PM's speech at 50th anniversary of the establishment of Delhi High Court

Published By : Admin | October 31, 2016 | 17:11 IST
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The contributions of Sardar Patel, in the creation of the All India Civil Services is immense: PM
Complement the legal fraternity for giving strength to Alternative Dispute Resolution mechanisms: PM Modi
Challenges come, but we have to prepare roadmap so that toughest situations can be overcome: PM
While drafting laws, we must imbibe best of the talent inputs. This will be the biggest service to judiciary: PM

भारत के मुख्य न्यायाधीश justice टी.एस ठाकुर जी, केन्द्र में मंत्री परिषद के मेरे साथी श्रीमान रविशंकर प्रसाद जी, दिल्ली के उपराज्यपाल श्रीमान नजीब जंग जी, दिल्ली के मुख्यमंत्री श्रीमान अरविंद जी, दिल्ली उच्च न्यायालय की मुख्य न्‍यायाधीश जी रोहिणी जी, दिल्ली उच्च न्यायालय के न्‍यायाधीश justice बदर दुर्रेज अहमद जी।

उपस्थित सभी सुप्रीम कोर्ट के वरिष्‍ठ महानुभाव, दिल्ली हाईकोर्ट के सभी वरिष्‍ठ महानुभाव, वरिष्‍ठ गण। मुझे कभी कोर्ट में जाने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है। लेकिन मैंने सुना है कि वहां बड़ा गंभीर वातावरण होता है। और शायद उसका प्रभाव यहां भी नजर आ रहा है। पचास साल का उत्सव मना रहे हैं । कुछ तो मुस्कराइये। डायस पर तो गंभीरता मैं समझ सकता हूं ताकि कोई ग़लत Perception ना बन जाए। लेकिन यहां तो I don’t think की कोई problem है।

पचास साल की यात्रा इस कार्य को सब के सहयोग से ये जो मुकाम प्राप्त हुआ है। चाहे बाहर के मित्र हों, चाहे किसी जमाने में जब कम्प्यूटर नहीं था तो बाहर बैठकर टाइपिंग करता होगा पैड़ के नीचे, या कोई डायस पर बैठकर के न्याय तोलता होगा। या हो सकता है कि किसी परिसर में लोगों को चाय भी पहुंचाने वाला कोई व्यक्ति होगा। हर किसी का इसमें योगदान है। अपने – अपने तरीके से Contribution है। आज जब पचास साल मना रहे हैं तब हर किसी के Contribution को हम सहर्ष स्वीकार करें। उनके प्रति अपने कृतज्ञता का भाव अभिव्यक्त करें। और हर किसीने अपने – अपने तरीके से इस व्यवस्थाओं में कुछ न कुछ value addition किया होगा। हरेक का कोई न कोई सकारात्मक योगदान रहा होगा। और यही सकारात्मक Contribution का पुट Institution की प्रतिष्ठा को बढ़ाता है। Institution की अहमियत को बढ़ाता है। और दिनों दिन Institution की आवश्यकता अधिक महसूस होती है। मुझे विश्वास है कि भारत के संविधान के प्रकाश में देश के सामान्य नागरिकों की आशा, आकांक्षाएं उसको पूर्ण करने में जिस किसी के पास जो जिम्मेवारी है। उसको पूरा करने का भरसक प्रयास करना चाहिए। हर किसीने करना चाहिए।

आज 31 अक्तूबर दिल्ली हाईकोर्ट को पचास साल, आज 31 अक्तूबर भारत की एकता के लिए जीवन खपाने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल की जन्म जयंती भी है। महात्मा गांधी के अनन्य सहयोगी के नाते जन सामान्य को अधिकार के लिए आंदोलित करना एक बैरिस्टर के नाते जिन्दगी गुजार सकते थे। वो भी शायद इस परिवेश में उत्तम से उत्तम कैरियर बना सकते थे। लेकिन देश की आवश्यकता के लिए बैरिस्टर के नाते जिन्दगी गुजारने की बजाय देश के लिए अपना सब कुछ आहुत करने के लिए निकल पड़े। सरदार साहब की एक बहुत बड़ी सेवा जो आज भी देश याद करता है। ये आजाद हिन्दुस्तान की शासकीय व्यवस्था को भारतीयता का रूप देना। ऑल इंडिया सिविल सर्विस जैसी व्यवस्थाओं को विकसित करना। एक बहुत बड़ा उनका Contribution मैं मान सकता हूं। देश की एकता का प्रोफाईल था और हम देख रहे हैं कि भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में ऑल इंडिया सिविल सर्विस की इस व्यवस्था के कारण किसी न किसी मात्रा में एक तंतु जुड़ा रहता है। एक सेतु बना रहता है। और जिले में बैठा हुआ अफसर भी, उसकी ट्रेनिंग ऐसी हुई है कि वो राष्ट्रीय परिवश में चीजों को तोलता है, सोचता है और निर्णय प्रिक्रिया में अपनी भूमिका अदा करता है। ऑल इंडिया सिविल सर्विस के सपनों को अलग-अलग रुपों में देखा गया धीरे-धीरे कई वर्ग होते गए की व्यवस्थाएं खड़ी हुई। एक चर्चा का विषय रहा। ऑल इंडिया judicial सर्विस का विवादों में रहा है। लेकिन लोकतंत्र का ये मूलभूत पिंड है। वाद, विवाद और संवाद। चर्चा होनी चाहिए, बहस होनी चाहिए। सरदार साहब ने जिस व्यवस्था को खड़ा किया था। जिसको आगे कई लोगों ने बढ़ाया था। यहां ऐसे-ऐसे लोग बैठे हैं हो सकता है ऐसे मंथन हो। लेकिन हम लोग इसमें कोई ज्यादा Contribute नहीं कर सकते और न ही हम करेंगे तो लाभ होगा। लेकिन यहां जो लोग बैठे हैं वो काफी कुछ Contribute कर सकते हैं। इस देश का दलित, पीड़ित, शोषित, वंचित, गरीब, उपेक्षित समाज के एकदम नीचे के तबके से आने वाला व्यक्ति क्या उसको भी इस व्यवस्था में आने का अवसर मिल सकता है क्या। क्या ऐसी कोई नई व्यवस्था बन सकती है। क्योंकि अब पहले के जमाने में न्याय के क्षेत्र की सीमा एक दायरा इतना विस्तृत हो चुका है, इतना ग्लोबल हो चुका है। शायद पिछले तीस साल पहले किसी ने सोचा भी नहीं होगा। आज उसका दायरा बहुत बड़ा है न जाने कैसी-कैसी समस्याएं अदालत के सामने खड़ी हो जाती हैं कि अदालत के लिए भी सवाल खड़ा हो जाएगा अरे भई ये कहां से विषय आया है क्या बैक्ग्राउंड है इसका। क्या पहलू है इसका। जिस प्रकार से टेक्नॉलॉजी ने दुनिया में अपनी जगह बनाई है। तो चुनौतियां बहुत बड़ी हैं। लेकिन चुनौतियों से भागना इंसान का स्‍वभाव नहीं होता है। चुनौतियों से रास्ते खोजना, Capability बढ़ाना अगर टेक्नॉलॉजी की आवश्यकता है तो उसको जोड़ना। आज जब हम पचास साल इस व्यवस्था के मना रहे हैं तब अब पचास साल के अनुभव के आधार पर हम आने वाले अपना रोड मैप कोई बना सकते हैं क्या। और मिलकर के बनाना पड़ेगा। कोई एक जगह से ये चीजें हो नहीं सकती। लेकिन इस देश के पास सामर्थ्‍य है, बन सकता है। ऐसा नहीं है कि नहीं बन सकता। रास्ते खोजे जा सकते हैं। और खोजने का अविरल प्रयास भी चलते रहना चाहिए। किसी भी चीज के दरवाजे बंद नहीं किये जा सकते। और तभी जाकर के बदलाव संभव होता है।



ये बात सही है कि अदालतों में जो लोग बैठे हैं। उन्हीं के प्रयासों से और उन्हीं के Contribution से Alternate Mechanism को जो बल मिला है। गरीब लोग वहां चले जाते हैं। उनको संतोष होता है। चलो भई मुझे न्याय मिल गया। बेचारी दिल्ली हाईकोर्ट का रिपोर्ट हमने देखा हिन्दुस्तान में सब जगह पे और मैंने देखा उसमें बाहर का भी Contribution है। Judiciary में बैठे हुए लोगों का भी Contribution है। और वो अपने काम का सिवाए का समय अपने व्यक्तिगत समय से निकाल कर के इस काम को कर रहे हैं। और उसके कारण गरीब इंसान को भी बहुत लाभ हो रहा है। एक Awareness भी आएगी। लेकिन Awareness को हमें और अधिक बढ़ाना पड़ेगा। सामान्य मानवीय को शिक्षित करना होगा। जितना ज्यादा शिक्षित कर पाएंगे। उतना लाभ होगा। ज्यादातर Judiciary का अधिकतम समय हम लोगों के बीच ही जाता है। मतलब कि मोदी नहीं, सरकार सबसे बड़ा litigant सरकार होती है। हर मसले पर सरकार भिड़ती रहती है। मैं कभी हमारे सरकार के लोगों को कहता हूं भाई। एक टीचर अपने हक के लिये गया कोर्ट में उसको न्याय मिला वो जीत गया। उसी प्रकार के दस हजार टीचर के मसले लटके पड़े हैं। उसको आधार बनाकर दस हजार को पूरा करो न। आप Judiciary का बोझ क्यों बढ़ा रहे हो। लेकिन पता नहीं उनके दिमाग में पड़ नहीं रहा है। उनको लगता है नहीं साहब वो Individual मसला था और कानून के दायरे में Individual मसले को हम किसी को फीट नहीं कर सकते। पता नहीं मैं इन सारी बारीकियों को नहीं जानता हूं लेकिन मैं समझा रहा हूं कि भाई हम इस बोझ को कम कैसे करें। दूसरा मैंने देखा है, शायद आज से पच्चीस तीस साल पहले राजनीति इतनी media driven नहीं थी। और उसके कारण संसद में जो बहस होती थी खासकर के विधि निर्माण की वे बहुत एक संविधान के प्रकाश में और भविष्य के लिए उपकारक और जन सामान्य की सुविधाजनक ऐसी कुछ व्यवस्थाएं विकसित करने की दिशा में कानून की चर्चा का दायरा रहता था । आज हम जब सदन में चर्चा करते हैं तो उसका रूप एक होता है। कौन सरकार लाई है। उसके आधार पर तय होगा कि सामने वाला क्या कहेगा। अगर हम वहां बैठे तो हम वो बोलेंगे। हम यहां बैठे तो वो दूसरा बोलेंगे। ये हाल है हमारा। standing committee में मसला जाता है तो वो मीडिया में रिपोर्ट नहीं होता है। वहां सब मिलकर के तय करते हैं कि देखो भाई कैसे करेंगे। समय की मांग है कि विधि निर्माताओं कानून बनाने में इतनी बारीकियों में जाके talent input हो उसमें। और जितने अच्छे कानून हम बना पाएंगे। इतना शायद हम न्याय की क्षेत्र की सबसे बड़ी सेवा कर पाएंगे। और जिम्मा इलैक्ट्रेड गवर्मेंट्स का है। हम लोगों का। मैंने देखा है कि इन दिनों National Law Universities में जो होनहार बच्चे पढ़ने के लिए आ रहे हैं। पहले में तो रूटीन कॉलेज में पढ़ते थे और फिर बाद में Law करने जाते थे। इन दिनों इसको एक Profession के रूप में स्वीकार करते हैं। ये देखा जा रहा है कि बहुत ही talented youth आज इन Universities से निकल रहे हैं । उसमें जितना drafting capacity का दायरा हम बनाएंगे। और ड्राफ्टिंग के लेवल पर ही हमें अगर अच्छा इन्पुट मिलेगा। और हम अच्छे कानून बना पाएंगे। कानून में बदलाव लाना है तो भी उस दायरे में वो आएगा। तो discrimination का या interpretation का स्कॉप नैरो होता जाएगा। जीरो करना तो मुश्किल है लेकिन narrow होता जाएगा। और जब इन्टरप्रियशन और डिस्क्रिमिनेशन का दायरा नैरो हो जाता है। तब अपने आप ब्लैक एन व्हाइट पढ़कर के वो तय कर सकता है कि हां ये मेरे हक का है, ये मिलकर रहेगा। दुविधा नहीं होगी। लेकिन ये कमी आज भी महसूस होता है। इसको पूरा करना होगा। हम सबको मिलकर करना होगा। अगर इसको हम कर पाएंगे तो देश की सेवा ज्यादा अच्छे से कर पाएंगे। मैं इस गोल्डन जुबली अवसर पर दिल्ली बार के उन सभी महानुभावों का अभिनन्दन करता हूं। जिन्होंने इसमें Contribute किया है। अनेक judges हैं इनकी सेवाएं इस कोर्ट को मिली होंगी। उनको भी अभिनन्दन करता हूं। और भारत की न्याय व्यवस्था सदियों से इसका एक श्रद्धा का स्थान रहा। हजारों साल से हम सुनते आए हैं शास्त्रों में पढ़ते आए हैं। एक श्रद्धा की जगह है। उस श्रद्धा रूप स्थान को चोट न पहुंचे। उसका गौरव बढ़ता रहे। उसका सामर्थ्‍य बढ़ता रहे। उसके लिए जो जहां भी है सबने अपनी-अपनी जिम्मेवारियां निभाई होगी। सरकार में बैठे हुए लोगों ने विशेष निभानी होगी। और मुझे विश्वास है कि ये दिन हम करते रहेंगे। परिणाम लाते रहेंगे। बहुत – बहुत धन्यवाद।

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Text of PM’s unveils the hologram statue of Netaji at India Gate
January 23, 2022
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Also confers Subhas Chandra Bose Aapda Prabandhan Puraskars
Gujarat was the first state to enact disaster related law in 2003
“In disaster management, emphasis is on Reform along with stress on Relief, Rescue and Rehabilitation”
“Disaster management is no longer just a government job but it has become a model of 'Sabka Prayas'”
“We have a goal to fulfil the dreams of independent India. We have the goal of building a new India before the hundredth year of independence”
“It is unfortunate that after Independence, along with the culture and traditions of the country, the contribution of many great personalities was also tried to be erased”
“The freedom struggle involved ‘tapasya’ of lakhs of countrymen, but attempts were made to confine their history as well. But today the country is boldly correcting those mistakes”
“We have to move ahead taking inspiration from Netaji Subhash's 'Can Do, Will Do' spirit”

इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में उपस्थित मंत्रीपरिषद के मेरे साथी श्री अमित शाह, श्री हरदीप पूरी जी, मंत्रिमंडल के अन्य सदस्य, INA के सभी ट्रस्टी, NDMA के सभी सदस्यगण, jury मेम्बर्स, NDRF, कोस्ट गॉर्ड्स और IMD के डाइरेक्टर जनरल्स, आपदा प्रबंधन पुरस्कारों के सभी विजेता साथी, अन्य सभी महानुभाव, भाइयों एवं बहनों!

भारत मां के वीर सपूत, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जन्मजयंती पर पूरे देश की तरफ से मैं आज कोटि-कोटि नमन करता हूं। ये दिन ऐतिहासिक है, ये कालखंड भी ऐतिहासिक है और ये स्थान, जहां हम सभी एकत्रित हैं, वो भी ऐतिहासिक है। भारत के लोकतंत्र की प्रतीक हमारी संसद पास में है, हमारी क्रियाशीलता और लोकनिष्ठा के प्रतीक अनेक भवन भी हमारे साथ पास में नजर आ रहे हैं, हमारे वीर शहीदों को समर्पित नेशनल वॉर मेमोरियल भी पास है। इन सबके आलोक में आज हम इंडिया गेट पर अमृत महोत्सव मना रहे हैं और नेताजी सुभाषचंद्र बोस को आदरपूर्वक श्रद्धांजलि दे रहे हैं। नेताजी सुभाष, जिन्होंने हमें स्वाधीन और संप्रभु भारत का विश्वास दिलाया था, जिन्होंने बड़े गर्व के साथ, बड़े आत्मविश्वास के साथ, बड़े साहस के साथ अंग्रेजी सत्ता के सामने कहा था- “मैं स्वतंत्रता की भीख नहीं लूंगा, मैं इसे हासिल करूंगा"। जिन्होंने भारत की धरती पर पहली आज़ाद सरकार को स्थापित किया था, हमारे उन नेताजी की भव्य प्रतिमा आज डिजिटल स्वरूप में इंडिया गेट के समीप स्थापित हो रही है। जल्द ही इस होलोग्राम प्रतिमा के स्थान पर ग्रेनाइट की विशाल प्रतिमा भी लगेगी। ये प्रतिमा आज़ादी के महानायक को कृतज्ञ राष्ट्र की श्रद्धांजलि है। नेताजी सुभाष की ये प्रतिमा हमारी लोकतान्त्रिक संस्थाओं को, हमारी पीढ़ियों को राष्ट्रीय कर्तव्य का बोध कराएगी, आने वाली पीढ़ियों को, वर्तमान पीढ़ी को निरंतर प्रेरणा देती रहेगी।

साथियों,

पिछले साल से देश ने नेताजी की जयंती को पराक्रम दिवस के रूप में मनाना शुरू किया है। आज पराक्रम दिवस के अवसर पर सुभाषचंद्र बोस आपदा प्रबंधन पुरस्कार भी दिए गए हैं। नेताजी के जीवन से प्रेरणा लेकर ही इन पुरस्कारों को देने की घोषणा की गई थी। साल 2019 से 2022 तक, उस समय के सभी विजेताओं, सभी व्यक्तियों, सभी संस्थाओं को जिने आज सम्मान का अवसर मिला है। उन सबको भी मैं बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

साथियों,

हमारे देश में आपदा प्रबंधन को लेकर जिस तरह का रवैया रहा था, उस पर एक कहावत बहुत सटीक बैठती है- जब प्यास लगी तो कुआं खोदना। और जिस मैं काशी क्षेत्र से आता हूं वहां तो एक और भी कहावत है। वो कहते हैं - भोज घड़ी कोहड़ा रोपे। यानि जब भोज का समय आ गया तो कोहड़े की सब्जी उगाने लगना। यानि जब आपदा सिर पर आ जाती थी तो उससे बचने के उपाय खोजे जाते थे। इतना ही नहीं, एक और हैरान करने वाली व्यवस्था थी जिसके बारे में कम ही लोगों को पता है। हमारे देश में वर्षों तक आपदा का विषय एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट के पास रहा था। इसका मूल कारण ये था कि बाढ़, अतिवृष्टि, ओले गिरना, ऐसी जो स्थितियों पैदा होती थी। उससे निपटने का जिम्मा, उसका संबंध कृषि मंत्रालय से आता था। देश में आपदा प्रबंधन ऐसे ही चलता रहता था। लेकिन 2001 में गुजरात में भूकंप आने के बाद जो कुछ हुआ, देश को नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर किया। अब उसने आपदा प्रबंधन के मायने बदल दिए। हमने तमाम विभागों और मंत्रालयों को राहत और बचाव के काम में झोंक दिया। उस समय के जो अनुभव थे, उनसे सीखते हुए ही 2003 में Gujarat State Disaster Management Act बनाया गया। आपदा से निपटने के लिए गुजरात इस तरह का कानून बनाने वाला देश का पहला राज्य बना। बाद में केंद्र सरकार ने, गुजरात के कानून से सबक लेते हुए, 2005 में पूरे देश के लिए ऐसा ही Disaster Management Act बनाया। इस कानून के बाद ही National Disaster Management Authority उसके गठन का रास्ता साफ हुआ। इसी कानून ने कोरोना के खिलाफ लड़ाई में भी देश की बहुत मदद की।

साथियों,

डिजास्टर मैनैजमेंट को प्रभावी बनाने के लिए 2014 के बाद से हमारी सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर चौतरफा काम किया है। हमने Relief, Rescue, Rehabilitation उस पर जोर देने के साथ-साथ ही Reform पर भी बल दिया है। हमने NDRF को मजबूत किया, उसका आधुनिकीकरण किया, देश भर में उसका विस्तार किया। स्पेस टेक्नालजी से लेकर प्लानिंग और मैनेजमेंट तक, best possible practices को अपनाया। हमारे NDRF के साथी, सभी राज्यों के SDRFs, और सुरक्षा बलों के जवान अपनी जान की बाजी लगाकर, एक-एक जीवन को बचाते हैं। इसलिए, आज ये पल इस प्रकार से जान की बाजी लगाने वाले, औरों की जिंदगी बचाने के लिए खुद की जिंदगी का दांव लगाने वाले चाहे वो NDRF के लोग हों, चाहे SDRF के लोग हों, हमारे सुरक्षाबलों के साथी हों, ये सब के सब उनके प्रति आज आभार व्यक्त करने का, उनको salute करने का ये वक्त है।

साथियों,

अगर हम अपनी व्यवस्थाओं को मजबूत करते चलें, तो आपदा से निपटने की क्षमता दिनों-दिन बढ़ती चली जाती है। मैं इसी कोरोना काल के एक-दो वर्षों की बात करूं तो इस महामारी के बीच भी देश के सामने नई आपदाएँ आकर खड़ी हो गईं। एक तरफ कोरोना से तो लड़ाई लड़ ही रहे थे। अनेक जगहों पर भूकंप आए, कितने ही क्षेत्रों में बाढ़ आई। ओड़िशा, पश्चिम बंगाल समेत पूर्वी तटों पर cyclones आए, गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात, पश्चिमी तटों पर cyclones आए, पहले, एक-एक साइक्लोन में सैकड़ों लोगों की मृत्यु हो जाती थी, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। देश ने हर चुनौती का जवाब एक नई ताकत से दिया। इसी वजह से इन आपदाओं में हम ज्यादा से ज्यादा जीवन बचाने में सफल रहे। आज बड़ी-बड़ी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां, भारत के इस सामर्थ्य, भारत में आए इस बदलाव की सराहना कर रही हैं। आज देश में एक ऐसा end-to-end cyclone response system है जिसमें केंद्र, राज्य, स्थानीय प्रशासन और सभी एजेंसियां एक साथ मिलकर के काम करती हैं। बाढ़, सूखा, cyclone, इन सभी आपदाओं के लिए वार्निंग सिस्टम में सुधार किया गया है। Disaster risk analysis के लिए एडवांस्ड टूल्स बनाए गए हैं, राज्यों की मदद से अलग अलग क्षेत्रों के लिए Disaster risk maps बनाए गए हैं। इसका लाभ सभी राज्यों को, सभी स्टेक होल्डर्स को मिल रहा है। और सबसे महत्वपूर्ण, डिजास्टर मैनेजमेंट - आपदा प्रबंधन, आज देश में जनभागीदारी और जन-विश्वास का विषय बन गया है। मुझे बताया गया है कि NDMA की ‘आपदा मित्र’ जैसी स्कीम्स से युवा आगे आ रहे हैं। आपदा मित्र के रूप में जिम्मेवारियां उठा रहे हैं। यानी जन भागीदारी बढ़ रही है। कहीं कोई आपदा आती है तो लोग विक्टिम्स नहीं रहते, वो वॉलंटियर्स बनकर आपदा का मुकाबला करते हैं। यानी, आपदा प्रबंधन अब एक सरकारी काम भर नहीं है, बल्कि ये ‘सबका प्रयास’ का एक मॉडल बन गया है।

और साथियों,

जब मैं सबका प्रयास की बात करता हूँ, तो इसमें हर क्षेत्र में हो रहा प्रयास, एक holistic approach भी शामिल है। आपदा प्रबंधन को प्राथमिकता देते हुए, हमने अपने एजुकेशन सिस्टम में भी कई सारे बदलाव किए हैं। जो सिविल इंजीनियरिंग के कोर्सेस होते हैं, आर्किटेक्चर से जुड़े कोर्सेस होते हैं, उसके पाठ्यक्रम में डिजास्टर मैनेजमेंट से जोड़ा, इन्फ्रासट्रक्चर की रचना कैसी हो उसपर विषयों को जोड़ना, ये सारे काम प्रयासरत हैं। सरकार ने Dam Failure की स्थिति से निपटने के लिए, डैम सेफ्टी कानून भी बनाया है।

साथियों,

दुनिया में जब भी कोई आपदा आती है तो उसमें लोगों की दुखद मृत्यु की चर्चा होती है, कि इतने लोगों की मृत्यु हो गई, इतना ये हो गया, इतने लोगों को हटाया गया, आर्थिक नुकसान भी बहुत होता है। उसकी भी चर्चा की जाती है। लेकिन आपदा में जो इंफ्रास्ट्रक्चर का नुकसान होता है, वो कल्पना से परे होता है। इसलिए ये बहुत आवश्यक है कि आज के समय में इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण ऐसा हो जो आपदा में भी टिक सके, उसका सामना कर सके। भारत आज इस दिशा में भी तेजी से काम कर रहा है। जिन क्षेत्रों में भूकंप, बाढ़ या साइक्लोन का खतरा ज्यादा रहता है, वहां पर पीएम आवास योजना के तहत बन रहे घरों में भी इसका ध्यान रखा जाता है। उत्तराखंड में जो चार धाम महा-परियोजना का काम चल रहा है, उसमें भी आपदा प्रबंधन का ध्यान रखा गया है। उत्तर प्रदेश में जो नए एक्सप्रेसवे बन रहे हैं, उनमें भी आपदा प्रबंधन से जुड़ी बारीकियों को प्राथमिकता दी गई है। आपात स्थिति में ये एक्सप्रेसवे, विमान उतारने के काम आ सकें, इसका भी प्रावधान किया गया है। यही नए भारत का विज़न है, नए भारत के सोचने का तरीका है।

साथियों,

Disaster Resilient Infrastructure की इसी सोच के साथ भारत ने दुनिया को भी एक बहुत बड़ी संस्था का विचार दिया है, उपहार दिया है। ये संस्था है- CDRI - Coalition for Disaster Resilient Infrastructure. भारत की इस पहल में ब्रिटेन हमारा प्रमुख साथी बना है और आज दुनिया के 35 देश इससे जुड़ चुके हैं। दुनिया के अलग-अलग देशों के बीच में, सेनाओं के बीच में हमने Joint Military Exercise बहुत देखी है। पुरानी परंपरा है उसकी चर्चा भी होती है। लेकिन भारत ने पहली बार डिजास्टर मैनेजमेंट के लिए Joint ड्रिल की परंपरा शुरू की है। कई देशों में मुश्किल समय में हमारी डिजास्टर मैनेजमेंट से जुड़ी एजेंसियों ने अपनी सेवाएँ दी हैं, मानवता के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह किया है। जब नेपाल में भूकंप आया, इतनी बड़ी तबाही मची, तो भारत एक मित्र देश के रूप में उस दुख को बाटने के लिए जरा भी देरी नहीं की थी। हमारे NDRF के जवान वहां तुरंत पहुंच गए थे। डिजास्टर मैनेजमेंट का भारत का अनुभव सिर्फ हमारे लिए नहीं बल्कि पुरी मानवता के लिए आप सभी को याद होगा 2017 में भारत ने साउथ एशिया जियो-स्टेशनरी communication satellite को लान्च किया। weather और communication के क्षेत्र में उसका लाभ हमारे दक्षिण एशिया के मित्र देश को मिल रहा है।

साथियों,

परिस्थितियां कैसी भी हों, अगर हममे हौंसला है तो हम आपदा को भी अवसर में बदल सकते हैं। यही संदेश नेताजी ने हमे आजादी की लड़ाई के दौरान दिया था। नेताजी कहते थे कभी भी स्वतंत्र भारत के सपने का विश्वास मत खोना। दुनिया की कोई ताकत नहीं है जो भारत को झकझोर सके"। आज हमारे सामने आज़ाद भारत के सपनों को पूरा करने का लक्ष्य है। हमारे सामने आज़ादी के सौंवे साल से पहले, 2047 के पहले नए भारत के निर्माण का लक्ष्य है। और नेताजी को देश पर जो विश्वास था, जो भाव नेताजी के दिल में उभरते थे। और उनके ही इन भावों के कारण मैं कह सकता हूँ कि, दुनिया की कोई ताकत नहीं है जो भारत को इस लक्ष्य तक पहुंचने से रोक सके। हमारी सफलताएँ हमारी संकल्पशक्ति का सबूत हैं। लेकिन, ये यात्रा अभी लंबी है। हमें अभी कई शिखर और पार करने हैं। इसके लिए जरूरी है, हमें देश के इतिहास का, हजारों सालों की यात्रा में इसे आकार देने वाले तप, त्याग और बलिदानों का बोध रहे।

भाइयों और बहनों,

आज़ादी के अमृत महोत्सव का संकल्प है कि भारत अपनी पहचान और प्रेरणाओं को पुनर्जीवित करेगा। ये दुर्भाग्य रहा कि आजादी के बाद देश की संस्कृति और संस्कारों के साथ ही अनेक महान व्यक्तित्वों के योगदान को मिटाने का काम किया गया। स्वाधीनता संग्राम में लाखों-लाख देशवासियों की तपस्या शामिल थी लेकिन उनके इतिहास को भी सीमित करने की कोशिशें हुईं। लेकिन आज आजादी के दशकों बाद देश उन गलतियों को डंके की चोट पर सुधार रहा है, ठीक कर रहा है। आप देखिए, बाबा साहब आंबेडकर से जुड़े पंचतीर्थों को देश उनकी गरिमा के अनुरूप विकसित कर रहा है। स्टेचू ऑफ यूनिटी आज पूरी दुनिया में सरदार वल्लभ भाई पटेल के यशगान की तीर्थ बन गई है। भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत भी हम सबने कर दी है। आदिवासी समाज के योगदान और इतिहास को सामने लाने के लिए अलग-अलग राज्यों में आदिवासी म्यूज़ियम्स बनाए जा रहे हैं। और नेताजी सुभाषचंद्र बोस के जीवन से जुड़ी हर विरासत को भी देश पूरे गौरव से संजो रहा है। नेताजी द्वारा अंडमान में तिरंगा लहराने की 75वीं वर्षगांठ पर अंडमान के एक द्वीप का नाम उनके नाम पर रखा गया है। अभी दिसम्बर में ही, अंडमान में एक विशेष ‘संकल्प स्मारक’ नेताजी सुभाष चंद्र बोस के लिए समर्पित की गई है। ये स्मारक नेताजी के साथ साथ इंडियन नेशनल आर्मी के उन जवानों के लिए भी एक श्रद्धांजलि है, जिन्होंने आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। ये मेरा सौभाग्य है कि पिछले वर्ष, आज के ही दिन मुझे कोलकाता में नेताजी के पैतृक आवास भी जाने का अवसर मिला था। जिस प्रकार से वो कोलकाता से निकले थे, जिस कमरे में बैठकर वो पढ़ते थे, उनके घर की सीढ़ियां, उनके घर की दीवारें, उनके दर्शन करना, वो अनुभव, शब्दों से परे है।

साथियों,

मैं 21 अक्टूबर 2018 का वो दिन भी नहीं भूल सकता जब आजाद हिंद सरकार के 75 वर्ष हुए थे। लाल किले में हुए विशेष समारोह में मैंने आजाद हिंद फौज की कैप पहनकर तिरंगा फहराया था। वो पल अद्भुत है, वो पल अविस्मरणीय है। मुझे खुशी है कि लाल किले में ही आजाद हिंद फौज से जुड़े एक स्मारक पर भी काम किया जा रहा है। 2019 में, 26 जनवरी की परेड में आजाद हिंद फौज के पूर्व सैनिकों को देखकर मन जितना प्रफुल्लित हुआ, वो भी मेरी अनमोल स्मृति है। और इसे भी मैं अपना सौभाग्य मानता हूं कि हमारी सरकार को नेताजी से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करने का अवसर मिला।

साथियों,

नेताजी सुभाष कुछ ठान लेते थे तो फिर उन्हें कोई ताकत रोक नहीं सकती थी। हमें नेताजी सुभाष की ‘Can Do, Will Do’ स्पिरिट से प्रेरणा लेते हुए आगे बढ़ना है। वो ये जानते थे तभी ये बात हमेशा कहते थे भारत में राष्ट्रवाद ने ऐसी सृजनात्मक शक्ति का संचार किया है जो सदियों से लोगों के अंदर सोई पड़ी थी। हमें राष्ट्रवाद भी जिंदा रखना है। हमें सृजन भी करना है। और राष्ट्र चेतना को जागृत भी रखना है। मुझे विश्वास है कि, हम मिलकर, भारत को नेताजी सुभाष के सपनों का भारत बनाने में सफल होंगे। आप सभी को एक बार फिर पराक्रम दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें देता हूं और मैं आज एनडीआरएफ, एसडीआरएफ के लोगों को भी विशेष रूप से बधाई देता हूं। क्योंकि बहुत छोटे कालखंड में उन्होंने अपनी पहचान बना दी है। आज कहीं पर भी आपदा हो या आपदा के संबंधित संभावनाओं की खबरें हों, साईक्लोन जैसी। और जब एनडीआरएफ के जवान यूनिफार्म में दिखते हैं। सामान्य मानवीय को एक भरोसा हो जाता है। कि अब मदद पहुंच गई। इतने कम समय में किसी संस्था और इसकी यूनिफार्म की पहचान बनना, यानि जैसे हमारे देश में कोई तकलीफ हो और सेना के जवान आ जाएं तो सामान्य मानवीय को संतोष हो जाता है, भई बस अब ये लोग आ गये। वैसा ही आज एनडीआरएफ और एसडीआरएफ के जवानों ने अपने पराक्रम से ये करके दिखाया है। मै पराक्रम दिवस पर नेताजी का स्मरण करते हुए, मैं एनडीआरएफ के जवानों को, एसडीआरएफ के जवानों को, उन्होंने जिस काम को जिस करुणा और संवेदनशीलता के साथ उठाया है। बहुत – बहुत बधाई देता हूं। उनका अभिनंदन करता हूं। मैं जानता हूं इस आपदा प्रबंधन के काम में, इस क्षेत्र में काम करने वाले कईयों ने अपने जीवन भी बलिदान दिए हैं। मैं आज ऐसे जवानों को भी श्रद्धांजलि देता हूं जिन्होंने किसी की जिंदगी बचाने के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी थी। ऐसे सबको में आदरपूवर्क नमन करते हुए मैं आप सबको भी आज पराक्रम दिवस की अनेक – अनेक शुभकामनाएं देते हुए मेरी वाणी को विराम देता हूं। बहुत बहुत धन्यवाद !