प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने नागरिकों की निस्वार्थ सेवा भावना को दर्शाते हुए एक संस्कृत सुभाषितम् साझा किया:
“छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे।
फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव॥"
इसका अर्थ है कि वृक्ष स्वयं कड़ी धूप सहन करते हैं, लेकिन दूसरों को छाया देते हैं। उनके फल भी दूसरों के लिए ही होते हैं। वृक्ष निस्वार्थ और नेक भाव वाले लोगों की तरह होते हैं जो हमेशा दूसरों को सुविधांए प्रदान करते हैं।
श्री मोदी ने कहा कि किसी राष्ट्र की सच्ची ताकत उसके नागरिकों की निस्वार्थ सेवा भावना में निहित है। यह लोगों को एक-दूसरे से सीखने के लिए प्रेरित करता है तथा हमारे समाज को और अधिक सशक्त, समृद्ध व दयालु बनाता है।
प्रधानमंत्री ने ‘एक्स’ पर लिखा:
“राष्ट्र की असली शक्ति उसके नागरिकों की निःस्वार्थ सेवा भावना में निहित है। इससे लोग एक दूसरे से प्रेरित होते हैं, साथ ही हमारा समाज भी और समृद्ध होता है।
छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे।
फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव॥"
राष्ट्र की असली शक्ति उसके नागरिकों की निःस्वार्थ सेवा भावना में निहित है। इससे लोग एक दूसरे से प्रेरित होते हैं, साथ ही हमारा समाज भी और समृद्ध होता है।
— Narendra Modi (@narendramodi) April 27, 2026
छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे।
फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव॥ pic.twitter.com/kYqB92qdsR


