1992 में एक सपना संजोया गया था। अम्‍बेडकर जी के प्रति आस्‍था रखने वाले सभी महानुभावों ने सक्रिय होकर के एक विश्‍व स्‍तरीय केंद्र बने, उस दिशा में प्रयास किए थे। सरकारी फाइलें चलती रही। विचार विमर्श होता रहा। बाबा साहब अम्‍बेडकर ने जो संविधान बनया था, उस संविधान के कारण जो सरकारें बनी थी, उन सरकारों को बाबा साहब को याद करने में बड़ी दिक्‍कत होती थी। इतने साल बीत गए, 20 साल से भी अधिक समय यह कागजों में मामला चलता रहा। जब मेरे जिम्‍मे काम आया, तो पीड़ा तो हुई कि भई ऐसा क्‍यों हुआ होगा। 

लेकिन मैंने यह तय किया है भले ही 20 साल बर्बाद हुए हो लेकिन अब हम 20 महीने के भीतर-भीतर इस काम को पूरा करेंगे। कभी-कभी व्‍यक्तिगत रूप से मैं सोचता हूं अगर बाबा साहब अम्‍बेडकर न होते तो नरेंद्र मोदी कहा होते? जिस पार्श्‍व भूमि पर मेरा जन्‍म हुआ, जिस अवस्‍था मैं पला-बढ़ा पैदा हुआ, अगर बाबा साहब अम्‍बेडकर न होते, तो मैं यहां तक नहीं पहुंच पाता। समाज के दलित, पीडि़त, शोषित वंचित सिर्फ उन्‍हीं का भला किया है ऐसा नहीं है। और कभी-कभी मैं जब यह सुनता हूं तो मुझे पीड़ा होती है कि बाबा साहेब अम्‍बेडकर दलितों के देवता थे। जी नहीं, वो मानव जात के लिए थे। और न ही सिर्फ हिंदुस्‍तान में विश्‍वभर के दलित, पीडि़त, शोषित, वंचित, उपेक्षित उन सबके लिए एक आशा की किरण थे। और हमने भी गलती से भी बाबा साहब को छोटे दायरे में समेट करके उनको अपमानित करने का पाप नहीं करना चाहिए था। इतने बड़े मानव थे। 

आप कल्‍पना किजिए वो समय.. जीवनभर हम देखें बाबा साहब को, वो सामाजिक Untouchability का शिकार तो थे ही, लेकिन मरने के बाद भी Political Untouchability का शिकार बने रहे। देश को न सामाजिक Untouchability चाहिए, देश को न राजनीतिक Untouchability चाहिए। बाबा साहब का जीवन.. और उन्‍होंने संदेश भी क्‍या दिया, आज 21वीं सदी में भी हर सरकार के लिए वहीं काम मुख्‍य है, जो बाबा साहब कह के गए हैं। उन्‍होंने क्‍या संदेश दिया? शिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो। शिक्षित बनो, आज भी भारत की सभी सरकारें.. उनके सामने ये प्रमुख काम है कि हम 100% Literacy की और कैसे आगे बढ़ें, उस लक्ष्‍य को कैसे प्राप्‍त करें। हम बाबा साहब आंबेडकर के सवा सौ साल मनाने जा रहे हैं, तब बाबा साहब ने हमें जो एक मंत्र दिया है, शिक्षित बनो.. समाज के आखिरी छोर पर बैठे हुए इंसान को अगर हम शिक्षित बनाते हैं तो बाबा साहब को उत्‍तम से उत्‍तम श्रंद्धाजलि होगी। सवा सौ साल मनाने का वो उत्‍तम से उत्‍तम तरीका होगा, क्‍योंकि ये वहीं लोग है जो शिक्षा से वंचित रह गए है, जिनके लिए बाबा साहब जीते थे, जीवनभर जूझते थे और इसलिए हमारे लिए एक सहज कर्त्‍तव्‍य बनता है। उस कर्त्‍तव्‍य का पालन करना है.. भारत को ऐसा संविधान मिला है, जिस संविधान में द्वेष और कटुता को कहीं जगह नहीं है। 

आप कल्‍पना कर सकते है कि दलित मां की कोख से पैदा हुआ एक बालक, जिसने जीवनभर जाति के नाम पर कदम-कदम अपमान सहा हो, सम्‍मान से जीने के लिए कोई व्‍यवस्‍था न हो, ऐसे व्‍यक्ति के दिल में कितनी कटुता, कितना रोष, कितना बदले का भाव हो सकता था। लेकिन बाबा साहब के भीतर वो परमात्‍मा का रूप था, जिसने संविधान की एक धारा में भी.. खुद के जीवन पर जो बीती थी, वो यातनाएं कटुता में परिवर्तित नहीं होने दीं। बदले का भाव संविधान के किसी भी कोने में नहीं पैदा होता। इतिहास कभी तो मूल्‍यांकन करेगा कि जीवन की वो कौन सी ऊंचाईयां होगी इस महापुरूष में कि जिसके पास इतना बड़ा दायित्‍व था, वो चाहते तो उन स्थितियों में ऐसी बात करवा सकते थे, लेकिन नहीं करवाई। 

मूल में कटुता, द्वेष, बदले का भाव न उनके दिल में कभी पनपने दिया, न आने वाली पीढि़यों में पनपे इसके लिए कोई जगह उन्‍होंने छोड़ी। मैं समझता हूं कि हम संविधान की बात करते हैं लेकिन उन पहलुओं की ओर कभी देखते नहीं है। उस सामाजिक अवस्‍था की ओर देखते नहीं है। 

मुझे खुशी है मैं उस प्रदेश में पैदा हुआ। जहाँ Sayajirao Gaekwad ने बाबा साहब अम्‍बेडकर का गौरव किया था। उनको सम्‍मानित किया था, उनके जीवन का गर्व-भैर स्‍वीकार किया था। और बाबा साहब अम्‍बेडकर ने हमेशा न्‍याय-प्रियता को प्राथमिकता दी थी। आज हम सब, जैसे मैं कहता हूं कि संविधान मेरे जैसे व्‍यक्ति को भी कहां से कहां पहुंचा सकता है। 

यह Election Commission की रचना है। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि उस समय निष्‍पक्ष चुनाव का महत्‍व क्‍या होता है, लोकतंत्र में निष्‍पक्ष चुनाव की ताकत क्‍या होती है, उस बात के बीज बोए उन्‍होंने Independent Election की रचना करके, यह बाबा साहब की सोच थी और आज हम सब एक ऐसी व्‍यवस्‍था पर भरोसा करते हैं कि हिंदुस्‍तान के सभी दल कितना ही विरोध क्‍यों न हो, लेकिन Election Commission की बात को गर्व के साथ स्‍वीकार करते हैं। बाबा साहेब ने यह व्‍यवस्‍था हमें दी। 

उनकी न्‍यायप्रियता देखिए। दुनिया के समृद्ध-समृद्ध कहे जाने वाले देश, most forward कहे जाने वाले देश उन देशों में भी महिलाओं को मत का अधिकार पाने के लिए 50-50, 60-60 साल तक लड़ाईयां लड़नी पड़ी थी। आंदोलन करने पड़े थे, महिलाओं को मत का अधिकार नहीं था, voting right नहीं था। पढ़े-लिखे देश से, प्रगतिशील देश से, धनवान देश से लोकतंत्र की दुहाई देने का जैसे उनका मनोबल ही था, लेकिन एक दलित मां की कोख से पैदा हुआ बेटा संविधान के पहले ही दिन हिंदुस्‍तान के अंदर माताओं-बहनों को वोट का अधिकार दे देता है, यह न्‍यायप्रियता ही उनकी। 

भारत एक Federal Structure है। संघीय ढांचा आगे चलकर के कैसे चलेगा, व्‍यवस्‍थाएं कैसी होगी। मैं नहीं मानता हूं कि सामान्‍य मानवीय 50-60 साल के बाद क्‍या होगा, वो देख पाता है, मैं नहीं मानता। आज हम देखते हैं क‍ि हमारे संघीय ढांचे को मजबूत बनाए रखने के लिए कितनी-कितनी बारीक चीजों पर ध्‍यान देना पड़ता है। और फिर भी कहीं न कहीं तो कोई गलती रह जाती होगी। यह बाबा साहब अम्‍बेडकर थे, जिनको इस बात की समझ थी कि उन्‍होंने संविधान की रचना के साथ एक स्‍वतंत्र Finance Commission की रचना रखी। जो Finance Commission केंद्र और राज्‍यों के संतुलन और धन के वितरण की व्‍यवस्‍था को स्‍वतंत्र रूप से गाइड करता है और आज भी वो व्‍यवस्‍था पर सब भरोसा करते है और चलते हैं। इस बार राज्‍यों को 42% तक राशि मिली है। हिंदुस्‍तान के इतिहास की बहुत बड़ी घटना है यह। यानी एक प्रकार से राज्‍यों ने कल्‍पना न की हो, उतने धन के भंडार इस बार मिल गए। पहली बार ऐसा हुआ है कि देश की जो Total जो तिजोरी, जो माने राज्‍य और केंद्र की मिलकर के तो करीब-करीब 60% से ज्‍यादा, 65% से भी ज्‍यादा amount आज राज्‍यों के पास है। भारत के पास मात्र 35% amount है। यह ताकत राज्‍यों को कैसे मिली है। सरकार के समय निर्णय हुआ एक बात है…लेकिन मूल बाबा साहब आंबेडकर के उस मूल में लिखा हुआ है, तब जा करके हुआ और इसलिए समाज के अंदर जब हम इन चीजों की ओर देखते हैं तो लगता है कि भई क्‍या हमारी आने वाली पीढ़ी को इस महापुरूष के कामों को समझना चाहिए कि नहीं समझना चाहिए, इस महापुरूष के विचारों को जानना चाहिए कि नहीं जानना चाहिए? हमारी आने वाली पीढि़यों को इस महापुरूष के आदर्शों से कुछ पा करके जीने का संकल्‍प करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए? 

अगर ये हमें करना है, तो जो आज हम व्‍यवस्‍था को जन्‍म देने जा रहे है, जो 20 महीने के भीतर-भीतर, गतिविधि उसकी शुरू हो जाएं, ऐसी मेरी अपेक्षा है। ये आने वाली पीढि़यों की सेवा करने का काम है और ये सरकार कोई उपकार नहीं कर रही है, मोदी सरकार भी उपकार नहीं कर रही। एक प्रकार से समाज को अपना कर्ज चुकाना है, कर्ज चुकाने का एक छोटा सा प्रयास है। 

और इसलिए मैं समझता हूं कि बाबा साहब के माध्‍यम से जितनी भी चीजें हमारे सामने आई है.. हम कभी-कभी देखें, बाबा साहब.. women Empowerment, इसको उन्‍होंने कितनी बारिकी से देखा। आज भी विवाद होते रहते हैं। उस समय बाबा साहब की हिम्‍मत देखिए, उन्‍होंने जिन कानूनों को लाने में सफलता पाई, जो हिन्‍दुस्‍तान में विमिन Empowerment के लिए एक बहुत बड़ी ताकत रखते है। ये बाबा साहब का प्रयास था कि जिसके कारण हिंदू मैरिज़ एक्‍ट 1955 बना। ये बाबा साहब का पुरूषार्थ था कि Hindu Succession Act 1956 बना। Hindu Minority And Guardianship Act 1956 बना, Hindu Adoption और Maintenance Act 1956 बना। ये सारे कानून समाज के उन लोगों को ताकत देते थे विशेष करके महिलाओं को, ये बाबा साहब की विशेषता थी। 

आज भी मैं जब लोगों से बड़े-बड़े सुनता हूं तो आश्‍चर्य होता है कि काश इस प्रकार के भाषण करने वालों ने कभी आंबेडकर को पढ़ा होगा। खैर.. वो तो उनको गले लगाने को तैयार नहीं थे, उनके जाने के बाद उनको पढ़ने के लिए कहा से तैयार होगे। कोई कल्‍पना कर सकता है कि दुनिया में Labour Reform की बात कहें तो Communist विचारधारा की चर्चा होती है। Labour Reform की चर्चा करें तो Leftist विचारधारा के खाते में जाता है, लेकिन बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि जब ब्रिटिश सल्‍तनत थी, अंग्रेज वायसराय यहां बैठे थे.. और उस काउंसिल के अंदर 1942 में बाबा साहब आंबेडकर की ताकत देखिए, भारत के मजदूरों का अंग्रेज सल्‍तनत शोषण करती थी, ये बाबा साहब की ताकत थी कि 1942 के पहले मजदूरों को 12 घंटे काम करना पड़ता था। 1942 में बाबा साहब आंबेडकर ने वायसराय से लड़ाई लड़ करके 12 घंटे से 8 घंटे काम करवाने का पक्‍का कर लिया था। 

ये छोटे निर्णय नहीं है और इसलिए बाबा साहब को एक सीमा में बांध करके देखने से.. भारत की पूरी विकास यात्रा में बाबा साहब का कितना बड़ा रोल था, इसको हम समझ नहीं पाते। ये मेरा सौभाग्‍य रहा है, क्‍योंकि मैं हर पल मानता हूं और अपने जीवन को देख करके मुझे हर पल लगता है कि इस महापुरूष ने हमें बहुत कुछ दिया है, बहुत कुछ दिया है। समाज के प्रति भी उनकी भूमिका क्‍या रही, समाज को जोड़ने की भूमिका रहीं। कभी समाज को तोड़ने की भूमिका नहीं रही। 

उनके सारे विचारों को हम देखे, उनके सामने धन के ढेर कर दिए गए थे – यह बनो, यह पाओ, यह करो। मैं उसकी चर्चा में जाना नहीं चाहता हूं, इतिहास मौजूद है। लेकिन वो उससे विचलित नहीं हुए थे। और इसलिए जिस प्रकार से समता का महत्‍व है, उतना ही ममता का भी महत्‍व है। खासकर के जो अपने आप को उच्‍च मानते हैं, उन लोगों ने अपने आप को सोचना होगा कि समाज में भेद-भाव लम्‍बे अर्से तक चलने वाला नहीं है। इसे स्‍वीकार करना होगा और भारत जैसा देश जो विविधताओं से भरा हुआ है उसमें सामाजिक एकता एक बहुत बड़ी एकता रखती है। बाबा साहब के 125 वर्ष मना रहे हैं तब सामाजिक एकता के बिगुल को हम कैसे ताकतवर बनाए। 

और इसलिए मैं कहता हूं – समता + ममता = समरता। समभाव + ममभाव = समरसता। और इसलिए अपनापन यह मेरे हैं। यह मेरे ही परिवार के अंग है, यह भाव हमें जीकर के दिखाना होगा और मुझे विश्‍वास है कि यह जो हम प्रयास शुरू कर रहे हैं। उस प्रयास के माध्‍यम से समाज की धारणा बनाने में, समाज को सशक्‍त बनाने में संविधान की lateral spirit, उसको कोई चोट न पहुंचे। उसकी जागरूक भूमिका अदा करने के लिए एक प्रकार से यह चेतना केंद्र बनेगा। यह विश्‍व चेतना केंद्र बनने वाला है, उस सपने को लेकर के हमें देखना चाहिए। 

हम मार्टिन लूथर किंग की बात तो कर लेते हैं, लेकिन बाबा साहब को भूल जाते हैं और इसलिए अगर मार्टिन लूथर किंग की बात करती है दुनिया, तो हमारी कोशिश होनी चाहिए कि दुनिया जब मार्टिन लूथर किंग की चर्चा करें तो बाबा साहब अम्‍बेडकर की भी करने के लिए मजबूर हो जाए। वो तब होगा, जब हम बाबा साहब का सही रूप उनके विचारों की सही बात, उनके काम की सही बात दुनिया के पास सही स्‍वरूप में प्रस्‍तुत करेंगे। इस केंद्र को यह सबसे बड़ा काम रहेगा कि पूरा विश्‍व बाबा साहब को जाने-समझे। भारत के मूलभूत तत्‍व को जाने-समझे और यह बाबा साहब के माध्‍यम से बहुत आसानी से समझा जा सकता है। 

और इसलिए मैं कहता हूं कि हमने बाबा साहब से प्रेरणा लेकर के उनके विचारों और आदर्शों से प्रेरणा लेकर के समाज को सशक्‍त बनाने की दिशा में, राष्‍ट्र के लिए.. महान राष्‍ट्र बनाने का सपना पूरा करने के लिए, हमारी जो भी जिम्‍मेवारी है उसको पूरा करने का प्रयास करना चाहिए। 

मैं विभाग के सभी साथियों को बधाई देता हूं कि 20 साल से अधिक समय से भी लटकी हुई चीज, एक प्रकार से Political untouchability का स्‍वीकार हुआ Project है। उससे मुक्ति दिलाई है। अब आने वाले 20 महीनों में उसको पूरा करे। लेकिन यह भी ध्‍यान रखे कि उसका निर्माण उस स्‍तर का होना चाहिए ताकि आने वाली शताब्‍दियों तक वो हमें प्रेरणा देता रहे, ऐसा निर्माण होना चाहिए। 

मैं फिर एक बार बाबा साहब आंबेडकर को प्रणाम करता हूं और सवा सौ वर्ष.. ये हमारे भीतर ताकत दें, हमें जोड़ने का सामर्थ्‍य दें, सबको साथ ले करके चलने का सामर्थ्‍य दें, समाज के आखिरी छोर पर बैठा हुआ इंसान, वो हमारी सेवा के केंद्र बिंदु में रहें, ऐसे आर्शीवाद बाबा साहब के निरंतर मिलते रहें ताकि उनके जो सपने अधूरे हैं, वो पूरे करने में हम लोग भी कुछ काम आएं, इसी अपेक्षा के साथ फिर एक बार मैं विभाग को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। 

बहुत-बहुत धन्‍यवाद! 

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আমার প্রিয় দেশবাসী, নমস্কার। ‘মন কী বাত’-এ আবারও আপনাদের সঙ্গে যুক্ত হয়ে আমি অত্যন্ত আনন্দিত। দেশের বিভিন্ন প্রান্তে আমাদের দেশের মানুষ দেশের স্বার্থে, সমাজের স্বার্থে এমন অসাধারণ সব কাজ করছেন এবং যখন তাঁদের সম্পর্কে শুনি, তখন আমরা নতুন প্রেরণা পাই। আজকের অনুষ্ঠানের সূচনা আমি অ্যাথলেটিক্সে দেশের তেমনই এক কৃতিত্বের কথা দিয়ে করব। কয়েকদিন আগেই ঝাড়খণ্ডের রাঁচিতে ন্যাশনাল সিনিয়র অ্যাথলেটিক্স ফেডারেশন প্রতিযোগিতা অনুষ্ঠিত হয়েছে। এতে সারা দেশ থেকে প্রায় ৮০০ অ্যাথলিট অংশ নিয়েছেন। এই প্রতিযোগিতা চলাকালীন চারটি ভিন্ন ভিন্ন ইভেন্টে চারটি জাতীয় রেকর্ড ভাঙা হয়েছে। ভেঙেছেন গুরিন্দরবীর সিং, বিশাল টিকে, তেজস্বীন শঙ্কর, দেব মীণা এবং কুলদীপ কুমার। এই সাথীরা আলাদা-আলাদা ক্যাটেগরিতে নতুন রেকর্ড গড়েছেন। আমি সর্বপ্রথম এদের সকলকে অনেক-অনেক অভিনন্দন জানাই।

সাথী, একটি ইভেন্ট যা নিয়ে সারা দেশে খুব আলোচনা হচ্ছে, সেটি হলো – ১০০ মিটার রেস, একশ মিটারের দৌড়। মাত্র দু’ দিনের মধ্যে পুরুষদের একশো মিটার রেসে জাতীয় রেকর্ড তিনবার ভেঙে গিয়েছে। যে দু’জন অ্যাথলিট এই কৃতিত্ব দেখিয়েছেন তাঁরা হলেন - গুরিন্দরবীর সিং এবং অনিমেষ কুজুর। আমি ভাবলাম এইবার ‘মন কী বাত’-এ এই দু’জন খেলোয়াড়ের সঙ্গে কথা বলা যাক।

(ফোন কল)

প্রধানমন্ত্রী: অনিমেষ জী নমস্কার | গুরিন্দর বীর তোমাকেও নমস্কার, সৎশ্রী অকাল।

অনিমেষ, গুরিন্দরবীর: নমস্কার স্যার, নমস্কার স্যার।

প্রধানমন্ত্রী: আচ্ছা ভাই, তোমরা তো খুব বড় কৃতিত্ব দেখিয়েছ। তোমাদের জুটিও তাক লাগিয়ে দিয়েছে। আমরা সঙ্গীতে তো যুগলবন্দী দেখেছি, কিন্তু চ্যালেঞ্জে এখন যুগলবন্দী হল যেখানে একবার একজন চ্যালেঞ্জ দেয়, তারপর অন্যজন সেই চ্যালেঞ্জটি গ্রহণ করে। ফের তৃতীয়বার সাফল্য পায়। তোমাদের ব্যাপারটা খুব আকর্ষণীয় ছিল। আমি চাই ‘মন কী বাত’-এর শ্রোতারা জানুন এ ব্যাপারে, তোমাদের সম্পর্কে জানুন তাঁরা। তোমরা যে চমৎকার প্রদর্শন করেছেন সেটা জানা যাক।

অনিমেষ জী: নমস্কার স্যার, আমার নাম অনিমেষ কুজুর। আমি ২০০ মিটার এবং ৪০০ মিটারে জাতীয় রেকর্ডের অধিকারী স্যার আমি ছত্তিশগড়ের মানুষ।এখন আমি ওড়িশার হয়ে খেলি। আমি গত বছর এশিয়ান মেডেল এবং ওয়ার্ল্ড ইউনিভার্সিটি গেমস মেডেল নিয়ে এসেছি আমি অ্যাথলেটিক্স ২০২১ থেকে শুরু করি যখন আমি স্কুল থেকে উত্তীর্ণ হই। আমি অম্বিকাপুরের সৈনিক স্কুল থেকে পাশ করেছি, আমি প্রথমে ফুটবল খেলতাম, আমার বাবা-মা কোভিডের সময় আমাকে কিছুটা ছাড় দিতেন যে তুই গিয়ে বাইরে দৌড়ে আয় বা খেলে আয়, আর যখন কোভিড শেষ হতে লাগল তখন আমার ফুটবলের যেসব বন্ধু ছিল তারা আমাকে বলল যে স্টেট মিট হতে চলেছে, তুই গিয়ে অংশগ্রহণ কর আমি অংশ নিলাম আমি জানতাম না যে সেখান থেকে জাতীয় স্তরের বাছাই হয়। আমি সেখান থেকে জাতীয় পর্যায়ে নির্বাচিত হলাম এবং আজ আমি আন্তর্জাতিক পর্যায়ে ভারতের প্রতিনিধিত্ব করছি।

প্রধানমন্ত্রী: এবার গুরিন্দরবীর জী তুমি বলো?

গুরিন্দরবীর: নমস্কার স্যার, আমার নাম গুরিন্দরবীর এবং আমি ভারতীয় নৌবাহিনীতে প্যাটি অফিসার এবং আমি ভারতের সবচেয়ে দ্রুত স্প্রিন্টার। এখন ১০০ মিটারে ১০.০৯ (দশ দশমিক শূন্য নয়) সেকেন্ডের জাতীয় রেকর্ড গড়েছি। এবং আমি প্রথম ভারতীয় যে ১০.১ (দশ দশমিক এক) সেকেন্ডের কমে দৌড়েছি, এবং আমি চেষ্টা করছি যেন ট্র্যাক ও ইউনিফর্মেও আমার দেশের সেবা করতে পারি। আমার বাবা এবং ঠাকুরদা দু’জনেই খেলাধুলো করতেন – আমাদের ভারতের সংস্কৃতি হলো, যখনই কোনো উৎসব হয় যেমন দীপাবলী, যেমন নববর্ষ, তখন আমরা আমাদের ঘর পরিষ্কার করি। সেই সময় আমি আমার বাবার ট্রফি এবং মেডেলগুলো পরিষ্কার করতাম, সেটা আমার খুব ভালো লাগত, আমি খুব আনন্দ পেতাম। যখনই কোনো ট্রফি পরিষ্কার করতাম, তখন জিজ্ঞাসা করতাম – আচ্ছা, এই ট্রফি কোথায় জিতেছ? এই মেডেল কোথায় জিতেছ? এই ছবিটি কবেকার? তখন তাঁরা আমাকে তাঁদের গল্প শোনাতেন যে, দ্যাখো, আমি এখানে খেলতে গিয়েছিলাম, আমি এই জাতীয়-পদক জিতেছি, আমি এতে আমার দলকে জিতিয়েছি। তখন আমিও তাঁদের বলতাম – বেশ, আমিও কোনো খেলা খেলতে চাই। তাঁরা সকালে দৌড়তে যেতেন, তাই আমি তাঁদের বলতে লাগলাম – শোনো না, আমাকেও নিয়ে চল তোমাদের সঙ্গে। তখন তাঁরা আমাকে নিয়ে যেতে লাগলেন এবং তাঁদের খেলায় যা শিখেছিলেন, সেটা আমাকে শেখাতে লাগলেন। তখন আমার আগ্রহ তৈরি হতে লাগল। উসেইন বোল্টের বিশ্বরেকর্ড ভাঙ্গা হচ্ছে সেটা আমি দেখেছি। মজার একটা ঘটনা আছে এ ব্যাপারে – আমি টিভি দেখছিলাম, তখন আমার মা আমার টিভি বন্ধ করে দিলেন –বেটা এখন পড়ার সময় হয়েছে, তুমি পড়ো। তখন আমি বললাম – ঠিক আছে, তুমি আমাকে টিভি দেখতে দিচ্ছ না, কিন্তু একদিন এমন আসবে যে তুমি আমাকে টিভিতে খুঁজবে – দেখো, সেই গুরিন্দর দৌড়চ্ছে। তাই এখন আমার খুব আনন্দ হয় যে আমার মা আমাকে টিভিতে দৌড়তে দেখছে।

প্রধানমন্ত্রী : বাঃ বাঃ বাঃ! খুব চমৎকার কথা বললে ভাই!

গুরিন্দর বীর: হ্যাঁ স্যার, আমরা মধ্যবিত্ত পরিবার স্যার, আমার বাবাও ভলিবল খেলতেন। পারিবারিক সমস্যার কারনে উনি খেলা ছেড়ে দেন। তার স্বপ্ন অসম্পূর্ণ থেকে যায়। উনি আমার ভেতরে সেই স্বপ্ন দেখেছিলেন, যে আমার ছেলে সেই স্বপ্ন পূরণ করবে। আমি বাবার সঙ্গে কথা বলতাম, শুনতাম মিলখা সিং কত পরিশ্রম করতেন। আমি বাবাকে বলতাম যে আমিও একদিন তোমার স্বপ্ন পূরণ করব। তিনি বলতেন স্বপ্ন পূরণ এমনি এমনি হয় না। তার জন্য প্রচুর হার্ডওয়ার্ক করতে হয়। পরিশ্রম করতে হয়। মিলখা সিংজী মুখে রক্ত তুলে পরিশ্রম করতেন, রোদের মধ্যে দৌড়তেন। সারাদিন ট্রেনিং করতেন। সেই বিষয়গুলো আমাকে ইন্সপায়ার করত। আমার বাবা আমাকে ইন্সপায়ার করতেন। বলতেন, আমি দৌড়ব আমার দেশের জন্য, দেশের জন্য মেডেল আনবো, জিতবো। আর এই বিষয়টাও ছিল, আমি যখন ১০০ মিটারের ইভেন্ট বাছাই করলাম, তখন সবাই আমাকে বলল, ভাই ১০০ কোরো না। ১০০ ভারতীয়দের ইভেন্ট নয়। ভারতীয়দের শরীর ১০০ মিটারের জন্য প্রস্তুতই নয়। তখন আমি আর আমার বাবা সব সময় বলতাম, যে দেখ গুরিন্দর, আমরা এটা বেছে নিয়েছি। এখন এটার থেকে পিছু হটবো না। যারা আমাকে বলতো যে ভাই, এটা তুমি করতে পারবে না, আমি সেটা করে দেখাব। বাবা বলত, তুই করে দেখাবি, তোর ওপর আমার ভরসা আছে। যে ভরসা আমার বাবা আমার ওপর করেছেন, সেই ভরসাকে নিজের শক্তিতে পরিণত করে আমি এগিয়ে চলেছি, আর এখন তো আমি প্রত্যেক ভারতীয় কে বলছি, ভাই ভারতীয়রা স্প্রিন্ট করো।

প্রধানমন্ত্রী : দেখুন, তোমরা দু'জন এক অভূতপূর্ব কীর্তি স্থাপন করেছ, এবং মাত্র দুদিনের মধ্যে তোমরা তিনবার ন্যাশনাল রেকর্ড ভেঙেছো।

যেমনটা গুরিন্দারবীর বললেন, যে লোকে বলে ভারতীয়দের শরীর ১০০ মিটার রেসে দৌড়নোর জন্য একেবারেই উপযুক্ত নয়। এত সমস্যা থাকা সত্ত্বেও তোমরা তোমাদের কাজ করেছো। তাই তোমাদের দু'জনের থেকে আমি জানতে চাইবো এবং মন কি বাত-এর শ্রোতারাও শুনতে চাইবেন যে কি এমন আবেগ ছিল? কি এমন জেদ ছিল? কী ভেবেছিলে তোমরা এবং কীভাবে এটা করলে? কতটা কঠিন এই বিষয়টা?

গুরিন্দরবীর: হ্যাঁ স্যার, আমি গুরিন্দর। শুরুতে তো খুব স্ট্রাগল ছিল। অনেকবার সংশয়ও হয়েছে যে, আমি কি ঠিক করছি? আমি কি সঠিক বিষয় বাছাই করেছি? কারণ প্রত্যেকবার তো আপনি জিতবেন না, কখনো কখনো আপনি শিখবেনও। যখন আমি হেরে যেতাম, যখন আমি ঠিকমতো পারফরম করতে পারতাম না, কোন চোট-আঘাত আসত, তখন আমার পরিবারের সদস্যরা আমাকে সাপোর্ট করতেন। বলতেন, কোন ব্যাপার না। একদিন খারাপ গেছে, এক বছর খারাপ গেছে, এতে সারা জীবন খারাপ হয়ে যায় না। স্বপ্ন দেখা ছেড়ো না। আমার কোচও আমাকে এটা শিখিয়েছেন, যে যদি তুই না করতে পারিস, তবে অন্য কেউও করতে পারবে না। এভাবেই যখন আমার কমিউনিটি, আমাদের আশেপাশের মানুষ আমাকে উৎসাহিত করেন, তখন আমার মোটিভেশন কখনো নষ্ট হয় না।

প্রধানমন্ত্রী: অনিমেষজী...

অনিমেষ: স্যার, যখন আমি ২০২১ এ অ্যাথলেটিক্স শুরু করি তখন

লোকজন আমাকে বলতো যে, এটা নতুন ফিল্ড, দেখ তুই করতে পারবি কিনা। তা আমি বললাম যে আমি এই ফিল্ডে ঢুকেছি যখন, তখন করবোই। আমার বাবাও সব সময় আমাকে বলতেন, যে তুই এই ফিল্ডে ঢুকেছিস যখন তখন কখনো পিছন ফিরে দেখবি না, কারণ ভাবে তো সবাই যে এই করব, ওই করব, কিন্তু খুব কম লোকই করে দেখায়। তুই এই ফিল্ডে ঢুকেছিস তো এটাতেই লেগে থাকতে হবে, এটাতেই এগিয়ে যেতে হবে।

তোমাকে সবরকম facilities (সুযোগ সুবিধে) সমস্ত কিছু দিয়ে আমরা support করব। পারিবারিক support, আর্থিক support, সব কিছু করব আমরা। ব্যাস, তুমি পরিশ্রম কর আর India কে দেখিয়ে দাও যে ভারতীয়রাও দৌড়তে পারে। কারণ আমাকেও লোকে বলত যে ভারতীয়দের genes সেরকম নয় যাতে তারা দশ অথবা দশ দশমিক এক এর মধ্যে দৌড়তে পারে অথবা sprint করতে পারে। কিন্তু এখন আমরা দুজনেই এটা prove করেছি যে ভারতীয়রাও এটা করতে পারে। আমাদের জন্য এটা এমন কিছু কঠিন নয়, আমরা ও এসব করতে পারি। আসলে স্যার, এ সমস্ত কিছু আমাকে খুব প্রেরণা দেয়, আর আমরা যত প্রশিক্ষণ নিচ্ছি প্রয়োজনীয় সময় আরো কমছে এবং অন্য ভারতীরাও দেখতে পারছে যে ভারতীয়রাও পারে। আমরা আরো করব স্যার, এখন আমাদের দুজনের নির্বাচন Commonwealth games এর জন্য ও হয়েছে। সামনের প্রতিযোগিতায় আমরা আরো ভালো প্রদর্শন (perform) করব ।

প্রধানমন্ত্রী : দ্যাখো, আমার মনে একটা কৌতুহল আছে, আর লোকেদের ও আছে। আমি শুনেছি তোমরা দুজনে খুব ভালো বন্ধুও। তোমরা দুজনে কিছু ঠিক করে রেখেছ নাকি যে তুমি আমার record ভাঙলে আমি তোমার record ভাঙব। প্রথমে অনিমেষ বলো।

অনিমেষ: স্যার জী, আগে রেকর্ড ছিল দশ দশমিক এক আট এর , যা আমার ছিল। সেটাকে গুরিন্দরবীর ভাই সেমিফাইনালে ভেঙে দশ দশমিক এক সাত করে। তারপর আমি আবার ওটাকে সেকেন্ড সেমিফাইনাল- দশ দশমিক এক পাঁচ করে ভাঙি। যখন সেমিফাইনাল হয়, আমরা দুজনেই খুশি ছিলাম যে, চলো ঠিক আছে , আজ রেকর্ড ভেঙেছে আর আমরা দুজনেই ভেঙেছি। কারণ ঐ সময়ে প্রতিযোগিতায় এ প্রতিদ্বন্দ্বিতা থাকে কিন্তু এটা আমরা দুজনেই আগে থেকে ঠিক করে রেখেছিলাম । তার আগে আমরা সৌদি আরব ও গিয়েছিলাম প্রতিযোগিতায় অংশ নিতে, সেখানেও আমরা দুজন roommates ছিলাম। আমরা ওখানেও আলোচনা করতাম ভারতের sprinting কে আরো এগিয়ে নিয়ে যেতে হবে আর এটা আমাদেরই হাতে , আমরা যা করব সেটাই অন্যদের উৎসাহিত করবে।

প্রধানমন্ত্রী : গুরিন্দরবীর তুমি কী বলবে?

গুরিন্দরবীর: আমরা দুজনে ঠিক করেছিলাম যে আমরা খুব ভালো দৌড়বো। সেই জন্য যখনই একে অপরকে প্রয়োজন হয় একে অন্যের পাশে থাকি। যেমন, এখন রেকর্ড গড়ার আগে আমি রেকর্ড গড়লাম তারপর অনিমেষ গড়ল। যখন আমরা warm up করছিলাম তখন আমি অনিমেষ কে বলছিলাম, অনিমেষ ঐ ব্লক টা ভালো, ঐখানে গিয়ে বোস, ওখানে তাড়াতাড়ি চলে যা আমরা ওখানেই warm up করব, এখানে ভালো warm up করা গেলে একে অপরকে help করা হবে। একজন অন্য কে সাহায্য করলে সেও improve করে, আমি ও improve করি। সেই জন্য বন্ধুত্ব ও দরকার। তবে, স্যার, আমরা যখন মাঠের বাইরে, প্রতিযোগিতার বাইরে তখন আমরা বন্ধু। যেই আমরা মাঠে আসি তখন একে অপরের প্রতিদ্বন্দী হয়ে যাই। তখন এটাই হয় যে আমি দ্রুত দৌড়বো, আমি ওর থেকেও দ্রুত দৌড়বো।

প্রধানমন্ত্রী: দ্যাখো, তোমাদের যে লড়াই সেটা দেশের সম্মান বাড়ানোর জন্য। দেশ কে ভবিষ্যতে এই জায়গায় নিয়ে যাওয়ার জন্য আর এটা এক positive spirit নিয়েই করা। আর আমি মনে করি তোমাদের এই যে sportsman spirit, এটা খেলা ও, আবার একে অপর কে challenge করাও, এগিয়ে যাওয়ার চেষ্টা করা আবার এগিয়ে যাবার জন্য একে অন্যকে সাহায্য ও করা , এ এক অভিনব দৃষ্টান্ত স্থাপন করেছ তোমরা। আমার তরফ থেকে অনেক অনেক অভিনন্দন তোমাদের। অনেক অনেক শুভ কামনা এবং আমার পূর্ণ বিশ্বাস যে তোমরা দেশের নাম ঊজ্জ্বল করবে।

তোমরা এভাবেই পরিশ্রম করতে থাকো অনেক উন্নতি হবে। আমার অনেক অনেক শুভ কামনা।

গুরিন্দরবীর/ অনিমেষ: ধন্যবাদ স্যার, ধন্যবাদ আপনাকে।

প্রধানমন্ত্রী: অনেক অনেক ধন্যবাদ।

আমার প্রিয় দেশবাসী , এই সময়, দেশের বেশিরভাগ জায়গায় খুব গরম পড়েছে। প্রচণ্ড রোদ, গরম হাওয়া, এই রকম আবহাওয়ায় নিজের প্রতি খেয়াল রাখা অত্যন্ত জরুরি। জল পান করতে থাকুন। রোদে বেরোনো জরুরি হলে সাবধানে বেরোন। এব্যাপারে সরকারের বিভিন্ন দপ্তর যে যে গাইডলাইনস দিয়েছে তা ভুলবেন না।

বন্ধুরা, আমাদের এখানে গরমের সঙ্গে লড়াই করার নানা উপায় রান্নাঘরেও পাওয়া যায়। আপনিও নিশ্চয়ই দেখেছেন, যেমন যেমন গরম বাড়তে থাকে, তেমন তেমন রান্নার স্বাদও বদলাতে থাকে, রান্নার পদ্ধতিও পাল্টে যায়। কখনও কলসির জল আসে, কখনও দই পাতা হয়, তো কখনও কাঁচা আম সিদ্ধ করা হয়- আর শুরু হয় দেশী পানীয়র বাহার। দেশী পানীয়র সঙ্গে আপনিও পরিচিত। আপনি যদি উত্তর ভারতে যান তো অনেক জায়গায় আপনি পাবেন আম পান্না, কাঁচা আমের স্বাদ আর গরম থেকে রেহাই। পঞ্জাব হরিয়ানা গেলে লস্যি পাবেন, বড় গেলাসের লস্যি। রাজস্থান আর গুজরাটে ছাঁচ, যা সব খাবারের সঙ্গেই যায়। আর বিহার ঝাড়খণ্ড, পূর্ব উত্তরপ্রদেশে ছাতুর সরবৎ, ওর কথা তো একদম আলাদা -পেটও ভরে, শক্তিও দেয়। কোঙ্কন আর গোয়াতে কোকম শরবৎ , আর সোলকারি। দক্ষিণ ভারতের পানকম, নীর মোর, সম্বারন আর ওড়িশার বেলপান্না, এসব শুধু পানীয়ই নয়, ভারতের আলাদা আলাদা জায়গায় ঐতিহ্যের নিদর্শন।

আর এর মধ্যে এক ভারত শ্রেষ্ঠ ভারতের এক ছবিও পাওয়া যায়। আর একটা ব্যাপার অবশ্যই মাথায় রাখবেন, এর মধ্যে অধিকাংশ জিনিসই আমাদের রান্নাঘরেই পাওয়া যায়, আমাদের ক্ষেতখামার থেকেই আসে। কোন বড় branding নেই। কিন্তু প্রজন্মের অভিজ্ঞতা তার মধ্যে মিলেমিশে আছে। আপনিও গরমের সময় দেশীয় পানীয়র আস্বাদ অনুভব করুন।

বন্ধুরা, গরম এলেই আর একটি আলোচনা সব ঘরে শুরু হয়ে যায়, আর সেটি হলো আম। আম, সর্বসাধারনের আলোচনার বিষয় হয়ে ওঠে,, ভারতে খুব কম ঘর আছে যেখানে আম নিয়ে কথা হয় না। প্রত্যেক জায়গার নিজস্ব আম, নিজস্ব স্বাদ, নিজস্ব সুগন্ধ।মহারাষ্ট্র আর কোঙ্কনে হাপুস, আলফনসো, গুজরাটে কেসর, এটাই তো আমের প্রাণ, উত্তরপ্রদেশের দশহরী আর আমার কাশীর ল্যাংড়া। ল্যাংড়া আমের মধ্যে অন্যতম, পাকার পরেও তার রং অনেক সময়ই সবুজই থেকে যায়। বিহারের জর্দালু, যার সুগন্ধ বহুদূর থেকে পাওয়া যায়। মালদার চৌসা, এই প্রত্যেকটি নামের সঙ্গে মানুষের স্মৃতি জুড়ে আছে। দক্ষিণ ভারতে যান, বংগনপল্লী, তোতাপুরি, নীলম, মলগোবা, বাংলার হিমসাগর, ওড়িশার আর অন্ধ্রপ্রদেশের সুবর্ণরেখা। অর্থাৎ, স্হান বদলায়, আমের রূপ রঙ আর তার স্বাদও বদলে যায়। আর বন্ধুরা, আমের এই পথচলা এখন গ্রাম থেকে global market পর্যন্ত পৌঁছে গেছে।আজ মন কি বাতের মাধ্যমে আমের ফলনের সঙ্গে যুক্ত কৃষক ভাইবোনদের প্রশংসা করব। আপনারা দেশের কৃষি অর্থ ব্যবস্থার জন্য শুধু সাধারণ কৃষক নন, আরও অনেক বেশি। এরকমই থাকুন।

বন্ধুরা, গরমের এই দিনগুলিতে একতো স্কুলের ছুটি থাকে, কিন্তু আমি এক এরকম class এর কথা বলব, যেখানে ভর্তি হওয়ার জন্য আপনার ইচ্ছে হবেই।

বন্ধুরা কল্পনা করুন, এক এমন school, যেখানে বাচ্চারাও যাচ্ছে , য়ুবারাও এবং বয়স্করাও, যেখানে কোন fee নেই, কোন বড় building নেই, কোন classroom ও নেই, আর সবচেয়ে পছন্দের কথা এখানে class নদীতে হয়।

বন্ধুরা, এ কোন গল্প নয়। এ এক সত্যি প্রচেষ্টা। কেরলের আলুওয়া তে, সাজি ওয়ালাশেরিলজী এমনি এক swimming club চালান। এখনও পর্যন্ত ১৫ হাজারের ও বেশী লোক এখানে সাঁতার শিখেছেন। সাজিজী

দিব্যাঙ্গ বাচ্চাদের ও swimming শিখিয়েছেন। এই প্রচেষ্টার পেছনে এক দুঃখও রয়েছে। কয়েক বছর আগে এক নৌকা দুর্ঘটনায় কিছু ছাত্রের মৃত্যু হয়। এই ঘটনা সাজিজির ভেতরটাকে ওলটপালট করে দেয়। উনি চিন্তা করেন যে যদি বাচ্চারা সাঁতার জানতো তবে অনেক প্রাণ বেঁচে যেত- ব্যস এরপর থেকেই শুরু হয় তাঁর এই প্রচেষ্টা।

বন্ধুরা, সাজি ওয়ালাশেরিলজীর জীবন আমাদের এক মস্ত বড় শিক্ষা দেয়। সেবা করার জন্য অনেক বড় প্রচেষ্টার দরকার নেই -জরুরী হল এক সৎ ইচ্ছে এবং নিরন্তর প্রচেষ্টা। তাঁর এই শক্তির মাধ্যমেই বহু মানুষের জীবনে পরিবর্তন আনা সম্ভব হয়।

আমার প্রিয় দেশবাসী, কয়েক দিন আগে আমার ইউরোপের নেদারল্যান্ডসে যাওয়ার সুযোগ হয়েছিল।ওখানে আমি অনেকগুলো মিটিং এ ছিলাম। এই সময়েই এক এমন মুহূর্ত আসে যা সমস্ত ভারতীয়দের গর্বে ভরিয়ে তোলে। নেদারল্যান্ডসে আয়োজিত এক বিশেষ অনুষঠানেও চোল রাজত্বকালীন প্রাচীন তাম্র ফলক ভারতকে প্রত্যর্পণ করা হয়।এই কার্যক্রমে নেদারল্যান্ডসের প্রধানমন্ত্রীও ছিলেন।এই তাম্র ফলক নিয়ে দেশবিদেশ থেকে আমার কাছে নিরন্তর সংবাদ আসতে থাকে।

মানুষ তাঁদের খুশি জানাচ্ছেন, তাঁদের গর্বের কথা জানাচ্ছেন। সারা বিশ্বে তামিল দের মধ্যে এবিষয়ে বিশেষ উৎসাহ রয়েছে।

বন্ধুরা এই তাম্র ফলক নিয়ে মানুষের মধ্যে অনেক প্রশ্নও রয়েছে। এজন্য আমি এর সঙ্গে যুক্ত কিছু কথা আজ আপনাদের সঙ্গে আলোচনা করতে চাই।এর মধ্যে একুশটি বড় এবং তিনটি ছোট তাম্র ফলক রয়েছে। এগুলি প্রধানত রাজা প্রথম রাজেন্দ্র চোলের পিতা রাজা রাজরাজা চোলকে দেওয়া প্রতিজ্ঞার সঙ্গে যুক্ত। এতে আনইমঙ্গলম গ্রামটি এক বৌদ্ধ বিহার কে দানের কথা লেখা আছে। এই তাম্র ফলকে চোল বংশের সাফল্যের কথাও লেখা আছে। এরথেকে বোঝা যায় চোল সাম্রাজ্যের সমুদ্র শক্তি কতটা শক্তিশালী ছিল। দক্ষিণ পূর্ব এশিয়ার দেশের সঙ্গে তাঁদের যোগাযোগের কথাও এতে পাওয়া যায়।

চোল সাম্রাজ্যের সমৃদ্ধ ইতিহাস আর সংস্কৃতি আমাদের সবার অনেক গর্বের। বন্ধুরা, আমাদের সরকার ভারতের এইসব অমূল্য ঐতিহ্য সংরক্ষণের জন্য নিরন্তর প্রচেষ্টা চালিয়ে যাচ্ছে। এরকম ভাবেই ছত্তিশগড়ের মল্হারেও জ্ঞান ভারতম অভিযানের সঙ্গে যুক্ত এক গুরুত্বপূর্ণ খনন হয়েছে। এখানে তিনটি দুর্লভ তাম্রফলক পাওয়া গেছে।এগুলো পাণ্ডু রাজবংশের মহর্ষি বালার্জুনের শাসনকালের সঙ্গে যুক্ত বলে মনে করা হয়। বিশেষজ্ঞদের মত এই inscription গুলি ষষ্ঠ - সপ্তম শতকের অর্থাৎ চোদ্দ পনেরোশো বছর আগের পুরোনো এই তাম্র ফলক প্রাচীন ব্রাম্হী লিপি আর পালি ভাষাতে লেখা। এ থেকে ওই সময়ের শাসন ব্যবস্থা, ধর্ম আর সংস্কৃতি সম্পর্কে গুরুত্বপূর্ণ তথ্য জানা যায়।

বন্ধুরা, আমাদের ভারতবর্ষে জ্যোতির্বিজ্ঞান অর্থাৎ astronomy সম্পর্কে বিশেষ আকর্ষণ রয়েছে। আমাদের দেশে আজও শতাব্দী প্রাচীন observatories রয়েছে। এখানে অদ্ভুত mathematical discoveries হয়েছে।

Navigation হোক, পঞ্চাঙ্গ হোক, অথবা আমাদের পরব বা উৎসব, এই সব কিছু আকাশ আর তারাদের সঙ্গে জুড়ে রয়েছে। আমাদের এখানে সব প্রজন্মেই astronomy কৌতুহল জাগিয়েছে। এর exploration এর জন্য উদ্বুদ্ধ করেছে , আর আজকের যুব প্রজন্মও এব্যাপারে যথেষ্ট উৎসাহ দেখাচ্ছেন।আজকাল আপনিও দেখতে পাবেন সারা দেশে astronomy club অত্যন্ত দ্রুত জনপ্রিয় হয়ে উঠছে। বড় শহর থেকে ছোট শহর , স্কুল থেকে পার্ক পর্যন্ত এর ক্রিয়াকলাপ দেখা যাচ্ছে। আমি Bangalore Astronomical Society থেকে খবর পেয়েছি।এখানে observational sessions আয়োজন করা হয়।এই সংস্হা গ্রাম অঞ্চলে astronomy কে জনপ্রিয় করার কাজও শুরু করে দিয়েছে। খগোল মণ্ডল নামে এক টিম ৩০ঘণ্টার এক খুব innovative course শুরু করেছেন।

বন্ধুরা, রাতে তারাদের পর্যবেক্ষণ এক অদ্ভুত অনুভূতি। Astro Kerala নামের একটি সংস্হা night observation camps আর workshop এর আয়োজন করে। এখানে যুবা বন্ধুরা টেলিস্কোপ তৈরি করা আর star maps ব্যবহার করা শেখেন।রাজকোটের বিগ ব্যাং অ্যাস্ট্রোনমি ক্লাব গিরের জংগল থেকে কচ্ছের রণ পর্যন্ত অনেক অ্যাস্ট্রোনমি ইভেন্ট এর আয়োজন করেছেন। জ্যোতির্বিদ্যা পরিসংস্হাও অ্যাস্ট্রোনমির সবথেকে পুরনো সংস্থাগুলির মধ্যে একটি। এখানে observational facility র সঙ্গে সঙ্গে বই , লাইব্রেরী আর টেলিস্কোপ লাইব্রেরীরও সুবিধে আছে। আমি আইস্যাকের কথাও উল্লেখ করতে চাই। এটা একটা student - led nationwide network , যেটা astronomy আর astrophysics club কে একসঙ্গে যুক্ত করে।

বন্ধুরা , নিজের hobbyর জন্য সময় বের করা, সবসময়ে নতুন কিছু শিখতে থাকা খুব জরুরি। আমি যুবকদের কাছে চাইব তাঁরা যেন অবশ্যই কোনো astronomy club-এর সঙ্গে যুক্ত হন এবং এই ছুটিতে অবশ্যই কোনো একটি planetarium দেখতে যান।

বন্ধুরা, 'মন কি বাত' অনুষ্ঠানটি যাঁরা টিভিতে দেখছেন, আমি তাঁদের বলব, একটি ভিডিও নিশ্চয়ই দেখবেন। এই ভিডিওটি নিয়ে কিছুদিন আগে প্রচুর আলোচনা হয়েছে। এটিতে কিছু মানুষ অপরিসীম ধৈর্য সহকারে, খুব সাবধানে গাঙ্গেয় ডলফিনকে বাঁচানোর চেষ্টা করছেন। আপনারা শুনে অবাক হবেন যে, এই পুরো প্রচেষ্টায় লেগেছিল প্রায় ১৩ ঘন্টা, আর তার ফলে শেষপর্যন্ত ডলফিনটি বেঁচে যায়।

বন্ধুরা, এই গোটা ব্যাপারটিতে খুব বড় ভূমিকা ছিল, ভারতের প্রথম গঙ্গা dolphin rescue ambulance এর। এটি উত্তর প্রদেশের ঘটনা। সেখানে একটি গাঙ্গেয় dolphin খালে আটকে গিয়েছিল। ওই সময়ে 'নমামি গঙ্গে অভিযানের' জন্য তৈরি এই ambulance তার ভরসা হয়ে পৌঁছে গেল এবং খুব সাবধানে তাকে বাইরে বার করে আনা হল। ভালো করে পরীক্ষা ও চিকিৎসার পর তাকে সুরক্ষিত রাপ্তি নদীতে ছেড়ে দেওয়া হয়। এক হিসেবে বলা যেতে পারে, একটি জীবন যেন আবার তার নিজের ঘরে ফিরে গেল।

বন্ধুরা, এই dolphin rescue ambulance টি বিশেষ ধরনের। এটিকে একটি ভ্রাম্যমান হাসপাতালের মতো করে তৈরি করা হয়েছে। এতে dolphinকে সুরক্ষিত রাখার ব্যবস্থা আছে। Oxygen আছে, বিশেষ স্ট্রেচার আছে, জীবন রক্ষার নানা উপকরণ আছে, অর্থাৎ যদি কোনো dolphin আহত হয়, খালে আটকে যায় বা নদী থেকে বিচ্ছিন্ন হয়ে যায়, তাহলে সঙ্গে সঙ্গে তাকে উদ্ধার করা যাবে।

বন্ধুরা, যখন আমরা গাঙ্গেয় dolphin কে বাঁচাই, তখন শুধু যে একটি প্রজাতিকে বাঁচাই তা-ই নয়, আমরা গঙ্গার জীব বৈচিত্রকে বাঁচাই । এভাবে নদীর পুরো জীবনতন্ত্রকে বাঁচানো হয়, এবং আমাদের আগামী প্রজন্মের জন্যে প্রকৃতির এক অমূল্য উত্তরাধিকারকে বাঁচিয়ে রাখা হয়।

আমার প্রিয় দেশবাসী, আপনাদের মধ্যে অনেকেরই নিশ্চয়ই নদী, পুকুর বা কুয়ার জলের সঙ্গে জড়িত অনেক স্মৃতি রয়েছে। কারুর পুকুরে সাঁতার কাটার কথা মনে পড়বে, কারুর আবার পুকুরপাড়ে বন্ধুদের সঙ্গে খেলার কথা কিংবা সেই মাটির গন্ধটা মনে আসবে। ছোটবেলার এইসব স্মৃতি সারা জীবন মনে থেকে যায়।

বন্ধুরা, এইসব স্মৃতিকে বাঁচিয়ে রাখার এক অনুপ্রেরণামূলক কাহিনী উত্তর প্রদেশের বস্তি জেলা থেকে জানা গেছে। নিজেদের গ্রামের মনোরমা নদীটিকে দেখে বস্তির বাসিন্দা আকাশ গুপ্তার খুব দুঃখ হত। কারণ যে নদীকে তিনি বাল্যকালে পরিষ্কার আর প্রাণবন্ত দেখতেন, সময়ের সঙ্গে সঙ্গে সেই নদীতে ক্রমশ প্লাস্টিক জমা হতে থেকেছে, জলে আবর্জনা বেড়ে চলেছে। শ্রীমান আকাশ স্থির করলেন, তিনি কোনো অভিযোগ করবেন না, বরং নতুনভাবে এক প্রচেষ্টা শুরু করবেন। অভিযোগ নয়, আরম্ভ -- এটাই মন্ত্র হয়ে দাঁড়াল। তিনি নিজের বন্ধুদের সঙ্গে নিলেন। আর ছিল শুধু জাল, ছোট কোদাল, ঝুড়ি এবং সেইসঙ্গে সবচেয়ে বড় যে শক্তিটা ছিল সেটা হল কিছু বদলে দেবার সংকল্প। এই যুবকেরা জলে নেমে কচুরিপানা সরাতেন। প্লাষ্টিক আর আবর্জনা তুলে আনতেন। কয়েকবার তো এক এক দিনে ৫০-৬০ কিলো পর্যন্ত আবর্জনা নদী থেকে তোলা হয়েছে। ধীরে ধীরে মনোরমা নদীর ওই অংশটিকে আবার পরিষ্কার দেখাতে লাগল। আশপাশের মানুষদেরও নজর পড়ল এমন একটি উদ্যোগের প্রতি । অধিবাসীদের মধ্যে স্বচ্ছতার ব্যাপারে সচেতনতা বাড়ল।

 বন্ধুরা, এরকমই আর একটি প্রেরণাদায়ী কাহিনী গোয়া থেকেও আমাদের কাছে এসেছে। গোয়ার বালকৃষ্ণ অইয়া জী একজন retired teacher. অবসর নিলেও সমাজের জন্য কাজ করার উৎসাহ তাঁর আজও একই রকম আছে। মড্ডি-তোলাপ এলাকার জলের সমস্যা নিয়ে তাঁকে খুবই পীড়িত করতো। তিনিও সমাধানের জন্য কাজ শুরু করলেন। পাইপলাইন পাতার কাজে বালকৃষ্ণজী গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা নেন। এর ফলে বেশ কিছু বাড়িতে জল পৌঁছে দেওয়া গেল। যে পরিবারগুলিকে জলের জন্য রোজ অনেক কষ্ট করতে হত, এতে তাঁরাও স্বস্তি পেলেন।

বন্ধুরা, গতমাসে আমার একটি সুন্দর অভিজ্ঞতা হয়েছে। এরসঙ্গে 'মন কি বাত'-এরও সম্বন্ধ রয়েছে। সেইজন্যেই আজ আপনাদের কাছে এই বিষয়ে আলোচনা করতে চাই। তামিলনাড়ুর নাগেরকয়েলে এক শিক্ষকের সঙ্গে আমার দেখা হয়েছিল। প্রায় তিন দশক আগে আমার সঙ্গে তাঁর দেখা হয়। আমি গিরিজা আম্মাজী-র কথা বলছি। এই সাক্ষাতের সময়ে কিছু তরুণ ছাত্রও তাঁর সঙ্গে ছিল।

বন্ধুরা, গিরিজা আম্মাজী প্রায় ১৫ টি স্কুল চালান। এরমধ্যে চেন্নাইয়ের জয়গোপাল গরোডিয়া হিন্দু বিদ্যালয় খুবই উল্লেখযোগ্য। তার দেশভক্তির ভাবনা প্রত্যেক ভারতবাসীকে প্রেরণা জোগাতে পারে। 'মন কি বাত' থেকে অনুপ্রেরণা নিয়ে তিনি দেশের সৈনিকদের কাজে লাগার সংকল্প নিয়েছিলেন। সেই উদ্দেশ্যে তিনি তাঁর সব স্কুলের ছাত্রদের উৎসাহ দিলেন এবং বললেন তারা যেন প্রতিদিন সেই বীর জওয়ানদের জন্য এক টাকা করে দেয়। অর্থাৎ এক বছর পরে ছাত্রপিছু মোট ৩৬৫ টাকা জমা হল। এই ছোট ছোট উদ্যোগকে এক করে প্রায় চল্লিশ লক্ষ টাকা একত্রিত করা সম্ভব হয়েছিল। গিরিজা আম্মাজী এই পুরো টাকার অঙ্কটি আমার হাতে সমর্পণ করেন। তাঁর সঙ্গে কথা বলতে গিয়ে আমি উপলব্ধি করেছিলাম, মা ভারতীর প্রতি তাঁর সমর্পণ কতটাই গভীর !

গতবছরই চেন্নাইয়ের প্রথম হিন্দু বিদ্যালয় তাদের ৫০ বছর পূর্ণ করেছে। দেশের শিক্ষা ও সংস্কৃতিকে এগিয়ে নিয়ে যাবার ব্যাপারে এই school network এর ভূমিকা খুবই প্রশংসনীয়। আমি এরসঙ্গে যুক্ত সকলকে অনেক অনেক ধন্যবাদ জানাই, এবং সেই ছাত্রদেরও বিশেষ তারিফ করি, যারা দেশের বীর সৈনিকদের জন্য অবদান রেখেছিল ।

বন্ধুরা , ভারতের প্রতিটি গ্রামে, প্রতিটি শহরে, এরকম কিছু না কিছু ঘটে চলেছে যা আমাদের প্রেরণা দেয়। অনেকসময়েই এই প্রয়াসগুলি নিয়ে বেশি চর্চা হয়না, কিন্তু যখন আমরা এগুলির বিষয়ে জানতে পারি, তখন তখন এই বিশ্বাসটিই আরো মজবুত হয় যে দেশ তার আপনজনেদের শক্তিতেই এগিয়ে চলেছে। আমি চাই, আপনারাও নিজেদের চারপাশে এইসব প্রয়াসগুলির প্রতি নজর রাখুন। সমাজের জন্য যাঁরা ভালো কাজ করছেন, তাঁদের চিনে রাখুন, তাঁদের প্রশংসা করুন, তাঁদের থেকে শিখুন, আর সম্ভব হলে নিজেরাও কোনো ভালো কাজের সঙ্গে যুক্ত হন।

আগামী মাসে 'মন কি বাত'এ আরো কিছু অনুপ্রেরণামূলক কাহিনী নিয়ে আপনাদের কাছে আসব। অনেক অনেক ধন্যবাদ। নমস্কার।