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जय जगन्‍नाथ, मंच पर विराजमान सभी वरिष्‍ठ महानुभाव। आजी पवित्र उत्‍कल दिवस, ओडिशा प्रतिष्‍ठा दिवस, समस्‍त ओडिशावासिन को ए अवसरे मोर अभिनंदन।

आज यह मेरा सौभाग्‍य है कि उत्‍कल दिवस के पावन अवसर पर मुझे जगन्‍नाथ जी की धरती पर आने का सौभाग्‍य मिला। इस उड़ीसा को बनाने के लिए, अनेक लोगों ने अपना जीवन खपा दिया, साधना की और आज उत्‍कल दिवस पर मैं विशेष रूप से उत्‍कल मणि पंडित गोपवंदु दास को प्रणाम करता हूं। उत्‍कल के गौरव मधुसुधन दास को नमस्‍कार करता हूं। वीर सुरेंद्र साई को प्रणाम करता हूं और महाराज कृष्‍णा चंद्र गज‍पति जी को मैं उनका पुण्‍य स्‍मरण करता हूं। यह बीरसा मुंडा की भी, क्रांति जोत से प्रज्‍वलित धरती है, मैं बीरसा मुंडा को भी प्रणाम करता हूं और आधुनिक ओडिशा बनाने के लिए बीजू बाबू को हर ओडिशा वासी हमेशा याद करता है। मैं इन सभी महानुभाव को और ओडिशा की जनता को हृदय से अभिनंदन करता हूं, उनको प्रणाम करता हूं और मैं आज के ओडिशा दिवस पर ओडिशावासियों को हृदय से बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं। अभिनंदन करता हूं और ओडिशा विकास की नई ऊंचाईयों को पार करे। ओडिशा के नौजवानों का भविष्‍य ओजस्‍वी हो, तेजस्‍वी हो, सामर्थवान हो, राष्‍ट्र के कल्‍याण में ओडिशा की नई पी‍ढ़ी अपना अमूल्‍य योगदान देने के लिए उसको अवसर मिले।

उड़ीसा का किसान हो, उड़ीसा का मजदूर हो, उड़ीसा का मेरा मछुआरा भाई हो या उड़ीसा का आदिवासी हो। ये वो धरती हो। जिसके लिए पूरा हिंदुस्तान गर्व करता है, सम्मान करता है। यहां का सूर्य मंदिर आज भी हिंदुस्तान को प्रकाश दे रहा है, एक नई आशा का संचार करता है। ऐसी इस पवित्र भूमि को मैं आज नमन करता हूं।

मैं पिछले वर्ष, अप्रैल महीने के पहले सप्ताह राउरकेला की धरती पर आया था। शायद 4 अप्रैल को आया था और आज एक साल के भीतर-भीतर, दोबारा मैं आपके बीच आया हूं। मैं पिछले वर्ष आया था तब आपके सपनों को समझना चाहता था, आपकी आशा, आकांक्षाओं को समझना चाहता था। आज, जब मैं आया हूं तो मेरा एक साल का हिसाब देने के लिए आया हूं और लोकतंत्र में ये हमारा दायित्व बनता है कि हम जनता-जर्नादन को हमारे काम का हिसाब दें। पल-पल का हिसाब दें, पाई-पाई का हिसाब दें। भाईयों-बहनों, ये राउरकेला एक प्रकार से लघु भारत है। हिंदुस्तान का कोई कोना नहीं है जो राउरकेला में बसता नहीं है। राउरकेला में कुछ भी होता है, हिंदुस्तान पूरे कोने में उसका तुरंत vibration पहुंच जाता है और भारत के किसी भी कोने में कुछ भी क्यों न हो पल दो पल में राउरकेला में पता चल जाता है कि हिंदुस्तान के उस कोने में ये हुआ है। इतना जीवंत नाता संपूर्ण भारत के साथ, इस धरती का नाता है। यहां के लोगों का नाता है। एक प्रकार से राउरकेला को बनाने में भारत को इस्पात की ताकत देने में ये लघु भारत में, राउरकेला का बहुत बड़ा योगदान है।

भारत को एक करने का काम लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने किया था और आजादी के बाद किसी शहर ने भारत को इस्पात की ताकत दी है तो वो शहर का नाम है राउरकेला। ये बज्र सा सामर्थ्य दिया है और जहां से बज्र सा समार्थ्य मिलता है, वो राष्ट्र कभी भी पीछे नहीं हटता है। विकास की नई ऊचांईयों को पार करता जाता है। यहां पर डॉक्टर राजेंद्र बाबू ने कई वर्षों पहले इस्पात के कारखाने की नींव डाली। यहां का जो मजदूर होगा, वो भी ये सोचता होगा कि मैं खनिज में से, आयरन में से मिट्टी जैसा जो लग रहा है, उसको कोशिश करके मैं स्टील तैयार करता हूं, मजबूत स्टील तैयार करता हूं, अच्छा स्टील तैयार करता हूं लेकिन राउरकेला के मेरे भाईयों-बहनों आप सिर्फ प्लेट नहीं बनाते। आप सिर्फ इतनी चौड़ाई इतनी मोटाई, इसकी सिर्फ प्‍लेट का निर्माण नहीं करते हैं। आप जो पसीना बहाते हैं, आप जो मेहनत करते हैं, उस भंयकर गर्मी के बीच खड़े रहकर के, आप अपने शरीर को भी तपा देते हैं। सिर्फ स्‍टील की प्‍लेट नहीं पैदा करते हैं आप भारत की सैन्‍य शक्ति में, भारत की सुरक्षा शक्ति में एक अबोध ताकत पैदा करते हैं, एक बज्र की ताकत पैदा करते हैं।

आज भारत सामुद्रिक सुरक्षा में indigenous बनने का सपना लेकर के चल रहा है। हमारे युद्धपोत हमारे देश में कैसे बने इस पर आज भारत का ध्‍यान है। लेकिन यह युद्धपोत इसलिए बनना संभव हुआ है, क्‍योंकि राउरकेला में कोई मजदूर भारत की सुरक्षा के लिए गर्मी के बीच खड़े रहकर के अपने आप को तपा रहा है, तब जाकर के भारत की सुरक्षा होती है, तब जाकर के युद्धपोत बनते हैं, तब जाकर के यहां बनाया, पकाया स्‍टील भारत की सुरक्षा के लिए काम आता है। दुश्‍मनों की कितनी ही ताकत क्‍यों न हो, उन ताकतों के खिलाफ लोहा लेने का सामर्थ्‍य हमारे सेना के जवानों में तब आता है, जब वो एक मजबूत टैंक के अंदर खड़ा है और दुश्‍मन के वार भी झेलता है और दुश्‍मन पर वार भी करता है। वो टैंक भारत में तब निर्माण होती है, जब राउरकेला में मजबूत स्‍टील तैयार होता है और इसलिए मेरे प्‍यारे भाईयों-बहनों दूर हिमालय की गोद में देश की सेना का जवान किसी टैंक पर खड़े रहकर के मां भारती की रक्षा करता है तो उसके अंदर आप के भी पुरूषार्थ की महक होती है। तब जाकर के राष्‍ट्र की रक्षा होती है और उस अर्थ में यह स्‍टील उत्‍पादन का काम राष्‍ट्र की रक्षा के साथ भी जुड़ा हुआ है।

यह स्‍टील उत्‍पादन का काम न सिर्फ ओडिशा के आर्थिक जीवन को, लेकिन पूरे देश के आर्थिक जीवन में एक नई ताकत देता है। इस पिछड़े इलाके में यह उद्योग के कारण रोजगार की संभावनाएं बढ़ी है। यहां के गरीब से गरीब व्‍यक्ति के लिए रोजी-रोटी का अवसर उपलब्‍ध हुआ है और आने वाले दिनों में उसके विकास के कारण और अधिक रोजगार की संभावनाएं होगी। विकास के और नए अवसर पैदा होने वाले हैं।

आज इस प्रोजेक्‍ट का Expansion हो रहा है और Expansion भी दो-चार कदम नहीं, एक प्रकार से उसकी ताकत डबल होने जा रही है। इस ताकत के कारण देश के इस्‍पात की क्षमता में बहुत बड़ी बढ़ोतरी होगी। देखते ही देखते हिंदुस्‍तान ने अमेरिका को पीछे छोड़ दिया है इस्‍पात के उत्‍पादन में। लेकिन अभी भी हम चाइना से काफी पीछे है और जब मैं मेक इन इंडिया की बात करता हूं, तो हमें किसी के पीछे रहना मंजूर नहीं। हमें उसमें आगे बढ़ना है। देश, 65% नौजवानों से भरा हुआ देश है। भारत मां की गोद में 65% 35 साल से कम उम्र के नौजवान मां भारती की गोद में पल रहे हैं, खेल रहे हैं। कितनी बड़ी ताकत है हमारे पास। उनको अगर अवसर मिलेगा, उन्‍हें अगर रोजगार मिलेगा, उनको अगर सही Skill Development होगा, तो यह हमारे नौजवान पिछले 60 साल में हिंदुस्‍तान जहां आ पहुंचा है 10 साल में उससे तेज गति में आगे ले जाएंगे, यह मुझे मेरे नौजवानों पर पूरा भरोसा है।

और इसलिए भाईयों-बहनों देश का औद्योगिक विकास हो। भारत के अंदर जो खनिज संपदा है। ये कच्चा माल विदेशों में भेजकर के, ट्रेडिंग करके, पेट भरकर के हमं गुजारा नहीं करना चाहिए। हमारी जो खनिज संपदा है। वो कच्चा माल, दुनिया के बाजार में बेचने से पैसा तो मिल जाएगा। ट्रेडिंग करने से अपना परिवार भी चल जाएगा। पांच-पचास लोगों का पेट भी भर जाएगा लेकिन भारत का भविष्य नहीं बनेगा और इसलिए हमारी कोशिश है कि भारत के पास जो कच्चा माल है, भारत के पास जो खनिज संपदा है। खान-खनिज में हमारा जो सामर्थ्य है। उसमें Value addition होना चाहिए, उसका Processing होना चाहिए, उसकी मूल्य वृद्धि होनी चाहिए और उसमें से जो उत्पादित चीजें हो, वो विश्व के बाजार में उत्तम प्रकार की चीजों के रूप में जाएगी तो भारत की आर्थिक संपन्न ताकत भी अनेक गुना बढ़ेगी और इसलिए हमारी कोशिश है कि हमारे देश में जो कच्चा माल है, उस कच्चे माल पर आधारित उद्योगों की जाल बिछाई जाए। नौजवानों को अवसर दिया जाए, बैंकों से धन उनके लिए उपलब्ध कराया जाए और देश में एक नई औद्योगिक क्रांति की दिशा में प्रयास हो।

भाईयो-बहनों एक समय था, भारत की ओर कोई देखने को तैयार नहीं था। पिछला एक दशक ऐसी मुसीबतों से गुजरा है कि जिसके कारण पूरे विश्व ने हमसे मुंह मोड़ लिया था लेकिन आज भाईयों-बहनों, मैं बड़े गर्व के साथ कहता हूं कि 10 महीने के भीतर-भीतर निराशा के बादल छंट गए, आशा का सूरज फिर से एक बार आसमान के माध्यान पर पहुंचा हे और पूरे विश्व का ध्यान आज हिंदुस्तान के अंदर पूंजी निवेश की ओर लगा है। रेल हो, रोड हो, गरीबों के लिए घर हो, उद्योग हो, कारखाने हो, दुनिया के लोगों का ध्यान आज हिंदुस्तान की तरफ आया है और हम इस अवसर का फायदा उठाना चाहते हैं। हम विश्व को निमंत्रित करना चाहते हैं। आइए आप अपना नसीब आजमाइए। भारत की धरती उर्वरा है। यहां पर जो पूंजी लगाएगा, दुनिया में उसको कहीं जितना Return मिलता है, उससे ज्यादा Return देने की ताकत इस धरती के अंदर है और इसलिए मैं विश्व को निमंत्रित करता हूं और उस इलाके में करना चाहे।

मैं बेमन से कह रहा हूं कि भारत का विकास सिर्फ हिंदुस्तान के पश्चिम छोर पर होने से, भारत का संपूर्ण विकास नहीं हो सकता है। महाराष्ट्र आगे बढ़े, गुजरात आगे बढ़े, गोवा आगे बढ़े, राजस्थान आगे बढ़े, हरियाणा आगे बढ़े, पंजाब आगे बढ़े, इससे काम नहीं चलेगा। वो बढ़ते रहें और बढ़ते रहें, लेकिन देश का भला तो तब होगा, जब उड़ीसा भी आगे बढ़े, छत्तीसगढ़ बढ़े, बिहार आगे बढ़े, पश्चिम बंगाल आगे बढ़े, आसाम आगे बढ़े, पूर्वी उत्तर प्रदेश आगे बढ़े, पूरे हिंदुस्तान का नक्शा देखिए। पूर्वी भारत का इलाका, ये भी उतना ही आगे बढ़ना चाहिए, जितना की हिंदुस्तान का पश्चिमी किनारा आगे बढ़ा है और इसलिए भाईयों-बहनों मेरा पूरा ध्यान इस बात पर है कि भारत का पूर्वी इलाका उड़ीसा से लेकर के पूर्वी इलाका ये कैसे सामर्थ्यवान बने। कैसे विकास की यात्रा में भागीदार बने इसलिए सरकार की सारी योजनाएं विकास की उस दिशा में ले जाने का हमारा प्रयास है, हमारी कोशिश है।

अब तक ये परंपरा रही दिल्ली वाले, दिल्ली में बैठने वाले ऐसे अहंकार में जीते थे कि राज्यों को वो छोटा मानते थे, नीचा मानते थे। हमने इस चरित्र का बदलने का फैसला किया है। ये परंपरा मुझे मंजूर नहीं है। केंद्र हो या राज्य हो बराबरी के भागीदार है, कोई ऊंच नहीं है, कोई नीच नहीं है, कोई ऊपर नहीं है, कोई नीचे नहीं है। कोई देने वाला नहीं, कोई लेने वाला नहीं, दोनों मिलकर के आगे बढ़ने वाले पार्टनर है, उसी रूप में देश को चलाना है और इसलिए हमने कोपरेटिव फेडरेलिज्‍म की बात कही है। भाईयों-बहनों राज्‍यों ने हमसे कुछ मांगा नहीं था। लेकिन हम मानते थे, क्‍योंकि मैं खुद अनेक वर्षों तक मुख्‍यमंत्री रहा हूं और देश में पहली बार लम्‍बे अर्सें तक रहा हुआ व्यक्ति प्रधानमंत्री बना है और इसलिए उसको मुख्‍यमंत्री की तकलीफें क्‍या होती है, राज्‍य की मुसीबतें क्‍या होती है। उसकी भली-भांति समझ है। मैं दिल्‍ली में बैठकर के भी ओडिशा के दर्द को भली-भांति समझ सकता हूं, पहचान सकता हूं, क्‍योंकि मैंने राज्‍य में काम किया है। एक जमाना था, यहां का खनिज खदानें आपके पास, लेकिन रोयल्‍टी के लिए दिल्‍ली के चक्‍कर काटने पड़ते थे। हमारी सरकार बनने के कुछ ही दिनों में हमने निर्णय कर लिया। कई वर्षों से जो रोयल्‍टी का मामला अटका था, उसका निपटारा कर दिया और रोयल्‍टी में हमने बढ़ोतरी कर दी, क्‍योंकि हम मानते हैं अगर धन राज्‍यों के पास होगा, तो राज्‍य भी विकास के लिए पीछे नहीं हटेंगे और इसलिए हमने इस काम को किया।

भाईयों बहनों Finance Commission के द्वारा राज्‍यों को पैसे दिये जाते हैं । पिछले वर्ष ओडिशा को भारत सरकार की तरफ से Finance Commission ने करीब 18 हजार करोड़ रुपया दिया था। भाईयों बहनों हमने आते ही 60 साल में पहुंचते-पहुंचते 18 हजार करोड़ पहुंचा था। हमने एक ही पल में 18 हजार करोड़ का 25 हजार करोड़ कर दिया, 25 हजार करोड़। अगर राज्‍य आगे बढ़ेंगे तो देश आगे बढ़ेगा। राज्‍य मिलजुलकर के प्रगति करेंगे तो देश प्रगति करेगा। इस मंत्र को लेकर के हम आगे चल रहे हैं और मुझे विश्‍वास है कि जिस प्रकार से एक के बाद एक भारत सरकार ने विकास के नये आयामों को छूने का प्रयास किया है। जो राज्‍य Progressive होगा, जो राज्‍य लम्‍बे समय की योजनाओं के साथ इस धन का उपयोग करेगा, वो राज्‍य हिंदुस्‍तान में नंबर एक पहुंचने में देर नहीं होगी। यह मैं आपको विश्‍वास दिलाने आया हूं। अब जिम्‍मेवारी राज्‍यों की बनती है कि वे विकास के मार्ग तय करें, Infrastructure पर बल लगाए। तत्‍कालीन लाभ वाला कार्यक्रम नहीं लम्‍बे समय के लिए राज्‍य को ताकत देने वाला कार्यक्रम हाथ में लें आप देखिए आने वाली पीढि़या सुखी हो जाएगी और ओडिशा में वो ताकत पड़ी है। स्‍वर्णिम इतिहास रहा है, स्‍वर्णिम काल रहा है उडिया का। फिर से एक बार वो स्‍वर्णिम काल आ सकता है, उडिया का और मैं साफ देख रहा हूं वो अवसर सामने आकर के खड़ा है। भाईयों और बहनों आप जानते है।

कभी ओडिशा के लोगों को लगता होगा कि हमारा ऐसा नसीब है कि कोयले की काली मां हमारे पर छाई हुई है। कुछ मिलता नहीं था। कोयला बोझ बन गया था, आज कोयले को हमने हीरा बना दिया, हीरा बना दिया भाई, कोयले की खदानों का Auction किया, जो कोयले को हाथ लगाने से लोग डरते थे, आज उस कोयले को हीरे में प्रवर्तित करने का हमने काम किया। जब CAG की रिपोर्ट आई थी, उसने कहा था कि कोयले की खदानों की चोरी में देश के खजाने का एक लाख 76 हजार करोड़ रुपया लूट लिया गया है। मैं पिछले अप्रैल में मैंने भाषण में यह कहा था, तब मुझे कई लोग कहते थे कि साहब एक लाख 76 हजार नहीं होगा, थोड़ा बहुत लिया होगा, लेकिन इतना नहीं लिया होगा। कई लोग कहते थे साहब एक लाख 76 हजार नहीं होगा। थोड़ा बहुत लिया होगा लेकिन इतना नहीं लिया होगा। कुछ लोग कहते थे। लोग कहते थे, तो मैं भी भई ज्यादा Argument नहीं करता था। CAG ने कहा है लेकिन भाईयों-बहनों सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार में दे दी गई 204 Coal mines को, सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया। ये चोर-लूटेरे की जो बंटवाई हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने लाल आंख दिखाई। 204 कोयले की खदानें रद्द हो गईं। हमने तय किया। हम Transparent पद्धति से Auction करेंगे, नीलामी करेंगे, दुनिया के सामने खुलेआम निलामी करेंगे, मीडिया के लोगों की हाजिरी में नीलामी करेंगे और मेरे भाईयों-बहनों 204 में से अभी सिर्फ 20 की नीलामी हुई है, ज्यादा अभी बाकी है सिर्फ 20 की और आपको मालूम है, जिन 204 खदानों से हिंदुस्तान की तिजोरी में एक रुपया नहीं आता था। सिर्फ 20 की नीलामी से दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा रकम सरकार के खजाने में आई है और ये पैसे दिल्ली के खजाने में जमा नहीं करेंगे। जिन राज्यों में कोयले की खदाने हैं, ये पैसे उनके खजाने में जाएंगे। उड़ीसा के खजाने में जाएंगे, छत्तीसगढ़ के खजाने में जाएंगे, झारखंड के खजाने में जाएंगे। राज्य में ताकत आएगी। भाईयों-बहनों, ईमानदारी के साथ अगर काम करें तो कितना बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है। ये उदाहरण आपके सामने है।

ये लोग जिम्मेवार नहीं हैं क्या? क्या उन्हें जवाब देना नहीं चाहिए? ये दो लाख करोड़ रुपया 20 खदानों का आया कहां से? तो पहले पैसे गया कहां था? भाईयों-बहनों मैंने आपको वादा किया था। दिल्ली में आप अगर मुझे सेवा करने का मौका देंगे तो ऐसा कभी कुछ नहीं करुंगा ताकि मेरे देशवासियों को माथा नीचे कर करके जीना पड़े और आज मैं सीना तानकर के आपके सामने हिसाब देने आया हूं, 10 महीने हो गए सरकार को एक दाग नहीं लगा मेरे भाईयों बहनों, एक दाग नहीं लगा मेरे भाईयों-बहनों। भाईयों-बहनों अभी हमने नए कानून पास किए। minerals के संबंध में कानून पास किया और मैं नवीन बाबू का आभारी हूं कि संसद में उन्होंने हमारा समर्थन किया तो राज्यसभा में भी वो बिल मंजूर होने में हमारी सुविधा हो गई और हम मिलकर के देश हित के निर्णयों को करते चलेंगे और देश हित में हम काम करते जाएंगे।

भाईयों-बहनों मैं जब पिछली बार आया था तब तो मैं प्रधानमंत्री नहीं था लेकिन यहां के लोगों ने मेरे सामने एक मांग रखी थी। राजनीति का स्वभाव ऐसा है कि पुरानी बातें भुला देना, जितना जल्दी हो सके भुला देना लेकिन मेरे भाईयों-बहनों, मैं राजनेता नहीं हूं, मैं तो आपका सेवादार हूं। मुझे पुरानी बातें भुलाने में Interest नहीं है। मैं तो खुद होकर के याद दिलाना चाहता हूं और मैंने गत वर्ष 4 अप्रैल को इसी मैदान से, मैंने जो घोषणा की थी तब प्रधानमंत्री नहीं था। आपने प्रधानमंत्री बनाया और आज जब मैं पहली बार आया हूं, तो मैं उस वादे को पूरा करते हुए बताना चाहता हूं कि इस्पात General hospital, अब इस्पात General hospital, ये मेडिकल कॉलेज cum Super specialty Hospital के रूप में उसको विकसित करने का निर्णय भारत सरकार ने कर लिया है।

भाइयों-बहनों लेकिन मैं नहीं चाहता हूं, कि इस अस्‍पताल में आपको कभी patient बनकर के जाना पड़े। मैं आप उत्‍कल दिवस पर आपको शुभकामना देता हूं कि अस्‍पताल तो हिंदुस्‍तान में बढि़या से बढि़या बने, लेकिन बारह महीने खाली रहे। कोई बीमार न हो, किसी के परिवार में मुसीबत न हो, किसी को अस्‍पताल जाना न पड़े। लेकिन यहां के मेडिकल कॉलेज से होनहार नौजवान तैयार हो करके देश के स्‍वास्‍थ्‍य के लिए भी तैयार हो। एक बात और भी हुई थी, ब्रहामणी नदी पर दूसरा ब्रिज बनाने की। मैं आपकी कठिनाई जानता हूं। आज मैं आपको विश्‍वास दिलाता हूं ब्रहामणी नदी पर दूसरे ब्रिज का काम भी कर दिया जाएगा और उसके कारण राउरकेला की connectivity कितनी बढ़ने वाली है इसका आपको पूरा अंदाज है भाईयों-बहनों।

भाईयों-बहनों आज मैं दूर से ही जगन्‍नाथ जी को प्रणाम करते हुए उनके आर्शीवाद ले रहा हूं, लेकिन पूरा ओडिशा और एक प्रकार से देश और दुनिया के जगन्‍नाथ के भक्‍त नव कलेवर के लिए तैयारी कर रहे हैं। कई वर्षों के बाद नवकलेवर आता है। पूरा ओडिशा पूरे विश्‍व का स्‍वागत करने के लिए सजग हो जाता है। रेल की सुविधा चाहिए, हवाई जहाजों की सुविधा चाहिए और कोई – संबंधी आवश्‍यकताएं हो satiation जैसी आवश्‍यकता हो, भारत सरकार कंधे से कंधा मिलाकर के ओडिशा के इस नवकलेवर पर्व में आपका साथ देगी और ऊपर से इस काम को आगे बढाने के लिए 50 करोड़ रुपया भारत सरकार की तरफ से भी इसमें मुहैया किया जाएगा।

भाईयों-बहनों आज इस्पात के इस कारखाने के Expansion के साथ हम आगे तो बढ़ेंगे और आगे बढ़नें का संकल्प लेकर जाएंगे, विकास की नई ऊंचाइयों पर आगे बढ़ेंगे और मैं राज्यों को निमंत्रित करता हूं। आईए एक नए युग का ये शुभारंभ करने का अवसर है। लंबी सोच के साथ हम विकास की नींव मजबूत बनाएं। तत्कालीन फायदे से मुक्त होकर के हमारी भावी पीढ़ी के कल्याण के लिए हम अपने रास्तों को प्रशस्त करें।

मैं फिर एक बार SAIL के सभी मित्रों को हृदय से अभिनंदन करता हूं। यहां के छोटे-मोटे इस्पात के कारखानों के मेरे भाईयों-बहनों को अनेक-अनेक शुभकामनाएं देता हूं। मैं उड़ीसा Government का बहुत आभारी हूं और मैं कल्पना नहीं कर सकता हूं भाईयों-बहनों। मैं नहीं मानता हूं कि कभी सरकार किसी कार्यक्रम में इतनी भीड़ आती हो। चारों तरफ मुझे लोग ही लोग नजर आ रहे हैं। आपने मुझे जो प्यार दिया है, ये प्यार एक प्रकार से विकास के प्रति आपके समर्थन की अभिव्यक्ति है। देश के नौजवानों के भविष्य को बदलने के लिए आपके संकल्प की अभिव्यक्ति है। हिंदुस्तान के गरीब को, किसान को ताकतवर बनाने के, आपके सपनों को पूरा करने का जो संकल्प है, उसका खुला समर्थन करने का आपका ये प्रयास है। मैं इसके लिए मेरे उड़ियावासियों को शत-शत नमन करता हूं, उनका अभिनंदन करता हूं।

बहुत-बहुत धन्यवाद करते हुए। जय जगन्नाथ-जय जगन्नाथ-जय जगन्नाथ।

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November 26, 2021
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“We all may have different roles, different responsibilities, different ways of working, but the source of our faith, inspiration and energy is the same - our Constitution”
“Sabka Saath-Sabka Vikas, Sabka Vishwas-Sabka Prayas, is the most powerful manifestation of the spirit of the Constitution. Government dedicated to the Constitution, does not discriminate in development”
“India is the only country on course to achieve the goals of the Paris Agreement ahead of time. And yet, in the name of environment, various pressures are created on India. All this is the result of a colonial mentality”
“On the strong foundation of separation of power, we have to pave the path of collective responsibility, create a roadmap, determine goals and take the country to its destination”

नमस्कार !

चीफ जस्टिस एन.वी. रमन्ना जी, जस्टिस यू.यू. ललित जी, कानून मंत्री श्री किरण रिजिजू जी, जस्टिस डी.वाई. चन्द्रचूड़ जी, अटॉर्नी जनरल श्री के.के. वेणुगोपाल जी, सुप्रीम कोर्ट बार असोशिएशन के अध्यक्ष श्री विकास सिंह जी, और देश की न्याय व्यवस्था से जुड़े देवियों और सज्जनों!

आज सुबह मैं विधायिका और कार्यपालिका के साथियों के साथ था। और अब न्यायपालिका से जुड़े आप सभी विद्वानों के बीच हूं। हम सभी की अलग-अलग भूमिकाएं, अलग-अलग जिम्मेदारियां, और काम करने के तरीके भी अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन हमारी आस्था, प्रेरणा और ऊर्जा का स्रोत एक ही है - हमारा संविधान! मुझे खुशी है कि आज हमारी ये सामूहिक भावना संविधान दिवस पर इस आयोजन के रूप में व्यक्त हो रही है, हमारे संवैधानिक संकल्पों को मजबूत कर रही है। इस कार्य से जुड़े सभी लोग, अभिनंदन के अधिकारी है।

माननीय,

आजादी के लिए जीने-मरने वाले लोगों ने जो सपने देखे थे, उन सपनों के प्रकाश में, और हजारों साल की भारत की महान परंपरा को संजोए हुए, हमारे संविधान निर्माताओं ने हमें संविधान दिया। सैकड़ों वर्षों की गुलामी ने, भारत को अनेक मुसीबतों में झोंक दिया था। किसी युग में सोने की चिड़िया कहा जाने वाला भारत, गरीबी-भुखमरी और बीमारी से जूझ रहा था। इस पृष्ठभूमि में, देश को आगे बढ़ाने में संविधान हमेशा हमारी मदद करता रहा है। लेकिन आज दुनिया के अन्य देशों की तुलना में देखें, तो जो देश भारत के करीब-करीब साथ ही आजाद हुए, वो आज हमसे काफी आगे हैं। यानि अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है, हमें मिलकर लक्ष्य तक पहुंचना है। हम सभी जानते हैं, हमारे संविधान में Inclusion पर कितना जोर दिया गया है। लेकिन ये भी सच्चाई रही है कि आजादी के इतने दशकों बाद भी बड़ी संख्या में देश के लोग exclusion को भोगने के लिए मजबूर रहे हैं। वो करोड़ों लोग, जिनके घरों में शौचालय तक नहीं था, वो करोड़ों लोग जो बिजली के अभाव में अंधेरे में अपनी जिंदगी बिता रहे थे, वो करोड़ों लोग जिनके जीवन का सबसे बड़ा संघर्ष, घर के लिए थोड़ा सा पानी जुटाना था, उनकी तकलीफ, उनका दर्द समझकर, उनका जीवन आसान बनाने के लिए खुद को खपा देना, मैं संविधान का असली सम्मान मानता हूं। और इसलिए, आज मुझे संतोष है कि देश में, संविधान की इसी मूल भावना के अनुरूप, exclusion को inclusion में बदलने का भागीरथ अभियान तेजी से चल रहा है। और इसका जो सबसे बड़ा लाभ क्या हुआ है, ये भी हमें समझना होगा। जिन 2 करोड़ से अधिक गरीबों को आज अपना पक्का घर मिला है, जिन 8 करोड़ से अधिक गरीब परिवारों को उज्जवला योजना के तहत मुफ्त गैस कनेक्शन मिला है, जिन 50 करोड़ से अधिक गरीबों को बड़े से बड़े अस्पताल में 5 लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज सुनिश्चित हुआ है, जिन करोड़ों गरीबों को पहली बार बीमा और पेंशन जैसी बुनियादी सुविधाएं मिली हैं, उन गरीबों के जीवन की बहुत बड़ी चिंता कम हुई है, ये योजनाएं उनके लिए बड़ा संबल बनी हैं। इसी कोरोना काल में पिछले कई महीनों से 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त अनाज सुनिश्चित किया जा रहा है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना पर सरकार 2 लाख 60 हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च करके गरीबों को मुफ्त अनाज दे रही है। अभी कल ही हमने इस योजना को अगले वर्ष मार्च तक के लिए बढ़ा दिया है। हमारे जो Directive Principles कहते हैं - “Citizens, men and women equally, have the right to an adequate means of livelihood” वो इसी भावना का ही तो प्रतिबिंब हैं। आप सभी ये मानेंगे कि जब देश का सामान्य मानवी, देश का गरीब, विकास की मुख्यधारा से जुड़ता है, जब उसे equality और equal opportunity मिलती है, तो उसकी दुनिया पुरी तरह बदल जाती है। जब रेहड़ी, ठेले, पटरी वाला भी बैंक क्रेडिट की व्यवस्था से जुड़ता है, तो उसको राष्ट्र निर्माण में भागीदारी का ऐहसास होता है। जब दिव्यांगों को ध्यान में रखते हुए पब्लिक प्लेसेस, पब्लिक ट्रांसपोर्ट और दूसरी सुविधाओं का निर्माण होता है, जब उन्हें आजादी के 70 साल बाद पहली बार कॉमन साइन लैंग्वेज मिलती है, तो उनमें आत्मविश्वास जागता है। जब ट्रांसजेंडर्स को कानूनी संरक्षण मिलता है, ट्रांसजेंडर को पद्म पुरस्कार मिलते हैं, उनकी भी समाज पर, संविधान पर आस्था और मज़बूत होती है। जब तीन तलाक जैसी कुरीति के विरुद्ध कड़ा कानून बनता है, तो उन बहनों-बेटियों का संविधान पर भरोसा और सशक्त होता है, जो हर तरह से नाउम्मीद हो चुकी थीं।

महानुभाव,

सबका साथ-सबका विकास, सबका विश्वास-सबका प्रयास, ये संविधान की भावना का सबसे सशक्त प्रकटीकरण है। संविधान के लिए समर्पित सरकार, विकास में भेद नहीं करती और ये हमने करके दिखाया है। आज गरीब से गरीब को भी क्वालिटी इंफ्रास्ट्रक्चर तक वही एक्सेस मिल रहा है, जो कभी साधन संपन्न लोगों तक सीमित था। आज लद्दाख, अंडमान और निकोबार, नॉर्थ ईस्ट के विकास पर भी देश का उतना ही फोकस है, जितना दिल्ली और मुंबई जैसे मेट्रो शहरों पर है। लेकिन इन सबके बीच, मैं एक और बात की तरफ आपका ध्यान दिलाउंगा। आपने भी ज़रूर अनुभव किया होगा कि जब सरकार किसी एक वर्ग के लिए, किसी एक छोटे से टुकड़े के लिए कुछ करती है, तो बड़ी उदारवादी कहलाती है, उसकी बड़ी प्रशंसा होती है। कि देखो उनके लिए कुछ किया लेकिन मैं हैरान हूँ कभी कभी हम देखते हैं कोई सरकार एक राज्य के लिए कुछ करे, राज्य का भला हो, तो बड़ी वाहवाही करते हैं। लेकिन जब सरकार सबके लिए करती, हर नागरिक के लिए करती है, हर राज्य के लिए करती है, तो इसे उतना महत्व नहीं दिया जाता, उसका जिक्र तक नहीं होता। सरकार की योजनाओं से कैसे हर वर्ग का, हर राज्य का समान रूप से भला हो रहा है, इस पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता है। पिछले सात वर्षों में हमने बिना भेदभाव के, बिना पक्षपात के, विकास को हर व्यक्ति, हर वर्ग, और देश के हर कोने तक पहुंचाने का प्रयास किया है। इस साल 15 अगस्त को मैंने गरीब कल्याण से जुड़ी योजनाओं के सैचुरेशन की बात कही और इसके लिए हम मिशन मोड पर जुटे भी हैं। सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय, इस मंत्र को लेकर के कार्य करने का हमारा प्रयास है I आज इससे देश की तस्वीर कैसे बदली है ये हमें हाल के National Family Health Survey report में भी दिखाई देता है। इस रिपोर्ट के बहुत से तथ्य, इस बात को सिद्ध करते हैं कि जब नेक नीयत के साथ काम किया जाए, सही दिशा में आगे बढ़ा जाए, और सारी शक्ति जुटाकर लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास किया जाए तो, सुखद परिणाम अवश्य आते हैं। Gender Equality की बात करें तो अब पुरुषों की तुलना में बेटियों की संख्या बढ़ रही है। गर्भवती महिलाओं को अस्पताल में डिलिवरी के ज्यादा अवसर उपलब्ध हो रहे हैं। इस वजह से माता मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर कम हो रही है। और भी बहुत सारे इंडिकेटर्स ऐसे हैं जिस पर हम एक देश के रूप बहुत अच्छा कर रहे है। इन सभी इंडिकेटर्स में हर परसेंटेज पॉइंट की बढ़ोतरी सिर्फ एक आंकड़ा भर नहीं है। ये करोड़ों भारतीयों को मिल रहे उनके हक का प्रमाण है। ये बहुत आवश्यक है कि, जन कल्याण से जुड़ी योजनाओं का पूरा लाभ लोगों को मिले, इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी परियोजनाएं समय पर पूरी हों। किसी भी कारण से हुई अनावश्यक देरी, नागरिक को उसके हक से वंचित रखती है। मैं गुजरात का रहने वाला हूँ तो मैं सरदार सरोवर डैम का उदाहरण देना चाहता हूं। सरदार पटेल ने मां नर्मदा पर इस तरह के डैम का सपना देखा था। पंडित नेहरू ने इसका शिलान्यास किया था। लेकिन ये परियोजना दशकों तक अपप्रचार में फंसी रही। पर्यावरण के नाम पर चले आंदोलन में फंसी रही। न्यायालय तक इसमें निर्णय लेने में हिचकिचाते रहे। वर्ल्ड बैंक ने भी इसके लिए पैसे देने से मना कर दिया था। लेकिन उसी नर्मदा के पानी से कच्छ में जो विकास हुआ, विकास का कार्य हुआ, आज हिन्‍दुस्‍तान के तेज गति से आगे बढ़ रहे district में कच्‍छ जिला है। कच्‍छ तो एक प्रकार से रेगिस्‍तान जैसा इलाका है, तेज गति से विकसित होने वाले क्षेत्र में उसकी जगह बन गयी। कभी रेगिस्तान के रूप में जाने वाला कच्छ, पलायन के लिए पहचाना जाने वाला कच्छ, आज एग्रो-एक्सपोर्ट की वजह से अपनी पहचान बना रहा है। इससे बड़ा ग्रीन अवार्ड और क्या हो सकता है?

माननीय,

भारत के लिए, और विश्व के अनेक देशों के लिए, हमारी अनेक पीढ़ियों के लिए, उपनिवेशवाद की बेड़ियों में जकड़े हुए जीना एक मजबूरी थी। भारत की आज़ादी के समय से, पूरे विश्व में एक post-Colonial कालखंड की शुरुआत हुई, अनेकों देश आज़ाद हुए। आज पूरे विश्व में कोई भी देश ऐसा नहीं है जो प्रकट रूप से किसी अन्य देश के उपनिवेश के रूप में exist करता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उपनिवेशवादी मानसिकता, Colonial Mindset  समाप्त हो गया  है। हम देख रहे हैं कि यह मानसिकता अनेक विकृतियों को जन्म दे रही है। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण हमें विकासशील देशों की विकास यात्राओं में आ रही बाधाओं में दिखाई देता है। जिन साधनों से, जिन मार्गों पर चलते हुए, विकसित विश्व आज के मुकाम पर पहुंचा है, आज वही साधन, वही मार्ग, विकासशील देशों के लिए बंद करने के प्रयास किए जाते हैं। पिछले दशकों में इसके लिए अलग-अलग प्रकार की शब्दावली का जाल रचाया जाता है। लेकिन उद्देश्य एक ही रहा है - विकासशील देशों की प्रगति को रोकना। आजकल हम देखते हैं, कि पर्यावरण के विषय को भी इसी काम के लिए हाईजैक करने के प्रयास हो रहे हैं। कुछ सप्ताह पहले हमने COP-26 समिट में इसका जीवंत उदाहरण देखा है। अगर absolute cumulative emissions की बात करें, तो, विकसित देशों ने मिलकर 1850 से अब तक, भारत से 15 गुना अधिक उत्सर्जन किया है। अगर हम per capita basis की बात करें तो भी विकसित देशों ने भारत के मुकाबले 15 गुना अधिक उत्सर्जन किया है। अमेरिका और यूरोपीय संघ ने मिलकर भारत की तुलना में 11 गुना अधिक absolute cumulative emission किया है। इसमें भी per capita basis को आधार बनाएं तो अमेरिका और यूरोपीय संघ ने भारत की तुलना में 20 गुना अधिक उत्सर्जन किया है। फिर भी आज, आज हमें गर्व है भारत जिसकी सभ्यता और संस्कृति में ही प्रकृति के साथ जीने की प्रवृति है, जहाँ पत्थरों में, पेड़ों में, और प्रकृति के कण-कण में, जहां पत्‍थर में भगवान देखा जाता है, उसका स्वरुप देखा जाता है, जहाँ धरती को माँ के रूप में पूजा जाता है, उस भारत को पर्यावरण संरक्षण के उपदेश सुनाए जाते हैं। और हमारे लिए ये मूल्य सिर्फ़ किताबी नहीं हैं, किताबी बातें नहीं हैं। आज भारत में Lion), Tiger, Dolphin आदि की संख्या, और अनेक प्रकार की biodiversity के मानकों में लगातार सुधार हो रहा है। भारत में वन क्षेत्र बढ़ रहा है। भारत में Degraded Land का सुधार हो रहा है। गाड़ियों के ईंधन के मानकों को हमने स्वेच्छा से बढ़ाया है। हर प्रकार की renewable ऊर्जा में हम विश्व के अग्रणी देशों में हैं। और पेरिस समझौते के लक्ष्यों को समय से पहले प्राप्त करने की ओर अग्रसर अगर कोई है तो एकमात्र हिन्‍दुस्‍तान है। G20 देशों के समूह में अच्‍छे से अच्‍छा काम करने वाला कोई देश है, दुनिया ने माना है वो हिन्‍दुस्‍तान है और फ़िर भी, ऐसे भारत पर पर्यावरण के नाम पर भाँति-भाँति के दबाव बनाए जाते हैं। यह सब, उपनिवेशवादी मानसिकता का ही परिणाम है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हमारे देश में भी ऐसी ही मानसिकता के चलते अपने ही देश के विकास में रोड़े अटकाए जाते है। कभी freedom of expression के नाम पर तो कभी किसी और चीज़ का सहारा लेकर। हमारे देश की परिस्थितियाँ, हमारे युवाओं की आकांक्षाओ, सपनों को बिना जाने समझे, बहुत सी बार दूसरे देशों के benchmark पर भारत को तौलने का प्रयास होता है और इसकी आड़ में विकास के रास्ते बंद करने की कोशिशें होती हैं। इसका नुकसान, ये जो करते हैं ऐसे लोगों को भुगतना नहीं पड़ता है। इसका नुकसान भुगतना पड़ता है उस माँ को, जिसका बच्चा बिजली प्लांट स्थापित न होने के कारण पढ़ नहीं पाता। इसका नुकसान भुगतना पड़ता है उस पिता को, जो रुके हुए सड़क प्रोजेक्ट के कारण अपनी संतान को समय पर अस्पताल नहीं पहुँचा पाता। इसका नुकसान भुगतना पड़ता है उस मध्यम वर्गीय परिवार को जिसके लिए आधुनिक जीवन की सुविधाएं पर्यावरण के नाम पर उसकी आमदनी से बाहर पहुंचा दी गई हैं। इस कोलोनियल माइंडसेट की वजह से, भारत जैसे देश में, विकास के लिए प्रयास कर रहे देश में, करोड़ों आशाएं टूटती हैं, आकांक्षाएं दम तोड़ देती हैं। आजादी के आंदोलन में जो संकल्पशक्ति पैदा हुई, उसे और अधिक मजबूत करने में ये कोलोनियल माइंडसेट बहुत बड़ी बाधा है। हमें इसे दूर करना ही होगा। और इसके लिए, हमारी सबसे बड़ी शक्ति, हमारा सबसे बड़ा प्रेरणा स्रोत, हमारा संविधान ही है।

माननीय,

सरकार और न्यायपालिका, दोनों का ही जन्म संविधान की कोख से हुआ है। इसलिए, दोनों ही जुड़वां संतानें हैं। संविधान की वजह से ही ये दोनों अस्तित्व में आए हैं। इसलिए, व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो अलग-अलग होने के बाद भी दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

हमारे यहाँ शास्त्रों में भी कहा गया है-

ऐक्यम् बलम् समाजस्य, तत् अभावे स दुर्बलः।

तस्मात् ऐक्यम् प्रशंसन्ति, दॄढम् राष्ट्र हितैषिण:॥

अर्थात्, किसी समाज की, देश की ताकत उसकी एकता और एकजुट प्रयासों में होती है। इसलिए, जो मजबूत राष्ट्र के हितैषी होते हैं, वो एकता की प्रशंसा करते हैं, उस पर ज़ोर देते हैं। राष्ट्र के हितों को सर्वोपरि रखते हुये यही एकता देश की हर संस्था के प्रयासों में होनी चाहिए। आज जब देश अमृतकाल में अपने लिए असाधारण लक्ष्य तय कर रहा है, दशकों पुरानी समस्याओं के समाधान तलाशकर नए भविष्य के लिए संकल्प ले रहा है, तो ये सिद्धि सबके साथ से ही पूरी होगी। इसीलिए, देश ने आने वाले 25 सालों के लिए जब देश आजादी की 25वीं शताब्‍दी मनाता होगा और इसलिए ‘सबका प्रयास’ इसका देश ने आह्वान किया है। निश्चित तौर पर इस आह्वान में एक बड़ी भूमिका judiciary की भी है।

महोदय,

हमारी चर्चा में बिना भूले हुए एक बात लगातार सुनने को आती है, बार-बार उसे दोहराया जाता है - Separation of power । Separation of power की बात, न्यायपालिका हो, कार्यपालिका हो या फिर विधायिका, अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण रही है। इसके साथ ही, आजादी के इस अमृत काल में, भारत की आजादी के 100 वर्ष पूरे होने तक, ये जो अमृत काल है, ये अमृत कालखंड में, संविधान की भावना के अनुरूप, Collective Resolve दिखाने की आवश्यकता है। आज देश के सामान्य मानवी के पास जो कुछ है, वो उससे ज्यादा का हकदार है। जब हम देश की आज़ादी की शताब्दी मनायेंगे, उस समय का भारत कैसा होगा, इसके लिए हमें आज ही काम करना है। इसलिए, देश की उसकी आकांक्षाओं  को पूरा करने की collective responsibility के साथ चलना बहुत ज़रूरी है। Separation of Power के मज़बूत अधिष्ठान पर हमें collective responsibility का मार्ग निर्धारित करना है, Roadmap बनाना है, लक्ष्य तय करने है और मंज़िल तक देश को पहुंचना है।

माननीय,

कोरोना काल ने justice delivery में technology के इस्तेमाल को लेकर नया भरोसा पैदा किया है। डिजिटल इंडिया के मेगा मिशन में न्यायपालिका की सहभागिता है। 18 हजार से ज्यादा कोर्ट्स का computerize होना, 98 प्रतिशत कोर्ट कॉम्प्लेक्स का वाइड एरिया नेटवर्क से जुड़ जाना, रियल टाइम में judicial data के transmission के लिए national judicial data grid का functional होना, e-court platform का लाखों लोगों तक पहुँचना, ये बताता है कि आज technology हमारे जस्टिस सिस्टम की कितनी बड़ी ताकत बन चुकी है, और आने वाले समय में हम एक advanced judiciary को काम करते हुये देखेंगे। समय परिवर्तनीय है, दुनिया बदलती रहती है, लेकिन ये बदलाव मानवता के लिए evolution का जरिया बने हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि मानवता ने इन बदलावों को स्वीकार किया, और साथ ही मानवीय मूल्यों को शाश्वत बनाए रखा। न्याय की अवधारणा इन मानवीय मूल्यों का सबसे परिष्कृत विचार है। और, संविधान न्याय की इस अवधारणा की सबसे परिष्कृत व्यवस्था है। इस व्यवस्था को गतिशील और प्रगतिशील बनाए रखने का दायित्व हम सभी पर है। अपनी इन भूमिकाओं का निर्वहन हम सब पूरी निष्ठा से करेंगे, और आज़ादी के सौ साल से पहले एक नए भारत का सपना पूरा होगा। हम लगातार इन बातों से प्रेरित हैं, जिस बात के लिए हम गर्व करते हैं और वो मंत्र हमारे लिये है- संगच्छध्वं, संवदध्वं, सं वो मनांसि जानताम्। हमारे लक्ष्य समान हों, हमारे मन समान हों और हम साथ मिलकर उन लक्ष्यों को प्राप्त करें। इसी भावना के साथ मैं आज संविधान दिवस के इस पवित्र माहौल में आप सबको, देशवासियों को भी अनेकअनेक शुभकामनाएं देते हुए मेरी बात को समाप्‍त करता हूं। फिर एक बार आप सबको बहुत-बहुत बधाई।

बहुत बहुत धन्यवाद!