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महाराष्‍ट्र के राज्‍यपाल श्रीमान के. शंकर नारायणन जी, मुख्‍यमंत्री श्रीमान पृथ्‍वीराज जी, मंत्रिपरिषद के मेरे साथी श्री नितिन गडकरी जी, श्री अनंत गीते जी, यहां के सांसद श्री सारंग जी, विधान परिषद के नेता प्रतिपक्ष श्रीमान विनोद तांबड़े जी, विधान सभा के प्रतिपक्ष के नेता श्री एकनाथ खरसे जी, शिपिंग के सचिव श्री विश्‍वपति त्रिवेदी जी, जेएनपीटी के चेयरमैन श्री एम.एन. कुमार और विशाल संख्‍या में पधारे हुए भाइयों और बहनों,

प्रधानमंत्री बनने के बाद महाराष्‍ट्र की धरती पर ये मेरा पहला सार्वजनिक कार्यक्रम है। और मेरे लिए ये बड़े सौभाग्‍य की बात है कि मेरा पहला कार्यक्रम छत्रपति शिवाजी महाराज की राजधानी रायगड की धरती से हो रहा है। और जब रायगड जिले में पहला कार्यक्रम कर रहा हूं तो सहज रूप से हृदय के भीतर से एक ही स्‍वर निकलता है- ‘छत्र‍पति शिवरायांचा त्रिवार जयजयकार’।

आज यहां स्‍पेशल इकोनोमिक जोन, और जिसका मुख्‍य लक्ष्‍य यहां के भूमि पुत्रों को रोजगार मिले, लाखों नौजवानों को रोजी-रोटी कमाने के लिए यहां से दूर न जाना पड़े। उनको यहीं पर रोजगार मिल जाए। और इस हेतु से मैन्‍यूफैक्‍चरिंग सेक्‍टर को बढ़ावा देना, औद्योगिक विकास करना, सेवा क्षेत्र का विकास करना, जिससे रोजगार की संभावनाएं बढ़ती हैं। अगर हमें देश के सामान्‍य मानवीय जीवन में बदलाव लाना है, क्‍वालिटी ऑफ लाइफ में परिवर्तन लाना है तो आर्थिक विकास, रोजगार के अवसर, आवश्‍यक इंफ्रास्‍टक्‍चर, शिक्षा, आरोग्‍य जैसी सुविधाएं, इसे प्राथमिकता देनी होती है। एक समय था, बंदरगाहों का विकास, उसमें छोटे-मोटे प्रयास होते थे, लेकिन आज विश्‍व व्‍यापार का युग है। और जब विश्‍व व्‍यापार का युग है तब सामुद्रिक व्‍यापार, यह अनिवार्य हो गया है। हमरा हिन्‍द महासागर, दुनिया के आयल सेक्‍टर का दो तिहाई व्‍यापार हिंद महासागर के जरिये होता है। कंटेनर का व्‍यापार क्षेत्र, करीब 50 प्रतिशत हिंद महासागर से होता है और आने वाले दिनों में यह बढ़ने वाला है। इसलिए पोर्ट सेक्‍टर का डेवलपमेंट और विशेष कर के हमारे देश के जो तटीय राज्‍य को ध्‍यान देना होगा। इस बार हमने बजट में घोषणा की है, सागरमाला की रचना करने की। हिंदुस्‍तान के समुद्र तट पर पूरब हो या पश्चिम या दक्षिण, समुद्र तट पर जो राज्‍य हैं, उसे सागरमाला प्रोजेक्‍ट का लाभ मिले और जब हम नक्‍शा देखें, भारत माता का मानचित्र देखें तो इन सागरमाला की ऐसी शृंखला तैयार हो जहां सर्वाधिक आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बना हो। दुनिया में जिन-जिन राष्‍ट्रों का विकास हुआ है उसमें एक बात प्रखर रूप से उभरती है कि समुद्र तट पर जो शहर विकसित हुए हैं, उसी की आर्थिक गतिविधियों ने उस देश को संवृद्धि दी है और इसलिए भारत ने भी बंदरगाहों का विकास और सागरमाला योजना, इसकी अनिवार्यता समझी है।

एक समय था, हम पोर्ट डेवलपमेंट पर केंद्रित थे। लेकिन, अब पोर्ट डेवलपमेंट से बात नहीं बनेगी। अगर हमें विकास करना है तो पोर्ट लेड डेवलपमेंट पर बल देना पड़ेगा। यदि मैं पोर्ट लेड डेवलपमेंट कहता हूं , तब जिसमें हमारी सागरमाला योजना के तहत संकल्‍पना है कि पोर्ट हो, पोर्ट के साथ एस ई जेड हो, पोर्ट के साथ रेल की कनेक्टिविटी, रोड कनेक्टिविटी, रोड कनेक्टिविटी, वाटर वे कनेक्टिविटी, एक प्रकार से हिंदुस्‍तान के अन्‍य भूभागों से उसको ऐसी कनेक्टिविटी मिले ताकि हमारे जो उद्योगकार, लैंड लॉक्‍ड स्‍टेट के भी, जो उत्‍पादन करें, उसको तत्‍काल समुद्री तट पर पहुंचा करके दुनिया के बाजारों में पहुंचा सकें। अगर हमें एक्‍सपोर्ट को बल देना है तो हमें इन व्‍यवस्‍थाओं को भी बल देना होगा। इसलिए सागरमाला योजना के तहत पोर्ट लेड डेवपलमेंट- जहां कनेटिक्‍वटी भी हो, कोल्‍ड स्‍टोरेज का नेटवर्क हो, वेयर हाउसिंग का नेटवर्क हो, एक फुल फ्लेज्ड व्‍यवस्‍था को हम विकसित करना चाहते हैं। और उसी के तहत इस नई सरकार ने, तत्‍काल यहां के नौजवानों को रोजगार मिले, पूंजी निवेश हो, उत्‍पादन बढ़े, इसके लिए आज यहां पर ये एसईजेड आरंभ करना तय किया है।

पृथ्‍वीराज जी ने, जो एस ई जेड बंद पड़े हैं, उसकी चिंता जताई। यह चिंता तो उनको पहले से ही रही होगी, लेकिन पहले शायद कह नहीं पाए होंगे। क्‍योंकि ये, बीमारी नई नहीं है, पुरानी है। और कभी-कभी पुरानी बीमारियों को दूर करने के लिए अच्‍छे डॉक्‍टर की जरूरत पड़ती है। तो माननीय मुख्‍यमंत्री जी ने जो चिंता जताई है, मैं भी उसमें अपना स्‍वर जोड़ता हूं। उनकी चिंता वाजिब है और इस समस्‍या का समाधान करने की दिशा में नई सरकार बहुत ही तेज गति से काम कर रही है। मैंने, मेरे ही कार्यालय में एक विशेष टीम बनाई है, जिसको मैंने कहा कि भाई, जब एस ई जेड की घोषणा हुई तो बड़ा उमंग-उत्‍साह था, चारो तरफ क्‍या हो गया? यह टेक ऑफ ही नहीं कर पाया। रनवे पर ही रुका पड़ा है। कुछ तो टेक ऑफ कर गए तो ग्राउंडेड हो गए। क्‍या कारण थे? नियमों की क्‍या कठिनाई थी, क्‍या सपोर्ट मिला, क्‍या नहीं मिला। इन सारे विषयों का अध्‍ययन करके निदान निकालना है। यह समस्‍या सिर्फ महाराष्‍ट्र की नहीं है। पूरे हिंदुस्‍तान को इस संकट को झेलना पड़ रहा है। लेकिन उस संकट से देश को बाहर निकालने के लिए हम पूरा प्रयास करेंगे। मैं मुख्‍यमंत्री जी को और देश के अन्‍य भागों को भी विश्‍वास दिलाता हूं।

दो और बातें भी आज मैं कहना चाहता हूं। एक्‍सपोर्ट के क्षेत्र में भारत सरकार का एक डिपार्टमेंट रहता है, वह अपनी योजनाएं बनाता है। और एक्‍सपोर्ट के बिजनेस से जुड़े हुए लोग भारत सरकार के साथ अपना संबंध बनाते हैं। जब तक हम राज्‍यों को इसके अंदर नहीं जोड़ेंगे, राज्‍य अपने राज्‍य के उत्‍पादकों को, मैन्‍यूफैक्‍चरर्स को, एक्‍सपोर्ट के लिए प्रोत्‍साहित नहीं करेंगे, केंद्र और राज्‍य मिलकर के एक्‍सपोर्ट प्रमोशन के लिए कंधे से कंधा मिलाकर के काम नहीं करेंगे, तो हम जो चाहते हैं, एक्‍सपोर्ट का वह परिणाम नहीं मिल सकता है। और इसलिए नई सरकार राज्‍यों को भी एक स्‍वतंत्र एक्‍सपोर्ट कमीशन बनाने को प्रेरित कर रही है, भारत सरकार के साथ मिल करके। राज्‍य भी अपने राज्‍य के ऐसे उत्‍पादकों को प्रोत्‍साहन दें। एक्‍सपोर्ट करने वाले जो यूनिट हैं, उसकी चिंता करने की राज्‍यों में व्‍यवस्‍था खड़ी हो। राज्य और केंद्र मिलकर के इस काम को भलीभांति कर सकते हैं। इनोवेशंस में कोई जो मदद करनी है, टेक्‍नॉलाजी ट्रांसफर करने की व्‍यवस्‍था करने में कोई मदद करनी है, डिजाइनिंग की दृष्टि से व्‍यवस्‍था करनी है, पैकेजिंग की व्‍यवस्‍था करनी है। ये सारे एक्‍सपर्टाइज पहलू हैं। अगर उस पर बल देते हैं, राज्‍य और केंद्र मिलकर के काम करते हैं, तो आज जो देश की हालत है- कि हमारा इंपोर्ट बढ़ता चला जा रहा है, एक्‍सपोर्ट कम होता जा रहा है, वह बदल सकती है। आने वाले देखते ही देखते समय के अंदर हमारे नौजवानों पर मुझे भरोसा है कि वो उस चीजों को उत्‍पादित कर सकते हैं कि एक्‍सपोर्ट की दुनिया में हिंदुस्‍तान का डंका बजने लग जाएगा। पिछले दिनों हमने राज्‍यों और केंद्र के प्रतिनिधियों की पहली बार एक्‍सपोर्ट प्रमोशन के लिए एक मीटिंग बुलाई। राज्‍यों को कहा कि आपके यहां एक्‍सपोर्ट करने वाली कौन सी यूनिट हैं, उसे जरा देखो तो। उसकी मुसीबत क्‍या है, उनकी सुविधाएं कैसे बढ़े। हमारी कानूनी झाल इतनी भयंकर बनाकर रखी गई है, यहां बैठे हुए व्‍यापार जगत के मित्र जानते हैं। कि उनके व्‍यवसाय में एक डिपार्टमेंट तो पूरा सरकारी फार्म भरने में लगाकर रखना पड़ता है। मेरी कोशिश है उसको सिम्‍पलीफाई करने की। अभी-अभी हमारे निति‍न जी ने अपने विभाग में दो महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। और भी बहुत किए हैं पर मैं दो का उल्‍लेख यहां करना चाहता हूं। अब ऐसी चीजें अखबारों में नहीं आती हैं, क्‍योंकि हमारे देश में सकारात्‍मक समाचारों के लिए अभी जरा तकलीफ रहती है। ये शिपिंग में जो लोग लगे हैं, उन्‍हें हर वर्ष लाइसेंस लेना पड़ता था। अब मुझे बताओ भाई, ये हर वर्ष लाइसेंस के चक्‍कर में पड़ना, मतलब क्‍या है? अफसर के पास जाओ, फिर कुछ इधर से, और तब जाकर लाइसेंस रिव्‍यू होता है और तब फिर रिन्‍यू होता है। हमारे निति‍न जी ने एक धमाके से निर्णय कर दिया, अब लाइसेंस लाइफ टाइम मिलेगा। विदेशों से जो व्‍यापार करने आते हैं, शिप आते हैं, उनका भी यही हाल है। उनके लिए भी नियम बदल दिए गए हैं।

हमारी कोशिश है, सरलीकरण की नीति, और ईज़ आफ द बर्डेन। यह जितना हम तेज माहौल बनाएंगे उतना बढि़या। भारत के नौजवानों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। भारत के उद्योगकारों में साहस करने की क्षमता अप्रतिम है। उन्‍हें उचित माहौल मिलना चाहिए। उचित प्रोत्‍साहन मिलना चाहिए, उचित वातावरण मिलना चाहिए। और उसके लिए यह सरकार प्रतिबद्ध है।

दूसरा एक क्षेत्र जिस पर मैं आकर्षित करना चाहता हूं, यहां उद्योग के लोग भी बैठे हैं और मुंबई हमारी उद्योग नगरी भी रही है, आर्थिक नगरी रही है। और इसलिए आज विश्‍व का सामुद्रिक व्‍यापार जितना तेजी से बढ़ रहा है, उतनी ही शिपिंग इंडस्‍ट्री की बहुत बड़ी मांग बढ़ रही है। आज शिप बिल्डिंग एक बहुत बड़ी ऑपरच्‍यूनिटी है। पूरे विश्‍व में शिप बिल्डिंग के क्षेत्र में हमारा कंट्रीव्‍यूशन बहुत कम है। साउथ कोरिया जैसा देश, बहुत छोटा देश, महाराष्‍ट्र से भी छोटा। वहां आज दुनिया का 40 प्रतिशत शिप बिल्डिंग का काम वह अकेला देश करता है। और भारत के पास जितना बड़ा समुद्र समुद्र तट हो, इतने बड़े नौजवानों की फौज हो और शिप बिल्डिंग का काम कोई बहुत बड़ी टेक्‍नोलॉजी का काम नहीं है। टर्नर, फिटर, वेल्‍डर भी शिप बिल्डिंग के काम में लग जाते हैं। गरीब से गरीब व्‍यक्ति को रोजगार मिलता है। हम शिप बिल्डिंग को बढ़ावा देना चाहते हैं।

और कल जैसे मैंने 15 अगस्‍त को सार्वजनिक रूप से कहा था कम मेक इन इंडिया। कुछ लोग इसको समझ नहीं पाए। तो कुछ लोग कल चला रहे थे, मेक इंडिया। मैंने कहा था 'मेक इन इंडिया'। हम चाहते हैं, विदेशी पूंजी निवेशक आएं। शिप बिल्डिंग एक बहुत बड़ा क्षेत्र है। और हमारे पास नौजवानों, स्किल, मैन पावर, यह हमारे लिए उपलब्‍ध कराना बेहद आसान है। हम इसे बल देना चाहते हैं। इतना ही नहीं, पोर्ट का डेवलपमेंट, यह सिर्फ वहां पर रहने वाले लोगों के आर्थिक प्रगति का केंद्र नहीं होता है। हमारे बंदरगाह एक प्रकार से भारत की समृद्धि का प्रवेश द्वार बन सकते हैं। अगर हम, हमारे बंदरगाहों को भारत की समृद्धि के प्रवेश द्वार के रूप में विकसित करना चाहते हैं तो हमने सागरमाला योजना के तहत उसको और बढ़ावा देने का प्रयास आरंभ किया है। मैं देश के नौजवानों को विश्‍वास देता हूं। रोजगार की संभावनाएं जितनी ज्‍यादा बढ़े, ऐसे उद्योगों को हम बल देना चाहते हैं। किसानों का, उनकी मेहनत का उचित दाम मिले, किसान जो उत्‍पादन करता है, उसका वैल्‍यू एडिशन हो, मूल्‍य वृद्धि हो। दुनिया के बाजार में हमारे किसानों द्वारा उत्‍पादित की हुई चीजें पहुंचें, उस प्रकार का औद्योगिक विकास हो जो कृषि‍ आधारित हो। गांव के नौजवानों को रोजगार मिले। हम जितना इसका प्रकार का विस्‍तार करेंगे, भारत के पास जो सबसे बड़ी ताकत है वह 65 प्रतिशत नौजवान 35 वर्ष से कम आयु के हैं। अगर इनकी शक्ति देश के अंदर लग जाए तो दुनिया के अंदर देश का डंका बज जाए। इस विश्‍वास के साथ हम आगे बढ़ सकते हैं।

लाखों-करोड़ों रुपये के पूंजी निवेश से यहां पर रोजगार की संभानाएं बढ़ने वाली हैं और हर राज्‍य, कौन राज्‍य ज्‍यादा एक्‍सपोर्ट करता है, उसकी आने वाले दिनों में स्‍पर्धा करने की आवश्‍यकता है। राज्‍यों-राज्‍यों के बीच स्‍पर्धा हो, विकास की स्‍पर्धा हो। कौन राज्‍य सबसे ज्‍यादा अपने एक्‍सपोर्ट कर सकता है। कौन सा ऐसा उत्‍पादन उसके राज्‍य में होता है जहां से दुनिया में एक्‍सपोर्ट हो रहा है, उसकी तरफ हम ध्‍यान केंद्रित करना चाहते हैं। हम दुनिया के बाजार में हिंदुस्‍तान की जगह बनाना चाहते हैं। तब मैंने कल कहा था मेड इन इंडिया, गर्व के साथ। एक जमाना था, मेड इन जापान कहते ही सामान हम जेब में ले लेते थे, चाहे कितना भी पैसा देना पड़े। क्‍या दुनिया मेड इन इंडिया का भरोसा नहीं कर सकती है? क्‍या हमारे पास वह कौशल नहीं है कि हम दुनिया के बाजार में अपनी जगह बना सकते? इन एसईजेड के माध्‍यम से ऐसे उत्‍पादन को हम प्राथमिकता दें ताकि दुनिया के बाजार के अंदर हम अपनी जगह बना सकें। मुझे विश्‍वास है कि भारत सरकार का यह इनिशिएटिव, राज्‍य सरकार की भी योजनाओं में सहभागिता, इस क्षेत्र के विकास के लिए, इस क्षेत्र के नौजवानों के जीवन में बदलाव लाने के लिए, रोजगार की संभावना उपलब्‍ध कराने के लिए बहुत बड़ा अवसर बनेगा। मैं आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं और रायगड की धरती पर से हम एक बार ललकारें

छत्रपति शिवाजी महाराज की जय, छत्रपति शिवाजी महाराज की जय, छत्रपति शिवाजी महाराज की जय, भारत माता की जय।

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Government of India to provide free vaccine to all Indian citizens above 18 years of age: PM Modi
June 07, 2021
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Government of India to provide free vaccine to all Indian citizens above 18 years of age
25 per cent vaccination that was with states will now be undertaken by Government of India: PM
Government of India will buy 75 per cent of the total production of the vaccine producers and provide to the states free of cost: PM
Pradhan Mantri Garib Kalyan Anna Yojna extended till Deepawali: PM
Till November, 80 crore people will continue to get free food grain every month: PM
Corona, Worst Calamity of last hundred years: PM
Supply of vaccine is to increase in coming days: PM
PM informs about development progress of new vaccines
Vaccines for children and Nasal Vaccine under trial: PM
Those creating apprehensions  about vaccination are playing with the lives of people: PM

मेरे प्यारे देशवासियों, नमस्कार! कोरोना की दूसरी वेव से हम भारतवासियों की लड़ाई जारी है।  दुनिया के अनेक देशों की तरह, भारत भी इस लड़ाई के दौरान बहुत बड़ी पीड़ा से गुजरा है। हममें से कई लोगों ने अपने परिजनों को, अपने परिचितों को खोया है। ऐसे सभी परिवारों के साथ मेरी पूरी संवेदनाएं हैं।

साथियों,

बीते सौ वर्षों में आई ये सबसे बड़ी महामारी है, त्रासदी है। इस तरह की महामारी आधुनिक विश्व ने न देखी थी, न अनुभव की थी। इतनी बड़ी वैश्विक महामारी से हमारा देश कई मोर्चों पर एक साथ लड़ा है। कोविड अस्पताल बनाने से लेकर ICU बेड्स की संख्या बढ़ानी हो, भारत में वेंटिलेटर बनाने से लेकर टेस्टिंग लैब्स का एक बहुत बड़ा नेटवर्क तैयार करना हो, कोविड से लड़ने के लिए बीते सवा साल में ही देश में एक नया हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया है। सेकेंड वेव के दौरान अप्रैल और मई के महीने में भारत में मेडिकल ऑक्सीजन की डिमांड अकल्पनीय रूप से बढ़ गई थी। भारत के इतिहास में कभी भी इतनी मात्रा में मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत कभी भी महसूस नहीं की गई। इस जरूरत को पूरा करने के लिए युद्धस्तर पर काम किया गया। सरकार के सभी तंत्र लगे। ऑक्सीजन रेल चलाई गई, एयरफोर्स के विमानों को लगाया गया, नौसेना को लगाया गया। बहुत ही कम समय में लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन के प्रॉडक्शन को 10 गुना से ज्यादा बढ़ाया गया। दुनिया के हर कोने से, जहां कही से भी, जो कुछ भी उपलब्ध हो सकता था उसको प्राप्त करने का भरसक प्रयास  किया गया, लाया गया। इसी तरह ज़रूरी दवाओं के production को कई गुना बढ़ाया गया, विदेशों में जहां भी दवाइयां उपलब्ध हों, वहां से उन्हें लाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी गई।

साथियों,

कोरोना जैसे अदृश्य और रूप बदलने वाले दुश्मन के खिलाफ लड़ाई में सबसे प्रभावी हथियार, कोविड प्रोटोकॉल है, मास्क, दो गज की दूरी और बाकी सारी सावधानियां उसका पालन ही है। इस लड़ाई में वैक्सीन हमारे लिए सुरक्षा कवच की तरह है। आज पूरे विश्व में वैक्सीन के लिए जो मांग है, उसकी तुलना में उत्पादन करने वाले देश और वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां बहुत कम हैं, इनी गिनी है। कल्पना करिए कि अभी हमारे पास भारत में बनी वैक्सीन नहीं होती तो आज भारत जैसे विशाल देश में क्या होता?  आप पिछले 50-60 साल का इतिहास देखेंगे तो पता चलेगा कि भारत को विदेशों से वैक्सीन प्राप्त करने में दशकों लग जाते थे। विदेशों में वैक्सीन का काम पूरा हो जाता था तब भी हमारे देश में वैक्सीनेशन का काम शुरू भी नहीं हो पाता था। पोलियो की वैक्सीन हो, Smallpox जहां गांव में हम इसको चेचक कहते हैं। चेचक की  वैक्सीन हो, हेपिटाइटिस बी की वैक्सीन हो, इनके लिए देशवासियों  ने दशकों तक इंतज़ार किया था। जब 2014 में देशवासियों ने हमें सेवा का अवसर दिया तो भारत में वैक्सीनेशन का कवरेज, 2014 में भारत में वैक्सीनेशन का कवरेज सिर्फ 60 प्रतिशत के ही आसपास था। और हमारी दृष्टि में ये बहुत चिंता की बात थी। जिस रफ्तार से भारत का टीकाकरण कार्यक्रम चल रहा था, उस रफ्तार से, देश को शत प्रतिशत टीकाकरण कवरेज का लक्ष्य हासिल करने में करीब-करीब 40 साल लग जाते। हमने इस समस्या के समाधान के लिए मिशन इंद्रधनुष को लॉन्च किया। हमने तय किया कि मिशन इंद्रधनुष के माध्यम से युद्ध स्तर पर वैक्सीनेशन किया जाएगा और देश में जिसको भी वैक्सीन की जरूरत है उसे वैक्सीन देने का प्रयास होगा। हमने मिशन मोड में काम किया, और सिर्फ 5-6 साल में ही वैक्सीनेशन कवरेज 60 प्रतिशत से बढ़कर 90 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गई। 60 से 90,  यानि हमने वैक्सीनेशन की स्पीड भी  बढ़ाई और दायरा भी बढ़ाया।

 हमने बच्चों को कई जानलेवा बीमारियों से बचाने के लिए कई नए टीकों को भी भारत के टीकाकरण अभियान का हिस्सा बना दिया। हमने ये इसलिए किया, क्योंकि हमें हमारे देश के बच्चों की चिंता थी, गरीब की चिंता थी, गरीब के उन बच्चों की चिंता थी जिन्हें कभी टीका लग ही नहीं पाता था। हम शत प्रतिशत टीकाकरण कवरेज की तरफ बढ़ रहे थे कि कोरोना वायरस ने हमें घेर लिया। देश ही नहीं, दुनिया के सामने फिर पुरानी आशंकाएं घिरने लगीं कि अब भारत कैसे इतनी बड़ी आबादी को बचा पाएगा? लेकिन साथियों,जब नीयत साफ होती है, नीति स्पष्ट होती है, निरंतर परिश्रम होता है, तो नतीजे भी मिलते हैं। हर आशंका को दरकिनार करके भारत ने एक साल के भीतर ही एक नहीं बल्कि दो 'मेड इन इंडिया' वैक्सीन्स लॉन्च कर दीं। हमारे देश ने, देश के वैज्ञानिकों ने ये दिखा दिया कि भारत बड़े बड़े देशों से पीछे नहीं है। आज जब मैं आपसे बात कर रहा हूं तो देश में 23 करोड़ से ज्यादा वैक्सीन की डोज़ दी जा चुकी हैं।

साथियों,

हमारे यहाँ कहा जाता है- विश्वासेन सिद्धि: अर्थात, हमारे प्रयासों में हमें सफलता तब मिलती है, जब हमें स्वयं पर विश्वास होता है। हमें पूरा विश्वास था कि हमारे वैज्ञानिक बहुत ही कम समय में वैक्सीन बनाने में सफलता हासिल कर लेंगे। इसी विश्वास के चलते जब हमारे वैज्ञानिक अपना रिसर्च वर्क कर ही रहे थे तभी हमने लॉजिस्टिक्स और दूसरी तैयारियां शुरू कर दीं थीं। आप सब भली-भांति जानते हैं कि पिछले साल यानि एक साल पहले, पिछले साल अप्रैल में, जब कोरोना के कुछ ही हजार केस थे, उसी समय वैक्सीन टास्क फोर्स का गठन कर दिया गया था। भारत में, भारत के लिए वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को सरकार ने हर तरह से सपोर्ट किया। वैक्सीन निर्माताओं को क्लिनिकल ट्रायल में मदद की गई, रिसर्च और डवलपमेंट के लिए ज़रूरी फंड दिया गया, हर स्तर पर सरकार उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चली। 

आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत मिशन कोविड सुरक्षा के माध्यम से भी उन्हें हज़ारों करोड़ रुपए उपलब्ध कराए गये। पिछले काफी समय से देश लगातार जो प्रयास और परिश्रम कर रहा है, उससे आने वाले दिनों में वैक्सीन की सप्लाई और भी ज्यादा बढ़ने वाली है। आज देश में 7 कंपनियाँ, विभिन्न प्रकार की वैक्सीन का प्रॉडक्शन कर रही हैं। तीन और वैक्सीन का ट्रायल भी एडवांस स्टेज पर चल रहा है। वैक्सीन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए दूसरे देशों की कंपनियों से भी वैक्सीन खरीदने की प्रक्रिया को तेज किया गया है। इधर हाल के दिनों में, कुछ एक्सपर्ट्स द्वारा हमारे बच्चों को लेकर भी चिंता जताई गई है। इस दिशा में भी 2 वैक्सीन्स का ट्रायल तेजी से चल रहा है। इसके अलावा अभी देश में एक 'नेज़ल' वैक्सीन पर भी रिसर्च जारी है। इसे सिरिन्ज से न देकर नाक में स्प्रे किया जाएगा। देश को अगर निकट भविष्य में इस वैक्सीन पर सफलता मिलती है तो इससे भारत के वैक्सीन अभियान में और ज्यादा तेजी आएगी।

साथियों,

इतने कम समय में वैक्सीन बनाना, अपने आप में पूरी मानवता के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इसकी अपनी सीमाएं भी हैं। वैक्सीन बनने के बाद भी दुनिया के बहुत कम देशों में वैक्सीनेशन प्रारंभ हुआ, और ज्यादातर समृद्ध देशों में ही शुरू हुआ। WHO ने वैक्सीनेशन को लेकर गाइडलाइंस दीं। वैज्ञानिकों ने वैक्सीनेशन की रूप रेखा रखी। और भारत ने भी जो अन्य देशों की best practices थी , विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक  थे, उसी आधार पर चरणबद्ध तरीके से वैक्सीनेशन करना तय किया। केंद्र सरकार ने मुख्यमंत्रियों के साथ हुई अनेकों बैठकों से जो सुझाव मिले, संसद के विभिन्न दलों के साथियों द्वारा जो सुझाव मिले, उसका भी पूरा ध्यान रखा। इसके बाद ही ये तय हुआ कि जिन्हें कोरोना से ज्यादा खतरा है, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। इसलिए ही, हेल्थ वर्कर्स, फ्रंटलाइन वर्कर्स, 60 वर्ष की आयु से ज्यादा के नागरिक, बीमारियों से ग्रसित 45 वर्ष से ज्यादा आयु के नागरिक, इन सभी को वैक्सीन पहले लगनी शुरू हुई। आप कल्पना कर सकते हैं कि अगर कोरोना की दूसरी वेव से पहले हमारे फ्रंटलाइन वर्कर्स को वैक्सीन नहीं लगी होती तो क्या होता? सोचिए, हमारे डॉक्टर्स, नर्सिंग स्टाफ को वैक्सीन ना लगी तो क्या होता? अस्पतालों में सफाई करने वाले हमारे भाई-बहनों को, एंबुलेंस के हमारे ड्राइवर्स भाई - बहनों को वैक्सीन ना लगी होती तो क्या होता? ज्यादा से ज्यादा हेल्थ वर्कर्स का वैक्सीनेशन होने की वजह से ही वो निश्चिंत होकर दूसरों की सेवा में लग पाए, लाखों देशवासियों का जीवन बचा पाए।

लेकिन देश में कम होते कोरोना के मामलों के बीच, केंद्र सरकार के सामने अलग-अलग सुझाव भी आने लगे, भिन्न-भिन्न मांगे होने लगीं। पूछा जाने लगा, सब कुछ भारत सरकार ही क्यों तय कर रही है? राज्य सरकारों को छूट क्यों नहीं दी जा रही? राज्य सरकारों को लॉकडाउन की छूट क्यों नहीं मिल रही? One Size Does Not Fit All जैसी बातें भी कही गईं। दलील ये दी गई कि संविधान में चूंकि Health-आरोग्य, प्रमुख रूप से राज्य का विषय है, इसलिए अच्छा है कि ये सब राज्य ही करें। इसलिए इस दिशा में एक शुरूआत की गई। भारत सरकार ने एक बृहद गाइडलाइन बनाकर राज्यों को दी ताकि राज्य अपनी आवश्यकता और सुविधा के अनुसार काम कर सकें। स्थानीय स्तर पर कोरोना कर्फ्यू लगाना हो, माइक्रो कन्टेनमेंट जोन बनाना हो, इलाज से जुड़ी व्यवस्थाएं हो, भारत सरकार ने राज्यों की इन मांगों को स्वीकार किया।

साथियों,

इस साल 16 जनवरी से शुरू होकर अप्रैल महीने के अंत तक, भारत का वैक्सीनेशन कार्यक्रम मुख्यत: केंद्र सरकार की देखरेख में ही चला। सभी को मुफ्त वैक्सीन लगाने के मार्ग पर देश आगे बढ़ रहा था। देश के नागरिक भी, अनुशासन का पालन करते हुए, अपनी बारी आने पर वैक्सीन लगवा रहे थे। इस बीच, कई राज्य सरकारों ने फिर कहा कि वैक्सीन का काम डी-सेंट्रलाइज किया जाए और राज्यों पर छोड़ दिया जाए। तरह-तरह के स्वर उठे। जैसे कि वैक्सीनेशन के लिए Age Group क्यों बनाए गए? दूसरी तरफ किसी ने कहा कि उम्र की सीमा आखिर केंद्र सरकार ही क्यों तय करे? कुछ आवाजें तो ऐसी भी उठीं कि बुजुर्गों का वैक्सीनेशन पहले क्यों हो रहा है? भांति-भांति के दबाव भी बनाए गए, देश के मीडिया के एक वर्ग ने इसे कैंपेन के रूप में भी चलाया।

साथियों,

काफी चिंतन-मनन के बाद इस बात पर सहमति बनी कि राज्य सरकारें अपनी तरफ से भी प्रयास करना चाहती हैं, तो भारत सरकार क्यों ऐतराज करे? और भारत सरकार ऐतराज क्यों करे? राज्यों की इस मांग को देखते हुए, उनके आग्रह को ध्यान में रखते हुए 16 जनवरी से जो व्यवस्था चली आ रही थी, उसमें प्रयोग के तौर पर एक बदलाव किया गया। हमने सोचा कि राज्य ये मांग कर रहे हैं, उनका उत्साह है, तो चलो भई 25 प्रतिशत काम उन्ही की शोपित कर दिया जाये, उन्ही को दे दिया जाए। स्वभाविक है, एक मई से राज्यों को 25 प्रतिशत काम उनके हवाले दिया गया, उसे पूरा करने के लिए उन्होंने अपने-अपने तरीके से प्रयास भी किए। 

इतने बड़े काम में किस तरह की कठिनाइयां आती हैं, ये भी उनके ध्यान में आने लगा, उनको पता चला। पूरी दुनिया में वैक्सीनेशन की क्या स्थिति है, इसकी सच्चाई से भी राज्य परिचित हुए। और हमने देखा, एक तरफ मई में सेकेंड वेव, दूसरी तरफ वैक्सीन के लिए लोगों का बढ़ता रुझान और तीसरी तरफ राज्य सरकारों की कठिनाइयां। मई में दो सप्ताह बीतते-बीतते कुछ राज्य खुले मन से ये कहने लगे कि पहले वाली व्यवस्था ही अच्छी थी। धीरे-धीरे इसमें कई राज्य सरकारें जुड़ती चली गईं। वैक्सीन का काम राज्यों पर छोड़ा जाए, जो इसकी वकालत कर रहे थे, उनके विचार भी बदलने लगे। ये एक अच्छी बात रही कि समय रहते राज्य, पुनर्विचार की मांग के साथ फिर आगे आए। राज्यों की इस मांग पर, हमने भी सोचा कि देशवासियों को तकलीफ ना हो, सुचारू रूप से उनका वैक्सीनेशन हो, इसके लिए एक मई के पहले वाली, यानि 1 मई के पहले 16 जनवरी से अप्रैल अंत तक जो व्यवस्था थी, पहले वाली पुरानी व्यवस्था को फिर से लागू किया जाए।

 

साथियों,

आज ये निर्णय़ लिया गया है कि राज्यों के पास वैक्सीनेशन से जुड़ा जो 25 प्रतिशत काम था, उसकी जिम्मेदारी भी भारत सरकार उठाएगी। ये व्यवस्था आने वाले 2 सप्ताह में लागू की जाएगी। इन दो सप्ताह में केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर नई गाइड-लाइंस के अनुसार आवश्यक तैयारी कर लेंगी। संयोग है कि दो सप्ताह बाद, 21 जून को ही अंतरराष्ट्रीय योग दिवस भी है। 21 जून, सोमवार से देश के हर राज्य में, 18 वर्ष से ऊपर की उम्र के सभी नागरिकों के लिए, भारत सरकार राज्यों को मुफ्त वैक्सीन मुहैया कराएगी। वैक्सीन निर्माताओं से कुल वैक्सीन उत्पादन का 75 प्रतिशत हिस्सा भारत सरकार खुद ही खरीदकर राज्य सरकारों को मुफ्त देगी। यानि देश की किसी भी राज्य सरकार को वैक्सीन पर कुछ भी खर्च नहीं करना होगा। अब तक देश के करोड़ों लोगों को मुफ्त वैक्सीन मिली है।

 अब 18 वर्ष की आयु के लोग भी इसमें जुड़ जाएंगे। सभी देशवासियों के लिए भारत सरकार ही मुफ्त वैक्सीन उपलब्ध करवाएगी। गरीब हों, निम्न मध्यम वर्ग हों, मध्यम वर्ग हो या फिर उच्च वर्ग, भारत सरकार के अभियान में मुफ्त वैक्सीन ही लगाई जाएगी। हां, जो व्यक्ति मुफ्त में वैक्सीन नहीं लगवाना चाहते, प्राइवेट अस्पताल में वैक्सीन लगवाना चाहते हैं, उनका भी ध्यान रखा गया है। देश में बन रही वैक्सीन में से 25 प्रतिशत,  प्राइवेट सेक्टर के अस्पताल सीधे ले पाएं, ये व्यवस्था जारी रहेगी। प्राइवेट अस्पताल, वैक्सीन की निर्धारित कीमत के उपरांत एक डोज पर अधिकतम 150 रुपए ही सर्विस चार्ज ले सकेंगे। इसकी निगरानी करने का काम राज्य सरकारों के ही पास रहेगा।

साथियों,

हमारे शास्त्रों में कहा गया है-प्राप्य आपदं न व्यथते कदाचित्, उद्योगम् अनु इच्छति चा प्रमत्तः॥ अर्थात्, विजेता आपदा आने पर उससे परेशान होकर हार नहीं मानते, बल्कि उद्यम करते हैं, परिश्रम करते हैं, और परिस्थिति पर जीत हासिल करते हैं। कोरोना से लड़ाई में 130 करोड़ से अधिक भारतीयों ने अभी तक की यात्रा आपसी सहयोग, दिन रात मेहनत करके तय की है। आगे भी हमारा रास्ता हमारे श्रम और सहयोग से ही मजबूत होगा। हम वैक्सीन प्राप्त करने की गति भी बढ़ाएंगे और वैक्सीनेशन अभियान को भी और गति देंगे। हमें याद रखना है कि, भारत में वैक्सीनेशन की रफ्तार आज भी दुनिया में बहुत तेज है, अनेक विकसित देशों से भी तेज है। हमने जो टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म बनाया है- Cowin, उसकी भी पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। अनेक देशों ने भारत के इस प्लेटफॉर्म को इस्तेमाल करने में रुचि भी दिखाई है। हम सब देख रहे हैं कि वैक्सीन की एक एक डोज कितनी महत्वपूर्ण है, हर डोज से एक जिंदगी जुड़ी हुई है। केंद्र सरकार ने ये व्यवस्था भी बनाई है कि हर राज्य को कुछ सप्ताह पहले ही बता दिया जाएगा कि उसे कब, कितनी डोज मिलने वाली है। मानवता के इस पवित्र कार्य में वाद-विवाद और राजनीतिक छींटाकशी, ऐसी बातों को कोई भी अच्छा नहीं मानता है। वैक्सीन की उपलब्धता के अनुसार, पूरे अनुशासन के साथ वैक्सीन लगती रहे, देश के हर नागरिक तक हम पहुंच सकें, ये हर सरकार, हर जनप्रतिनिधि, हर प्रशासन की सामूहिक जिम्मेदारी है।

प्रिय देशवासियों,

टीकाकरण के अलावा आज एक और बड़े फैसले से मैं आपको अवगत कराना चाहता हूं। पिछले वर्ष जब कोरोना के कारण लॉकडाउन लगाना पड़ा था तो प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत, 8 महीने तक 80 करोड़ से अधिक देशवासियों को मुफ्त राशन की व्यवस्था हमारे देश ने की थी। इस वर्ष भी दूसरी वेव के कारण मई और जून के लिए इस योजना का विस्तार किया गया था। आज सरकार ने फैसला लिया है कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना को अब दीपावली तक आगे बढ़ाया जाएगा। महामारी के इस समय में, सरकार गरीब की हर जरूरत के साथ, उसका साथी बनकर खड़ी है। यानि नवंबर तक 80 करोड़ से अधिक देशवासियों को, हर महीने तय मात्रा में मुफ्त अनाज उपलब्ध होगा। इस प्रयास का मकसद यही है कि मेरे किसी भी गरीब भाई-बहन को, उसके परिवार को, भूखा सोना ना पड़े।

साथियों,

देश में हो रहे इन प्रयासों के बीच कई क्षेत्रों से वैक्सीन को लेकर भ्रम और अफवाहों की  चिंता बढ़ाती है। ये चिंता भी मैं आपके सामने व्यक्त करना चाहता हूं। जब से भारत में वैक्सीन पर काम शुरू हुआ, तभी से कुछ लोगों द्वारा ऐसी बातें कही गईं जिससे आम लोगों के मन में शंका पैदा हो। कोशिश ये भी हुई कि भारत के वैक्सीन निर्माताओं का हौसला पस्त पड़ जाए और उनके सामने अनेक प्रकार की बाधाएं आएं। जब भारत की वैक्सीन आई तो अनेक माध्यमों से शंका-आशंका को और बढ़ाया गया। वैक्सीन न लगवाने के लिए भांति-भांति के तर्क प्रचारित किए गए। इन्हें भी देश देख रहा है। जो लोग भी वैक्सीन को लेकर आशंका पैदा कर रहे हैं, अफवाहें फैला रहे हैं, वो भोले-भाले भाई-बहनों के जीवन के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं।

ऐसी अफवाहों से सतर्क रहने की जरूरत है। मैं भी आप सबसे, समाज के प्रबुद्ध लोगों से, युवाओं से अनुरोध करता हूँ, कि आप भी वैक्सीन को लेकर जागरूकता बढ़ाने में सहयोग करें। अभी कई जगहों पर कोरोना कर्फ्यू में ढील दी जा रही है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हमारे बीच से कोरोना चला गया है। हमें सावधान भी रहना है, और कोरोना से बचाव के नियमों का भी सख्ती से पालन करते रहना है। मुझे पूरा विश्वास है, हम सब कोरोना से इस जंग में जीतेंगे, भारत कोरोना से जीतेगा। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ, आप सभी देशवासियों का बहुत बहुत धन्यवाद!