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PM Modi addresses Indian Community in Singapore
PM applauds the Indian Diaspora for being a living example of Vasudhaiva Kutumbakam - the whole world is 1 family
India can learn a lot from Singapore, cleanliness is one of them: PM 
PM pitches for Make in India in defence. Says we have opened up FDI upto 49% in defence sector
Today the world looks towards India with great faith: PM 
FDI is needed to First Develop India: PM
There is an increase in FDI since we have taken office: PM
Indian currency must gain more respect globally: PM
We have begun a movement, we are working on skill development with Singapore, Germany, USA:  PM
We want to provide 24x7 electricity to everyone in India: PM
We want renewable energy, wind energy & nuclear energy: PM
We have set a target of producing 175 GW renewable energy: PM
Declaration of International Yoga Day on June 21st by UN brought the world together to celebrate yoga as holistic health care: PM

नमस्‍ते, वणक्‍कम, दीपावली का पर्व अभी-अभी गया, लेकिन मुझे बताया गया कि Little India ने इस बार दीपावली की रोशनी एक हफ्ते तक उसको extend कर दिया। मैं इसके लिए सभी Singaporeans का हृदय से आभार व्‍यक्‍त करता हूं। मैं सिंगापुर पहले भी आया हूं। पहले भी Indian Community के साथ मिलने का बातें करने का मुझे अवसर मिला है। लेकिन आज का ये नजारा हिन्‍दुस्‍तान में बैठ करके कोई सोच भी नहीं सकता है कि सिंगापुर का ये मूड है। मैं हृदय से आप सबका धन्‍यवाद करता हूं आज पूरे विश्‍व में भारत की जो छवि बनी है, पूरा विश्‍व भारत की तरफ एक विश्‍वास के भाव से देख रहा है उसका कारण, उसका कारण, उसका कारण मोदी नहीं है। उसका कारण विदेशों में बसे हुए आप मेरे भारतीय भाई-बहन हैं। आप लोगों ने दुनिया के जिस देश में गए, जिस धरती पर पहुंचे, जान-पहचान थी या नहीं थी, हालात अनुकूल थे या प्रतिकूल थे, आपने उस धरती को अपना बना लिया। आपने उस देश के लोगों के साथ आप ऐसे मिल गए ऐसे मिल गए, जैसे दूध में शक्‍कर मिल जाती है।

हम कभी सुना करते थे, पढ़ा करते थे इतिहास में कि पारसी कौम जब सबसे पहले हिन्‍दुस्‍तान की धरती पर आए, गुजरात के किनारे पर आए और उस समय के हिन्‍दु राजा थे जदीराणा, ये विदेश से आए थे, कौन है क्‍या है जानते नहीं थे। क्‍यों आए थे पता नहीं था लेकिन उन्‍होंने समुंदर में से मैसेज भेजा तो राजा ने एक दूध का गिलास भरा हुआ उनको भेज दिया। और उसमें मैसेज ये था कि जैसे ये गिलास में दूध पूरी तरह भरा हुआ है और बिल्‍कुल जगह नहीं है, मैं आपको यहां कैसे समाऊंगा? ये Symbolic मैसेज था। तो पारसियों ने क्‍या किया, उस दूध में चीनी मिला दी, शक्‍कर मिला दी और वो दूध का कटोरा वापिस भेजा और उन्‍होंने राजा को संदेश दिया कि हम विदेश की धरती से आए हैं, संकटों के मारे आए हैं लेकिन जैसे इस भरे हुए दूध से भरे गिलास में जगह न होने के बावजूद भी चीनी जैसे उसमें मिल गई हम भी मिल जाएंगे और हम और मिठास भर देंगे। हिन्‍दुस्‍तानी भी जहां गया उसने वहां के जीवन के साथ अपने आचरण के द्वारा, अपने व्‍यवहार के द्वारा, उस समाज में वो ऐसे घु‍लमिल गया कि हर किसी को अपना लगने लगा, अपने लगने लगा। दुनिया के कई देशों से पता चलता है कि अगर अड़ौस-पड़ौस में कोई Indian आता है तो खुशी महसूस करते हैं। उनको लगता है अच्‍छा भई कोई Indian हमारे पड़ौस में आया है। और वो अपने बच्‍चों को प्रेरित करते हैं कि जरा तुम Indian बच्‍चों से दोस्‍ती करो।

ये, ये, इस, आपके इस व्‍यवहार के कारण और सदियों से हमारे देशवासी जहां गए, वहां वे एक अपनापन की महक ले करके गए, अपने बन करके रहे, हर किसी को गले लगा करके रहे और ये सदियों से परंपरा चली आ रही है। इसी के कारण भारत जब सोने की चिडि़या था तब भी किसी को भी आंख में खटकता नहीं था। और हमारे बुरे दिन आए तब भी किसी ने हमें हड़दूत नहीं किया था, अपमानित नहीं किया था क्‍योंकि सदियों से हमारे लोगों ने ये प्‍यार, ये अपनापन, इसी का मूलमंत्र ले करके और हमने सिर्फ शास्‍त्रों में पढ़ा था, ऐसा नहीं है। वसुधैव कुटुम्‍बकम् से वेदकाल से हमारे यहां उद्घोष चला आ रहा है। लेकिन भारतीयों ने सच्‍चे अर्थ में वसुधैव कुटुम्‍बकम् Whole world is one family, इस मंत्र को जी करके दिखाया है। और उसी के कारण आज विश्‍व में भारतीयों के प्रति, भारत के प्रति कहीं कोई आशंका का माहौल नहीं होता है, अपनेपन की श्‍वास होती है और इसलिए मैं विश्‍व भर में फैले हुए मेरे सभी भारतीय भाइयों-बहनों का आदरपूर्वक अभिनंदन करता हूं।

मैं गत मार्च महीने में एक दिन के लिए सिंगापुर आया था। जिस महापुरुष ने इस सिंगापुर को बनाया, अपने खून-पसीने से बनाया। अपने-आप को खपा दिया। एक छोटा सा मछुआरों का गांव आज विश्‍व के समृद्ध देशों की बराबरी कर रहा हो, ऐसा सिंगापौर बन गया। ऐसे महापुरुष स्‍वर्गीय Lee Kuan Yew, उनकी अंत्‍येष्टि के लिए, अंतिम दर्शन के लिए मैं आया था। जब सिंगापुर को याद करते हैं एक विश्‍वास पैदा होता है।

अगर कुछ करने का माजा है तो होके रहता है। अगर सपने है और सपनों के लिए समर्पण है तो सिद्धि आपके चरण चूमने के लिए तैयार रहती है। प्रसिद्धि और सिद्धि में बहुत बड़ा फर्क होता है। कुछ भी करने पर प्रसिद्धि तो मिल जाती है लेकिन सिद्धि के लिए तो सिर्फ तपस्‍या, यही एक मार्ग होता है और जिन्‍होंने प्रसिद्धि का रास्‍ता अपनाया है वो कभी कुछ सिद्धि नहीं कर पाए हैं। कुछ समय तक सुर्खियों में जगह बना सकते हैं लेकिन धरती पर बदलाव नहीं ला सकते हैं सिंगापुर वो एक उदाहरण है कि 50 साल के कार्यकाल में एक ही generation की आंखों के सामने एक देश को कहां से कहां पहुंचाया जा सकता है, इसका ये उत्‍तम उदाहरण है। भारत महान देश है, भारत विशाल देश है, सवा सौ करोड़ देशवासियों का देश है। सब कुछ है फिर भी सिंगापुर से बहुत कुछ सीखना भी है।

आज से 50 साल पहले, 60 साल पहले जिस महापुरुष को एक विचार आया – सिंगापुर की सफाई, स्‍वच्‍छता, cleanliness। अब क्‍या हमारा देश ये काम नहीं कर सकता क्‍या, करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए? यहां के नागरिकों की भूमिका है कि नहीं है? और मुझे महात्‍मा गांधी जीवन भर एक बात के लिए बड़े आग्रही थे – स्‍वच्‍छता के लिए। और वो तो यहां तक कह दिया था कि मुझे आजादी और स्‍वच्‍छता दोनों में से पहले प्राथमिकता देनी है तो मैं स्‍वच्‍छता को दूंगा।

आज भारत में सबका एक मन बना है। हर किसी को लग रहा है कि हमारा देश ऐसा नहीं होना चाहिए। गंदगी में बहुत गुजारा कर लिया। दुनिया बदल रही है, हिन्‍दुस्‍तान को बदलना चाहिए कि नहीं बदलना चाहिए। और अच्‍छी बात यह है कि सवा सौ करोड़ देशवासियों ने बदलने का मन बना लिया है। कोई देश न सरकारों से बनते है न सरकारों से बढ़ते है, देश बनते है जन-जन की इच्‍छा से, जन-जन के संकल्‍प से, जन-जन के पुरुषार्थ से] जन-जन के त्‍याग और तपस्‍या से, पीढ़िया खप जाती है तब एक राष्‍ट्र का निर्माण होता है। आज भारत में वो मिजाज पैदा हुआ है। हर भारतीय को लगने लगा है हम देश को आगे बढ़ाएंगे, देश को आगे ले जाएंगे। हम उस युग में जी रहे हैं कि जिस युग में अगर कुछ मिला है तो छोड़ने का मन कभी नहीं करता है। हम travel करते हो और travel करते समय हमारी सीट reserve हो, हम सीट पर बैठे हो, बगल की सीट खाली हो, हमने अपने बैग वहां रख दिए हो, अखबार रख दिए हो, कुछ सामान रख दिया हो। वो सीट अपनी नहीं है, लेकिन किसी और को आने में देर हुई है, हमने सब रखा है और जब वो आ जाए तो ऐसा मन खट्टा हो जाता है। किसी और का.. ये मूलभूत प्रवृत्‍ति है, लेकिन मैंने मेरे देशवासियों का जो मिजाज देखा है, भारत के लोगों ने क्‍या मन बनाया है।

मैंने एक बार एक छोटी-सी बात कही, देशवासियों के सामने। मैंने कहा कि आप जो घर में गैस का चूल्‍हा जलाते हैं, वो जो गैस का सिलेंडर आता है, उस पर करीब 500 रुपए सरकार सब्‍सिडी के रुप में देती है। आप ऐसे परिवार के हो जिनमें 500 रुपए तो चाय-पानी पर खर्च कर देते हैं। आप से सब्‍सिडी क्‍यों लेते हो, क्‍या आप ये सब्‍सिडी छोड़ नहीं सकते। इतना सा मैंने कहा था और आज मैं गर्व के साथ कहता हूं मेरे देश के 40 लाख परिवारों ने गैस सब्‍सिडी छोड़ दी। बगल की कुर्सी न छोड़ने का जो मन रहता था वो आज सब्‍सिडी छोड़ने के लिए तैयार हो जाता है और वो भी महात्‍मा गांधी कुछ कहे, लाल बहादुर शास्‍त्री कुछ कहे और देश कर ले, ये तो हमारे गले उतरता है, लेकिन मुझ जैसा एक सामान्‍य मानवीय, एक चाय बेचने वाला, ये देश के सामने एक बात रखे और मेरा देश इस बात को सर-आँखों पर उठा ले तब मेरा मन कहता है, ये देश नई ऊंचाइयों पर जाकर के रहेगा, ये देश स्‍वामी विवेकानंद जी ने जो सपना देखा था कि मैं मेरी भारत माता को विश्‍व गुरु के रूप में देख रहा हूं। मैं विश्‍वास से कहता हूं कि अब हिन्‍दुस्‍तान विवेकानंद जी के सपनों को साकार करने के लिए सज हो चुका है। जितनी विविधताएं, जितनी विशेषताएं, जितने किंतु परंतु हिन्‍दुस्‍तान में है, उतने ही सिंगापुर में है, उसके बावजूद भी हर कोई सिंगापोरियन है। हर कोई सिंगापुर बनाने में लगा हुआ है, हर कोई कंधे से कंधा मिलाकर के काम कर रहा है। हम भी इस बात में सिंगापुर से बहुत कुछ सीखना चाहते हैं। वसुधैव कुटुम्‍बकम, जिस धरती से मंत्र निकला, वहां भी जन-जन मेरे परिवार का है, हर कोई मेरा अपना है। वही भाव देश को आगे बढ़ाने की ताकत बनता है और उसी को आगे बढ़ाने की दिशा में हम लगातार कोशिश कर रहे हैं। सारी दुनिया को किस प्रकार से हिन्‍दुस्‍तान की तरफ, मैं पिछले दिनों विश्‍व के बहुत सारे नेताओं से मिला हूं। मैं जब चुनाव के मैदान में था तो मुझे पत्रकारों ने पूछा था कि आपकी विदेश नीति कैसी होगी? और मैं देख रहा था चुनाव के समय, पत्रकार बहुत बुद्धिमान होते हैं और बड़े चतुर भी होते हैं। तो जब मैं चुनाव अभियान करता था तो उनको मालूम था कि मोदी की weaknesses क्‍या है। वो बराबर लेकर के आते थे। तो उनको लगता था कि ये गुजरात जैसे छोटे राज्‍य में काम करता है, इसे हिन्‍दुस्‍तान का कोई अनुभव नहीं है, विदेश का तो सवाल ही नहीं होता। तो मुझे वो हर दूसरा-तीसरा सवाल घुमाकर के विदेश नीति पर ले आते थे। अब उस समय मैं चुनाव के कैम्‍पेन में था मैं उनको विदेश नीति क्‍या समझाऊ? लेकिन वो बराबर पकड़ लेते थे और उनको ये समझ आता था कि इसमें ये बंदा weak है और वो घुमा फिराकर मुझे वहीं ले जाते थे। तो फिर मैं इतना ही कहता था कि देखिए भाई जब हमें इस जिम्‍मेवारी को निर्वाह करने की नौबत आएगी तब क्‍या करना है वो देखेंगे, लेकिन मैं इतना विश्‍वास देता हूं, न हम आंख झुकाकर के बात करेंगे और न ही हम आंख दिखाकर के बात करेंगे, हम दुनिया से आंख मिलाकर बात करेंगे। आज 18 महीने के बाद मेरे प्‍यारे देशवासियों मैंने जो वादा किया था, वो निभाया है, न हिन्‍दुस्‍तान आंख झुकाकर के बात करता है, न कभी हिन्‍दुस्‍तान किसी को आंख दिखाने की कोशिश करता है, लेकिन हिन्‍दुस्‍तान आत्‍मविश्‍वास से भरा हुआ है, वो आंख मिलाकर के बात करता है। बराबरी से बात करता है और उसका एक परिणाम भी है। आज पूरा विश्‍व भारत के साथ बराबरी का व्‍यवहार कर रहा है। सारे विश्‍व को सवा सौ करोड़ देशवासियों वाला देश क्‍या होता है, उसकी ताकत क्‍या होती है, अब विश्‍व पहचानने भी लगा है, अनुभव भी करने लगा है। अब विश्‍व ये नहीं सोचता है कि भारत एक बहुत बड़ा बाजार है, हम अपना माल बेचने के लिए पहुंच जाएंगे, वो सोच बदल चुकी है। अब उसको लगता है, मौका मिल जाए तो हिन्‍दुस्‍तान के साथ पार्टनरशिप कर ले, भागीदारी कर ले। और ये अुनभव अब आ रहा है। इन दिनों हर क्षेत्र में ये अनुभव आ रहा है। 

भारत में विदेश का पूंजी निवेश एक बात निश्‍चित है। यहां बैठा हुआ कोई व्‍यक्‍ति ऐसा चाहता है कि हिन्‍दुस्‍तान जैसा है वैसा ही रहे, कोई चाहता है। हर कोई चाहता है न देश में बदलाव आए, हर कोई चाहता है देश आगे बढ़े, हर कोई चाहता है देश आधुनिक बने, हर कोई चाहता है देश से गरीबी मिटे, हर कोई चाहता है देश में नौजवान को रोजगार मिले। इस काम को पूरा करना है तो जहा से जो शक्‍ति मिले वो लेनी चाहिए कि नहीं लेनी चाहिए। अगर परिवार में कोई बीमार है और विेदेश की दवाई से काम चलने वाला है तो लानी चाहिए कि नहीं लानी चाहिए, बीमारी ठीक करनी चाहिए कि नहीं करनी चाहिए।

भारत में भी बहुत बड़ी मात्रा में विदेश पूंजी की जरूरत है। Foreign direct investment की आवश्‍यकता है और जब मैं FDI कहता हूं तो मेरे दिमाग में FDI एक साथ दो विषय लेकर चलती है। दुनिया की नजरों में FDI है foreign direct investment। लेकिन उस समय मेरे दिमाग में है – first develop India. और इसलिए FDI to FDI, foreign direct investment to first develop India. अब मुझे बताइए आप कितने ही सालों से पड़ोसी के बराबर-बराबर रहते हो और कभी अचानक 5-10 हजार की जरूरत पड़ गई और गए तो दे देगा क्‍या? वो कहेगा हां-हां बिलकुल, मैं तो मदद जरूर करूंगा। आप लोग ऐसा करो, आपके भाईसाहब बाहर गए है Monday को आएंगे, फिर मैं कुछ करूंगा। ऐसा ही करते हैं न, 10 हजार रुपया भी कोई बगल में देने के लिए तैयार नहीं होता। आज foreign direct investment में मैं जब सत्‍ता पर आया उसके पहले जो स्‍थिति थी, उसकी तुलना में 40% growth हुआ है 40%। हमें ये रुपयों की क्‍यों जरूरत है, कागज पर दिखाने के लिए नहीं। हमें बदलाव लाना है।

आज हमारे देश की रेलवे, मुझे बताइए रेलवे का इतना बड़ा नेटवर्क है, इतना बढ़िया नेटवर्क। दुनिया के कई देश जिसकी जनसंख्‍या है उससे ज्‍यादा लोग हमारे यहां एक समय रेल के डिब्‍बे में होते हैं। लेकिन समय रहते रेल आधुनिक होनी चाहिए कि नहीं होनी चाहिए, स्‍पीड बढ़नी चाहिए कि नहीं बढ़नी चाहिए। रेल की लंबाई बढ़नी चाहिए कि नहीं बढ़नी चाहिए, सेवाएं सुधरनी चाहिए कि नहीं सुधरनी चाहिए। अगर दुनिया के पास technology है, दुनिया के पास पैसे हैं, दुनिया के पास भारत एक अवसर है तो हमें मौका देना चाहिए कि नहीं देना चाहिए। मैं आज दुनिया में जो-जो देश रेलवे के लिए काम कर रहे हैं, उन सबसे मिला हूं, मैं कहा रहा हूं आइए। आधुनिक से आधुनिक technology लाइए और मेरे लिए रेलवे ये सिर्फ transportation नहीं है, मेरे लिए रेलवे transformation का engine है, हिन्‍दुस्‍तान के transformation का engine है। मैंने उसकी ताकत को जाना है, पहचाना है और आज विश्‍व भर के लोग। इसलिए हमने पहली बार देश में रेलवे को 100% foreign direct investment के लिए open up कर दिया है। नई technology आएगी, नई स्‍पीड आएगी, परिवर्तन आएगा और सबसे बड़ी बात।

जो लोगों विदेशों में जाते हैं उनको तो बराबर मालूम है आपकी जेब में लाखों रुपए पड़े हो, लेकिन कहीं एक चाय भी पीनी है तो मिलती है क्‍या? जब तक डॉलर नहीं होगा, चाय नहीं मिलती है। रुपया का डॉलर करना पड़ता है, रुपया का पाउंड करना पड़ता है, करना पड़ता है कि नहीं करना पड़ता है? अरे वो टैक्‍सी वाला भी कहेगा यार रुपया मेरे काम का क्‍या है भाई ये तो कागज है, मेरे काम का क्‍या है। तुम डॉलर में लाओ। भारत की करेंसी उसकी इज्‍जत बढ़नी चाहिए कि नहीं बढ़नी चाहिए, विश्‍व भारत की करेंसी को भी उतना ही सम्‍मान दे, ये हम चाहते हैं कि नहीं चाहते हैं? पहली बार लंदन के stock exchange में rupee bond के लिए हम लोग आगे बढ़े। रेलवे के लिए अब rupee bond दुनिया का कोई भी व्‍यक्‍ति रुपयों में invest कर सकता है और उसको रुपयों में वापिस मिल सकता है। ये रुपयों की इज्‍जत का कमाल है, वर्ना या तो गोल्‍ड चलता था, या डॉलर या पाउंड चलते थे। आज दुनिया के बाजार में हम रुपयों के रूप में enter कर रहे हैं। इसका कारण ये है कि पूरे विश्‍व में एक विश्‍वास पैदा हुआ है। ये जो rupee bond हमने लागू किया, अभी मैं जब UK गया था, अभी तक बहुत लोगों को पल्‍ले ही नहीं पड़ा है कि करके क्‍या आया है मोदी। अब आज मैं समझा रहा हूं तो शायद चर्चा शुरू होगी। rupee bond अपने आप में भारत की आर्थिक संपन्‍नता का एक महत्‍वपूर्ण मिसाल है और हिन्‍दुस्तान के हर नागरिक को इसे गौरव के रूप में देखना चाहिए और इसको उजागर करना चाहिए। तभी तो भारत की ताकत बढ़ती है। हम ही अपने आप को कोसते रहेंगे तो दुनिया हमारी तरफ क्‍यों देखेगी। इसलिए आत्‍मविश्‍वास के साथ एक समाज के रूप में विश्‍व के सामने हमारी एक पहचान बने, ताकत खड़ी हो, उस दिशा में हमारा प्रयास है।

आज हिन्‍दुस्‍तान में रक्षा के क्षेत्र में हमें सब चीजें import करनी पड़ती है, बाहर से लानी पड़ती है। अब आज के युग में क्‍या सवा सौ करोड़ देशवासियों को हम असुरक्षित रख सकते हैं, उनके नसीब पर छोड़ सकते हैं? देश के सवा सौ करोड़ देशवासियों को सुरक्षा की गारंटी होनी चाहिए कि नहीं होनी चाहिए? अब उसके लिए हमारे सेना के जवान डंडा लेकर के खड़ा हो जाएगा तो काम चलेगा क्‍या? उसको भी शक्‍ति संपन्‍न औजारों से ताकतवर बनाना पड़ेगा कि नहीं बनाना पड़ेगा? लेकिन क्‍या हम आजादी के 70 साल के बावजूद भी हर चीज बाहर से लाएंगे क्‍या, हर चीज import करेंगे क्‍या ? क्‍या सवा सौ करोड़ देशवासी बना नहीं सकते क्‍या? आपको हैरानी होगी, सुरक्षा के क्षेत्र में पुलिस वालों के पास एक साधन होता है – अश्रु गैस, tear gas. भीड़ को तितर-बितर करने के लिए वो tear gas छिड़कते हैं। आंसू निकलते हैं तो फिर आंदोलनकारी भागते है। हम रोने के लिए भी बाहर से लाते हैं। अब रोना कि हंसना मुझे समझ नहीं आता है। ये स्‍थिति बदलनी चाहिए। भारत का बहुत एक धन defence के लिए जो चीजें हम import करते हैं उसमें खर्च हो जाता है। भारत के पास नौजवान है, भारत के पास talent है, भारत के पास raw material है, भारत की आवश्‍यकता है। क्‍यों न हमारे defence equipment हिन्‍दुस्‍तान में क्‍यों नहीं बनने चाहिए और इसलिए मैंने बीड़ा उठाया है कि भारत में रक्षा क्षेत्र में भारत अपने कदमों पर खड़ा हो और इसके लिए हमने foreign direct investment को पहली बार 49% open up कर दिया है और हमने ये भी कहा है कि अगर उत्‍तम कक्षा की technology अगर उसमें involve है तो हम उसको 100% foreign direct investment के लिए open up कर देंगे। लोग आएंगे भारत में पूंजी लगाएंगे और भारत के नौजवान शस्‍त्रार्थ बनाएंगे, वो हमारी भी रक्षा करेंगे और कही भेजना है तो भेज भी पाएंगे और इसलिए दुनिया के देश आज हमारे साथ समझौता कर रहे हैं। एक समय ऐसा था कि defence में कुछ भी खरीददारी करनी है तो हर बार corruption के आरोप लग जाते थे। इसलिए या तो निर्णय नहीं होता था, या निर्णय होता था तो कहीं न कहीं से कोई बू आती थी। 18 महीने हो गए, हमने एक के बाद एक निर्णय किए, transparency के साथ निर्णय किए और अब तक कोई हमारे ऊपर उंगली नहीं उठा पा रहा है, देश की रक्षा के लिए आवश्‍यक है।

हमारा देश दुनिया में जिन देशों के पास समृद्धि है उनके सामने एक कठिनाई भी है। दुनिया के बहुत देश ऐसे भी है जो आर्थिक संपन्‍नता की ऊंचाइयों पर पहुंच चुके हैं। लेकिन उन देशों में बुढ़ापा घर कर गया है। जवानी नहीं बची है। भारत अकेला देश ऐसा है, जो दुनिया के जवान देशों में है। भारत की 65 प्रतिशत जनसंख्‍या; 800 मिलियन लोग, 35 साल से कम उम्र के है। जो देश जवानी से लबालब भरा हुआ हो उसके सपने भी जवान होते हैं, संकल्‍प भी जवान होते हैं, इरादे भी जवान होते हैं और पुरुषार्थ भी जवान होता है। हमें demographic dividend मिला हुआ है, लेकिन ये ताकत में तब बदलेगा जब हमारे नौजवान के हाथों में हुनर होगा, skill हो, रोजगार के अवसर हो, अगर वो नहीं है तो ये 35 साल की उम्र का नौजवान लंबे समय तक इंतजार नहीं कर सकता है और इसलिए देश को ये 65 प्रतिशत नौजवान है, उनकी शक्‍ति को भारत के निर्माण में लगाना है और इसलिए हमने अभियान चलाया है skill development और skill development में सिंगापुर का ITES, उसके साथ मिलकर के हम काम कर रहे हैं। हम जर्मनी जिसने skill development में काम किया है उसके साथ काम कर रहे हैं, हम USA के साथ काम कर रहे हैं। दुनिया के देशों से जिन्‍होंने skill development में महारत हासिल की है, उसके पास जो उत्‍तम है उसे हम लाना चाहते हैं। फिर उसमें जो, हमारे लोग उसमें तो ताकतवर है, जोड़ देंगे नया। हम बहुत तेजी से आगे निकल सकते हैं और इसलिए विश्‍व के साथ जब संबंध जोड़ते हैं तो ये ताकत हमारे काम आती है।

हमारे यहां बहुत बड़ी मात्रा में Universities, Colleges खुलते चले जा रहे हैं। private भी बहुत आ रहे हैं। लेकिन faculty नहीं मिलती है। खुल तो जाता है, student भी आ जाते हैं। हमने एक योजना बनाई ज्ञान। हमने विश्‍व भर में रहने वाले लोगों से कहा विशेषकर के भारतीय समुदाय को कहा कि आप जब आपके यहां मौसम खराब रहता हो, बड़ी कड़ाके की ठंड रहती हो, बर्फ रहता हो, तकलीफ से गुजारा करना पड़ता हो तो उस समय आप भारत चले आइए। 6 महीने हमारे यहां रहिए बच्‍चों को पढ़ाइए, 6 महीने उधर चले जाइए। जब हमारे यहां गर्मी शुरू हो तो वहां चले जाना। हमने USA के साथ समझौता किया और मुझे खुशी है कि बहुत बड़ी मात्रा में, सैंकड़ों की तादाद में बड़े-बड़े विद्वान भारतीय मूल के भी और विदेशी भी जो रिटायर्ड हुए हैं, वे आज भारत में आकर के पढ़ाने के लिए तैयार हुए हैं, हमारी नई पीढ़ी को शिक्षित करने के लिए।

कहने का मेरा तात्‍पर्य यह है कि मेरी कोशिश यह है कि दुनिया में जो श्रेष्‍ठ है हिन्‍दुस्‍तान में होना चाहिए और हमारा जो श्रेष्‍ठ है उसमें दुनिया का श्रेष्‍ठ जुड़ना चाहिए। इसलिए हमारी कोशिश यह है कि हमारा देश, हमारे नौजवान उसकी शक्‍ति को जोड़कर के हम आगे बढ़ना चाहते हैं।

अब आप में से यहां बहुत लोग होंगे जिनको शायद अपने गांव में बिजली का संकट रहता होगा, जिस गांव से 24 घंटे बिजली तो नसीब ही नहीं होती होगी। वो दिन याद है न कि सब भूल गए। आजादी के 70 साल के बाद क्‍या मेरा देशवासी उसे बिजली मिलनी चाहिए कि नहीं मिलनी चाहिए, 24 घंटे बिजली मिलनी चाहिए कि नहीं मिलनी चाहिए? उसको मोबाइल फोन तो मिल जाता है कि लेकिन चार्जिंग के लिए दूसरे गांव जाना पड़ता है। ये स्‍थिति बदलनी है, बस बदलनी है और हम सच्‍चाई से मुंह नहीं मोड़ सकते। ये हकीकत है कि आज भी मेरे देश के लाखों परिवार, करोड़ों परिवार, हजारों गांव बिजली के संकट से जूझ रहे हैं। अगर मुझे आधुनिक हिन्‍दुस्‍तान बनाना है, हमारे बच्‍चे स्‍कूलों में कंप्‍यूटर चलना, अगर उनको सीखाना है तो बिजली की जरूरत तो पड़ेगी। हमने बीड़ा उठाया है 2022, जब भारत की आजादी के 75 साल होंगे। देश आजादी के 75 साल मनाता होगा तब हिन्‍दुस्‍तान में हर परिवार को 24 घंटे बिजली, 365 दिन मिलेगी और एक तरफ दुनिया ग्‍लोबल वार्मिंग के कारण परेशान है। दुनिया दबाव डाल रही है कि कोयले से बिजली पैदा मत करो। हम भी चाहते हैं कि दुनिया के सुख में हम भी जुड़े क्‍योंकि हम तो वो लोग है जिन्‍होंने सदियों से पर्यावरण की रक्षा की है। हम ही तो लोग है जिन्‍होंने पौधे में परमात्‍मा देखा था। हम ही तो लोग है जो जीव में शिव के दर्शन करते हैं। इस महान परंपरा से निकले हुए हम लोग हैं और इसलिए हमारे लिए तो पर्यावरण ये हमारी सांसों की तरह हमारे साथ जुड़ा हुआ है और इसलिए हम मानव जाति को नुकसान हो ऐसा कभी सोच नहीं सकते और महात्‍मा गांधी से बढ़कर के पर्यावरण का कोई ambassador नहीं हो सकता है। environment का कोई ambassador नहीं हो सकता है। शायद दुनिया में अपने जीवन काल में कम से कम कार्बन foot print वाला कोई इंसान होगा, मैं कहता हूं शायद महात्‍मा गांधी अकेले होंगे और इसलिए हम ऊर्जा तो चाहते हैं लेकिन दुनिया के लिए कोई संकट भी पैदा नहीं करना चाहते। भारत ने सपना देखा है 2030 तक 40% बिजली non fossil के माध्‍यम से होगी, कोयले के माध्‍यम से नहीं होगी। मतलब ये जो छोटे-छोटे टापू देश हैं न जिनको डर लग रहा है कि समंदर का अगर स्‍तर बढ़ गया तो डूब जाएंगे, हम आपको डूबने नहीं देंगे। हमसे जो हो सकता है वो हिन्‍दुस्‍तान करेगा क्‍योंकि हम वसुधैव कुटुम्‍बकम वाले हैं। और इसलिए nuclear energy चाहिए, renewal energy चाहिए, hydro चाहिए, solar चाहिए, wind चाहिए, biomass में से निकलना चाहिए। अब ये चीजें जो हैं खर्चीली है। हम अगर nuclear energy में जाना चाहते हैं, हमे यूरेनियम चाहिए। यूरेनियम इसलिए नहीं मिलता है कि आपको जरूरत है या आपके पास पैसे है। यूरेनियम आजकल जब मिलता है जब आप पर विश्‍व का भरोसा हो कि आप इसका शांति के लिए ही उपयोग करेंगे और किसी पाप को आप भाग नहीं करोगे तब जाकर के दुनिया यूरेनियम देती है। भारत ने ये विश्‍वास पैदा किया है। हमारी आवश्‍यकता के अुनसार दुनिया के नए-नए देश अब हमें यूरेनियम देने के लिए तैयार हो गए। पिछले 18 महीने में कजाखिस्‍तान कहो, कनाडा कहो, ऑस्‍ट्रेलिया कहो इन्‍होंने भारत को Civil nuclear energy के लिए, हमारे साथ करार किए और कुछ लोगों को डिलीवरी देना शुरू कर दिया।

हम भारत के लोग जब बिजली की बात करते हैं तो ज्‍यादा से ज्‍यादा पहले तो यूनिट पे चर्चा करते थे, कितने यूनिट बिजली, कितना दाम वगैरह। थोड़ा आगे बढ़े, तो हम मेगावाट पर सोचने लगे भई इतना मेगावाट, इतना मेगावाट। भारत ने कभी बिजली के क्षेत्र में मेगावाट से आगे सोचा ही नहीं। हमने पहली बार फैसला किया है hundred seventy five gigawatt, Hundred seventy five gigawatt renewable energy. बड़ी सामान्‍य बुद्धि का विषय होता है। हम लोग स्‍कूल में जब exam देते थे तो टीचर क्‍या सिखाते थे? टीचर सिखाते थे कि exam में जाते हो तो देखा भाई जो सरल सवाल है उसको पहले उठाओ। ये ही सिखाते थे ना? मेरे टीचर ने तो ये ही सिखाया था। आपको भी वैसे ही सिखाया होगा कि जो easy question है उसको पहले address करो और जो कठिन है तो बाद में समय बच जाये तब देख लेना। ये होता है ना? मुझे बताइए हमारे पास कितना सूरज तपता है, करीब-करीब 365 दिन सूरज तपता हो और हम बच्‍चों को भी environment बढि़या ढंग से सिखाते हैं। हर मां बच्‍चे को कहती है कि ये चांदा तेरा मामा है और सूरज तेरा दादा है। लेकिन हमने कभी उस दादा की उंगली पकड़कर के चलना सीखा नहीं। क्‍यों न सूर्य शक्‍ति हमारे जैसे देश की विकास का बड़ा स्‍तंभ बन सकता है और इसलिए solar energy पर हम बल दे रहे हैं। 100 gigawatt solar energy, wind energy, biomass. मेरा जो clean India movement है न, 500 शहरों का जो कूड़ा-कचरा है, गंदगी हैं उसमें से बिजली पैदा करना, भले ही महंगी पड़े, लेकिन मेरा साफ शहर बनना चाहिए।

अब इन चीजों के लिए विदेशों से धन चाहिए, विदेशों से technology चाहिए, विदेशों से manufacturing करने वाले लोग चाहिए, जिन लोगों की इन चीजों में मास्‍टरी है वो लोग चाहिए, और मैं बड़े आनंद से कह सकता हूं कि आज दुनिया को भारत के hundred seventy five gigawatt renewable energy में इतना आकर्षण पैदा हुआ है, विश्‍व के राजनेताओं को ताज्‍जुब हो रहा है और विश्‍व के पूंजी निवेशकों को एक नया अवसर नजर आ रहा है कि वो भारत में आकर के बिजली के उत्‍पादन के अंदर हमारे साथ जुड़ने के लिए तैयार हो रहे हैं।

दुनिया के साथ संबंध होते हैं, वो संबंध goody-goody बातों से नहीं होते हैं। विश्‍व या तो आपका लोहा मानता है, या विश्‍व अपनेपन की भाषा समझता है। आज मैं संतोष के साथ कहता हूं कि विश्‍व के साथ भारत ने ऐसे संबंधों को बनाने का रूप लिया है। आप मुझे बताइए, पश्चिम एशिया के देशों में जो तूफान चल रहा है, निर्दोषों को मौत के घाट उतारा जा रहा है, आतंकवाद अपनी चरम सीमा पर है। उन देशों में 70 लाख हिन्‍दस्‍तानी रहते हैं, 70 लाख, seven million. आप मुझे बताइए आप सिंगापुर में रहते हैं इसलिए बहुत जल्‍द बात को समझोगे। क्‍या उनको उनके नसीब पे छोड़ देना चाहिए क्‍या? उन पर संकट आएगा तो किसी तरफ देखेंगे? किसकी तरफ देखेंगे? वे मुसीबत में होंगे तो किसकी तरफ देखेंगे? और तब भारत ये कहे के बेटे तुम तो चले गए थे अब क्‍या याद कर रहे हो, चलेगा क्‍या? अगर कहीं से आवाज उठती है, कहीं से एक भी सिसकी सुनाई देती है तो दूसरे ही पल उसको ये ही आवाज सुनाई देनी चाहिए कि चिंता मत करो, भारत है ना। कहीं पर भी सिसकी सुनाई दे, उसको ये ही आवाज सुनाई देनी चाहिए, हां भारत है ना। और एक बार उसके कान में स्‍वर गूंजता है तो वो निश्चिंत हो जाता है, ठीक है संकट के बादल आए हैं लेकिन मेरा देश मुझे बचा लेगा। और तब, ये विश्‍व के रिश्‍ते काम आते हैं, संबंध काम आते हैं। यमन हो, ईराक हो, हजारों की तादाद में हमारे भारतीय भाई-बहन फंसे थे, even हमारी केरल की Nurses बहनें, जीवन और मौत के बीच वो पल उन्‍होंने कैसे बिताए होंगे हम कल्‍पना कर सकते हैं।

लेकिन विश्‍व के साथ जो संबंध जुड़े हैं दुनिया के कुछ देशों से प्रार्थना की कि देखिए इसमें क्‍या मदद कर सकते हैं और मैं आज संतोष के साथ कह सकता हूं उन देशों ने हमारी इन बच्चियों को ला करके केरल तक पहुंचाने में हमारी भरपूर मदद की है। यमन में हमारे हजारों लोग फंसे थे, हम तीन महीने से उनको कह रहे थे कि भई निकलो, निकलो, निकलो। लेकिन कोई निकलने को तैयार नहीं था। ये बाहर जो रहते हैं इतनी बात ध्‍यान रखें भई। कितना हम समझाऐं वो, नहीं नहीं साहब वो तो देखा जाएगा। क्‍योंकि इतने प्‍यार से रहते थे, इतनी निकटता थी, उनको शक ही नहीं था कि कभी कोई मुसीबत आ सकती है? लेकिन चारों तरफ Bombarding शुरू हुआ। हमने दुनिया के कुछ देशों के लोगों के साथ मैंने फोन पर बात की। और आज मैं संतोष के साथ कहना हूं दुनिया के उन देशों ने हमारी मदद की और हम हजारों की तादाद में हमारे सभी यमन में फंसे हुए नागरिकों को ले करके वापिस आए। ईराक हो, लीबिया हो, यमन हो, विश्‍व के साथ संबंध आज के युग में हर पल, हर समय आवश्‍यकता होती है। अरे कभी-कभार नेपाल में हमारे यात्री चले जाएं और एक बस गड्ढे में पड़ जाए, अगर नेपाल सरकार के साथ नाता नहीं होगा तो उन बेचारों का कौन देखेगा? विश्‍व के साथ संबंध बनाने का प्रयास और formality से नहीं चलता, आज युग बदल चुका है, जीवंत नाता होना अनिवार्य होता है और तब जा करके हमारे देशवासियों की जिंदगी दांव पर लगी हो तब वो संबंध काम आ जाते हैं और उनकी जिंदगी बच जाती है।

दुनिया के किसी एक देश में कोई एक भारतीय की जान चली जाए तो पूरा हिंदुस्‍तान बेचैन हो जाता है, हजारों की जान बच जाएं तो खुशी कितनी हो सकती है इसका आप अंदाज लगा सकते हो भाई। और इसलिए हमारी ये कोशिश रही है कि भारत विकास की नई ऊंचाइयों को पार करे और आज वो जमाना नहीं है कि आपने चार देशों के साथ दोस्‍ती बना ली तो गाड़ी चल जाएगी। पहले तो दुनिया दो गुटों में बंटी हुई थी, आप किसी गुट के साथ दोस्‍ती कर लो तो वो गुट आपकी रखवाली कर लेता था। आज वो युग नहीं है। आज पूरा विश्‍व Inter-dependent हो गया है। कोई भी दुनिया का देश Isolated नहीं रह सकता है और कोई भी दुनिया का देश अकेला ही सब कर लूंगा, दुनिया का समृद्ध से समृद्ध देश होगा, ताकतवर से ताकतवर देश होगा, लेकिन छोटे से छोटे देश पर भी वो dependent होता है। पूरी दुनिया Inter-dependent है। भारत ने अगर दुनिया में आगे बढ़ना है, भारत ने अपनी जगह बनानी है तो Inter-dependent इस दुनिया के अंदर हमने भी अपने संबंधों को ताजगी देनी पड़ती है। देश छोटा, कितना ही छोटा क्‍यों न हो, लेकिन union में उसकी ताकत होती है। आप कल्‍पना कर सकते हैं, मैं हिंदुस्‍तान के वासियों को कहूं कि गैस की Subsidy छोड़ दो, 40 लाख लोग Gas Subsidy छोड़ दें, भारत का वक्‍त कैसा बदला है।

अगर हिंदुस्‍तान ये कहे कि दुनिया नाक पकड़ ले, योगा करे, हमने किसी को कान पकड़ने के लिए नहीं कहा है। 21 जून को पूरा विश्‍व अंतर्राष्‍ट्रीय योगा दिवस मनाए। कौन भारतीय होगा जिसको इस बात का गर्व नहीं हुआ होगा भाइयो, बहनों। जिस दिन Neil Armstrong ने चन्‍द्रमा पर पग रखा होगा, सिर्फ American नहीं, विश्‍व की मानव जात ने गौरव अनुभव किया होगा। आज जब 21 जून को पूरा विश्‍व Holistic Health Care को ले करके योगा दिवस बनाने के लिए आगे आ जाए, कोई बंधन नहीं, कोई रंग नहीं, कोई रूप नहीं, कोई परंपरा नहीं, कोई सम्‍प्रदाय नहीं, कोई बाधाएं नहीं, एक मन से योगा के लिए विश्‍व तैयार हो गया। और दुनिया की पहली घटना है कि इतने कम समय में, United Nation में ये प्रस्‍ताव पारित हुआ, इतने देशों ने इसको Co-sponsor किया, और दुनिया के इतने देशों ने इसको बनाया। सिगापुर ने भी बड़े धूमधाम से योगा दिवस बनाया। अब ये कोई, मोदी कोई योगा लाया है क्‍या? ये तो था ही था। लेकिन हमें हमारे पर भरोसा नहीं था क्‍योंकि हम संकोच करते थे, यार किसी को कहेंगे तो पता नहीं वो नाक चढ़ा देगा, और पता नहीं इंकार कर देगा तो, अगर हमारा अपने-आप में विश्‍वास हो तो दुनिया हमारे साथ चलने के लिए तैयार होती है। दुनिया भी, दुनिया भी शांति की तलाश में है, दुनिया भी संतोष की तलाश में है, कोई तो आएं जो अंगुली पकड़ करके चलाएं, दुनिया चलने के लिए तैयार है और भारत, भारत आज तैयार हुआ है विश्‍व के साथ कंधे से कंधा मिला करके तैयार हुआ है, चल सकता है भारत।

भाइयों, बहनों मेरा एक ही काम लेकर के मैं निकला हूं और उस काम को पूरा करने के लिए मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए। सवा सौ करोड़ देशवासियों के आशीर्वाद के साथ-साथ विश्‍व में फैले हुए मेरे भारत के प्‍यारे भाइयों-बहनों, आपके आशीर्वाद चाहिए। और वो काम है, एक ही काम करना है मुझे, विकास, विकास, विकास। और वो विकास जो गरीब के आंसू पोंछने की ताकत रखता हो, वो विकास जो नौजवान को रोजगार देता हो, वो विकास जो किसान की जिंदगी में खुशहाली लाता हो, वो विकास जो हमारी माताओं-बहनों को empower करता हो, वो विकास जो एकता और अखंडता के मंत्र को ले करके विश्‍व के अंदर सिर ऊंचा करके खड़ा रह सकता हो, वैसा विकास करने का सपना ले करके मैं चला हूं। भारत आगे बढ़े इतना काफी नहीं है, भारत आधुनिक बने ये भी उतना ही आवश्‍यक है। हम सिर्फ, कभी-कभी क्‍या होता है, आप देखा होगा, किसी senior citizen को आप मिलोगे, 70 साल की उम्र हो गई होगी, 80 साल की उम्र हो गई होगी, पोते-पोतियां नमस्‍ते करने जाएंगे तो वो क्‍या करता है, आओ बैठो, देखो मैं जब 30 साल का था ना ऐसा करता था और बच्‍चों ने ये बात दस बार सुनी होगी, तो जब दादा बुलाते हैं तो बच्‍चे भाग जाते हैं। उनको लगता है कि ये दादा अब फिर कुछ कथा सुनाएंगे। ऐसा हम देखते हैं, परिवार के जीवन में हम देखते हैं। बालक भी लंबे समय तक पुराने पराक्रमों को सुनने के लिए तैयार नहीं हैं।

मैं देशवासियों को ये कहने की हिम्‍मत करता हूं आज, हमारे पूर्वजों ने जो परा‍क्रम किए हैं, वो हमारी प्रेरणा के कारण बन सकते हैं लेकिन हमारे पूर्वजों के पराक्रम पर गीत गाते-गाते हम गुजारा नहीं कर सकते हैं। हमने अपने युग में, हमने पूर्वजों के पराक्रम से प्ररेणा ले करके अपने वर्तमान को भी उज्‍जवल करना है, और भविष्‍य की मजबूत नींव डालना ये हमारा दायित्‍व बनता है। सिर्फ महान संस्‍कृति, महान परंपरा, पांच हजार साल का उज्‍ज्‍वल इतिहास, इसी के गीत गाते रहें और पड़ोसी को कभी पानी भी पिलाने को तैयार न हों, ऐसा कभी मेरा देश नहीं हो सकता है। और इसलिए पूवर्जों के पराक्रम, महान संस्‍कृति, महान परंपरा, उसकी जो उत्‍तम चीजें हैं, उसको हमें प्रेरणा लेनी है लेकिन अपने पसीने से वर्तमान को भरना है। अपनी इच्‍छाशक्ति से इसकी मजबूत नींव डालनी है ताकि आने वाली पीढ़ी ये न कहे कि आपने पूर्वजों ने तो बहुत कर के गये, तुम बताओ बेटे तुमने क्‍या किया? ये सवाल का जवाब देने का हमारे में हौसला होना चाहिए ऐसा हिंदुस्‍तान बनाना है। अपने सामर्थ्‍य से, अपने पराक्रम से, अपने पुरुषार्थ से, अपने त्‍याग से, अपनी तपस्‍या से, हमने हमारे देश को बनाना चाहिए, हमने हमारे देश को आगे बढ़ाना चाहिए और हमारे जो मूल्‍य हैं, सांस्‍कृतिक विरासतें हैं उसको विश्‍व को परिचित कराना चाहिए, ये जब तक हम संतुलन नहीं करते, दुनिया हमें स्‍वीकार नहीं करेगी।

मुझे विश्‍वास है कि विकास के इन सपनों को ले करके जो हम चल रहे हैं, उसमें आपका पूरा-पूरा योगदान रहेगा। भारत का गौरव बढ़ाने के लिए हम जहां हों, जहां भी हों हम जरूर अपनी तरफ से प्रयास करते रहें। दुनिया को देने के लिए इस देश के पास बहुत कुछ है। अनेक संकटों के बाद भी आज भी सीना तान करके खड़े रहने की हम में हिम्‍मत है। लेकिन सीना सीना तानना पड़े, दिन आने नहीं चाहिए। और वो तब होता है, जब हम अपने वर्तमान को विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए पुरुषार्थ करते हैं, सामूहिक पुरुषार्थ करते हैं, सामर्थ्‍य के साथ चलते हैं, तब जा करके परिणाम मिलता है।

सिंगापुर को हर किसी ने बनाया है, हर कोई बना रहा है, और सिंगापुर भी अगल-बगल के मुल्‍कों को बनाने की ताकत रखता है। मैं सिंगापुर को बहुत-बहुत बधाई देता हूं, इस सिंगापुर की विकास यात्रा को मैं नमन करता हूं। इस सिंगापुर ने, सिंगापुर सचमुच में सौ-सौ सलाम करने वाला देश बन गया है, मैं उसको मेरी तरफ से बहुत-बहुत बधाई देता हूं और सवा सौ करोड़ का देश हिंदुस्‍तान वो भी उमंग और उत्‍साह के साथ आगे बढ़ेगा इसी एक संकल्‍प के साथ मैं फिर एक बार सभी को बहुत-बहुत बधाई देता हूं, बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं, बहुत-बहुत धन्‍यवाद करता हूं। धन्‍यवाद। Thank You.

بھارتی اولمپئنس کی حوصلہ افزائی کریں۔ #Cheers4India
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آیئے اپنے کھلاڑیوں تک اپنی نیک خواہشات پہنچائیں اور ان کی حوصلہ افزائی کریں: وزیر اعظم مودی
کارگل جنگ بھارتی افواج کی بہادری اور تحمل کی علامت ہے، جس کا مشاہدہ پوری دنیا نے کیا تھا: وزیر اعظم مودی
'امرت مہوتسو نہ تو حکومت کا پروگرام ہے نہ ہی کسی سیاسی جماعت کا۔ یہ بھارت کے عوام کا پروگرام ہے: وزیر اعظم مودی
#میرا ہینڈلوم میرا فخر: وزیر اعظم مودی نے شہریوں سے کھادی اور ہتھ کرگھا مصنوعات خریدنے کی اپیل کی۔
من کی بات میں مثبت طرز فکر اور حساسیت دونوں شامل ہے۔ یہ پروگرام ایک جامع کردار کا حامل ہے:وزیر اعظم مودی
یہ جان کر خوشی ہوئی کہ من کی بات کے لئے موصول ہونے والے سجھاؤں میں سے 75 فیصد سجھاؤ 35 برس سے کم عمر کے زمرے کے افراد کی جانب سے آتے ہیں: وزیر اعظم مودی
پانی کی ہر ایک بوند کا تحفظ اور پانی کے کسی بھی طرح کے ضیاع کو روکنا ہماری زندگی کا جزولاینفک ہونا چاہئے: وزیر اعظم مودی

میرے پیارے ہم وطنو ،  نمسکار !

دو دن پہلے کی کچھ خوبصورت تصویریں ، کچھ یاد گار پل ، اب بھی میری آنکھوں کے سامنے ہیں  ۔ اس لئے اِس مرتبہ ’’ من کی بات‘‘ کی شروعات ، انہی لمحوں سے کرتے ہیں ۔ ٹوکیو اولمپکس میں بھارتی کھلاڑیوں کو ترنگا لے کر چلتے دیکھ کر میں ہی نہیں ، پورا ملک جھوم اٹھا ۔  پورے ملک نے جیسے ایک ہوکر اپنے اِن جانبازوں سے کہا –

تمہاری فتح ہو ! تمہاری فتح ہو !

جب یہ کھلاڑی بھارت سے روانہ ہوئے تھے تو مجھے ان کے ساتھ گپ شپ کرنے کا ، ان کے بارے میں جاننے اور ملک کو بتانے کا موقع ملا۔ یہ کھلاڑی زندگی کے بہت سے چیلنجوں کا سامنا کرتے ہوئے یہاں تک پہنچے ہیں۔ آج ، ان کے پاس  آپ کی محبت اور حمایت کی قوت  ہے۔ اس لئے آئیے مل کر اپنے تمام کھلاڑیوں کو  اپنی نیک خواہشات پیش کریں، ملک کا حوصلہ بڑھائیں ۔ سوشل میڈیا پر اولمپکس کھلاڑیوں کی حمایت کے لئے ہمارا وِکٹری پنچ کمپین اب شروع ہو چکا ہے ۔ آپ بھی اپنی ٹیم کے ساتھ اپنا وِکٹری پنچ شیئر کریئے۔ بھارت کے لئے چیئر کریئے ۔

ساتھیو ،  جو ملک کے لئے ترنگا اٹھاتا ہے ، اُس کے احترام میں جذباتی ہو جانا فطری بات ہے ۔ حب الوطنی کا یہ جذبہ ہم سب کو جوڑتا ہے ۔ کل یعنی 26 جولائی کو  ’’ کرگل وجے دِوس ‘‘ بھی ہے۔ کرگل کی جنگ بھارتی فوجوں کی بہادری اور تحمل کی ایک ایسی علامت ہے ، جسے پوری دنیا نے دیکھا ہے۔ اس بار یہ شاندار دن ’’ امرت مہوتسو ‘‘ کے دوران منایا جائے گا ۔ اس لئے یہ اور بھی خاص ہوجاتا ہے۔ میری خواہش ہے کہ آپ کرگل کی سنسنی خیز کہانی ضروری پڑھیں ، ہم سب کرگل کے بہادروں  کو سلام پیش کریں۔

ساتھیو ،  اس مرتبہ  15 اگست کو ، ملک آزادی کے 75 ویں سال میں داخل ہورہا ہے۔ یہ ہماری بہت بڑی خوش قسمتی ہے کہ جس آزادی کے لئے ملک نے صدیوں کا انتظار کیا ، اُس کے 75 سال پورے ہونے کے ہم گواہ بن رہے ہیں ۔  آپ کو یاد ہوگا ، آزادی کے 75 سال منانے کے لئے ، ’’ امرت مہوتسو ‘‘  کا آغاز 12 مارچ کو باپو کے سابرمتی آشرم سے ہوا تھا۔ اس دن باپو کی ڈانڈی یاترا کی بھی تجدید کی گئی تھی ،  تب سے جموں و کشمیر سے پڈوچیری تک ، گجرات سے شمال مشرق تک ، ’’امرت مہوتسو ‘‘  سے متعلق پروگرام پورے ملک میں جاری ہے۔ ایسے بہت سارے واقعات ، ایسے جدو جہد آزادی کے سپاہی، جن کا تعاون تو بہت زیادہ ہے لیکن اُن کا ذکر اتنا نہیں ہو پایا ، آج لوگ ان کے بارے میں بھی جان رہے  ہیں۔ اب ، مثال کے طور پر ، موئیرانگ ڈے کو ہی لے لیجئے ! منی پور کا ایک چھوٹا سا قصبہ ، موئیرانگ ، کسی زمانے میں نیتا جی سبھاش چندر بوس کی انڈین نیشنل آرمی یعنی ( آئی این اے )  کا ایک اہم  ٹھکانہ  تھا۔ یہاں ، آزادی سے قبل ہی ، آئی این اے کے کرنل شوکت ملک نے پرچم لہرایا تھا۔ ’’ امرت مہوتسو ‘‘ کے دوران 14 اپریل کو اسی موئیرانگ میں ایک بار پھر ترنگا لہرایا گیا۔  ایسے بہت سے آزادی کے سپاہی اور عظیم شخصیات ہیں ، جنہیں ’’ امرت مہوتسو ‘‘ میں ملک یاد کر رہا ہے ۔ حکومت اور سماجی اداروں کی طرف سے بھی لگاتار اس طرح کے پروگراموں کا انعقاد کیا جا رہا ہے ۔ ایسا ہی ایک پروگرام اس مرتبہ  15 اگست کو ہونے والا ہے ۔ یہ ایک کوشش ہے – قومی ترانے سے جڑی ہوئی ۔  ثقافت کی وزارت کی کوشش  ہے کہ اس دن ہندوستان کے زیادہ سے زیادہ لوگ قومی ترانہ ایک ساتھ مل کر گائیں ۔ اس کے لئے ایک ویب سائٹ بھی بنائی گئی ہے  Rashtragan.in۔ اس ویب سائٹ کی مدد سے آپ قومی ترانہ گاکر ، اُسے ریکارڈ کر سکیں گے، اس مہم سے جڑ سکیں گے ۔  مجھے امید ہے کہ آپ اس انوکھی پہل سے ضرور جڑیں گے ۔ اسی طرح کی بہت ساری مہم ، بہت ساری کوششیں آپ کو آنے والے دنوں میں دیکھنے کو ملیں گی ۔ ’’  امرت مہوتسو ‘‘ کسی حکومت کا پروگرام نہیں ہے ، کسی سیاسی پارٹی کا پروگرام نہیں ہے ، یہ پوری طرح ہندوستانیوں کا پروگرام ہے ۔ ہر آزاد  اور ممنون ہندوستانی کا اپنے آزادی کے سپاہیوں کو سلام  ہے اور اس مہوتسو کا بنیادی جذبہ تو بہت وسیع ہے ۔ یہ جذبہ ہے ، اپنے جدو جہد آزادی  کے سپاہیوں کے راستے پر چلنا ، اُن کے خوابوں کا ملک بنانا  ، جیسے – ملک کی آزادی کے متوالے ، آزادی کے لئے متحد ہوگئے تھے ، ویسے ہی ہمیں ملک کی ترقی کے لئے متحد ہونا ہے ۔ ہمیں ملک کے لئے جینا ہے ،  ملک کے لئے کام کرنا ہے اور اس میں چھوٹی چھوٹی کوششوں سے بھی بڑے نتائج حاصل ہو جاتے ہیں ۔ روز مرہ کے کام کرتے ہوئے بھی ہم قوم کی تعمیر کر سکتے ہیں ، جیسے ووکل فار لوکل   ۔ ہمارے ملک کے مقامی صنعت کاروں ، فن کاروں ، دست کاروں ، بنکروں کی حمایت کرنا ، ہمارے رویے میں ہونا چاہیئے ۔ 7 اگست کو آنے والا قومی یومِ ہینڈلوم ایک ایسا ہی موقع ہے ، جب ہم کوشش کرکے بھی یہ کام کرسکتے ہیں ۔ قومی یومِ ہینڈ لوم کے ساتھ بہت  تاریخی واقعہ جڑا ہوا ہے ۔ اسی دن 1905 ء میں سودیشی کی شروعات ہوئی تھی ۔

ساتھیو ، ہمارے ملک کے دیہی اور قبائلی علاقوں میں ہینڈ لوم کمائی کا ایک بہت بڑا وسیلہ ہے ۔ یہ  ایسا شعبہ ہے ، جس سے لاکھوں خواتین ، لاکھوں بنکر ، لاکھوں دست کار جڑے ہوئے ہیں ۔ آپ کی  چھوٹی چھوٹی کاوشوں سے بنکروں کو نئی امید ملے گی۔ آپ خود بھی کچھ نہ کچھ خریدیں اور اپنی بات دوسروں کو بھی بتائیں  اور جب ہم آزادی کے 75 سال کا جشن منا رہے ہیں تو  ہماری ذمہ داری ہے کہ ہم ایسا کریں۔ آپ نے دیکھا ہوگا ، سال 2014 ء کے بعد سے ہی  ’’ من کی بات ‘‘ میں ہم اکثر کھادی کے بارے میں بات کرتے ہیں۔  یہ آپ کی ہی کوشش ہے  کہ آج ملک میں کھادی کی فروخت میں کئی گنا اضافہ ہوا ہے۔ کیا کوئی سوچ سکتا تھا کہ ایک کھادی کے کسی اسٹور سے ایک دن میں ایک کروڑ سے زیادہ کی فروخت ہو سکتی  ہے! لیکن ، آپ نے یہ بھی کر دکھایا  ہے۔ جب بھی آپ کہیں بھی کھادی کی کوئی چیز خریدتے ہیں تو اس سے ہمارے غریب بنکر بھائیوں اور بہنوں کا ہی فائدہ ہوتا ہے۔ لہٰذا ، کھادی خریدنا ایک طرح سے عوامی خدمت ہے ، یہ قوم کی خدمت بھی ہے۔ میں آپ سبھی عزیز بھائیوں اور بہنوں سے گزارش کرتا ہوں کہ وہ دیہی علاقوں میں تیار کردہ ہینڈلوم مصنوعات خریدیں اور اسے #MyHandloomMyPride کے ساتھ شیئر کریں۔

ساتھیو  ، جب آزادی کی تحریک اور کھادی کی بات آتی ہے تو پوجیے باپو کو یاد رکھنا فطری بات ہے ۔ جیسے باپو کی قیادت میں ’’ بھارت چھوڑو ‘‘ مہم چلی تھی ، ویسے ہی آج ہر شہری کو  ’’ بھارت جوڑو ‘‘ مہم کی قیادت کرنی ہے ۔  یہ ہماری ذمہ داری ہے کہ ہم اپنے کام اِس طرح  کریں ، جو تنوع والے  ہمارے بھارت کو جوڑنے میں مدد گار ہو سکیں ۔  تو آیئے ہم ’’ امرت مہوتسو  ‘‘ پر  یہ امرت عہد  کریں کہ ملک ہی ہمارا سب سے بڑا عقیدہ  اور سب سے بڑی ترجیح بنا  رہے گا ۔  ’’ نیشن فرسٹ ، آلویز فرسٹ ‘‘ کے نعرے کے ساتھ ہی ہمیں آگے بڑھنا ہے ۔

میرے پیارے ہم وطنو ، آج  میں من کی بات سننے والے اپنے نوجوان ساتھیوں کا  خصوصی طور پر شکریہ ادا کرنا چاہتا ہوں ۔ ابھی کچھ دن پہلے ہی  MyGov کی طرف سے  ’’ من کی بات ‘‘ کے سامعین کے بارے میں ایک مطالعہ کیا گیا تھا  ۔ اس مطالعے میں یہ دیکھا گیا کہ من کی بات کے لئے پیغامات اور مشورے بھیجنے والوں میں ، خاص طور پر کون لوگ ہیں ۔ مطالعے کے بعد یہ بات سامنے آئی کہ پیغامات اور تجاویز بھیجنے والوں میں تقریباً تقریباً 75 فی صد لوگ 35 سال کی عمر سے کم  ہیں یعنی بھارت کی نوجوان قوت کی تجاویز ’’ من کی بات ‘‘ کو راستہ دکھا رہی ہیں ۔  میں اسے ایک بہت اچھی علامت کے طور پر دیکھ رہا ہوں۔ ’’ من کی بات ‘‘ ایک ایسا ذریعہ ہے ، جہاں مثبت انداز اور حساسیت پائی جاتی ہے ۔ ’’ من کی بات ‘‘ میں ہم مثبت باتیں کرتے ہیں ۔ اس کا کریکٹر  اجتماعی  ہے ۔

مثبت خیالات اور مشوروں کے لئے بھارت کے نو جوانوں کی یہ سرگرمی مجھے خوش کرتی ہے ۔ مجھے اس بات کی بھی خوشی ہے کہ ’’ من کی بات  ‘‘ کے ذریعے مجھے نو جوانوں کے دِل کو بھی جاننے کا موقع ملتا ہے ۔

ساتھیو ، آپ لوگوں سے  ملے مشورے  ہی  ’’ من کی بات  ‘‘  کی اصل طاقت ہیں  ۔ آپ کی تجاویز  ’’ من کی بات  ‘‘ کے ذریعے بھارت کے تنوع کا اظہار کرتی ہیں ،  بھارت میں رہنے والوں کی خدمت اور قربانی کو چاروں طرف پھیلاتی ہیں ۔ ہمارے محنت کش نو جوانوں کے اننوویشن سب کو ترغیب دیتے ہیں ۔  ’’ من کی بات  ‘‘  میں آپ کئی طرح کے آئیڈیاز بھیجتے ہیں ۔ ہم سبھی پر تو تبادلۂ خیال نہیں کر سکتے لیکن اُن میں سے بہت سے آئیڈیا کو میں متعلقہ شعبوں کو ضرور بھیجتا ہوں   تاکہ اُن پر آگے کام کیا جا سکے ۔

ساتھیو ،  میں آپ کو  سائیں پرنیت جی کی کوششوں کے بارے میں بتانا چاہتا ہوں ۔ سائیں پرنیت جی ، ایک سافٹ ویئر انجینئر ہیں ۔ آندھرا پردیش کے رہنے والے ہیں ۔ پچھلے سال انہوں نے دیکھا کہ اپنی جگہ موسم کی وجہ سے کسانوں کو بہت پریشانی کا سامنا کرنا پڑا۔ وہ کئی سالوں سے محکمہ موسمیات میں دلچسپی لے رہے تھے ۔ لہٰذا انہوں  نے اپنی دلچسپی اور اپنی صلاحیتوں کو کسانوں کی بہتری کے لئے استعمال کرنے کا فیصلہ کیا۔ اب وہ موسم کے اعداد و شمار کو مختلف اعداد و شمار کے ذرائع سے خریدتے ہیں ، اس کا تجزیہ کرتے ہیں اور مقامی زبان میں مختلف ذرائع کے ذریعہ کاشت کاروں کو ضروری معلومات منتقل کرتے ہیں۔ موسم کی تازہ معلومات  کے علاوہ ، پرنیت جی الگ الگ آب و ہوا کی صورت حال میں لوگوں کو کیا کرنا چاہیئے ،  اس کی بھی رہنمائی کرتے ہیں ، خاص طور پر سیلاب سے بچنے کے لئے یا طوفان یا آسمانی بجلی کی صورت میں کیسے بچا جائے ، اس کے بارے میں بھی وہ لوگوں کو بتاتے ہے۔

ساتھیو  ، ایک طرف اس نوجوان سافٹ ویئر انجینئر کی یہ کوشش دل کو چھو لینے والی ہے ، دوسری طرف ہمارے ایک اور ساتھی کے ذریعہ ٹیکنالوجی کا استعمال بھی آپ کو تعجب کرنے پر مجبور کرے گا ۔ یہ ساتھی ہیں ،  اڈیشہ کے سنبل پور ضلعے کے ایک گاؤں میں رہنے والے جناب اسحاق منڈا جی ، جو کبھی ایک دیہاڑی مزدور کے طور پر کام کرتے تھے لیکن اب وہ ایک انٹرنیٹ سنسیشن بن گئے ہیں ۔ اپنے یو ٹیوب چینل سے وہ کافی رقم کما رہے  ہیں ۔ وہ اپنے ویڈیوز میں مقامی کھانے ، روایتی کھانے بنانے کے طریقے ، اپنے گاؤں ، اپنی طرز زندگی ، خاندان اور کھانے پینے کی عادتوں کو خاص طور سے دکھاتے ہیں ۔ ایک  یو ٹیوبر کی شکل میں ، اُن کا سفر مارچ ، 2020 ء  میں شروع ہوا تھا ، جب انہوں نے اڈیشہ کے مشہور مقامی  کھانے پکھال سے جڑا ایک ویڈیو پوسٹ کیا تھا ۔ تب سے اب تک وہ سینکڑوں ویڈیو پوسٹ کر چکے  ہیں۔  یہ کوشش کئی وجہ سے سب سے الگ ہے ، خاص طور پر اس لئے کہ اس سے شہروں میں رہنے والے لوگوں کو ، وہ طرز زندگی دیکھنے کا موقع ملتاہے ، جس کے بارے میں وہ زیادہ کچھ نہیں جانتے ۔  اسحاق منڈا جی کلچر اور کھانوں دونوں کو برابر ملاکر جشن منا رہے ہیں اور ہم سب کو تحریک بھی  دے رہے ہیں ۔

          ساتھیو ،  جب ہم ٹیکنالوجی کی بات کر رہے ہیں تو میں ایک اور دلچسپ موضوع پر بات کرنا چاہتا ہوں ۔ آپ نے حال فی الحال میں پڑھا ہوگا ، دیکھا ہوگا کہ آئی آئی ٹی مدراس کے طالب علم کے ذریعے قائم کی گئی ایک اسٹارٹ اَپ نے ایک 3 ڈی پرنٹڈ ہاؤس بنایا ہے ۔ 3 ڈی پرنٹنگ کرکے گھر کی تعمیر ، آخر یہ ہوا کیسے ؟ دراصل اِس اسٹارٹ اَپ نے سب سے پہلے 3 ڈی پرنٹر میں ایک تین پہلو والے ڈیزائن کو فیڈ کیا اور پھر ایک خاص طرح کی کنکریٹ کے ذریعے پرت  دَر پرت ایک تھری ڈی ڈھانچہ تیار کر دیا ۔ آپ کو یہ جان کر خوشی ہوگی کہ ملک بھر میں ، اِس طرح کی کئی کوششیں ہو رہی ہیں ۔  ایک وقت تھا ، جب چھوٹے چھوٹے تعمیری کام میں بھی کئی سال لگ جاتے تھے لیکن آج ٹیکنا لوجی کی وجہ سے بھارت میں صورتِ حال بدل رہی ہے ۔ کچھ وقت پہلے ہم نے  دنیا بھر کی ایسی  اختراعی کمپنیوں کو مدعو کرنے کے لئے ایک عالمی ہاؤسنگ ٹیکنالوجی چیلنج لانچ کیا تھا  ۔ یہ ملک میں اپنی نوعیت کی ایک انوکھی کوشش ہے ۔ لہٰذا ، ہم نے ان کو لائٹ ہاؤس پروجیکٹس کا نام دیا۔ اس وقت ملک میں 6 مختلف مقامات پر لائٹ ہاؤس پروجیکٹس پر تیز رفتاری سے کام جاری ہے۔ ان لائٹ ہاؤس پروجیکٹس میں جدید ٹیکنالوجی اور جدید طریقے استعمال کئے جاتے ہیں۔ اس سے تعمیرات کا وقت کم ہوجاتا ہے نیز جو مکانات تعمیر کئے گئے ہیں ، وہ زیادہ پائیدار ، کفایتی  اور آرام دہ ہوتے ہیں۔ میں نے حال ہی میں ڈرون کے ذریعے  ان منصوبوں کا جائزہ لیا اور کام کی پیشرفت کو براہ راست دیکھا۔

اِندور کے پروجیکٹ میں ، بِرک اور مورٹار وال کی جگہ  پری فیبریکیٹڈ  سینڈویچ پینل سسٹم استعمال کیا جارہا ہے۔ راجکوٹ میں لائٹ ہاؤس فرانسیسی ٹیکنالوجی سے بنائے جا رہے ہیں ، جس میں سرنگوں کے ذریعہ  کنکریٹ کی تعمیراتی ٹیکنالوجی کا استعمال کیا جارہا ہے۔ اس ٹیکنالوجی سے بنائے گئے گھر آفات کا سامنا کرنے کے کہیں زیادہ اہل  ہوں گے۔ چنئی میں ، امریکہ اور فن لینڈ کی پری کاسٹ کنکریٹ سسٹم ٹیکنالوجی کا استعمال کیا جارہا ہے۔ اس کی مدد سے مکانات تیزی سے تعمیر ہوں گے اور لاگت بھی کم آئے گی۔ جرمنی کے تھری ڈی کنسٹرکشن سسٹم کا استعمال کرتے ہوئے رانچی میں مکانات تعمیر کئے جائیں گے۔ اس میں ، ہر کمرے کو الگ سے بنایا جائے گا ، پھر پورے ڈھانچے کو اسی طرح جوڑا جائے گا ، جیسے  بلاک کھلونوں کو جوڑا جاتا ہے ۔ نیوزی لینڈ کی ٹیکنالوجی کا استعمال کرتے ہوئے اسٹیل فریم کے ساتھ اگرتلا میں مکانات تعمیر ہورہے ہیں ، جو بڑے زلزلوں کا مقابلہ کرسکتے ہیں۔  وہیں لکھنؤ میں کناڈا کی ٹیکنالوجی کا استعمال کیا جارہا ہے۔  اس میں پلاسٹر اور پینٹ کی ضرورت نہیں ہوگی اور گھر کو تیزی سے بنانے کے لئے پہلے سے تیار دیواریں استعمال کی جائیں گی۔

ساتھیو، آج ملک میں یہ کوشش ہو رہی ہے کہ یہ پروجیکٹ  انکیوبیشن سینٹرز کے طور پر کام کریں ۔ اس سے ہمارے منصوبہ بندی کرنے والوں ،  آرکیٹیکٹس ، انجینئرز اور طلباء نئی ٹیکنالوجی کو جان سکیں گے اور وہ اس کے ساتھ تجربہ بھی کرسکیں گے۔ میں ان چیزوں کو خصوصاً اپنے نوجوانوں کے لئے ساجھا کر رہا ہوں تاکہ ہمارے نوجوانوں کو قوم کے مفاد میں ٹیکنالوجی کے نئے شعبوں کی طرف راغب کیا جاسکے۔

میرے پیارے ہم وطنو ،  آپ نے انگریزی کی کہاوت ضرور سنی ہوگی – ’’ ٹو لرن اِز ٹو گرو ‘‘ یعنی ’’ سیکھنا ہی آگے بڑھنا ہے‘‘ ۔ جب ہم کچھ نیا سیکھتے ہیں تو ہمارے لئے نئے نئے راستے خود بہ خود کھل جاتے ہیں ۔ جب بھی کہیں لیگ سے ہٹ کر کچھ نیا کرنے کی کوشش ہوئی ہے ، انسانیت کے لئے نئے دروازے کھلے ہیں ، ایک نئے دور کا آغاز ہوا ہے  اور آپ نے دیکھا ہوگا کہ جب کہیں بھی کوئی نیا واقعہ ہوتا ہے تو اس کا نتیجہ سب کو حیرت میں ڈال دیتا ہے۔ اب جیسے اگر میں آپ سے پوچھوں کہ وہ کون سی ریاستیں ہیں ، جن کو آپ سیب کے ساتھ  جوڑیں گے؟ تو ظاہر ہے کہ ہماچل پردیش ، جموں و کشمیر اور اتراکھنڈ کا نام آپ کے ذہن میں سب سے پہلے آئے گا لیکن اگر میں یہ کہتا ہوں کہ آپ منی پور کو بھی اس فہرست میں جوڑ دیجئے  تو شاید آپ کو بہت تعجب ہو گا ۔  کچھ نیا کرنے کے جذبے  سے بھرے نوجوانوں نے منی پور میں یہ کارنامہ کر دکھایا ہے ۔ آج کل منی پور کے ضلع اخرول  میں سیب کی کاشت زور پکڑتی جارہی ہے۔ یہاں کے کاشتکار اپنے باغات میں سیب اُگا رہے ہیں۔ سیب اگانے کے لئے ، ان لوگوں نے ہماچل جاکر باقاعدہ ٹریننگ بھی لی ہے۔ ان میں سے ایک ہیں ، ٹی ایس رِنگپھامی یونگ ۔ یہ پیشے سے ایک ایرو نوٹیکل انجینئر ہیں ۔ انہوں نے اپنی اہلیہ محترمہ ٹی ایس اینجل کے ساتھ مل کر سیب کی پیداوار کی ہے ۔ اسی طرح آوُنگ شی شمرے اوگسٹینا نے بھی اپنے باغوں میں سیب کی پیداوار کی ۔ آوُنگ شی دلّی میں جاب کرتی تھیں ۔ یہ چھوڑ کر وہ اپنے گاؤں لوٹ گئیں اور سیب کی کھیتی شروع کی ۔ منی پور میں آج ایسے کئی سیب پیدا کرنے والے ہیں ، جنہوں نے کچھ الگ اور نیا کرکے دکھایا ہے ۔

ساتھیو ، ہمارے قبائلی سماج میں بیر بہت مقبول ہوتے ہیں ۔  قبائلی سماج کے لوگ ہمیشہ سے بیر کی کاشت کرتے رہے ہیں لیکن خاص طور پر کووڈ – 19 وبائی بیماری کے بعد اس کی کاشت میں اضافہ ہو رہا ہے۔ بکرم جیت چکما 32 سال کے ایسے ہی نوجوان ساتھی ہیں  ، جو تری پورہ کے اناکوٹی کے رہنے والے ہیں ۔ انہوں نے بیر کی کھیتی کی شروعات کرکے بہت زیادہ منافع بھی حاصل کیا ہے اور اب وہ لوگوں کو بیری کی کاشت کرنے کے لئے بھی تحریک دے رہے ہیں ۔ ریاستی حکومت بھی ایسے لوگوں کی مدد کے لئے آگے آئی ہے۔ اس کے لئے حکومت کی طرف سے بہت ساری خصوصی نرسریاں بنائی گئی ہیں تاکہ بیر کی کاشت سے وابستہ لوگوں کی مانگ  پوری کی جاسکے۔  کھیتی میں جدت طرازی ہو رہی ہے تو کھیتی کی پیداوار میں بھی تخلیقی پہلو دیکھنے کو مل رہا ہے ۔

ساتھیو  ، مجھے اترپردیش کے لکھیم پور کھیری میں کئے گئے ایک تجربے کے بارے میں بھی پتہ چلا ہے ۔ کووڈ کے دوران ہی لکھیم پور کھیری میں ایک انوکھی پہل ہوئی ہے ۔  وہاں ، خواتین کو  کیلے کے بیکار تنوں سے فائبر بنانے کی تربیت دینے کا کام شروع کیا گیا۔  فضلے کو کارآمد بنانے کا طریقہ ۔ کیلے کے تنے کو کاٹ کر مشین کی مدد سے ’ بنانا فائبر ‘ تیار کیا جاتا ہے ، جو جوٹ یا سن کی طرح ہوتا ہے ۔  اس فائبر سے تھیلے ، چٹائی ، دری ، کتنی ہی چیزیں بنائی جاتی ہیں ۔  اس سے ایک تو فصل کے کچرے کا استعمال شروع ہو گیا ، وہیں دوسری طرف گاؤں میں رہنے والی ہماری بہن بیٹیوں کو آمدنی کا ایک ذریعہ مل گیا ۔  ’ بنانا فائبر ‘ کے اِس کام سے ایک مقامی خاتون کو  400 سے 600 روپئے یومیہ کی کمائی ہوجاتی ہے ۔ لکھیم پور کھیری میں سینکڑوں ایکڑ زمین پر کیلے کی کھیتی ہوتی ہے ۔ کیلے کی فصل کے بعد عام طور پر کسانوں کو  ، اِس کے تنے کو پھینکنے کے لئے الگ سے خرچ کرنا پڑتا تھا ۔ اب اُن کا یہ پیسہ بھی بچ جاتا ہے یعنی آم کے آم ، گٹھلیوں کے دام ، یہ کہاوت یہاں بالکل درست بیٹھتی ہے ۔

ساتھیو،ایک طرف بنانا فائبر سے سامان بنایا جارہا ہے ، وہیں دوسری طرف کیلے کے آٹے سے  ڈوسا اور گلاب جامن جیسے مزیدار کھانے بھی بن رہے ہیں ۔  کرناٹک کے شمالی کنڑ اور جنوبی کنڑ ضلعوں میں خواتین یہ نیا کام کررہی ہیں ۔ اس کا آغاز بھی کورونا دور میں ہی ہوا ہے ۔ ان خواتین نے نہ صرف کیلے کے آٹے سے ڈوسا ، گلاب جامن  جیسی چیزیں بنائی ہیں بلکہ ان کی تصویروں کو سوشل میڈیا پر شیئر بھی  کیا ہے ۔ جب زیادہ لوگوں کو کیلے کے آٹے کے بارے میں پتہ چلا تو اُس کی مانگ بھی بڑی اور ان عورتوں کی آمدنی بھی ۔ لکھیم پور کھیری کی طرح یہاں بھی اس اختراعی نظریے کی خواتین ہی قیادت کررہی ہیں ۔

دوستو، اس طرح کی مثالیں زندگی میں کچھ نیا کرنے کے لئے ترغیب فراہم کرتی ہیں۔ آپ کے آس پاس ایسے کئی لوگ ہوں گے۔  جب آپ کے کنبے کے افراد بات چیت میں مصروف ہوتے ہیں تو آپ کو بھی اس گفتگو میں حصہ لینا چاہئے۔ کچھ وقت نکال کر اپنے بچوں کے ساتھ اس طرح کی کوششوں کو دیکھنے جائیں اور اگر آپ کو موقع ملے ، تو خود بھی ایسا ہی کچھ کریں۔ اور ہاں، میں چاہوں گا کہ آپ یہ سب میرے ساتھ نمو ایپ یا مائی گو پر ساجھا کریں۔

 میرے عزیز اہل وطن ، ہماری سنسکرت کی کتابوں میں ایک اشلوک ہے –

آتمن تھرم جیوالوکاسمن، کو نہ جیوتی مانواہ: |

پرم پروپکارتھم، یو جیوتی سا جیوتی ||

اس کا مطلب ہے، اس دنیا میں ہر کوئی اپنے لیے جیتا ہے۔ لیکن درحقیقت جیتا صرف وہی انسان ہے جس کا وجود دوسروں کے لئے ہے۔ ’من کی بات‘ ایک ایسا پروگرام ہے جس میں بھارت ماتا کے بیٹوں اور بیٹیوں کی انسان دوست کوششوں کے بارے میں باتیں کی جاتی ہیں۔ آج بھی، ہم ایسے ہی دوستوں کے بارے میں بات کریں گے۔ ہمارے دوستوں میں سے ایک کاتعلق چنڈی گڑھ شہر سے ہے۔ میں بھی چنڈی گڑھ میں کچھ برس رہا ہوں۔ یہ ایک بہت ہی خوشگوار اور خوبصورت شہر ہے۔ چنڈی گڑھ کے عوام بھی بڑے دل والے ہوتے ہیں، اور ہاں، اگر آپ کھانے کے شوقین ہیں، تو یہاں آپ کو اور لطف آئے گا۔ چنڈی گڑھ کے سیکٹر 29 میں، سنجے رانا جی کا ایک فوڈ اسٹال ہے اور وہ اپنی سائیکل پر چھولے بھٹورے بیچتے ہیں۔ ایک دن ان کی بیٹی ردھیما اور بھانجی ریا ایک سجھاؤ لے کر آئیں۔ دونوں نے ان سے درخواست کی کہ وہ ان لوگوں کو مفت چھولے بھٹورے کھلائیں جنہوں کووِڈ ٹیکہ لگوایا ہے۔ انہوں نے اس سجھاؤ کو بخوشی قبول کیا اور فوری طور پر اس اچھی اور نیک کوشش کا آغاز کیا۔ سنجے رانا جی کے چھولے بھٹورے مفت کھانے کے لئے، آپ کو یہ دکھانا ہوگا کہ آپ نے اس دن ٹیکہ لگوایا ہے۔ جب آپ ٹیکہ لگوانے سے متعلق پیغام دکھائیں گے تو وہ آپ کو لذیذ چھولے پیش کریں گے۔ یہ کہا جاتا ہے کہ سماج کی فلاح و بہبود کے لئے، پیسے سے زیادہ جذبۂ خدمت اور فرض کا احساس درکار ہوتا ہے۔ ہمارے سنجے بھائی اس قول کو سچ ثابت کر رہے ہیں۔

دوستو، میں آج اس طرح کے کام کی ایک اور مثال پیش کرنا چاہوں گا۔ یہ کوشش تمل ناڈو کے نیل گری علاقے میں کی جا رہی ہے۔ یہاں رادھیکا شاستری جی نے ایمبوآر ایکس (ایمبو ریکس) پروجیکٹ شروع کیا ہے۔ اس پروجیکٹ کا مقصد پہاڑی علاقوں میں مریضوں کے علاج کے لئے آسان نقل و حمل فراہم کرانا ہے۔ انہوں نے ایمبو آر ایکس کے لئے اپنے کیفے کے ساتھیوں سے سرمایہ اکٹھا کیا تھا۔ آج چھ ایمبو آر ایکس نیل گری پہاڑی علاقوں میں اپنی خدمات پیش کر رہی ہیں اور ہنگامی صورتحال کے دوران دور دراز کے علاقوں میں مریضوں کو مدد فراہم کر رہی ہیں۔ ایک ایمبو آرایکس ایک اسٹریچر، ایک آکسیجن سلنڈر، فرسٹ ایڈ باکس اور دیگر سازومان پر مشتمل ہوتی ہے۔

دوستو، خواہ سنجے جی ہوں یا رادھیکا جی، ان کی مثالیں یہ ثابت کرتی ہیں کہ ہم اپنے روزمرہ کے کام ، اپنا کاروبار اور نوکری کرتے ہوئے بھی خدمت کر سکتے ہیں۔

دوستو، چند روز قبل ایک بڑا ہی دلچسپ اور جذباتی واقعہ پیش آیا، جس نے بھارت۔جارجیا دوستی کو نئی قوت عطا کی۔ اس تقریب کے دوران، بھارت نے حکومت جارجیا اور وہاں کے عوام کو مقدس باقیات یا سینٹ کوئین کیٹیون کا آئیکن سونپا، اس مشن کے لئے ہمارے وزیر خارجہ بذاتِ خود وہاں گئے۔ یہ تقریب، جوکہ انتہائی جذباتی ماحول میں منعقد ہوئی، اس  میں جورجیا کے صدر، وزیر اعظم، متعدد مذہبی قائدین، اور بڑی تعداد میں جارجیا کے عوام نے شرکت کی۔ اس تقریب کے دوران بھارت کی تعریف میں جو کلمات کہے گئے وہ یقیناً یادگار ہیں۔ اس واحد تقریب نے نہ صرف دو ممالک کے درمیان بلکہ گوا اور جارجیا کے مابین تعلقات کو بھی مضبوط کیا ۔ سینٹ کوئین کیٹیون کے مقدس باقیات  2005 میں گوا میں واقع سینٹ اگسٹائن چرچ میں پائے گئے تھے۔

دوستو، آپ کے ذہنوں میں یہ سوال پیدا ہو رہا ہوگا ۔۔۔ یہ سب چیزیں کس لیے ہیں اور یہ کیسے ہوا؟ درحقیقت، یہ واقعہ چار سو یا پانچ سو برس پہلے کا ہے۔ کوئین کیٹیون جارجیا کے شاہی خاندان کی بیٹی تھیں۔ دس سال کی قید کے بعد 1624میں انہیں شہید کر دیا گیا۔ قدیم پرتگالی دستاویز کے مطابق، سینٹ کوئین کیٹیون کے باقیات کو پرانے گوا کے سینٹ آگسٹین کانوینٹ میں رکھا گیا تھا۔ لیکن، ایک طویل مدت کے لئے یہ سمجھا گیا کہ گوا میں دفن ان کے باقیات 1930 کے زلزلے میں کہیں گم ہوگئے۔

حکومت ہند اور جارجیا کے مؤرخین ، محققین، ماہرین آثار قدیمہ اور جارجیا کی چرچ کی دہائیوں کی انتھک کوششوں کے بعد  2005 میں باقیات کو کامیابی کے ساتھ ڈھونڈھ لیا گیا۔یہ جارجیا کے عوام کے لئے ایک ازحدجذباتی موضوع ہے ۔ اسی لیے ان کے تاریخی، مذہبی اور روحانی جذبات کو ذہن میں رکھتے ہوئے، حکومت ہند نے جارجیا کے عوام  کو ان باقیات کے ایک حصے کو بطور تحفہ دینے کا فیصلہ کیا۔ آج، بھارت اور جارجیا کی مشترکہ تاریخ کے اس منفرد حصے کی حفاظت کرنے کے لئے میں گوا کے عوام کا شکریہ ادا کرنا چاہوں گا۔گوا متعدد روحانی ورثے کی سرزمین کی حیثیت سے جانا جاتا ہے۔ سینٹ آگسٹین چرچ یونیسکو کی ورلڈ ہیریٹیج سائٹ ہے جو کہ گوا کے چرچوں اور کانوینٹس کا ایک حصہ ہے۔

میرے عزیز اہل وطن، اب مجھے آپ کو جارجیا سے سنگاپور لے جانے دیجئے، جہاں اس ماہ کے آغاز میں ایک اور شاندار موقع حاصل ہوا۔ سنگاپور کے وزیر اعظم  اور میرے دوست لی شین لونگ نے حال ہی میں تجدید شدہ سیلت روڈ گورودوارے کا افتتاح کیا۔ انہوں نے روایتی سکھ پگڑی بھی پہنی۔ یہ گورودوارہ سو سال پہلے تعمیر کیا گیا تھا  اور یہاں بھائی مہاراج سنگھ کو وقف کیا گیا ایک میمورئیل بھی ہے۔ بھائی مہاراج جی بھارت کی آزادی کے لئے لڑے تھے اور یہ لمحہ اس وقت مزید متاثرکن ہو گیا ہے جب ہم آزادی کے 75 برسوں کا جشن منا رہے ہیں۔

دونوں ممالک کی عوام  سے عوام کے درمیان طاقت کو اس طرح کی پہل قدمیوں اور کوششوں سے تقویت حاصل ہوتی ہے۔ ان سے یہ بھی پتہ چلتا ہے کہ ہم آہنگی کے ماحول میں رہنا اور ایک دوسرے کی ثقافت کو سمجھنا کتنا اہم ہے۔

میرے پیارے اہل وطن، آج ’من کی بات‘ میں ہم نے متعدد موضوعات پر بات چیت کی۔ ایک موضوع اور ہے جو میرے دل کے بہت قریب ہے۔ یہ موضوع آبی تحفظ سے متعلق ہے۔ جس جگہ میرا بچپن گزرا، وہاں ہمیشہ پانی کی قلت رہتی تھی۔ ہم بارش کے لئے ترستے تھے اور اسی لیے پانی کی ایک ایک بوند کی حفاظت کرنا ہماری روایات ، ہماری ثقافت کا حصہ رہا ہے۔ اب ’عوامی شراکت داری کے توسط سے آبی تحفظ‘ کے منتر نے وہاں کی تصویر ہی بدل کر رکھ دی ہے۔

دوستو، فطرت اور ماحولیات کی حفاظت بھارت کی ثقافتی زندگی میں پنہاں ہے۔ اس کے ساتھ ساتھ، بارشوں  اور مانسون نے ہمارے افکار، ہمارے فلسفے اور ہماری تہذیب کو سنوارا ہے۔ ’رِتو سنہار‘ اور ’میگھ دوت‘ میں، عظیم شاعر کالی داس نے خوبصورت انداز میں بارشوں کے بارے میں بیان کیا ہے۔ یہ نظمیں ادب کے چاہنے والوں میں آج بھی بہت مقبول ہیں۔ بارشوں کی عظمت کو رگوید کی پرجانیا سکتم میں بھی بڑی ہی خوبصورتی کے ساتھ بیان کیا گیا ہے۔ اسی طرح، زمین، سورج اور بارش کے درمیان رشتے پر بھی شریمد بھگوت میں منظوم  انداز میں تفصیلی بیان ملتا ہے۔

اشٹو ماسان نپیت ید، بھومیا: چا، اود۔مایم وسو|

سوبھوگی: موکتم آرے بھے، پرجنیہ: کال آگتے||

اس کا مطلب ہے، سورج نے زمین کی دولت کو پانی کی شکل میں استعمال کیا، اب مانسون کے موسم میں،  سورج یہ جمع کی گئی دولت زمین کو واپس کر رہا ہے۔ یقیناً، مانسون اور بارش کا موسم نہ صرف خوبصورت اور خوشگوار ہے، بلکہ یہ حیات بخش اور نشو و نما کرنے والا بھی ہے۔ ہمیں حاصل ہونے والا بارانی پانی ہماری مستقبل کی پیڑھی کے لئے، ہمیں یہ کبھی فراموش نہیں کرنا چاہئے۔

آج ایک خیال میرے ذہن میں آیا کہ کیوں نہ میں اپنی بات اس طرح کے دلچسپ حوالوں کے ساتھ پوری کروں۔  آنے والے تیوہاروں کے لئے آپ سبھی کو میری طرف سے نیک خواہشات۔ تیوہاروں اور جشن کے دور میں، آپ کو یہ یاد رکھنا ہے کہ کورونا ہمارے درمیان سے رخصت نہیں ہوا۔ آپ کورونا سے متعلق پروٹوکول کو فراموش نہ کریں۔ خداکرے کہ آپ سب صحت مند اور خوش رہیں۔

بہت بہت شکریہ!