महाराष्‍ट्र के राज्‍यपाल श्रीमान के. शंकर नारायणन जी, मुख्‍यमंत्री श्रीमान पृथ्‍वीराज जी, मंत्रिपरिषद के मेरे साथी श्री नितिन गडकरी जी, श्री अनंत गीते जी, यहां के सांसद श्री सारंग जी, विधान परिषद के नेता प्रतिपक्ष श्रीमान विनोद तांबड़े जी, विधान सभा के प्रतिपक्ष के नेता श्री एकनाथ खरसे जी, शिपिंग के सचिव श्री विश्‍वपति त्रिवेदी जी, जेएनपीटी के चेयरमैन श्री एम.एन. कुमार और विशाल संख्‍या में पधारे हुए भाइयों और बहनों,

प्रधानमंत्री बनने के बाद महाराष्‍ट्र की धरती पर ये मेरा पहला सार्वजनिक कार्यक्रम है। और मेरे लिए ये बड़े सौभाग्‍य की बात है कि मेरा पहला कार्यक्रम छत्रपति शिवाजी महाराज की राजधानी रायगड की धरती से हो रहा है। और जब रायगड जिले में पहला कार्यक्रम कर रहा हूं तो सहज रूप से हृदय के भीतर से एक ही स्‍वर निकलता है- ‘छत्र‍पति शिवरायांचा त्रिवार जयजयकार’।

आज यहां स्‍पेशल इकोनोमिक जोन, और जिसका मुख्‍य लक्ष्‍य यहां के भूमि पुत्रों को रोजगार मिले, लाखों नौजवानों को रोजी-रोटी कमाने के लिए यहां से दूर न जाना पड़े। उनको यहीं पर रोजगार मिल जाए। और इस हेतु से मैन्‍यूफैक्‍चरिंग सेक्‍टर को बढ़ावा देना, औद्योगिक विकास करना, सेवा क्षेत्र का विकास करना, जिससे रोजगार की संभावनाएं बढ़ती हैं। अगर हमें देश के सामान्‍य मानवीय जीवन में बदलाव लाना है, क्‍वालिटी ऑफ लाइफ में परिवर्तन लाना है तो आर्थिक विकास, रोजगार के अवसर, आवश्‍यक इंफ्रास्‍टक्‍चर, शिक्षा, आरोग्‍य जैसी सुविधाएं, इसे प्राथमिकता देनी होती है। एक समय था, बंदरगाहों का विकास, उसमें छोटे-मोटे प्रयास होते थे, लेकिन आज विश्‍व व्‍यापार का युग है। और जब विश्‍व व्‍यापार का युग है तब सामुद्रिक व्‍यापार, यह अनिवार्य हो गया है। हमरा हिन्‍द महासागर, दुनिया के आयल सेक्‍टर का दो तिहाई व्‍यापार हिंद महासागर के जरिये होता है। कंटेनर का व्‍यापार क्षेत्र, करीब 50 प्रतिशत हिंद महासागर से होता है और आने वाले दिनों में यह बढ़ने वाला है। इसलिए पोर्ट सेक्‍टर का डेवलपमेंट और विशेष कर के हमारे देश के जो तटीय राज्‍य को ध्‍यान देना होगा। इस बार हमने बजट में घोषणा की है, सागरमाला की रचना करने की। हिंदुस्‍तान के समुद्र तट पर पूरब हो या पश्चिम या दक्षिण, समुद्र तट पर जो राज्‍य हैं, उसे सागरमाला प्रोजेक्‍ट का लाभ मिले और जब हम नक्‍शा देखें, भारत माता का मानचित्र देखें तो इन सागरमाला की ऐसी शृंखला तैयार हो जहां सर्वाधिक आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बना हो। दुनिया में जिन-जिन राष्‍ट्रों का विकास हुआ है उसमें एक बात प्रखर रूप से उभरती है कि समुद्र तट पर जो शहर विकसित हुए हैं, उसी की आर्थिक गतिविधियों ने उस देश को संवृद्धि दी है और इसलिए भारत ने भी बंदरगाहों का विकास और सागरमाला योजना, इसकी अनिवार्यता समझी है।

एक समय था, हम पोर्ट डेवलपमेंट पर केंद्रित थे। लेकिन, अब पोर्ट डेवलपमेंट से बात नहीं बनेगी। अगर हमें विकास करना है तो पोर्ट लेड डेवलपमेंट पर बल देना पड़ेगा। यदि मैं पोर्ट लेड डेवलपमेंट कहता हूं , तब जिसमें हमारी सागरमाला योजना के तहत संकल्‍पना है कि पोर्ट हो, पोर्ट के साथ एस ई जेड हो, पोर्ट के साथ रेल की कनेक्टिविटी, रोड कनेक्टिविटी, रोड कनेक्टिविटी, वाटर वे कनेक्टिविटी, एक प्रकार से हिंदुस्‍तान के अन्‍य भूभागों से उसको ऐसी कनेक्टिविटी मिले ताकि हमारे जो उद्योगकार, लैंड लॉक्‍ड स्‍टेट के भी, जो उत्‍पादन करें, उसको तत्‍काल समुद्री तट पर पहुंचा करके दुनिया के बाजारों में पहुंचा सकें। अगर हमें एक्‍सपोर्ट को बल देना है तो हमें इन व्‍यवस्‍थाओं को भी बल देना होगा। इसलिए सागरमाला योजना के तहत पोर्ट लेड डेवपलमेंट- जहां कनेटिक्‍वटी भी हो, कोल्‍ड स्‍टोरेज का नेटवर्क हो, वेयर हाउसिंग का नेटवर्क हो, एक फुल फ्लेज्ड व्‍यवस्‍था को हम विकसित करना चाहते हैं। और उसी के तहत इस नई सरकार ने, तत्‍काल यहां के नौजवानों को रोजगार मिले, पूंजी निवेश हो, उत्‍पादन बढ़े, इसके लिए आज यहां पर ये एसईजेड आरंभ करना तय किया है।

पृथ्‍वीराज जी ने, जो एस ई जेड बंद पड़े हैं, उसकी चिंता जताई। यह चिंता तो उनको पहले से ही रही होगी, लेकिन पहले शायद कह नहीं पाए होंगे। क्‍योंकि ये, बीमारी नई नहीं है, पुरानी है। और कभी-कभी पुरानी बीमारियों को दूर करने के लिए अच्‍छे डॉक्‍टर की जरूरत पड़ती है। तो माननीय मुख्‍यमंत्री जी ने जो चिंता जताई है, मैं भी उसमें अपना स्‍वर जोड़ता हूं। उनकी चिंता वाजिब है और इस समस्‍या का समाधान करने की दिशा में नई सरकार बहुत ही तेज गति से काम कर रही है। मैंने, मेरे ही कार्यालय में एक विशेष टीम बनाई है, जिसको मैंने कहा कि भाई, जब एस ई जेड की घोषणा हुई तो बड़ा उमंग-उत्‍साह था, चारो तरफ क्‍या हो गया? यह टेक ऑफ ही नहीं कर पाया। रनवे पर ही रुका पड़ा है। कुछ तो टेक ऑफ कर गए तो ग्राउंडेड हो गए। क्‍या कारण थे? नियमों की क्‍या कठिनाई थी, क्‍या सपोर्ट मिला, क्‍या नहीं मिला। इन सारे विषयों का अध्‍ययन करके निदान निकालना है। यह समस्‍या सिर्फ महाराष्‍ट्र की नहीं है। पूरे हिंदुस्‍तान को इस संकट को झेलना पड़ रहा है। लेकिन उस संकट से देश को बाहर निकालने के लिए हम पूरा प्रयास करेंगे। मैं मुख्‍यमंत्री जी को और देश के अन्‍य भागों को भी विश्‍वास दिलाता हूं।

दो और बातें भी आज मैं कहना चाहता हूं। एक्‍सपोर्ट के क्षेत्र में भारत सरकार का एक डिपार्टमेंट रहता है, वह अपनी योजनाएं बनाता है। और एक्‍सपोर्ट के बिजनेस से जुड़े हुए लोग भारत सरकार के साथ अपना संबंध बनाते हैं। जब तक हम राज्‍यों को इसके अंदर नहीं जोड़ेंगे, राज्‍य अपने राज्‍य के उत्‍पादकों को, मैन्‍यूफैक्‍चरर्स को, एक्‍सपोर्ट के लिए प्रोत्‍साहित नहीं करेंगे, केंद्र और राज्‍य मिलकर के एक्‍सपोर्ट प्रमोशन के लिए कंधे से कंधा मिलाकर के काम नहीं करेंगे, तो हम जो चाहते हैं, एक्‍सपोर्ट का वह परिणाम नहीं मिल सकता है। और इसलिए नई सरकार राज्‍यों को भी एक स्‍वतंत्र एक्‍सपोर्ट कमीशन बनाने को प्रेरित कर रही है, भारत सरकार के साथ मिल करके। राज्‍य भी अपने राज्‍य के ऐसे उत्‍पादकों को प्रोत्‍साहन दें। एक्‍सपोर्ट करने वाले जो यूनिट हैं, उसकी चिंता करने की राज्‍यों में व्‍यवस्‍था खड़ी हो। राज्य और केंद्र मिलकर के इस काम को भलीभांति कर सकते हैं। इनोवेशंस में कोई जो मदद करनी है, टेक्‍नॉलाजी ट्रांसफर करने की व्‍यवस्‍था करने में कोई मदद करनी है, डिजाइनिंग की दृष्टि से व्‍यवस्‍था करनी है, पैकेजिंग की व्‍यवस्‍था करनी है। ये सारे एक्‍सपर्टाइज पहलू हैं। अगर उस पर बल देते हैं, राज्‍य और केंद्र मिलकर के काम करते हैं, तो आज जो देश की हालत है- कि हमारा इंपोर्ट बढ़ता चला जा रहा है, एक्‍सपोर्ट कम होता जा रहा है, वह बदल सकती है। आने वाले देखते ही देखते समय के अंदर हमारे नौजवानों पर मुझे भरोसा है कि वो उस चीजों को उत्‍पादित कर सकते हैं कि एक्‍सपोर्ट की दुनिया में हिंदुस्‍तान का डंका बजने लग जाएगा। पिछले दिनों हमने राज्‍यों और केंद्र के प्रतिनिधियों की पहली बार एक्‍सपोर्ट प्रमोशन के लिए एक मीटिंग बुलाई। राज्‍यों को कहा कि आपके यहां एक्‍सपोर्ट करने वाली कौन सी यूनिट हैं, उसे जरा देखो तो। उसकी मुसीबत क्‍या है, उनकी सुविधाएं कैसे बढ़े। हमारी कानूनी झाल इतनी भयंकर बनाकर रखी गई है, यहां बैठे हुए व्‍यापार जगत के मित्र जानते हैं। कि उनके व्‍यवसाय में एक डिपार्टमेंट तो पूरा सरकारी फार्म भरने में लगाकर रखना पड़ता है। मेरी कोशिश है उसको सिम्‍पलीफाई करने की। अभी-अभी हमारे निति‍न जी ने अपने विभाग में दो महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं। और भी बहुत किए हैं पर मैं दो का उल्‍लेख यहां करना चाहता हूं। अब ऐसी चीजें अखबारों में नहीं आती हैं, क्‍योंकि हमारे देश में सकारात्‍मक समाचारों के लिए अभी जरा तकलीफ रहती है। ये शिपिंग में जो लोग लगे हैं, उन्‍हें हर वर्ष लाइसेंस लेना पड़ता था। अब मुझे बताओ भाई, ये हर वर्ष लाइसेंस के चक्‍कर में पड़ना, मतलब क्‍या है? अफसर के पास जाओ, फिर कुछ इधर से, और तब जाकर लाइसेंस रिव्‍यू होता है और तब फिर रिन्‍यू होता है। हमारे निति‍न जी ने एक धमाके से निर्णय कर दिया, अब लाइसेंस लाइफ टाइम मिलेगा। विदेशों से जो व्‍यापार करने आते हैं, शिप आते हैं, उनका भी यही हाल है। उनके लिए भी नियम बदल दिए गए हैं।

हमारी कोशिश है, सरलीकरण की नीति, और ईज़ आफ द बर्डेन। यह जितना हम तेज माहौल बनाएंगे उतना बढि़या। भारत के नौजवानों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। भारत के उद्योगकारों में साहस करने की क्षमता अप्रतिम है। उन्‍हें उचित माहौल मिलना चाहिए। उचित प्रोत्‍साहन मिलना चाहिए, उचित वातावरण मिलना चाहिए। और उसके लिए यह सरकार प्रतिबद्ध है।

दूसरा एक क्षेत्र जिस पर मैं आकर्षित करना चाहता हूं, यहां उद्योग के लोग भी बैठे हैं और मुंबई हमारी उद्योग नगरी भी रही है, आर्थिक नगरी रही है। और इसलिए आज विश्‍व का सामुद्रिक व्‍यापार जितना तेजी से बढ़ रहा है, उतनी ही शिपिंग इंडस्‍ट्री की बहुत बड़ी मांग बढ़ रही है। आज शिप बिल्डिंग एक बहुत बड़ी ऑपरच्‍यूनिटी है। पूरे विश्‍व में शिप बिल्डिंग के क्षेत्र में हमारा कंट्रीव्‍यूशन बहुत कम है। साउथ कोरिया जैसा देश, बहुत छोटा देश, महाराष्‍ट्र से भी छोटा। वहां आज दुनिया का 40 प्रतिशत शिप बिल्डिंग का काम वह अकेला देश करता है। और भारत के पास जितना बड़ा समुद्र समुद्र तट हो, इतने बड़े नौजवानों की फौज हो और शिप बिल्डिंग का काम कोई बहुत बड़ी टेक्‍नोलॉजी का काम नहीं है। टर्नर, फिटर, वेल्‍डर भी शिप बिल्डिंग के काम में लग जाते हैं। गरीब से गरीब व्‍यक्ति को रोजगार मिलता है। हम शिप बिल्डिंग को बढ़ावा देना चाहते हैं।

और कल जैसे मैंने 15 अगस्‍त को सार्वजनिक रूप से कहा था कम मेक इन इंडिया। कुछ लोग इसको समझ नहीं पाए। तो कुछ लोग कल चला रहे थे, मेक इंडिया। मैंने कहा था 'मेक इन इंडिया'। हम चाहते हैं, विदेशी पूंजी निवेशक आएं। शिप बिल्डिंग एक बहुत बड़ा क्षेत्र है। और हमारे पास नौजवानों, स्किल, मैन पावर, यह हमारे लिए उपलब्‍ध कराना बेहद आसान है। हम इसे बल देना चाहते हैं। इतना ही नहीं, पोर्ट का डेवलपमेंट, यह सिर्फ वहां पर रहने वाले लोगों के आर्थिक प्रगति का केंद्र नहीं होता है। हमारे बंदरगाह एक प्रकार से भारत की समृद्धि का प्रवेश द्वार बन सकते हैं। अगर हम, हमारे बंदरगाहों को भारत की समृद्धि के प्रवेश द्वार के रूप में विकसित करना चाहते हैं तो हमने सागरमाला योजना के तहत उसको और बढ़ावा देने का प्रयास आरंभ किया है। मैं देश के नौजवानों को विश्‍वास देता हूं। रोजगार की संभावनाएं जितनी ज्‍यादा बढ़े, ऐसे उद्योगों को हम बल देना चाहते हैं। किसानों का, उनकी मेहनत का उचित दाम मिले, किसान जो उत्‍पादन करता है, उसका वैल्‍यू एडिशन हो, मूल्‍य वृद्धि हो। दुनिया के बाजार में हमारे किसानों द्वारा उत्‍पादित की हुई चीजें पहुंचें, उस प्रकार का औद्योगिक विकास हो जो कृषि‍ आधारित हो। गांव के नौजवानों को रोजगार मिले। हम जितना इसका प्रकार का विस्‍तार करेंगे, भारत के पास जो सबसे बड़ी ताकत है वह 65 प्रतिशत नौजवान 35 वर्ष से कम आयु के हैं। अगर इनकी शक्ति देश के अंदर लग जाए तो दुनिया के अंदर देश का डंका बज जाए। इस विश्‍वास के साथ हम आगे बढ़ सकते हैं।

लाखों-करोड़ों रुपये के पूंजी निवेश से यहां पर रोजगार की संभानाएं बढ़ने वाली हैं और हर राज्‍य, कौन राज्‍य ज्‍यादा एक्‍सपोर्ट करता है, उसकी आने वाले दिनों में स्‍पर्धा करने की आवश्‍यकता है। राज्‍यों-राज्‍यों के बीच स्‍पर्धा हो, विकास की स्‍पर्धा हो। कौन राज्‍य सबसे ज्‍यादा अपने एक्‍सपोर्ट कर सकता है। कौन सा ऐसा उत्‍पादन उसके राज्‍य में होता है जहां से दुनिया में एक्‍सपोर्ट हो रहा है, उसकी तरफ हम ध्‍यान केंद्रित करना चाहते हैं। हम दुनिया के बाजार में हिंदुस्‍तान की जगह बनाना चाहते हैं। तब मैंने कल कहा था मेड इन इंडिया, गर्व के साथ। एक जमाना था, मेड इन जापान कहते ही सामान हम जेब में ले लेते थे, चाहे कितना भी पैसा देना पड़े। क्‍या दुनिया मेड इन इंडिया का भरोसा नहीं कर सकती है? क्‍या हमारे पास वह कौशल नहीं है कि हम दुनिया के बाजार में अपनी जगह बना सकते? इन एसईजेड के माध्‍यम से ऐसे उत्‍पादन को हम प्राथमिकता दें ताकि दुनिया के बाजार के अंदर हम अपनी जगह बना सकें। मुझे विश्‍वास है कि भारत सरकार का यह इनिशिएटिव, राज्‍य सरकार की भी योजनाओं में सहभागिता, इस क्षेत्र के विकास के लिए, इस क्षेत्र के नौजवानों के जीवन में बदलाव लाने के लिए, रोजगार की संभावना उपलब्‍ध कराने के लिए बहुत बड़ा अवसर बनेगा। मैं आप सबको बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं और रायगड की धरती पर से हम एक बार ललकारें

छत्रपति शिवाजी महाराज की जय, छत्रपति शिवाजी महाराज की जय, छत्रपति शिवाजी महाराज की जय, भारत माता की जय।

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सुनिश्चित करें कि आपके घर, सोसाइटी या मोहल्ले में स्थापित होने वाली गणपति बप्पा की प्रतिमा हमारे अपने देश की मिट्टी से बनी हो: पीएम मोदी

मेरे प्यारे देशवासियो,

नमस्कार | ‘मन की बात’ में एक बार फिर आप सबसे जुड़कर मुझे अत्यंत आनंद हो रहा है | 2026 का आधा साल बीतने को है | इन 6 महीनों में हमने ‘मन की बात’ में देशवासियों की अनेक उपलब्धियों पर चर्चा की है | जून में भी, देश ने कुछ ऐसी उपलब्धियाँ हासिल की हैं, जो हर देशवासी को गर्व से भर देती हैं | ये सफलताएँ देश की सुरक्षा और आत्मनिर्भरता से जुड़ी हैं | हाल ही में मुझे कोलकाता में नौ-सेना से जुड़े एक कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला | वहाँ INS दूनागिरी, INS संशोधक और INS अग्रय को भारतीय नौ-सेना के बेड़े में शामिल किया गया | इन ships की design और manufacturing तक, सब कुछ स्वदेशी है |

साथियो,

जून के महीने में ही aviation sector में भी देश ने एक बड़ी सफलता पाई | C-295, ये विमान ‘Made In India’ है और C-295 विमान ने अपनी पहली उड़ान पूरी की है, और ऐसे 40 विमान, भारत में ही बनाए जा रहे हैं | इससे MSME और Aerospace sector को नई शक्ति मिल रही है | रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं | और आत्मनिर्भर भारत का संकल्प भी मजबूत हो रहा है | इसी महीने DRDO ने स्वदेशी ‘Long Range Land Attack Cruise Missile’ का भी सफल परीक्षण किया है | इसको DRDO की Laboratories और Indian Industries Partners ने मिलकर बनाया है, यानि, आज समुद्र से लेकर आकाश तक हमारा भारत अधिक सुरक्षित और आत्मनिर्भर बन रहा है |

साथियो,

जून में एक और आयोजन हुआ जिसमें पूरी दुनिया भारत के प्रयासों से जुड़ी, और ये कार्यक्रम था ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ | इस बार दुनिया के 2500 से अधिक स्थानों पर योग के अनेक विविध कार्यक्रम हुए | हमारे देश में करोड़ों लोगों ने स्थान-स्थान पर योग कार्यक्रमों में हिस्सा लिया | इस महीने, अहमदाबाद में आयोजित ‘विश्व योगासन चैम्पियनशिप’ की भी बड़ी चर्चा हुई | इसमें भारत ने कुल 114 पदक जीते हैं, इनमें 102 गोल्ड मेडल भी शामिल हैं | भारत इस चैम्पियनशिप की पदक तालिका में पहले स्थान पर रहा | मैं सभी विजेता खिलाड़ियों को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ |

साथियो,

किसी भी राष्ट्र की आत्मा उसके लोग होते हैं | और जब उस देश के लोग कोई संकल्प लेते हैं तो कोई भी शक्ति उन्हें अपने लक्ष्य से डिगा नहीं पाती | राष्ट्र निर्माण में जन-भागीदारी की ये ताकत भारत की बहुत बड़ी पूंजी है और इस जन-भागीदारी का हम बार-बार अनुभव कर रहे हैं |

साथियो,

पश्चिम एशिया में बनी युद्ध की स्थितियों को देखते हुए, मैंने देशवासियों से कुछ आग्रह किए थे | मैंने कहा था कि जहाँ तक संभव हो, कुछ समय के लिए गोल्ड, सोना खरीदने से बचें | लोगों से कहा था कि विदेश में छुट्टियाँ मनाने से बचें, मैंने लोगों से car pooling को भी बढ़ावा देने की अपील की थी, मैंने किसानों से chemical मुक्त खेती के लिए, खेत बचाने के लिए और प्राकृतिक खाद का ज्यादा- से-ज्यादा इस्तेमाल का आग्रह किया था | साथियो, मैं देश के हर नागरिक का आभारी हूँ कि मेरी अपील का उन्होंने ना सिर्फ समर्थन किया बल्कि हर तरफ से उसमें अपना सहयोग कर रहे हैं | मुझे कई परिवारों ने संदेश भेजकर अपने अनुभव साझा किए हैं | कितने ही परिवारों ने तय किया है कि घर के विवाह में इस बार सोना नहीं खरीदेंगे | जरूरत पड़ी तो पुराने सोने को recycle करके नए गहने बना लेंगे | कितने ही लोगों ने social media पर ये भी लिखा है कि कैसे उन्होंने इस बार विदेश यात्रा को टाल दिया है |

साथियो,

car pooling को लेकर भी लोगों ने अनेक अनुभव साझा किए हैं | जो लोग हर दिन एक ही दिशा में अपने-अपने वाहनों से जाते थे, वे अब साथ जाने लगे हैं | लोग हर संभव बस और मेट्रो का उपयोग कर रहे हैं | इससे पेट्रोल और डीजल की बचत हो रही है | इसी तरह देश के अलग-अलग हिस्सों में प्राकृतिक खाद की खपत बढ़ने की भी खबरें आ रही हैं | साथियो, मुझे इस बात की खुशी है, इस global crisis का हम भारतीय मिलकर मुकाबला कर रहे हैं | मुझे विश्वास है जनभागीदारी की यही शक्ति हमें मजबूती देगी, हमें सफल बनाएगी |

मेरे प्यारे देशवासियो,

हमारे देश में जन्मदिन, शादी-ब्याह पारिवारिक कार्यक्रम होने के ही साथ ही पूरे समाज का भी उत्सव होता है | हर परिवार चाहता है कि उसकी खुशियाँ दूसरों के साथ भी साझा हों | लोग मेहमानों को उपहार भी देते हैं | साथियो, महाराष्ट्र के नांदेड़ में एक परिवार ने अपनी खुशियाँ बाँटने के लिए ऐसा काम किया है जो चर्चा का विषय बन गया है | यहाँ नांदेड़ के बहादुरपुरा गाँव में पेठकर परिवार रहता है | इस परिवार ने सोचा कि अगर खुशी बाँटनी ही है, तो ऐसी चीज दी जाए, जो मुश्किल समय में किसी परिवार का सहारा बने | अपने घर में विवाह के अवसर पर इस परिवार ने गाँव के लगभग साढ़े तीन हजार लोगों के लिए दुर्घटना बीमा की व्यवस्था की | हर व्यक्ति को एक लाख रुपए का बीमा कवर दिया गया | इस पहल के पीछे की भावना बहुत स्पर्श करने वाली है | परिवार ने देखा था कि दुर्घटना के बाद परिवारों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है | ऐसे समय में एक छोटी-सी सहायता भी बहुत बड़ा संबल बन जाती है |

साथियो,

सरकार देश के करोड़ों परिवारों तक सुरक्षा का कवच पहुंचा रही है | ‘प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना’ के तहत केवल 20 रुपये के सालाना premium यानि केवल एक साल के 20 रुपये का premium, उस पर दो लाख रुपये तक का ‘दुर्घटना बीमा’ मिलता है | अब तक इस योजना से 58 करोड़ से अधिक लोग जुड़ चुके हैं | इनमें करीब 28 करोड़ हमारी माताएं, बहनें, बेटियाँ हैं, महिलाएं हैं | इस योजना से पीड़ित परिवारों को अब तक जो हिसाब मिला है 3,700 करोड़ रुपये से अधिक की सहायता मिल चुकी है|

साथियो

उसी प्रकार से ‘प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना’ भी उतनी ही अहम है | ये योजना व्यक्ति की दुखद मृत्यु होने पर उसके परिवार को दो लाख रुपये का बीमा कवर देती है | इसका वार्षिक premium सिर्फ 436 रुपये है | मतलब एक दिन का मुश्किल से डेढ़ रुपया | इस योजना से अब तक 27 करोड़ से अधिक लोग जुड़े हैं | इसके तहत देश के करीब 11 लाख परिवारों को करीब 22 हजार करोड़ रुपये की सहायता मिल चुकी है | ये आकड़ें बहुत बड़े हैं | इन आकड़ों के पीछे लाखों परिवारों की अपनी-अपनी कहानी है | कहीं किसी माँ को बच्चों की पढ़ाई जारी रखने में सहायता मिल गई, कहीं किसी पत्नी को घर की जिम्मेदारियाँ संभालने का सहारा मिल गया | साथियो, कई बार बहुत बड़ी सुरक्षा की शुरुआत बहुत छोटी राशि और एक छोटे-से कदम से हो सकती है, छोटा-सा भी निर्णय बहुत बड़ा बदलाव करता है | मेरा आप सभी से आग्रह है कि अपने परिवार में इन योजनाओं की जानकारी जरूर साझा करें |

मेरे प्यारे देशवासियो

‘मन की बात’ में अब बात एक ऐसे विषय की जो हजारों साल पुराना है, हजारों साल से मानव समाज में घर कर करके बैठ गया है | ये विषय है – अंधविश्वास का | अंधविश्वास कई बार केवल एक गलत धारणा नहीं होता | वो डर पैदा करता है और जब डर मन पर हावी हो जाता है, तो इंसान सच को देखना ही बंद कर देता है | अंधविश्वास में डूबे लोग, फिर बिना तर्क के, बिना सत्य जाने, ऐसे फैसले लेने लगते हैं, जिनका बड़ा नुकसान होता है | वहीं समाज में ऐसे लोग भी होते हैं, जो विज्ञान, अनुभव और तर्क के आधार पर उन धारणाओं को चुनौती देते हैं | अंधविश्वास से विश्वास तक की ये यात्रा आसान नहीं होती और आज मैं ऐसी ही एक सफल यात्रा के बारे में आपको जरूर बताना चाहता हूँ |

साथियो,

असम में एक पक्षी पाया जाता है | उस पक्षी का नाम है ‘हरगिला’ | ‘हरगिला’ एक दुर्लभ पक्षी है | ये प्रकृति को स्वच्छ रखने में अहम भूमिका निभाता है | लेकिन असम के कुछ इलाकों में लंबे समय तक इसे अशुभ माना जाता था | लोग इसे अपने आसपास देखना पसंद नहीं करते थे | कई बार उन पेड़ों को भी काट दिया जाता था जिन पर हरगिला के घोसलें बने होते थे | सोचिए, एक ऐसा पक्षी जो पर्यावरण की सफाई में मदद करता है, वही ‘हरगिला’ लोगों के डर का शिकार बन गया था | इसी दौरान जीव-वैज्ञानिक पूर्णिमा देवी बर्मन ने ये सब देखा | उन्होंने लोगों के मन में बैठी गलत धारणा को बदलने का संकल्प लिया | उन्होंने महिलाओं से बात की, उन्होंने लोगों को विज्ञान के आधार पर समझाया, धीरे-धीरे महिलाएं इस अभियान से जुडने लगीं | फिर एक बड़ा बदलाव शुरू हुआ | जिस पक्षी को कभी अशुभ मानकर भगाया जाता था, वही गांवों की पहचान बनने लगा | हजारों ग्रामीण महिलाएं ‘हरगिला’ को बचाने के लिए आगे आईं - आज उन्हें ‘हरगिला आर्मी’ के नाम से जाना जाता है |

इन महिलाओं ने समाज के साथ संघर्ष भी किया | समाज को समझाने के लिए दिन-रात काम किया और अंधविश्वास को पीछे छोड़ करके रहे | उन्होंने दिखाया है जब सही जानकारी पहुंचाई जाती है, तो वर्षों पुरानी सोच भी बदल सकती है |

साथियो,

मैं अक्सर कहता हूँ, जो खेलता है, वो खिलता है | आज देश में ऐसे युवाओं की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है, जो खेल भी रहे हैं और खिल भी रहे हैं | पहले की तुलना में अब कहीं अधिक युवा खेलों को career के रूप में अपना रहे हैं | मुझे नागालैंड के दो ऐसे प्रयासों के बारे में जानकारी मिली है, जो बहुत दिलचस्प हैं | पहला प्रयास है ‘Nagaland Baby League’. नाम सुनकर आपको जरूर लगता होगा ये बहुत छोटे बच्चों की कोई साधारण लीग होगी, लेकिन ऐसा नहीं है | ये 5 से 10-12 साल की आयु के छोटे-छोटे बच्चे, फूल जैसे बच्चों की एक असाधारण league है और इन बच्चों के football खिलाड़ियों की एक ऐसी league है, जो उनकी रफ्तार को और प्रतिभा के लिए उनको प्रेरित भी करती है और उनकी पहचान भी बनाती है | इसकी शुरुआत नागालैंड के अधिक-से-अधिक बच्चों को football से जोड़ने के लिए हुई थी | पांच से बारह वर्ष तक के लड़के और लड़कियां इसमें हिस्सा ले सकते हैं | ये league अब अपने तीन वर्ष पूरे कर चुकी है | इस लीग का बच्चों के मन पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ा है |

साथियो,

नागालैंड में एक और अच्छा प्रयास हो रहा है | इसका नाम है, ‘Nagaland Women Futsal League’, हो सकता है आपके लिए ये ‘futsal’ एक नया नाम होगा, मैं आपको बताता हूँ Futsal को indoor football भी कहा जाता है | इसमें एक टीम में केवल पांच खिलाड़ी होते हैं | खेल का मैदान भी football के मैदान से बहुत छोटा होता है | इस कारण खिलाड़ियों को तेज फैसले लेने होते हैं | उन्हें अपनी technique और skill का बेहतर इस्तेमाल करना पड़ता है | नागालैंड की Women Futsal League हमारी बेटियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अच्छा अवसर दे रही है | मैं ऐसी पहलों के लिए नागालैंड के लोगों की सराहना करता हूं | ऐसे प्रयास देश के दूसरे हिस्सों को भी प्रेरणा देते हैं |

साथियो,

ये technology का युग है । हर दिन नई research हो रही है । नए-नए AI innovations सामने आ रहे हैं । इस दौर में एक सवाल बहुत महत्वपूर्ण है - लोगों की creativity को कैसे बचाए रखा जाए? नई technology के साथ आगे बढ़ते हुए हम अपनी जड़ों से कैसे जुड़े रहें? इन सवालों का समाधान खोजा है ‘नालंदा विश्वविद्यालय’ ने । हजारों साल पुरानी हमारी नालंदा विश्वविद्यालय अब नए अवतार के रूप में भारत का भाग्य गढ़ रही है | दो साल पहले मुझे नालंदा विश्वविद्यालय के नए परिसर के लोकार्पण का अवसर मिला था । नालंदा विश्वविद्यालय ने शास्त्रार्थ की हमारी प्राचीन परंपरा को फिर से जीवंत किया है । शास्त्रार्थ केवल अपनी बात रखने का माध्यम नहीं है । ये वाद–संवाद और मंथन की एक अनुशासित प्रक्रिया है । इसमें तर्क के साथ, तथ्य के साथ, अपनी बात कहना बहुत जरूरी होता है, और उसमें आपकी महारत होनी चाहिए | दूसरों के विचारों को धैर्य से सुनने और समझने की सीख भी इस शास्त्रार्थ की प्रक्रिया से मिलती है । मुझे खुशी है कि नालंदा विश्वविद्यालय ने इसे अपने दीक्षांत समारोह का हिस्सा बनाया । इसमें भाग लेने वाले करीब आधे students अन्य देशों से आए थे । एक प्राचीन परंपरा को आज के समय से जोड़ने का ये प्रयास बहुत सराहनीय है । मैं इसके लिए नालंदा विश्वविद्यालय को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ । मैं देश के दूसरे विश्वविद्यालयों से भी आग्रह करूंगा कि वे ऐसी पहल पर विचार करें ।


साथियो,

जड़ों से जुड़े रहकर युवाओं को नई technology के लिए तैयार करने का एक और अच्छा प्रयास हो रहा है । दिल्ली में स्थित Central Sanskrit University, Artificial Intelligence और Data Science में B.tech Programme शुरू करने जा रही है । ये आधुनिक technology को भारत के पारंपरिक ज्ञान से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है । इससे भारतीय भाषाओं के लिए नए AI tools तैयार करने में मदद मिलेगी । हमारे प्राचीन ग्रंथों और पांडुलिपियों को digital रूप में संरक्षित करने के काम को भी नई गति मिलेगी । मैं Central Sanskrit University को इस प्रयास के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूँ ।

साथियो,

आज भारतीय संस्कृति दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुँच रही है । हमारे गीत, संगीत और आध्यात्म को दुनिया-भर के लोग जान रहे हैं और अपना रहे हैं । भारत से हजारों kilometre दूर Caribbean सागर में Dominican Republic नाम का एक देश है । वहाँ भारतीयों की संख्या करीब 100 है शायद इससे भी कम होगी । इसके बावजूद भारतीय संस्कृति और आध्यात्म से जुड़ा एक बहुत अच्छा प्रयास वहाँ हो रहा है । वहाँ Spanish बोलने वाले कुछ लोगों ने एक team बनाई है । इस team का नाम है, ‘ब्रहमकमल डोमिनिकाना’ । team के सदस्य मिलकर वैदिक साहित्य का अध्ययन करते हैं । वे वैदिक मंत्रों का उच्चारण भी सीख रहे हैं । उन्हें इसकी कोई formal training नहीं मिली है । लेकिन उन्होंने audio recordings सुनकर वैदिक मंत्रों का सही उच्चारण सीखा है । आज वे कई मंत्रों का बहुत अच्छे से जाप कर लेते हैं । इनमें पुरुष सूक्तम, श्री सूक्तम, श्री रुद्रम, दुर्गा सूक्तम और देवी महात्मयम शामिल हैं । भारत से इतनी दूर रहकर हमारी परंपराओं को सीखने का उनका यह प्रयास बहुत प्रेरक है । मैं ‘ब्रहमकमल डोमिनिकाना’ वहाँ के सभी सदस्यों को उनके प्रयासों के लिए शुभकामनाएँ देता हूँ । मैं ऐसे सभी लोगों की हृदय से सराहना करता हूँ जो भारतीय संस्कृति को दुनिया भर में लोकप्रिय बनाने के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं ।

मेरे प्यारे देशवासियो,

मेघालय की पहचान बादलों से है, खूबसूरत नजारों से है | जो मेघालय जाता है, उसे वहां के लोगों का अपनापन भी लंबे समय तक याद रहता है | लेकिन, मेघालय की एक और विशेषता है, जिसकी मैं आज, ‘मन की बात’ में, आपसे चर्चा करना चाहता हूं | ये है - मेघालय के रूट ब्रिज | रास्ता वाला route नहीं, जड़ों वाला root | इन रूट ब्रिजों की कहानी बहुत रोचक है | ये ब्रिज कुछ दिनों या कुछ वर्षों में नहीं बनते | इन्हें तैयार होने में कई दशक लगते हैं | रबर के पेड़ों की जड़ों को धीरे-धीरे दिशा दी जाती है | इन जड़ों को जल-धाराओं के पार ले जाया जाता है | समय के साथ वही जड़ें एक मजबूत ब्रिज का रूप ले लेती हैं | इन ब्रिजों की एक और विशेषता है | ये जीवित ब्रिज हैं | समय बीतने के साथ ये और मजबूत हो जाते हैं | इनमें मेघालय के लोगों की सृजनशीलता दिखाई देती है | इनके पीछे वर्षों का धैर्य और प्रकृति के प्रति गहरा सम्मान है | ये ब्रिज बताते हैं कि मनुष्य प्रकृति के साथ मिलकर कितनी अद्भुत चीजें बना सकता है | ये हमारे देश की, इस धरती की, धरोहर है | अब भारत ने मेघालय के रूट ब्रिजों को UNESCO World Heritage Site Network में शामिल कराने के लिए आवेदन किया है |

साथियो,

climate change के कारण इन रूट ब्रिजों के सामने कई चुनौतियां भी आती हैं | ऐसे समय में मेघालय के लोगों ने इस प्राकृतिक धरोहर के संरक्षण की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई है | पहले ये पता लगाना भी आसान नहीं था कि ऐसे ब्रिजों की संख्या कितनी है? स्थानीय लोगों ने खुद इनकी गिनती शुरू की | इसके बाद समुदायों ने इन ब्रिजों की देख-भाल की जिम्मेदारी भी संभाली | आज स्थानीय लोग 120 से अधिक रूट ब्रिजों की देख-रेख कर रहे हैं | कुछ टीमें हर साल इन पुलों की स्थिति की जांच करती हैं | कुछ लोगों ने आस-पास के क्षेत्र को मजबूत बनाने के लिए नर्सरी भी तैयार की है | इस तरह के इनके संरक्षण के लिए एक पूरा ecosystem तैयार हो गया है | आपने देखा होगा, इस वर्ष हैली वार जी को Padma Award से सम्मानित किया गया है | उन्होंने अपने जीवन के 50 से अधिक वर्ष इन रूट ब्रिजों की देखभाल में लगाए हैं | उनका समर्पण हम सभी के लिए प्रेरणादायक है| साथियो, आपने कभी इन रूट ब्रिजों की यात्रा की हो, तो उनकी तस्वीरें social media पर जरूर साझा कीजिए | आपकी तस्वीरें दूसरे लोगों को भी मेघालय की इस अनोखी धरोहर के बारे में जानने के लिए प्रेरित करेगी |

मेरे प्यारे देशवासियो,

हम सभी चाहते हैं कि हमारा गांव साफ-सुथरा हो, हमारा शहर सुंदर दिखे | लेकिन शायद ही कभी रुककर ये सोचा जाता है कि हमारे आस-पास जो कचरा जमा होता है, कौन उसे साफ करता है? ज्यादातर लोग तो यही मानकर चलते हैं कि ये किसी और की जिम्मेदारी है, और, वो ही सफाई करेगा | लेकिन हमारे बीच कुछ ऐसे भी लोग होते हैं, जो अपनी सोच से हमें बहुत प्रेरित करते हैं | मुझे मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के ब्यावरा की कुछ बहनों के बारे में जानने का अवसर मिला | उन्होंने अपने आस-पास फैले plastic कचरे को हटाने का संकल्प लिया | ये नहीं सोचा कि कोई आकर बदलाव लाएगा | उन्होंने खुद शहर-भर से plastic कचरा और खाली बोतलें इकट्ठा करना शुरू किया | धीरे-धीरे ये प्रयास आगे बढ़ता गया और फिर उस plastic को eco-bricks में बदला जाने लगा | आज इन्हीं eco-bricks का उपयोग सार्वजनिक स्थानों को सुंदर बनाने में किया जा रहा है | राजगढ़ में पिछले कुछ महीनों में सैकड़ों किलो plastic को recycle करके उनका बेहतर उपयोग किया गया है | यानी, जो plastic पहले शहर में प्रदूषण फैलाता था, आज वही इन बहनों के प्रयास से शहर की सुंदरता बढ़ाने में योगदान दे रहा है | मैं ब्यावरा की सभी बहनों और इस अभियान से जुड़े साथियो को बधाई देता हूं |

मेरे प्यारे देशवासियो,

मुझे कई लोगों ने पत्र लिखकर एक खास विषय पर बात करने का सुझाव भेजा है | ये विषय ‘गणेश उत्सव’ से जुड़ा है | वैसे तो ‘गणेश उत्सव’ में अभी काफी समय बाकी है, लेकिन लोगों ने ये आग्रह किया है कि इस विषय पर अभी ही बात होनी चाहिए | दरअसल, गणेश जी की मूर्तियां बनाने का काम बहुत पहले शुरू हो जाता है | मूर्ति बनाने वाले, मूर्तियों के व्यापार से जुड़े लोग अभी से सक्रिय हो जाते हैं | इसलिए मेरा आप सभी से एक आग्रह है | आप प्रयास करें कि आपके घर, सोसायटी या आसपास की जगहों पर गणपति बप्पा की जो मूर्ति स्थापित हो, वो हमारे देश की मिट्टी से बनी हो, वो हमारे अपने कुम्हारों और स्थानीय कलाकारों के हाथों तैयार हुई हो | जो लोग गणेश जी की मूर्तियां बनाते हैं, उनसे भी मेरा आग्रह है कि वे मिट्टी की मूर्तियों को प्राथमिकता दें, और जो लोग मूर्तियां खरीदते हैं, वे भी यह जरूर देखें, कि, गणपति बप्पा की मूर्ति किससे बनी है और किस देश में तैयार हुई है | Plaster of Paris से बनी मूर्तियां बिल्कुल ना खरीदें | साथियो, मिट्टी की मूर्तियां पूजा के बाद सहज रूप से पानी में विलीन हो जाती हैं | इससे हमारी नदियां, तालाबों और पर्यावरण की रक्षा होती है | हमारी आस्था भी बनी रहती है और प्रकृति के प्रति हमारा दायित्व भी पूरा होता है | जब हम स्थानीय कारीगरों से मूर्ति खरीदते हैं, हम ‘Vocal for Local’ के संकल्प को मजबूत करते हैं | मुझे विश्वास है कि इस बार ‘गणेश उत्सव’ में और ऐसे हर उत्सव में हम ऐसी सारी बातों पर जरूर गंभीरता से सोचेंगे और देश-हित में कदम भी उठाएंगें |

साथियो,

हमारे देश की सबसे बड़ी शक्ति, हमारे देश के लोग हैं | देश के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे छोटे-बड़े प्रयास हमें बहुत कुछ सिखाते हैं | ये प्रयास बताते हैं कि जब मन में संकल्प हो और समाज का साथ मिले, तो कोई भी बड़ा बदलाव लाया जा सकता है | आप अपने आस-पास हो रहे ऐसे प्रयासों के बारे में मुझे जरूर लिखते रहिए | अपने विचार और अपने सुझाव भेजते रहिए, हो सकता है आपके आस-पास की कोई छोटी-सी पहल, पूरे देश के लिए प्रेरणा बन जाए | अगले महीने हम फिर मिलेंगे | देशवासियों के कुछ नए प्रयासों की चर्चा करेंगे | तब तक आप अपना और अपने परिवार का ध्यान रखिए, और हाँ! जलसंचय तो करना-ही-करना है | बारिश के पानी की एक-एक बूँद को हमें बचाना है | ‘Catch the Rain’ ये अभियान जरा भी ढ़ीला नहीं होने देना है | तो मेरा खास आग्रह है, वर्षा का बूँद-बूँद पानी, हम मिल करके बचायें | बहुत-बहुत धन्यवाद | नमस्कार |