मंत्री परिषद् के मेरे सभी साथी, और उपस्थित सभी महानुभाव,

आप सभी सुबह 9 बजे से बैठे हैं. काफी थकान भी महसूस कर रहे हैं. क्योंकि यहाँ खुद के संबधित विषय बहुत कम होंगे, लेकिन और विषयों को भी झेलना पढ़ रहा है.

सामान्य रूप से सरकार का एक स्वभाव रहता है, secrecy का. आज के इस अवसर पर आप अनुभव करते होंगे openness का - एक खुलापन। सरकार क्याा सोचती है, अब यह चीजें जितनी आज आपके सामने आई हैं, यही चीजें पाने के लिए पता नहीं कितनी आरटीआई करनी पड़ती है आपको। तो व्यकवस्था ऐसी विकसित की जा सकती है कि... उसी प्रकार से हमने देखा है कि बजट जब आता है तो ढेर सारे delegations memorandum लेकर के आते हैं। वो भी एक ऐसी formality हो जाती है कि सरकार कागज ले लेती है, कितना ही बड़ा higher position पर क्यों न हो, “अच्छा-अच्छा देख लेंगे।“ फिर वो कागज process में चला जाता है।

आज आपने देखा होगा कि आपकी जो concerns है उसकी आज चर्चा हुई है। सिर्फ सुना गया ऐसा नहीं है। चर्चा हुई, इतना ही नहीं उसमें से रास्ते खोजे गए। रास्ते खोजकर के हम मिलकर के achieve कैसे करे? हमारी collective responsibility का एक feeling आज आया। feeling of oneness - उस दिशा में एक प्रयास है।

जब मैं प्रारंभ से कहता हूं कि Minimum Government, Maximum Governance. यह विषय बहुत कम लोग समझ पाते है। कुछ लोग तो यह मानते है कि मंत्रियों की संख्या के आधार पर तय होता है कि Minimum Government है या नहीं है। यह उनकी समझदारी का problem है। लेकिन Minimum Government, Maximum Governance क्या होता है वो आज एक दिन में आपने देख लिया। शायद जितने निर्णय आज आप कर रहे हैं, मिल करके कर रहे हैं, शायद सरकारी फाइल और process में हुआ होता तो सालों निकल जाते। यह है Maximum Governance. Minimum Governance to Maximum Governance की दिशा में कैसे जा सकते है इसका यह एक स्वभाविक आपके सामने प्रस्तुत है।

मैं जब नया-नया आया मैंने 15 अगस्त को भी इस बात का उल्लेख किया था लाल किले पर से। मैं अनुभव कर रहा था यहां सरकार silo में चलती है। हरेक का अपना-अपना एक रजवाड़ा बना हुआ है वो अपना... पिछले छह-सात महीनों में सबसे पहला हमने काम किया उन सारे barriers को खत्म कर दिया। मिल-बैठकर के निर्णय करें, कागजी कार्रवाई आखिर में होती है।

आज हम उसमें से एक step आगे गए हैं और वो step है कि Public private partnership का model सिर्फ पूंजी और प्रोजेक्टि नहीं होता है। Public private partnership का model – design making process में भी हो सकता है। एक नया approach है। और उस नये approach को आज आपने अनुभव किया है। It is a beginning. लेकिन इससे आपको संकेत मिलता होगा कि किस दिशा में जाया जा सकता है। तो in true sense, Public private partnership का model “meeting of mind” से शुरू होता है, तो फिर achievement in manufacturing तक पहुंचता है और मैं मानता हूं कि आज पूरे दिनभर में आपने इस बात को अनुभव किया होगा।

मुझे याद है जिस दिन 25 सितंबर को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्म> जयंती पर मैंने Make In India कार्यक्रम की यहां शुरूआत की थी, आप में से कई मित्र यहां थे। उसके बाद मैं काफी कुछ उसकी आलोचनाएं सुन रहा था। लेकिन आपने देखा होगा कि पिछले तीन महीने में एक विचार को सिद्ध करने के लिए government machinery ने किस प्रकार से अपने आपको तैयार किया है, सज्य किया है। आपको अनुभव आया होगा चर्चा में। कानून बदलने पड़े - तैयार है, नियम बदलने पड़े - तैयार है, व्यावस्थाओं को speedy करना है - तैयार है, यह जो एक बदलाव है उस बदलाव को हमें real धरती पर आगे उतारना है। और इसलिए आपको इसके साथ जोड़कर के इसके लिए हमने प्रयास किया है।

हम जानते है सरकार ज्याकदातर ABCD में फंसी हुई रहती है। सरकार का culture ABCD culture होता है। और यह ऊपर से नीचे तक होता है। और जब मैं ABCD कहता हूं मतलब..

A मतलब avoid,

B – Bypass,

C – Confuse,

D - Delay.

हमारी कोशिश है ABCD culture से एक ऐसे Road map पर जाए, जिसमें success ही success हो। और जब मैं success ही success Road की बात करता हूं, तो मैं उस Road की चर्चा करता हूं जिसमें R O A D:

R - Responsibility,

O - Ownership,

A - Accountability,

D - Discipline.

यह Roadmap पर हम आगे बढ़ना चाहते हैं।

पूरी सरकारी व्यवस्था को उस दिशा में तैयार करने की हम कोशिश कर रहे हैं। इसके कारण शासन में काम करने वाले व्यक्तियों को भी “सामान्य जन की क्याा अपेक्षाएं हैं”, उसके अनुरूप अपनी चीजों को prioritise करने की आदत बन जाती हैं।

मैं समझता हूं इससे एक बहुत बड़ा लाभ होगा। एक उससे आगे का कदम जो मेरे मन में है, जिस पर हमें सोचना चाहिए। जिस प्रकार से आज हम इस forum में इस प्रकार के लोग मिले हैं, मैं मानता हूं मैं विकास के लिए जिन बातों को बल देना है, उसमें man, material, money, machine, minerals - इसका maximum movement कैसे हो। कोई stagnancy न हो, इन पांचों क्षेत्रों में। इन five M’s की movement कैसे बढ़े, उसको लेकर के हम आगे बढ़ना चाहते हैं।

जैसा अभी अरूण जी ने बताया हम जनवरी 1st week में financial sector को attend कर रहे हैं, विशेषकर के Banking sector के लोगों को बुला रहे हैं। इस गोल को पाने के लिए उनका रोल क्याह होगा उसकी वहां चर्चा करेंगे, रास्ते तय करेंगे।

एक महत्व, जैसा मैंने कहा हमारा काम है human resource development का, हमारा काम है innovation का, हमारा काम है research का। इन सारे क्षेत्रों को भी अगर हमें next generation की ओर ले जाना है, तो इन तीन बातों को हमारे DNA के रूप में लाना पड़ेगा। आज दुर्भाग्य से हमारी व्यावस्था में वो DNA नहीं है। Innovation, research, and human resource development ये पूरे part of the process होना चाहिए। Isolated नहीं होना चाहिए। और इसलिए मेरा second phrase का काम ऐसा है कि क्याह हम देश में पांच या छह या आठ regions में universities को, institutions को, manufacturing world को, और government policy makers को - साथ मिलकर के human resource development की हमारी next 20-30 years के लिए किस प्रकार के लोगों की जरूरत है। उन लोगों को तैयार करने के लिए हमारे आज जो सिलेबस है, हमारे institutions है वो capable enough है क्या? उसको हम बदलाव ला सकते हैं क्या? उसमें कोई नया मॉडल ला सकते हैं क्या? हम कल्पना कर सकते हैं, आज अगर मान लीजिए हम सोच रहे हैं हम बुलेट ट्रेन। क्या? बुलेट ट्रेन के लिए engineering skill के लोग हमारे पास है क्या? नहीं है तो We will have to create! हमने जिस गोल को achieve करना है उसको ध्यान में रखते हुए human resource development इस पर हम कैसे बल दें और हमारी इन व्यवस्थाओं को, और मैं चाहता हूं कि within a month or two इस एक skill development और human resource development को लेकर के एक हमार joint - उसको National level पर नहीं कर सकते, क्योंकि हमने कोई area identify करना हो, मानो chemical zone है तो chemical zone के लोग मिले फिर उसके साथ संबंधित institutions मिले तो शायद हमारा productive debate होगा। इस प्रकार से हम चर्चा कर करके इस पर काम करे, और उसी में - innovation and research.

अगर हम दुनिया के सामने innovation लेकर नहीं जाएंगे... हमारे IT sector में हम लोगों ने बहुत बड़ा अपना तजुर्बा बताया 25 साल पहले, लेकिन हम Google नहीं बना पाए। हमारा जो talented manpower था हमारा बाहर चला गया। क्या हम उस दिशा में सोच सकते हैं कि जगत में जो श्रेष्ठ है वो हमारे यहां भी पैदा हो सकता है और दुनिया इस बात को मानेगी। हमारे space का जब presentation हो रहा था मैं देख रहा था कि सब लोग तालियां बजा रहे थे। यह भारत के नौजवान scientist कर रहे हैं जी दुनिया में अपना रूतबा दिखा रहे हैं तो और क्षेत्र तो इससे सरल है। हम इसको कर सकते हैं।

और एक दूसरा जो विषय जैसे मैंने कहा हम जनवरी 1st week में Banking or financial sector को इसी विषय को लेकर के मिल रहे हैं। मैं चाहता हूं कि संबंधित लोग मिलकर के “regional दिशा में कैसे काम करे?”

और एक विषय है जिस पर हमें बल देने की आवश्यरकता है भारत का विकास संतुलित होना चाहिए। अगर पश्चिम का हिस्सा भारत का समृद्धि की ओर बढ़े और पूरब का हिस्सा हमारे वैसे का वैसा रह जाए तो देश के लिए उचित नहीं है। हम - industrial houses को भी सोचना होगा और हम कैसे लोग हैं? कोयला east में है और बिजली west में पैदा करते हैं। मैं नहीं मानता हूं ऐसी कौन सी strategy है हमारी। हमारे पास प्राकृतिक सम्पदा सारी की सारी eastern part of India है। क्या हम हमारी योजनाओं में, और मैं चाहूंगा इसके लिए हमारे नीति निर्धारक भी attention दे और आप जो विकास करना चाहते हैं - अपना विकास, अपनी कंपनी का विकास, देश का विकास भी सोचिए। Eastern part of India उसके पास जो potential है, उसके पास जो सामर्थ्य है, वो सामर्थ्य हमारे देश के विकास में किस प्रकार से उपयोग हो, हमारी manufacturing center कैसे बने। वहां पर भी talented youth है, वहां minerals है, वहां संभावनाएं पड़ी है। उन संभावनाओं पर हम एक दशक में अगर ध्यान दें तो भारत का पश्चिमी छोर जिस प्रकार से आगे बढ़ा है अगर पूरब का छोर इक्वल आ जाएगा तो आप कल्पना कर सकते हैं कि जिस growth target की चर्चा पूरी दुनिया हिंदुस्तान से अपेक्षा करती है उसको पाने का वो उत्तम से उत्तम रास्ता बन सकता है।

और इसलिए हम उस दिशा में भी अगर आगे बढ़े तो मैं समझता हूं कि हम काफी कुछ दे सकते हैं। मैं ज्यादा लम्बा समय नहीं लेना चाहता आपका। आज पूरे दिनभर यह जो प्रयास हुआ है, हरेक की जिम्मेदारी तय हो चुकी है, Roadmap तैयार हो चुका है, क्या‍ achieve करना है वो निर्धारित हो चुका है, नीतियों में क्या, परिवर्तन लाना है वो तय हो चुका है। अब मैं नहीं मानता हूं कि कोई कागजी कार्रवाई की जरूरत पड़ेगी अपने आप चीजें implement होगी। और हम जो Make in India का concept लेकर के चल रहे हैं, उस पर आगे बढ़ेंगे।

लेकिन बात Make in India से अटक नहीं सकती। हमारी कोशिश उससे आगे हो। हम दुनिया में India Brand कैसे develop कर सकते हैं? अगर दुनिया में India Brand develop करना है, तो Make in India उसके साथ एक catchline लगेगी: “Zero Defect”. अगर Zero Defect नहीं है, तो हम ग्लोबल मार्केट में archive नहीं कर सकते। उसी प्रकार से दुनिया environment conscious है। बहुत बड़ी हमारी जिम्मेदारी है तो “Zero Defect, Zero Effect”. हम वो manufacturing करेंगे environment पर effect न करे। हम वो manufacturing करेंगे जो zero defect हो और दुनिया भर के अंदर जिसकी मांग हो - उस काम के लिए हम आगे बढ़े।

मेरी आप सबको बहुतबहुत शुभकामनाएं। पूरे दिनभर इस का मंथन - पहली बार प्रयोग हुआ है। इसको हम और आगे बढ़ाने वाले हैं। सेक्टेर स्पेसिफिक तक जाने वाले हैं। मैं चाहता हूं कि आपके सुझाव हम सब मिलकर के देश को आगे बढ़ाने में काम आएंगे।

बहुत-बहुत धन्यनवाद। बहुत-बहुत शुभकामनाएं। इसी हफ्ते 2015 में हम प्रवेश करेंगे। मेरी आप सबको नववर्ष की बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

धन्यवाद।

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“Role of newspapers is very important in the journey to Viksit Bharat in the next 25 years”
“The citizens of a country who gain confidence in their capabilities start achieving new heights of success. The same is happening in India today”
“INS has not only been a witness to the ups and downs of India’s journey but also lived it and communicated it to the people”
“A country’s global image directly affects its economy. Indian publications should enhance their global presence”

महाराष्ट्र के गवर्नर श्रीमान रमेश बैस जी, मुख्यमंत्री श्रीमान एकनाथ शिंदे जी, उप मुख्यमंत्री भाई देवेंद्र फडणवीस जी, अजित दादा पवार जी, इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी के प्रेसिडेंट भाई राकेश शर्मा जी, सभी वरिष्‍ठ महानुभाव, देवियों और सज्जनों!

सबले पहले मैं इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी के सभी सदस्यों को बहुत-बहुत बधाई देता हूं। आज आप सभी को मुंबई में एक विशाल और आधुनिक भवन मिला है। मैं आशा करता हूँ, इस नए भवन से आपके कामकाज का जो विस्तार होगा, आपकी जो Ease of Working बढ़ेगी, उससे हमारे लोकतंत्र को भी और मजबूती मिलेगी। इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी तो आज़ादी के पहले से अस्तित्व में आने वाली संस्‍थाओं में से एक है और इसलिए आप सबने देश की यात्रा के हर उतार-चढ़ाव को भी बहुत बारीकी से देखा है, उसे जिया भी है, और जन-सामान्‍य को बताया भी है। इसलिए, एक संगठन के रूप में आपका काम जितना प्रभावी बनेगा, देश को उसका उतना ही ज्यादा लाभ मिलेगा।

साथियों,

मीडिया केवल देश के हालातों का मूकदर्शक भर नहीं होता। मीडिया के आप सभी लोग, हालातों को बदलने में, देश को दिशा देने में एक अहम रोल निभाते हैं। आज भारत एक ऐसे कालखंड में है, जब उसकी अगले 25 वर्षों की यात्रा बहुत अहम है। इन 25 वर्षों में भारत विकसित बने, इसके लिए पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका भी उतनी ही बड़ी है। ये मीडिया है, जो देश के नागरिकों को जागरूक करता है। ये मीडिया है, जो देश के नागरिकों को उनके अधिकार याद दिलाता रहता है। और यही मीडिया है, जो देश के लोगों को ये एहसास दिलाता है कि उनका सामर्थ्य क्या है। आप भी देख रहे हैं, जिस देश के नागरिकों में अपने सामर्थ्य को लेकर आत्मविश्वास आ जाता है, वो सफलता की नई ऊंचाई प्राप्त करने लगते हैं। भारत में भी आज यही हो रहा है। मैं एक छोटा सा उदाहरण देता हूं आपको। एक समय था, जब कुछ नेता खुलेआम कहते थे कि डिजिटल ट्रांजेक्शन भारत के लोगों के बस की बात नहीं है। ये लोग सोचते थे कि आधुनिक टेक्नोलॉजी वाली चीजें इस देश में नहीं चल पाएंगी। लेकिन भारत की जनता की सूझबूझ और उनका सामर्थ्य दुनिया देख रही है। आज भारत डिजिटल ट्रांजेक्शन में दुनिया में बड़े-बड़े रिकॉर्ड तोड़ रहा है। आज भारत के UPI की वजह से आधुनिक Digital Public Infrastructure की वजह से लोगों की Ease of Living बढ़ी है, लोगों के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक पैसे भेजना आसान हुआ है। आज दुनियाभर में हमारे जो देशवासी रहते हैं, खासकर के गल्‍फ के देशों में, वो सबसे ज्यादा रेमिटेंस भेज रहे हैं और उनको जो पहले खर्च होता था, उसमें से बहुत कमी आ गई है और इसके पीछे एक वजह ये डिजिटल रेवेल्यूशन भी है। दुनिया के बड़े-बड़े देश हमसे टेक्नोलॉजी और हमारे implementation model को जानना-समझने को प्रयास कर रहे हैं। ये इतनी बड़ी सफलता सिर्फ सरकार की है, ऐसा नहीं है। इस सफलता में आप सभी मीडिया के लोगों की भी सहभागिता है औऱ इसलिए ही आप सब बधाई के भी पात्र हैं।

साथियों,

मीडिया की स्वाभाविक भूमिका होती है, discourse create करना, गंभीर विषयों पर चर्चाओं को बल देना। लेकिन, मीडिया के discourse की दिशा भी कई बार सरकार की नीतियों की दिशा पर निर्भर होती है। आप जानते हैं, सरकारों में हमेशा हर कामकाज के अच्छा है, बुरा है, लेकिन वोट का गुणा-भाग, उसकी आदत लगी ही रहती है। हमने आकर के इस सोच को बदला है। आपको याद होगा, हमारे देश में दशकों पहले बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था। लेकिन, उसके बाद की सच्चाई ये थी कि 2014 तक देश में 40-50 करोड़ गरीब ऐसे थे, जिनका बैंक अकाउंट तक नहीं था। अब जब राष्ट्रीयकरण हुआ तब जो बातें कही गई और 2014 में जो देखा गया, यानी आधा देश बैंकिंग सिस्टम से बाहर था। क्या कभी हमारे देश में ये मुद्दा बना? लेकिन, हमने जनधन योजना को एक मूवमेंट के तौर पर लिया। हमने करीब 50 करोड़ लोगों को बैंकिंग सिस्टम से जोड़ा। डिजिटल इंडिया और भ्रष्टाचार विरोधी प्रयासों में यही काम हमारा सबसे बड़ा माध्यम बना है। इसी तरह, स्वच्छता अभियान, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया जैसे अभियानों को अगर हम देखेंगे! ये वोट बैंक पॉलिटिक्स में कहीं फिट नहीं होते थे। लेकिन, बदलते हुए भारत में, देश के मीडिया ने इन्हें देश के नेशनल discourse का हिस्सा बनाया। जो स्टार्ट-अप शब्द 2014 के पहले ज्यादातर लोग जानते भी नहीं थे, उन्हें मीडिया की चर्चाओं ने ही घर-घर तक पहुंचा दिया है।

साथियों,

आप मीडिया के दिग्गज हैं, बहुत अनुभवी हैं। आपके निर्णय देश के मीडिया को भी दिशा देते हैं। इसलिए आज के इस कार्यक्रम में मेरे आपसे कुछ आग्रह भी हैं।

साथियों,

किसी कार्यक्रम को अगर सरकार शुरू करती है तो ये जरूरी नहीं है कि वो सरकारी कार्यक्रम है। सरकार किसी विचार पर बल देती है तो जरूरी नहीं है कि वो सिर्फ सरकार का ही विचार है। जैसे कि देश ने अमृत महोत्सव मनाया, देश ने हर घर तिरंगा अभियान चलाया, सरकार ने इसकी शुरुआत जरूर की, लेकिन इसको पूरे देश ने अपनाया और आगे बढ़ाया। इसी तरह, आज देश पर्यावरण पर इतना ज़ोर दे रहा है। ये राजनीति से हटकर मानवता के भविष्य का विषय है। जैसे कि, अभी ‘एक पेड़ मां के नाम’, ये अभियान शुरू हुआ है। भारत के इस अभियान की दुनिया में भी चर्चा शुरू हो गई है। मैं अभी जी7 में गया था जब मैंने इस विषय को रखा तो उनके लिए बड़ी उत्सुकता थी क्योंकि हर एक को अपनी मां के प्रति लगाव रहता है कि उसको लगता है कि ये बहुत क्लिक कर जाएगा, हर कोई कह रहा था। देश के ज्यादा से ज्यादा मीडिया हाउस इससे जुड़ेंगे तो आने वाली पीढ़ियों का बहुत भला होगा। मेरा आग्रह है, ऐसे हर प्रयास को आप देश का प्रयास मानकर उसे आगे बढ़ाएं। ये सरकार का प्रयास नहीं है, ये देश का है। इस साल हम संविधान का 75वां वर्ष भी मना रहे हैं। संविधान के प्रति नागरिकों में कर्तव्य बोध बढ़े, उनमें जागरूकता बढ़े, इसमें आप सभी की बहुत बड़ी भूमिका हो सकती है।

साथियों,

एक विषय है टूरिज्म से जुड़ा हुआ भी। टूरिज्म सिर्फ सरकार की नीतियों से ही नहीं बढ़ता है। जब हम सब मिलकर देश की ब्रांडिंग और मार्केटिंग करते हैं तो, देश के सम्मान के साथ-साथ देश का टूरिज़्म भी बढ़ता है। देश में टूरिज्म बढ़ाने के लिए आप लोग अपने तरीके निकाल सकते हैं। अब जैसे मान लीजिए, महाराष्ट्र के सभी अखबार मिलकर के तय करें कि भई हम सितम्बर महीने में बंगाल के टूरिज्म को प्रमोट करेंगे अपनी तरफ से, तो जब महाराष्ट्र के लोग चारों तरफ जब बंगाल-बंगाल देखें तो उनको करें कि यार इस बार बंगाल जाने का कार्यक्रम बनाएं, तो बंगाल का टूरिज्‍म बढ़ेगा। मान लीजिए आप तीन महीने के बाद तय करें कि भई हम तमिलनाडु की सारी चीजों पर सब मिलकर के, एक ये करें के एक दूसरा करें ऐसा नहीं, तमिलनाडु फोकस करेंगे। आप देखिए एक दम से महाराष्ट्र के लोग टूरिज्‍म में जाने वाले होंगे, तो तमिलनाडु की तरफ जाएंगे। देश के टूरिज्म को बढ़ाने का एक तरीका हो और जब आप ऐसा करेंगे तो उन राज्यों में भी महाराष्ट्र के लिए ऐसे ही कैम्पेन शुरू होंगे, जिसका लाभ महाराष्‍ट्र को मिलेगा। इससे राज्यों में एक दूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ेगा, जिज्ञासा बढ़ेगी और आखिरकार इसका फायदा जिस राज्य में आप ये इनिशिएटिव ले रहे हें और बिना कोई एक्‍स्‍ट्रा प्रयास किए बिना आराम से होने वाला काम है।

साथियों,

आप सभी से मेरा आग्रह अपनी ग्लोबल प्रेजेंस बढ़ाने को लेकर भी है। हमें सोचना होगा, दुनिया में हम नहीं है। As far as media is concerned हम 140 करोड़ लोगों के देश हैं। इतना बड़ा देश, इतना सामर्थ्य और संभावनाएं और बहुत ही कम समय में हम भारत को third largest economy होते देखने वाले हैं। अगर भारत की सफलताएं, दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने का दायित्व भी आप बहुत बखूबी ही निभा सकते हैं। आप जानते हैं कि विदेशों में राष्ट्र की छवि का प्रभाव सीधे उसकी इकोनॉमी और ग्रोथ पर पड़ता है। आज आप देखिए, विदेशों में भारतीय मूल के लोगों का कद बढ़ा है, विश्वसनीयता बढ़ी है, सम्मान बढ़ा है। क्योंकि, विश्व में भारत की साख बढ़ी है। भारत भी वैश्विक प्रगति में कहीं ज्यादा योगदान दे पा रहा है। हमारा मीडिया इस दृष्टिकोण से जितना काम करेगा, देश को उतना ही फायदा होगा और इसलिए मैं तो चाहूंगा कि जितनी भी UN लैंग्वेज हैं, उनमें भी आपके पब्लिकेशंस का विस्तार हो। आपकी माइक्रोसाइट्स, सोशल मीडिया accounts इन भाषाओं में भी हो सकते हैं और आजकल तो AI का जमाना है। ये सब काम आपके लिए अब बहुत आसान हो गए हैं।

साथियों,

मैंने इतने सारे सुझाव आप सबको दे डाले हैं। मुझे मालूम है, आपके अखबार में, पत्र पत्रिकाओं में, बहुत लिमिटेड स्पेस रहती है। लेकिन, आजकल हर अखबार पर और हर एक के पास एक publication के डिजिटल editions भी पब्लिश हो रहे हैं। वहाँ न स्पेस की limitation है और न ही distribution की कोई समस्या है। मुझे भरोसा है, आप सब इन सुझावों पर विचार करके, नए experiments करेंगे, और लोकतंत्र को मजबूत बनाएँगे। और मैं पक्‍का मानता हूं कि आपके लिए एक, भले ही दो पेज की छोटी एडिशन जो दुनिया की UN की कम से कम languages हों, दुनिया का अधिकतम वर्ग उसको देखता है, पढ़ता है… embassies उसको देखती हैं और भारत की बात पहुंचाने की एक बहुत बड़ा source आपके ये जो डिजिटल एडिशंस हैं, उसमें बन सकता है। आप जितना सशक्त होकर काम करेंगे, देश उतना ही आगे बढ़ेगा। इसी विश्वास के साथ, आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद! और आप सबसे मिलने का मुझे अवसर भी मिल गया। मेरी आपको बहुत शुभकामनाएं हैं! धन्‍यवाद!