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प्यारे भाईयों और बहनों

आप सबका उत्साह और उमंग हिंदुस्तान में जो लोग टी.वी. देखते हैं, पूरे हिंदूस्तान को उमंग से भर देता है कि दूर फ्रांस में,पेरिस में,इस प्रकार से भारतीयों का उमंग और उत्साह से भरा हुआ माहौल भारत के सवा सौ करोड़ देशवासियों के लिए भी उमंग और आनंद का कारण बन जाता है। इसके लिए मैं आपका बहुत बहुत अभिनंदन करता हूं। आपका धन्यवाद करता हूं। मैं परसों रात यहां पहुंचा था। यह मेरा एक प्रकार से यहाँ आखिरी सार्वजनिक कार्यक्रम है और कल मैं यहां से जर्मनी जा रहा हूं। फ्रांस मैं पहले भी आया था,एक Tourist के रूप में। लेकिन आज आया हूं यहां से टूरिस्टों का India ले जाने के लिए। पहले आया था, एक जिज्ञासा ले करके, देखना चाहता था,फ्रांस कैसा है। आज आया हूं, एक सपना ले करके कि मेरा देश भी कभी इससे भी आगे कैसे बढ़ेगा।

आज मैं गया था,वीर भारतीयों ने जहां पर शहादत दी, उस युद्ध भूमि पर,उस युद्ध स्मारक को प्रणाम करने के लिए| मैं नहीं जानता हूं कि मेरे पहले भारत से और कौन-कौन वहां गया था। लेकिन, अगर मैं न गया होता, तो मेरे दिल में कसक रह जाती। एक दर्द रह जाता,एक पीड़ा रह जाती। दुनिया को पता नहीं है, हिंदुस्तान, यह त्याग और तपस्या की भूमि कही जाती है। वो त्याग और तपस्या जब इतिहास के रूप में सामने नज़र आती है, मैं उस भूमि पर गया, मेरे रोंगटे खड़े हो गए। पूरे शरीर में, मन में एक अलग-सा भाव जगने लगा और इतना गौरव महसूस होता था कि हमारे पूर्वज क्या महान परंपरा हमारे लिए छोड़ करके गए हैं। अपनों के लिए, खुद के लिए लड़ने वाले, मरने वाले, त्याग करने वाले बहुत हैं। लेकिन औरों के लिए भी कोई मर सकता है, ये तो सिर्फ प्रथम विश्व युद्ध की घटनाओं को याद करें तब पता चलता है। यह वर्ष प्रथम विश्व युद्ध की शताब्दी का वर्ष है। सौ साल पहले कैसा मानवसंहार हुआ था। उन यादों को फिर एक बार इतिहास के झरोखे से देखने की ज़रूरत है। युद्ध कितना भयानक होता है। मानवता के खिलाफ कितना हृदयद्रावक परिणाम होता है। इसलिए प्रथम विश्व युद्ध की शताब्दी हमारे भीतर युद्ध से मुक्त मानवता ,उसके संकल्प का ये वर्ष होना चाहिए। भारत में भी हमारे पूर्वजों के बलिदान की बातें बारीकी से नहीं बताई जातीं। कभी कभार तो इतिहास को भुला दिया जाता है। इतिहास, जो समाज भूल जाता है, वो इतिहास बनाने की ताकत भी खो देता है। इतिहास वो ही बना सकते हैं जो इतिहास को जानते हैं,समझते हैं।

दुनिया इस बात को समझे कि प्रथम विश्वयुद्ध में भारत के 14 लाख जवानों ने अपनी जिंदगी दांव पर लगाई थी। युद्ध के मैदान में उतरे थे। चार साल तक लड़ाई चली, लोग कैसे होंगे, मौसम कैसा होगा, प्रकृति कैसी होगी, पानी कैसा होगा, खान-पान कैसा होगा, कुछ पता नहीं था, लेकिन किसी के लिए वे लड़ रहे थे। अपने लिए नहीं, कोई भारत को अपने भू-भाग का विस्तार करना था, इसलिए नहीं, भारत कोई अपना विजय डंका बजाने के लिए निकला था, वो नहीं और वैसे भारत के पूरे इतिहास में ये नहीं है। हजारों साल का भारत का इतिहास, जिसमें आक्रमण का नामोनिशान नहीं है। फ्रांस के लोगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ाई लड़े थे। उस समय की अगर तस्वीरें देखें,मैंने आज कुछ तस्वीरें ट्वीट की हैं, जिसमें जब हिंदुस्तान के सैनिक युद्ध के लिए यहां पहुंचे थे तो फ्रांस की कोई महिला उनको फूल दे करके उनका स्वागत कर रही थी, वह उस समय की एक तस्वीर मैंने आज ट्वीट की है। कोई कल्पना करे कि 14 लाख सेना के जवान किसी के लिए बलिदान देने के लिए निकल पड़े | प्रथम विश्व युद्ध में करीब-करीब 75 हजार हिंदुस्तान के सैनिकों ने शहादत दी थी। ये अंक छोटा नहीं है। 75 हजार लागों की शहादत! और 11 तो ऐसे वीर पुरूष थे जिन्होंने Victoria cross का सर्वोपरि सम्मान प्राप्त किया था, अपनी वीरता के लिए, बलिदान की उच्च परंपराओं के लिए। फ्रांस की धरती पर, उसमें से 9 हजार लोग शहीद हुए थे और उनकी स्मृति में ये स्मारक बना हुआ है और आज वहां मैं सर झुकाने गया था। उन वीरों का आशीर्वाद लेने गया था और मैं दुनिया को एक संदेश देना चाहता था कि विश्व भारत को समझे। दुनिया भारत को देखने का नज़रिया बदले। ये कैसा देश है! जो अपने लिए नहीं औरों के लिए भी बलिदान देता है और इतनी बड़ी मात्रा में बलिदान देता है। इतना ही नहीं, United Nations बनने के बाद Peace keeping force बने हैं। आज भी दुनिया में ये बात गौरव से कही जाती है कि Peace keeping forces में सबसे ज्यादा अगर कोई योगदान देता है, तो हिंदुस्तान के सैनिक देते हैं..और Peace keeping force में, जिनके Discipline की, जिनके शौर्य की, जिनकी बुद्धिमता की तारीफ होती है, वो सेना के नायक भारत के होते हैं। वह देश, जिसने कभी कहीं आक्रमण न किया हो, हजारों साल में, जो देश प्रथम विश्व युद्ध में और द्वितीय विश्व युद्ध में, औरों के लिए जिसके लोग शहादत देते हों। जो देश, यूएन बनने के बाद Peace keeping force में लगातार सबसे अधिक अपने सैनिक भेज करके दुनिया में शांति के लिए अपनी पूरी ताकत खपा देता है और दूसरी तरफ दुनिया हमें क्या देती है? शांति का झंडा उठाकर चलने वाला ये देश, शांति के लिए जीने मरने वाला ये देश, United Nations में, Security Council में Seat पाने के लिए तरस रहा है।

दुनिया से मैं आग्रह करूंगा कि आज जब विश्व प्रथम विश्व युद्ध की शताब्दी में गुजर रहा है तब ये अवसर है, शांतिदूतों के सम्मान का। ये अवसर है, गांधी और बुद्ध की भूमि को उसका हक देने का। वो दिन चले गए, जब हिंदुस्तान भीख मांगेगा। ये देश अपना हक मांगता है, और हक, विश्व में शांति का संदेश बुद्ध और गांधी की भूमि जिस प्रकार से दे सकती है, शायद ही और कोई इतनी Moral Authority है, जो दुनिया को ये ताकत दे सके, संदेश दे सके। मैं आशा करता हूं कि यूएन अपनी 70वीं शताब्दी जब मनाएगा तो इन विषयों पर पुर्नविचार करेगा। इसलिए मैं आज विशेष रूप से उन वीर शहीदों को प्रणाम करने गया था, ताकि शांति के लिए हम सर कटा सकते हैं, ये दुनिया को पता चलना चाहिए और ये संदेश हम दुनिया को दें।

मैं आज ये भाषण तो पेरिस में आपके सामने कर रहा हूं, लेकिन मुझे बताया गया कि सैंकड़ों मील दूर, अलग-अलग टापुओं पर, जहां फ्रांस के नागरिक बसते हैं और जिसमें हिंदुस्तानी लोग भी बसते हैं। Reunion में लोग इकठ्ठे हुए हैं, वादालूप में लोग इकठ्ठे हुए हैं, मार्तेनिक में लोग इकठ्ठे हुए हैं, सेमार्ता में लोग इकठ्ठे हुए हैं और वहां करीब करीब ढाई लाख से भी ज़्यादा हिंदुस्तानी लोग बसते हैं। मैं इतनी दूर बैठे हुए आप सबको भी यहां से प्रणाम करता हूं और मैं जानता हूं कि यहां बैठे हुए तो शायद हिंदी समझ लेते हैं, आप भारतीय होने का गर्व करते हैं, लेकिन फ्रैंच भाषा से अधिक किसी भाषा से परिचित नहीं हैं। Simultaneous फ्रैंच भाषा में Translation चल रहा है, वो जो दूर टापुओं पर बैठे हैं, उनको फ्रैंच भाषा में सुनने का अवसर मिला है, ऐसा मुझे बताया गया है। मैं उन सभी भारतवासियों को इस कार्यक्रम में शरीक होने के लिए, उनका अभिनंदन करता हूं और आपको मैं विश्वास दिलाता हूं कि आप अगर हिंदुस्तानी भाषा नहीं जानते हैं, बहुत साल पहले आप हिंदुस्तान से बाहर निकल चुके हैं, पासपोर्ट के रंग बदल गए होंगे, लेकिन मेरे और आपके खून का रंग नहीं बदल सकता। भारत आपकी चिंता पासपोर्ट के रंग के आधार पर नहीं करता, मेरे और आपके डीएनए के आधार पर करता है, मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूं। इसको हमने बखूबी शुरू भी किया है। इस बार जो प्रवासी भारतीय दिवस मनाया गया क्योंकि ये वर्ष प्रवासी भारतीय दिवस का वो वर्ष है,जब महात्मा गांधी को साउथ अफ्रीका से हिन्दुस्तान लौटने का शताब्दी वर्ष है। 1915 में गांधी जी साउथ अफ्रीका से भारत वापस लौटे थे और ये 2015 है जो शताब्दी वर्ष है और उस शताब्दी में प्रवासी भारतीय दिवस, गांधी वापस आ करके, जहां उन्होंने आंदोलन की शुरूआत की थी, उस गुजरात के अंदर वो कार्यक्रम हुआ था। हर बार के प्रवासी भारतीय दिवस के अपेक्षा इस बार एक विशेषता थी और ये विशेषता थी, कि पहले भी कई प्रकार के कार्यक्रम होते थे, कई प्रकार की मीटिंग होती थी, लेकिन पहली बार फ्रेंच भाषा जानने वालों का अलग कार्यक्रम किया गया था। उनके साथ अलग विचार विमर्श किया गया था। उनकी समस्याओं को अलग से समझा गया था और उन समस्याओं के समाधान खोजने के प्रयास भी जारी कर दिए गए हैं।

मैं जानता हूं, फ्रांस में कुछ Professionals हैं जो अभी अभी आए हैं। जो हिंदुस्तान की कई भाषा जानते हैं, हिंदुस्तान को भली भांति जानते हैं, कुछ लोग इसके पहले आए, विशेषकरके पांडिचेरी से आए, उनका भी ज्यादा नाता यहां हो गया है, वहां थोड़े बहुत, कम अधिक मात्रा में रहा है। लेकिन कुछ उससे भी पहले आए हैं, जिनके पास कोई Document तक नहीं है। कब आए, कैसे आए, किस जहाज में आए, कहां ठहरे, कुछ पता नहीं है। लेकिन इतना उनको पता है कि वो मूल भारतीय हैं और हमारे लिए इतना रिश्ता काफी है। मैं चाहूंगा कि उन चीज़ों को हम फिर से कैसे अपने आप को जोड़ें। कभी कभार जब भाषा छूट जाती है, परंपराओं से अलग हो जाते हैं, नाम बदल जाते हैं तो सदियों के बाद आने वाली पीढि़यों के लिए परेशानी हो जाती है कि पता नहीं हम कौन थे, कोई हमें स्वीकार क्यों नहीं करता है। यहां वालों को लगता है कि तुम यहां के तो हो ही नहीं, बाहर वाले को हम बता नहीं पाते, हम कहां से हैं। एक बार मेरे साथ एक घटना घटी, गुजरात में वेस्ट इंडीज की क्रिकेट टीम खेलने के लिए आई थी, तो क्रिकेट का मैच था, तो उस जमाने में तो मोबाइल फोन वगैरह नहीं थे। एक सज्जन का मेरे यहां टेलीफोन आया। मैं आरएसएस हेडक्वार्टर पर रहता था और फोन आया कि वेस्टइंडीज क्रिकेट टीम के मैनेजर आपसे मिलना चाहते हैं। मेरे लिए बड़ा Surprise था। मैं एक बहुत सामान्य, छोटा सा व्यक्ति.. मैं कोई तीस साल पहले की बात कर रहा हूं। 30-35 साल हो गए होंगे। वेस्टइंडीज क्रिकेट टीम का मैनेजर, उस जमाने में तो क्रिकेटर से हाथ मिलाना, यानी ये भी एक जीवन का सौभाग्य माना जाता था। मैंने तुरंत उनसे संपर्क किया। उन्होंने कहा- मेरा नाम रिखि है, मैं वेस्टइंडीज से आया हूं और वेस्टइंडीज में फलाने फलाने आदमी ने आपका reference दिया है। मैंने कहा, ज़रूर मैं आपसे मिलने आता हूं। उन्होंने रिखि कहा तो मुझे समझ नहीं आया, वो है क्या चीज़, किस परंपरा से हैं, किस समाज से हैं। मैं गया तो वे तो बिल्कुल हिंदुस्तानी जैसे लगते थे और उनकी पत्नी भी साड़ी वगैरह पहन करके बैठी थी। मैंने कहा, ये रिखि ? उन्होंने कहा कि पता नहीं ये नाम हमारा कैसे बना है, लेकिन मेरी पत्नी का नाम बोले, सीता है और बोले हम डेढ़ सौ साल, दो सौ पहले हमारे पूर्वज गए थे, तो हो सकता है, मेरे नाम के साथ ऋषि शब्द होना चाहिए। अपभ्रंश होते होते रिखि हो गया है और बोले मैं वहां Government में Education विभाग में अफसर हूं और टीम मैनेजर के रूप में मैं यहां आया हूं। खैर मैंने दूसरे दिन उनका एक स्वागत समारोह रखा और बड़े वैदिक परंपरा से उनका सम्मान स्वागत किया। लेकिन तब मेरे मन में विचार आया कि अगर हम, हमारी जो मूल परंपरा है, उससे अगर नाता छूट जाता है, अब आप देखिए Mauritius जाएं तो हमें कभी भी वहां कठिनाई महसूस नहीं होती क्योंकि Mauritius जब लोग गए तो साथ में हनुमान चालीसा ले गए और तुलसीकृत रामायण ले गए तो डेढ़ सौ-दो सौ साल उसी के आधार पर वे भारत से जुड़े रहे। उसका गान करते रहे। भाषा को समझते रहे। लेकिन वेस्टइंडीज की तरफ जाओ आप, Guyana वगैरह में तो भाषा भूल चुके हैं, क्योंकि पहुंची नहीं भाषा, लेकिन अंग्रेज़ी के कारण थोड़ी बहुत Connectivity रहती है। आपके नसीब में तो वो भी नहीं है। इसलिए जो भी अपने आप को इस परंपरा की विरासत के साथ जोड़ता है, उसे कोई न कोई संपर्क रखना चाहिए।

मैं इस प्रकार से उत्सुक सभी परिवारों से कहता हूं कि अब तो इंटरनेट का जमाना है, सोशल मीडिया का जमाना है और मैं बहुत easily available हूं, अगर आप इन विषयों में भारत सरकार को अगर लिखेंगे, मेरी website पर अगर आप चिठ्ठी डाल देंगे, तो मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि आपको भाषा की दृष्टि से, परंपराओं की दृष्टि से, भारत से या मूल किस राज्य से आपका संबंध होगा, वो अगर खोजना होगा तो हमारी तरफ से मदद करने का पूरा प्रयास रहेगा क्योंकि ये नाता हमारा बनना चाहिए। मैंने पूछा यहां पर तो बोले कि Movie तो हिंदुस्तान की देखते हैं, लेकिन जब तक नीचे फ्रैंच भाषा में Caption नहीं आता, समझ नहीं आती। एक बार मैं Caribbean countries में एक स्थान पर गया था। जिस दिन मैं वहां पहुंचा, वहां कहीं एक मूल भारतीय परिवार में किसी का स्वर्गवास हुआ था और जिसके यहां मैं रूकने वाला था, वे एयरपोर्ट लेने नहीं आए, कोई और आया, तो मैंने पूछा क्यों भई क्या हुआ? तो बोले कि हमारे परिचित थे, उनका स्वर्गवास हो गया तो वो वहां चले गए हैं, तो मैंने कहा कि ठीक है, मैं भी चलता हूं वहां। हम यहां आए हैं, आपके परिचित हैं तो हम भी चले जाते हैं। हम वहां गए तो, मैंने जो दृश्य देखा बड़ा हैरान था। वहां उनके अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही थी, भारतीय परंपरा से Dead body को ले जाना था, लेकिन एक हिंदी फिल्म का गाना बज रहा था और परिवार के सारे लोग रो रहे थे। गाने के शब्दों को और उस घटना को पूरा 180 डिग्री Contrast था। शोक और मृत्यु से उसका कोई लेना देना नहीं था। लेकिन उस गाने में थोड़ा Sadness थी, गाने में तो उनको लग रहा था कि मृत्यु के बाद ये ठीक है, तो वो वही बजाते थे और वे रो रहे थे। तो मेरे मन में विचार आया कि कम से कम, अब उस जमाने में तो वीडियो था नहीं, लेकिन मुझे लगा कि हिंदी फिल्म Song हो तो उसको अपनी Language में Transliteration भेजना चाहिए, क्योंकि उनको समझ में आना चाहिए शब्द क्या हैं ।कोई मेल नहीं था, पर चूंकि वो भारतीय परंपरा से अग्नि संस्कार वगैरह करने वाले थे, लेकिन उनके लिए ये लिंक टूट जा रहा था। ये अपने आप में बड़ी कठिनाई थी। मैं समझता हूँ कि जो दिकक्त Caribbean countries में अनुभव करते हैं, शायद इस भू-भाग में भी वो समस्याएं हैं और मैं समझता हूँ कि उन समस्याओं का समाधान भारत और आपको मिलकर के प्रयास करना चाहिए और मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आगे भी हमारा संबंध और भी गहरा बने, सरल बने और आने वाली पीढ़ियों तक कैसे सरल बने उसके लिए जो कुछ भी करना होगा, विशेषकर के इन टापुओं पर जो मुझे आज सुन रहें हैं उनकी सबसे ज्यादा कठिनाई है। बड़े स्थान पर रहने वालों को शायद इतनी कठनाई नही होती होगी लेकिन जो दूर छोटे-छोटे टापुओं पर बसे भारतीय लोग हैं उनके लिए मेरा यह प्रयास रहेगा कि आने वाले दिनों में उनकी किस रूप में मदद हो सकती है।

आप देख रहें हैं कि पिछले वर्ष भारत में चुनाव हुआ, चुनाव भारत में था लेकिन नतीजों के लिए आप ज्यादा इन्तेजार करते थे | पटाखे यहां फूट रहे थे। मिठाई यहां बांटी जा रही थी, यह जो आनंद था आपके मन में वो आनंद अपेक्षाओं के गर्व में से पैदा हुआ था| उसके साथ अपेक्षाएं जुड़ी है और मैं आपको विश्‍वास दिलाता हूं कि जन आशाओं, आकांक्षाओं के साथ हिंदुस्‍तान की जनता ने भारत में सरकार बनाई है पिछले दस महीने का मैं अनुभव से कह सकता हूं कि यह सारे सपने साकार होंगे। मैं अनुभव से कह सकता हूं.. अब मैं किताबी बात नहीं कर रहा हूं। किसी अखबार के Article के द्वारा प्राप्‍त की हुई जानकारी के आधार पर नहीं कह रहा हूं। मैं अनुभव से कह रहा हूं कि हिंदुस्‍तान को गरीब रहने का कोई कारण ही नहीं है।

स्‍वामी विवेकानंद ने कहा था कि मैं मेरी आंखों के सामने देख रहा हूं कि मेरी भारत माता एक बार जगत गुरू के स्‍थान पर विराजमान होगी और मेरी विवेकानंद में बहुत श्रद्धा है। विवेकानंद जी 1895 में फ्रांस आए थे और दोबारा 1900 में आए थे। दोनों बार आए, एक बात उन्‍होंने बड़े मजेदार कही थी, उन्‍होंने कहा था कि फ्रांस यह यूरोप की सभ्‍यता का नेतृत्‍व उसके हाथ में है और उन्‍होंने कहा कैसा, उन्‍होंने कहा जैसे गंगा की पहचान गौमुख से होती है, वैसे यूरोपीय सभ्‍यता की पहचान फ्रांस से होती है। यह वो भूमि है, जहां स्‍वयं महात्‍मा गांधी 31 में आए थे। यह भूमि है जहां मैडम कामा, श्‍याम जी कृष्‍ण वर्मा, जो आजादी के लड़ाई में नेतृत्‍व करना जो एक बहुत बड़ा तबका था वो इसी धरती पर रहता था लम्‍बे अरसे तक और पहला तिरंगा उसका निर्माण कार्य फ्रांस की धरती पर हुआ था और जर्मनी में फहराया गया था।

मैडम कामा, सरदार श्री राणा और श्‍याम जी कृष्‍ण वर्मा यह त्रिकुटी उस समय हिंदुस्‍तान की क्रांति का नेतृत्‍व करते थे। आज भी मुझे इस बात का गर्व है कि मैं मुख्‍यमंत्री बनने के बाद एक कार्य करने का मुझे सौभाग्‍य मिला। वैसे बहुत से अच्‍छे काम जो है वो मेरे लिए बाकी रहे है, वह मुझे ही पूरे करने है। श्‍याम जी कृष्‍ण वर्मा जिन्‍होंने हिंदुस्‍तान में आजादी की और उसमें भी क्रांतिकारी क्षेत्र में काम करने की दिशा में एक अलख जगाई थी। London में अंग्रेजों की नाक के नीचे उन्‍होंने India House बनाया था और वीर सावरकर, सभी क्रांतिकारियों को वो Scholarship देकर यहां बुलाते थे और उनको तैयार करते थे। बहुत बड़ा उनका काम था। 1930 में उनका स्‍वर्गवास हुआ। आजादी की लड़ाई में बड़ा नेतृत्‍व करने वाले व्‍यक्ति थे। उन्‍होंने एक चिट्ठी लिखी कि मेरे मरने के बाद मेरी अस्थि संभालकर रखी जायें। मैं तो जीते जी आजाद हिंदुस्‍तान देख नहीं पाया, लेकिन मेरे मरने के बाद जब भी हिंदुस्‍तान आजाद हो मेरी अस्थि हिंदुस्‍तान जरूर ले जाई जायें। देखिए देशभक्ति, देशभक्ति करने वालों का दिमाग किस प्रकार से काम करता है और वो सोचते थे। 1930 में उनका स्‍वर्गवास हुआ। 2003 में जब मैं गुजरात में मुख्‍यमंत्री था। 2001 में मुख्‍यमंत्री बना फिर मैंने लिखा-पट्टी शुरू की। स्विट्ज़रलैंड को लिखा, जिनेवा में कोशिश की, भारत सरकार को लिखा। 2003 में मुझे अनुमति मिली। उनकी मृत्‍यु के 70 साल के बाद मैं जिनेवा आया, उनकी अस्थि रखी थीं, देखिए विदेशी लोग भी भारत के एक व्‍यक्ति जिसकी अपेक्षा थी मेरी अस्थि संभालकर रखना, हिंदुस्‍तान को तो 15 अगस्‍त को आजाद होने के दूसरे दिन ही यहां आ जाना चाहिए था, लेकिन भूल गए, हो सकता है कि यह पवित्र काम मेरे हाथ में ही लिखा होगा, तो मैं यहां आया और उनकी अस्थि लेकर के गया और कच्‍छ मांडवी जहां उनका जन्‍म स्‍थान था वहां India House की replica बनाई है और एक बहुत बड़ा उनका शहीद स्‍मारक बनाया है। आपको भी कच्‍छ की धरती पर जाने का सौभाग्‍य मिले तो आप जरूर उस महापुरूष को नमन करके आना। कहने का तात्‍पर्य यह है कि हमारी फ्रांस की धरती पर भारत के लिए काम करने वाले, सोचने वाले आजादी के दीवाने भी इस धरती पर से अपना प्रयास करते रहते थे।

भारत का और फ्रांस का एक विशेष संबंध रहा है। इन दिनों मैं यह अनुभव करता हूं कि फ्रांस में कोई दुर्घटना घटे, अगर आतंकवादी घटना फ्रांस में होती है, तो पीड़ा पूरे हिंदुस्‍तान को होती है और हिंदुस्‍तान के साथ कोई अन्‍याय हो, तो फ्रांस से सबसे पहले आवाज उठती है। फ्रांस का और भारत का यह नाता है। कल से आज तक हमने कई बड़े महत्‍वपूर्ण फैसले किए हैं, बहुत सारे समझौते किए हैं, उसमें रक्षा के क्षेत्र में बहुत महत्‍वपूर्ण किए, विकास के लिए बहुत महत्‍वपूर्ण किए। और भारत में इन दिनों एक विषय लेकर के चल रहा हूं ‘मेक इन इंडिया’। मैं दो दिन में ज्‍यादा से ज्‍यादा दस बार ‘मेक इन इंडिया’ बोला हूं शायद। लेकिन फ्रांस का हर नेता 25-25 बार ‘मेक इन इंडिया’ बोला है। यहां के राष्‍ट्रपति हर तीसरा वाक्‍य मेक इन इंडिया कहते हैं। यानी कि हमारी बात सही जगह पर, सही शब्दों में पहुंच चुकी है| हर किसी को लग रहा है और इसलिए भारत ने बड़े महत्‍वपूर्ण initiative लिये हैं। Insurance में हमने FDI के लिए 49% open up कर दिया है, रेलवे में 100% कर दिया है। फ्रांस defense के क्षेत्र में बहुत बड़ी भूमिका अदा कर सकता है। भारत के पास आज मानव बल है। मैं आज एयरबस को देखने गया था उसके कारखाने पर, वहां भी मैं देख रहा था सारे Indian लोग काम कर रहे थे। तों मैंने कहा वहां तो बस में काम करते हो, यहां एयरबस में काम करते हो। भारत में बहुत अवसर है मित्रों और इसलिए विश्‍व में जो भी श्रेष्‍ठ है वो हिंदुस्‍तान की धरती पर होना चाहिए और उससे भी आगे जाना चाहिए। फ्रांस में इस बार जो समझौते हुए।

एक जमाना था जब हम रेलवे का वर्णन करते थे, तो यह कहते थे यह देश को जोड़ता है। लेकिन मैं मानता हूं कि रेलवे की ताकत है सिर्फ हिंदुस्‍तान को जोड़ने की नहीं, हिंदुस्‍तान को दौड़ाने की ताकत है। बशर्ते कि हम रेलवे को आधुनिक बनाएं। Technology upgrade करें, speed बढ़ाए, expansion करे, और फ्रांस के पास Technology expertise है। कल मैं यहां रेलवे के अधिकारियों से मिला था। मैंने कहा आइये यहां भारत में बहुत सुविधाएं हैं और मैंने कहा हमारे यहां तो शहर के बीच से रेल निकलती है। सबसे मूल्‍यवान जमीन उस पर से रेल की पटरी चल रही है। तो मैंने कहा नीचे रेल चलती रहे तुम ऊपर पूरा construction करो, सात मंजिला इमारतें खड़ी करो। वहां Mall हो, Hotel हो, क्‍या कुछ न हो। देखिए कितना बड़ा हो सकता है, भारत के रेलवे स्‍टेशनों पर एक-एक शहर बसाया जाए, इतने बड़े-बड़े 20-20 किलोमीटर लंबे स्‍टेशन हैं। और जब मैंने यहां कहा, मैंने कहा मेरे देश की रेलवे इतनी बड़ी है कि 20% फ्रांस एक ही समय रेल के डिब्‍बे में होता है।

दुनिया के लोगों को भारत की जो विशालता है, इसकी भी पहचान नहीं है। उसकी क्षमताओं की पहचान की बात तो बाद की बात है हमारी कोशिश है कि दुनिया हमें जाने, हमें माने और वो दिन दूर नही है दोस्तों विश्वास कीजिए कि विश्व भारत को जानेगा भी और विश्व भारत को मानेगा भी। इन दिनों जितने भी आर्थिक विकास के पैरामीटर की चर्चा आती है, उन सारे पैरामीटर्स में सारी दुनिया यह कह रही है कि भारत की economy विश्व की सबसे तेज गति से आगे बढ़ने वाली economy मानी गई है। आप World Bank का record देख लीजिए, आप IMF का record देख लीजिए। अभी-अभी Moody ने बताया, मोदी ने नहीं। हर पैरामीटर, हर जगह से एक ही आवाज उठ रही है कि हिंदुस्‍तान आज दुनिया की सबसे तेज गति से आगे बढ़ने वाली economy है। तो फिर मैं दुनिया को इतना ही कहता हूँ कि फिर इंतजार किस बात का? अवसर है और इस अवसर का फायदा उठाने के लिए दुनिया में स्‍पर्धा का माहौल बने वो हमारी कोशिश है। दुनिया के हर प्रकार के लोग आएं कि हां! देखिए हम यह करना चाहते हैं, आइये हम आपको अवसर देंगे। हम भी आगे बढ़ेंगे आप भी आगे बढि़ए। विकास के लिए अनेक संभावनाएं हैं। लेकिन यह विकास के मूल में यह इतने Foreign Direct Investment आएं, हिंदुस्‍तान में रेलवे को काम हो, हिंदुस्‍तान में युद्ध के जहाज बनें, हिंदुस्‍तान के अंदर युद्ध के लिए submarine बने, युद्ध के अंदर Health सेक्टर के लिए equipment manufacturing हो, यह सारा काम जो हम करना चाहते हैं, क्‍यों? इसका मूल कारण है मैं चाहता हूं कि हिंदुस्‍तान के नौजवान को हिंदुस्‍तान की धरती पर रोजगार मिले। उसकी क्षमता, उसकी योग्‍यता के अनुसार उसको काम का अवसर मिले। मैं नहीं चाहता हिंदुस्‍तान के नौजवान को अपने बूढ़े मां-बाप को अपने गांव छोड़कर के रोजी-रोटी के लिए कहीं बाहर जाना पड़े, मैं नहीं चाहता। हम देश ऐसा बनाने चाहते हैं और इसलिए विकास गरीब से गरीब व्‍यक्ति की भलाई के लिए हो। विकास नौजवान के रोजगार के लिए हो।

मैं यहां की कंपनी वालों को समझा रहा था। मैंने कहा देखिए दुनियाभर में आपको कारखाने लगाने के लिए बहुत सारे incentives मिलते होंगे, लेकिन 20 साल के बाद वहां काम करने के लिए आपको कोई इंसान मिलने वाला नहीं है। सारी दुनिया बूढ़ी होती चली जा रही है। एक अकेला हिंदुस्‍तान है जो आज दुनिया का सबसे नौजवान देश है। 65 प्रतिशत जनसंख्‍या Below 35 है। 20 साल के बाद दुनिया को जो work force की जरूरत है वो work force एक ही जगह से मिलने वाला है और उसका पता है हिंदुस्‍तान| तो दुनिया के बड़े-बड़े उद्योगकार विश्‍व के किसी भी कोने में कारखाना क्यों न लगाते हो लेकिन वो दिन दूर नहीं होगा तो उनकों कारखाना चलाने के लिए इंसान के लिए हिंदुस्‍तान को धरती पर आना पड़ेगा, तो मैं उनको समझा रहा हूं, मैं उनको समझा रहा हूं कि 20 साल के बाद खोजने के लिए आओगे उससे पहले अभी आ जाओ भाई। तो हमारे लोग आपके काम के लिए तैयार हो जाएंगे तो दुनिया के किसी भी देश में आपका कारखाना संभाल लेंगे। हमारे पास Demographic dividend है।ये हमारी बहुत बड़ी ताकत है।

भारत और फ्रांस का नाता लोकतांत्रिक मूल्‍यों के कारण भी है। बुद्ध और गांधी की धरती पर पैदा होने वाले हम लोग जन्‍म से एक मंत्र में जुड़े हुए हैं। ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ |पूरा विश्‍व एक परिवार है, यह हमारे संस्‍कारों में है... पूरा विश्‍व एक परिवार है। हर किसी को हम अपना मानते हैं| हम किसी को पराया नहीं मानते और यह फ्रांस की धरती है जहां इसका मंत्र आज भी गुनगुनाती है दुनिया, जहां पर स्‍वतंत्रता, समानता और बंधुता की चर्चा हुई है। दोनों मूल्‍यों में एक ही समानता है और इसलिए दोनों मिलकर बहुत कुछ कर सकते हैं। ये ताकत है इसके अंदर है। और हम आने वाले दिनों में इस ताकत के आधार पर आगे बढ़ेंगे।

इस बार एक महत्‍वपूर्ण निर्णय हुआ है कि जो हिंदुस्‍तान के नौजवान यहां पढ़ने के लिए आते हैं और पढ़ाई के बाद बोरिया बिस्तर लेकर जाओ वापस, वो दिन गए। अब आपका मन यहां लग गया है तो आप यहां रह सकते हैं। आपको पढ़ाई के बाद भी कुछ समय मिलेगा यहां पर काम करने के लिए। फ्रांस सरकार के साथ, फ्रांस ने इस बात को माना है, मैं समझता हूं भारतीय नागरिकों के लिए खासकर युवा पीढ़ी के लिए जो पढ़ने के लिए यहां आते हैं, उनके लिए यह बहुत बड़ा अवसर है। यहां पर आने के बाद, पढ़ने के बाद जो कुछ भी उन्‍होंने सीखा है, जाना है उसको Experience करने के लिए और अधिक Practice के लिए, रोजी-रोटी कमाने के लिए, पढ़ाई का खर्चा निकालने के लिए भी ताकि घर पर जाकर कर्ज न ले जाएं, सारी सुविधा बढ़ेगी| मैं समझता हूं इससे आने वाले दिनों में लाभ होने वाला है। तो विकास की नई ऊंचाईयों पर एक बार पहुंचना है | विश्‍व भर में हमारे फैले हुए भारत के भाई बहनों के बारे में उनकी ताकत को भी उपयोग करना है, उनको सुरक्षा भी देनी है। उनके सम्‍मान के लिए भी भारत की जो आज पहुंच है, उसका बारीकी से उपयोग करना है उस दिशा में हम प्रयास कर रहे हैं और इस प्रयास को विश्‍व, विश्‍व साहनु को प्रतिषाद दे रहा है।

पिछले दिनों में भारत में ऐसी घटनाएं घटीं हैं जो सामान्‍य तौर पर हमारे देश में सोचा ही नहीं जा सकता और सुने तो भरोसा नहीं हो पाता है। क्‍योंकि दूध का जला जो रहता है न वो छांछ भी फूंक-फूंक कर पीता है। हमने इतना बुरा सुना है, इतना बुरा देखा है कि कभी-कभी अच्‍छा पर भरोसा करने में थोड़ी देर लग जाती है। आपने अभी-अभी देखा होगा कोयले का कारोबार, समझ गए, सबको पता है क्‍या-क्‍या हुआ सब मालूम है। अभी क्‍या हुआ है ये मालूम नहीं होगा। देखिए अच्‍छी बात को पहुंचाने के लिए मुझे रु-ब-रू जाना पड़ता है। 204 कोयले की खदान वो ऐसी ही दे दी थी। ऐसे ही, अच्‍छा-अच्छा आज आप आये हैं ठीक है मेरी पेन लेते जाओ, अच्‍छा अच्‍छा आज आप आये हैं ठीक है मेरा यह Handkerchief ले जाओ। अच्‍छा अच्‍छा यह कागज चाहिए ठीक है कोई बात नहीं ले जाओ। आप शायद पेन भी अगर किसी को देंगे तो 50 बार सोचोगे या नहीं सोचोगे। ऐसे ही पैन देते हो क्‍या, 204 कोयले की खदाने ऐसे ही दे दी गई थी, दे दी गई थी। बस !! अरे भई जरा दे देना, कोई पूछने वाला नहीं था कोई। तूफान खड़ा हो गया, Court के मामले बन गए। प्रधानमंत्री तक के नाम की चर्चा होने लगी, पता नहीं क्‍या कुछ हुआ। मैं उस दिशा में जाना नहीं चाहता और न ही मैं यहां किसी की आलोचना करना चाहता हूं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने डंडा चलाया। लेकिन हमारा नसीब ऐसा कि हमारे आने के बाद चलाया। सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि इन 204 खदानों में से अब आप कोयला नहीं निकाल सकते हैं। अब कोयला नहीं निकलेगा तो बिजली का कारखाना कैसे चलेगा। बिजली का कारखाना नहीं चलेगा तो बिजली कहां से आएगी। बिजली नहीं आएगी तो और कारखानें कैसे चलेंगे| बिजली नहीं आएगी तो बच्‍चे पढ़ेंगे कैसे। सारा अंधेरा छाने की नौबत आ गई। सुप्रीम कोर्ट ने हमें मार्च तक का समय दिया कि ठीक है भले तुम नये आये हो हम कुछ सुनने को तैयार नहीं हैं 31 मार्च से पहले जो करना है करो, वरना 01 अप्रैल से 01 ग्राम भी कोयला नहीं निकाल सकते हो। हम नए थे, लेकिन जब चुनौतियां आती हैं तो भीतर से एक नई ऊर्जा भी पैदा होती है। जब मैं सोच रहा था कि 01 अप्रैल के बाद मेरे देश का क्‍या हाल हो सकता है, गाड़ियां रूक जाएंगी, बिजली नहीं होगी, कोयला नहीं होगा, कारखाने बंद हो जाएंगे, लोग बेरोजगार हो जाएंगे, अंधेरा छा जाएगा, बच्‍चे पढ़ाई नहीं कर पाएंगे। क्‍या देश को 01 अप्रैल तक इंतजार करते हुए बर्बाद होने देना है। मेहनत करना शुरू किया सितंबर में, रास्‍ते खोजने शुरू किए और 31 मार्च से पहले-पहले हमने प्राथमिक काम पूरा कर दिया। पहले तो मुफ्त में दे दी गई थी ठीक है, ठीक है ले जाओ, अच्‍छा –अच्‍छा आपको चाहिए रख लो , दे दिया ऐसे ही दे दिया था। हमने तय किया कि उसका Auction करेंगे और सीएजी का रिपोर्ट आया था सीएजी ने कहा था कि कोयले में One Lakh 76 Thousand Crore Rupees का घपला हुआ है। तो ये जब आंकड़े आते थे न अखबार में 176000 तो लोग मानने के लिए तैयार नहीं होते थे कि ऐसा भी कोई हो सकता है क्‍या कोई मानता नही था। हम बोलते तो थे लेकिन हमको भी भीतर से होता था कि नही यार पता नहीं लेकिन जब हमने Auction किया 204 कोयले की खदान में से अभी 20 का ही Auction हुआ है, 20 का ही है और 20 के Auction में दो लाख करोड़ रूपये मिले हैं। 204 के लिए एक लाख 76 हजार करोड़ रूपये का आरोप था अभी तो दस percent काम हुआ है और दो लाख करोड़ रूपया देश के खजाने में आया है। मेरे देशवासियों कोई सरकार अपने पूरे कार्यकाल में ये भी काम कर दे न तो भी 25 साल देश कहेगा कि अरे भाई तुम ही देश चलाओ। इतना बड़ा काम हुआ है और इसलिए जिनको कहा था न हां ले जाओ, ले जाओ , वो सब परेशान है। क्‍योंकि अब उनको जेब से पैसा देना पड़ रहा है सरकार के खजाने में जा रहा है और ये पैसा दिल्‍ली की सरकार की तिजोरी में डालने के लिए मैं नहीं सोचा, हमने सोचा यह पैसा राज्‍यों की तिजोरी में जाएगा और राज्‍यों से कहा कि गरीबी के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए infrastructure का विकास किया जाए। उद्योगों को लगाया जाए, शिक्षा में सुधार किया जाए, आरोग्‍य की सेवाओं में सुधार किया जाए और राज्‍यों पर दबाव डाला हुआ है कि इसको कीजिए और राज्य भी कौन से हैं। गुजरात में कोयले की खदान नहीं है। वरना मैं ये देता तो अखबार वाले लिखते मोदी कोयले के खदान के पैसे राज्‍यों इसलिए देता है क्‍योंकि कोयला गुजरात में था। गुजरात में एक ग्राम कोयला भी नहीं निकलता है। ये कोयले के पैसे जा रहे हैं बिहार को, ओडिशा को, झारखंड को, पश्चिम बंगाल को, उन राज्‍यों में जाएंगे जहां पर विकास की संभावनाएं हैं लेकिन अभी काफी पीछें हैं उनको मुझे आगे ले जाना हैं।

देश का पूरा पूर्वी हिस्‍सा आप हिन्‍दुस्‍तान का नक्‍शा देखिए पश्चिम के तौर पर कुछ न कुछ दिखता है गोवा हो, कर्नाटक हो, महाराष्‍ट्र हो, राजस्‍थान हो, गुजरात हो, हरियाणा हो कुछ न कुछ दिखता है लेकिन जैसे पूरब की ओर जाएं तो हमें दिखता है कि ये इलाका कब आगे बढ़ेगा जो पश्चिम में आगे बढ़ा है, सबसे पहले मेरा मन का सपना है पूरब के इस इलाके को पश्चिम के बराबर में तो ला दूं । फिर आप देखिए पूरब, पश्चिम से भी आगे निकल जाएगा ये इतनी ताकत है पूरब में। सारी प्राकृति सम्‍पदा के वहां भंडार वहां पड़े हुए हैं। एक बार विकास की दिशा में अगर चल पड़े तो फिर गाड़ी अटकने वाली नहीं है। कहने का तात्‍पर्य यह है साथियों कि देश विकास की नई ऊंचाईयों को पार करता हुआ आगे बढ़ता चला जा रहा है।

हमने प्रधानमंत्री जन धन योजना का कार्यक्रम शुरू किया। 15 अगस्‍त को मैंने घोषित किया और हमने कहा था कि 26 जनवरी तक मुझे पूरा करना है। हिन्‍दुस्‍तान में गरीब से गरीब व्‍यक्ति का बैंक का खाता होना चाहिए। बैंकिंग व्‍यवस्‍था आज के युग में Finance की गतिविधि की मुख्‍यधारा है उससे कोई अछूता नहीं रहना चाहिए और मैं बड़े गर्व के साथ कहता हूं डेढ़ सौ दिन के भीतर-भीतर इस देश में ये काम पूरा हो गया । करीब 14 करोड़ लोगों के नए खाते खुल गए। 14 करोड़ लोगों के, यानी फ्रांस की जनसंख्‍या से भी ज्‍यादा। अब आप देखिए कोई काम करना तय करे कि कैसे हो सकता है, उसके बाद हमने कहा कि हिन्‍दुस्‍तान में घर के अंदर जो गैस सिलेंडर जो होते हैं वो सब्सिडी से मिलते हैं। उसमें भी सरकार सब्सिडी देती है। हमने कहा यह सब्सिडी हम सीधी बैंक Account में जमा करेंगे। आप समझ गए ना कि बैंक Account में सीधी क्‍यों दी गई क्‍योंकि पहले कहीं और जाती थी और दुनिया में सबसे बड़ी घटना हैं, दुनिया में सबसे बड़ी घटना है, 13 करोड़ लोगों के बैंक खाते में सीधी गैस सब्सिडी Transfer हो गई उनके खातों में, खाते में जमा हो गई और उसके कारण बिचौलिए बाहर, leakages बंद, Corruption का नामोनिशान नहीं है और सामान्‍य मानविकी को लाभ हुआ या नहीं हुआ।

इसके बाद ये जमाना कैसा है कोई कुछ छोड़ने को तैयार होता है क्‍या, कोई छोड़ता है क्‍या, नहीं छोड़ता। लाल बहादुर शास्‍त्री ने एक बार देश को कहा था जब भारत-पाक की लड़ाई हुई थी तब लाल बहादुरी शास्‍त्री जी ने कहा था कि एक समय खाना छोड़ दीजिए, सप्‍ताह में एक दिन खाना छोड़ दीजिए, एक टाइम। हर सोमवार उन्‍होंने बताया सोमवार को एक समय ही खाना कीजिए, दो समय मत खाइये। और लाल बहादुर शास्‍त्री ने जब कहा था हिंदुस्‍तान की उस पीढ़ी को याद होगा, पूरा हिंदुस्‍तान सप्‍ताह में एक दिन एक समय खाना नहीं खाता था| क्‍यों? क्‍यों‍कि देश लड़ाई लड़ रहा था, अन्‍न बचाना था। और देश ने लाल बहादुर शास्त्री के शब्‍दों पर भरोसा करके खाना छोड़ दिया था। मेरे मन में विचार आया कि इस देश के लोगों में एक अद्भुत ताकत है। इस देश की जनता पर भरोसा करना चाहिए। हिंदुस्‍तान के नागरिकों पर विश्‍वास करना चाहिए। और हमने ऐसे ही बातों-बातों में एक बात कह दी। हमने कहा कि भई जो अभी सम्‍पन्‍न लोग हैं। उन्‍होंने यह गैस सिलेंडर की सब्सिडी लेनी चाहिए क्‍या । यह दो सौ, चार सौ रुपये में क्‍या रखा है। क्‍या छोड़ नहीं सकते क्‍या। ऐसी ही हल्‍की फुल्‍की मैंने बात बताई थी। और मैंने देखा कि करीब-करीब दो लाख लोगों ने स्‍वेच्‍छा से गैस सिलेंडर की सब्सिडी लेने से मना कर दिया, तो हौसला और बुलंद हो गया। मैंने कहा कि भई देखिए यह देश वैसा ही है, जैसा लाल बहादुर शास्‍त्री के जमाने में था। तो मैंने फिर सार्वजनिक रूप से लोगों को कहा कि अगर आप सम्‍पन्‍न है, आप afford कर सकते हैं तो आप गैस सिलेंडर पर जो सब्सिडी मिलती हैं छोड़ दीजिए और परसों तक मुझे पता चला करीब-करीब साढ़े तीन लाख लोगों ने छोड़ दी। अब उसके कारण पैसे बच गए, तो क्‍या करेंगे हमने तय किया इन पैसों को सरकार की तिजोरी में नहीं डालेंगे। लेकिन उन गरीब परिवारों को जिस गरीब परिवार में लकड़ी का चूल्‍हा जलता है, घर में धुंआ होता है, बच्‍चे रोते हैं धुएं में, मां बीमार हो जाती है। लकड़ी के चूल्‍हे से जहां रसोई पकती है। ऐसे परिवारों को यह सिलेंडर वहां Transfer कर दिया जाएगा, सब्सिडी वहां Transfer कर दी जाएगी।

यह जो दुनिया climate change की चिंता करती है न, climate change के उपाय इसमें है। Global Warming का जवाब इसमें है। जंगल कटना बंद तब होगा, जब चूल्‍हे जलाना बंद होगा। धुंआ निकलना तब बंद होगा, जबकि हम smoke free व्‍यवस्‍थाओं को विकसित करेंगे। समाज के सम्‍पन्‍न लोगों को मदद मांग कर के उसको Transfer करने का काम उठाया और देखते ही देखते अभी तो एक हफ्ता हुआ यह बात किए हुए, साढ़े तीन लाख लोग आगे आए और उन्‍होंने surrender कर दिया। मेरा कहने का तात्‍पर्य यह है कि चाहे हिंदुस्‍तान हो या हिंदुस्‍तान के बाहर हर हिंदुस्तानी के दिल में एक जज्‍बा दिखाई दे रहा है कि देश में कुछ करना है, देश के लिए कुछ करना है और करके कुछ दिखाना है। इस सपने को लेकर देश चल रहा है।

मैं फिर एक बार देशवासियों, मैं आपको विश्‍वास दिलाता हूं भारत एक पूरी शक्ति के साथ खड़ा हो चुका है। देश तेज गति से आगे बढ़ने के लिए संकल्‍प कर चुका है। देश ने अब पिछले दिनों में जितने निर्णय किए हैं उन निर्णयों को सफलतापूर्वक सिद्ध कर दिया है। इन बातों के भरोसे मैं कहता हूं आपकी अपनी आंखों के सामने आपने जैसा चाहा है वैसा हिंदुस्‍तान बनकर रहेगा, मेरी आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

आपने इतना प्‍यार दिया, इतनी बड़ी संख्‍या में आए और उन टापुओं पर जो नागरिक बैठे हैं उनको भी मेरी तरफ से बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। आप सबको भी बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। पूरी ताकत से मेरे साथ बोलिए,दोनों हाथ ऊपर कर बोलिए – भारत माता की जय, भारत माता की जय, भारत माता की जय।

बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

সেৱা আৰু সমৰ্পণৰ ২০ বছৰক সূচিত কৰা ২০ খন আলোকচিত্ৰ
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বাৰানসীত পিএম আয়ুষ্মান ভাৰত হেল্থ ইনফ্ৰাষ্ট্ৰাকচাৰ মিছন উদ্ঘাটন কৰি দিয়া প্ৰধানমন্ত্ৰীৰ ভাষণৰ পাঠ
October 25, 2021
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“In post-independence India, health infrastructure did not get the required attention for a very long time and citizens had to run from pillar to post for proper treatment, leading to worsening of the condition and financial strain”
“Government at the Center and in the state understands the pain of the poor, downtrodden, oppressed, backward and middle class”
“Through PM Ayushman Bharat Health Infrastructure Mission an entire ecosystem for services from treatment to critical research will be created in every corner of the country”
“PM Ayushman Bharat Health Infrastructure Mission, along with health, is also a medium of aatmnirbharta.”
“Heart of Kashi is the same, the mind is the same, but sincere efforts are being made to improve the body”
“Today, from technology to health, unprecedented facilities are being created in BHU. Young friends from all over the country are coming here for studies”

হৰ-হৰ, মহাদেৱ!

মই আৰম্ভ কৰো এতিয়া আপোনালোকৰ অনুমতি সাপেক্ষে, তেন্তে মই ক'বলৈ আৰম্ভ কৰো। হৰ-হৰ মহাদেৱ, বাবা বিশ্বনাথ, মাতা অন্নপূৰ্ণাৰ নগৰী কাশীৰ পূণ্য ভূমিৰ সকলো বন্ধু আৰু ভগ্নীসকলক প্ৰণাম। দীপাৱলি, দেৱ দীপাৱলি, অন্নকূট, ভইয়াদূজ, প্ৰকাশোৎসৱ আৰু অনাগত ডালা ছঠৰ আপোনালোক সকলোকে বহুত বহুত শুভকামনা। উত্তৰ প্ৰদেশৰ ৰাজ্যপাল শ্ৰীমতী আনন্দীবেন পেটেল জী, ইউপিৰ শক্তিশালী মুখ্যমন্ত্ৰী যোগী আদিত্যনাথ জী, কেন্দ্ৰীয় স্বাস্থ্যমন্ত্ৰী মনসুখ মন্দাভিয়া জী, ইউপি চৰকাৰৰ অন্য মন্ত্ৰীগণ, কেন্দ্ৰৰ মোৰ আৰু এজন লগৰীয়া মহেন্দ্ৰনাথ পাণ্ডে জী, ৰাজ্যৰ আৰু এজন মন্ত্ৰী অনিল ৰাজভৰ জী, নীলকন্ঠ তিৱাৰী জী, ৰৱিন্দ্ৰ জয়সৱাল জী, অন্য মন্ত্ৰীগণ, সংসদত মোৰ লগৰীয়া শ্ৰীমতী সীমা দ্বিৱেদী জী, বি পি সৰোজ জী, বাৰাণসীৰ মেয়ৰ শ্ৰীমতী মৃদুলা জয়সৱাল জী, অন্য জনপ্ৰতিনিধিগণ, টেকনলজিৰ মাধ্যমত দেশৰ কোণ কোণৰ পৰা সংযুক্ত হেল্থ প্ৰফেচনেলছ, জিলা হাস্পতাল, মেডিকেল সংস্থা আৰু ইয়াত উপস্থিত বেনাৰসৰ মোৰ ভাই আৰু ভনীসকল।

দেশে কৰোণা মহামাৰীৰে নিজৰ যুঁজত ১০০ কোটি ভেকচিন ড'জৰ ডাঙৰ স্তৰ সম্পূৰ্ণ কৰিলে। বাবা বিশ্বনাথৰ আশীৰ্বাদত, মা গংগাৰ অবিৰল প্ৰতাপেৰে, কাশীবাসীৰ অখণ্ড বিশ্বাসেৰে, সকলোকে ভেকচিন-মুক্ত ভেকচিনৰ অভিযান সফলতাৰে আগবাঢ়ি আছে। মই আপোনালোক সকলো স্বজনক আদৰেৰে বন্দন কৰিছো। আজিয়েই কিছু সময় পূৰ্বে এটা কাৰ্যক্ৰমত মোৰ উত্তৰ প্ৰদেশক ৯খন নতুন মেডিকেল কলেজ অৰ্পণ কৰাৰ সৌভাগ্য হৈছে। ইয়াৰ জৰিয়তে পূৰ্বাঞ্চল আৰু সমগ্ৰ ইউপিৰ কোটি কোটি দুখীয়া, দলিত-পিছপৰা-শোষিত-বঞ্চিতক এনেকুৱা সমাজৰ সকলো বঞ্চিতৰ বহুত লাভ হ'ব, অন্য চহৰৰ ডাঙৰ হাস্পতালৰ বাবে তেওঁলোকৰ যি দৌৰা-ঢাপৰা হৈছিল, সেয়া কম হ'ব।

বন্ধুসকল,

মানসত এটা প্ৰবাদ আছে-

মুক্তি জন্ম মহি জানি, জ্ঞান খানিঅঘ হানিকৰ।

জহঁ বস সম্ভু ভৱানি, সো কাসী সেইঅ কস ন।।

অৰ্থাৎ, কাশীত শিৱ আৰু শক্তিয়ে সাক্ষাৎ নিৱাস কৰে। জ্ঞানৰ ভাণ্ডাৰ কাশীয়ে তো কষ্ট আৰু ক্লেশ উভয়ৰে পৰা মুক্ত কৰে।

তেন্তে স্বাস্থ্যৰে জড়িত ইমান ডাঙৰ যোজনা, ৰোগ-কষ্টৰ পৰা মুক্তিৰ ইমান ডাঙৰ সংকল্প, ইয়াৰ আৰম্ভণিৰ বাবে কাশীতকৈ ভাল ঠাই কি হ'ব পাৰে? কাশীৰ মোৰ ভাই আৰু ভনীসকল, আজি এই মঞ্চত দুটা ডাঙৰ কাৰ্যক্ৰম হৈ আছে। এটা ভাৰত চৰকাৰৰ আৰু সমগ্ৰ ভাৰতৰ বাবে ৬৪ হাজাৰ কোটি টকাতকৈও অধিক ধনৰাশিৰ এই কাৰ্যক্ৰম আজি কাশীৰ পৱিত্ৰ মাটিৰ পৰা লঞ্চ হৈ আছে। আৰু আনটো কাশী আৰু পূৰ্বাঞ্চলৰ বিকাশৰ হাজাৰ হাজাৰ কোটিৰ কাৰ্যক্ৰমৰ লোকাৰ্পণ আৰু একপ্ৰকাৰে মই কওঁ যে প্ৰথমটো কাৰ্যক্ৰম আৰু ইয়াৰ কাৰ্যক্ৰম সকলো মিলাই মই কওঁ আজি প্ৰায় ৭৫ হাজাৰ কোটি টকাৰ কামৰ আজি ইয়াত নিৰ্ণয় বা লোকাৰ্পণ হৈ আছে। কাশীৰ পৰা আৰম্ভ হোৱা এই যোজনাত মহাদেৱৰ আশীৰ্বাদো আছে। আৰু য'ত মহাদেৱৰ আশীৰ্বাদ আছে, তাত তো কল্যাণেই কল্যাণ, সফলতাই সফলতা। আৰু যেতিয়া মহাদেৱৰ আশীৰ্বাদ থাকে তেতিয়া কষ্টৰ পৰা মুক্তিও স্বাভাৱিক।

বন্ধুসকল,

আজি ইউপিসহ সমগ্ৰ দেশৰ হেল্থ ইনফ্ৰাষ্ট্ৰাকচাৰক শক্তি দিবৰ বাবে, ভৱিষ্যতে মহামাৰীৰ পৰা ৰক্ষা পাবলৈ আমাৰ প্ৰস্তুতি উচ্চ স্তৰৰ হওক, গাঁও আৰু ব্লক স্তৰলৈকে আমাৰ হেল্থ ছিষ্টেমলৈ আত্মবিশ্বাস আৰু আত্মনিৰ্ভৰতা আহক, ইয়াৰ বাবে আজি কাশীত মোৰ ৬৪ হাজাৰ কোটি টকাৰ আয়ুষ্মান ভাৰত হেল্থ ইনফ্ৰাষ্ট্ৰাকচাৰ মিছন ৰাষ্ট্ৰক সমৰ্পিত কৰাৰ সৌভাগ্য হৈছে। আজি কাশীৰ ইনফ্ৰাষ্ট্ৰাকচাৰৰ সৈতে জড়িত প্ৰায় ৫ হাজাৰ কোটি টকাৰ প্ৰজেক্টৰো লোকাৰ্পণ এতিয়া কৰা হৈছে। ইয়াত পথৰ পৰা আৰম্ভ কৰি ঘাটৰ সৌন্দৰ্য, গংগা জী আৰু বৰুণাৰ পৰিষ্কাৰ কৰণ, দলং, পাৰ্কিং স্থল, বিএইচইউত অনেক সুবিধাৰে জড়িত অনেক প্ৰজেক্ট। উৎসৱৰ এই বতৰত জীৱনক সুগম, সুস্থ আৰু সমৃদ্ধ কৰি তুলিবলৈ কাশীত হৈ থকা এই বিকাশ পৰ্বই একপ্ৰকাৰ সমগ্ৰ দেশক নতুন বল, নতুন শক্তি, নতুন বিশ্বাস দিব। ইয়াৰ বাবে কাশীসহ আজি মই কাশীৰ ভূমিৰ পৰা ১৩০ কোটি দেশবাসীক হিন্দুস্তানৰ প্ৰতিটো প্ৰান্তক, হিন্দুস্তানৰ গাঁওসমূহক, হিন্দুস্তানৰ চহৰসমূহক সকলোকে বহুত বহুত অভিনন্দন!

ভাই আৰু ভনীসকল!

আমাৰ ইয়াত সকলো কামৰ মূল আধাৰ আৰোগ্য বুলি ভবা হয়। শৰীৰৰক সুস্থ ৰাখিবলৈ কৰা বিনিয়োগক সদায় উত্তম বিনিয়োগ বুলি ভবা হয়। কিন্তু স্বাধীনতাৰ পিছৰ দীঘলীয়া সময়ত আৰোগ্যৰ ওপৰত, স্বাস্থ্য সুবিধাৰ ওপৰত সিমান মনোযোগ দিয়া নহৈছিল যিমান দেশৰ প্ৰয়োজন আছিল। দেশত যাৰ দীৰ্ঘ সময় ধৰি চৰকাৰ আছিল, তেওঁলোকে দেশৰ হেল্থ কেয়াৰ ছিষ্টেমৰ সম্পূৰ্ণ বিকাশৰ সলনি তাক সুবিধাৰ পৰা বঞ্চিত ৰাখিলে। গাঁৱত হয় হাস্পতাল নাই, হাস্পতাল আছিল যদিও চিকিৎসা কৰোতা নাছিল। ব্লকৰ হাস্পতাললৈ গ'লেও টেষ্টৰ সুবিধা নাছিল, টেষ্ট হ'লেও ফলাফলক লৈ ভ্ৰান্তি আছিল, সঠিক হোৱাৰ ওপৰত আশংকা। জিলা হাস্পতাললৈ গ'লে গম পায় যে যি গম্ভীৰ ৰোগ ডিটেক্ট হয়, তাততো ছাৰ্জাৰী হ'ব। কিন্তু যি ছাৰ্জাৰী হ'ব লাগে, তাৰ সুবিধাই নাই, সেয়ে আকৌ ডাঙৰ হাস্পতাললৈ দৌৰ, ডাঙৰ হাস্পতালত বেছি ভীৰ, দীঘলীয়া অপেক্ষা। আমি সকলো সাক্ষী যে ৰোগী আৰু তেওঁৰ গোটেই পৰিয়ালে এনেকুৱা পৰিস্থিতিতে ওলমি থাকিবলগীয়া হৈছিল। জীৱন যুদ্ধতে পাৰ হৈছিল, ইয়াৰ জৰিয়তে গম্ভীৰ ৰোগ বেছি বেয়াৰ ফালে গৈছিল, ওপৰৰ পৰা দুখীয়াৰ ওপৰত যি অনাৱশ্যকীয় বোজা পৰিছিল, সেয়া তো আছিলেই।

বন্ধুসকল,

আমাৰ হেল্থ কেয়াৰ ছিষ্টেমত যি ডাঙৰ অভাৱ আছিল, সি দুখীয়া আৰু মিডল ক্লাছত চিকিৎসাক লৈ সদায় হৈ থকা চিন্তা সৃষ্টি কৰিছিল। আয়ুষ্মান ভাৰত হেল্থ ইনফ্ৰাষ্ট্ৰাকচাৰ মিছন-দেশৰ হেল্থকেয়াৰ ছিষ্টেমৰ এই অভাৱকে দূৰ কৰাৰ এটা সমাধান। ভৱিষ্যতে যিকোনো মহামাৰীৰে মোকাবিলা কৰিবলৈ আমি সাজু থাকিম, সক্ষম হ'ম, ইয়াৰ বাবে নিজৰ হেল্থ ছিষ্টেমক আজি সাজু কৰা হৈছে। চেষ্টা এইটোও কৰা হৈছে যে ৰোগ সোনকালে চিনাক্ত হওক, পৰীক্ষাত পলম নহওক। লক্ষ্য এইটোৱেই যে অনাগত ৪-৫ বছৰত দেশৰ গাঁৱৰ পৰা আৰম্ভ কৰি ব্লক, জিলা, ৰিজনেল আৰু নেচনেল লেভেললৈকে ক্ৰিটিকেল হেল্থকেয়াৰ নেটৱৰ্কক শক্তিশালী কৰা হওক। বিশেষকৈ যিবিলাক ৰাজ্যত স্বাস্থ্য সুবিধাৰ অভাৱ, যি আমাৰ পাহাৰীয়া আৰু নৰ্থ-ইষ্টৰ ৰাজ্য আছে, সিবিলাকৰ ওপৰত আৰু বেছি ফ'কাছ কৰি থকা হৈছে। যেনেকৈ উত্তৰাখণ্ড আছে, হিমাচল আছে।

বন্ধুসকল,

দেশৰ হেল্থ ছেক্টৰৰ বেলেগ বেলেগ গেপছক এড্ৰেছ কৰিবলৈ আয়ুষ্মান ভাৰত হেল্থ ইনফ্ৰাষ্ট্ৰাকচাৰ মিছনৰ তিনিটা ডাঙৰ পদক্ষেপ আছে। প্ৰথম, ডায়েগ্নষ্টিক আৰু ট্ৰিটমেণ্টৰ বাবে বিস্তৃত সুবিধাৱলীৰ নিৰ্মাণৰ সৈতে জড়িত। ইয়াৰ জৰিয়তে গাঁও আৰু চহৰত হেল্থ এণ্ড ৱেলনেছ ছেক্টৰ খুলি থকা হৈছে, য'ত ৰোগ আৰম্ভণিতে ডিটেক্ট কৰাৰ সুবিধা থাকিব। এই চেণ্টাৰবিলাকত ফ্ৰী মেডিকেল কনছালটেচন, ফ্ৰী টেষ্ট, ফ্ৰী ঔষধৰ দৰে সুবিধাৱলী পোৱা যাব। সময়মতে ৰোগৰ বিষয়ে জানিব পাৰিলে ৰোগ গম্ভীৰ হোৱাৰ আশংকা কম হ'ব। গম্ভীৰ ৰোগৰ স্থিতিত তাৰ চিকিৎসাৰ বাবে ৬০০তকৈও অধিক জিলাত, ক্ৰিটিকেল কেয়াৰৰ সৈতে জড়িত ৩৫ হাজাৰতকৈ অধিক নতুন বিছনা নিৰ্মাণ কৰা হ'ব। বাকী প্ৰায় দেৰশ জিলাত ৰেফাৰেলৰ সুবিধা দিয়া হ'ব। ৰাষ্ট্ৰীয় স্তৰত ইয়াৰ বাবে ট্ৰেইনিং আৰু কেপাচিটী বিল্ডিঙৰ বাবে ১২খন কেন্দ্ৰীয় হাস্পতালত জৰুৰী সুবিধাৱলী বিকশিত কৰাতো কাম হৈ আছে। এই যোজনাৰ জৰিয়তে ৰাজ্যসমূহতো ছাৰ্জাৰীৰ সৈতে জড়িত নেটৱৰ্ক শক্তিশালী কৰিবলৈ ২৪×৭ চলিবলগীয়া ১৫ ইমাৰ্জেঞ্চী অপাৰেচন চেণ্টাৰো নিৰ্মাণ কৰা হ'ব।

বন্ধুসকল,

যোজনাৰ দ্বিতীয় পদক্ষেপ, ৰোগৰ পৰীক্ষাৰ বাবে টেষ্টিং নেটৱৰ্কৰে জড়িত। এই মিছনৰ জৰিয়তে ৰোগৰ পৰীক্ষা, তাৰ চোৱাচিতা কেনেকৈ হ'ব, তাৰ বাবে জৰুৰী ইনফ্ৰাষ্ট্ৰাকচাৰৰ বিকাশ কৰা হ'ব। দেশৰ ৭৩০খন জিলাত ইণ্টেগ্ৰেটেড পাব্লিক হেল্থ লেব আৰু দেশত চিহ্নিত চাৰেতিনি হাজাৰ ব্লকত, ব্লক পাব্লিক হেল্থ ইউনিট বনোৱা হ'ব। ৫টা ৰিজনেল নেচনেল চেণ্টাৰছ ফৰ ডিজিজ কণ্ট্ৰ'ল, ২০টা মেট্ৰোপলিটান ইউনিট আৰু ১৫টা বিএছএল লেবেও এই নেটৱৰ্কক আৰু শক্তিশালী কৰিব।

ভাই আৰু ভনীসকল,

এই মিছনৰ তৃতীয় পদক্ষেপ মহামাৰীৰে জড়িত ৰিছাৰ্চ সংস্থাৰ বিস্তাৰৰ, সিবিলাকক শক্তিশালী কৰি তোলাৰ। এই সময়ত দেশত ৮০টা ভাইৰেল ডায়েগ্নষ্টিক আৰু ৰিছাৰ্চ লেব আছে। এইবিলাকক আৰু ভাল কৰা হ'ব। মহামাৰীত বায়'ছেফ্টি লেভেল-৩ৰ লেব লাগে। এনেকুৱা ১৫টা লেবক অপাৰেচনেল কৰা হ'ব। ইয়াৰ উপৰিও দেশত ৪টা নতুন নেচনেল ইনষ্টিটিউট অফ ভাইৰলজী আৰু এটা নেচনেল ইনষ্টিটিউট ফৰ ৱান হেল্থো স্থাপন কৰা হৈছে। দক্ষিণ এছিয়াৰ বাবে ডব্লিউএইচঅ'ৰ ৰিজনেল ৰিছাৰ্চ প্লেটফৰ্মেও ৰিছাৰ্চৰ এই নেটৱৰ্কক শক্তিশালী কৰিব। অৰ্থাৎ আয়ুষ্মান ভাৰত হেল্থ ইনফ্ৰাষ্ট্ৰাকচাৰ মিছনৰ মাধ্যমত দেশৰ বিভিন্ন প্ৰান্তত চিকিৎসাৰ পৰা আৰম্ভ কৰি ক্ৰিটিকেল ৰিছাৰ্চলৈকে এটা সম্পূৰ্ণ ইক'ছিষ্টেম বিকশিত কৰা হ'ব।

বন্ধুসকল,

এনেয়ে এই কাম কেইবাদশক পূৰ্বে হৈ যাব লাগিছিল। কিন্তু অৱস্থা কি তাৰ বৰ্ণনা কৰা মোৰ দৰকাৰ নাই। আমি যোৱা ৭ বছৰ ধৰি একেৰাহে সংস্কাৰ কৰি আছো কিন্তু এতিয়া এক বহুত ডাঙৰ স্কেলত, বহুত ডাঙৰ এগ্ৰেছিভ এপ্ৰ'চৰ সৈতে এই কাম কৰিব লাগিব। কিছুদিন আগতে আপোনালোকে হয়তো দেখিছে মই দিল্লীত সমগ্ৰ দেশৰ বাবে এক গতি শক্তি এক বহুত ডাঙৰ দেশব্যাপি ইনফ্ৰাষ্ট্ৰাকচাৰৰ সৈতে জড়িত কাৰ্যক্ৰম লঞ্চ কৰিছিলো। আজি এয়া দ্বিতীয়টো, প্ৰায় ৬৪ হাজাৰ কোটি টকাৰ হেল্থক লৈয়েই, আৰোগ্যক লৈয়েই, ৰোগৰ বিৰুদ্ধে যুঁজিবৰ বাবে, দেশৰ প্ৰত্যেক নাগৰিকক সুস্থ ৰাখিবৰ বাবে ইমান ডাঙৰ এটা মিছন লৈ আজি কাশীৰ ভূমিৰ পৰা আমি দেশজুৰি ওলাই আছো।

বন্ধুসকল,

যেতিয়া এনেকুৱা হেল্থ ইনফ্ৰাষ্ট্ৰাকচাৰ হয়, তেতিয়া ইয়াৰ ফলত হেল্থ ছাৰ্ভিচ তো ভাল হয়েই, ইয়াৰ জৰিয়তে ৰোজগাৰৰো এটা সম্পূৰ্ণ বাতাবৰণ বিকশিত হয়। ডাক্তৰ, পেৰামেডিকছ, লেব, ফাৰ্মাচী, চাফচিকুনতা, অফিচ, ট্ৰেভেল-ট্ৰেন্সপ'ৰ্ট, খোৱা-বোৱা, এনেকুৱা বহু ধৰণৰ ৰোজগাৰ এই যোজনাৰ জৰিয়তে হ'ব। আমি দেখিছো যে এখন ডাঙৰ হাস্পতাল হ'লে, তাৰ আশেপাশে এখন সম্পূৰ্ণ চহৰ বহি যায়। যি হাস্পতালৰ সৈতে জড়িত কামকাজৰ জীৱিকাৰ কেন্দ্ৰ হৈ পৰে। বহুত ডাঙৰ অৰ্থনৈতিক কামকাজৰ কেন্দ্ৰ হৈ পৰে। আৰু সেয়ে আয়ুষ্মান ভাৰত হেল্থ ইনফ্ৰাষ্ট্ৰাকচাৰ মিছন, স্বাস্থ্যৰ লগতে অৰ্থনৈতিক আত্মনিৰ্ভৰতাৰো মাধ্যম। এয়া এক হলিষ্টিক হেল্থকেয়াৰৰ বাবে হৈ থকা প্ৰয়াসৰ এটা পদক্ষেপ। হলিষ্টিক হেল্থকেয়াৰ অৰ্থাৎ যি সকলোৰে বাবে সুলভ, যি সস্তা আৰু সকলোৰে উপলব্ধ, হলিষ্টিক হেল্থকেয়াৰ অৰ্থাৎ য'ত স্বাস্থ্যৰ লগতে ৱেলনেছৰ ওপৰতো ফ'কাছ হয়। স্বচ্ছ ভাৰত অভিযান, জল জীৱন মিছন, উজ্জ্বলা যোজনা, পোষণ অভিযান, মিছন ইন্দ্ৰধনুষ, এনেকুৱা অনেক অভিযানে দেশৰ কোটি কোটি দুখীয়াক ৰোগৰ পৰা বচাইছে, তেওঁলোকক ৰোগ হোৱাৰ পৰা বচাইছে। আয়ুষ্মান ভাৰত যোজনাই দুই কোটিৰো অধিক দুখীয়াৰ হাস্পতালত বিনামূলীয়া চিকিৎসাও কৰাইছে। চিকিৎসাৰ সৈতে জড়িত বহু বিপদ আয়ুষ্মান ভাৰত ডিজিটেল মিছনৰ জৰিয়তে সমাধান কৰা হৈছে।

ভাই আৰু ভনীসকল,

আমাৰ আগতে বছৰ বছৰ ধৰি যি চৰকাৰত আছিল, তেওঁলোকৰ বাবে স্বাস্থ্য সেৱা, পইচা উপাৰ্জন কৰা, দুৰ্নীতিৰ মাধ্যম আছিল। দুখীয়াৰ কষ্ট দেখিও তেওঁলোক তাৰ পৰা আঁতৰি গৈছিল। আজি কেন্দ্ৰ আৰু ৰাজ্যত যি চৰকাৰ আছে, যি দুখীয়া, দলিত, শোষিত-বঞ্চিত, পিছপৰা, মধ্যশ্ৰেণী সকলোৰে দুখ বুজে। দেশত স্বাস্থ্য সুবিধাৱলী ভাল কৰিবলৈ আমি দিন-ৰাতি এক কৰি আছো। আগতে জনসাধাৰণৰ পইচা দুৰ্নীতিত গৈছিল, এনেকুৱা মানুহৰ বাকচলৈ গৈছিল, আজি ডাঙৰ ডাঙৰ প্ৰজেক্টত পইচা লাগি আছে। সেয়ে আজি ইতিহাসৰ সবাতোকৈ ডাঙৰ মহামাৰীৰেও দেশে মোকাবিলা কৰি আছে আৰু আত্মনিৰ্ভৰ ভাৰতৰ বাবে লাখ লাখ কোটি টকাৰ ইনফ্ৰাষ্ট্ৰাকচাৰো বনাই আছে।

বন্ধুসকল,

মেডিকেল সুবিধাৱলী বঢ়াবলৈ বহুত আৱশ্যকীয় হয় যে, ডাক্তৰ আৰু পেৰামেডিকেল ষ্টাফৰ সংখ্যাও সিমানেই দ্ৰুতগতিত বাঢ়িব লাগে। ইউপিত যি দ্ৰুততাৰে নতুন মেডিকেল কলেজ খুলি থকা হৈছে, তাৰ বহুত ভাল প্ৰভাৱ মেডিকেলৰ ছিট আৰু ডাক্তৰৰ সংখ্যাৰ ওপৰত পৰিব। অধিক ছিট হোৱা বাবে এতিয়া দুখীয়া পিতৃ-মাতৃৰ সন্তানেও ডাক্তৰ হোৱাৰ সপোন দেখিব পাৰিব আৰু তাক সম্পূৰ্ণ কৰিব পাৰিব।

ভাই আৰু ভনীসকল,

স্বাধীনতাৰ পিছত ৭০ বছৰত দেশত যিমান ডাক্তৰ মেডিকেল কলেজৰ পৰা পঢ়ি ওলাইছে, তাতকৈ অধিক ডাক্তৰ অহা ১০-১২ বছৰত দেশে লাভ কৰিবলৈ গৈ আছে। অৰ্থাৎ নতুন ভাৰত আছে য'ত, অভাৱতকৈ আগবাঢ়ি গৈ প্ৰতিটো আকাংক্ষা পূৰণৰ বাবে দিনে-নিশাই কাম কৰি থকা হৈছে।

ভাই আৰু ভনীসকল,

অতীতত লাগে দেশতেই হওক বা উত্তৰ প্ৰদেশতেই হওক, যেনেদৰে কাম হৈছিল, যদি তেনেকৈয়ে কাম হ'লহেঁতেন তেন্তে কাশীৰ অৱস্থা কি হ'লহেঁতেন। যিমান কাম বাৰানসীত যোৱা ৭ বছৰত হৈছে, সিমান কাম যোৱা কেইবাদশকত হোৱা নাছিল।

ভাই আৰু ভনীসকল,

ৰিংৰোডৰ অভাৱত কাশীত জামৰ কি অৱস্থা হৈছিল, ইয়াক আপোনালোকে বছৰ বছৰ ধৰি অনুভৱ কৰিছিল। এতিয়া ৰিংৰোড হোৱাত প্ৰয়াগৰাজ, লক্ষ্ণৌ, চুলতানপুৰ, আজমগড়, গাজীপুৰ, গোৰখপুৰ, দিল্লী, কলকাতা, ক'ৰবালৈ অহাযোৱা কৰিবলগা হ'লে চহৰলৈ আহি চহৰীয়া লোকক অসুবিধা দিয়াৰ প্ৰয়োজন নহয়। ইয়াৰ ফলত যাত্ৰা তো সহজ হ'বই, বেপাৰ-বাণিজ্যই গতি লাভ কৰিব, ট্ৰেন্সপ'ৰ্টৰ মূল্য কম হ'ব।

ভাই আৰু ভনীসকল,

যেতিয়ালৈকে দেশত এটা ডেডিকেটেড ইনফ্ৰাষ্ট্ৰাকচাৰৰ নিৰ্মাণ নহয়, তেতিয়ালৈকে বিকাশৰ গতি আধৰুৱা হৈ থাকে। বৰুণা নদীৰ ওপৰত দুখন দলং হোৱাত কেইবাজনো গাঁৱৰ বাবে এতিয়া চহৰলৈ অহাযোৱাটো সহজ হৈছে। পথ, দলং, পাৰ্কিং স্থলৰ সৈতে জড়িত এনেকুৱা অনেক প্ৰজেক্ট আজি কাশীবাসীক সমৰ্পিত কৰা হৈছে, যাৰ ফলত চহৰ আৰু কাষৰীয়া জীৱন আৰু অধিক সুগম হ'ব। ৰে'লৱেই ষ্টেচনত হোৱা আধুনিক এগজিকিউটিভ লঞ্জৰ জৰিয়তে যাত্ৰীসকলৰ সুচলতা আৰু বাঢ়িব।

বন্ধুসকল,

গংগা জীৰ স্বচ্ছতা আৰু নিৰ্মলতাৰ বাবে যোৱা বছৰবিলাকত ব্যাপক কাম কৰা হৈছে, যাৰ পৰিণাম আজি আমি অনুভৱ কৰি আছো। এতিয়া ৰামনগৰত ৫টা নলেৰে প্ৰবাহিত ছিৱেজক ট্ৰিট কৰিবলৈ আধুনিক ট্ৰিটমেণ্ট প্লাণ্টে কাম কৰিবলৈ আৰম্ভ কৰিছে। গংগা জীয়েই নহয়, বৰং বৰুণাৰ স্বচ্ছতাক লৈও প্ৰাথমিকতাৰ আধাৰত কাম হৈ আছে। বৰুণাৰ দুয়োটা পাৰ পাথৱে, ৰেলিং, লাইটিং, পকা ঘাট, চিৰি, এনেকুৱা অনেক সুবিধাৰ নিৰ্মাণ সম্পূৰ্ণ হৈ আছে।

বন্ধুসকল,

কাশী আধ্যাত্মিকতাৰ লগতে গ্ৰামীণ অৰ্থনৈতিক ব্যৱস্থাৰো এক বিশেষ কেন্দ্ৰ। কাশীসহ সমগ্ৰ পূৰ্বাঞ্চলৰ কৃষকৰ শস্য দেশ-বিদেশৰ বজাৰ পোৱাবলৈ যোৱা বছৰবিলাকত অনেক সুবিধা বিকশিত হৈছে। শাহেনশাহপুৰত বায়'-চিএনজি প্লাণ্ট হ'লে বায়' গেছো পাব আৰু হাজাৰ হাজাৰ মেট্ৰিক টন অৰ্গেনিক সাৰো কৃষকে লাভ কৰিব।

ভাই আৰু ভনীসকল,

যোৱা বছৰবিলাকৰ আৰু এটা ডাঙৰ অভিজ্ঞতা কাশীৰ হৈছে যে, সেয়া হৈছে বিএইচইউৰ আকৌ পৃথিৱীত শ্ৰেষ্ঠতাৰ দিশত অগ্ৰসৰ হোৱা। আজি টেকনলজিৰ পৰা হেল্থলৈকে, বিএইচইউত অভূতপূৰ্ব সুবিধাৱলী সৃষ্টি হৈ আছে। দেশজুৰি ইয়ালৈ যুৱক-যুৱতীয় বন্ধুসকল পঢ়িবলৈ আহি আছে। বিশেষকৈ বহুত ছাত্ৰীৰ বাবে যি হোষ্টেলৰ সুবিধা সৃষ্টি হৈছে, তাৰ জৰিয়তে মালব্য জীৰ ভিজনক সাকাৰ কৰাত অধিক শক্তি পোৱা যাব।

ভাই আৰু ভনীসকল,

বিকাশৰ এই সকলো প্ৰজেক্টে আত্মনিৰ্ভৰতাৰ আমাৰ সংকল্পক সিদ্ধ কৰিব। চৰকাৰৰ প্ৰয়াসত যোৱা ৫ বছৰত বাৰাণসীত খাদী আৰু অন্য কুটীৰ উদ্যোগৰ উৎপাদনত প্ৰায় ৬০% আৰু বিক্ৰীত প্ৰায় ৯০%ৰ বৃদ্ধি হৈছে। সেয়ে মই আকৌ এবাৰ ইয়াৰ পৰা সকলো দেশবাসীক আবেদন জনাম যে এই দীপাৱলিত আমি, আমাৰ এই বন্ধুসকলৰো মনত ৰাখিব লাগিব। নিজৰ ঘৰ সজোৱাৰ পৰা নিজৰ কাপোৰ আৰু দীপাৱলিৰ বন্তিলৈকে, লোকেলৰ বাবে আমি ভোকেল হ'ব লাগিব। আৰু যেতিয়া মই লোকেলৰ বাবে ভোকেলৰ কথা কওঁ, তেতিয়া মই দেখিছো যে আমাৰ টিভিৰ লোকসকলেও কেৱল মাটিৰ বন্তিহে দেখুৱায়। ভোকেল ফৰ লোকেল কেৱল বন্তিতে সীমাবদ্ধ নহয় ভাই, প্ৰতিটো বস্তুতে সেই সামগ্ৰী য'ত মোৰ দেশবাসীৰ ঘাম আছে, যি সামগ্ৰীত মোৰ দেশৰ মাটিৰ সুগন্ধ আছে, সেয়া মোৰ বাবে। আৰু এবাৰ যদি আমাৰ অভ্যাস হৈ যায় দেশৰ সামগ্ৰী ক্ৰয় কৰাৰ তেতিয়া উৎপাদনো বাঢ়িব, ৰোজগাৰো বাঢ়িব, দুখীয়াতকৈও দুখীয়াই কামো পাব আৰু এই কাম সকলোৱে লগ হৈ কৰিব পাৰে, সকলোৰে প্ৰয়াসত বহুত ডাঙৰ পৰিৱৰ্তন আমি আনিব পাৰো।

বন্ধুসকল,

এবাৰ আকৌ আয়ুষ্মান ভাৰত হেল্থ ইনফ্ৰাষ্ট্ৰাকচাৰ মিছনৰ বাবে সমগ্ৰ দেশক আৰু বিকাশৰ অনেক প্ৰজেক্টৰ বাবে কাশীক বহুত বহুত অভিনন্দন। আপোনালোক সকলোকে অনাগত সকলো উৎসৱৰ বাবে আকৌ এবাৰ অনেক অনেক অগ্ৰিম শুভকামনা। বহুত বহুত ধন্যবাদ!