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Dr. Kalam always sought fresh challenges to overcome in life, says PM Modi
Dr. Kalam always wanted to be remembered as a teacher: PM Narendra Modi
Dr. Kalam worked for the welfare of poor & farmers: PM Modi
On the birth anniversary of Dr. Kalam, we must explore how we can encourage innovation in India: PM
Dr. Kalam's life continues to be an inspiration for all of us: PM
PM Narendra Modi unveils a statue of Dr. APJ Abdul Kalam at DRDO Bhavan in New Delhi
Prime Minister Modi releases commemorative postal stamp on Dr. Kalam

 

आज 15 अक्‍तूबर, श्रीमान अब्‍दुल कलाम जी की जन्‍म जयंती पर आप सब इकट्ठे हुए है। आज DRDO के परिसर में उनकी एक प्रतिमा का अनावरण करने का मुझे सौभाग्‍य मिला। यह बात सही है कि कलाम साहब का जीवन इतना व्‍यापक, विशाल और गहरा रहा है कि उनको याद करने का गर्व होता है, लेकिन साथ में एक कसक भी रहती है कि काश! वो हमारे साथ होते तो। तो ये जो कमी महसूस होती है, इसको कैसे भरना है, ये हम सब के लिए एक चुनौती है और मुझे विश्‍वास है कि अब्‍दुल कलाम जी के आशीर्वाद से उन्‍होंने हम देशवासियों को जो शिक्षा-दीक्षा दी है, उससे हम अवश्‍य उसको पूरा करने का भरपूर प्रयास करेंगे और वही उनको सबसे बड़ी अंजलि होगी।

वे राष्‍ट्रपति बने, मैं समझता हूं कि उससे पहले वे राष्‍ट्र रत्‍न थे। ऐसा बहुत कम होता है कि एक व्‍यक्‍ति पहले राष्‍ट्र रत्‍न बने और बाद में राष्‍ट्रपति पद को स्‍वीकार करे और वह उनके जीवन की ऊंचाइयों से जुड़ा हुआ था। भारत सरकार ने तय किया है कि जहां पर उनका जन्‍म हुआ और जहां पर उनकी अंत्‍येष्‍टि हुई, उस गांव में एक आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा दे, ऐसा स्‍मारक बनाया जाएगा। सरकार ने already वो जमीन acquire कर ली है। मैंने मंत्रियों की एक कमेटी भी बनाई है जो आने वाले दिनों में इसका आखिरी रूप तय करके, ऐसा कैसा स्‍मारक हो जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहे और कलाम साहब का जीवन हमेशा-हमेशा हम सबके लिए मार्गदर्शक बनता रहे।



दो बातें जो कलाम साहब की स्‍वाभाविक नजर आती हैं – एक तो उनके बाल। दूर से भी किसी को पता चलता है कि अब्‍दुल कलाम जी जा रहे हैं। और कुछ न बनाया हो, सिर्फ उनके बालों को किसी ने पेंट किया तो कह देगा कि हां, बाकी चेहरा कलाम साहब का होगा। लेकिन साथ-साथ एक और भी बात थी। जैसे उनके बाल थे, वैसा उनके भीतर एक बालक था। तो उनके बाल और उनके भीतर का बालक, ये दोनों, मैं समझता हूं हमेशा-हमेशा जो उनके निकट गए हैं उनको याद रहता है। इतनी सहजता, इतनी सरलता।

आमतौर पर वैज्ञानिकों के विषय में एक सोच ऐसी रहती है कि वो बड़े गंभीर चेहरा, उदासीन, Lab में ही डूबे रहने वाले, साल में कितनी बार मुस्‍कुराए वो भी शायद हिसाब लगाना पड़े। लेकिन कलाम साहब, हर पल एक बड़े जीवंत व्‍यक्‍तिव नज़र आता था। मुस्‍कुराते रहना, दौड़ते रहना और। दो प्रकार के लोग होते हैं, एक वो होते हैं जो Opportunity खोजते हैं, एक वो होते हैं जो Challenge खोजते हैं। कलाम साहब Challenges की तलाश में रहते थे। कौन-से नए Challenge है? उस Challenge को कैसे उठा ले और उस Challenge को पार कैसे करे और यही उनके हर पल जीवन में रहता था। आखिर तक!

जब भी मेरा बहुत निकट संबंध रहा क्‍योंकि जब मैं मुख्‍यमंत्री था तब भी उनका गुजरात बार-बार आना होता था। अहमदाबाद से उनका विशेष लगाव था क्‍योंकि उनके career की पहली शुरूआत उन्‍होंने अहमदाबाद में शुरू की थी और विक्रम साराभाई के साथ उन्‍होंने काम किया। तो उसके कारण उनका लगाव भी गुजरात के साथ बहुत था। तो मेरा भी उस समय उनसे संबंध बहुत रहता था। कच्‍छ का भूकंप हो या आपत्‍ति की इतनी बड़ी घटना हो, वो आना, छोटी-छोटी चीजों में guide करना और उस समय भूकंप की परिस्‍थिति के पुनरनिर्माण के काम में विज्ञान और technology का सहारा कैसे लिया जाए ताकि relief तेज गति से हो, rehabilitation तेज गति से हो, reconstruction तेज गति से हो, ऐसी हर बारीक चीज में वो मार्गदर्शन करते थे वो सहायता करते थे।

जीवन भर उनकी एक विशेषता रही है और किसी ने उनको पूछा था कि आपको कैसे याद रखा जाए और उन्‍होंने जवाब में कहा था कि मुझे शिक्षक के रूप में याद रखा जाए। ये शिक्षक का तो सम्‍मान है लेकिन साथ-साथ उनके जीवन का conviction क्‍या था, commitment क्‍या था, उसका भी परिचायक था। उनको लगता है कि भई 5-50 व्‍यक्‍तियों का समूह जरूर कुछ कर दिखा सकता है। लेकिन भारत जैसे देश ने पीढ़ियों तक आगे बढ़ने के लिए, प्रभाव पैदा करने के लिए तेज गति से चलना है तो आने वाली पीढ़ियों को तैयार करना होगा और वो एक टीचर तैयार कर सकता है और ये उनके सिर्फ शब्‍द नहीं थे, उनके पूरे जीवन में ही नजर आता है।

राष्‍ट्रपति पद से मुक्‍ति के दूसरे दिन... ये छोटी बात नहीं है। इतने बड़े पद पर रहने के बाद कल क्‍या करूं, कल कैसा जाएगा, कल से कैसा होगा? आप सब को मालूम है जब अफसर retired होता है तो क्‍या हो जाता है। यानी आज कहां खड़ा है और दूसरे दिन वो अपने आपको कहां महसूस करता है, वो अपने आपको एक खालीपन महसूस करता है। एकदम से वो लगता है बस, अब जीवन का अंत शुरू हो गया है, ऐसा ही मान लेता है। दिमाग में retirement भर जाता है। कलाम साहब की विशेषता देखिए कि राष्‍ट्रपति पद, इतनी बड़ी ऊंचाई और निवृत्‍ति भी आदर्श और गौरव के साथ। दूसरे ही दिन जहाज पकड़ के चैन्‍नई जाना, चैन्‍नई में क्‍लासरूम में पढ़ाना शुरू करना। ये भीतर के commitment के बिना संभव नहीं होता है। एक व्‍यक्‍ति ने अपने जीवन में उसको inherent कर दिया होता है, तब होता है और जीवन का अंत भी देखिए। कहां रामेश्‍वरम्, कहां दिल्‍ली, कहां दुनिया में जय-जयकार और कहां नॉर्थ ईस्‍ट। किसी को कहा जाए कि नॉर्थ ईस्‍ट जाओ तो कहे अरे साहब, किसी और का भेज दो। ऐसा करो अगली बार मैं जाऊंगा इस बार जरा कोई और को। वहां पर इस उम्र में जाना और student के साथ अपने आखिरी पल बिताना। ये उनके भीतर का एक जो एक सातत्‍य था, एक commitment था, उसको प्रतिबिंबित करता है।

भारत शक्‍तिशाली हो, लेकिन सिर्फ शस्‍त्रों से शक्‍तिशाली हो ये कलाम साहब की सोच नहीं थी। शस्‍त्रों का सामर्थ्‍य आवश्‍यक है और उसमें कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिए और उसमें उन्‍होंने जितना योगदान दे सकते थे, दिया। लेकिन वो इसे मानकर के चलते थे कि देश सरहदों से नहीं, देश कोटि-कोटि लोगों से पहचाना जाता है। देश की पहचान सीमाओं के आधार पर तय नहीं होती है। देश की ताकत उसके जन कैसे सामर्थ्‍यवान है, उस पर होती है और इसलिए कलाम साहब उन दोनों धाराओं को साथ लेकर के चलते थे कि एक तरफ innovation हो, research हो, रक्षा के क्षेत्र में भारत अपने पैरों पर खड़ा हो और Third World Countries, गरीब देशों का भी उपकारक हो, उस दिशा में भारत अपनी जगह बनाए और दूसरी तरफ भारत का मानव समुदाय संपन्‍न हो।

वे शिक्षा के बड़े आग्रही थे। वे हमेशा कहते थे, योग का महत्‍व समझाते थे और उसके साथ वो commitment भी था उनका। religion को spiritualism में convert करना चाहिए। spiritualism को प्राधान्‍य देना चाहिए। ये उनका conviction था। यानी, एक प्रकार से समाज जीवन में किन मूल्‍यों की आवश्‍यकता है, उन मूल्‍यों पर वो बल देते थे। शायद ये बड़ी हिम्‍मत का काम है, लेकिन वो करते थे। किसी भी समारोह में जाते थे और वहां student मिल गए तो फिर वो खिलते थे। उनका लगता था कि हां, एक ऐसे में बगीचे में आया हूं जहां ये फूल खिलने वाले हैं। उनको तुरंत feel होता था, एकदम से उनका natural connect होता था और ऐसे समारोह में वो बाद में संकल्‍प करवाते थे। एक-एक वाक्‍य बच्‍चों से बुलवाते थे। ये कठिन इसलिए है आज के जमाने में क्‍योंकि इस प्रकार की बात करो तो दूसरे दिन पता नहीं कितने-कितने विवाद खड़े हो जाते हो। लेकिन वे कभी इन चिंताओं में नहीं रहे। हर बार उस संकल्‍प को दोहराते रहे। क्‍या हम जब भी कलाम साहब को याद करेंगे, जहां भी कलाम साहब की चर्चा होगी, उन संकल्‍प के संबंध में, उसको लोगों में सार्वजनिक रूप से बार-बार कैसे लाए? उनका संकल्‍प था, जो हमें बताया जाता था, उसको चरितार्थ करना, ये हमारा दायित्‍व बनता है। उस दायित्‍व को पूरा करने के लिए हमारी नई पीढ़ी को हम कैसे तैयार करें? उस संकल्‍प को बार-बार दोहराते जाए कि ये परंपरा चलती रहे और चेतना जगाने का प्रयास निरंतर चलता रहे, उस दिशा में हम कैसे प्रयास करे।

आज विश्‍व में भारत अपना एक विशेष स्‍थान बनाता जा रहा है। दुनिया किसी जमाने में भारत को एक बड़े market के रूप में देखती थी। आज विश्‍व ने भारत को एक सहयात्री के रूप में देखना शुरू किया है। भारत की तरफ देखने का दुनिया का नजरिया बदला है। लेकिन आर्थिक संपन्‍नता ही या सिर्फ market ही हमें drive करेगा क्‍या?

आने वाले दिनों में हमारे पास innovation के लिए बहुत संभावनाएं हैं। Eight hundred million, Thirty Five से नीचे जनसंख्‍या जहां हो, 65 प्रतिशत जनसंख्‍या 35 से नीचे हो। आज IT के कारण दुनिया में हमने अपनी जगह बना दी उसका कारण innovation था। हम innovation को बल कैसे दें। हम कलाम साहब की हर जन्‍म जयंती पर DRDO में एक ऐसा seminar organize कर सकते हैं क्या? एक दिन, दो दिन, तीन दिन जो भी हो इसमें young scientist हो, innovation करने वाले लोग हो या जिनका scientific temper का spark जिसके अंदर हो, ऐसे बच्‍चे हो। कभी स्‍कूल के बच्‍चों का एक-आध दिन कार्यकाल हो, कभी innovation में लगे हुए 35 से नीचे young scientist. इनको बुला करके इन्‍हीं विषयों पर सेमीनार हमेशा-हमेशा, कलाम साहब को याद करना मतलब innovation को promote करना। यह हमें परंपरा बना सकती है। तो उनकी जन्‍म जयंती को बनाने में हम एक नई जिम्‍मेदारी की ओर भी समाज को लेते चले जाएंगे और वह उनके लिए सबसे बड़ा संतोष का विषय बन सकता है, ऐसा मुझे लगता है।

दुनिया में अब भारत को उस विषय पर सोचने की आवश्‍यकता है कि हम विश्‍व को क्‍या दे सकते हैं। हम क्‍या बन सकते हैं? क्‍या हो सकते हैं? या कोई हमारे लिए क्‍या कर सकता है? उससे थोड़ा ऊपर जा करके थोड़ा हट करके हमारी वो ऐसी कौन सी विरासत है, जो हम विश्‍व को दे सकते हैं। और जो विश्‍व सहज रूप से स्‍वीकार करेगा और जो विश्‍व के कल्‍याण के लिए काम आयेगा। हमने उन पहलुओं पर धीरे-धीरे अपने आप को तैयार करना चाहिए।

आज पूरा विश्‍व cyber crime को ले करके बड़ा परेशान है। क्‍या हमारे नौजवान वो innovation करे, जिसमें cyber security की गारंटी के लिए भारत की पहल हो। भारत एक ऐसी जगह हो जहां cyber security के लिए पूरी संभावनाएं है। जितनी सीमा सुरक्षा महत्‍व की बनी है, उतनी ही cyber की security महत्‍व पर बनी है। तभी भी विश्‍व बदलता चला जाता है, उसमें हम किस प्रकार से contribute कर सकते हैं? हमारी खोज, हमारे विज्ञान, हमारे संसाधन, common man की जिंदगी में बदलाव ला सकते हैं। quality of life में कोई change ला सकते हैं। भारत गरीब देश रहा है। हमारे यह सारे संसाधन, संशोधन यह सब कुछ गरीब की quality of life में बदलाव लाने के लिए हो सकता है। अब हमने 2022 तक हर गरीब को घर देने का सोचा है। अब उसमें हमें नई टेक्‍नोलॉजी, नई चीजें लानी पडेंगी। वो कौन से material से अच्‍छे मकान बन सकते हैं, वो नई खोज करनी पड़ेगी। वो कौन सी technique होगी कि जिसके कारण fastest मकान बना सकते हैं। वो कौन सी technique होगी जिससे हम low cost मकान बना सकते हैं। क्‍यों न हो? कलाम साहब चाहते थे देश के किसान का कल्‍याण करना है। देश के गरीब का कल्‍याण है, तो हमारी नदियों को जोड़ना। यह नदियों को जोड़ना सिर्फ परपरागत engineering work से होने वाला नहीं है। हमें innovation चाहिए, expertise चाहिए, space science की मदद चाहिए। इन सारी बातों को करके हम क्‍या लोगों की जिंदगी में बदलाव ला सकते हैं? यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी है, जिसमें हमें बदलाव लाना है।

आज भी दुनिया में प्रति हेक्‍टर जो crop है उसकी तुलना में हमारा बहुत कम है। आज दुनिया में प्रति cattle जितना milk मिलता है, उसकी तुलना में हमारा कम है। वो कौन से वैज्ञानिक तरीके हों, वो कौन सा वैज्ञानिक temper हो जो किसान के घर तक पहुंचे, पशुपालक के घर तक पहुंचे? ताकि उसकी जिंदगी में बदलाव आए। और इसलिए विज्ञान को हमने सामान्‍य मानव की जिंदगी में बदलाव लाने के लिए उस applicable science को कैसे लाया जाए? उस technology को कैसे हम innovate करें। यह ठीक है DRDO में जो लोग बैठे हैं उनका क्षेत्र अलग है। लेकिन उसके बावजूद भी, यह वो बिरादरी है, जिसका innovation, विज्ञान, खोज यह उसके सहज प्रकृति के हिस्‍से हैं। हम धीरे-धीरे उसको expand करते हुए, अब्‍दुल कलाम जी को याद करते हुए, हम देश को क्‍या दे सकते है? और यही ताकत दुनिया को देने की ताकत बन सक‍ती है।

और कभी-कभार हम पढ़ते है जब सुनते हैं कि भई, हमारे यहां किसान अन्‍न पैदा करता है, लेकिन काफी मात्रा में बर्बाद हो जाता है। क्‍या उपाय हो सकते हैं? हर प्रकार के उपाय हो सकते हैं। temporary भी क्‍यों न हो उसके रख-रखाव की व्‍यवस्‍था क्‍या हो सकती हैं? ऐसी बहुत सी चीजें हैं, जिसमें हमने हमारी परंपरा की पुरानी पद्धतियों में से प्रेरणा लेना, नई innovation करना और उसमें से नए equipment तैयार करना, व्‍यवस्‍थाएं खड़ी करना, जो विज्ञान के द्वारा समाज जीवन में परिवर्तन का एक कारण बन सकते हैं, सहारा बन सकते हैं।

विश्‍व जिस प्रकार से बदल रहा है, उसमें सामूहिक सुरक्षा एक बहुत बड़ा विषय बनता जा रहा है। Blue Economy की तरफ दुनिया बढ़ रही है। अब जब Blue Economy की तरफ बढ़ रही है, तब समुद्रिक जीवन में उसके साथ जुड़े हुए व्‍यापार से भी संबंध है, सामुद्रिक खोज एक बहुत बड़ा क्षेत्र अधूरा पड़ा है। संपदाओं का अपरंपार भंडार सामुद्रिक संपत्ति में पड़ा हुआ है। लेकिन at the same time मानव जात के सामने चुनौती है Blue Sky, Environment, Climate दुनिया में आज चिंता और चर्चा के विषय है। और इसलिए Blue Economy जो सामुद्रिक शक्ति की चिंता भी करें और Blue Sky बचा रहे हैं उसकी भी चिंता करे। उस प्रकार की technology का हमारा innovation कैसा है? हमारा manufacturing जब हम कहते हैं कि zero defect-zero effect. हम ग्‍लोबली जाना चाहते हैं कि हमारे innovation की स्थिति कैसे बने कि हमारे manufacture में कोई defect भी न हो और उसके कारण environment पर कोई effect भी न हो। जब हम इन चीजों को ले करके चलेंगे, मैं समझता हूं कि हमारे युवा वैज्ञानिकों के सामने चुनौतियां हैं। और देश के युवा वैज्ञानिक अब्‍दुल कलाम साहब ने जो हमें रास्‍ता दिखाया, अब्‍दुल कलाम साहब के जीवन की स्‍वयं की यात्रा तो सामान्‍य गरीब परिवार से निकले यहां तक पहुंचे, लेकिन वो जिस क्षेत्र में गए वहां भी वैसे ही हाल था। अभी हमने देखा रॉकेट का एक Part साइकिल पर ले जा रहे थे। यानी institute भी इतनी गरीब थी, इस गरीबी वाले institute से जुड़ करके इतनी बड़ी विशाल संस्‍था का निर्माण कर दिया। सिर्फ पूरा अपनी व्‍यक्ति का जीवन गरीब झोपड़ी से ले करके राष्‍ट्रपति भवन तक आए ऐसा नहीं, जहां गए वहां, जहां था उसको उत्‍तम और बड़ा बनाने का भरपूर सफल प्रयास किया। यह अपने आप में बहुत बड़ा योगदान है। और उस अर्थ में हम भी जहां हो वहां, नई ऊंचाईयों को पार करने वाली अवस्‍था कैसे पैदा कर सकते हैं। उसके लिए हम और योगदान क्‍या दे सकते हैं?

कलाम साहब का जीवन सदा-सर्वदा हमें प्रेरणा देता रहेगा। और हम सब अपने संकल्‍पों को पूरा करने के लिए जी जान से जुटेंगे। इसी एक अपेक्षा के साथ कलाम साहब को शत-शत वंदन करता हूं और उनका जीवन सदा-सर्वदा हमें प्रेरणा देता रहे इसी एक आशा-अपेक्षा के साथ बहुत-बहुत शुभकामनाएं। बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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ଅମୃତ ମହୋତ୍ସବ' ସରକାରଙ୍କ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ କିମ୍ବା କୌଣସି ରାଜନୈତିକ ଦଳର ନୁହେଁ। ଏହା ଭାରତର ଜନସାଧାରଣଙ୍କ ଏକ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମୋଦୀ
#MyHandloomMyPride: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମୋଦୀ ନାଗରିକମାନଙ୍କୁ ଖଦି ଏବଂ ହସ୍ତତନ୍ତ ଉତ୍ପାଦ କିଣିବାକୁ ଅନୁରୋଧ କରିଛନ୍ତି
ମନ୍ କି ବାତ୍' ରେ ସକାରାତ୍ମକତା ଏବଂ ସମ୍ବେଦନଶୀଳତା ଅଛି । ଏହାର ଚରିତ୍ର ଚରିତ୍ର ସମଷ୍ଟିଗତ : ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମୋଦୀ
ଏହା ଜାଣି ଖୁସି ଯେ ମନ୍ କି ବାତ୍ ପାଇଁ ପ୍ରାପ୍ତତଃ 75% ପରାମର୍ଶ 35 ବର୍ଷରୁ କମ୍ ବୟସ ଗୋଷ୍ଠୀର ଆସିଛି : ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମୋଦୀ
ପ୍ରତ୍ୟେକ ବୁନ୍ଦା ଜଳକୁ ବଞ୍ଚାଇବା, ଯେକୌଣସି ପ୍ରକାରର ଜଳ ଅପଚୟକୁ ରୋକିବା ଆମ ଜୀବନର ଏକ ଅବିଚ୍ଛେଦ୍ୟ ଅଙ୍ଗ ହେବା ଉଚିତ୍: ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମୋଦୀ

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ, ନମସ୍କାର ।

ଦୁଇ ଦିନ ପୂର୍ବର କିଛି ଚମତ୍କାର ଛବି, କିଛି ସ୍ମରଣୀୟ ମୁହୁର୍ତ୍ତ ଏବେ ବି ମୋ ଆଖି ଆଗରେ ରହିଛି । ତେଣୁ, ଏଥର ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ର ଆରମ୍ଭ କରିବା ସେହି ମୁହୁର୍ତ୍ତଗୁଡ଼ିକୁ ନେଇ । ଟୋକିଓ ଅଲମ୍ପିକ୍ସରେ ଭାରତୀୟ ଖେଳାଳିମାନଙ୍କୁ ତ୍ରିରଙ୍ଗା ଧରି ଚାଲୁଥିବା ଦେଖି କେବଳ ମୁଁ ନୁହେଁ, ବରଂ ସାରା ଦେଶ ରୋମାଞ୍ଚିତ ହୋଇଉଠିଲା । ସାରା ଦେଶ ସତେ ଯେମିତି ଆମର ଏହି ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କୁ କହିଲା –

ବିଜୟୀ ଭବ . . . ବିଜୟୀ ଭବ  ।

ଏହି ଖେଳାଳିମାନେ ଯେତେବେଳେ ଭାରତରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିଥିଲେ, ସେତେବେଳେ ମୋତେ ସେମାନଙ୍କ ସହ କଥାବାର୍ତ୍ତା ହେବାର, ସେମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ଜାଣିବାର ଏବଂ ଦେଶକୁ ଜଣାଇବାର ସୁଯୋଗ ମିଳିଥିଲା । ଏହି ଖେଳାଳିମାନେ ଜୀବନର ଅନେକ ବାଧାବିଘ୍ନକୁ ପାର କରି ଏ ଯାଏ ପହଞ୍ଚିଛନ୍ତି । ଆଜି ସେମାନଙ୍କ ପାଖରେ ଆପଣଙ୍କ ସ୍ନେହ ଏବଂ ସମର୍ଥନର ଶକ୍ତି ରହିଛି । ତେଣୁ ଆସନ୍ତୁ, ସମସ୍ତେ ମିଶି ଆମର ଏହି ଖେଳାଳିମାନଙ୍କୁ ନିଜ ନିଜର ଶୁଭେଚ୍ଛା ଜଣାଇ ସେମାନଙ୍କ ଉତ୍ସାହ ବୃଦ୍ଧି କରିବା । ସାମାଜିକ ଗଣମାଧ୍ୟମରେ ଅଲମ୍ପିକ୍ସ ଖେଳାଳିମାନଙ୍କ ସମର୍ଥନ ପାଇଁ ଆମର ଭିକ୍ଟୋରୀ ପଞ୍ଚ କ୍ୟାମ୍ପେନ୍ ଏବେ ଆରମ୍ଭ ହୋଇସାରିଛି । ଆପଣ ମଧ୍ୟ ନିଜ ଟିମ ସହ ନିଜର ଭିକ୍ଟୋରୀ ପଞ୍ଚ ଶେୟାର କରନ୍ତୁ । ଭାରତକୁ ପ୍ରୋତ୍ସାହିତ କରନ୍ତୁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ଯିଏ ଦେଶ ପାଇଁ ତ୍ରିରଙ୍ଗା ଧାରଣ କରେ, ତା’ର ସମ୍ମାନାର୍ଥେ ଆବେଗରେ ଜୁଡୁବୁଡୁ ହୋଇଯିବା ସ୍ୱାଭାବିକ । ଦେଶର ଏହି ଭାବନା ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ବାନ୍ଧି ରଖିଛି । ଆସନ୍ତାକାଲି, ଅର୍ଥାତ ଜୁଲାଇ ୨୬ ତାରିଖ ଦିନ କାରଗିଲ୍ ଦିବସ ମଧ୍ୟ ରହିଛି । କାରଗିଲ୍ ଯୁଦ୍ଧ, ଭାରତୀୟ ସେନାବାହିନୀର ବୀରତ୍ୱ ଏବଂ ସଂଯମର ଏଭଳି ଏକ ପ୍ରତୀକ, ଯାହାକୁ ସାରା ବିଶ୍ୱ ଦେଖିଛି । ଏଥର ଏହି ଗୌରବମୟ ଦିନଟି ମଧ୍ୟ ଅମୃତ ମହୋତ୍ସବ ସମୟରେ ପାଳିତ ହେବ । ତେଣୁ, ଏହାର ଗୁରୁତ୍ୱ ଆହୁରି ଅଧିକ ହୋଇଯାଇଛି । ମୁଁ ଚାହୁଁଛି ଯେ କାରଗିଲ ରୋମାଞ୍ଚକର କାହାଣୀ ଆପଣମାନେ ପଢ଼ନ୍ତୁ, କାରଗିଲ ବୀରମାନଙ୍କୁ ଆମେ ସମସ୍ତେ ପ୍ରଣାମ କରିବା ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ଏଥର ଅଗଷ୍ଟ ୧୫ ଦିନ ଦେଶ ନିଜର ସ୍ୱାଧୀନତାର ୭୫ତମ ବର୍ଷରେ ପ୍ରବେଶ କରିବାକୁ ଯାଉଛି । ଏହା ଆମର ବହୁତ ବଡ଼ ସୌଭାଗ୍ୟ ଯେ, ଯେଉଁ ସ୍ୱାଧୀନତା ପାଇଁ ଦେଶ ଶହ ଶହ ବର୍ଷ ଧରି ପ୍ରତୀକ୍ଷା କଲା, ତାହାର ୭୫ ବର୍ଷ ପୂରଣ ହେବା ଘଟଣାର ଆମେ ସାକ୍ଷୀ ହେବାକୁ ଯାଉଛୁ । ଆପଣମାନଙ୍କର ମନେଥିବ, ସ୍ୱାଧୀନତାର ୭୫ ବର୍ଷ ପାଳନ ପାଇଁ ମାର୍ଚ୍ଚ ୧୨ ତାରିଖ ଦିନ ବାପୁଙ୍କ ସାବରମତୀ ଆଶ୍ରମରୁ ଅମୃତ ମହୋତ୍ସବର ଶୁଭାରମ୍ଭ ହୋଇଥିଲା । ସେହିଦିନ ବାପୁଙ୍କ ଦାଣ୍ଡିଯାତ୍ରାକୁ ମଧ୍ୟ ପୁନର୍ଜୀବିତ କରାଯାଇଥିଲା । ସେହିଦିନଠାରୁ ଜମ୍ମୁ-କଶ୍ମୀରଠାରୁ ଆରମ୍ଭ କରି ପୁଡୁଚେରୀ ଯାଏ, ଗୁଜରାଟରୁ ଆରମ୍ଭ କରି ଉତ୍ତର-ପୂର୍ବାଞ୍ଚଳ ଯାଏ, ସାରା ଦେଶରେ ଅମୃତ ମହୋତ୍ସବ ସହ ସଂଲଗ୍ନ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମମାନ ଚାଲିଛି । ଅନେକ ଏଭଳି ଘଟଣା, ଏଭଳି ସ୍ୱାଧୀନତା ସଂଗ୍ରାମୀ, ଯେଉଁମାନଙ୍କର ବହୁତ ବଡ଼ ଅବଦାନ ରହିଛି, କିନ୍ତୁ ସେମାନେ ଲୋକଲୋଚନକୁ ଆସିପାରିନାହାନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ମଧ୍ୟ ଜାଣିବାକୁ ପାଉଛୁ । ଯେମିତିକି ମୋଇରାଙ୍ଗ ଦେଙ୍କ କଥା ଧରନ୍ତୁ । ମଣିପୁରର ଗୋଟିଏ ଛୋଟ ଇଲାକା ମୋଇରାଙ୍ଗ, ଏକଦା ନେତାଜୀ ସୁଭାଷ ଚନ୍ଦ୍ର ବୋଷଙ୍କ ଇଣ୍ଡିଆନ ନ୍ୟାସନାଲ୍ ଆର୍ମି ବା ଆଇ.ଏନ୍.ଏ.ର ଗୋଟିଏ ପ୍ରମୁଖ କାର୍ଯ୍ୟସ୍ଥଳ ଥିଲା । ଏଠାରେ ସ୍ୱାଧୀନତାର ବହୁ ପୂର୍ବରୁ ଆଇ.ଏନ୍.ଏ.ର କର୍ଣ୍ଣେଲ ଶୌକତ୍ ମଲିକ୍ ପତାକା ଉତ୍ତୋଳନ କରିଥିଲେ । ଅମୃତ ମହୋତ୍ସବ ସମୟରେ ଏପ୍ରିଲ ୧୪ ତାରିଖ ଦିନ ପୁଣି ଥରେ ସେହି ମୋଇରାଙ୍ଗରେ ପତାକା ଉତ୍ତୋଳନ କରାଗଲା । ଏଭଳି ଅନେକ ସ୍ୱାଧୀନତା ସଂଗ୍ରାମୀ ଓ ମହାପୁରୁଷ ରହିଛନ୍ତି, ଯେଉଁମାନଙ୍କୁ ଅମୃତ ମହୋତ୍ସବ ସମୟରେ ଦେଶ ସ୍ମରଣ କରୁଛି । ସରକାର ଏବଂ ସାମାଜିକ ସଂଗଠନଗୁଡ଼ିକ ତରଫରୁ ମଧ୍ୟ ନିରନ୍ତର ଭାବେ ଏହା ସହ ଜଡ଼ିତ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମଗୁଡ଼ିକ ଆୟୋଜନ କରାଯାଉଛି । ଏହିଭଳି ଏକ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ଏଥର ଅଗଷ୍ଟ ୧୫ ତାରିଖ ଦିନ ଅନୁଷ୍ଠିତ ହେବାକୁ ଯାଉଛି । ଏହା ଜାତୀୟ ସଙ୍ଗୀତ ସହ ଜଡ଼ିତ ଗୋଟିଏ ପ୍ରୟାସ । ସଂସ୍କୃତି ମନ୍ତ୍ରଣାଳୟ ଦ୍ୱାରା ଏହି ପ୍ରଚେଷ୍ଟା କରାଯାଉଛି ଯେ, ଏହି ଦିନ ଅଧିକରୁ ଅଧିକ ଭାରତବାସୀ ମିଶି ଜାତୀୟ ସଙ୍ଗୀତ ଗାନ କରନ୍ତୁ । ଏଥିପାଇଁ ଗୋଟିଏ ୱେବସାଇଟ ମଧ୍ୟ ପ୍ରସ୍ତୁତ କରାଯାଇଛି – ରାଷ୍ଟ୍ରଗାନ ଡଟ୍ ଇନ୍ । ଏହି ୱେବସାଇଟ ସହାୟତାରେ ଆପଣ ଜାତୀୟ ସଙ୍ଗୀତ ଗାନ କରି ତାହାକୁ ରେକର୍ଡ଼ କରିପାରିବେ, ଏହି ଅଭିଯାନ ସହ ସାମିଲ ହୋଇପାରିବେ । ଏହି ନିଆରା ପ୍ରଚେଷ୍ଟା ସହ ଆପଣମାନେ ଯୋଡ଼ି ହେବେ ବୋଲି ମୋର ଆଶା । ଏହି ଧରଣର ଅନେକ ଅଭିଯାନ, ଅନେକ ପ୍ରଚେଷ୍ଟା ଆପଣମାନଙ୍କୁ ଆଗାମୀ ଦିନମାନଙ୍କରେ ଦେଖିବାକୁ ମିଳିବ । ଅମୃତ ମହୋତ୍ସବ କୌଣସି ସରକାରୀ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ନୁହେଁ ବା କୌଣସି ରାଜନୈତିକ ଦଳର କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ ନୁହେଁ, ଏହା କୋଟି କୋଟି ଭାରତବାସୀଙ୍କ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମ । ଏହା ହେଉଛି ପ୍ରତ୍ୟେକ ସ୍ୱାଧୀନ ଏବଂ କୃତଜ୍ଞ ଭାରତୀୟଙ୍କ ନିଜର ସ୍ୱାଧୀନତା ସଂଗ୍ରାମୀମାନଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ । ଏହି ମହୋତ୍ସବର ମୂଳ ଚିନ୍ତାଧାରା ବହୁତ ବିସ୍ତୃତ । ଏହି ଚିନ୍ତାଧାରା ହେଉଛି, ନିଜର ସ୍ୱାଧୀନତା ସଂଗ୍ରାମୀମାନଙ୍କ ପଦାଙ୍କ ଅନୁସରଣ କରିବା, ସେମାନଙ୍କ ସ୍ୱପ୍ନର ଦେଶ ଗଢ଼ିବା । ଯେମିତିକି ଦେଶର ସ୍ୱାଧୀନତା ପାଇଁ ମୁକ୍ତିସଂଗ୍ରାମୀମାନେ ଖୁବ୍ ଆବେଗର ସହ ଏକଜୁଟ ହୋଇଯାଇଥିଲେ, ଠିକ ସେହିଭଳି ଭାବେ ଆମେ ଦେଶର ଉନ୍ନତି ପାଇଁ ଏକଜୁଟ ହେବାକୁ ପଡ଼ିବ । ଆମକୁ ଦେଶ ପାଇଁ ବଞ୍ଚିବାକୁ ହେବ, ଦେଶ ପାଇଁ କାମ କରିବାକୁ ହେବ । ଏଥିରେ ଛୋଟ ଛୋଟ ପ୍ରୟାସ ମଧ୍ୟ ବଡ଼ ସଫଳତା ଆଣି ଦେଇପାରେ । ଦୈନନ୍ଦିନର କାର୍ଯ୍ୟ କରିବା ସାଙ୍ଗରେ ମଧ୍ୟ ଆମେ ରାଷ୍ଟ୍ର ନିର୍ମାଣ କରିପାରିବା, ଯେମିତିକି ଭୋକାଲ୍ ଫର୍ ଲୋକାଲ୍ । ଆମ ଦେଶର ସ୍ଥାନୀୟ ଉଦ୍ୟୋଗୀ, କଳାକାର, ଶିଳ୍ପୀ, ବୁଣାକାରମାନଙ୍କୁ ସହାୟତା କରିବା ଆମର ଅଭ୍ୟାସ ହେବା ଉଚିତ । ଅଗଷ୍ଟ ୭ ତାରିଖ ଦିନ ପଡ଼ୁଥିବା ଜାତୀୟ ହସ୍ତତନ୍ତ ଦିବସ ଏଭଳି ଏକ ସୁଯୋଗ, ଯେଉଁଦିନ ଆମେ ଏ ଦିଗରେ ଚେଷ୍ଟା କରି କାମ କରିପାରିବା । ଜାତୀୟ ହସ୍ତତନ୍ତ ଦିବସ ସହ ଅନେକ ଐତିହାସିକ ପୃଷ୍ଠଭୂମି ଜଡ଼ିତ । ୧୯୦୫ ମସିହାରେ ଏହି ଦିନ ସ୍ୱଦେଶୀ ଆନ୍ଦୋଳନ ଆରମ୍ଭ ହୋଇଥିଲା ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ଆମ ଦେଶର ଗ୍ରାମାଞ୍ଚଳ ଏବଂ ଆଦିବାସୀ ଅଞ୍ଚଳରେ ହସ୍ତତନ୍ତ, ଆୟର ଏକ ପ୍ରମୁଖ ସ୍ରୋତ । ଏହା ଏଭଳି କ୍ଷେତ୍ର, ଯେଉଁଥିରେ ଲକ୍ଷ ଲକ୍ଷ ମହିଳା, ଲକ୍ଷ ଲକ୍ଷ ବୁଣାକାର, ଲକ୍ଷ ଲକ୍ଷ ଶିଳ୍ପୀ କାର୍ଯ୍ୟରତ । ଆପଣଙ୍କର ଛୋଟ ଛୋଟ ପ୍ରୟାସ ବୁଣାକାରମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଗୋଟିଏ ନୂତନ ଆଶା ସୃଷ୍ଟି କରିବ । ଆପଣ ନିଜେ କିଛି ନା କିଛି କିଣନ୍ତୁ, ଏବଂ ନିଜ କଥା ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ବି ଜଣାନ୍ତୁ । ଆଉ, ଯେତେବେଳେ ଆମେ ସ୍ୱାଧୀନତାର ୭୫ ବର୍ଷ ପାଳନ କରୁଛୁ, ସେତେବେଳେ ତ ଏତିକି କରିବା ଆମର ଦାୟିତ୍ୱ ବନ୍ଧୁଗଣ । ଆପଣମାନେ ଲକ୍ଷ୍ୟ କରିଥିବେ, ୨୦୧୪ ପରବର୍ତ୍ତୀ ସମୟରୁ ହିଁ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ରେ ଆମେ ସବୁବେଳେ ଖଦି ବିଷୟରେ କଥା ହେଉଛୁ । କେବଳ ଆପଣମାନଙ୍କ ପ୍ରଚେଷ୍ଟା ଯୋଗୁଁ ହିଁ ଆଜି ଦେଶରେ ଖଦୀର ବିକ୍ରି ଅନେକ ଗୁଣ ବୃଦ୍ଧି ପାଇଛି । ଗୋଟିଏ ଖଦୀଭଣ୍ଡାରରୁ ଦିନକରେ ଏକ କୋଟି ଟଙ୍କାରୁ ଅଧିକ ବିକ୍ରିବଟା ହେବାକଥା କ’ଣ କେହି ଚିନ୍ତା କରିପାରୁଥିଲା? କିନ୍ତୁ, ଆପଣମାନେ ଏକଥା ମଧ୍ୟ କରି ଦେଖାଇଲେ । ଆପଣ ଯେତେବେଳେ ବି କିଛି ଖଦି ତିଆରି ଜିନିଷ କିଣନ୍ତି, ସେତେବେଳେ ଏହାର ଲାଭ ଆମର ଗରିବ ବୁଣାକାର ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କୁ ହିଁ ମିଳିଥାଏ । ତେଣୁ, ଖଦି କିଣିବା ମଧ୍ୟ ଏକ ପ୍ରକାର ଜନସେବା, ଏକ ପ୍ରକାର ଦେଶସେବା । ମୋର ପ୍ରିୟ ଭାଇ-ଭଉଣୀମାନେ, ଆପଣମାନେ ମଧ୍ୟ ଗ୍ରାମାଞ୍ଚଳରେ ତିଆରି ହେଉଥିବା ହ୍ୟାଣ୍ଡଲୁମ ପ୍ରଡକ୍ଟସ କିଣିବା ପାଇଁ ଏବଂ ଏହାକୁ #MyHandloomMyPride ସହ ଶେୟାର କରିବାକୁ ମୋର ଅନୁରୋଧ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ସ୍ୱାଧୀନତା ଆନ୍ଦୋଳନ ଏବଂ ଖଦୀ କଥା ପଡ଼ିଥିବା ବେଳେ ପୂଜ୍ୟ ବାପୁଙ୍କ କଥା ମନେପଡ଼ିବା ସ୍ୱାଭାବିକ । ଯେମିତି ବାପୁଙ୍କ ନେତୃତ୍ୱରେ ଭାରତଛାଡ଼ ଆନ୍ଦୋଳନ ହୋଇଥିଲା, ଠିକ୍ ସେହିଭଳି, ଆଜି ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦେଶବାସୀଙ୍କୁ ଭାରତ ଯୋଡ଼ୋ ଆନ୍ଦୋଳନର ନେତୃତ୍ୱ ନେବାକୁ ହେବ । ଏହା ଆମ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ହେବା ଉଚିତ ଯେ ଆମେ ନିଜ କାମ ଏଭଳି ଢଙ୍ଗରେ କରିବା ଯାହା ବିବିଧତାରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଆମ ଭାରତକୁ ଯୋଡ଼ିବାରେ ସହାୟକ ହେବ । ତେବେ ଆସନ୍ତୁ, ଅମୃତ ମହୋତ୍ସବ ଅବସରରେ ଆମେ ଅମୃତ ସଂକଳ୍ପ ଗ୍ରହଣ କରିବା ଯେ, ଦେଶ ହିଁ ଆମର ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ଆସ୍ଥା, ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ଅଗ୍ରାଧିକାର ହୋଇରହୁ । ନେସନ୍ ଫାଷ୍ଟ୍, ଅଲ୍ୱେଜ୍ ଫାଷ୍ଟ୍ – ଏହି ମନ୍ତ୍ର ସହ ଆମକୁ ଆଗକୁ ବଢ଼ିବାକୁ ହେବ ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ, ଆଜି ମୁଁ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ ଶୁଣୁଥିବା ମୋର ଯୁବବନ୍ଧୁମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ବିଶେଷ କୃତଜ୍ଞତା ଜଣାଇବାକୁ ଚାହୁଁଛି । କିଛିଦିନ ତଳେ ହିଁ, ମାଇଁଗଭ୍ ତରଫରୁ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ର ଶ୍ରୋତାମାନଙ୍କୁ ନେଇ ଗୋଟିଏ ଅଧ୍ୟୟନ କରାଯାଇଥିଲା । ଏଥିରେ ଜଣାପଡ଼ିଲା ଯେ, ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ ପାଇଁ ବାର୍ତ୍ତା ଏବଂ ପ୍ରସ୍ତାବମାନ ପଠାଉଥିବା ଲୋକଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ପ୍ରାୟତଃ ୭୫ ପ୍ରତିଶତ ଲୋକଙ୍କର ବୟସ ୩୫ ବର୍ଷରୁ କମ୍ । ଅର୍ଥାତ, ଭାରତର ଯୁବଶକ୍ତିର ପ୍ରସ୍ତାବଗୁଡ଼ିକ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’କୁ ଦିଗଦର୍ଶନ ଦେଉଛନ୍ତି । ମୁଁ ଏହାକୁ ଗୋଟିଏ ବହୁତ ଭଲ ସଙ୍କେତ ବୋଲି ମନେ କରୁଛି । ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ ଏଭଳି ଏକ ମାଧ୍ୟମ ଯେଉଁଠି ରହିଛି ସକାରାତ୍ମକତା, ସମ୍ବେଦନଶୀଳତା । ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ରେ ଆମେ ସକାରାତ୍ମକ କଥାଗୁଡ଼ିକ କହିଥାଉ । ଏହାର ଚରିତ୍ର କଲେକ୍ଟିଭ୍ ବା ସମଷ୍ଟିଗତ । ସକାରାତ୍ମକ ଚିନ୍ତାଧାରା ଏବଂ ପ୍ରସ୍ତାବ ପାଇଁ ଭାରତର ଯୁବବର୍ଗଙ୍କ ଏହି ସକ୍ରିୟତା ମୋତେ ଆନନ୍ଦିତ କରୁଛି । ମୋତେ ଏକଥାକୁ ନେଇ ମଧ୍ୟ ଖୁସି ଲାଗୁଛି ଯେ, ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ ମାଧ୍ୟମରେ ମୋତେ ଯୁବମାନସକୁ ମଧ୍ୟ ଜାଣିବାର ସୁଯୋଗ ମିଳୁଛି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ଆପଣମାନଙ୍କଠୁ ମିଳିଥିବା ପ୍ରସ୍ତାବଗୁଡ଼ିକ ହିଁ, ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ର ପ୍ରକୃତ ଶକ୍ତି । ଆପଣମାନଙ୍କ ପ୍ରସ୍ତାବଗୁଡ଼ିକ ହିଁ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ ମାଧ୍ୟମରେ ଭାରତର ବିବିଧତାର ପରିପ୍ରକାଶ କରନ୍ତି, ଭାରତବାସୀଙ୍କ ସେବା ଓ ତ୍ୟାଗର ମହକ ଚତୁର୍ଦିଗରେ ପ୍ରସାରିତ କରନ୍ତି । ଆମ ପରିଶ୍ରମୀ ଯୁବବର୍ଗଙ୍କ ଇନୋଭେସନ୍ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପ୍ରେରଣା ଯୋଗାଇଥାଏ । ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ରେ ଆପଣମାନେ ଅନେକ ପ୍ରକାର ନୂଆ ଆଇଡିଆ ପଠାଇଥାନ୍ତି । ଆମେ ସବୁଗୁଡ଼ିକ ଉପରେ ତ ଆଲୋଚନା କରିପାରୁନାହୁଁ, କିନ୍ତୁ ସେଗୁଡ଼ିକ ମଧ୍ୟରୁ ଅନେକ ଆଇଡିଆ ମୁଁ ତତ୍ସଂଲଗ୍ନ ବିଭାଗଗୁଡ଼ିକୁ ନିଶ୍ଚୟ ଭାବେ ପଠାଇଥାଏଁ ଯାହାଫଳରେ ସେ ଦିଗରେ ଆଗକୁ କାର୍ଯ୍ୟ କରିହେବ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ମୁଁ ଆପଣମାନଙ୍କୁ ସାଇ ପ୍ରନୀଥଙ୍କ ପ୍ରଚେଷ୍ଟା ବିଷୟରେ ନିଶ୍ଚୟ ଜଣାଇବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଆନ୍ଧ୍ରପ୍ରଦେଶର ବାସିନ୍ଦା ସାଇ ପ୍ରନୀଥ ଜଣେ ସଫ୍ଟୱେୟାର ଇଞ୍ଜିନିୟର । ଗତବର୍ଷ ସେ ଲକ୍ଷ୍ୟ କଲେ ଯେ, ତାଙ୍କ ଅଞ୍ଚଳରେ ପାଣିପାଗର ଅସ୍ୱାଭାବିକତା ଯୋଗୁଁ ଚାଷୀମାନଙ୍କୁ ବହୁତ କ୍ଷତି ସହିବାକୁ ପଡ଼ିଥିଲା । ପାଣିପାଗ ବିଷୟରେ ବହୁତ ଆଗରୁ ତାଙ୍କର ଆଗ୍ରହ ରହିଥିଲା । ତେଣୁ ସେ ନିଜର ଆଗ୍ରହ ଏବଂ ନିଜର ପ୍ରତିଭାକୁ ଚାଷୀମାନଙ୍କ ହିତ ପାଇଁ ବ୍ୟବହାର କରିବାକୁ ନିଷ୍ପତ୍ତି ଗ୍ରହଣ କଲେ । ଏବେ ସେ ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ଡାଟା ସୋର୍ସରୁ ପାଣିପାଗ ସମ୍ପର୍କୀୟ ତଥ୍ୟ କିଣୁଛନ୍ତି, ଏହାର ବିଷ୍ଳେଷଣ କରୁଛନ୍ତି ଏବଂ ବିଭିନ୍ନ ମାଧ୍ୟମରେ ଆଞ୍ଚଳିକ ଭାଷାରେ ଏହି ସୂଚନା ଚାଷୀମାନଙ୍କ ନିକଟକୁ ପହଞ୍ଚାଉଛନ୍ତି । ପାଣିପାଗ ସମ୍ପର୍କୀୟ ସଦ୍ୟତମ ସୂଚନା ବ୍ୟତୀତ ପ୍ରନୀଥ ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ଜଳବାୟୁ ପରିସ୍ଥିତିରେ ଲୋକ କ’ଣ କରିବା ଦରକାର, ସେ ସମ୍ପର୍କରେ ମାର୍ଗଦର୍ଶନ ମଧ୍ୟ ଦେଉଛନ୍ତି । ବିଶେଷକରି ବନ୍ୟାରୁ ରକ୍ଷା ପାଇବା କିମ୍ବା ବଜ୍ରପାତରୁ କିଭଳି ସୁରକ୍ଷିତ ରହିହେବ ସେ ସମ୍ପର୍କରେ ଲୋକଙ୍କୁ ଜଣାଉଛନ୍ତି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ଏକ ପକ୍ଷରେ ଏହି ଯୁବ ସଫ୍ଟୱେୟାର ଇଞ୍ଜିନିୟରଙ୍କର ଏହି ପ୍ରୟାସ ମନକୁ ଛୁଇଁଯାଉଥିବା ବେଳେ ଅନ୍ୟପକ୍ଷରେ ଆମର ଅନ୍ୟ ଜଣେ ବନ୍ଧୁଙ୍କ ଦ୍ୱାରା କରାଯାଉଥିବା ପ୍ରଯୁକ୍ତିବିଦ୍ୟାର ଉପଯୋଗ ମଧ୍ୟ ଆପଣମାନଙ୍କୁ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟାନ୍ୱିତ କରିଦେବ । ଏହି ବନ୍ଧୁଜଣକ ହେଉଛନ୍ତି ଓଡ଼ିଶାର ସମ୍ବଲପୁର ଜିଲ୍ଲାର ଗୋଟିଏ ଗାଁରେ ବାସ କରୁଥିବା ଶ୍ରୀଯୁକ୍ତ ଇସାକ୍ ମୁଣ୍ଡା । ଇସାକ୍ ମହାଶୟ ଯିଏ ଦିନେ ଜଣେ ଦିନମଜୁରିଆ ଭାବେ କାମ କରୁଥିଲେ, ଆଜି ସେ ଜଣେ ଇଂଟରନେଟ୍ ସେନ୍ସେସନ୍ ପାଲଟିଯାଇଛନ୍ତି । ନିଜର ୟୁ-ଟ୍ୟୁବ୍ ଚ୍ୟାନେଲରୁ ସେ ପ୍ରଚୁର ଅର୍ଥ ଉପାର୍ଜନ କରୁଛନ୍ତି । ନିଜ ଭିଡିଓଗୁଡ଼ିକରେ ସେ ସ୍ଥାନୀୟ ବ୍ୟଞ୍ଜନ, ପାରମ୍ପରିକ ରନ୍ଧନଶୈଳୀ, ନିଜ ଗାଁ, ନିଜର ଜୀବନଶୈଳୀ, ପରିବାର ଏବଂ ଖାଦ୍ୟପେୟର ଅଭ୍ୟାସ ସମ୍ପର୍କରେ ପ୍ରଦର୍ଶିତ କରୁଛନ୍ତି । ଜଣେ ୟୁ-ଟ୍ୟୁବର୍ ଭାବେ ତାଙ୍କର ଯାତ୍ରା ମାର୍ଚ୍ଚ ୨୦୨୦ରେ ଆରମ୍ଭ ହୋଇଥିଲା, ଯେତେବେଳେ ସେ ଓଡ଼ିଶାର ସୁପ୍ରସିଦ୍ଧ ସ୍ଥାନୀୟ ଖାଦ୍ୟ ପଖାଳ ସହ ଜଡ଼ିତ ଗୋଟିଏ ଭିଡିଓ ପୋଷ୍ଟ କରିଥିଲେ । ସେବେଠାରୁ ସେ ଶହ ଶହ ଭିଡିଓ ପୋଷ୍ଟ କରିସାରିଛନ୍ତି । ତାଙ୍କର ଏହି ପ୍ରଚେଷ୍ଟା ଅନେକ କାରଣରୁ ନିଆରା । ବିଶେଷକରି ଏଥିପାଇଁ ଯେ, ଏହାଦ୍ୱାରା ସହରାଞ୍ଚଳରେ ରହୁଥିବା ଲୋକଙ୍କୁ ସେହି ଜୀବନଶୈଳୀ ଦେଖିବାର ସୁଯୋଗ ମିଳୁଛି, ଯାହା ବିଷୟରେ ସେମାନେ ବେଶୀ କିଛି ଜାଣନ୍ତିନି । ଇସାକ୍ ମୁଣ୍ଡା ମହାଶୟ ସଂସ୍କୃତି ଏବଂ ବ୍ୟଞ୍ଜନ ଉଭୟକୁ ମିଶାଇ ମନୋରଞ୍ଜନ କରୁଛନ୍ତି ଏବଂ ଆମ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ପ୍ରେରଣା ମଧ୍ୟ ଯୋଗାଉଛନ୍ତି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ଆମେ ଯେତେବେଳେ ପ୍ରଯୁକ୍ତିବିଦ୍ୟା କଥା କହୁଛୁ, ସେତେବେଳେ ମୁଁ ଆଉ ଗୋଟିଏ କୌତୂହଳପୂର୍ଣ୍ଣ ବିଷୟ ସମ୍ପର୍କରେ ଆଲୋଚନା କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ନିକଟରେ ଆପଣମାନେ ପଢ଼ିଥିବେ କିମ୍ବା ଦେଖିଥିବେ ଯେ, ଆଇଆଇଟି ମାଡ୍ରାସର ପୁରାତନ ଛାତ୍ରମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସ୍ଥାପିତ ଗୋଟିଏ ଷ୍ଟାର୍ଟ ଅପ୍ ଏକ ଥ୍ରୀଡି ପ୍ରିଂଟେଡ୍ ହାଉସ ପ୍ରସ୍ତୁତ କରିଛନ୍ତି । ଥ୍ରୀଡି ପ୍ରିଣ୍ଟ୍ କରି ଗୃହ ନିର୍ମାଣ ଅନ୍ତତଃ କିଭଳି ସମ୍ଭବ ହେଲା ? ପ୍ରକୃତରେ ଏହି ଷ୍ଟାର୍ଟ ଅପ୍ ସର୍ବପ୍ରଥମେ ଥ୍ରୀଡି ପ୍ରିଣ୍ଟରରେ ଗୋଟିଏ ଥ୍ରୀ ଡାଇମେନ୍ସନାଲ୍ ଡିଜାଇନକୁ ଫିଡ୍ କଲେ ଏବଂ ପରେ ଗୋଟିଏ ବିଶେଷ ଧରଣର କଂକ୍ରିଟ ମାଧ୍ୟମରେ ପରସ୍ତ ପରସ୍ତ କରି ଗୋଟିଏ ଥ୍ରୀଡି ଷ୍ଟ୍ରକ୍ଚର ନିର୍ମାଣ କରିଦେଲେ । ଆପଣମାନେ ଏକଥା ଜାଣି ଖୁସିହେବେ ଯେ, ସାରା ଦେଶରେ ଏହିଭଳି ଅନେକ ପରୀକ୍ଷା-ନିରୀକ୍ଷା ଚାଲିଛି । ଦିନ ଥିଲା ଯେତେବେଳେ ଛୋଟ ଛୋଟ ନିର୍ମାଣ କାର୍ଯ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ବହୁତ ବର୍ଷ ଲାଗିଯାଉଥିଲା । କିନ୍ତୁ ଏବେ ପ୍ରଯୁକ୍ତିବିଦ୍ୟା ଯୋଗୁଁ ଭାରତରେ ପରିସ୍ଥିତି ବଦଳୁଛି । ଆଗରୁ ଆମେ ବିଶ୍ୱର ଏଭଳି ଇନ୍ନୋଭେଟିଭ କମ୍ପାନୀଗୁଡ଼ିକୁ ଆମନ୍ତ୍ରିତ କରିବା ପାଇଁ ଗୋଟିଏ ଗ୍ଲୋବାଲ୍ ହାଉସିଂ ଟେକ୍ନୋଲୋଜି ଚ୍ୟାଲେଞ୍ଜ ଆରମ୍ଭ କରିଥିଲୁ । ଏହା ଦେଶରେ ଗୋଟିଏ ଭିନ୍ନ ଧରଣର ପ୍ରୟାସ । ତେଣୁ, ଆମେ ତାହାକୁ ବତୀଘର ପ୍ରକଳ୍ପ ଭାବେ ନାମିତ କରିଥିଲୁ । ଏବେ ଦେଶର ଛଅଟି ବତୀଘର ପ୍ରକଳ୍ପ କାର୍ଯ୍ୟ ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ସ୍ଥାନରେ ଦ୍ରୁତ ଗତିରେ ଚାଲିଛି । ଏହି ବତୀଘର ପ୍ରକଳ୍ପରେ ଆଧୁନିକ ପ୍ରଯୁକ୍ତିବିଦ୍ୟା ଏବଂ ଅଭିନବ ଉପାୟ ଅବଲମ୍ବନ କରାଯାଉଛି । ଏହାଦ୍ୱାରା ନିର୍ମାଣ କାର୍ଯ୍ୟ ଅବଧି ହ୍ରାସ ପାଉଛି । ତା’ସଙ୍ଗେ ସଙ୍ଗେ ନିର୍ମିତ ହେଉଥିବା ଗୃହଗୁଡ଼ିକ ଦୀର୍ଘସ୍ଥାୟୀ, ଶସ୍ତା ଏବଂ ଆରାମଦାୟକ ହୋଇପାରୁଛି । ମୁଁ ନିକଟରେ ଡ୍ରୋନ ଜରିଆରେ ଏହି କାର୍ଯ୍ୟଗୁଡ଼ିକର ସମୀକ୍ଷା କରିଥିଲି ଏବଂ କାର୍ଯ୍ୟର ପ୍ରଗତିକୁ ସିଧାସଳଖ ଦେଖିଲି ।

ଇନ୍ଦୋରର ପ୍ରୋଜେକ୍ଟରେ ଇଟା ଓ ସିମେଣ୍ଟର କାନ୍ଥ ବଦଳରେ ପ୍ରି-ଫେବ୍ରିକେଟେଡ ସ୍ୟାଣ୍ଡ୍ୱିଚ୍ ପ୍ୟାନେଲ୍ ସିଷ୍ଟମ୍ ବ୍ୟବହାର କରାଯାଉଛି । ରାଜକୋଟରେ ଏକ ବତିଘର ଫରାସୀ ପ୍ରଯୁକ୍ତିବିଦ୍ୟାରେ ନିର୍ମାଣ କରାଯାଉଛି, ଯେଉଁଥିରେ ଟନେଲ ମାଧ୍ୟମରେ ମନୋଲିଥିକ୍ କଂକ୍ରିଟ୍ କନଷ୍ଟ୍ରକ୍ସନ ଟେକ୍ନୋଲୋଜି ବ୍ୟବହାର କରାଯାଉଛି । ଏହି ଟେକ୍ନୋଲୋଜିରେ ତିଆରି ହେଉଥିବା ଘର ବିପର୍ଯ୍ୟୟର ସମ୍ମୁଖୀନ ହେବାରେ ଅଧିକ ସକ୍ଷମ ହେବ । ଚେନ୍ନାଇ, ଆମେରିକା ଓ ଫିନଲାଣ୍ଡରେ ଏହି ଟେକ୍ନୋଲୋଜି - ପ୍ରି-କାଷ୍ଟ୍ କଂକ୍ରିଟ୍ ସିଷ୍ଟମର ଉପଯୋଗ କରାଯାଉଛି । ଏହାଦ୍ୱାରା ଘର ଶୀଘ୍ର ତିଆରି ହେବ ଏବଂ ଖର୍ଚ୍ଚ ମଧ୍ୟ କମ୍ ହେବ । ରାଂଚିରେ ଜର୍ମାନୀର ଥ୍ରୀଡି ନିର୍ମାଣ ବ୍ୟବସ୍ଥାର ପ୍ରୟୋଗ କରାଯାଇ ଘର ତିଆରି କରାଯିବ । ଏଥିରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ କୋଠରିକୁ ଅଲଗା ଅଲଗା ତିଆରି କରାଯିବ, ପୁଣି ସମଗ୍ର ଷ୍ଟ୍ରକ୍ଚରକୁ ଏପରି ଯୋଡ଼ାଯିବ ଯେପରିକି ବ୍ଲକ୍ ଟଏଜକୁ ଯୋଡ଼ାଯାଏ । ଅଗରତାଲାରେ ନିଉଜିଲାଣ୍ଡ ଟେକ୍ନୋଲୋଜିର ଉପଯୋଗ କରି ଷ୍ଟିଲ୍ଫ୍ରେମ୍ ସହ ଘର ତିଆରି କରାଯାଉଛି, ଯାହା ବଡ଼ ଭୂମିକମ୍ପକୁ ମଧ୍ୟ ସମ୍ଭାଳିପାରିବ । ସେହିପରି ଲକ୍ଷ୍ନୌରେ କାନାଡାର ଟେକ୍ନୋଲୋଜି ବ୍ୟବହାର କରାଯାଉଛି । ଏଥିରେ ପଲସ୍ତରା ଏବଂ ରଙ୍ଗ କରାଯିବ ନାହିଁ ଓ ଖୁବଶୀଘ୍ର ଘର ତିଆରି ପାଇଁ ପୂର୍ବରୁ ହିଁ ନିର୍ମିତ କାନ୍ଥର ପ୍ରୟୋଗ କରାଯିବ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ଆଜି ଦେଶରେ ଏପରି ଚେଷ୍ଟା ହେଉଛି ଯେ ଏହି ପ୍ରକଳ୍ପ ଇନକ୍ୟୁବେସନ ସେଣ୍ଟର ଭଳି କାମ କରିବ । ଏହାଦ୍ୱାରା ଆମର ଯୋଜନାକାରୀ, ସ୍ଥପତି, ଇଂଜିନିୟର ଓ ବିଦ୍ୟାର୍ଥୀମାନେ ନୂଆ ପ୍ରଯୁକ୍ତିକୁ ଜାଣିପାରିବେ ଓ ତା’ର ପରୀକ୍ଷାନିରୀକ୍ଷା ମଧ୍ୟ କରିପାରିବେ । ମୁଁ ଏକଥାଗୁଡ଼ିକୁ ବିଶେଷଭାବେ ଆମର ଯୁବପିଢ଼ି ପାଇଁ କହୁଛି, ଯେପରିକି ଆମ ଯୁବକ ଯୁବତୀମାନେ ରାଷ୍ଟ୍ର ହିତରେ ପ୍ରଯୁକ୍ତର ନୂଆ ନୂଆ କ୍ଷେତ୍ରଗୁଡ଼ିକ ପ୍ରତି ଆକର୍ଷିତ ହୋଇପାରିବେ ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ, ଆପଣ ଇଂରେଜୀର ଗୋଟିଏ ପ୍ରବାଦ ଶୁଣିଥିବେ- “ଟୁ ଲର୍ଣ୍ଣ ଇଜ୍ ଟୁ ଗ୍ରୋ” ଅର୍ଥାତ ଶିଖିବା ହିଁ ଆଗକୁ ବଢ଼ିବା । ଯେତେବେଳେ ଆମେ କିଛି ନୂଆ ଶିଖୁ, ସେତେବେଳେ ଆମ ପାଇଁ ପ୍ରଗତିର ନୂଆ ନୂଆ ରାସ୍ତା ଆପେଆପେ ଖୋଲିଯାଏ । ଯେତେବେଳେ ବି କେଉଁଠି ନିଆରା କିଛି ନୂଆ କରିବାର ପ୍ରୟାସ ହୋଇଛି, ମାନବତା ପାଇଁ ନୂଆ ଦ୍ୱାର ଖୋଲିଛି, ଗୋଟିଏ ନୂଆ ଯୁଗର ଆରମ୍ଭ ହୋଇଛି । ଆଉ ଆପଣ ଦେଖିଥିବେ ଯେତେବେଳେ କେଉଁଠି କିଛି ନୂଆ ହୁଏ, ତା’ର ପରିଣାମ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଲୋକଙ୍କୁ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟଚକିତ କରିଦିଏ । ଯେପରିକି ମୁଁ ଯଦି ଆପଣଙ୍କୁ ଏବେ ପଚାରିବି ଯେ ସେଓ ଓ ଆପଲ୍ ସହ ଆପଣ କେଉଁ ରାଜ୍ୟକୁ ଯୋଡ଼ିବେ? ତାହାଲେ ସର୍ବପ୍ରଥମେ ଆପଣଙ୍କ ମନରେ ନିଶ୍ଚିତ ଭାବେ ହିମାଚଳ ପ୍ରଦେଶ, ଜମ୍ମୁକଶ୍ମୀର ଓ ଉତ୍ତରାଖଣ୍ଡର ନାମ ଆସିବ । କିନ୍ତୁ ଯଦି ମୁଁ କହିବି ଯେ ଏଇ ତାଲିକାରେ ଆପଣ ମଣିପୁରର ନାଁ ମଧ୍ୟ ଯୋଡ଼ିଦିଅନ୍ତୁ ତେବେ ବୋଧହୁଏ ଆପଣ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ହୋଇଯିବେ । କିଛି ନୂଆ କରିବାର ଉତ୍ସାହ ଉଦ୍ଦୀପନାରେ ଭରା ଯୁବକ ଯୁବତୀ ମଣିପୁରରେ ଏହି ଅଦ୍ଭୁତ କାର୍ଯ୍ୟ କରି ଦେଖାଇଛନ୍ତି । ଆଜିକାଲି ମଣିପୁରର ଉଖରୁଲ୍ ଜିଲାରେ ବହୁ ପରିମାଣରେ ସେଓ ଚାଷ ହେଉଛି । ଏଠାକାର ଚାଷୀମାନେ ନିଜ ବଗିଚାରେ ସେଓ ଉତ୍ପାଦନ କରୁଛନ୍ତି । ସେଓ ଉତ୍ପାଦନ ପାଇଁ ଏମାନେ ହିମାଚଳ ଯାଇ ବିଧିବଦ୍ଧଭାବେ ତାଲିମ ମଧ୍ୟ ନେଇଛନ୍ତି । ଏମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଜଣେ ହେଲେ ଟି ଏସ୍ ରିଙ୍ଗଫାମି ୟୋଙ୍ଗ୍ । ସେ ପେସାରେ ଜଣେ ଏରୋନଟିକାଲ୍ ଇଂଜିନିୟର୍ । ସେ ନିଜ ପତ୍ନୀ ଶ୍ରୀମତୀ ଟି.ଏସ୍. ଏଞ୍ଜେଲଙ୍କ ସହ ମିଶି ସେଓ ଉତ୍ପାଦନ କରୁଛନ୍ତି । ସେହିପରି ଅବୁଙ୍ଗଶୀ ଶିମରେ ଅଗଷ୍ଟିନା ମଧ୍ୟ ନିଜ ବଗିଚାରେ ସେଓ ଉତ୍ପାଦନ କରୁଛନ୍ତି । ଅବୁଙ୍ଗଶୀ ଦିଲ୍ଲୀରେ ଚାକିରି କରୁଥିଲେ । ତାକୁ ଛାଡ଼ି ସେ ନିଜ ଗାଁକୁ ଫେରିଆସିଲେ ଏବଂ ସେଓ ଚାଷ ଆରମ୍ଭ କଲେ । ମଣିପୁରରେ ଆଜି ଏପରି ଅନେକ ସେଓ ଉତ୍ପାଦକ ଅଛନ୍ତି, ଯେଉଁମାନେ କିଛି ଅଲଗା ଓ ନୂଆ କରିକି ଦେଖାଇଛନ୍ତି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ଆମର ଆଦିବାସୀ ସମ୍ପ୍ରଦାୟରେ କୋଳି ବହୁତ ଲୋକପ୍ରିୟ । ଆଦିବାସୀମାନେ ସବୁବେଳେ କୋଳି ଚାଷ କରିଥାନ୍ତି । କିନ୍ତୁ କୋଭିଡ-୧୯ ମହାମାରୀ ପରେ ଏହି ଚାଷ ବିଶେଷ ଭାବେ ବୃଦ୍ଧି ପାଉଛି । ତ୍ରିପୁରାର ଉନାକୋଟିରେ ଏହିପରି ୩୨ ବର୍ଷର ମୋର ଯୁବ ବନ୍ଧୁ ହେଲେ ବିକ୍ରମଜିତ ଚକମା । ସେ ବରକୋଳି ସେଓ ଚାଷ ଆରମ୍ଭ କରି ବହୁତ ଲାଭ ମଧ୍ୟ ପାଇଛନ୍ତି ଏବଂ ଏବେ ସେ ଲୋକଙ୍କୁ ବରକୋଳିସେଓ ଚାଷ କରିବା ପାଇଁ ପ୍ରେରଣା ମଧ୍ୟ ଦେଉଛନ୍ତି । ରାଜ୍ୟ ସରକାର ମଧ୍ୟ ଏପରି ଲୋକଙ୍କୁ ସାହାଯ୍ୟ କରିବା ପାଇଁ ଆଗେଇ ଆସିଛନ୍ତି । ସରକାରଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଏଥିପାଇଁ କେତେକ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ନର୍ସରି ତିଆରି କରାଯାଇଛି, ଯେପରିକି ବରକୋଳି ସେଓ ଚାଷ ସହ ସମ୍ପୃକ୍ତ ଲୋକଙ୍କ ଚାହିଦା ପୂରଣ କରାଯାଇପାରିବ । ଚାଷରେ ନୂଆ ନୂଆ ପ୍ରୟୋଗ ମଧ୍ୟ ହେଉଛି ତ ଚାଷର ବାଇ ପ୍ରଡକ୍ଟରେ ମଧ୍ୟ ସୃଜନଶୀଳତା ଦେଖିବାକୁ ମିଳୁଛି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ଉତ୍ତରପ୍ରଦେଶର ଲଖିମପୁର ଖିରିରେ କରାଯାଇଥିବା ଏକ ପ୍ରୟାସ ସମ୍ପର୍କରେ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଅବଗତ ହୋଇଛି । କୋଭିଡ ସମୟରେ ହିଁ ଲଖିମପୁର ଖିରିରେ ଏକ ନିଆରା ପ୍ରଚେଷ୍ଟା ହୋଇଛି । ସେଠାକାର ମହିଳାମାନେ କଦଳୀପଟୁଆରୁ ଫାଇବର ତିଆରି କରିବାର ତାଲିମ ଦେବାର କାମ ଆରମ୍ଭ କରିଛନ୍ତି । ୱେଷ୍ଟରୁ ବେଷ୍ଟ୍ କରିବାର ମାର୍ଗ । କଦଳୀପଟୁଆକୁ କାଟି ମେସିନ ସାହାଯ୍ୟରେ ବାନାନା ଫାଇବର୍ ତିଆରି କରାଯାଏ, ଯାହା ଝୋଟ ବା ଛଣ ଭଳି ହୋଇଥାଏ । ଏହି ଫାଇବରରୁ ହ୍ୟାଣ୍ଡବ୍ୟାଗ୍, ଚଟେଇ, ଦରି ଆଦି ଅନେକ ପ୍ରକାରର ଜିନିଷ ତିଆରି ହୋଇଥାଏ । ଏହାଦ୍ୱାରା ଗୋଟିଏ ପଟେ ଫସଲ ଆବର୍ଜନାର ବ୍ୟବହାର ଆରମ୍ଭ ହୋଇଗଲା, ଅନ୍ୟପଟେ ଗାଁରେ ରହୁଥିବା ଆମର ମାଆଭଉଣୀମାନଙ୍କୁ ଆୟର ଆଉ ଏକ ସାଧନ ମିଳିଗଲା । ବାନାନା ଫାଇବର ଏହି କାମରୁ ଜଣେ ସ୍ଥାନୀୟ ମହିଳାଙ୍କୁ ଚାରି ଶହରୁ ଛଅ ଶହ ଟଙ୍କା ଦୈନିକ ଆୟ ହୋଇଯାଏ । ଲଖିମପୁର ଖିରିରେ ଶହଶହ ଏକର ଜମିରେ କଦଳୀ ଚାଷ ହୋଇଥାଏ । କଦଳି ଫସଲ ପରେ ସାଧାରଣତଃ ଚାଷୀମାନେ ଏହାର ପଟୁଆକୁ ଫିଙ୍ଗିବା ପାଇଁ ଅଲଗା ଖର୍ଚ୍ଚ କରିବାକୁ ପଡ଼ୁଥିଲା । ଏବେ ସେମାନଙ୍କ ସେହି ପଇସା ମଧ୍ୟ ବଞ୍ଚିଯାଉଛି, ଅର୍ଥାତ “ଆମ୍ କେ ଆମ୍ ଗୁଠଲିୟୋଁ କେ ଦାମ୍” ରୁଢ଼ିଟି ଏ କ୍ଷେତ୍ରରେ ସଂପୂର୍ଣ୍ଣ ଠିକ୍ ସାବ୍ୟସ୍ତ ହୋଇଛି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ଗୋଟିଏ ପଟେ ବାନାନା ଫାଇବରରୁ ଜିନିଷପତ୍ର ତିଆରି କରାଯାଉଛି, ଅନ୍ୟପଟେ କଦଳୀର ଅଟାରୁ ଦୋସା ଓ ଗୁଲାବଜାମୁନ ପରି ସ୍ୱାଦିଷ୍ଟ ବ୍ୟଞ୍ଜନ ମଧ୍ୟ ତିଆରି ହେଉଛି । କର୍ଣ୍ଣାଟକର ଉତ୍ତର କନ୍ନଡ଼ ଏବଂ ଦକ୍ଷିଣ କନ୍ନଡ଼ ଜିଲାଗୁଡ଼ିକରେ ମହିଳାମାନେ ଏହି ଅସାଧାରଣ କାର୍ଯ୍ୟ କରୁଛନ୍ତି । ଏହାର ଆରମ୍ଭ ମଧ୍ୟ କରୋନା କାଳରେ ହିଁ ହୋଇଛି । ଏହି ମହିଳାମାନେ କେବଳ କଦଳୀ ଅଟାରୁ ଦୋସା, ଗୁଲାବଜାମୁନ୍ ଭଳି ଜିନିଷ ତିଆରି କରୁନାହାନ୍ତି, ବରଂ ସେଗୁଡ଼ିକର ଛବିକୁ ସୋସିଆଲ୍ ମିଡିଆରେ ମଧ୍ୟ ଶେୟାର୍ କରିଛନ୍ତି । ଯେତେବେଳେ ଅଧିକ ଲୋକ କଦଳୀ ଅଟା ସମ୍ପର୍କରେ ଜାଣିଲେ ସେତେବେଳେ ତା’ର ଚାହିଦା ମଧ୍ୟ ବଢ଼ିଲା ଓ ଏହି ମହିଳାଙ୍କର ଆମଦାନୀ ମଧ୍ୟ ବଢ଼ିଗଲା । ଲଖିମପୁର ଖିରି ଭଳି ଏଠାରେ ମଧ୍ୟ ମହିଳାମାନେ ହିଁ ଇନ୍ନୋଭେଟିଭ୍ ଆଇଡିଆକୁ କାର୍ଯ୍ୟକାରୀ କରିବାରେ ଆଗୁଆ ଅଛନ୍ତି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ଏପରି ଉଦାହରଣ ଜୀବନରେ କିଛି ନୂଆ କରିବାର ପ୍ରେରଣା ପାଲଟିଯାଏ । ଆପଣଙ୍କ ଆଖପାଖରେ ମଧ୍ୟ ଏପରି ଅନେକ ଲୋକ ରହିଥିବେ । ଯେତେବେଳେ ଆପଣଙ୍କ ପରିବାରରେ ଆପଣ ମନଖୋଲି କଥା ହେଉଥାନ୍ତି, ସେତେବେଳେ ଆପଣ ଏଗୁଡ଼ିକୁ ମଧ୍ୟ ନିଜର ଗପସପର ଅଂଶ କରନ୍ତୁ । କେବେ ସମୟ ବାହାର କରି ପିଲାଙ୍କ ସହ ଏପରି ପ୍ରୟାସଗୁଡ଼ିକୁ ଦେଖିବାକୁ ମଧ୍ୟ ଯାଆନ୍ତୁ ଏବଂ ସୁଯୋଗ ମିଳିଲେ ନିଜେ ମଧ୍ୟ ଏପରି କିଛି କରିଦେଖାନ୍ତୁ । ଆଉ ହଁ, ଏସବୁକୁ ଆପଣ ମୋ ସଂଗେ ନମୋଆପ୍ ବା ମାଇଁଗଭରେ ଯଦି ବାଣ୍ଟିପାରିବେ ମୋତେ ଆହୁରି ଭଲ ଲାଗିବ ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ, ଆମର ସଂସ୍କୃତ ଗ୍ରନ୍ଥରେ ଏକ ଶ୍ଳୋକ ଅଛି-

ଆତ୍ମାର୍ଥମ୍ ଜୀବ ଲୋକେ ଅସ୍ମିନ୍, କୋ ନ ଜୀବତି ମାନବଃ ।

ପରମ୍ ପରୋପକାରାର୍ଥମ୍, ୟୋ ଜୀବତି ଓ ଜୀବତି ।

ଅର୍ଥାତ୍ ନିଜ ପାଇଁ ତ ସଂସାରରେ ସମସ୍ତେ ବଞ୍ଚନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ବାସ୍ତବରେ ସେହି ବ୍ୟକ୍ତି ହିଁ ଅମର ହୋଇଥାଏ ଯିଏ ପରୋପକାର ପାଇଁ ବଂଚେ । ଭାରତମାତାର ପୁଅଝିଅଙ୍କ ପରୋପକାରୀ ପ୍ରୟାସର କଥା- ଏହାହିଁ ତ ‘ମନ୍ କୀ ବାତ୍’ । ଆଜି ମଧ୍ୟ ଏପରି କେତେକ ବନ୍ଧୁଙ୍କ ସମ୍ପର୍କରେ ଆସନ୍ତୁ ଆଲୋଚନା କରିବା । ଜଣେ ବନ୍ଧୁ ଚଣ୍ଡିଗଡ଼ ସହରର । ଚଣ୍ଡିଗଡ଼ରେ, ମୁଁ ମଧ୍ୟ କିଛି ବର୍ଷ ରହିଥିଲି । ଏହା ବହୁତ ଆନନ୍ଦମୟ ଆଉ ସୁନ୍ଦର ସହର ଅଟେ । ଏଠାରେ ରହୁଥିବା ଲୋକ ମଧ୍ୟ ହୃଦୟବାନ ଏବଂ ହଁ, ଯଦି ଆପଣ ଖାଦ୍ୟପ୍ରିୟ, ତେବେ ଏଠି ଆପଣଙ୍କୁ ଆହୁରି ଖୁସି ଲାଗିବ । ଏହି ଚଣ୍ଡିଗଡ଼ର ସେକ୍ଟର ୨୯ରେ ସଂଜୟ ରାଣା ଫୁଡଷ୍ଟଲ୍ ଚଳାନ୍ତି ଆଉ ସାଇକଲରେ ଛୋଲେ-ଭଟୁରେ ବିକ୍ରି କରନ୍ତି । ଦିନେ ତାଙ୍କ ଝିଅ ରିଦ୍ଧିମା ଆଉ ଭାଣିଜୀ ରିୟା ଗୋଟିଏ ଆଇଡିଆ ନେଇ ତାଙ୍କ ପାଖକୁ ଆସିଲେ । ଦୁଇଜଣ ତାଙ୍କୁ କୋଭିଡ଼ ଟିକା ନେଇଥିବା ଲୋକଙ୍କୁ ମାଗଣା ଛୋଲେ-ଭଟୁରେ ଖୁଆଇବାକୁ କହିଲେ । ସେ ଏଥିପାଇଁ ଖୁସିରେ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହୋଇଗଲେ । ସେ ସାଂଗେସାଂଗେ ଏହି ଉତ୍ତମ ଓ ସୁନ୍ଦର ପ୍ରୟାସ ଆରମ୍ଭ ମଧ୍ୟ କରିଦେଲେ । ସଂଜୟ ରାଣାଙ୍କ ଛୋଲେ-ଭଟୁରେ ମାଗଣାରେ ଖାଇବା ପାଇଁ ଆପଣଙ୍କୁ ସେହିଦିନ ଟିକା ନେଇଥିବା ଦେଖାଇବାକୁ ପଡ଼ିବ । ଟିକାର ମେସେଜ୍ ଦେଖାଇବା ମାତ୍ରେ ସେ ଆପଣଙ୍କୁ ସ୍ୱାଦିଷ୍ଟ ଛୋଲେ-ଭଟୁରେ ଦେଇଦେବେ । କୁହାଯାଏ, ସମାଜର ମଙ୍ଗଳ କରିବା ପାଇଁ ଅର୍ଥଠୁ ଅଧିକ ସେବାଭାବ, କର୍ତ୍ତବ୍ୟଭାବର ଅଧିକ ଆବଶ୍ୟକତା ହୋଇଥାଏ । ଆମର ସଂଜୟ ଭାଇ ଏହାକୁ ସତ୍ୟ ସାବ୍ୟସ୍ତ କରୁଛନ୍ତି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ଏପରି ଆଉ ଏକ କାମର ଚର୍ଚ୍ଚା ଆଜି କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଏହି କାମ ହେଉଛି ତାମିଲନାଡୁର ନୀଳଗିରିରେ । ସେଠାରେ ରାଧିକା ଶାସ୍ତ୍ରୀ ଏମ୍ବୁରେକ୍ସ ପ୍ରୋଜେକ୍ଟ ଆରମ୍ଭ କରିଛନ୍ତି । ଏହି ପ୍ରୋଜେକ୍ଟରର ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ହେଉଛି ପାହାଡ଼ିଆ ଅଞ୍ଚଳରେ ରୋଗୀଙ୍କର ଚିକିତ୍ସା ପାଇଁ ସହଜ ପରିବହନ ଉପଲବ୍ଧ କରାଇବା । ରାଧିକା କୁନ୍ନୁରରେ ଏକ କାଫେ ଖୋଲିଛନ୍ତି । ସେ ନିଜ କାଫେର ସାଥୀମାନଙ୍କ ସହ ଏମ୍ବୁରେକ୍ସ ପାଇଁ ପାଣ୍ଠି ସଂଗ୍ରହ କଲେ । ନୀଳଗିରି ପାହାଡ଼ରେ ଆଜି ୬ ଏମ୍ବୁରେକ୍ସ ସେବାରତ ଅଛନ୍ତି ଏବଂ ଦୂରଦୂରାନ୍ତ ଅଞ୍ଚଳରେ ଏମର୍ଜେନ୍ସି ସମୟରେ ରୋଗୀଙ୍କ ସହାୟତା କରୁଛନ୍ତି । ଏମ୍ବୁରେକ୍ସରେ ଷ୍ଟ୍ରେଚର୍, ଅକ୍ସିଜେନ ସିଲିଣ୍ଡର୍, ଫାଷ୍ଟ୍ ଏଡ୍ ବକ୍ସ ଭଳି ଅନେକ ଜିନିଷର ବ୍ୟବସ୍ଥା ରହିଛି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ସଂଜୟ ରାଣା ହୁଅନ୍ତୁ ବା ରାଧିକା ଶାସ୍ତ୍ରୀ, ଏମାନଙ୍କ ଉଦାହରଣରୁ ଜାଣିହୁଏ ଯେ ଆମେ ନିଜର କାର୍ଯ୍ୟ, ନିଜର ବ୍ୟବସାୟ, ଚାକିରି କରୁଥିବାବେଳେ ମଧ୍ୟ ସେବା କାର୍ଯ୍ୟ କରିପାରିବା ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, କିଛିଦିନ ପୂର୍ବରୁ ଗୋଟିଏ ବହୁତ ମଜାଦାର ଓ ବହୁତ ଆବେଗଭରା ଘଟଣା ଘଟିଥିଲା, ଯାହାଦ୍ୱାରା ଭାରତ-ଜର୍ଜିଆ ମୈତ୍ରୀକୁ ନୂଆ ଶକ୍ତି ମିଳିଲା । ଏହି ସମାରୋହରେ ଭାରତର ସେଣ୍ଟ୍ କୁଇନ୍ କେଟେଭାନର ହୋଲି ରେଲିକ୍ ଅର୍ଥାତ ତାଙ୍କର ପବିତ୍ର ସ୍ମୃତିଚିହ୍ନ ଜର୍ଜିଆର ସରକାର ଓ ସେଠାକାର ଜନତାକୁ ସମର୍ପଣ କଲେ, ଏଥିପାଇଁ ଆମର ବିଦେଶ ମନ୍ତ୍ରୀ ସ୍ୱୟଂ ସେଠାକୁ ଯାଇଥିଲେ । ବହୁତ ଭାବପୂର୍ଣ୍ଣ ପରିବେଶରେ ହୋଇଥିବା ଏହି ସମାରୋହରେ ଜର୍ଜିଆର ରାଷ୍ଟ୍ରପତି, ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ, ତାଙ୍କ ଧର୍ମଗୁରୁ ଏବଂ ବହୁସଂଖ୍ୟକ ଜର୍ଜିଆବାସୀ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ । ଏହି କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମରେ ଭାରତର ପ୍ରଶଂସା କରି ଯେଉଁ ଶବ୍ଦଗୁଡ଼ିକ କୁହାଯାଇଥିଲା, ତାହା ବହୁତ ସ୍ମରଣୀୟ । ଏହି ଗୋଟିଏ ସମାରୋହରେ ଦୁଇ ଦେଶ ସହିତ, ଗୋଆ ଓ ଜର୍ଜିଆ ମଧ୍ୟରେ ସମ୍ବନ୍ଧକୁ ମଧ୍ୟ ଆହୁରି ପ୍ରଗାଢ଼ କରିଦେଇଛି । ଏପରି ଏଥିପାଇଁ ଯେ ସେଣ୍ଟ୍ କୁଇନ କେଟେଭାନଙ୍କ ଏହି ପବିତ୍ର ଅବଶେଷ ୨୦୦୫ରେ ଗୋଆର ସେଣ୍ଟ୍ ଅଗଷ୍ଟାଇନ ଚର୍ଚ୍ଚରୁ ମିଳିଥିଲା ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ଆପଣଙ୍କ ମନରେ ପ୍ରଶ୍ନ ଆସୁଥିବ ଯେ ଏସବୁ କ’ଣ, ଏହା କେବେ ଓ କିପରି ହୋଇଥିଲା ? ପ୍ରକୃତରେ, ଏହା ଆଜିଠାରୁ ଚାରି ଶହ ପାଞ୍ଚ ଶହ ବର୍ଷ ତଳର କଥା । କୁଇନ କେଟେଭାନ ଥିଲେ ଜର୍ଜିଆର ରାଜକନ୍ୟା । ଦଶବର୍ଷର କାରାବାସ ପରେ ୧୬୨୪ ଖ୍ରୀଷ୍ଟାବ୍ଦରେ ସେ ସହିଦ ହୋଇଯାଇଥିଲେ । ଏକ ପ୍ରାଚୀନ ପର୍ତ୍ତୁଗାଲି ଦସ୍ତାବିଜ୍ ଅନୁସାରେ ସେଣ୍ଟ୍ କୁଇନ୍ କେଟେଭାନଙ୍କ ଅସ୍ଥିକୁ ଓଲ୍ଡ ଗୋଆର ସେଣ୍ଟ୍ ଅଗଷ୍ଟାଇନ କନଭେଟରେ ରଖାଯାଇଥିଲା । କିନ୍ତୁ, ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଧରି ଏହା ଧରାଯାଉଥିଲା ଯେ ଗୋଆରେ ସମାଧି ଦିଆଯାଇଥିବା ତାଙ୍କର ଅବଶେଷ ୧୯୩୦ ମସିହାର ଭୂମିକମ୍ପରେ ଉଭାନ ହୋଇଯାଇଥିଲା ।

ଭାରତ ସରକାର ଓ ଜର୍ଜିଆର ଐତିହାସିକ, ଗବେଷକ, ପ୍ରତ୍ନତତ୍ୱବିତ୍ ଓ ଜର୍ଜିଆନ୍ ଚର୍ଚ୍ଚର ଦଶନ୍ଧି ଧରି ନିରନ୍ତର ପ୍ରୟାସ ପରେ ୨୦୦୫ରେ ସେହି ପବିତ୍ର ଅବଶେଷକୁ ଖୋଜିବାରେ ସଫଳତା ମିଳିଥିଲା । ଏହି ବିଷୟ ଜର୍ଜିଆର ଲୋକଙ୍କ ପାଇଁ ବହୁତ ଭାବନାତ୍ମକ ଅଟେ । ସେଥିପାଇଁ ତାଙ୍କର ଐତିହାସିକ, ଧାର୍ମିକ ଓ ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ଭାବାବେଗକୁ ଧ୍ୟାନରେ ରଖି ଭାରତ ସରକାର ଏହି ଅବଶେଷର ଏକ ଅଂଶ ଜର୍ଜିଆର ଲୋକଙ୍କୁ ଉପହାର ସ୍ୱରୂପ ଦେବାର ନିଷ୍ପତ୍ତି ନେଲେ । ଭାରତ ଓ ଜର୍ଜିଆର ସାଧାରଣ ଇତିହାସର ଏହି ଅସାଧାରଣ ଘଟଣାକୁ ସଜାଇ ରଖିବା ପାଇଁ ମୁଁ ଆଜି ଗୋଆର ଜନସାଧାରଣଙ୍କୁ ହୃଦୟର ସହିତ ଧନ୍ୟବାଦ ଦେବାକୁ ଚାହିଁବି । ଗୋଆ ଅନେକ ମହାନ ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ଐତିହ୍ୟର ଭୂମି ରହିଆସିଛି । ସେଣ୍ଟ୍ ଅଗଷ୍ଟାଇନ ଚର୍ଚ୍ଚ, ୟୁନେସ୍କୋର ବିଶ୍ୱ ଐତିହ୍ୟସ୍ଥଳୀ ମାନ୍ୟତାପ୍ରାପ୍ତ - ଚର୍ଚ୍ଚେସ୍ ଆଣ୍ଡ୍ କନଭେଟସ ଅଫ୍ ଗୋଆର ଏକ ଅଂଶ ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ, ଜର୍ଜିଆରୁ ଏବେ ମୁଁ ଆପଣଙ୍କୁ ସିଧା ସିଙ୍ଗାପୁର ନେଇଯାଉଛି, ଯେଉଁଠି ଏହି ମାସ ଆରମ୍ଭରେ ଆଉ ଏକ ଗୌରବଶାଳୀ ଘଟଣା ସାମ୍ନାକୁ ଆସିଛି । ସିଙ୍ଗାପୁରର ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ଏବଂ ମୋର ବନ୍ଧୁ, ଲୀ ସେନ ଲୁଙ୍ଗ୍ ଏଇ ନିକଟରେ ପୁର୍ନନିର୍ମାଣ କରାଯାଇଥିବା ସିଲାଟ୍ ରୋଡ଼ ଗୁରୁଦ୍ୱାରାର ଉଦ୍ଘାଟନ କରିଥିଲେ । ସେ ପାରମ୍ପରିକ ଶିଖ୍ ପଗଡି ମଧ୍ୟ ପିନ୍ଧିଥିଲେ । ଏହି ଗୁରୁଦ୍ୱାରା ପ୍ରାୟ ଶହେ ବର୍ଷ ତଳେ ନିର୍ମିତ ହୋଇଥିଲା ଏବଂ ଏଠାରେ ଭାରତ ମହାରାଜ ସିଂହଙ୍କୁ ସମର୍ପିତ ଏକ ସ୍ମାରକ ମଧ୍ୟ ଅଛି । ଭାଇ ମହାରାଜ ସିଂହ ଜୀ ଭାରତର ସ୍ୱାଧୀନତା ପାଇଁ ଲଢ଼େଇ ଲଢ଼ିଥିଲେ ଏବଂ ଏବେ ସ୍ୱାଧୀନତାର ୭୫ ବର୍ଷ ପାଳନ କରୁଥିବା ସମୟରେ ଆହୁରି ଅଧିକ ପ୍ରେରଣାଦାୟକ ହୋଇଯାଏ । ଦୁଇ ଦେଶ ମଧ୍ୟରେ, ପିପୁଲ୍ ଟୁ ପିପୁଲ୍ କନେକ୍ଟ, ଏପରି କଥା, ଏପରି ପ୍ରୟାସରେ ହିଁ ମଜଭୁତ ହୋଇଥାଏ । ଏଥିରୁ ଏହା ମଧ୍ୟ ଜାଣିହୁଏ ଯେ ସୌହାର୍ଦ୍ଦ୍ୟପୂର୍ଣ୍ଣ ପରିବେଶରେ ରହିବା ଏବଂ ଜଣେ ଅପରର ସଂସ୍କୃତିକୁ ବୁଝିବାର କେତେ ମହତ୍ୱ ରହିଛି ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ, ଆଜି ‘ମନ୍ କୀ ବାତ୍’ରେ ଆମେ ଅନେକ ବିଷୟ ଆଲୋଚନା କଲେ । ଆଉ ଗୋଟିଏ ବିଷୟ ଅଛି ଯାହା ମୋ ହୃଦୟର ଖୁବ୍ ନିକଟତର । ଏହି ବିଷୟ ଜଳ ସଂରକ୍ଷଣର । ମୋ ଶୈଶବ ଯେଉଁଠି କଟିଥିଲା, ସେଇଠି ସବୁବେଳେ ପାଣିର ଅଭାବ ରହିଥାଏ । ଆମେ ବର୍ଷାକୁ ସବୁବେଳେ ଅପେକ୍ଷା କରୁଥିଲୁ ଏବଂ ସେଥିପାଇଁ ପାଣିର ଗୋଟିଏ ଗୋଟିଏ ବୁନ୍ଦା ସଂରକ୍ଷିତ କରି ରଖିବା ଆମ ସଂସ୍କାରର ଏକ ଅଂଶ ହୋଇଯାଇଥିଲା । ଏବେ “ଜନଭାଗିଦାରୀରେ ଜଳ ସଂରକ୍ଷଣ” ଏହି ମନ୍ତ୍ର ସେଠାକାର ଚିତ୍ରକୁ ବଦଳାଇ ଦେଇଛି । ପାଣିର ଗୋଟିଏ ଗୋଟିଏ ବୁନ୍ଦା ସଂରକ୍ଷଣ କରିବା, କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ପାଣି ନଷ୍ଟ ହେବାକୁ ନ ଦେବା, ଏହା ଆମ ଜୀବନଶୈଳୀର ଏକ ସହଜ ଅଂଶ ହୋଇଯିବା ଉଚିତ । ଆମ ପରିବାରର ଏହା ପରମ୍ପରା ହୋଇଯିବା ଆବଶ୍ୟକ, ଯାହାକୁ ନେଇ ପ୍ରତ୍ୟେକ ସଦସ୍ୟ ଗର୍ବ କରିବେ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ, ପ୍ରକୃତି ଓ ପରିବେଶର ସୁରକ୍ଷା ଭାରତର ସାଂସ୍କୃତିକ ଜୀବନରେ, ଆମର ଦୈନିକ ଜୀବନରେ ଅଙ୍ଗାଙ୍ଗୀ ଭାବେ ଜଡ଼ିତ । ସେହିପରି ବର୍ଷା ଓ ମୌସୁମି ସବୁବେଳେ ଆମର ବିଚାର, ଆମର ଦର୍ଶନ ଓ ଆମର ସଭ୍ୟତାକୁ ରୂପ ପ୍ରଦାନ କରିଆସିଛି । ଋତୁସଂହାର ଓ ମେଘଦୂତରେ ମହାକବି କାଳିଦାସ ବର୍ଷାକୁ ନେଇ ବହୁତ ସୁନ୍ଦର ବର୍ଣ୍ଣନା କରିଛନ୍ତି । ସାହିତ୍ୟପ୍ରେମୀଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଏହି କବିତା ଆଜି ମଧ୍ୟ ବହୁତ ଲୋକପ୍ରିୟ । ଋଗବେଦର ପର୍ଜନ୍ୟ ସୂକ୍ତରେ ମଧ୍ୟ ବର୍ଷାର ସୌନ୍ଦର୍ଯ୍ୟ ସମ୍ପର୍କରେ ଅନୁପମ ବର୍ଣ୍ଣନା ରହିଛି । ସେହିପରି ଶ୍ରୀମଦ୍ ଭାଗବତରେ ମଧ୍ୟ କାବ୍ୟାତ୍ମକ ରୂପରେ ପୃଥିବୀ, ସୂର୍ଯ୍ୟ ଓ ବର୍ଷା ଭିତରେ ରହିଥିବା ସମ୍ପର୍କକୁ ବିସ୍ତୃତ ଭାବେ ଦିଆଯାଇଛି ।

ଅଷ୍ଟୌ ମାସାନ୍ ନିପୀତଂ ୟଦ୍, ଭୂମ୍ୟାଃ ଚ, ଓଦ-ମୟମ୍ ବସୁ ।

ସ୍ୱଗୋଭିଃ ମୋକ୍ତୁମ୍ ଆରେଭେ, ପର୍ଜନ୍ୟଃ କାଳ ଆଗତେ । ।

ଅର୍ଥାତ୍ ସୂର୍ଯ୍ୟ ଆଠମାସ ଧରି ଜଳ ରୂପରେ ଥିବା ପୃଥିବୀ ସଂପଦର ଦୋହନ କରିଥିଲେ, ଏବେ ବର୍ଷାଋତୁରେ, ସୂର୍ଯ୍ୟ ସେହି ସଞ୍ଚିତ ସଂପଦକୁ ପୃଥିବୀକୁ ଫେରାଇ ଦେଉଛନ୍ତି । ସତରେ, ମୌସୁମୀ ଓ ବର୍ଷାର ଋତୁ କେବଳ ସୁନ୍ଦର ଓ ମନଲୋଭା ହୋଇନଥାଏ, ଏହା ପୋଷଣଦାତା, ଜୀବନଦାତା ମଧ୍ୟ । ଆମକୁ ଯେଉଁ ବର୍ଷାଜଳ ମିଳୁଛି ତାହା ଆମର ଆଗାମୀ ପିଢ଼ି ପାଇଁ, ଏକଥାକୁ ଆମେ କେବେ ଭୁଲିବା ଅନୁଚିତ ।

ଆଜି ମୋ ମନରେ ଏହି ବିଚାର ଆସୁଛି ଯେ ଏହି ରୋଚକ ବିଷୟ ସହିତ ହିଁ ନିଜ କଥାକୁ ମୁଁ କାହିଁକି ଶେଷ ନ କରିବି । ଆପଣ ସଭିଙ୍କୁ ଆଗାମୀ ଦିନର ପର୍ବପର୍ବାଣୀର ବହୁତ ବହୁତ ଶୁଭକାମନା । ପର୍ବ ଓ ଉତ୍ସବ ପାଳନ ସମୟରେ, ଏହା ନିଶ୍ଚିତ ମନେ ରଖନ୍ତୁ ଯେ କରୋନା ଏବେ ବି ଆମ ଭିତରୁ ଯାଇନାହିଁ । କରୋନା ସହ ସଂପୃକ୍ତ ମାର୍ଗଦର୍ଶିକା ଓ କଟକଣାକୁ ଆପଣ ଭୁଲନ୍ତୁ ନାହିଁ । ଆପଣ ସୁସ୍ଥ ଓ ପ୍ରସନ୍ନ ରହନ୍ତୁ ।

ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ ।