मंत्रिपरिषद के मेरे साथी श्रीमान नितिन गडकरी जी, श्रीमान उपेंद्र जी कुशवाहा, मंचस्थ महानुभाव सभी आदरणीय सांसद महोदय और सभी देशवासी,
देश आजाद हुआ तब से अब तक ग्रामीण विकास के संदर्भ में सभी सरकारों ने अपने-अपने तरीके से प्रयास किए हैं। और ये प्रयास निरंतर चलते रहने चाहिए। समयानुकूल परिवर्तन के साथ चलते रहने चाहिए। बदलते हुए युग के अनुकूल योजनाएं बननी चाहिए, बदलते हुए विश्व की गति के अनुसार परिवर्तन की भी गति तेज होनी चाहिए और ये न रुकने वाली प्रक्रिया है। लेकिन हर बार उस प्रक्रिया को और अधिक तेज बनाने के लिए, उस प्रक्रिया में प्राण-शक्ति भरने के लिए कुछ नए Element हर बार जोड़ते रहना जरूरी होता है।
हमारे देश में हर राज्य में 5-10, 5-10 गांव जरूर ऐसे हैं कि जिसके विषय में हम गर्व कर सकते हैं। उस गांव में प्रवेश करते ही एक अलग अनुभूति होती है। अगर सरकारी योजना से ही ये गांव बनते, तो फिर तो और भी गांव बनने चाहिए थे। और नहीं बने, कुछ ही बने, इसका मतलब ये हुआ कि सरकारी योजनाओं के सिवाय भी कुछ है। सरकारी योजनाओं के सिवा जो है वो ही इस सांसद आदर्श ग्राम योजना की आत्मा है।
योजनाएं तो सभी गांव के लिए हैं। लेकिन कुछ ही गांवों ने प्रगति की क्योंकि उस गांव में कुछ लोग थे जिनकी सोच भिन्न थी। कोई नेता थे जिन्होंने एक अलग ढंग से Lead किया और उसी के कारण ये परिवर्तन आया है। ऐसा नहीं है कि हम जो सोच रहे हैं उससे भी ज्यादा अच्छे गांव नहीं हैं। उससे भी ज्यादा अच्छे गांव हैं, लोगों ने बनाए हैं। आवश्यकता ये है कि हमें अगर निर्णय की प्रक्रिया में कुछ परिवर्तन लाना है तो कहीं से हमें शुरू करना चाहिए।
आज श्रद्धेय जय प्रकाश नारायण जी की जन्म जयंती का पावन पर्व है। आजादी के आंदोलन में मुखर युवा शक्ति, और आजादी के बाद राजनीति से अपने आप को भिन्न रखते हुए रचनात्मक कामों में अपने आप को आहूत करते हुए, उन्होंने अपने जीवन को जिस प्रकार से जिया, हम सबके लिए प्रेरणा बने हैं। जय प्रकाश जी की एक बात.. उनके विचारों पर गांधी, विनोबा की छाया हमेशा रहती थी। लोहिया की छाया भी रहती थी। उन्होंने एक बात कही कि ग्राम धर्म एक महत्वपूर्ण बात है और जब तक एक समाज की तरह गांव सोचता नहीं है, चलता नहीं है, तो ग्राम धर्म असंभव। है और अगर ग्राम धर्म संभव है, तो ग्राम नई ऊंचाईयों को पाने का रास्ता अपने आप चुन सकता है।
महात्मा गांधी के जीवन में गांव का जिक्र हर बात में आता है। गांधी जी 1915 में विदेश से वापस आए। दो साल के भीतर-भीतर उन्होंने जो कुछ भी अध्ययन किया, वही बिहार के चंपारण में जाकर के गांव के लोगों के अधिकार के लिए लड़ाई लड़ना शुरू कर दिया। जन भागीदारी के साथ कर दिया। इतने बड़े आजादी के आंदोलन का बीज गांव में बोया गया था, गांधी के द्वारा। आज जयप्रकाश नारायण जी के अनन्य साथी श्रीमान नानाजी देशमुख की भी जन्म जयंति है। नानाजी देशमुख ने जयप्रकाश नारायण और उनकी श्रीमती जी प्रभा देवी, उनके नाम से चित्रकूट के पास जयप्रभा नगर के विकास के लिए अपने आप को आछूत किया था। जयप्रभा नगर के मॉडल के आधार पर उन्होंने उत्तर प्रदेश के कई गांवों में, गांवों के जीवन को self sufficient बनाना, इस मकसद को लेकर उन्होंने काम किया था।
हमारे पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जी स्वयं उन गांवों का विजिट करने गए थे और उन्होंने बड़े विस्तार से अपनी बातों में उसका उल्लेख कई बार किया है। कहने का तात्पर्य यह है, कि आज हम जब आदर्श ग्राम योजना और वो भी सांसद के मार्गदर्शन में, सांसद के नेतृत्व में, सांसद के प्रयत्नों से, इसको हमें आगे बढ़ाना है। फिलहाल तो इस टर्म में Total 3 गांवों की कल्पना की है। 16 तक एक गांव का मॉडल खड़ा हो जाए, उसके अनुभव के आधार पर 19 तक दो और गांव हो जाए और आगे चलकर के फिर हर वर्ष एक गांव सांसद करे। करीब-करीब हम 800 सांसद है। अगर 19 के पहले हम तीन-तीन गांव करते हैं तो ढ़ाई हजार गांव तक पहुंच पाते हैं।
इसी योजना के प्रकाश में अगर राज्य भी विधायकों के लिए अगर कोई स्कीम बनाती है, और विधायक के नेतृत्व में आदर्श ग्राम… तो छह-सात हजार गांव और जुड़ सकते हैं। और, अगर एक ब्लॉक में, एक ब्लॉक में, एक गांव अच्छा बन जाता है तो बात वहां रूकती नहीं है। अगल-बगल के गांवों को भी हवा लगती है, वहां भी चर्चा होती है कि भई देखो वहां यह हुआ, हम भी कर सकते हैं। यहां ये प्रयोग हुआ, हम भी कर सकते हैं। इसका viral effect शुरू हो सकता है। इसलिए सबसे महत्वपूर्ण बात हम किस प्रकार से इसकी नींव रखते है।
हमारे देश में लंबे अरसे से आर्थिक क्षेत्र में चर्चा करने वाले, विकास के क्षेत्र में चर्चा करने वाले, एक बहस लगातार चल रही है। और वह चर्चा है कि भई विकास का model top-to-bottom हो कि bottom-to-top हो? यह चर्चा हो रही है। अब चर्चा करने वालों का काम… चर्चा करनी भी चाहिए। उसमें से नई-नई चीजें निकलती हैं। लेकिन काम वालों का काम है – कि चलो भाई, हम कहीं से शुरू तो करें। तो top-to-bottom जाना है कि bottom-to-top जाना है, वह चर्चा जहां होती है, होती रहे। देखिए हम तो कम से कम bottom में बैठकर के एक गांव को देखें तो सही।
इसका सबसे बड़ा लाभ यह होने वाला है, जिसका अंदाजा बहुत कम लोगों को है। आज सांसद अपने क्षेत्र के विकास के लिए, अपने क्षेत्र की जन समस्याओं के लिए जुटा रहता है, किसी भी दल का क्यों न हो, वह accountable होता है, उसे काम करते रहना पड़ता है। हर पल उसको जनता के बीच रहना पड़ता है। लेकिन ज्यादातर उसकी शक्ति और समय तत्कालीन समस्याओं को सुलझाने में जाता है। दूसरा, उसका शक्ति और समय सरकार से काम निकलवाने के लिए अफसरों के पीछे लगता है। मैं आज एकदम से इन स्थितियों को बदल पाऊंगा या नहीं, कह नहीं रहा। लेकिन इस प्रयोग के कारण… MPLADS fund होता है, उसमें भी होता क्या है? उसको, इलाके के लोग कहते हैं, मुझे यह चाहिए, यह चाहिए। फिर वो बांट देता है। सरकारी अफसर को दे देता है, देखों भाई ज्यादा से ज्यादा गांव खुश हो जाए ऐसा कर लेना जरा। छोटी-छोटी स्कीम… आखिरकार होता यही है।
ये काम ऐसा है कि जहां आज उसको एक Focussed activity के द्वारा ये लगने लगेगा कि, हां भई, उस गांव के साथ आने वाले दशकों तक उसका नाम जुड़ने वाला है। वो गांव हमेशा याद करेगा कि, भई, पहले तो हमारा गांव ऐसा था लेकिन हमारे एक MP बने थे, उनके रहते हुए ये बदलाव आ गया।
आज सरकारी योजनाएं बहुत सारी हैं। टुकड़ों में शायद एक सांसद उन योजनाओं से संपर्क में आता है लेकिन सभी योजनाओं की धाराएं एक जगह पर ले जाने में कठिनाइयां क्या हैं? कमियां क्या हैं? और अच्छा बनाने का रास्ता क्या है? ये सारी बातें, जब एक सांसद एक गांव को लेकर चर्चा शुरू करेगा, तो सरकारी व्यवस्थाओं की बहुत सी कमियां उजागर होने वाली हैं।
ये मैंने छोटा Risk नहीं लिया है। लेकिन बहुत समझदारी, जानकारी और अनुभव के आधार पर मैं कहता हूं - एक बार सांसद जब उसमें जुड़ेगा, सारी कमियां उभरकर के सामने आएगीं। और फिर जाकर के व्यवस्था में परिवर्तन शुरू होगा। फिर सबको लगेगा, “हां देखो यार! उस गांव में हमने इतना बदल किया तो सब जगह पर हम कर सकते हैं।“ आज होता क्या है, एक गांव में एक योजना होती है, टंकी एक जगह पर बन जाएगी, पानी का ट्यूबवैल दूसरी जगह पर होगा। जहां टंकी वहां ट्यूबवैल नहीं, जहां ट्यूबवैल है वहां टंकी नहीं। खर्चा हुआ? हुआ! Output हुआ? हुआ! Outcome हुआ? नहीं हुआ! इसलिए, Outcome पर Focus देने के लिए एक बार सांसद, गांव के जीवन की सभी बातों से वो जुड़ने वाला है।
इसमें इतनी Flexibility है, इस कार्यक्रम में, कि वो अपनी मर्जी से कोई गांव चुन ले। हो सके तो तीन हजार, पांच हजार की बस्ती में हो लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि कहीं 2800-2600 हैं तो लेना नहीं। और कहीं 5200 हो गए तो हाथ मत लगाओ। यह Flexible है लेकिन मोटा-मोटा अंदाज रहे कि तीन हजार-पांच हजार की बस्ती रहे तो एक व्यवस्था गढ़ी जाए। जहां पहाड़ी इलाके हैं, Tribal इलाके हैं वहां इतने बड़े गांव नहीं होते, तो वहां एक हजार और तीन हजार के बीच की संख्या हो।
सिर्फ एक शर्त रखी है मैंने, वो शर्त ये रखी है कि ये उसका अपना गांव नहीं होना चाहिए। या अपना सुसराल नहीं होना चाहिए। इसके सिवाए वो कोई भी गांव Select कर ले। वहां के जनप्रतिनिधियों के साथ बैठकर के करे। मुझे भी बनारस के लिए गांव अभी Select करना बाकी है। आज एक Guidelines आ गई हैं। मैं भी बनारस जाऊंगा, बात करूंगा और सबका मन बनाकर के मैं भी एक गांव Select करूंगा।
ये पूरी योजना.. आजकल हमारी एक सबसे बड़ी समस्या ये रही है कि हमारा विकास का मॉडल Supply-driven रहा है। दिल्ली में या लखनऊ में या गांधीनगर में योजना बन गई। फिर वही Inject करने का प्रयास होता है। हम इस आदर्श ग्राम के द्वारा Supply-driven से Shift करके Demand-driven बनाना चाहते हैं। गांव में urge पैदा हो। गांव कहे कि हां, ये करना है। अब ये चीज ऐसी नहीं, गांव में एक Bridge बना देना है या गांव के अंदर एक बुहत बड़ा तालाब बना देना है। इस प्रकार का नहीं है।
हमारी आज के स्थितियों में बदलाव लाया जा सकता है कि नहीं लाया जा सकता है। अब कोई मुझे बताए, गांव के स्कूल हों, गांव का पंचायत घर हो, गांव का कोई मंदिर हो, गांव का कोई और तीर्थ क्षेत्र हो, पूजाघर हो - कम से कम वहां सफाई हो। अब इसके लिए बजट लगता है क्या? लेकिन मैं खुद गांवों में जाता था।
मेरा ये भाग्य रहा है कि शायद, शायद राजनीतिक जीवन में काम करने वालों में बहुत कम लोगों को ये सौभाग्य मिला होगा, जो मुझे मिला है। मैंने 45 साल तक भ्रमण किया है। मैं 400 से अधिक गांवों में… Sorry, 400 से अधिक जिलों में… मुझे हिंदुस्तान में रात्रि मुकाम का अवसर मिला है। इसलिए मुझे, मुझे धरती की सच्चाई का पता है। गुजरात के बाहर कम से कम 5000 से अधिक गांव ऐसे होंगे, जहां कभी न कभी मेरा जाना हुआ होगा। और इसलिए मैं स्व-अनुभव से इन चीजों को जानता हूं, समझता हूं। और उसके आधार पर मैं कहता हूं कि हम एक बार गांव में विश्वास पैदा करें। गांव को तय करवायें कि हां, ये करना है।
अब मुझे बताइए, किसी गावं में, 3000-5000 की बस्ती हो, एक साल में डिलीवरी कितनी होती है। Maximum 100। उसमें 50-60 महिलाएं ऐसी होंगी, जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी होगी। 25-30 महिलाएं ऐसी होगी, जिनको इस गर्भावस्था में, अगर पोषण की व्यवस्था गांव कर दे, तो कभी भी कुपोषित बच्चा पैदा होने की संभावना नहीं है। माता के मरने की संभावना नहीं है।
अगर यही काम भारत सरकार को करना है तो Cabinet का note बनेगा, Department का Comment आएगा, Cabinet पास करेगी, Tender निकलेगा, Tender निकलने के बाद क्या होगा, सबको मालूम है। फिर छह महीने के बाद अखबार में खबर आएगी कि ये हुआ। इसमें न Tender लगेगा न बजट लगेगा, न कोई Cabinet की जरूरत पड़ेगी, न मंत्री की जरूरत पड़ेगी। गांव के लोग मिलके तय करेंगे कि हर वर्ष 25 महिलाएं अगर गर्भावस्था है, गरीब है तो उनको तीन महीने-चार महीने Extra Nutritional food के लिए हम गांव के लोग मिलकर के काम करेंगे।
मैं बताता हूं, यह काम आसान है साथियों। हमें मिजाज बदलने की आवश्यकता है। हमें जन-मन को जोड़ने की आवश्यकता है। और सांसद महोदय भी, यूं Political Activity करते होंगे, लेकिन उस गांव में जब जाएंगे, तो No Political Activity। पारिवारिक संबंध, पूरा परिवार जाए, बैठे, गांव के लोगों के साथ बैठे। आप देखिए, चेतना आएगी, गांव जुड़ जाएगा। समस्याओं का समाधान हो जाएगा।
हमारे यहां सरकार की योजना से मध्याह्न भोजन चलता है। अच्छी बात है, चलाना भी चाहिए। लेकिन गांव में भी 80-100 परिवार ऐसे होते हैं जो अपना जन्मदिन, अपने पिताजी की पुण्यतिथि, कुछ-न-कुछ मनाते हैं। अगर थोड़ा उनसे संपर्क कर कहा जाए कि आप भले मनाते हो, लेकिन आपको जीवन का अच्छा प्रसंग हो तो आप परिवार के साथ स्कूल में आइए। घर से कुछ मिठाई-विठाई लेकर के आइए। और बच्चे जब मध्याह्न भोजन करते हैं, आप भी उनके साथ बैठिए, आप भी अपना कुछ साथ बांटिए। मुझे बताइए, Social Harmony का कितना बढि़या Movement चल सकता है। At the same time, मध्याह्न भोजन की Quality में change लाने के लिए यह Input काम में आ सकता है कि नहीं आ सकता है? कोई बहुत बड़े circular की जरूरत नहीं पड़ती है। बहुत बड़ी योजना की जरूरत नहीं पड़ती। ये तिथि भोजन का कार्यक्रम हम आगे बढ़ा सकते हैं कि नहीं बढ़ा सकते हैं?
गांवों में सरकार की योजना है, गोबर गैस के प्लांट लगाने की। होता क्या है, हम सबको मालूम है। कोई बेचारा एक-आध व्यक्ति लगा देता है, पैसे हैं, सरकारी पैसा लाने की ताकत है, लगा देता है, लेकिन गोबर नहीं मिलता है। फिर साल, दो साल में वो स्मारक बन जाता है। अब ये स्मारक बनाना, कितना बनाते रहोगे आप? लेकिन अगर मान लीजिए, गांव की ही गोबर बैंक बना दी जाए। एक जगह पर, गांव में जितना गोबर हो, जिस तरह बैंक रुपया जमा करते है, गोबर बैंक में गोबर जमा करा दें, उसका एक common Gas Plant बने। पूरे गांव में Gas supply हो, धुएं से चूल्हें में काम करते-करते हमारी माताएं-बहनें परेशानी झेलती हैं, बिना खर्च के संभावना है कि नहीं है? पूरी संभावना मैं देख रहा हूं। और जो गोबर जमा करे, जब खेती का मौसम आए तो उतना ही गोबर उसे वापस दे दिया जाए Fertilizer के रूप में। गांव की गंदगी जाएगी। Fertilizer मिल जाएगा। Gas मिल जाएगा। और पूरा गांव साफ-सुथरा होने के कारण जो Health Parameter में सुधार आएगा, वह Extra Benefit है। मेरा कहने का तात्पर्य ये है, कि हम खुद Interest लेकर के गांव में एक माहौल बनाएं।
मैं कभी सोचता हूं, कि गांव के लोग अपने गांव के प्रति गर्व करें, ऐसा माहौल हम बनाते हैं क्या? जब तक हम ये पैदा नहीं करेंगे, बदलाव नहीं आएगा जी। ये बहुत आवश्यक होता है। गांव का अपना भी तो जन्मदिन होता है। उसको एक उत्सव के रूप में गांववाले क्यों न मनाएं? उस गांव के लोग पढ़े-लिखे जितने शहरों में गए हैं उस दिन खास गांव में क्यों न आएं? सब मिलकर के आएंगे तो सोचेंगे, “यार अपने गांव में ये नहीं है, चलो मिलकर के ये कर दें। ये गांव में ये कर दें, ये कर दें।“ ये जब तक हमारा मिजाज नहीं बने… और मैं मानता हूं, आदर्श ग्राम योजना के मूल में सरकारी योजनाएं पहले भी थीं, परिवर्तन नहीं आया है। जो कमी थी उसको भरने के लिए ये “एक” प्रयोग है। यही एक Ultimate है, ये अगर मैं सोचूंगा, तो मैं मुनष्य की बुद्धि शक्ति पर ही भरोसा नहीं करता हूं, ये अर्थ होता है। कोई पूर्ण सोच नहीं होती है। हर सोच पूर्णतया की ओर आगे बढ़ती है।
इसलिए मैं उस तत्व में विश्वास करता हूं कि कुछ भी Ultimate नहीं है। जो जब तक हुआ, अच्छा है। जो आज हो रहा है, एक कदम आगे है। आगे कोई और आएगा और अच्छा करेगा। अगर हम इसी को पूर्ण विराम मानेंगे तो काम नहीं चलता। लेकिन कहने का हमारा तात्पर्य यह है कि एक… वहां की Requirement के अनुसार, लचीलेपन के साथ सरकारी तंत्र भी हुक्म से काम न करवाए, प्रेरित करे। प्रेरित करके करवाएं। मैं विश्वास से कहता हूं, 2016 के बाद जिस सांसद ने काम किया होगा वो अपने रिश्तेदारों के लिए हमेशा उस गांव को तीर्थ क्षेत्र के रूप में बनाएगा। रिश्तेदारों को कहेगा कि चलो-चलो मैंने जो गांव बनाया है, देखने के लिए आइए। ये जो Satisfaction level है ना, वो किसी भी व्यक्ति को जीवन में समाधान देता है।
जय प्रकाश नारायण जी ने एक महत्वपूर्ण बात बताई थी। मैं समझता हूं, आज के युग में ये बहुत ही हम लोगों के लिए प्रेरक है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र और राजनीति को अलग नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र का स्वभाविक स्वभाव है, राजनीति का होना। ये आवश्यक है। लेकिन गंदी राजनीति के कारण हम परेशान हैं। गंदी राजनीति के कारण बदनामी हुई। पूरे राजनीतिक क्षेत्र की बदनामी हुई है। मुद्दा ये पार्टी, वो पार्टी नहीं है। एक विश्वास के माहौल को चोट पहुंची है। तो जय प्रकाश नारायण जी ने एक अच्छी बात बताई थी। उन्होंने कहा था कि राजनीति से मुक्ति, ये मार्ग नहीं है। मार्ग ये है, गंदी राजनीति की जगह उदार और अच्छी राजनीति इतनी तेजी से आए कि उसकी जगह ले ले।
मैं मानता हूं, सांसद आदर्श ग्राम योजना एक रचनात्मक राजनीति का नया द्वार खोल रही है।
उस गांव में हमें वोट मिले या न मिले, उस गांव की कोई बिरादरी हमारा सहयोग करे या न करे, मेरी उस गांव के किसी नेता के साथ पटती हो या न पटती हो, इन सबसे परे होकर के, एक गांव के लिए.. एक गांव के लिए ये सारे बंधन, सब गांव के बाहर छोड़कर आ जाऊंगा। यहां तो गांव एक Community है, वो एक सामूहिक समाज है, एक रस समाज है, एकत्व की अनुभूति से काम करने वाला है और सपनों को पूर्ति करने के लिए मैं एक catalytic agent के रूप में, मैं एक Facilitator के रूप में, मैं उनका साथी बनकर के काम कर सकता हूं क्या।
जब 2016 में, इस अनुभव के आधार पर, जब संसद में चर्चा होगी.. मैं जानता हूं कि इस अनुभव के बाद जो सांसद Parliament में बोलेगा, अनुभव के आधार पर बोलेगा - कितनी भी असंवेदनशील सरकार होगी उसको भी उस सांसद के अनुभव को मानना पड़ेगा। कितनी भी बहुमत वाली सरकार क्यों न हो, उसको अपनी नीतियों को बदलना पड़ेगा। सांसद की बात का महात्म्य बढ़ जाने वाला है।
कोई सरकार नकार नहीं पाएगी.. कि भई तुम तो फलानी पार्टी के हो, ठीक है आलोचना कर दो। नहीं होने वाला है..क्योंकि वो कह रहा है, मैं उस गांव में गया था, मैं काम कर रहा हूं, मेरे गांव में ये दिक्कत आ रही है, आपकी सरकार की नीतियां गलत हैं, आपकी योजनाएं गलत हैं, आपको अफसरों को समझ नहीं है… वो बोलेगा!
उस बोलने में जो वजन होगा, जो ताकत होगी वो सरकार की नीतियां बदलने के लिए कारण बन जाएगी और ये देश को… Bottom-to-top वाला जो रास्ता हैं न, वो उसी से चुना जाने वाला है। Academic world में Bottom to top, Top to bottom चर्चा होती रहेगी। हम कहीं से शुरूआत करना चाहते हैं और इसलिए मैं कहता हूं Supply-Driven नहीं, Demand-Driven हम विकास को ले जा सकते हैं। सरकार के द्वारा नहीं, समाज के द्वारा विकास का रास्ता चुन सकते हैं क्या? सरकारी सहायताओं के साथ-साथ जन-भागीदारी के महत्व को बढ़ा सकते हैं क्या?
हम अभी एक आंध्र के गांव को देख रहे थे। इतने छोटे से गांव में उन्होंने 28 कमिटियां बनाई हैं। सारी कमिटियां functional हैं, ऐसा नहीं कि सिर्फ मालाएं पहनने के लिए। सारी कमिटियां Functional है और उन्होंने इन काम को करके दिखाया है। अगर हम ये प्रेरणा दें। और अगर आज सांसद के द्वारा, कल MLA के द्वारा, अगर हर वर्ष हम सात-आठ हजार गांवों को आगे बढ़ाते हैं, देखते-ही-देखते ऐसा Viral effect होगा कि हम पूरे ग्रामीण परिसर के विकास के Model को बदल कर रख देंगे।
हम यह समझ कर चलें कि गांव के व्यक्ति के aspirations भी शहर के लोगों से कम नहीं हैं। वह दुनिया देख रहा है। वह अपनी Quality of life में बदलाव चाहता है। उसको भी बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा चाहिए। उसको भी अगर long distance education मिलता है, तो उसको चाहिए।
अब हम मानो, कहते हैं कि भाई, Drip irrigation। पानी का संकट है दुनिया में कौन इंकार करता है? हर कोई कहता है, पानी का संकट है। क्या मैं जिस आदर्श ग्राम को चुनूंगा, वहां पर जितने किसान होंगे, वहां का एक भी खेत ऐसा नहीं होगा, जहां पर मैं drip irrigation न लगवाऊं। सरकार की जितनी स्कीमें होंगी, वो लाऊंगा। बैंक वालों से बोल कर उनको Loan दिलवा दूंगा। लेकिन Drip irrigation करके मैं उनके Product को बढ़ावा दे सकता हूं क्या? गांव की Economy बदल जाएगी। वहां भी पशुपालन होगा। Milk productivity बढ़े, पशु की स्थिति में सुधार आए, उसका scientific development हो - मैं अफसरों को लाउंगा, समझाऊंगा, मैं खुद उनको समझाऊंगा। मैं बदलाव ला सकता हूं।
मित्रों, मैं मानता हूं ग्रामीण परिसर के जीवन को बदला जा सकता है। जो लोग शहर से MP चुनकर आए हैं - एक भी गांव नहीं है। मेरी उनसे प्रार्थना है, आप अपने शहरी क्षेत्र के नजदीक का कोई गांव है, उसकी तरफ ध्यान दीजिए। आप जिम्मा लीजिए। आप उसपे काम कीजिए। जो राज्यसभा के मित्र हैं, वे उस राज्य के अंदर, जहां से वे चुनकर आए हैं, जो भी उनको मनमर्जी पड़े गांव select कर लें, जो Nominated MPs है, वे हिंदुस्तान में जहां उन्हें ठीक लगे, कोई गांव पसंद करें। एक गांव को करें। लेकिन हम सब मिलके एक रचनात्मक राजनीति का द्वार खोलने का काम करेंगे और राजनीतिक छूआछूत से परे हो के काम करेंगे।
जयप्रकाश नारायण जी का, महात्मा गांधी का, राम मनोहर लोहिया जी का, पंडित दीन दयाल उपाध्याय जी का। ये ऐसी पिछली शताब्दी की विचार धारा का प्रतीक है, जिनकी छाया किसी न किसी राजनीतिक जीवन पर आज भी है। सबकी सब पर नहीं होगी, लेकिन किसी ना किसी की किसी पर है। उनसे प्रेरणा लेकर के हम इस काम को आगे बढ़ाये, यही मेरी आपसे अपेक्षा है।
मैंने 15 अगस्त को कहा था कि 11 अक्टूबर, जयप्रकाश जी के जन्म दिन पर इसकी guidelines पेश करेंगे। कुछ मित्रों में मुझे उसी शाम को Email करके, कि मैंने एक गांव Select किया है, ऐसा मुझे बताया था। और वे भाजपा के ही लोग थे, ऐसा नहीं है। भाजपा के सिवा MP ने भी, कॉंग्रेस के MPs ने भी मुझे लिखकर के दिया है। तभी मुझे लगा था कि बात में दम है। राजनीति से परे होकर के सबको इसको गले लगा रहे हैं।
लेकिन बहुत सारे… जैसे मुझे, मुझे भी अभी गांव तय करना, मेरे इलाके में अभी बाकी है। क्योंकि मैं भी चाहता था कि Guidelines तय होने के बाद मैं, मेरे बनारस के लोगों से मिलकर के, बैठकर के, वहां के अफसरों से भी मिलकर के, बैठकर के एकाध गांव Select करूंगा। आने वाले 15-20 दिन में मैं जरूर कर लूंगा। लेकिन हम मिलकर के अपने यहां विश्वास जताएं कि हम करेंगे और उनको विश्वास भेजिए, कि आप MP रहेंगे तो आगे भी और गांव होंगे। एक model बन रहा है। और फिर और गांववालों को उस model को दिखाने के लिए लाने का प्रबंध करोगे तो अपने आप में बदलाव आ जाएगा। लेकिन हम अपने प्रयत्नों से ग्राम विकास.. यह मूल मद्दा है। अपने प्रयत्नों से, अपने हुक्म से नहीं। चिट्ठी लिख दी ये बात छूटी, ये ऐसा नहीं है। ये काम, मैं एक MP के नाते सवाल पूछ लूं पूरा हो जाए, ऐसा नही है। हम मिलकर के एक गांव करेंगे।
मैं समझता हूं भारत मां की बहुत बड़ी सेवा करने का एक नया तरीका हम आजमा रहे हैं। मैं सभी सांसदों का हृदय से अभिनंदन करता हूं कि उन्होंने बड़े उमंग के साथ सभी दल के महानुभावों ने इसको स्वीकार किया है, स्वागत किया है और सबके मार्गदर्शन में… यह कोई योजना Ultimate नहीं है, इसमें बहुत बदलाव आएंगे। बहुत सुधार आएंगे, बहुत Practical बातें आएंगी। लेकिन ये रुपए-पैसों वाली योजना नहीं है। यह योजना People-Driven है, People's Participation से होने वाली है और सांसद मार्गदर्शन में होने वाली है। उसको आगे बढ़ायें, इसी अपेक्षा के साथ, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
फिर एक बार जय प्रकाश जी को आदरपूर्वक नमन करता हूं।
Thank you.
‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ के शुभारंभ के अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के संबोधन का मूल पाठ
भारत माता की जय।
भारत माता की जय।
भारत माता की जय।
उद्धघाटन हो गया? उद्धघाटन हो गया? नहीं, अभी आधा काम हुआ है। मैंने सिर्फ वो पर्दा हटाया है, लेकिन मैं आज चाहता हूं इस एयरपोर्ट का उद्धघाटन यहां जो भी उपस्थित हैं, आप सब करें, और इसलिए आप अपना मोबाइल फोन निकालिये, अपने मोबाइल फोन का फ्लैश लाईट कीजिए और आपका इसका उद्धघाटन कर रहे हैं। आप दीया जलाकर के यहां उपस्थित हर व्यक्ति, आज इस एयरपोर्ट का उद्धघाटन कर रहा है। ये आपकी अमानत है, ये आपका भविष्य है, ये आपका पुरूषार्थ है और इसलिए इसका उद्धघाटन भी आपके हाथों से हो रहा है, आप अपने भारत माता की जय बोलकर के, हाथ ऊपर करके, फ्लैश लाईट पूरी तरह से दिखाइये। भारत माता जी जय। भारत माता जी जय। भारत माता जी जय। बहुत-बहुत धन्यवाद। अब उद्धघाटन हो गया।
उत्तरप्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, यहां के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या, ब्रजेश पाठक, केंद्रीय मंत्रिमंडल के मेरे सहयोगी श्री राममोहन नायडू जी, पंकज चौधरी जी, ज्यूरिक एयरपोर्ट के चेयरमैन जोसेफ फेल्डर जी, अन्य मंत्रिगण, सांसद, विधायक, अन्य महानुभाव और मेरे प्यारे भाइयों और बहनों।

मैं देख रहा हूं, आज जहां भी मेरी नजर पड़ रही है, सारे युवा मुझे नजर आ रहे हैं, उत्साह से भरे युवा हैं, जोश से भरे हुए युवा हैं, क्योंकि इन युवाओं को पता है, ये जो काम हो रहा है ना, ये नौजवानों के भविष्य को नई उड़ान देने वाला काम हो रहा है। आज हम विकसित यूपी-विकसित भारत अभियान का एक नया अध्याय शुरू कर रहे हैं। देश का सबसे बड़ा प्रदेश, आज देश के सबसे अधिक इंटरनेशनल एयरपोर्ट्स वाले राज्यों में से एक हो गया है। और आज मेरे लिए गर्व और प्रसन्नता के दो कारण हैं। एक तो ये है कि इस एयरपोर्ट का शिलान्यास भी करने का सौभाग्य आप सबने मुझे दिया था और आप सबने इस एयरपोर्ट के उद्धघाटन का सौभाग्य भी मुझे दिया, लेकिन मैंने उस सौभाग्य को आपके साथ बांट दिया और आपके हाथों से उद्धघाटन करवा दिया। दूसरा, जिस उत्तर प्रदेश ने मुझे अपना प्रतिनिधि चुना, जिस उत्तर प्रदेश ने मुझे सांसद बनाया, उसकी पहचान के साथ, उस उत्तर प्रदेश की पहचान के साथ इस भव्य एयरपोर्ट का नाम भी जुड़ गया है।
साथियों,
नोएडा का ये एयरपोर्ट, आगरा, मथुरा, अलीगढ़, गाजियाबाद, मेरठ, इटावा, बुलंदशहर, फरीदाबाद, इस पूरे क्षेत्र को बहुत बड़ा लाभ होने वाला है। हिन्दुस्तान को और उत्तर प्रदेश को तो होना ही होना है। ये एयरपोर्ट पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों, छोटे और लघु उद्योगों, यहां के नौजवानों के लिए, अनेक नए अवसर लेकर आने वाला है। यहां से दुनिया के लिए विमान तो उड़ेंगे ही, साथ ही, ये विकसित उत्तर प्रदेश की उड़ान का भी प्रतीक बनेगा। मैं उत्तर प्रदेश को, विशेष रूप से पश्चिम उत्तर प्रदेश की जनता को इस भव्य एयरपोर्ट के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं।
साथियों,
आज का ये कार्यक्रम, भारत के नए मिज़ाज का प्रतीक है। आप सभी देख रहे हैं कि आज पूरा विश्व कितना चिंतित है। पश्चिम एशिया में एक महीने से युद्ध चल रहा है। युद्ध की वजह से कई सारे देशों में खाने-पीने के सामान, पेट्रोल-डीज़ल-गैस, खाद, ऐसी कई ज़रूरी चीज़ों का चारो तरफ संकट पैदा हो गया है। हर देश इस संकट का सामना करने के लिए कुछ न कुछ कोशिश कर रहा है, प्रयास कर रहा है। और हमारा भारत भी इस संकट का पूरी शक्ति से मुकाबला कर रहा है, देशवासियों की ताकत के भरोसे कर रहा है। भारत तो बहुत बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और गैस, ये जहां युद्ध चल रह है ना, इस युद्ध से प्रभावित इलाके से मंगाता रहा है। इसलिए सरकार हर वो कदम उठा रही है, जिससे सामान्य परिवारों पर, हमारे किसान भाई-बहनों पर, इस संकट का बोझ न पड़े।

साथियों,
संकट के इस समय में भी, भारत ने अपने तेज़ विकास को निरंतर जारी रखा है। मैं सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ही बात करुं, तो पिछले कुछ सप्ताह में ही, ये चौथा बड़ा प्रोजेक्ट है, जिसका शिलान्यास या लोकार्पण हुआ है। इन कुछ ही सप्ताह में, इस दौरान नोएडा में बहुत बड़ी सेमीकंडक्टर फैक्ट्री का शिलान्यास हुआ, इसी कालखड में देश की पहली दिल्ली-मेरठ नमो-भारत ट्रेन ने गति पकड़ी, इसी कालखंड में मेरठ मेट्रो का विस्तार किया गया, और इतने कम समय में आज नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का आप सबके हाथों से उद्धघाटन भी हो गया।
साथियों,
ये सारे प्रोजेक्ट्स, यूपी के विकास के लिए, डबल इंजन सरकार के प्रयासों का शानदार उदाहरण हैं। सेमीकंडक्टर फैक्ट्री, भारत को टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भर बना रही है। मेरठ मेट्रो और नमो भारत रेल, तेज और स्मार्ट कनेक्टिविटी दे रही है। और ये हमारा जेवर एयरपोर्ट, पूरे उत्तर भारत को दुनिया से जोड़ रहा है। और आपने अभी वीडियो में देखा, ये ऐसा एयरपोर्ट बन रहा है, हर दो मिनट में एक जहाज उड़ेगा, हर दो मिनट में एक जहाज उड़ेगा। पहले सपा वालों ने नोएडा को अपनी लूट का ATM बना लिया था। लेकिन आज भाजपा सरकार में वही नोएडा, यूपी के विकास का सशक्त इंजन बन रहा है।
साथियों,
जेवर का ये एयरपोर्ट, डबल इंजन सरकार की कार्यसंस्कृति का भी बहुत अच्छा उदाहरण है। अब आप सोचिये, इस एयरपोर्ट को अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार ने 2003 में ही फाइल में मंजूरी दे दी थी। 2003 में, आपमें से बहुत होंगे जिसका जन्म नहीं हुआ होगा, बहुत वो लोग होंगे जो उस समय 25-30 साल के 35 साल के हुए होंगे और आज रिटायर भी हो गए, लेकिन एयरपोर्ट नहीं बना। लेकिन केंद्र में कांग्रेस और यहां की पहले की सरकारों ने सालों तक इस एयरपोर्ट की नींव तक नहीं पड़ने दी। 2004 से 2014 तक ये एयरपोर्ट फाइलों में ही दबा रहा। जब हमारी सरकार बनी तो यूपी में सपा की सरकार थी। शुरु के दो-तीन सालों में सपा वालों ने इस पर काम नहीं होने दिया। लेकिन जैसे ही यहां भाजपा-NDA की सरकार बनी, दिल्ली में भाजपा-एनडीए की सरकार बनी, तो जेवर एयरपोर्ट की नींव भी पड़ी, निर्माण भी हुआ और अब ये शुरु भी हो गया है।
साथियों,
एयरपोर्ट के अलावा ये क्षेत्र देश के दो बड़े फ्रेट कॉरिडोर्स का भी हब बन रहा है। ये फ्रेट कॉरिडोर मालगाड़ियों के लिए बिछाई गई स्पेशल पटरियां हैं। इससे उत्तर भारत की बंगाल और गुजरात के समंदर से कनेक्टिविटी बेहतर हो गई है। और दादरी वो स्थान है जहां ये दोनों कॉरिडोर्स आपस में मिलते हैं। यानी यहां किसान जो उगाते हैं, यहां उद्योग जो कुछ बनाते हैं, वो जमीन से, हवाई मार्ग से, दुनिया के कोने-कोने तक तेज़ी से जा पाएगा। ऐसी मल्टी-मोडल कनेक्टिविटी के कारण, यूपी दुनियाभर के निवेशकों के लिए बहुत बड़ा आकर्षण बन रहा है।

साथियों,
जिस नोएडा को पहले अंधविश्वास के कारण अपने हाल पर छोड़ दिया गया था, कुर्सी जाने के डर से पहले के सत्ताधारी यहां आने से डरते थे, मुझे याद है यहां की सपा सरकार थी और मैंने नोएडा आने का कार्यक्रम बनाया, तो मुख्यमंत्री इतने डरे हुए थे कि वो उस कार्यक्रम में नहीं आए और मुझे भी डराने की लोगों ने कोशिश की, कि नोएडा मत जाओ मोदी जी, अभी-अभी प्रधानमंत्री बने हो। मैंने कहा इस धरती का आशीर्वाद लेने जा रहा हूं, जो मुझे लंबे अर्से तक सेवा करने का मौका देगा। अब वही इलाका पूरी दुनिया का स्वागत करने के लिए तैयार है। ये पूरा क्षेत्र, आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को सशक्त कर रहा है।
साथियों,
इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में, खेती-किसानी का बहुत महत्व है। मैं आज उन मेरे किसान भाई-बहनों का विशेष रूप से आभार व्यक्त करता हूं, जिन्होंने इस प्रोजेक्ट को साकार करने के लिए अपनी जमीनें दी है। उन किसानों के लिए जोरदार तालियां बजाइये दोस्तों, मेरे किसान भाई-बहनों के लिए जोरदार तालियां बजाइये। मेरे किसान भाई-बहन, आपके इस योगदान से ही, इस पूरे क्षेत्र में विकास का एक नया दौर शुरु होने जा रहा है। आधुनिक कनेक्टिविटी का जो विस्तार यहां हो रहा है, उससे पश्चिमी यूपी में फूड प्रोसेसिंग की संभावनाओं को और बल मिलेगा। अब यहां के कृषि उत्पाद दुनिया के बाज़ारों में और बेहतर तरीके से जा पाएंगे।
साथियों,
यहां मैं अपने किसान साथियों का एक और बात के लिए भी आभार व्यक्त करना चाहता हूं। आपके गन्ने से जो इथेनॉल बनाया गया है, उससे कच्चे तेल, कच्चे तेल पर देश की निर्भरता कम हुई है। अगर इथेनॉल का उत्पादन ना बढ़ता, पेट्रोल में उसकी ब्लेंडिंग ना बढ़ती, तो देश को हर वर्ष साढ़े चार करोड़ बैरल, साढ़े चार करोड़ बैरल यानी लगभग 700 करोड़ लीटर कच्चा तेल विदेशों से मंगवाना पड़ता। किसानों के परिश्रम ने देश को इस संकट के समय में इतनी बड़ी राहत दी है।
साथियों,
इथेनॉल से देश को तो फायदा हुआ ही है, किसानों को भी बहुत बड़ा लाभ हुआ है। इससे करीब डेढ़ लाख करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा बची है। यानी इथेनॉल न बनाते तो ये पैसा विदेश जाना जय था। बीते वर्षों में इतना सारा पैसा, देश के किसानों को मिला है, गन्ना किसानों को मिला है।

साथियों,
यहां के गन्ना किसानों ने तो पहले के वो दिन भी देखे हैं, जब कई-कई सालों तक गन्ने का बकाया लटका रहता था। लेकिन आज भाजपा की डबल इंजन सरकार के प्रयासों से गन्ना किसानों की स्थिति बेहतर हुई है।
साथियों,
किसी भी देश में एयरपोर्ट सिर्फ एक सामान्य सुविधा नहीं होता। ये एयरपोर्ट प्रगति को भी उड़ान देते हैं। साल 2014 से पहले, देश में सिर्फ 74 एयरपोर्ट थे। आज 160 से अधिक एयरपोर्ट्स देश में हैं। अब महानगरों के अलावा, देश के छोटे-छोटे शहरों में भी हवाई कनेक्टिविटी पहुंच रही है। पहले जो सरकारें रही हैं, वे मानती थीं कि हवाई यात्रा सिर्फ अमीरों के लिए ही होनी चाहिए। लेकिन भाजपा सरकार ने, सामान्य भारतीय के लिए हवाई यात्रा को आसान बना दिया है। हमारी सरकार ने उत्तर प्रदेश में हवाई अड्डों के नेटवर्क का तेज़ी से विस्तार करते हुए उनकी संख्या बढ़ाकर सत्रह कर दी है।
साथियों,
भाजपा सरकार का निंरतर प्रयास रहा है कि एयरपोर्ट भी बने और किराया-भाड़ा भी सामान्य परिवारों की पहुंच में रहे। इसलिए, हमने उड़ान योजना शुरु की थी। इस स्कीम के कारण, बीते कुछ सालों में एक करोड़ साठ लाख से अधिक देशवासियों ने उड़ान योजना से टिकट लेकर सस्ती दरों पर हवाई यात्रा की है। और मैं आपको एक और जानकारी देना चाहता हूं। हाल में ही केंद्र सरकार ने उड़ान योजना को और विस्तार दिया है। इसके लिए लगभग 29 हज़ार करोड़ रुपए की स्वीकृति दी गई है। आने वाले वर्षों में इसके तहत, छोटे-छोटे शहरों में 100 नए एयरपोर्ट और 200 नए हेलीपैड बनाने की योजना है। यूपी को भी इससे बहुत अधिक लाभ होगा।
साथियों,
भारत का एविएशन सेक्टर, बहुत तेज़ से गति और विकास कर रहा है। जैसे-जैसे भारत में नए-नए एयरपोर्ट बन रहे हैं, वैसे-वैसे नए हवाई जहाज़ों की ज़रूरत भी बढ़ती जा रही है। इसलिए देश की अलग-अलग एयरलाइन्स ने सैकड़ों नए जहाजों के ऑर्डर दिए हैं। ये जो नई सुविधाएं हैं, नए जहाज आ रहे हैं, इनको उड़ाने वाले, इनमें सर्विस देने वाले, मेंटनेस से जुड़े, ऐसे हर काम के लिए बहुत बड़ी संख्या में वर्कफोर्स की ज़रूरत रहेगी। ये युवाओं के लिए बहुत बड़ा अवसर है। इसलिए हमारी सरकार, एविएशन सेक्टर में ट्रेनिंग की सुविधाओं का भी विस्तार कर रही है।
साथियों,
आप जब अपनी कोई गाड़ी खरीदते हैं, तो ये जरूर देखते हैं कि उस गाड़ी बनाने वाली कंपनी का सर्विसिंग सेंटर आसपास है या नहीं है। आप जानकर हैरान हो जाएंगे कि हमारे देश में हवाई जहाजों की सर्विसिंग, यानी उनके मैंटनेंस, रिपेयर एंड ओवरहॉल की पुख्ता व्यवस्थाएं ही नहीं थीं। भारत के 85 एयरपोर्ट, 85 परसेंट हवाई जहाजों को आज भी मैंटनेंस, रिपेयर एंड ओवरहॉल यानी MRO के लिए, इस काम के लिए विदेश भेजना पड़ता है। इसलिए हमारी सरकार ने ठाना है कि MRO सेक्टर में भी भारत को आत्मनिर्भर बनाएंगे। अब भारत में ही, बहुत बड़े पैमाने पर MRO सुविधाएं विकसित की जा रही हैं। आज यहां जेवर में भी MRO सुविधा का शिलान्यास हुआ है। ये सुविधा जब तैयार हो जाएगी, तो ये देश-विदेश के विमानों को सेवा देगी। इससे देश को कमाई भी होगी, हमारा पैसा भी देश में ही रहेगा, और युवाओं को अनेक रोजगार भी मिलेंगे।

साथियों,
आज हमारी सरकार की प्राथमिकता देश के नागरिकों की सुविधा है। देश के नागरिक का समय बचे और उसकी जेब पर ज्यादा बोझ भी न पड़े, ये हमारा लक्ष्य है। मेट्रो और वंदे भारत जैसी आधुनिक रेल सेवाओं का इसी भाव से ही विस्तार किया जा रहा है। दिल्ली-मेरठ नमो भारत रेल, इसका कितना फायदा हो रहा है, ये भी हम सब देख रहे हें। अभी तक नमो भारत, ढाई करोड़ से अधिक लोग सफर कर चुके हैं। दिल्ली-मेरठ के जिस सफर में पहले घंटों लग जाते थे, अब वो सफर मिनटों में ही पूरा हो रहा है।
साथियों,
विकसित भारत के विकसित आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमारी सरकार अभूतपूर्व निवेश कर रही है। बीते 11 वर्षों में इंफ्रास्ट्रक्चर का बजट छह गुणा से अधिक बढ़ाया गया है। इन वर्षों में 17 लाख करोड़ रुपये हाईवे और एक्सप्रेसवे पर खर्च किए गए हैं, एक लाख किलोमीटर से अधिक के हाईवे का निर्माण किया गया है। 2014 तक रेलवे में सिर्फ 20 हजार किलोमीटर रूट का बिजलीकरण हुआ था। जबकि 2014 के बाद से 40 हजार किलोमीटर से ज्यादा रेलवे ट्रैक का बिजलीकरण किया गया है। आज ब्रॉडगेज नेटवर्क का लगभग शत-प्रतिशत बिजलीकरण हो चुका है। आज कश्मीर घाटी हो या नॉर्थ ईस्ट की राजधानियां, ये पहली बार रेल नेटवर्क से जुड़ रही हैं। पोर्ट यानी बंदरगाहों की क्षमता, बीते दशक में दोगुने से अधिक हुई है। देश में नदी जलमार्गों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है। विकसित भारत के निर्माण के लिए जरूरी हर क्षेत्र में भारत तेज़ी से काम कर रहा है।

साथियों,
विकसित भारत बनाने के लिए सबका प्रयास बहुत ज़रूरी है। ये आवश्यक है कि 140 करोड़ देशवासी कड़े से कड़ा परिश्रम करे, और वैश्विक संकटों का एकजुट होकर सामना करें। अभी जो युद्ध चल रहा है, इससे पैदा हुए संकटों का सामना कैसे करना है, इसके बारे में मैंने संसद में भी विस्तार से बताया है। मेरी कल देश के सभी मुख्यमंत्रियों से भी लंबी चर्चा हुई है और बड़ी सकारात्मक चर्चा हुई है। मैं आज आप सभी जनता-जनार्दन से फिर कहूंगा, मैं देशवासियों से फिर से कहूंगा। हमें शांत मन से, धैर्य के साथ, एकजुटता के साथ, मिल जुलकर के, इस संकट का सामना करना है। ये पूरे विश्व में परेशानी पैदा करने वाला संकट है। हमें अपने देश की सबसे ज्यादा चिंता करनी है। और यही हम भारतीयों की सबसे बड़ी ताकत है। मैं यूपी के, देश के सभी राजनीतिक दलों से भी आग्रहपूर्वक कहना चाहता हूं, विनती पूर्वक कहना चाहता हूं, इस प्रकार के संकट में ऐसी बातें करने से बचें, जो देश के लिए नुकसानदायक हैं। जो भारतीयों के हक में है, जो भारत के हित में है, वही भारत सरकार की नीति और रणनीति है। राजनीति के लिए गलत बयानबाज़ी करने वाले, राजनीतिक बहस में तो कुछ नंबर पा लेंगे, लेकिन देश को नुकसान पहुंचाने वाली हरकतों को देश की जनता कभी माफ नहीं करती। कोरोना के महासंकट के दौरान भी, कुछ लोगों ने अफवाहें फैलाईं, वैक्सीन को लेकर झूठ बोले, ताकि सरकार का काम मुश्किल हो, देश को नुकसान हो। परिणाम क्या हुआ? जनता ने चुनावों के दौरान ऐसी राजनीति को नकार दिया, ठुकरा दिया। मुझे पूरा भरोसा है, कि देश के सभी राजनीतिक दल भी इससे सबक सीखेंगे और देश के एकजुट प्रयासों को वो बल देंगे, ताकत देंगे। इसी आग्रह के साथ, एक बार फिर से उत्तर प्रदेश को इस शानदार एयरपोर्ट के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
मेरे साथ बोलिये-
भारत माता की जय!
वंदे मातरम्!
वंदे मातरम्!
वंदे मातरम्!
वंदे मातरम्!
वंदे मातरम्!
वंदे मातरम्!
वंदे मातरम्!
वंदे मातरम्!
वंदे मातरम्!
बहुत-बहुत धन्यवाद।


