वोट मांगने आया था। लेकिन पहले जब आया, तब तो मेरे लिए वोट मांगा था, फिर भी एक चौथाई भी लोग नहीं थे सभा में। लेकिन आज चारों तरफ...मैंने ऐसी सभा पहली बार देखी है। अब बताइए, मेरी शिकायत मिठी है कि कड़वी है। आज आपने ऐसा दम दिखा दिया है। ऐसी ताकत दिखा दिए...मैं जहां देख सकता हूं...मुझे लोग ही लोग दिखते हैं...बाकी कुछ दिखता ही नहीं है। क्या कमाल कर दिया है आप लोगों ने। लेकिन आगे का काम बहुत महत्वपूर्ण है। और वो है वोट देने के लिए जाना, वोट देने के लिए औरों को ले जाना। करोंगे...पक्का करोंगे...सब लोग करोंगे...देखिए तभी यहां से ये माफिया राज समाप्त होगा। ये माफियाशाही तभी समाप्त होगी।

और भाइयो-बहनो

मैं बंगाल जहां भी गया हूं यही माहौल है। और उधर क्या है?

दीदी, ओ दीदी, 

देखिए दीदी...ओ दीदी...2 मई में अब सिर्फ आधा महीना बचा है। आधा चुनाव हो चुका है। सिर्फ कुछ दिन और। कोयला धुले, मोयला जाय ना !

भाइयो और बहनो, 

सोनार बांग्ला के संकल्प के साथ बीजेपी सरकार यहां आपकी हर मुश्किल कम करने के लिए काम करेगी। बंगाल में कानून व्यवस्था का राज स्थापित किया जाएगा। कानून के राज में यहां नए उद्योग लगेंगे, बंगाल में निवेश बढ़ेगा। बीजेपी सरकार में हर कोई अपना काम करेगा। आपके जीवन में टीएमसी के तोलाबाजों की जो घुसपैठ हुई है, उसे जीरो किया जाएगा, उसे दूर किया जाएगा। पुलिस अपनी जिम्मेवारी निभाएगी, अपना काम करेगी, राज्य सरकार के अलग-अलग विभाग अपने जनसेवा का दायित्व निभाएंगे, अपना काम पूरा करेंगेप्रशासन अपनी जिम्मेवारियों को निभाते हुए जनता जनार्दन की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए दिन-रात काम करेगा। और सरकार अपनी जिम्मेवारियों को पूरा करने के लिए काम करेगी। और बीजेपी कार्यकर्ता...मैं आपको विश्वास दिलाता हूं आपकी सेवा में हरदम खड़ा रहेगा। और इसमें जो भी खेला करने की कोशिश करेगा, उस पर कानून के तहत उतनी ही सख्त कार्रवाई भी होगी।

भाइयो और बहनो,

दीदी ने बीते दस सालों में विकास के नाम पर आपके साथ विश्वासघात किया है। विकास के हर काम में, हर काम के आगे दीदी दीवार बनकर खड़ी हो गई हैं। केंद्र सरकार ने 5 लाख रुपए के मुफ्त इलाज की सुविधा दी, तो दीदी दीवार बन गईं। केंद्र सरकार ने शरणार्थियों की मदद के लिए कानून बनाया, तो दीदी इसका भी विरोध करने लगीं। केंद्र सरकार ने मुस्लिम बहनों को तीन तलाक से मुक्ति के लिए कानून बनाया, तो दीदी फिर आगबबूला हो गईं। केंद्र सरकार ने किसानों को बिचौलियों से मुक्त करने वाले कानून बनाए, तो दीदी विरोध में उतर आईं। केंद्र सरकार ने किसानों के बैंक खातों में सीधे पैसे ट्रांसफर करने शुरू किए, तो दीदी ने इससे भी किसानों को वंचित रख दिया। 

साथियो

बंगाल को विकास रोकने वाली नहीं, डबल इंजन की सरकार चाहिए। बंगाल की बीजेपी सरकार, आपका लाभ कराने वाली हर उस योजना को लागू करेगी, जिन्हें दीदी की सरकार ने रोका हुआ है। पहली ही कैबिनेट में पीएम किसान सम्मान निधि पर बड़ा फैसला लिया जाएगा। बंगाल के हर किसान के खाते में 18 हजार रुपए सीधे ट्रांसफर हो, जिसको दीदी ने रोकने की कोशिश की। 2 मई के बाद नई सरकार बनने के बाद दीदी नहीं रोक पाएंगी। क्योंकि सरकार आपने बनाई है...आपके लिए बनाई है...और वो आपके लिए काम करेगी।

भाइयो और बहनो

आप मुझे बताइए... दीदी को अगर आप लोगों के दु:ख-दर्द की परवाह होती, तो क्या वो आपकी भलाई के...आपके हित वाले कामों को रोकने का काम कभी करती क्या ? ये रुकावटे डालती क्या ? दीवार बनती क्या ? दीदी को अगर आपकी तकलीफ की चिंता होती, तो क्या वो तोलाबाजी होने देतीं क्या ? जरा इधर से जवाब दीजिए तोलाबाजी होने देतीं क्या ?  सिंडिकेट को आगे बढ़ाती क्या ? कटमनी वसूलने देतीं क्या ?

साथियो

दीदी, अपने अहंकार में दीदी इतनी बड़ी हो गई हैं कि हर कोई उन्हें अपने आगे छोटा दिखता है। केंद्र सरकार ने अनेक बार अनेक विषयों पर बात करने के लिए बैठकें बुलाई हैं, लेकिन दीदी कोई न कोई कारण बताकर इन बैठकों में नहीं आतीं। जैसे कोरोना पर पिछली दो बैठकों में बाकी मुख्यमंत्री आए, लेकिन दीदी नहीं आईं। नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की बैठक में बाकी मुख्यमंत्री आए, लेकिन दीदी नहीं आईं। मां गंगा की सफाई के लिए देश में इतना बड़ा अभियान शुरू हुआ, लेकिन दीदी उससे जुड़ी जो बैठक होती है, उसमें भी नहीं आईं। एक-दो बार न आने का तो समझ में आता है साथियों, लेकिन दीदी ने यही तरीका बना लिया है। दीदी बंगाल के लोगों के लिए कुछ देर का समय नहीं निकाल पातीं। ये उन्हें समय की बर्बादी लगता है। और जब दीदी के तोलाबाज, कोरोना के दौरान भेजे गए राशन को लूटते हैं, तो वो उन्हें खुली छूट देती हैं। 

केंद्रीय टीमें चाहे सहयोग के लिए आएं या फिर करप्शन की जांच के लिए, दीदी उनको रोकने के लिए पूरे संसाधन लगा देती हैं। दीदी केंद्रीय वाहिनी ही नहीं, सेना तक को बदनाम करती हैं, राजनीति के लिए झूठे आरोप लगाती हैं। दीदी, खुद को देश के संविधान से ऊपर समझती हैं। दीदी चोखे ओहोन्कारेर पोरदा। (दीदी की आंखों पर अहंकार का पर्दा चढ़ा हुआ है।)

भाइयो और बहनो,

दीदी की राजनीति सिर्फ विरोध और गतिरोध तक सीमित नहीं है। बल्कि दीदी की राजनीति, प्रतिशोध की खतरनाक सीमा को भी पार कर गई है। बीते 10 साल में बीजेपी के अनेकों कार्यकर्ताओं की हत्या की गई है। अभी मेरी... यहां ऊपर आने से पहले... कई पीड़ित परिवारों से बात हुई है। दीदी की वजह से न जाने कितनी माताओं ने अपने बेटों को खोया है, न जाने कितनी बहनें आज भी अपने भाई का इंतजार कर रही हैं। दीदी की निर्ममता, उनकी असंवेदनशीलता हमें कुछ दिन पहले ही फिर एकबार दिखाई दी है, सुनाई दी है।

साथियो

कूचबिहार में जो हुआ, उस पर कल एक ऑडियो टेप आपने सुना होगा। ऑडियो टेप सुना क्या आपने ? 5 लोगों की दुखद मृत्यु के बाद दीदी किस तरह राजनीति कर रही हैं, ये इस ऑडियो टेप के अंदर साफ-साफ खुल गया है, सामने आता है। इस ऑडियो टेप में कूचबिहार के टीएमसी नेता को कहा जा रहा है कि मारे गए लोगों के शवों के साथ रैली निकालो। दीदी, वोटबैंक के लिए कहां तक जाएंगी आप ? सच्चाई ये है कि दीदी ने कूचबिहार में मारे गए लोगों की मृत्यु से भी अपना सियासी फायदा करने की सोची। शवों पर राजनीति करने की दीदी को बहुत पुरानी आदत है।

साथियो

दीदी ने बंगाल में ये हाल बना दिया है। जनता ने भी जब उनके विरोध की कोशिश की, तो उसको कुचल दिया गया है। बंगाल की जनता के अधिकार, दीदी के लिए कोई मायने नहीं रखते। 2018 के पंचायत चुनाव पश्चिम बंगाल कभी नहीं भूल सकता। बर्धमान से लेकर बांकुरा, बीरभूमि, मुर्शीदाबाद के लोगों को आज भी याद है कैसे उनके अधिकारों को छीना गया।

आप सोचिए

बंगाल में 20 हजार से ज्यादा पंचायतों में सीधे दीदी के तोलाबाजों को निर्वाचित कर दिया गया। दीदी ने इतना आतंक फैलाया कि एक तिहाई से भी ज्यादा पंचायतों में कैंडिडेट पर्चा तक नहीं भर पाए। हमले के डर से WhatsApp तक पर नॉमिनेशन फाइल करने पड़े। जीत के बाद भी जनप्रतिनिधियों को पड़ोसी राज्यों में शरण लेनी पड़ी। लोकतंत्र के इस अपमान से, लोकतंत्र को इस तरह कमजोर किए जाने से सुप्रीम कोर्ट तक ने नाराजगी जताई। लेकिन दीदी ने लोकतंत्र का सम्मान नहीं किया, लोकतंत्र की परवाह नहीं की।

साथियो

बंगाल और भारत के लिए रोबी ठाकुर का आदर्श है - चित्तो जेथा, भॉय- शुन्नो। हृदय जहां भय मुक्त रहे। लेकिन दीदी का प्रयास रहता है- चित्तो जेथा भॉया-क्रांतो। हृदय जहां भयाक्रांत रहे। दीदी को इस बार के चुनाव में छप्पा वोट नहीं करने दिया जा रहा, तो वो और बौखला गई हैं। दीदी को गुंडागिरी-मस्तानगिरी का खैला नहीं करने दिया जा रहा है, तो दीदी बौखला गई हैं। दीदी द्वारा हर पैंतरा आजमाया जा रहा है ताकि बंगाल के लोगों को वोट देने से रोका जाए। टीएमसी द्वारा अभियान चलाए जा रहे हैं, चुनाव आयोग पर दबाव बनाया जा रहा है। दिल्ली से लेकर बंगाल तक दीदी ने मोदी के खिलाफ मोर्चा खुलवा दिया है।

दीदी, ओ दीदी, ओ आदरणीय दीदी

आप जितनी चाहे साजिशें कर लीजिए, जितनी चाहे कोशिशें कर लीजिए। इस बार आपकी साजिश बंगाल के लोग खुद ही नाकाम कर रहे हैं। इस बार बंगाल के लोगों ने ही आपके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। बंगाल के लोगों ने आप पर अभूतपूर्व विश्वास किया था। अब वो आपको हमेशा-हमेशा के लिए एक ऐसा सॉर्टिफिकेट देने वाली है बंगाल की जनता इस चुनाव में, जो आप जीवन भर घर में लटका कर रख सकती हो। कौन सा सॉर्टिफेकट जनता देने वाली है, जो 2 मई को आने वाला है ? वो सॉर्टिफिकेट आने वाला है भूतपूर्व मुख्यमंत्री। यानि दीदी, ये बंगाल की जनता आपको आजीवन एक सॉर्टिफिकेट देने वाली है भूतपूर्व मुख्यमंत्री...लेकर घुमते रहना। 

भाइयो-बहनो

बंगाल के लोग, बंगाल के लोगों से आपकी नफरत भी महसूस कर रहे हैं। दीदी के करीबी, शिड्यूल्ड कास्ट के मेरे भाइयों और बहनों को भिखारी कहते हैं, दीदी चुप रहती हैं। दीदी के करीबी बीजेपी को वोट देने वालों को बंगाल से बाहर फेंकने की धमकी देते हैं, दीदी चुप रहती हैं। किसी की दुखद मृत्यु पर दीदी की संवेदना भी वोटबैंक का फिल्टर लगाकर ही प्रकट होती है।

दीदी

पश्चिम बंगाल आपकी दुर्नीति से परेशान है, इतना ही नहीं है, बल्कि बंगाल को आपकी नीयत पर भी शक है। इसलिए पश्चिम बंगाल के कोने-कोने से एक ही आवाज़ सुनाई दे रही है-   

कीच्छू नेइ तृनोमूल, एबार भोट पॉद्दोफूले। (कुछ नहीं अब तृणमूल में, इस बार वोट कमल-फूल में।)

भाइयो और बहनो,

10 साल तक दीदी ने बंगाल को भेदभाव और पक्षपात वाली सरकार दी है। हालात तो ये है कि स्पोर्ट्स क्लबों, खिलाड़ियों तक की मदद में भी दीदी ने भेदभाव किया। जो स्पोर्ट्स क्लब दीदी का गुणगान करे, उनके गीत गाए, उन्हें पैसा। जो खेल पर अपना ध्यान दे, बंगाल का नाम रोशन करे, वो स्पोर्ट्स क्लब यहां पैसे के लिए तरसते हैं। दीदी की इसी दुर्नीति की वजह से बुज़ुर्गों को मिलने वाला ‘भाता’ तक सभी लाभार्थियों तक नहीं पहुंच पा रहा है। गांव की सड़क को भी दीदी की सरकार ने राजनीति का शिकार बना दिया। मनरेगा की मज़दूरी हो या फिर आपदा की राहत हो, दीदी की सरकार ने सबमें भेदभाव किया, पक्षपात किया। आपको तीन साल पहले की रामनवमी याद है? आसनसोल-रानीगंज के दंगे कौन भूल सकता है! इन दंगों में सैकड़ों लोगों की जीवन भर की मेहनत राख हो गई। सबसे ज्यादा नुकसान गरीबों का हुआ, पटरी पर दुकान लगाने वाले और छोटे व्यापारियों का हुआ। 

दंगाइयों का साथ किसने दिया? - दीदी ने।

तुष्टिकरण की नीति किसने पनपाई? – दीदी ने।

किसके कारण पुलिस दंगाइयों के पक्ष में खड़ी रही? –  दीदी के।

एक ही जवाब है न...एक ही जवाब है न...हर कोई कह रहा है दीदी के कारण...दीदी के कारण...।

भाइयो और बहनो,

जो विकास पर विरोध को, विश्वास पर प्रतिशोध को, सुशासन पर राजनीति को, प्राथमिकता देती है, ऐसी सरकार पश्चिम बंगाल का भला नहीं कर सकती। इसलिए बंगाल को आशोल पोरिबोरतोन चाहिए। आशोल पोरिबोरतोन बंगाल में सबका साथसबका विकाससबका विश्वास के लिए, आशोल पोरिबोरतोन बंगाल के युवाओं को रोजगार के लिए, आशोल पोरिबोरतोन बंगाल में कानून के राज के लिए, आशोल पोरिबोरतोन बंगाल की भलाई के लिए।

साथियो

दीदी के राज में महिलाओं के साथ जो अत्याचार हुआ है, उसकी चर्चा तक दीदी ने नहीं होने दी है। राज्य सरकार के आंकड़े छिपाकर, महिलाओं पर अत्याचार की खबरों को दबाकर दीदी ने सबसे बड़ा खेला, बंगाल की महिलाओं के साथ ही किया है। मैं आज विशेष रूप से बंगाल की बहन-बेटियों को एक बात के लिए आश्वस्त करता हूं। बीजेपी की सरकार हर वर्ग, हर मत-मज़हब को उसकी बेटी की सुरक्षा और सम्मान को सुनिश्चित करेगी। दीदी की सरकार ने यहां रेप जैसे संगीन अपराध के दोषियों को जल्द से जल्द सजा सुनाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट पर अड़ंगा डाला, उसको रोक दिया। देश भर में ऐसी एक हजार अदालतें खोली जा रही हैं लेकिन दीदी ने बेटियों को न्याय दिलाने वाली ऐसी एक भी अदालत खोलने नहीं दी। बीजेपी सरकार में फास्ट ट्रैक कोर्ट का भी तेजी से निर्माण किया जाएगा। गरीब, दलित, आदिवासी बेटियों को यहां से दूसरे राज्यों में भेजने का जो अवैध काम किया जाता है, उस पर रोक लगाने के लिए सख्त कदम उठाए जाएंगे।

साथियो,

सोनार बांग्ला का यही संकल्प बंगाल बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र में रखा है। बंगाल में Ease of Living, Ease of Doing Business का माहौल बनाया जाएगा। यहां के इंफ्रास्ट्रक्चर पर, रोड, रेल, एयर, इंटरनेट, हर प्रकार की कनेक्टिविटी को डबल इंजन सरकार, डबल स्पीड के साथ आधुनिक बनाएगी। इस क्षेत्र को आर्सेनिक युक्त ज़हरीले पानी से मुक्ति मिले, इसके लिए पाइप से हर घर जल के प्रकल्प को तेज़ी से यहां लागू किया जाएगा। दीदी ने जो कुछ भी लाभ आप तक पहुंचने से रोका है, वो तेज़ी से मिलेगा। डबल इंजन की सरकार में डबल बेनिफिट और डायरेक्ट बेनिफिट मिलेगा। 

एबार शोंघात नॉय, शॉहोजोगिता होबे!

एबार बिरोध नॉय, बिकाश होबे!

एबार मोने भय नॉय, पेटे भात होबे!

एबार शिक्खा होबे, शिल्पो होबे, कोर्मो-शोंस्थान होबे! 

आप इतनी बड़ी तादाद में आशीर्वाद देने के लिए आए...मैं आपका बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं। दोनों हाथ ऊपर करके मेरे साथ बोलिए 

भारत माता की जय !

भारत माता की जय !

भारत माता की जय !

बहुत-बहुत धन्यवाद !