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The BJP relies on its cadre of hard-working, dedicated Karyakartas to reach out to the people: PM Modi in Varanasi
We all have seen in these elections how in states like Bengal and Kerala, several BJP Karyakartas have even sacrificed their lives for the cause they believe in: PM Modi
Such a large support from across the country was made possible because the people had faith in the ‘Saaf Niyat, Sahi Vikas’ approach of the BJP government: Prime Minister Modi

हर-हर महादेव, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, जिनके नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी के करोड़ों कार्यकर्ताओं ने जी-जान से इस चुनाव अभियान को चलाया, वैसे भाई श्री अमित भाई शाह, यहां के लोकप्रिय मुख्यमंत्री योगी जी, प्रदेश के अध्यक्ष महेंद्रनाथ जी और काशी के सभी श्रेष्ठ बंधुजन।

मैं भी भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्ता होने के नाते पार्टी और कार्यकर्ता जो आदेश करते हैं उसका पालन करने का मैं भरसक प्रयास करता हूं। एका मास पूर्व जब 25 तारीख को मैं यहां था, जिस आन, बान, शान के साथ काशी ने एक विश्व रूप दिखाया था और वो सिर्फ काशी को प्रभावित करने वाला नहीं था, सिर्फ उत्तर प्रदेश को प्रभावित करने वाला नहीं था, उसने पूरे हिंदुस्तान को प्रभावित किया था। हिंदुस्तान का कोई कोना ऐसा नहीं होगा, जो काशी की गलियों में, काशी के मार्ग पर काशी का मिजाज जिस प्रकार से प्रगट हो रहा था, उसे जब देश के हर कोने में जब मतदाता देख रहा था।

कुछ कार्यकर्ताओं के हाथ में जो कागज हैं उन्हें कलेक्ट कर लीजिए, मुझे पहुंचा दीजिएगा। आपको संतोष हो गया? कार्यकर्ता का संतोष, यही हमारा जीवन मंत्र है।

और जब 25 की शाम को और 26 में यहां के प्रबुद्धजनों से कार्यकर्ताओं से मुझे बात-चीत करने का अवसर मिला था और आप सब ने मुझे आदेश दिया था की एक महीने तक आप काशी में प्रवेश नहीं कर सकते हैं। देश ने भले मुझे प्रधानमंत्री बनाया हो लेकिन आपके लिए मैं कार्यकर्ता हूं और मेरे लिए आपका आदेश सर-आंखों पर रहा। 18-19 को जब प्रचार अभियान समाप्त हो चुका था, 19 को मतदान होना था। मेरे मन में भी था की चलो भले कोई काम नहीं है लेकिन चले जाएं काशी। लेकिन फिर याद आता था, आपने आदेश दिया है एन्ट्री नहीं देंगे तो क्या होगा तो मैंने सोचा चलो ये बाबा नहीं तो कोई और बाबा। शायद ही कोई उम्मीदवार चुनाव में और चुनाव के नतीजों के समय में इतना निश्चिंत होता है जितना की मैं था। और इस निश्चिंतता का कारण मोदी नहीं था, निश्चिंतता का कारण आप सब का परिश्रम था, काशीवासियों का विश्वास था। जब नतीजे आए तब भी निश्चिंत था, जब परिणाम आए तब भी निश्चिंत था और इसलिए बड़े मौज के साथ केदारनाथ में बाबा के चरणों में जा कर बैठ चुका था। काशी तो अविनाशी है और जो स्नेह मुझे दिया है, जो शक्ति मुझे दी है ये अपने आप में शायद ही, ऐसा सौभाग्य मिलना बहुत मुश्किल होता है जी। आप में से कई लोग हैं, कितने कार्यक्रम किए, मुझे जानकारी मिलती थी की क्या-क्या कार्यक्रम चल रहे हैं। एक प्रकार से चुनाव को लोकोत्सव बना दिया गया है, देश के लिए भी। और पूरे चुनाव अभियान में बहुत एक मात्रा में मैं कह सकता हूं की तू-तू, मैं-मैं का तत्व बहुत कम था, अपनत्व का माहौल ज्यादा था। इस चुनाव में अलग-अलग दलों के जो साथी मैदान में थे, इस चुनाव में जो निर्दलीय साथी जो मैदान में थे, मैं उनका भी आभार व्यक्त करता हूं। उन्होंने ने भी अपने तरीके से काशी की गरिमा के अनुकूल इस चुनाव के अभियान को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दिया है, वे भी अभिनंदन के अधिकारी हैं और इसलिए मैं सार्वजनिक रूप से जो अन्य उम्मीदवार थे, उनका भी हृदय से धन्यवाद करना चाहता हूं।

चुनाव में प्रशासन को बहुत कठिनाइयां रहती हैं, बहुत परिश्रम रहता है, देश भर मीडिया वर्ल्ड भी यहां आता था तो स्थानीय मीडिया के लोगों के भरोसे वो चलते थे। एक प्रकार से उनको भी काशी की रिपोर्टिंग करना और देश भर से आए मीडिया को संभालना, ये अपने आप कर रहे थे, मैं इस मीडिया जगत के सभी साथियों का भी हृदय से बहुत-बहुत अभिनंदन करना चाहता हूं। इस चुनाव में जब कार्यकर्ताओं के साथ मेरा मिलना हुआ था तो उस दिन मैंने कहा था की यहां पर शायद नामांकन तो एक नरेंद्र मोदी का हुआ होगा, लेकिन ये चुनाव हर घर का नरेंद्र मोदी लड़ेगा, हर गली का नरेंद्र मोदी लड़ेगा। और आपने एक प्रकार से अपने भीतर की शक्तियां, एक प्रकार से नरेंद्र मोदी के रूप में ही आपने अपने अंदर ही इसको समाहित कर दिया है और आप सब नरेंद्र मोदी बन गए हैं और इस पूरे चुनाव अभियान को आपने चलाया। आम तौर पर जब इस प्रकार का चुनाव होता है तो थोड़ा मन में अब क्या है भाई जीतने ही वाले हैं, लेकिन मैं काशी के संगठन से जुड़े हुए लोगों का, काशी के हर छोटे-मोटे कार्यकर्ता का और काशी के हर समर्थक का इस बात के लिए आभार व्यक्त करता हूं की उन्होंने इस चुनाव को जय और पराजय के तराजू से नहीं तौला, मैं समझता हूं की ये हिंदुस्तान के लोकतंत्र की बहुत बड़ी घटना है। जय और पराजय के तराजू में नहीं तौला, उन्होंने चुनाव को एक लोकशिक्षा का पर्व माना, लोकसंपर्क का पर्व माना, लोक संग्रह का पर्व माना, लोक समर्पण का पर्व माना और कोई कमी ना रह जाए, किसी मतदाता को ये ना लगे की कोई मेरे पास तो आया नहीं था, किसी ने तो मुझे कहा नहीं था। मोदी हमें पसंद है पर भाई क्या बात है, इतना बड़ा अवसर है आपने मुझे याद भी नहीं किया। हर घर गए, हर मतदाता को मिले, 40-45 डिग्री टेंपरेचर पर गए और गर्मागर्मी नहीं थी। चुनाव के माहौल को गर्म करना भी अपने आप में एक कसौटी होती है ताकी मतदाताओं का उत्साह बढ़े। इन सभी कसौटियों से आप पार उभरे हैं और डिस्टिंक्शन मार्क के साथ पार उतरे हैं इसलिए आप बधाई के पात्र हैं।

सारे देश में और सोशल मीडिया में यहां की बेटियों ने जो स्कूटी निकाली इसकी बड़ी चर्चा है और उसने मैसेजिंग किया की स्कूटी पर बैठकर के हमारी बेटियों ने पूरे काशी को अपने सर पर ले लिया था। भांति-भांति के कार्यक्रम और कभी-कभी तो जाकर के हम सिर्फ देखते थे वाह कैसा चल रहा है, लेकिन कर रही थी जनता जनार्दन, जनता जनार्दन का उत्साह था, कोई कारण नहीं था ये आज तो मुझे ऐसे ही उतरकर के बाबा के चरणों में जाना था और फिर आप सब के माध्यम से काशी का और उत्तर प्रदेश का अभिनंदन करना था। लेकिन उसके बावजूद भी जिस प्रकार से पूरे रास्ते भर लोग अपने आशीर्वाद दे रहे थे, ये भी अपने आप में एक अनोखा अनुभव था और इसलिए मैं आप सब का हृदय से अभिनंदन करता हूं। आज मैं भले काशी से बोल रहा हूं लेकिन पूरा उत्तर प्रदेश अनेक-अनेक अभिनंदन का अधिकारी है। आज उत्तर प्रदेश देश की राजनीति को दिशा दे रहा है, आज उत्तर प्रदेश स्वस्थ लोकतंत्र की नींव को और मजबूत कर रहा है। उत्तर प्रदेश ने 77 में लोकतंत्र के लिए सारी दीवारें तोड़ कर के, लोकतंत्र के प्रति अपनी निष्ठा बता कर के देश को एक दिशा दी थी, ताकत दी थी। लेकिन 2014 हो, 2017 हो, 2019 हो, ये हैट्रिक छोटी नहीं है जी। ये तत्कालीन किए हुए निर्णय नहीं हैं, उत्तर प्रदेश के गांव, गरीब परिवार का व्यक्ति भी, भारत के उज्जवल भविष्य की दिशा क्या हो सकती है इसके विषय में सोचता भी है और उसी की दिशा में चलता भी है और देश को चलने के लिए प्रेरित भी करता है। उत्तर प्रदेश के ये 14, 17 और 19, इन तीन चुनावों के योगदान को, भारत की राजनीति, भारत की समाजनीति, भारत की मतदान की नीतियां किस प्रकार से बदलाव ला रही हैं, इसके अद्भुत, विराट रूप के दर्शन कराए हैं और तीन-तीन चुनाव के बाद भी अगर पॉलीटिकल पंडित की आंखें खुलती नहीं है, तीन-तीन चुनाव के बावजूद भी पॉलीटिकल पंडितों के कान पर आवाज नहीं पहुंचती है तो इसका मतलब है की उनके विचार, उनकी सोच, उनके तर्क कालबाह्य हो चुके हैं, वो 20वीं सदी के लिए हैं 21वीं सदी के लिए नहीं हैं। 50-50 पेज का जिनका बॉयोडेटा बनता होगा, प्रोफाइल बनता होगा, इतनी डिग्रियां होंगी, इतने पेपर लिखे होंगे ना जाने क्या-कुछ हुआ होगा, लेकिन उनकी तुलना में जमीन से जुड़ा हुआ एक गरीब आदमी उसकी समझ शक्ति कई गुना ऊंचा होती है, बहुत दीर्घ दृष्टि होती है। और हम उसी के प्रति श्रद्धा रखते हुए, उसी के प्रति समर्पण भाव रखते हुए और उसी के सहारे, उसी की शक्ति के भरोसे राष्ट्र की राजनीति में एक नई व्यवस्था को विकसित करने का प्रयास किया है।

चुनाव परिणाम, वो तो एक गणित होता है, जिसको 200 वोट मिले हैं और दूसरे को 201 मिला है तो विजेता तो 201 वाला होने वाला है 200 वाला नहीं। परिणाम का आधार तो गणित समझ सकता हूं मैं, 20 सदी के चुनावों के हिसाब-किताब भी गणित और अंकगणित के दायरे में चले होंगे, लेकिन चाहे वो 2014 हो, 17 हो या 2019, देश के राजनीतिक विश्लेषकों को मानना होगा की अर्थमैटिक के आगे भी कैमेस्ट्री होती है। गुणा-भाग के हिसाब के परे भी एक कैमेस्ट्री होती है। देश में समाजशक्ति की जो कैमेस्ट्री है, आदर्शों और संकल्पों की जो कैमेस्ट्री है वो कभी-कभी सारे गुणा-भाग, सारे अंकगणित को निरस्त कर देती है, पराजित कर देती है और इस बार अंकगणित को कैमेस्ट्री ने पराजित किया है। इस अर्थ में यो चुनाव अपने आप में, देश और दुनिया के पॉलीटिकल पंडितों को, कुछ लोगों की घिसी-पिटी कैसेट है और वही एक दायरे में फिट करके एक परसेप्शन बनाने की कोशिश करते रहते हैं। और ये माना गया है की पॉलीटिक्स इज अबाउट परसेप्शन, लेकिन और हम वो लोग हैं जो हम जैसे हैं वैसे दुनिया हमें देख ना लें इसलिए 90% से अधिक ताकतें जो पिछले 50-60-70 साल में इसटैब्लिश हो चुकी हैं वे दो काम करती रहती हैं। किसी भी हालत में हमारे विषय में सही परसेप्शन ना बने इसके लिए जो भी झूठ का सहारा लेना पड़े और दूसरा, एक है जैसे परसेप्शन सही ना पहुंचे, तो दूसरा है, हो सके जितने कुतर्क करके परसेप्शन के बर्बाद किया जाए, बिगाड़ा जाए। एक ऐसा खराब परसेप्शन बना दिया जाए की लोग पास खड़े रहने से डर जाएं, ये 70 साल तक चला है। पंडितों की ये थ्योरी होगी की पॉलीटिक्स इज अबाउट परसेप्शन, लेकिन उन पंडितों को दोबारा सोचना पड़ेगा की दो चीजें ऐसी होती है जो परसेप्शन को तबाह करने वालों की कोशिशों को भी, गंदा और बुरा परसेप्शन क्रिएट करने वालों की कोशिशों को भी उसको परास्त करके आगे बढ़ने की ताकत होती है और वो है, वो दो चीजें, एक है पारदर्शिता और दूसरा है परिश्रम। पारदर्शिता और परिश्रम, लोग कितनी ही अपनी ताकत लगा लें परसेप्शन बनाने की, उसको परास्त करने का साहस रखती हैं और हिंदुस्तान ने उसे स्वीकार करके दिखाया है, उसे करके दिखाया है। और इसलिए हमारे लिए भी पारदर्शिता और परिश्रम का कोई ऑलटर्नेट नहीं है क्योंकि हमें इस प्रकार की इसटैब्लिश निगेटीविटी के बीच पॉजिटीविटी को लेकर जाना है और निरंतर जाना है, अविरत जाना है क्योंकि देश उसी से आगे बढ़ने वाला है और उसको हमने किया है।  

साथियो, हम लोगों को लगता है ये सफलता है। सरकार और संगठन, इन दोनों के बीच तालमेल, परफेक्ट सिनर्जी ये बहुत बड़ी ताकत होती है। आप देखते होंगे की भारतीय जनता पार्टी ने सफलतापूर्वक इसको साकार किया है। राज्यों में इतनी सरकारें हों, केंद्र में सरकार हों, लेकिन सरकार और संगठन, दोनों के बीच में सिनर्जी। सरकार नीति बनाती है नीति पर चलती है, संगठन रणनीति बनाता है। नीति और रणनीति, इसकी सिनर्जी, सरकार और संगठन के काम की सिनर्जी का एक प्रतिबिम्ब होती है और जिस प्रतिबिम्ब का आज हम सफल, उसका लाभ देश को मिल रहा है। उसी प्रकार से हम ये जानते हैं की सरकार का कार्य है काम करना और इसलिए एक तरफ सरकार का कार्य हो और उसमें जब कार्यकर्ता जुड़ जाता है, कार प्लस कार्यकर्ता वो एक ऐसी ताकत है जो करिश्मा करती है। ये जो करिश्मा दिख रहा है वो कार्य का भी है और कार्य के साथ कार्यकर्ता का भी है, दोनों में से एक होने में होना नहीं है ये करिश्मा और इसलिए वर्क एंड वर्कर क्रिएट्स वंडर। और इसलिए वर्क और वर्कर, ये वंडर की बहुत बड़ी सबसे उद्दीपक, केटेलिक एजेंट हैं, जो आज हम कर रहे हैं। सरकार ने काम किया, शौचालय बनाए, घर बनाए, गैस पहुंचाया, बिजली पहुंचाई, लेकिन ये कार्यकर्ता है जिसने विश्वास पैदा किया की अभी तो ये शुरूआत है। जिसे नहीं मिला है मिलने वाला है और जिसे मिला है वो उपकार नहीं उसके हक का मिला है। ये जो वर्क और वर्कर वाला सिनर्जी है, जो वंडर करता है वो आज हर बात में हम देख पाते हैं। और इसलिए मैं समझता हूं की भारतीय जनता पार्टी, एक प्रकार से दो संकटों से हम गुजरे हैं और लगातार हमें झेलना पड़ता है। जैसे दो शक्ति हैं नीति और रीति, जैसे दो शक्ति हैं नीति और रणनीति, जैसे दो शक्ति हैं पारदर्शिता और परिश्रम, जैसे दो शक्ति हैं वर्क और वर्कर वैसे ही दो संकट भी हमने झेले हैं। और वो दो संकट हैं, चाहे केरल लीजिए या कश्मीर ले लीजिए, चाहे बंगाल ले लीजिए या त्रिपुरा ले लीजिए। ये चीजें अखबारों में नहीं छपती हैं, मीडिया में नहीं दिखती हैं। कुछ लोगों की सलेक्टिव संवेदनशीलता, सलेक्टिव मानवतावाद इन सत्य को नकारता है, लेकिन हमारे सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने शहादत मोल ली हैं, उनकी हत्याएं हुई हैं। उनको सिर्फ राजनीतिक विचारधारा के कारण मौत के घाट उतार दिया गया है। जब त्रिपुरा में चुनाव चल रहा था, फांसी पर लटका दिए जाते थे हमारे कार्यकर्ता, बंगाल में आज भी हत्याओं का दौर रुक नहीं रहा है। कश्मीर में हमारे लोगों ने जान की बाजी लगाई है, केरल में हमें मौत के घाट उतार दिया जाता है। शायद हिंदुस्तान में कोई एक राजनीतिक दल इतनी व्यापक प्रकार से हिंसा का शिकार हुआ है और उसके मूल में जो हेटरेज का जो नैरेटिव बनाया गया है, उसी का परिणाम है की हिंसा को एक प्रकार से मान्यता दी गई है ये हमारे सामने बहुत बड़ा संकट है। दूसरा हमारे सामने संकट है, बाबा साहब अंबेडकर, महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों ने सार्वजनिक जीवन में छुआछूत को, समाज जीवन में छुआछूत को, सामाजिक व्यवस्था में छुआछूत को खत्म करने के लिए अपनी जिंदगी खपा दी, लेकिन दुर्भाग्य से हमारे देश में राजनीतिक छुआछूत दिन पर दिन बढ़ती चली जा रही है। भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं पर लगातार हिंसा होना, उनकी हत्याएं होना और दूसरी तरफ भाजपा का नाम लेते ही अनटचेबिलिटी, छुओ मत ये तो बड़े खतरनाक हैं। हम इतने सालों से सत्ता में आए हैं, हम विभाजनकारी मनोक्ति के नहीं हैं। जो लोग अपने आप को एकता का ठेकेदार बनाते हैं उन्होंने सिर्फ आन्ध्र का विभाजन किया, आज भी वहां शांति का माहौल नहीं बन पाया है, तेलंगाना और आन्ध्र। और हम वो लोग हैं जो एकता के मंत्र को लेकर के चलते हैं, हम उत्तर प्रदेश में से उत्तराखंड बना दें, दिलों में आग नहीं लगने देते हैं। हम बिहार में से झारखंड बना दें, दिलों को चोट नहीं पहुंचाते हैं। हम मध्य प्रदेश में से छत्तीसगढ़ बना दें, प्यार में कोई कमी नहीं आने देते हैं क्योंकि सबका साथ-सबका विकास ये मंत्र हमारी रगों में है, हमारी जहन में है। लेकिन उसके बावजूद भी एक ऐसा परसेप्शन क्रिएट किया गया है की जिसमें हमें आज भी अछूत। मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था और गुजरात के टूरिज्म प्रमोशन के लिए मैंने सिने जगत के लोगों की मदद मांगी, उन्होंने मदद की। लेकिन सारी दुनिया उन पर टूट पड़ी, आप और गुजरात, यानी ऐसा छुआछूत का परसेप्शन बनाते चले गए। ये चुनौती भी है, भारत के लोकतंत्र में इस प्रकार के वृत्ति वाले लोग हैं उनसे भी मैं आज काशी की पवित्र धरती से पुनर्विचार करने के लिए आज प्रार्थना करना चाहता हूं, बहुत हो चुका-बहुत हो चुका। आओ दोस्तों आओ, नए सिरे से सोचना शुरू करो, कमियां हममें भी होंगी, लेकिन हमारे इरादे नेक हैं।

दोस्तो, लोकतंत्र, कोई कुछ भी कह दे, आज हिंदुस्तान के राजनीतिक तख्त पर, राजनीतिक कैनवास पर ईमानदारी से रग-रग में लोकतंत्र को जीने वाला कोई दल है तो भारतीय जनता पार्टी है। हम शासन में आते हैं तब भी हम सबसे ज्यादा लोकतंत्र की परवाह करने वाले लोग होते हैं। कभी-कभी तो और लोग जब सत्ता में आते हैं तो विपक्ष का नामोनिशान नहीं होता है। हमें जब सत्ता मिलती है तो विपक्ष का अस्तित्व शुरू होता है क्योंकि लोकतंत्र ही हमारा स्पिरीट है। आप त्रिपुरा देख लीजिए, मैं देश के पॉलीटिकल पंडितों से कहना चाहूंगा और चुनौती दे कर के कहना चाहता हूं। कोई मुझे बताए, त्रिपुरा के अंदर 30 साल कम्यूनिस्टों की सरकार रही, क्या वहां कोई विपक्ष था, क्या वहां विपक्ष की कोई आवाज थी, क्या वहां विपक्ष को कभी सुना गया था? क्या दिल्ली के मीडिया में कभी विपक्ष की चर्चा हुई थी? कुचल दिया जा चुका था। आज त्रिपुरा में हम सत्ता में आए हैं, अभी तो दो साल मुश्किल से होने जा रहे हैं, आज वहां जानदार, शानदार विपक्ष मौजूद है और उसकी आवाज सुनी जाती है। ये लोकतंत्र स्पिरीट है, उसकी आवाज के तवज्जो दी जाती है और देश चलाने के लिए ये अपने आप में बहुत बड़ी बात होती है और जिम्मेवारी भी होती है, वो कोई उपकार नहीं है। मैं मानता हूं जो हमारे पूर्व राष्ट्रपति बार-बार कहते थे। पार्लियामेंट का उपयोग चर्चा के लिए होना चाहिए, चर्चा में आप भरपूर विरोध कीजिए ना, लेकिन जब चर्चा के लिए मुद्दे नहीं होते हैं, तर्क नहीं होते हैं, एक्सपोज होने का डर लगता है तो हो हल्ला करके संसद को ना चलने देना ये सरल मार्ग बन जाता है। हम विपक्ष की ताकत को स्वीकार कर के तवज्जो देने वाले, लोकतंत्र में विश्वास करने वाले लोग हैं और जहां-जहां हमें मौका मिला, वहां पर विपक्ष का आवाज, संख्या भले कम होती हो, जनता के अविश्वास के कारण उनकी जनसंख्या कम हो जाती है, वो उनकी जिम्मेवारी है जनता का विश्वास जीते, लेकिन संविधान हमें जिम्मेवारी देता है, एक भी क्यों ना हो उसकी आवाज का महत्व बड़ा है, ये हमारे जेहन में है।

दोस्तो, एक और बात है, हमारे देश के लोकतंत्र को वोटबैंक की राजनीति ने कुचल दिया है और इसलिए जो भी निर्णय होते हैं, चर्चा होती है। सबके बीच आकर हिम्मत से अपनी बात रखनी है तो ये वोटबैंक की राजनीति के दबाव में हमारे देश में कोई हिम्मत नहीं कर पाता है। क्या इस देश के सामान्य वर्ग के गरीब लोगों को अपने हक के लिए इतना इंतजार करना पड़ा, कोई उनकी बात सुनने को तैयार नहीं था। ऐसा तो नहीं था की आवाज आ नहीं रही थी, ऐसा तो नहीं था की लोग रोष व्यक्त नहीं करते थे। ऐसा भी नहीं था की आंदोलन नहीं होते थे, होता सब कुछ था। लेकिन वोटबैंक की राजनीति के प्रभाव में ये करेंगे तो शायद कुछ खिसक जाएगा तो। ये हमारी निष्पक्ष सोच थी, वोटबैंक की राजनीति से ऊपर उठकर सबका साथ-सबका विकास को अवसर और उसका कारण है की हम सामान्य वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का फैसला कर सके। अगर हम वोटबैंक की राजनीति पर चलते तो शायद हम भी उसी में ढल जाते, हम नहीं ढले, देश के उज्जवल भविष्य के लिए जो आवश्यक है वो हम करेंगे। आज भी मेरी सूचना रहती है, गांव में घर मिलेगा, एक तरफ से लिस्ट के अंदर से शुरू करो, 51 लोग हैं 25 को देने वाले हैं, पहले 25 को दे दो फिर दूसरा बजट आए 26 से शुरू करो। कौन जाति का है, कौन बिरादरी का है, प्रधान से लेना-देना है, कोई लेना-देना नहीं है, वो मेरे देश का नागरिक है उसको मिलना चाहिए। मैं जानता हूं इन चीजों से मिलने वाले को कभी लगता नहीं है। वो इसे ही मानता है, ये नियम में मेरा नाम आया है, भाजपा वालों ने क्या किया, मोदी ने क्या किया, ये निगेटीविटी हो सकती है, नुकसान हो सकता है, लेकिन ये नुकसान झेल कर भी हमने देश में व्यवस्थाओं को सुचारु रूप से विकसित करने की हिम्मत दिखाई है।

साथियो, हम वो लोग हैं जो भारत की महान विरासत को लेकर के गौरव के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं, जो कालबाह्य है उसको छोड़ने वाले हम लोग हैं, लेकिन जो सदियों से खरा उतरा है, ऋषियों ने, आचार्यों ने, भगवंतों ने, मजदूर ने, किसान ने, कामगार ने, शिक्षक ने, वैज्ञानिक ने हजारों सालों से देश की परंपरा को विकसित किया है औरों को शर्म आती हो आने दो, मुझे इसका गर्व होता है। जिनको शर्म आती है वो उनका प्रॉब्लम है, हमें लगता है कि हमारे महापुरुषों ने दुनिया को बहुत कुछ दिया है और जिसकी विरासत भारत के पास है। इसलिए हम दो बातों को लेकर चलने का प्रयास करते हैं, एक ये महान विरासत और दूसरा आधुनिक विजन। हमें कल्चर को भी बरकरार रखना है और हमें करंट सिचुएशन को भी एड्रेस करना है। योग हो, आयुर्वेद हो, रामायण सर्किट हो, बुद्धिस्त सर्किट हो, भारत की महान विविधताएं हैं। अयोध्या में दीवाली मनाना, इतने साल तक किसने रोकी था भाई। कुंभ के मेले का उपयोग देश की मर्यादाओं को चूर-चूर करने के लिए हुआ है इतने सालों तक, एक ही प्रकार का परसेप्शन क्रिएट किया गया। कुंभ का मेला मतलब, नागा साधुओं की जमात, उस परसेप्शन को बदला जा सकता है और योगी जी के नेतृत्व में देश ने बदला है और उसका गौरव सिर्फ उत्तर प्रदेश नहीं पूरे भारत का हुआ है।

26 जनवरी को जब विजय चौक पर परेड होती है और विजय पथ पर टेब्ल्यू जाते हैं। पहली बार एशिया के अंदर भगवान राम को किस-किस रूप में देखा जाता है, उसका प्रगतिकरण देश ने देखा। लेकिन इसके साथ हम वो लोग हैं जो अटल टिंकरिंग लैब भी बनाते हैं ताकी मेरी जो नई पीढ़ी है, 8वीं, 10वीं कक्षा का जो बच्चा है, जो अटल टिंकरिंग लैब से इनोवेशन पर सोचे, नए अनुसंधान पर सोचे, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से सोचे और भारत को 21वीं सदी में वैज्ञानिक अधिष्ठान पर ले जाए, इसके लिए भी हम उतनी ही ताकत लगा रहे हैं। इसलिए हम कल्चर को जितना महत्व देते हैं, हम 21वीं सदी के विजन को भी उतना ही प्रगढ़तापूर्वक आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं। हमारे देश में पूजा-पाठ में सवा रुपए का महत्व है, लेकिन फिर भी भीम ऐप बनाकर के मोबाइल फोन से डिजिटली डोनेट करने की परंपरा हम विकसित कर रहे हैं। जरूरी नहीं है की पुराना तोड़-फोड़ कर ही सब कुछ नया बनाया जा सकता है, लेकिन हमने उन चीजों को आगे लिया है। हमने 11 नंबर की अर्थव्यवस्था से शुरू की थी यात्रा, आज 6 नंबर पर पहुंच गए दुनिया में। पांच नंबर के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं, 3 में पहुंचने के इरादे से काम कर रहे हैं। आज मेरे देश का नवजवान स्टार्ट-अप को लेकर के विश्व में ताकत बन कर उभर सकता है, तो स्टार्टअप को बल देकर देश के नवजवान की ताकत से विश्व को अचंभित करने की दिशा में बढ़ना चाहते हैं। इसलिए हम उन चीजों को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं, जो लोग परसेप्शन बनाते हैं उन्होंने हमेशा ये बनाया और उनके लिए वो शायद एक ऐकेडेमिक डिसकशन होगा, लेकिन इस प्रकार की सोच से देश में दरारें पड़ती हैं। उनको पता भी नहीं होता है की उनकी ये सोच किस प्रकार से देश में दरार पैदा करती है। आज हिंदुस्तान का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहां भारतीय जनता पार्टी के प्रतिनिधि चुनते हों या ना चुनते हों, लेकिन लगातार हमारा वोट परसेंटेज बढ़ रहा है। केरल हो, तमिलनाडु हो, कश्मीर घाटी हो, आज लद्दाख से भी बीजेपी चुनकर आती है। फिर भी ये पंडित लोग बैठेंगे तो हिंदी हार्टलैंड की पार्टी, कर्नाटक में सबसे बड़ा दल फिर भी हम हिंदी हार्टलैंड, गोवा में हम सालों से सरकार चला रहे हैं फिर भी हिंदी हार्टलैंड, पूरे नार्थईस्ट में, वहां हिंदी भाषा समझना मुश्किल है फिर भी वहां हम सरकार चलाते हैं, असम में सरकार चलाते हैं। हम लद्दाख के अंदर चुनकर के आते हैं, एक ऐसा भ्रम पैदा किया गया है। हम एक सर्वसमावेशक, सर्वस्पर्शी और सर्वजनहिताय-सर्वजनसुखाय काम करने वाले भारतीय जनता पार्टी के हम लोग हैं।

भाइयो-बहनो, चुनाव जीतना एक काम है और लोकतंत्र का ये उत्सव आन, बान, शान के साथ हमने मनाया है। लेकिन अब 2022, आजादी के 75 साल, अधिकार की चर्चाएं हमने बहुत कर ली हैं, ये पांच साल कर्तव्य पर हम चल सकते हैं। इस देश का नागरिक अगर अपने कर्तव्यों का पालन करे तो किसी के अधिकारों का हनन होने वाला नहीं है। ये देश मेरा है, आज हमारे देश में एक मानसिकता बन गई है। आजादी का आंदोलन चला तो हम देश के लिए मर मिटते थे, लेकिन आजाद होने के बाद, स्कूल है तो हम आराम से कह देते हैं की ये सरकारी स्कूल है। अस्पताल, भाई ये तो सरकारी अस्पताल है, अरे भाई वो सरकारी नहीं है, वो तेरा है आप उसके मालिक हो। हमने ये भाव पैदा करना है, जो भी सरकारी है, वो भारत के हर नागरिक की मालिकी का है। और उसको बढ़ाना, उसको ताकत देना, उसकी रक्षा करना एक नागरिक के नाते हमारा कर्तव्य है। ये तो सरकारी स्कूल है भाई, वहां कौन जाएगा, ये सरकारी अस्पताल है वहां कौन जाएगा। जी नहीं, हम ही मिलकर सरकार हैं वो हमारा है, हम इसको ताकत कैसे दें। अपना स्कूटर तो हम दिन में चार बार साफ करते हैं, 20 साल पुराना हो, कलर उखड़ गया हो फिर भी चार बार साफ करते हैं। लेकिन सरकारी बस में बैठें और बगल में सीट खाली हो, बातें करने वाला ना हो और नींद आती नहीं हो तो क्या करते हैं, सीट में उंगली डालते हैं, यहां सबने किया होगा और अंदर से दो-तीन इंच का जब तक गढ्ढा ना करें हमको चैन नहीं आता है। भारत माता की जय बोलें और फिर बनारसी पान खा कर के, ये कौन से भारत माता की जय है भाई। उसी मां को गंदा करें, जिस मां का जयकारा करने के लिए हम संकट झेलते हैं, कहने का तात्पर्य ये है की ये देश मेरा है, ये देशवासी मेरे हैं। जिस स्पिरिट से आजादी का आंदोलन चला, उसी स्पिरिट से आजादी के 75 साल देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए हम आगे बढ़ आए और काशी कर के दिखाए।

साथियो, आज चुनाव की गहमागहमी के बाद, विजयोत्सव का माहौल अब धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है तब अपनों के बीच मैं आया हूं, ज्ञान नगरी में आया हूं, महान विरासत की धरती पर आया हूं और उसमें से जो भाव जगा, उस भाव को मैंने आपके सामने प्रकट किया है। जब चुनाव का काम चल रहा था उसी समय इस वर्ष जिनको हमने पद्मश्री दिया था वो श्रद्धेय हीरालाल जी हमारे बीच नहीं रहे, जिन्होंने संगीत साधना में बहुत बड़ा योगदान किया। मैं आज जब उनके स्वर्गवास के बाद पहली बार आया हूं तो मैं आदरपूर्वक उनको श्रद्धांजली देता हूं। उनके परिवारजनों से तो मैंने बात की थी, लेकिन उन्होंने जो विरासत छोड़ी है उस विरासत के प्रति हम सब का गर्व बना रहे। मैं फिर एक बार आपके पुरुषार्थ के लिए, आपके परिश्रम के लिए, आपके समर्पण के लिए जी जान से जो मेहनत आपने की है, आप सब को हाथ जोड़कर नमन करते हुए मैं हृदय से धन्यवाद करता हूं। आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद। सभी काशी के मतदाताओं का धन्यवाद, पूरे उत्तर प्रदेश का धन्यवाद। बहुत-बहुत धन्यवाद।

 

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January 22, 2022
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“When the aspirations of others become your aspirations and when fulfilling the dreams of others becomes the measure of your success, then that path of duty creates history”
Today Aspirational Districts are eliminating the barriers to progress of the country. They are becoming an accelerator instead of an obstacle
“Today, during the Azadi ka Amrit Kaal, the country's goal is to achieve 100% saturation of services and facilities”
“The country is witnessing a silent revolution in the form of Digital India. No district should be left behind in this.”

नमस्कार !

कार्यक्रम में हमारे साथ उपस्थित देश के अलग-अलग राज्यों के सम्मानित मुख्यमंत्रीगण, लेफ्टिनेंट गवर्नर्स, केंद्रीय मंत्रीमंडल के मेरे सहयोगी, सभी साथी, राज्यों के सभी मंत्री, विभिन्न मंत्रालयों के सचिव और सैकड़ों जिलों के जिलाधिकारी, कलेक्टर-कमिश्नर, अन्य महानुभाव, देवियों और सज्जनों,

जीवन में अक्सर हम देखते हैं कि लोग अपनी आकांक्षाओं के लिए दिन रात परिश्रम करते हैं और कुछ मात्रा में उन्हें पूरा भी करते हैं। लेकिन जब दूसरों की आकांक्षाएँ, अपनी आकांक्षाएँ बन जाएँ, जब दूसरों के सपनों को पूरा करना अपनी सफलता का पैमाना बन जाए, तो फिर वो कर्तव्य पथ इतिहास रचता है। आज हम देश के Aspirational Districts-आकांक्षी जिलों में यही इतिहास बनते हुए देख रहे हैं। मुझे याद है, 2018 में ये अभियान शुरू हुआ था, तो मैंने कहा था कि जो इलाके दशकों से विकास से वंचित हैं, उनमें लोगों की सेवा करने का अवसर, ये अपने आप में एक बहुत बड़ा सौभाग्‍य है। मुझे ख़ुशी है कि आज जब देश अपनी आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, तो आप इस अभियान की अनेकों उपलब्धियों के साथ आज यहाँ उपस्थित हैं। मैं आप सभी को आपकी सफलता के लिए बधाई देता हूं, आपके नए लक्ष्यों के लिए शुभकामनाएं देता हूँ। मैं मुख्‍यमंत्रियों का भी और राज्‍यों का भी विशेष रूप से अभिनंदन करता हूं कि उन्‍होंने, मैंने देखा कि अनेक जिलों में होनहार और बड़े तेज तर्रार नौजवान अफसरों को लगाया है, ये अपने आप में एक सही रणनीति है। उसी प्रकार से जहां vacancy थी उसको भरने में भी priority दी है। तीसरा मैंने देखा है कि उन्‍होंने tenure को भी stable रखा है। यानी एक प्रकार से aspirational districts में होनहार लीडरशिप, होनहार टीम देने का काम मुख्‍यमंत्रियों ने किया है। आज शनिवार है, छुट्टी का मूड होता है, उसके बावजूद भी सभी आदरणीय मुख्‍यमंत्री समय निकाल करके इसमें हमारे साथ जुड़े हैं। आप सब भी छुट्टी मनाये बिना आज इस कार्यक्रम में जुड़े हैं। ये दिखाता है कि aspirational district का राज्‍यों का मुख्‍यमंत्रियों के दिल में भी कितना महत्‍व है। वे भी अपने राज्‍य में इस प्रकार से जो पीछे रह गये हैं, उनको राज्‍य की बराबरी में लाने के लिये कितने दृढ़निश्चयी हैं, ये इस बात का सबूत है।

साथियों,

हमने देखा है कि एक तरफ बजट बढ़ता रहा, योजनाएं बनती रहीं, आंकड़ों में आर्थिक विकास भी होता दिखा, लेकिन फिर भी आजादी के 75 साल, इतनी बड़ी लंबी यात्रा के बाद भी देश में कई जिले पीछे ही रह गए। समय के साथ इन जिलों पर पिछड़े जिले का टैग लगा दिया गया। एक तरफ देश के सैकड़ों जिले प्रगति करते रहे, दूसरी तरफ ये पिछड़े जिले और पीछे होते चले गए। पूरे देश की प्रगति के आंकड़ों को भी ये जिले नीचे कर देते थे। समग्र रूप से जब परिवर्तन नजर नहीं आता है, तो जो जिले अच्छा कर रहे हैं, उनमें भी निराशा आती है और इसलिए देश ने इन पीछे रह गए जिलों की Hand Holding पर विशेष ध्यान दिया। आज Aspirational Districts, देश के आगे बढ़ने के अवरोध को समाप्त कर रहे हैं। आप सबके प्रयासों से, Aspirational Districts, आज गतिरोधक के बजाय गतिवर्धक बन रहे हैं। जो जिले पहले कभी तेज प्रगति करने वाले माने जाते थे, आज कई पैरामीटर्स में ये Aspirational Districts उन जिलों से भी अच्छा काम करके दिखा रहे हैं। आज यहां इतने माननीय मुख्यमंत्री जुड़े हुए हैं। वो भी मानेंगे कि उनके यहां के आकांक्षी जिलों ने कमाल का काम किया है।

साथियों,

Aspirational Districts इसमें विकास के इस अभियान ने हमारी जिम्मेदारियों को कई तरह से expand और redesign किया है। हमारे संविधान का जो आइडिया और संविधान का जो स्पिरिट है, उसे मूर्त स्वरूप देता है। इसका आधार है, केंद्र-राज्य और स्थानीय प्रशासन का टीम वर्क। इसकी पहचान है- फेडरल स्ट्रक्चर में सहयोग का बढ़ता कल्चर। और सबसे अहम बात, जितनी ज्यादा जन-भागीदारी, जितनी efficient monitoring उतने ही बेहतर परिणाम।

साथियों,

Aspirational Districts में विकास के लिए प्रशासन और जनता के बीच सीधा कनेक्ट, एक इमोशनल जुड़ाव बहुत जरूरी है। एक तरह से गवर्नेंस का 'टॉप टु बॉटम' और 'बॉटम टु टॉप' फ़्लो। और इस अभियान का महत्वपूर्ण पहलू है - टेक्नोलॉजी और इनोवेशन! जैसा कि हमने अभी के presentations में भी देखा, जो जिले, टेक्नोलॉजी का जितना ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं, गवर्नेंस और डिलिवरी के जितने नए तरीके इनोवेट कर रहे हैं, वो उतना ही बेहतर परफ़ॉर्म कर रहे हैं। आज देश के अलग-अलग राज्यों से Aspirational Districts की कितनी ही सक्सेस स्टोरीज़ हमारे सामने हैं। मैं देख रहा था, आज मुझे पाँच ही जिला अधिकारियों से बात करने का अवसर मिला। लेकिन बाकी जो यहां बैठे हैं, मेरे सामने सैकड़ों अधिकारी बैठे हैं। हर एक के पास कोई ना कोई success story है। अब देखिए हमारे सामने असम के दरांग का, बिहार के शेखपुरा का, तेलंगाना के भद्राद्री कोठागुडम का उदाहरण है। इन जिलों ने देखते ही देखते बच्चों में कुपोषण को काफी हद तक कम किया है। पूर्वोत्तर में असम के गोलपारा और मणिपुर के चंदेल जिलों ने पशुओं के वैक्सीनेशन को 4 साल में 20 प्रतिशत से 85 प्रतिशत पर पहुंचा दिया है। बिहार में जमुई और बेगूसराय जैसे जिले, जहां 30 प्रतिशत आबादी को भी बमुश्किल दिन भर में एक बाल्टी पीने का नसीब होता था, वहां अब 90 प्रतिशत आबादी को पीने का साफ पानी मिल रहा है। हम कल्पना कर सकते हैं कि कितने ही गरीबों, कितनी महिलाओं, कितने बच्चों बुजुर्गों के जीवन में सुखद बदलाव आया है। और मैं ये कहूंगा कि ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। हर आंकड़े के साथ कितने ही जीवन जुड़े हुए हैं। इन आंकड़ों में आप जैसे होनहार साथियों के कितने ही Man-hours लगे हैं, Man-power लगा है, इसके पीछे आप सब, आप सब लोगों की तप-तपस्या और पसीना लगा है। मैं समझता हूं, ये बदलाव, ये अनुभव आपके पूरे जीवन की पूंजी है।

साथियों,

Aspirational Districts में देश को जो सफलता मिल रही है, उसका एक बड़ा कारण अगर मैं कहूंगा तो वो है Convergence और अभी कर्नाटका के हमारे अधिकारी ने बताया कि Silos में से कैसे बाहर आए। सारे संसाधन वही हैं, सरकारी मशीनरी वही है, अधिकारी वही हैं लेकिन परिणाम अलग-अलग हैं। किसी भी जिले को जब एक यूनिट के तौर पर एक इकाई के तौर पर देखा जाता है, जब जिले के भविष्य को सामने रखकर काम किया जाता है, तो अधिकारियों को अपने कार्यों की विशालता की अनुभूति होती हैं। अधिकारियों को भी अपनी भूमिका के महत्व का अहसास होता है, एक Purpose of Life फील होता है। उनकी आंखों के सामने जो बदलाव आ रहे होते हैं और जो परिणाम दिखते हैं, उनके जिले के लोगों की जिंदगी में जो बदलाव दिखते हैं, अधिकारियों को, प्रशासन से जुड़े लोगों को इसका Satisfaction मिलता है। और ये Satisfaction कल्पना से परे होता है, शब्दों से परे होता है। यह मैंने स्वयं देखा है जब ये कोरोना नहीं था तो मैंने नियम बना रखा था कि अगर किसी भी राज्‍य में जाता था, तो Aspirational District के लोगों को बुलाता था, उन अधिकारियों के साथ खुल के बाते करता था, चर्चा करता था। उन्हीं से बातचीत के बाद मेरा ये अनुभव बना है कि Aspirational Districts में जो काम कर रहे हैं, उनमें काम करने की संतुष्टि की एक अलग ही भावना पैदा हो जाती है। जब कोई सरकारी काम एक जीवंत लक्ष्य बन जाता है, जब सरकारी मशीनरी एक जीवंत इकाई बन जाती है, टीम स्पीरिट से भर जाती है, टीम एक कल्चर को लेकर आगे बढ़ती है, तो नतीजे वैसे ही आते हैं, जैसे हम Aspirational Districts में देख रहे हैं। एक दूसरे का सहयोग करते हुए, एक दूसरे से Best Practices शेयर करते हुए, एक दूसरे से सीखते हुए, एक दूसरे को सिखाते हुए, जो कार्यशैली विकसित होती है, वो Good Governance की बहुत बड़ी पूंजी है।

साथियों,

Aspirational Districts- आकांक्षी जिलों में जो काम हुआ है, वो विश्व की बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटीज के लिए भी अध्ययन का विषय है। पिछले 4 सालों में देश के लगभग हर आकांक्षी जिले में जन-धन खातों में 4 से 5 गुना की वृद्धि हुई है। लगभग हर परिवार को शौचालय मिला है, हर गाँव तक बिजली पहुंची है। और बिजली सिर्फ गरीब के घर में नहीं पहुंची है बल्कि लोगों के जीवन में ऊर्जा का संचार हुआ है, देश की व्यवस्था पर इन क्षेत्रों के लोगों का भरोसा बढ़ा है।

साथियों,

हमें अपने इन प्रयासों से बहुत कुछ सीखना है। एक जिले को दूसरे जिले की सफलताओं से सीखना है, दूसरे की चुनौतियों का आकलन करना है। कैसे मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में 4 साल के भीतर गर्भवती महिलाओं का पहली तिमाही में रजिस्ट्रेशन 37 प्रतिशत से बढ़कर 97 प्रतिशत हो गया? कैसे अरुणाचल के नामसाई में, हरियाणा के मेवात में और त्रिपुरा के धलाई में institutional delivery 40-45 प्रतिशत से बढ़कर 90 प्रतिशत पर पहुँच गई? कैसे कर्नाटका के रायचूर में, नियमित अतिरिक्त पोषण पाने वाली गर्भवती महिलाओं की संख्या 70 प्रतिशत से बढ़कर 97 प्रतिशत हो गई? कैसे हिमाचल प्रदेश के चंबा में, ग्राम पंचायत स्तर पर कॉमन सर्विस सेंटर्स की कवरेज 67 प्रतिशत से बढ़कर 97 प्रतिशत हो गई? या फिर छत्तीसगढ़ के सुकमा में, जहां 50 फीसदी से भी कम बच्चों का टीकाकरण हो पाता था, वहाँ अब 90 प्रतिशत टीकाकरण हो रहा है। इन सभी सक्सेस स्टोरीज़ में पूरे देश के प्रशासन के लिए अनेकों नयी-नयी बाते सीखने जैसी हैं, अनेक नये-नये सबक भी हैं।

साथियों,

आपने तो देखा है कि Aspirational Districts में जो लोग रहते हैं, उनमें आगे बढ़ने की कितनी तड़प होती है, कितनी ज्यादा आकांक्षा होती है। इन जिलों के लोगों ने अपने जीवन का बहुत लंबा समय अभाव में, अनेक मुश्किलों में गुजारा है। हर छोटी-छोटी चीज के लिए उन्हें मशक्कत करनी पड़ी है, संघर्ष करना पड़ा है। उन्होंने इतना अंधकार देखा होता है कि उनमें, इस अंधकार से बाहर निकलने की जबरदस्त अधीरता होती है। इसलिए वो लोग साहस दिखाने के लिए तैयार होते हैं, रिस्क उठाने के लिए तैयार होते हैं और जब भी अवसर मिलता है, उसका पूरा लाभ उठाते हैं। Aspirational Districts में जो लोग रहते हैं, जो समाज है, हमें उसकी ताकत को समझना चाहिए, पहचानना चाहिए। और मैं मानता हूं, इसका भी बहुत प्रभाव Aspirational Districts में हो रहे कार्यों पर दिखता है। इन क्षेत्रों की जनता भी आपके साथ आकर काम करती है। विकास की चाह, साथ चलने की राह बन जाती है। और जब जनता ठान ले, शासन प्रशासन ठान ले, तो फिर कोई पीछे कैसे रह सकता है। फिर तो आगे ही जाना है, आगे ही बढ़ना है। और आज यही Aspirational Districts के लोग कर रहे हैं।

साथियों,

पिछले साल अक्टूबर में मुझे मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री रहते हुए जनता की सेवा करते हुए 20 साल से भी अधिक समय हो गया। उससे पहले भी मैंने दशकों तक देश के अलग-अलग हिस्सों में प्रशासन के काम को, काम करने के तरीके को बहुत करीब से देखा है, परखा है। मेरा अनुभव है कि निर्णय प्रक्रिया में जो Silos होते हैं, उससे ज्यादा नुकसान, Implementation में जो Silos होता है, तब वो नुकसान भयंकर होता है। और Aspirational Districts ने ये साबित किया है कि Implementation में Silos खत्म होने से, संसाधनों का Optimum Utilisation होता है। Silos जब खत्म होते हैं तो 1+1, 2 नहीं बनता, Silos जब खत्‍म हो जाते हैं तब 1 और 1, 11 बन जाता है। ये सामर्थ्य, ये सामूहिक शक्ति, हमें आज Aspirational Districts में नजर आ रही है। हमारे आकांक्षी जिलों ने ये दिखाया है कि अगर हम गुड गवर्नेंस के बेसिक सिद्धांतों को फॉलो करें, तो कम संसाधनों में भी बड़े परिणाम आ सकते हैं। और इस अभियान में जिस अप्रोच के साथ काम किया गया, वो अपने आप में अभूतपूर्व है। आकांक्षी जिलों में देश की पहली अप्रोच रही- कि इन जिलों की मूलभूत समस्याओं को पहचानने पर खास काम किया गया। इसके लिए लोगों से उनकी समस्याओं के बारे में सीधे पूछा गया, उनसे जुड़ा गया। हमारी दूसरी अप्रोच रही कि - आकांक्षी जिलों के अनुभवों के आधार पर हमने कार्यशाली में निरंतर सुधार किया। हमने काम का तरीका ऐसा तय किया, जिसमें Measurable indicators का selection हो, जिसमें जिले की वर्तमान स्थिति के आकलन के साथ प्रदेश और देश की सबसे बेहतर स्थिति से तुलना हो, जिसमें प्रोग्रेस की रियल टाइम monitoring हो, जिसमें दूसरे जिलों के साथ healthy Competition हो, और बेस्ट प्रैक्टिसेस को replicate करने का उमंग हो, उत्‍साह हो, प्रयास हो। इस अभियान के दौरान तीसरी अप्रोच ये रही कि हम ऐसे गवर्नेंस reforms किए जिससे जिलों में एक प्रभावी टीम बनाने में मदद मिली। जैसे, नीति आयोग के प्रेजेंटेशन में अभी ये बात बताई गई कि ऑफिसर्स के stable tenure से नीतियों को बेहतर तरीके से लागू करने में बहुत मदद मिली। और इसके लिए मैं मुख्‍यमंत्रियों को बधाई देता हूं। उनका मैं अभिनंदन करता हूं। आप सभी तो इन अनुभवों से खुद गुजरे हुए हैं। मैंने ये बातें इसलिए दोहराईं ताकि लोगों को ये पता चल सके कि गुड गवर्नेंस का प्रभाव क्या होता है। जब हम emphasis on basics के मंत्र पर चलते हैं, तो उसके नतीजे भी मिलते हैं। और आज मैं इसमें एक और चीज जोड़ना चाहूंगा। आप सभी का प्रयास होना चाहिए कि फील्ड विजिट के लिए, inspection और night halt के लिए detailed guidelines भी बनाई जाए, एक मॉडल विकसित हो। आप देखिएगा, आप सभी को इससे कितना ज्यादा लाभ होगा।

साथियों,

आकांक्षी जिलों में मिली सफलताओं को देखते हुए, देश ने अब अपने लक्ष्यों का और विस्तार किया है। आज आज़ादी के अमृतकाल में देश का लक्ष्य है सेवाओं और सुविधाओं का शत प्रतिशत saturation! यानी, हमने अभी तक जो उपलब्धियां हासिल की हैं, उसके आगे हमें एक लंबी दूरी तय करनी है। और बड़े स्तर पर काम करना है। हमारे जिले में हर गाँव तक रोड कैसे पहुंचे, हर पात्र व्यक्ति के पास आयुष्मान भारत कार्ड कैसे पहुंचे, बैंक अकाउंट की व्‍यवस्‍था कैसे हो, कोई भी गरीब परिवार उज्ज्वला गैस कनैक्शन से वंचित न रहे, हर योग्य व्यक्ति को सरकार की बीमा का लाभ मिले, पेंशन और मकान जैसी सुविधाओं का लाभ मिले, ये हर एक जिले के लिए एक time bound target होना चाहिए। इसी तरह, हर जिले को अगले दो सालों के लिए अपना एक विज़न तय करना चाहिए। आप ऐसे कोई भी 10 काम तय कर सकते हैं, जिन्हें अगले 3 महीनों में पूरा किया जा सके, और उनसे सामान्य मानवी की ease of living बढ़े। इसी तरह, कोई 5 टास्क ऐसे तय करें जिन्हें आप आज़ादी के अमृत महोत्सव के साथ जुड़कर पूरा करें। ये काम इस ऐतिहासिक कालखंड में आपकी, आपके जिले की, जिले के लोगों की ऐतिहासिक उपलब्धियां बननी चाहिए। जिस तरह देश आकांक्षी जिलों को आगे बढ़ाने के लिए काम कर रहा है, वैसे ही जिले में आप ब्लॉक लेवेल पर अपनी प्राथमिकताएं और लक्ष्य तय कर सकते हैं। आपको जिस जिले की ज़िम्मेदारी मिली है, आप उसकी खूबियों को भी जरूर पहचानें, उनसे जुड़ें। इन खूबियों में ही जिले का potential छिपा होता है। आपने देखा है, 'वन डिस्ट्रिक, वन प्रॉडक्ट' जिले की खूबियों पर ही आधारित है। आपके लिए ये एक मिशन होना चाहिए कि अपने डिस्ट्रिक्ट को नेशनल और ग्लोबल पहचान देनी है। यानि वोकल फॉर लोकल का मंत्र आप अपने जिलों पर भी लागू करिए। इसके लिए आपको जिले के पारंपरिक प्रॉडक्ट्स को, पहचान को, स्किल्स को पहचानना होगा और वैल्यू चेन्स को मजबूत करना होगा। डिजिटल इंडिया के रूप में देश एक silent revolution का साक्षी बन रहा है। हमारा कोई भी जिला इसमें पीछे नहीं छूटना चाहिए। डिजिटल इनफ्रास्ट्रक्चर हमारे हर गाँव तक पहुंचे, सेवाओं और सुविधाओं की डोर स्टेप डिलिवरी का जरिया बने, ये बहुत जरूरी है। नीति आयोग की रिपोर्ट में जिन जिलों की प्रगति अपेक्षा से धीमी आई है, उनके DMs को, सेंट्रल प्रभारी ऑफिसर्स को विशेष प्रयास करना होगा। मैं नीति आयोग को भी कहूँगा कि आप एक ऐसा mechanism बनाए जिससे सभी जिलों के DMs के बीच रेगुलर interaction होता रहे। हर जिला एक दूसरे की बेस्ट practices को अपने यहाँ लागू कर सके। केंद्र के सभी मंत्रालय भी उन सभी challenges को document करें, जो अलग-अलग जिलों में सामने आ रहे हैं। ये भी देखें कि इसमें पीएम गतिशक्ति नेशनल मास्टर प्लान से कैसे मदद मिल सकती है।

साथियों,

आज के इस कार्यक्रम में मैं एक और चैलेंज आपके सामने रखना चाहता हूं, एक नया लक्ष्य भी देना चाहता हूं। ये चैलेंज देश के 22 राज्यों के 142 जिलों के लिए है। ये जिले विकास की दौड़ में पीछे नहीं हैं। ये aspirational district की category में नहीं हैं। ये काफी आगे निकले हुए हैं। लेकिन अनेक पैरामीटर में आगे होने के बावजूद भी एक आद दो पैरामीटर्स ऐसे हैं जिसमें वो पीछे रह गए हैं। और तभी मैंने मंत्रालयों को कहा था कि वो अपने-अपने मंत्रालय में ऐसा क्‍या-क्‍या है जो ढूंढ सकते हैं। किसी ने दस जिले ढूंढे, किसी ने चार जिले ढूंढे, तो किसी ने छ: जिले ढूंढे, ठीक है, अभी इतना आया है। जैसे कोई एक जिला है जहां बाकी सब तो बहुत अच्छा है लेकिन वहां कुपोषण की दिक्कत है। इसी तरह किसी जिले में सारे इंडीकेटर्स ठीक हैं लेकिन वो एजुकेशन में पिछड़ रहा है। सरकार के अलग-अलग मंत्रालयों ने, अलग-अलग विभागों ने ऐसे 142 जिलों की एक लिस्ट तैयार की है। जिन एक-दो पैरामीटर्स पर ये अलग-अलग 142 जिले पीछे हैं, अब वहां पर भी हमें उसी कलेक्टिव अप्रोच के साथ काम करना है, जैसे हम Aspirational Districts में करते हैं। ये सभी सरकारों के लिए, भारत सरकार, राज्य सरकार, जिला प्रशासन, जो सरकारी मशीनरी है, उसके लिए एक नया अवसर भी है, नया चैलेंज भी है। इस चैलेंज को अब हमें मिलकर पूरा करना है। इसमें मैं अपने सभी मुख्यमंत्री साथियों का भी सहयोग हमेशा मिलता रहा है, आगे भी मिलता रहेगा, मुझे पूरा विश्‍वास है।

साथियों,

अभी कोरोना का समय भी चल रहा है। कोरोना को लेकर तैयारी, उसका मैनेजमेंट, और कोरोना के बीच भी विकास की रफ्तार को बनाए रखना, इसमें भी सभी जिलों की बड़ी भूमिका है। इन जिलों में भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए भी अभी से काम होना चाहिए।

साथियों,

हमारे ऋषियों ने कहा है- ''जल बिन्दु निपातेन क्रमशः पूर्यते घट:'' अर्थात्, बूंद बूंद से ही पूरा घड़ा भरता है। इसलिए, आकांक्षी जिलों में आपका एक एक प्रयास आपके जिले को विकास के नए आयाम तक लेकर जाएगा। यहां जो सिविल सर्विसेस के साथी जुड़े हैं, उनसे मैं एक और बात याद करने को मैं कहूंगा। आप वो दिन जरूर याद करें जब आपका इस सर्विस में पहला दिन था। आप देश के लिए कितना कुछ करना चाहते थे, कितना जोश से भरे हुए थे, कितने सेवा भाव से भरे हुए थे। आज उसी जज्बे के साथ आपको फिर आगे बढ़ना है। आजादी के इस अमृतकाल में, करने के लिए, पाने के लिए बहुत कुछ है। एक-एक आकांक्षी जिले का विकास देश के सपनों को पूरा करेगा। आज़ादी के सौ साल पूरे होने पर नए भारत का जो सपना हमने देखा है, उनके पूरे होने का रास्ता हमारे इन जिलों और गाँवों से होकर ही जाता है। मुझे पूरा भरोसा है कि आप अपने प्रयासों में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे। देश जब अपने सपने पूरे करेगा, तो उसके स्वर्णिम अध्याय में एक बड़ी भूमिका आप सभी साथियों की भी होगी। इसी विश्वास के साथ, मैं सभी मुख्‍यमंत्रियों का धन्यवाद करते हुए आप सब नौजवान साथियो ने अपने-अपने जीवन में जो मेहनत की है, जो परिणाम लाए हैं, इसके लिये बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूं, धन्‍यवाद करता हूं ! आज सामने 26 जनवरी है, उस काम का भी प्रैशर होता है, जिलाधिकारियों को ज्‍यादा प्रैशर होता है। कोरोना का पिछले दो साल से आप लड़ाई के मैदान में अग्रिम पंक्‍ति में हैं। और ऐसे में शनिवार के दिन आप सबके साथ बैठने का थोड़ा ही जरा कष्‍ट दे ही रहा हूं मैं आपको, लेकिन फिर भी जिस उमंग और उत्‍साह के साथ आज आप सब जुड़े हैं, मेरे लिये खुशी की बात है। मैं आप सबको बहुत-बहुत धन्‍यवाद देता हूं ! बहुत-बहुत शुभाकामनाएं देता हूं !