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मेरा भाषण तो बाद में होने वाला है, लेकिन उसके पहले एक घोषणा करने के लिए खड़ा हुआ हूँ। प्रधानमंत्री ने थोड़े दिन पहले कुपोषण के संबंध में चिंता जताई थी। और उन्होंने कहा था कि ये दु:ख सबसे बड़ी चुनौती है, और इस चुनौती के लिए देश भर में कुछ ना कुछ प्रयास होने चाहिए। मैं प्रधानमंत्री की भावना की कद्र करता हूँ और गुजरात ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। हम एक ‘मिशन बलम् सुखम्’ योजना का आज प्रारंभ कर रहे हैं। कुपोषण के खिलाफ एक सर्वांगीण तरीके से जंग कैसे लड़े और कुपोषण से मुक्ति कैसे मिले इसके लिए वैज्ञानिक अभिगम के साथ, जनभागीदारी के साथ, लोकशिक्षण के साथ, निरंतर परीक्षण के साथ एक मिशन के रूप में गुजरात योगदान करना चाहता है। देश की समस्या है, गुजरात का बोझ कम हो यह इस ‘बलम् सुखम् मिशन’ के जरिए हम कोशिश करेंगे। आज यहाँ गाँवों में जो कुपोषित बच्चे हैं उनकी संख्या को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक बच्चे को मदद करने की योजना के अंश के रूप में प्रत्येक जिले में से हर एक प्रतिनिधि को लगभग 2 लाख रुपये का चैक आज दिया जाएगा और ये रकम इसी प्रकार से हर एक गाँव के कुपोषित बच्चों की संख्या के आधार पर 14,000 पंचायतों और 18,000 गाँव, वहाँ के सभी लोगों को ये रकम मिलने वाली है। तो इसका आज शुभारंभ कर रहे हैं। एक छोटी सी सी.डी. के द्वारा सारी जानकारी आपको पता चलेगी और आखिर में मेरे भाषण में सारी विशेष बातें मैं आपके सामने रखूंगा।

मंच पर बिराजमान सभी महानुभावों और गुजरात के गाँव गाँव से पधारे हुए सभी सरपंचश्रीओं, आप सभी का अंत:करण से स्वागत करता हूँ और आपके नेतृत्व में आपके गाँव का चौतरफा विकास हो रहा है इसके लिए मैं आपका बहुत बहुत अभिनंदन करता हूँ। पंचायती राज व्यवस्था आजाद भारत का एक महत्वपूर्ण कदम रहा है। आज से पचास साल पूर्व उस समय के नेताओं ने दूरदर्शिता के साथ सत्ता के विकेन्द्रीकरण के लिए इस पंचायती राज व्यवस्था के मॉडल को विकसित किया था। इस प्रकार सदियों से भारत में ग्राम राज्य की कल्पना हमारी जनमघूँटी में थी। हमारे यहाँ गाँव आर्थिक-सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर हो ऐसा सदियों से आयोजन रहा है। हमारी परंपरागत प्रकृति के अनुरूप, अनुकूल ऐसी इस पंचायती राज व्यवस्था ने लोकशाही को मजबूत बनाने में, सत्ता के विकेन्द्रीकरण में और व्यापक रूप से जनभागीदारी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और इसीलिए गुजरात सरकार ने पंचायती राज की स्वर्ण जयंती मनाना निर्धारित किया। पचास साल पहले इसकी शुरूआत हुई, कई उतार-चढ़ाव आए, नई व्यवस्था थी, विकसित होना था, सीखते भी गए, सुधारते भी गए और आज समग्र देश में सत्ता के विकेन्द्रीकरण की अपनी इस बात को स्वीकृति मिली है।

भी हमने एक कार्यक्रम किया, तालुका पंचायत की प्रत्येक सीट में ‘अविरत विकास यात्रा’ का कार्यक्रम किया और इस कार्यक्रम में हमारे कोई ना कोई मंत्री आए, लगभग 4100 से ज्यादा कार्यक्रम किए। इस राज्य में पिछले पचास सालों में पंचायती राज व्यवस्था में जिन्होंने भी कोई ना कोई पद प्राप्त किया था, कोई तालुका पंचायत के प्रमुख रहे होंगे, कोई जिला पंचायत के प्रमुख रहे होंगे, कोई गाँव के सरपंच रहे होंगे, बीते पचास सालों में जिन जिन लोगों ने कोई ना कोई जिम्मेदारी निभाई थी, ऐसे सभी भूतपूर्व पदाधिकारियों का सम्मान करने का राज्य सरकार ने एतिहासिक फैसला लिया। भारतीय जनता पार्टी या जनसंघ की राजनीति की यदि बात करें तो पंचायती राज व्यवस्था में भूतकाल में भाजपा का नामोनिशान नहीं था, कोई पहचान तक नहीं थी, जनसंघ तो था ही नहीं। पूरा कार्यकाल, तकरीबन 40 साल एकमात्र कांग्रेस पार्टी की विचारधारा से प्रेरित महानुभावों के हाथ में था। पर हमारे मन पंचायत राज का महत्व था, पंचायत राज मजबूत बने इसका महत्व था। और हमारी भूमिका हमेशा से यही रही है कि इस राज्य का विकास किसी एक व्यक्ति के कारण नहीं है, इस राज्य के विकास में पिछले 50 सालों में हर एक का कोई ना कोई योगदान रहा है, इसके कारण है। इस राज्य का विकास सभी के योगदान की वजह से है। इस मूल मँत्र को लेकर हमने इन 50 सालों के दौरान जो भी पदाधिकारी हो गए उनका गौरवपूर्ण सम्मान किया और मुझे यह कहते हुए आनंद हो रहा है कि बहुत ज्यादा बीमार हो उसे छोड़ कर एक भी व्यक्ति कार्यक्रम में अनुपस्थित नहीं था। तकरीबन 89,000 पदाधिकारियों का गौरव करने का, सम्मान करने का सौभाग्य इस सरकार को प्राप्त हुआ। और उन्हें भी, किसी को 30 साल के बाद याद किया होगा, किसी को 25 साल के बाद याद किया होगा, तो उनके लिए भी वह गौरव का पल था, एक आनंद का पल था।

भाइयों और बहनों, आज ये पंचायती राज व्यवस्था के 50 साल के अवसर पर फिर से एक बार आपके साथ मिलने का कार्यक्रम किया है। आपने देखा होगा कि पिछले पांच साल में कोई साल ऐसा नहीं गया है कि कम से कम दो बार सरपंचों को याद नहीं किया हो। जिस भवन में आप बैठे हो, उस भवन के निर्माण में भी हर एक गाँव का योगदान है, सरपंचों के नेतृत्व में इन गाँवों ने योगदान दिया है। ये संपत्ति आपकी है, इसके मालिक आप हो, और इसीलिए सरपंचों के लिए इस महात्मा मंदिर में आना अपने ही घर आने जैसा, पंचायत के ही किसी काम के लिए आने जैसा सहज लगने लगा है, यह कोई छोटी-मोटी सिद्धि नहीं है। नहीं तो कई बार राज्य, राज्य की जगह चलता है और गाँव, गाँव की जगह चलता है। यह राज्य गाँव को चलाता है और राज्य और गाँव दोनों मिल कर गाँव की भलाई के बारे में सोचते हैं, ऐसा अन्योन्य भक्तिभाव वाला एक नया वातावरण पैदा करने में हम सफल हुए हैं। यहाँ पर तीन सरपंचों को सुनने का मौका मिला, जिसमें पुंसरी गाँव के बारे में तो हिन्दुस्तान के अंग्रेजी अखबारों ने ढेर सारा लिखा है और भारत में एक उत्तम गाँव के रूप में, आधुनिक गाँव के रूप में लगभग इस देश के सभी अंग्रेजी अखबारों ने अपनी मुहर लगाई है। लेकिन ये तीन गाँव ही नहीं है। आनंदपुरा गाँव के भगवतीबहन को मैं सुन रहा था, कितने सारे पैरामीटर में सौ में से सौ प्रतिशत... मैं सरपंचों से विनती करना चाहता हूँ कि हमारे मंत्रियों की एक भी बात आपको माननी हो तो मानना और नहीं मानना हो तो नहीं मानना, इस मुख्यमंत्री की एक भी बात माननी हो तो मानना और नहीं माननी हो तो नहीं मानना, लेकिन कम से कम इन तीन सरपंचों ने जो कर दिखाया है, उनकी बात को मान कर अपने गाँव में हम करके दिखाएं। ये तीन सरपंचो के भाषण के बाद मुझे कुछ कहने को रहता नहीं है, अपने इतने उत्तम अनुभवों का हमारे सामने वर्णन किया है, उत्तम प्रदर्शन करके दिखाया है।

भाइयों और बहनों, समरस गाँव का लाभ अब पूरा गुजरात देख रहा है। सभी को लगता है कि गाँव का सौहार्दपूर्ण वातावरण, प्रेमपूर्ण वतावरण और सभी मिलजुल कर गाँव के विकास की बात करें, यह वातावरण खुद में एक प्रेरणा बन गया है ‘तीर्थ ग्राम’ - पांच वर्ष तक कोई कोर्ट=कचहरी नहीं हुई हो गाँव में, ऐसे गाँव को ‘तीर्थ ग्राम’..! कुछ सरपंचों ने मेरे पास आकर दर्खास्त की है कि साहब, हमारा गाँव तो इतने प्रेम के साथ जीता है, पर हमारा ‘तीर्थ ग्राम’ में नंबर नहीं आता। मैंने कहा इसका कारण क्या..? तो कहते हैं कि हमारे गाँव के पास से हाईवे जाता है और हाइवे पर कोई एक्सीडेंट होता है तो एफ.आई.आर. हमारे गाँव के पुलिस स्टेशन में लिखी जाती है और इसके कारण केस बना हो ऐसा होता है और परिणामस्वरूप हमें ‘तीर्थ ग्राम’ से बाहर रखा जाता है। सरपंचश्रीओं का यह आवेदन मैं स्वीकार करता हूँ और ऐसे किसी कारण से कोई गाँव ‘तीर्थ ग्राम’ की कैटेगरी में आने से नहीं रहेगा, क्योंकि पाँच साल तक गाँव में कोई टंटा-फसाद नहीं हुआ हो, कोई झगड़ा नहीं हुआ हो, गाँव मिल-जुल कर रहे, इस कारण से कोई कोर्ट-कचहरी नहीं हुई हो, तो ये गाँव की सबसे बड़ी घटना है और ऐसे गाँवों का ‘तीर्थ ग्राम’ के रूप में हम स्वागत करेंगे, अपना लिया जाएगा। रोड एक्सीडेंट के कारण एफ.आई.आर. हुई हो, तो उसका नुकसान उस गाँव को ना हो इसकी सूचना मैं डिपार्टमेंट को भी देता हूँ और भूतकाल में भी ऐसी भूलों के कारण रह गए हों तो इनको पश्चाद्दर्शी असर से लाभ देना चाहिए, ऐसा मेरा मत है। क्योंकि इनके गाँव के पास से रोड गुजरती है तो इसमें उनका कोई कसूर नहीं है, भाई और रोड पर कोई एक्सीडेंट हो जाए, और इसके लिए कोई केस बनता है तो इसके कारण वह गाँव ‘तीर्थ ग्राम’ बनने से रह जाता हो तो अपने नियम को हम सुधारेंगे और ऐसे गाँवों को भी ‘तीर्थ ग्राम’ के दर्जे में लिए जाएंगे और ‘तीर्थ ग्राम’ के रूप में इनको जो कोई भी मिलने वाली रकम होगी, उस ईनाम की रकम पश्चाद्दर्शी असर से प्रदान की जाएगी ऐसी सरपंचों की इस मांग को मैं स्वीकार करता हूँ।

भाईयों और बहनों, ज्योतिग्राम योजना जब आई तो लोगों को लगता था कि वाह, ये शाम को खाने के वक्त बिजली नहीं मिलती थी,  ये मोदी साहब ने अच्छा काम किया, कम से कम शाम को खाना खाते समय बिजली तो मिलने लगी..! शुरूआत में लोगों के भाव इतने ही थे। पर आज मुझे कहते हुए गर्व महसूस होता है कि गाँव में 24 घंटे बिजली आने के कारण समग्र गाँव के जीवन में, क्वालिटी ऑफ लाइफ में एक बड़ा बदलाव आया है। इतना ही नहीं, गाँव के अंदर छोटा-मोटा मूल्यवृद्धि वाला प्रोसेसिंग करना हो तो लोग अब गाँव में ही करने लगे हैं। यहाँ हमारे गांधीनगर जिले का ईसनपुर के पास का एक गाँव हरी मिर्च की खेती करता है। मिर्च ज्यादा पकती है तो मिर्ची का भाव घट जाता है, मिर्ची कम पकती है तो किसानों को पूरे पैसे नहीं मिलते, इसलिए दोनों तरफ से किसानों को ही मार पड़ती है। एक बार बहुत ज्यादा मिर्ची हुई और पूरे गाँव की सभी मिर्च बेचो तो गाँव की आय तीन लाख रुपये जितनी होती थी। अब तीन लाख रुपये में पूरा गाँव एक साल तक गुजरा कैसे करे? उस गाँव के दो-तीन अग्रणियों ने विचार किया कि भाई अब तो ज्योतिग्राम आया है, हम कुछ सोच सकते हैं। ऐसा करो, हरी मिर्च को बेचना नहीं है, इनको लाल करते हैं। लाल करके उनका पाउडर बनाएं, चक्की लाएं, ज्योतिग्राम आया है तो चक्की लाकर मिर्ची पीसेंगे और पैकेट में पैक करके मिर्ची बेचनी चालू करते हैं। और लाल मिर्च बेचने के कारण जिस हरी मिर्च का तीन लाख मिलता था, उस गाँव ने उतनी ही लाल मिर्च को बेचा, 18 लाख रूपये की आमदनी हुई..! तब गाँव को समझ आया कि ज्योतिग्राम योजना के आने से हमारे गाँव के विकास की छोटी-छोटी ऐसी कई प्रक्रियाओं... अब कितने सारे लोग सूरत में झोपड़पट्टी में जीते थे और हीरे घिसते थे। अब हीरे की मशीन ही गाँव में ले गए। तो बहन भी जब टाइम मिलता है तो हीरा घिसती है, भाई भी हीरा घिसता है, मां भी हीरा घिसती है और हर हफ्ते इनकी छोटी-छोटी पुडिय़ा बना कर के सूरत जाकर दे आते हैं और 25-50 हजार रुपये मजदूरी के ले आते हैं। ज्योतिग्राम आने के कारण एक प्रकार से उद्योगों का भी विकेन्द्रीकरण हुआ। विभिन्न आद्यौगिक प्रवृतियों का गाँव में विकास हुआ। आज हिन्दुस्तान में, आपको आश्चर्य होगा, अभी जब 19 राज्यों में अंधेरा हो गया था, 60 करोड लोग अंधेरे में 48 घंटे तक अटक गए थे, तब पूरी दुनिया में गुजरात की ज्योतिग्राम योजना के चर्चे हो रहे थे। एक मात्र गुजरात था जो जगमगा रहा था। ऐसे हम पिछले पाँच साल से गला फाड़-फाड़ कर ज्योतिग्राम-ज्योतिग्राम कह रहे थे, गुजरात में 24 घंटा बिजली है ये बात कर रहे थे, तो किसी के गले नहीं उतरती थी, लेकिन जब पूरे देश में अंधकार हुआ तब अपना उजाला दिखा..! पूरे देश को पता चला, पूरी दुनिया को पता चला।

भाईयों और बहनों, इसका दूसरा बड़ा लाभ मिला है वह शिक्षा में मिला है। मुझे याद है, एक बार हमारी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों के साथ मीटिंग थी। एक राज्य का जो रिपोर्टिंग था उसमें केसों की पेन्डेंसी के कारणों में एक कारण ऐसा दिया गया कि भाई, हमारे यहाँ कोर्ट के मकान ऐसे हैं कि अंदर सूरज की रोशनी नहीं होती है और हफ्ते में चार-छह घंटे के लिए बिजली उपलब्ध होती है। इतने समय में जितने केस चल सकते हैं, चलाते हैं। बाकी समय में अंधेरे के कारण केस चल नहीं सकते और ये हमारी मजबूरी है। एक राज्य ने इस इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में सुप्रीम कोर्ट के जज की हाजिरी में हमारी मीटिंग में की हुई यह बात है। अपने यहाँ गुजरात में 24 घंटे बिजली होने के कारण स्कूलों में कम्प्यूटर चलने लगे, ब्राडबैंड कनेक्टिविटी के कारण इंटरनेट चालू हो गया, हम लांग डिस्टेन्स एज्यूकेशन देने लगे, जो अच्छी से अच्छी शिक्षा शहर के बच्चों को मिलती है वही लांग डिस्टेन्स एज्यूकेशन सैटेलाइट के जरिए हम गाँवों में भी देने लगे हैं। एक प्रकार से जीवन में बदलाव आया, परिवर्तन आया और इस परिवर्तन के मूल में ये छोटी-मोटी विकास की व्यवस्थाएं हैं।

मने निर्मल गाँव किया। आज भी दो बातें मुझे पूरी करनी है भाइयों, और सभी सरपंचों के पास से मुझे इसका आश्वासन चाहिए, आश्वासन दोगे, भाईयों..? जरा जोर से बोलो, दूसरे हॉल में बैठे हैं वे भी बोलें, क्योंकि आज इस महात्मा मंदिर के तीन ऐसे बड़े हॉल और एक छोटा आधा, ऐसे साढ़े-तीन हॉल में इतनी भीड़ है। मैं सभी में जाकर राम-राम करता हुआ मंच पर आया हूँ। सभी हॉल में जाकर आया हूँ, सभी सरपंचों को मिलकर आया हूँ। अब हमें तय करना है, हमारे गाँव में कोई घर ऐसा नहीं हो जिसमें शौचालय ना हो, अब ऐसा नहीं चल सकता। हमारी बहन-बेटीयों को खुले में प्राकृतिक हाजत के लिए जाना पड़े, ये हमारे गुजरात को शोभा नहीं देता। इस काम के लिए सरकार पैसा देती है, पर गाँव में थोड़ा करवा लेना पड़े। सरपंच तय करे, क्योंकि निर्मल गाँव की पहली शर्त ही यह है कि हमारे गाँव में हर एक घर में शौचालय होना चाहिए। मुझे यह सपना पूरा करना है और आने वाले दिनों में इस काम को सम्पन्न करना है। ये काम मैं तभी सफलतापूर्वक पूरा कर सकता हूँ यदि मुझे मेरे 18,000 गाँवों का सहयोग हो, मेरे 14,000 सरपंचों का मुझे समर्थन हो तो ही संभव हो सकता है और इसके लिए आपको मुझे आज वचन देना है कि आपके गाँव में अब किसी बहन-बेटी को कुदरती हाजत के लिए खुले में जाना नहीं पड़ेगा, घरों में शौचालय का काम हम पूरा करेंगे। और सरपंचों मेरे शब्द लिख कर रखो, मैं एडवांस में पैसा देने को तैयार हूँ।

दूसरा एक काम मुझे करना है। अभी हमने बहुत बड़े पैमाने पर घर देने का काम किया। 40 साल में 10 लाख घर बने थे। उसमें भी खेत मजदूरों के घर तो ऐसे बने थे कि बकरी बंधी हो तो बकरी दीवार के साथ घर तोड़ कर बाहर निकल जाती है, बकरी दीवार तोड़ दे, ऐसे पराक्रम किए है़ं..! इसलिए इस समय मैंने तय किया कि खेत मजदूरों के मौजूदा घरों को भी नए सिरे से पक्के बनाए जाएंगे। हजारों खेत मजदूरों के मकान हम नए सिरे से बनाने वाले हैं। पर भाइयों-बहनों, 10 लाख मकान 40 साल में बने थे, हमने बीते 10 सालों में 16 लाख मकान बनाए और ये एक महिने में 6 लाख मकान बनाने के खातिर पहले किश्त के 21,000 रूपये का चेक इनके खाते में जमा करवा दिए हैं, यानि कुल 22 लाख मकान। 40 साल में 10 लाख और 10 साल में 22 लाख मकान..! हमारी काम करने की गति कितनी तेज है इसका अंदाजा लगा लो। हालांकि अभी भी गाँव में दो-पाँच, दो-पाँच घर ऐसे हैं, जो घर होने के कारण सरकार की व्याख्या में नहीं आते हैं। क्योंकि वे बेघर नहीं हैं, बेघर होते तो सरकार इनकी मदद करे, सरकार के पैसे से इनका घर बन जाए। पर जिनका कच्चा, टूटा-फूटा, कंगाल घर हो तो दफ्तर में इसका रिकार्ड ही नहीं होता, इसका क्या..? भाईयों-बहनों, सरपंचश्रीओं, मेरी एक विनती स्वीकार करो। आप आपके गाँव में ऐसे कच्चे घर हों, इनका फोटो निकाल लो और जिनका घर हो, जो उस घर में रहता हो, उसका भी फोटो खींच लो और तलाटी या ग्राम-सेवक के साथ मिलकर इसकी लिस्ट बना लो कि गाँव में पाँच घर कच्चे हैं या तीन घर कच्चे हैं, अभी इस घर में कौन रह रहा है, कितने सालों से रह रहा है, ये सब आप तैयार कर दो। लाखों घर हो तो लाखों, पर मुझे इन सभी को पक्के मकान करके देने हैं। और ये संभव है, हो सकता है, सरपंच थोड़ा इनिशिएटिव लें। अब हमारे गाँव में कच्चे घर क्यों हो, भाई? जिसके पास कुछ नहीं था उसे घर मिल गया, तो कच्चा घर गाँव में नहीं होना चाहिए, पक्का घर उसे मिलना चाहिए। 25 लाख से ज्यादा घर... और 2011 का सेन्सस और दूसरा 2012 का सोश्यो-इकॉनोमिक सेन्सस जो हुआ है, इसके आधार पर आंकड़ों को लेकर मैं इस काम को परिपूर्ण करना चाहता हूँ, लेकिन ये काम सच्चा और अच्छा करने के लिए मुझे सरपंचश्रीओं की मदद चाहिए।

दूसरा एक ‘मिशन बलम् सुखम्’, यह ‘मिशन बलम् सुखम्’ जो है इसकी आज शुरूआत की है। हमारे गाँव में पाँच या दस बच्चे कुपोषण से पीडि़त हों, ज्यादा बच्चे कुपोषण से पीडि़त हों, तो उसके लिए आंगनवाड़ी बहनों को ट्रेनिंग दी है, आशा वर्करों को ट्रेनिंग दी है, और इस प्रकार की और अच्छी फिल्में बना कर के गाँव-गाँव में लोकशिक्षा का अभियान चलाने वाले हैं, छात्राओं को कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में सहयोगी बनाने वाले है, बारहवीं कक्षा से ज्यादा पढ़ी लड़कियों को इससे जोड़ने वाले हैं। दूसरा, दादीमाँओं को जोड़ने वाले हैं, क्योंकि घर के अंदर ज्यादातर दादीमाँ का रोल बहुत बड़ा होता है। दादीमाँ कई बार ऐसा मानती हैं कि बच्चा छोटा है इसे ये खिला दो, वो खिला दो और आखिरकार उसके स्वास्थ्य की जो चिंता करनी चाहिए वो नहीं होती है, इसलिए ऐसा भी तय किया है कि दादीमाँओं के भी क्लास लें। और ये जो नई ब्याहता बहुएं हैं, जिन्हें बच्चों को पालने का बहुत ज्यादा ज्ञान नहीं होता है, यदि दादीमाँ घर में हो तो मदद कर सकती है और उसे समझा सकती है।  तो एक तरह से सामाजिक क्रांति के लिए एक बड़ा प्रयास शुरू करने का तय किया है और ‘बलम् सुखम्’ के द्वारा आर्थिक मदद करके भी प्रति बालक 40 रूपया जितनी रकम खर्च कर के उन छोटे-छोटे बच्चों को कुपोषण के सामने टिकने के लिए, लड़ने के लिए, कुपोषण से मुक्त होने के लिए जो जो आवश्यकता हो उसकी पूर्ति हो सके और तकरीबन तीन एक हजार की बस्ती का गाँव हो, और कुपोषण वाले बच्चों की संख्या यदि ज्यादा हो तो लगभग एक-एक, दो-दो लाख रुपया प्रत्येक गाँव को इस ‘मिशन बलम् सुखम्’ के अंतर्गत मिल सकता है और चार प्रकार के स्तर बनाएं हैं। एक तो ऐसी व्यवस्था की है कि कोई बच्चा अति कुपोषित हो तो उसे सरकारी व्यवस्था में ले जाना, पन्द्रह दिन पूरी तरह से जिस तरह हॉस्पिटल में रखते हैं उस तरह से इस बालक में फिर चेतना लाने के लिए जो कोई प्रयास करना पड़े, इसके लिए स्पेशल ट्रैन्ड लोग रखे जाएंगे, पर गुजरात में से कुपोषण से मुक्ति के लिए आने वाले दिनों में मुझे एक अभियान चलाना है। और इसके लिए जागृति बड़ी बात है, इसमें रुपया बड़ी बात नहीं है, जागृति ही बड़ा काम है। क्योंकि कई बार बिना हाथ धोए खाना खाने के कारण भी कई बार यह महामारी आ सकती है। अगर बच्चे को तीन दिनों तक दस्त हो जाए तो आपने छह महीने लगाएं हों उसका वजन बढ़ाने में, और ऐसे हँसता खेलता किया हो, लेकिन तीन दिनों में बिल्कुल ढीला-ढाला हो जाता है। छोटी-छोटी बातें हैं, इन छोटी-छोटी बातों पर भी ध्यान देने के बारे में हमने सोचा है और इसमें आप लोगों का सहयोग चाहिए।

दूसरी एक बात, सरपंचश्रीओं का काम अब बढ़ता जा रहा है। पहले तो सरपंच मतलब गाँव का एक प्रतिष्ठित व्यक्ति, पाँच वर्ष में कभी एकाध लाख रूपया आए तो आए, गाँव जैसा हो वैसा..! आज तो सरकारी अधिकारियों का काफिला आता रहता है, गाँवों में आपने देखा, बैंक के अंदर 50-50, 60-60 लाख रूपये पड़े होते हैं, ये सरपंच बता रहे थे..! अभी मुझे एक सरपंच मिले, मुझे कहा कि हमें इनाम के तौर पर जितने पैसे मिले हैं, वे सभी हमने बैंक में फिक्स डिपोजिट कर दिए हैं, और उसके ब्याज में से सफाई का कान्ट्रेक्ट दे दिया है। पूरे गाँव की सफाई, जैसे राष्ट्रपति भवन की सफाई बाहर से करवाते हैं, ऐेसे ही ये लोग गाँव की पूरी सफाई बाहर से करवाते हैं..! आप सोचिए कि यदि उत्साह और उमंग हो तो किस तरह से काम हो सकता है इसका ये जीता जागता उदाहरण है। और इस स्थिति को देखते हुए सरपंचश्रीओं के तहत भी कुछ खर्च का प्रावधान करने की जरूरत लगती है। सरपंचों को भी कई बार खुद की जेब से खर्च करने पड़ते हैं, मेहमान आते हैं तो प्रबंध करना पड़ता है, उनके पास कोइ व्यवस्था नहीं होती है और इसलिए सरकार ने वार्षिक 10,000 रूपए सरपंचों के हाथों में देने का निर्णय लिया है। ये राशि सरपंच अपने स्वविवेक से खर्च कर सकते हैं और गाँव के विकास में सरपंच को कोई मुश्किल ना हो इस पर ध्यान देने का हमारा पूरा प्रयास रहेगा। आप आज इस सरपंच सम्मेलन में आए, एक नए विश्वास के साथ ग्रामीण विकास के सपने को लेकर हम आगे बढ़ें।

भाइयों और बहनों, बदकिस्मती ऐसी है कि अभी कोई भी कार्यक्रम करो, कुछ लोग इसमें चुनाव को ही देखते हैं। यह बारह महीने में मैं तीसरी बार सरपंचों से मिल रहा हूँ, भाई। और यदि चुनाव ही ध्यान में होता तो मुझे इन छोटे-छोटे बच्चों के लिए ‘बलम् सुखम्’ कार्यक्रम करने की जल्दी नहीं होती, ये कोई वोट देने जाने वाले नहीं हैं। इन छोटे-छोटे बच्चों के आरोग्य की चिंता इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि मुझे गुजरात के आने वाले कल कि चिंता है। भाईयो-बहनों, हमारी हर बात को चुनावी तराजू में तोलने की आदत समाज को बहुत नुकसान करती है। अरे, चुनाव तो एक बायप्रोडक्ट है। अच्छा काम जिसने किया है उसे जनता अब अच्छी तरह पहचानती है। प्रजा समझती है कि क्या सही है और क्या गलत, और उसीके आधार पर जनता अपना निर्णय लेती है। और इसलिए आने वाले दिनों में कैसे भी उत्तेजना हो, हमें अपना काम शांत चित्त से, सामंजस्यपूर्ण वातावरण में, एकता के वातावरण में, कहीं भी कोई तनाव पैदा ना हो इस तरीके से जैसे बीते दस सालों में विकास की यात्रा को आगे बढ़ाई है, ऐसे ही बढ़ाते रहें।

भाइयों और बहनों, यहाँ पर मुझे इस बात के लिए अभिनंदन दिए गए कि 4000 दिनों तक अखंड रूप में, अनवरत रूप से मुख्यमंत्री पद पर कार्य करने का मुझे मौका मिला। गुजरात में पहले कभी भी इतने लंबे समय तक राजनैतिक स्थिरता नहीं रही है। दो साल, ढाई साल होते ही सब कुछ हिलने लगे..! लेकिन राजकीय स्थिरता के कारण नीतियों के अंदर लगातार हिम्मत भरे निर्णय करने की एक ताकत आई, सरकारी तंत्र को पूरी तरह से लोग उन्मुख शासन बनाने में सफलता प्राप्त हुई और इसके परिणामस्वरूप... जिनको देखना ही नहीं है उनके लिए हमें समय बर्बाद करने की जरूरत नहीं है, जिनको सुनना ही नहीं है उनके कान में ड्रिलिंग करके कुछ सुनाने के लिए हमें मेहनत करने की जरूरत नहीं है, जिनको देखना है उनको आसानी से विकास दिखता है। ‘गुजरात मतलब विकास, विकास मतलब गुजरात’, ये पूरे विश्व में एक स्वीकृत बात बन गई है। पर इसका यश किसी नरेन्द्र मोदी को नहीं जाता है। ये 4000 दिनों में गुजरात ने जो विकास की ऊचांइयों को प्राप्त किया है इसका श्रेय गुजरात के मेरे छह करोड भाईयो-बहनों को जाता है, मेरी सरकार में बैठे मेरे साथी, छह लाख कर्मयोगी भाइयों-बहनों, इनकी प्रजालक्षी प्रवृत्ति, प्रजालक्षी काम, इनको श्रेय जाता है और कुदरत की भी अपने ऊपर कृपा रही है, कुदरत का भी जितना आभार माने उतना कम है। इस पूरी प्रगति की यात्रा को हमें और आगे बढ़ाना है। मैं सभी सरपंचों को कहना चाहता हूँ कि भले ही गुजरात की इतनी वाह-वाही हो रही हो, आपको भी संतोष होता होगा कि गाँव में कभी सी.सी. रोड कहाँ थे, गाँव में कभी गटर का विचार कहाँ था, गाँव में कभी बिजली कहाँ देखी थी, गाँव में कभी कम्प्यूटर कहाँ से हो सकते हैं, गाँव में कभी ‘108’ दौड़ी आए ऐसा कैसे हो...? मोदी साहब ने बहुत अच्छा किया, ऐसा आपको लगता होगा। लेकिन आपको भले ही संतोष हो, पर मुझे अभी संतोष नहीं है। ये जो कुछ भी हुआ है ये सब तो पहले हो जाना चाहिए था, पर हुआ नहीं और जो ये गड्ढे रह गए थे, उन गड्ढों को भरने का काम किया है। ये तो मैंने पुराने गड्ढे भरे हैं, गुजरात की दिव्य और भव्य इमारत बनाने की शुरूआत तो अभी इस जनवरी से करने वाला हूँ। इस जनवरी में आपके आदेश से एक भव्य और दिव्य गुजरात का निर्माण करना है और इसके लिए मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए। इस दस वर्ष के गड्ढे भरने में इतना संतोष हुआ, तो भव्य ईमारत कैसा संतोष देगी इसका अंदाजा हम कर सकते हैं।

भाइयों और बहनों, बाकी सभी वाद-विवाद हो गए दुनिया में, ये वाद आ गया, वो वाद आ गया, ढींकणा वाद आ गया, फलाना वाद आ गया..! अनुभव ये कहता है कि भारत का भला करना हो तो एक ही वाद काम में आने वाला है और इस वाद का नाम है ‘विकास वाद’। अंत्योदय की सेवा, वंचितों का कल्याण, विकास की यात्रा में सभी को भागीदार बनाना, ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय, सर्वे अपि संतुषिजन, सर्वे अपि सुखिन: संतु, सर्वे संतु निरामया...’, इस कल्पना को साकार करने का प्रयास। सभी का भला हो, सभी सुखी हो, सभी को आरोग्य मिले, यह ‘सबका साथ, सबका विकास’ इस मंत्र ही अपने काम आया है, इस मंत्र को हमें आगे बढ़ाना है और हमारे गुजरात को और नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए हम सब साथ मिल कर काम करें, इसी प्रार्थना के साथ, आप आए, 4000 दिनों के संयोग से आज आपका आशीर्वाद मिला और गुजरात की पंचायती राज व्यवस्था... और आपको मेरी बिनती है कि आप भी आपके गाँव में पंचायती राज व्यवस्था की 50 वर्ष की, आपकी कल्पना के अनुसार कोई ना कोई उत्सव मनाओ। लोकशिक्षण का काम करना चाहिए, बच्चों को बुला कर उनको पंचायती राज के बारे में समझाना चाहिए। ये पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, ये प्रजातांत्रिक प्रक्रिया निरंतर चलती रहनी चाहिए। और पंचायती राज व्यवस्था के 50 वर्ष मनाने के चार-छह महीने अभी भी हमारे पास हैं, इसका अधिकतम लाभ लेकर पंचायती राज व्यवस्था में ट्रांसपेरेंसी कैसे आए, जन भागीदारी कैसे बढ़े, जन शिक्षा को बल कैसे मिले, इसके ऊपर आप ध्यान केन्द्रित करोगे ऐसी अपेक्षा के साथ आप सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएं देता हूँ।

य जय गरवी गुजरात...!!

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Government of India to provide free vaccine to all Indian citizens above 18 years of age: PM Modi
June 07, 2021
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Government of India to provide free vaccine to all Indian citizens above 18 years of age
25 per cent vaccination that was with states will now be undertaken by Government of India: PM
Government of India will buy 75 per cent of the total production of the vaccine producers and provide to the states free of cost: PM
Pradhan Mantri Garib Kalyan Anna Yojna extended till Deepawali: PM
Till November, 80 crore people will continue to get free food grain every month: PM
Corona, Worst Calamity of last hundred years: PM
Supply of vaccine is to increase in coming days: PM
PM informs about development progress of new vaccines
Vaccines for children and Nasal Vaccine under trial: PM
Those creating apprehensions  about vaccination are playing with the lives of people: PM

मेरे प्यारे देशवासियों, नमस्कार! कोरोना की दूसरी वेव से हम भारतवासियों की लड़ाई जारी है।  दुनिया के अनेक देशों की तरह, भारत भी इस लड़ाई के दौरान बहुत बड़ी पीड़ा से गुजरा है। हममें से कई लोगों ने अपने परिजनों को, अपने परिचितों को खोया है। ऐसे सभी परिवारों के साथ मेरी पूरी संवेदनाएं हैं।

साथियों,

बीते सौ वर्षों में आई ये सबसे बड़ी महामारी है, त्रासदी है। इस तरह की महामारी आधुनिक विश्व ने न देखी थी, न अनुभव की थी। इतनी बड़ी वैश्विक महामारी से हमारा देश कई मोर्चों पर एक साथ लड़ा है। कोविड अस्पताल बनाने से लेकर ICU बेड्स की संख्या बढ़ानी हो, भारत में वेंटिलेटर बनाने से लेकर टेस्टिंग लैब्स का एक बहुत बड़ा नेटवर्क तैयार करना हो, कोविड से लड़ने के लिए बीते सवा साल में ही देश में एक नया हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया है। सेकेंड वेव के दौरान अप्रैल और मई के महीने में भारत में मेडिकल ऑक्सीजन की डिमांड अकल्पनीय रूप से बढ़ गई थी। भारत के इतिहास में कभी भी इतनी मात्रा में मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत कभी भी महसूस नहीं की गई। इस जरूरत को पूरा करने के लिए युद्धस्तर पर काम किया गया। सरकार के सभी तंत्र लगे। ऑक्सीजन रेल चलाई गई, एयरफोर्स के विमानों को लगाया गया, नौसेना को लगाया गया। बहुत ही कम समय में लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन के प्रॉडक्शन को 10 गुना से ज्यादा बढ़ाया गया। दुनिया के हर कोने से, जहां कही से भी, जो कुछ भी उपलब्ध हो सकता था उसको प्राप्त करने का भरसक प्रयास  किया गया, लाया गया। इसी तरह ज़रूरी दवाओं के production को कई गुना बढ़ाया गया, विदेशों में जहां भी दवाइयां उपलब्ध हों, वहां से उन्हें लाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी गई।

साथियों,

कोरोना जैसे अदृश्य और रूप बदलने वाले दुश्मन के खिलाफ लड़ाई में सबसे प्रभावी हथियार, कोविड प्रोटोकॉल है, मास्क, दो गज की दूरी और बाकी सारी सावधानियां उसका पालन ही है। इस लड़ाई में वैक्सीन हमारे लिए सुरक्षा कवच की तरह है। आज पूरे विश्व में वैक्सीन के लिए जो मांग है, उसकी तुलना में उत्पादन करने वाले देश और वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां बहुत कम हैं, इनी गिनी है। कल्पना करिए कि अभी हमारे पास भारत में बनी वैक्सीन नहीं होती तो आज भारत जैसे विशाल देश में क्या होता?  आप पिछले 50-60 साल का इतिहास देखेंगे तो पता चलेगा कि भारत को विदेशों से वैक्सीन प्राप्त करने में दशकों लग जाते थे। विदेशों में वैक्सीन का काम पूरा हो जाता था तब भी हमारे देश में वैक्सीनेशन का काम शुरू भी नहीं हो पाता था। पोलियो की वैक्सीन हो, Smallpox जहां गांव में हम इसको चेचक कहते हैं। चेचक की  वैक्सीन हो, हेपिटाइटिस बी की वैक्सीन हो, इनके लिए देशवासियों  ने दशकों तक इंतज़ार किया था। जब 2014 में देशवासियों ने हमें सेवा का अवसर दिया तो भारत में वैक्सीनेशन का कवरेज, 2014 में भारत में वैक्सीनेशन का कवरेज सिर्फ 60 प्रतिशत के ही आसपास था। और हमारी दृष्टि में ये बहुत चिंता की बात थी। जिस रफ्तार से भारत का टीकाकरण कार्यक्रम चल रहा था, उस रफ्तार से, देश को शत प्रतिशत टीकाकरण कवरेज का लक्ष्य हासिल करने में करीब-करीब 40 साल लग जाते। हमने इस समस्या के समाधान के लिए मिशन इंद्रधनुष को लॉन्च किया। हमने तय किया कि मिशन इंद्रधनुष के माध्यम से युद्ध स्तर पर वैक्सीनेशन किया जाएगा और देश में जिसको भी वैक्सीन की जरूरत है उसे वैक्सीन देने का प्रयास होगा। हमने मिशन मोड में काम किया, और सिर्फ 5-6 साल में ही वैक्सीनेशन कवरेज 60 प्रतिशत से बढ़कर 90 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गई। 60 से 90,  यानि हमने वैक्सीनेशन की स्पीड भी  बढ़ाई और दायरा भी बढ़ाया।

 हमने बच्चों को कई जानलेवा बीमारियों से बचाने के लिए कई नए टीकों को भी भारत के टीकाकरण अभियान का हिस्सा बना दिया। हमने ये इसलिए किया, क्योंकि हमें हमारे देश के बच्चों की चिंता थी, गरीब की चिंता थी, गरीब के उन बच्चों की चिंता थी जिन्हें कभी टीका लग ही नहीं पाता था। हम शत प्रतिशत टीकाकरण कवरेज की तरफ बढ़ रहे थे कि कोरोना वायरस ने हमें घेर लिया। देश ही नहीं, दुनिया के सामने फिर पुरानी आशंकाएं घिरने लगीं कि अब भारत कैसे इतनी बड़ी आबादी को बचा पाएगा? लेकिन साथियों,जब नीयत साफ होती है, नीति स्पष्ट होती है, निरंतर परिश्रम होता है, तो नतीजे भी मिलते हैं। हर आशंका को दरकिनार करके भारत ने एक साल के भीतर ही एक नहीं बल्कि दो 'मेड इन इंडिया' वैक्सीन्स लॉन्च कर दीं। हमारे देश ने, देश के वैज्ञानिकों ने ये दिखा दिया कि भारत बड़े बड़े देशों से पीछे नहीं है। आज जब मैं आपसे बात कर रहा हूं तो देश में 23 करोड़ से ज्यादा वैक्सीन की डोज़ दी जा चुकी हैं।

साथियों,

हमारे यहाँ कहा जाता है- विश्वासेन सिद्धि: अर्थात, हमारे प्रयासों में हमें सफलता तब मिलती है, जब हमें स्वयं पर विश्वास होता है। हमें पूरा विश्वास था कि हमारे वैज्ञानिक बहुत ही कम समय में वैक्सीन बनाने में सफलता हासिल कर लेंगे। इसी विश्वास के चलते जब हमारे वैज्ञानिक अपना रिसर्च वर्क कर ही रहे थे तभी हमने लॉजिस्टिक्स और दूसरी तैयारियां शुरू कर दीं थीं। आप सब भली-भांति जानते हैं कि पिछले साल यानि एक साल पहले, पिछले साल अप्रैल में, जब कोरोना के कुछ ही हजार केस थे, उसी समय वैक्सीन टास्क फोर्स का गठन कर दिया गया था। भारत में, भारत के लिए वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को सरकार ने हर तरह से सपोर्ट किया। वैक्सीन निर्माताओं को क्लिनिकल ट्रायल में मदद की गई, रिसर्च और डवलपमेंट के लिए ज़रूरी फंड दिया गया, हर स्तर पर सरकार उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चली। 

आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत मिशन कोविड सुरक्षा के माध्यम से भी उन्हें हज़ारों करोड़ रुपए उपलब्ध कराए गये। पिछले काफी समय से देश लगातार जो प्रयास और परिश्रम कर रहा है, उससे आने वाले दिनों में वैक्सीन की सप्लाई और भी ज्यादा बढ़ने वाली है। आज देश में 7 कंपनियाँ, विभिन्न प्रकार की वैक्सीन का प्रॉडक्शन कर रही हैं। तीन और वैक्सीन का ट्रायल भी एडवांस स्टेज पर चल रहा है। वैक्सीन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए दूसरे देशों की कंपनियों से भी वैक्सीन खरीदने की प्रक्रिया को तेज किया गया है। इधर हाल के दिनों में, कुछ एक्सपर्ट्स द्वारा हमारे बच्चों को लेकर भी चिंता जताई गई है। इस दिशा में भी 2 वैक्सीन्स का ट्रायल तेजी से चल रहा है। इसके अलावा अभी देश में एक 'नेज़ल' वैक्सीन पर भी रिसर्च जारी है। इसे सिरिन्ज से न देकर नाक में स्प्रे किया जाएगा। देश को अगर निकट भविष्य में इस वैक्सीन पर सफलता मिलती है तो इससे भारत के वैक्सीन अभियान में और ज्यादा तेजी आएगी।

साथियों,

इतने कम समय में वैक्सीन बनाना, अपने आप में पूरी मानवता के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इसकी अपनी सीमाएं भी हैं। वैक्सीन बनने के बाद भी दुनिया के बहुत कम देशों में वैक्सीनेशन प्रारंभ हुआ, और ज्यादातर समृद्ध देशों में ही शुरू हुआ। WHO ने वैक्सीनेशन को लेकर गाइडलाइंस दीं। वैज्ञानिकों ने वैक्सीनेशन की रूप रेखा रखी। और भारत ने भी जो अन्य देशों की best practices थी , विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक  थे, उसी आधार पर चरणबद्ध तरीके से वैक्सीनेशन करना तय किया। केंद्र सरकार ने मुख्यमंत्रियों के साथ हुई अनेकों बैठकों से जो सुझाव मिले, संसद के विभिन्न दलों के साथियों द्वारा जो सुझाव मिले, उसका भी पूरा ध्यान रखा। इसके बाद ही ये तय हुआ कि जिन्हें कोरोना से ज्यादा खतरा है, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। इसलिए ही, हेल्थ वर्कर्स, फ्रंटलाइन वर्कर्स, 60 वर्ष की आयु से ज्यादा के नागरिक, बीमारियों से ग्रसित 45 वर्ष से ज्यादा आयु के नागरिक, इन सभी को वैक्सीन पहले लगनी शुरू हुई। आप कल्पना कर सकते हैं कि अगर कोरोना की दूसरी वेव से पहले हमारे फ्रंटलाइन वर्कर्स को वैक्सीन नहीं लगी होती तो क्या होता? सोचिए, हमारे डॉक्टर्स, नर्सिंग स्टाफ को वैक्सीन ना लगी तो क्या होता? अस्पतालों में सफाई करने वाले हमारे भाई-बहनों को, एंबुलेंस के हमारे ड्राइवर्स भाई - बहनों को वैक्सीन ना लगी होती तो क्या होता? ज्यादा से ज्यादा हेल्थ वर्कर्स का वैक्सीनेशन होने की वजह से ही वो निश्चिंत होकर दूसरों की सेवा में लग पाए, लाखों देशवासियों का जीवन बचा पाए।

लेकिन देश में कम होते कोरोना के मामलों के बीच, केंद्र सरकार के सामने अलग-अलग सुझाव भी आने लगे, भिन्न-भिन्न मांगे होने लगीं। पूछा जाने लगा, सब कुछ भारत सरकार ही क्यों तय कर रही है? राज्य सरकारों को छूट क्यों नहीं दी जा रही? राज्य सरकारों को लॉकडाउन की छूट क्यों नहीं मिल रही? One Size Does Not Fit All जैसी बातें भी कही गईं। दलील ये दी गई कि संविधान में चूंकि Health-आरोग्य, प्रमुख रूप से राज्य का विषय है, इसलिए अच्छा है कि ये सब राज्य ही करें। इसलिए इस दिशा में एक शुरूआत की गई। भारत सरकार ने एक बृहद गाइडलाइन बनाकर राज्यों को दी ताकि राज्य अपनी आवश्यकता और सुविधा के अनुसार काम कर सकें। स्थानीय स्तर पर कोरोना कर्फ्यू लगाना हो, माइक्रो कन्टेनमेंट जोन बनाना हो, इलाज से जुड़ी व्यवस्थाएं हो, भारत सरकार ने राज्यों की इन मांगों को स्वीकार किया।

साथियों,

इस साल 16 जनवरी से शुरू होकर अप्रैल महीने के अंत तक, भारत का वैक्सीनेशन कार्यक्रम मुख्यत: केंद्र सरकार की देखरेख में ही चला। सभी को मुफ्त वैक्सीन लगाने के मार्ग पर देश आगे बढ़ रहा था। देश के नागरिक भी, अनुशासन का पालन करते हुए, अपनी बारी आने पर वैक्सीन लगवा रहे थे। इस बीच, कई राज्य सरकारों ने फिर कहा कि वैक्सीन का काम डी-सेंट्रलाइज किया जाए और राज्यों पर छोड़ दिया जाए। तरह-तरह के स्वर उठे। जैसे कि वैक्सीनेशन के लिए Age Group क्यों बनाए गए? दूसरी तरफ किसी ने कहा कि उम्र की सीमा आखिर केंद्र सरकार ही क्यों तय करे? कुछ आवाजें तो ऐसी भी उठीं कि बुजुर्गों का वैक्सीनेशन पहले क्यों हो रहा है? भांति-भांति के दबाव भी बनाए गए, देश के मीडिया के एक वर्ग ने इसे कैंपेन के रूप में भी चलाया।

साथियों,

काफी चिंतन-मनन के बाद इस बात पर सहमति बनी कि राज्य सरकारें अपनी तरफ से भी प्रयास करना चाहती हैं, तो भारत सरकार क्यों ऐतराज करे? और भारत सरकार ऐतराज क्यों करे? राज्यों की इस मांग को देखते हुए, उनके आग्रह को ध्यान में रखते हुए 16 जनवरी से जो व्यवस्था चली आ रही थी, उसमें प्रयोग के तौर पर एक बदलाव किया गया। हमने सोचा कि राज्य ये मांग कर रहे हैं, उनका उत्साह है, तो चलो भई 25 प्रतिशत काम उन्ही की शोपित कर दिया जाये, उन्ही को दे दिया जाए। स्वभाविक है, एक मई से राज्यों को 25 प्रतिशत काम उनके हवाले दिया गया, उसे पूरा करने के लिए उन्होंने अपने-अपने तरीके से प्रयास भी किए। 

इतने बड़े काम में किस तरह की कठिनाइयां आती हैं, ये भी उनके ध्यान में आने लगा, उनको पता चला। पूरी दुनिया में वैक्सीनेशन की क्या स्थिति है, इसकी सच्चाई से भी राज्य परिचित हुए। और हमने देखा, एक तरफ मई में सेकेंड वेव, दूसरी तरफ वैक्सीन के लिए लोगों का बढ़ता रुझान और तीसरी तरफ राज्य सरकारों की कठिनाइयां। मई में दो सप्ताह बीतते-बीतते कुछ राज्य खुले मन से ये कहने लगे कि पहले वाली व्यवस्था ही अच्छी थी। धीरे-धीरे इसमें कई राज्य सरकारें जुड़ती चली गईं। वैक्सीन का काम राज्यों पर छोड़ा जाए, जो इसकी वकालत कर रहे थे, उनके विचार भी बदलने लगे। ये एक अच्छी बात रही कि समय रहते राज्य, पुनर्विचार की मांग के साथ फिर आगे आए। राज्यों की इस मांग पर, हमने भी सोचा कि देशवासियों को तकलीफ ना हो, सुचारू रूप से उनका वैक्सीनेशन हो, इसके लिए एक मई के पहले वाली, यानि 1 मई के पहले 16 जनवरी से अप्रैल अंत तक जो व्यवस्था थी, पहले वाली पुरानी व्यवस्था को फिर से लागू किया जाए।

 

साथियों,

आज ये निर्णय़ लिया गया है कि राज्यों के पास वैक्सीनेशन से जुड़ा जो 25 प्रतिशत काम था, उसकी जिम्मेदारी भी भारत सरकार उठाएगी। ये व्यवस्था आने वाले 2 सप्ताह में लागू की जाएगी। इन दो सप्ताह में केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर नई गाइड-लाइंस के अनुसार आवश्यक तैयारी कर लेंगी। संयोग है कि दो सप्ताह बाद, 21 जून को ही अंतरराष्ट्रीय योग दिवस भी है। 21 जून, सोमवार से देश के हर राज्य में, 18 वर्ष से ऊपर की उम्र के सभी नागरिकों के लिए, भारत सरकार राज्यों को मुफ्त वैक्सीन मुहैया कराएगी। वैक्सीन निर्माताओं से कुल वैक्सीन उत्पादन का 75 प्रतिशत हिस्सा भारत सरकार खुद ही खरीदकर राज्य सरकारों को मुफ्त देगी। यानि देश की किसी भी राज्य सरकार को वैक्सीन पर कुछ भी खर्च नहीं करना होगा। अब तक देश के करोड़ों लोगों को मुफ्त वैक्सीन मिली है।

 अब 18 वर्ष की आयु के लोग भी इसमें जुड़ जाएंगे। सभी देशवासियों के लिए भारत सरकार ही मुफ्त वैक्सीन उपलब्ध करवाएगी। गरीब हों, निम्न मध्यम वर्ग हों, मध्यम वर्ग हो या फिर उच्च वर्ग, भारत सरकार के अभियान में मुफ्त वैक्सीन ही लगाई जाएगी। हां, जो व्यक्ति मुफ्त में वैक्सीन नहीं लगवाना चाहते, प्राइवेट अस्पताल में वैक्सीन लगवाना चाहते हैं, उनका भी ध्यान रखा गया है। देश में बन रही वैक्सीन में से 25 प्रतिशत,  प्राइवेट सेक्टर के अस्पताल सीधे ले पाएं, ये व्यवस्था जारी रहेगी। प्राइवेट अस्पताल, वैक्सीन की निर्धारित कीमत के उपरांत एक डोज पर अधिकतम 150 रुपए ही सर्विस चार्ज ले सकेंगे। इसकी निगरानी करने का काम राज्य सरकारों के ही पास रहेगा।

साथियों,

हमारे शास्त्रों में कहा गया है-प्राप्य आपदं न व्यथते कदाचित्, उद्योगम् अनु इच्छति चा प्रमत्तः॥ अर्थात्, विजेता आपदा आने पर उससे परेशान होकर हार नहीं मानते, बल्कि उद्यम करते हैं, परिश्रम करते हैं, और परिस्थिति पर जीत हासिल करते हैं। कोरोना से लड़ाई में 130 करोड़ से अधिक भारतीयों ने अभी तक की यात्रा आपसी सहयोग, दिन रात मेहनत करके तय की है। आगे भी हमारा रास्ता हमारे श्रम और सहयोग से ही मजबूत होगा। हम वैक्सीन प्राप्त करने की गति भी बढ़ाएंगे और वैक्सीनेशन अभियान को भी और गति देंगे। हमें याद रखना है कि, भारत में वैक्सीनेशन की रफ्तार आज भी दुनिया में बहुत तेज है, अनेक विकसित देशों से भी तेज है। हमने जो टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म बनाया है- Cowin, उसकी भी पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। अनेक देशों ने भारत के इस प्लेटफॉर्म को इस्तेमाल करने में रुचि भी दिखाई है। हम सब देख रहे हैं कि वैक्सीन की एक एक डोज कितनी महत्वपूर्ण है, हर डोज से एक जिंदगी जुड़ी हुई है। केंद्र सरकार ने ये व्यवस्था भी बनाई है कि हर राज्य को कुछ सप्ताह पहले ही बता दिया जाएगा कि उसे कब, कितनी डोज मिलने वाली है। मानवता के इस पवित्र कार्य में वाद-विवाद और राजनीतिक छींटाकशी, ऐसी बातों को कोई भी अच्छा नहीं मानता है। वैक्सीन की उपलब्धता के अनुसार, पूरे अनुशासन के साथ वैक्सीन लगती रहे, देश के हर नागरिक तक हम पहुंच सकें, ये हर सरकार, हर जनप्रतिनिधि, हर प्रशासन की सामूहिक जिम्मेदारी है।

प्रिय देशवासियों,

टीकाकरण के अलावा आज एक और बड़े फैसले से मैं आपको अवगत कराना चाहता हूं। पिछले वर्ष जब कोरोना के कारण लॉकडाउन लगाना पड़ा था तो प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत, 8 महीने तक 80 करोड़ से अधिक देशवासियों को मुफ्त राशन की व्यवस्था हमारे देश ने की थी। इस वर्ष भी दूसरी वेव के कारण मई और जून के लिए इस योजना का विस्तार किया गया था। आज सरकार ने फैसला लिया है कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना को अब दीपावली तक आगे बढ़ाया जाएगा। महामारी के इस समय में, सरकार गरीब की हर जरूरत के साथ, उसका साथी बनकर खड़ी है। यानि नवंबर तक 80 करोड़ से अधिक देशवासियों को, हर महीने तय मात्रा में मुफ्त अनाज उपलब्ध होगा। इस प्रयास का मकसद यही है कि मेरे किसी भी गरीब भाई-बहन को, उसके परिवार को, भूखा सोना ना पड़े।

साथियों,

देश में हो रहे इन प्रयासों के बीच कई क्षेत्रों से वैक्सीन को लेकर भ्रम और अफवाहों की  चिंता बढ़ाती है। ये चिंता भी मैं आपके सामने व्यक्त करना चाहता हूं। जब से भारत में वैक्सीन पर काम शुरू हुआ, तभी से कुछ लोगों द्वारा ऐसी बातें कही गईं जिससे आम लोगों के मन में शंका पैदा हो। कोशिश ये भी हुई कि भारत के वैक्सीन निर्माताओं का हौसला पस्त पड़ जाए और उनके सामने अनेक प्रकार की बाधाएं आएं। जब भारत की वैक्सीन आई तो अनेक माध्यमों से शंका-आशंका को और बढ़ाया गया। वैक्सीन न लगवाने के लिए भांति-भांति के तर्क प्रचारित किए गए। इन्हें भी देश देख रहा है। जो लोग भी वैक्सीन को लेकर आशंका पैदा कर रहे हैं, अफवाहें फैला रहे हैं, वो भोले-भाले भाई-बहनों के जीवन के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं।

ऐसी अफवाहों से सतर्क रहने की जरूरत है। मैं भी आप सबसे, समाज के प्रबुद्ध लोगों से, युवाओं से अनुरोध करता हूँ, कि आप भी वैक्सीन को लेकर जागरूकता बढ़ाने में सहयोग करें। अभी कई जगहों पर कोरोना कर्फ्यू में ढील दी जा रही है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हमारे बीच से कोरोना चला गया है। हमें सावधान भी रहना है, और कोरोना से बचाव के नियमों का भी सख्ती से पालन करते रहना है। मुझे पूरा विश्वास है, हम सब कोरोना से इस जंग में जीतेंगे, भारत कोरोना से जीतेगा। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ, आप सभी देशवासियों का बहुत बहुत धन्यवाद!