प्रधानमंत्री ने भारत के महानतम सम्राटों में से एक राजेंद्र चोल-I के सम्मान में एक स्मारक सिक्का जारी किया
राजराजा चोल और राजेंद्र चोल भारत की पहचान और गौरव के प्रतीक हैं: प्रधानमंत्री
चोल साम्राज्य का इतिहास और विरासत हमारे महान राष्ट्र की ताकत और वास्तविक क्षमता को दर्शाती है: प्रधानमंत्री
चोल युग भारतीय इतिहास के स्वर्णिम काल में से एक था; यह काल अपनी दुर्जेय सैन्य शक्ति के लिए विख्यात है: प्रधानमंत्री
राजेंद्र चोल ने गंगईकोंडा चोलपुरम मंदिर की स्थापना की; आज भी इस मंदिर की एक वास्तुशिल्प आश्चर्य के रूप में विश्व भर में प्रशंसा होती है: प्रधानमंत्री
आज, हमारी सरकार काशी-तमिल संगमम् और सौराष्ट्र-तमिल संगमम् जैसे आयोजनों के जरिए सांस्कृतिक एकता के चोळा-युगीन विचारों को आगे बढ़ा रही है: पीएम
नए संसद भवन के लोकार्पण के दौरान, जिसमें पवित्र सेंगोल स्थापित किया गया है, हमारे शिव आधीनम के संतों ने आध्यात्मिक रूप से आयोजन का नेतृत्व किया: पीएम
चोळा सम्राट शैव परंपरा के प्रमुख निर्माता थे जिन्होंने भारत की सांस्कृतिक पहचान को आकार दिया। आज भी, तमिलनाडु शैव परंपरा के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक बना हुआ है: पीएम
चोल काल में भारत ने जो आर्थिक और सैन्य ऊंचाइयां प्राप्त की, वे आज भी हमें प्रेरित करती हैं: प्रधानमंत्री
राजराजा चोल ने एक शक्तिशाली नौसेना बनाई जिसे राजेंद्र चोल ने और मजबूत किया: प्रधानमंत्री

वणक्कम चोळा मंडलम!

परम आदरणीय आधीनम मठाधीशगण, चिन्मया मिशन के स्वामीगण, तमिलनाडु के गवर्नर R N रवि जी, कैबिनेट में मेरे सहयोगी डॉ. एल मुरुगन जी, स्थानीय सांसद थिरुमा-वलवन जी, मंच पर मौजूद तमिलनाडु के मंत्री, संसद में मेरे साथी आदरणीय श्री इलैयाराजा जी, सभी ओदुवार्, भक्त, स्टूडेंट्स, कल्चरल हिस्टोरियन्स, और मेरे प्यारे भाइयों और बहनों! नमः शिवाय

नम: शिवाय वाळघा, नादन ताळ वाळघा, इमैइ पोळुदुम्, येन नेन्जिल् नींगादान ताळ वाळघा!!

मैं देख रहा था कि जब-जब नयनार नागेंद्रन का नाम आता था, चारो तरफ उत्साह के वातावरण से एकदम से माहौल बदल जाता था।

साथियों,

एक प्रकार से राज राजा की ये श्रद्धा भूमि है। और उस श्रद्धा भूमि में इलैयाराजा ने आज जिस प्रकार से शिवभक्ति में हम सबको डूबो दिया, सावन का मास हो, राज राजा की श्रद्धा भूमि हो और इलैयाराजा की तपस्या हो, कैसा अद्भुत वातावरण, बहुत अद्भुत वातावरण, और मैं तो काशी का सांसद हूं और जब ओम नम: शिवाय सुनता हूं, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

साथियों,

शिवदर्शन की अद्भुत ऊर्जा, श्री इलैयाराजा का संगीत, ओदुवार् का मंत्रोच्चार, वाकई ये spiritual experience आत्मा को भाव विभोर देता है।

साथियों,

सावन का पवित्र महीना और बृहदेश्वर शिवमंदिर का निर्माण शुरू होने के, one thousand years का ऐतिहासिक अवसर, ऐसे अद्भुत समय में मुझे भगवान बृहदेश्वर शिव के चरणों में उपस्थित होकर के पूजा करने का सौभाग्य मिला है। मैंने इस ऐतिहासिक मंदिर में 140 करोड़ भारतीयों के कल्याण और भारत की निरंतर प्रगति के लिए प्रार्थना की है। मेरी कामना है- भगवान शिव का आशीर्वाद सबको मिले, नम: पार्वती पतये हर हर महादेव!

साथियों,

मुझे यहां आने में विलंब हुआ, मैं यहां तो जल्दी पहुंच गया था, लेकिन भारत सरकार के सांस्कृतिक मंत्रालय ने जो अद्भुत प्रदर्शनी लगाई है, ज्ञानवर्धक है, प्रेरक है और हम सब गर्व से भर जाते हैं, कि हजार साल हमारे पूर्वजों ने किस प्रकार से मानव कल्याण को लेकर के दिशा दी। कितनी विशालता थी, कितनी व्यापकता थी, कितनी भव्यता थी, और ये बताया गया मुझे पिछले एक सप्ताह से हजारों लोग ये प्रदर्शनी को देखने के लिए आ रहे हैं। ये दर्शनीय हैं और मैं तो सबको कहूंगा कि इसको आप जरूर देखें।

साथियों,

आज मुझे यहाँ चिन्मय मिशन के प्रयासों से तमिल गीता की एल्बम लॉंच करने का अवसर भी मिला है। ये प्रयास भी विरासत को सहेजने के हमारे संकल्प को ऊर्जा देता है। मैं इस प्रयास से जुड़े सभी लोगों को भी बहुत-बहुत अभिनंदन करता हूँ।

साथियों,

चोळा राजाओं ने अपने राजनयिक और व्यापारिक संबंधों का विस्तार श्रीलंका, मॉलदीव और दक्षिण-पूर्व एशिया तक किया था। ये भी एक संयोग है कि मैं कल ही मॉलदीव से लौटा हूं, और आज तमिलनाडु में इस कार्यक्रम का हिस्सा बना हूं।

हमारे शास्त्र कहते हैं- शिव के साधक भी शिव में ही समाहित होकर उनकी ही तरह अविनाशी हो जाते हैं। इसीलिए, शिव की अनन्य भक्ति से जुड़ी भारत की चोळा विरासत भी आज अमर हो चुकी है। राजराजा चोळा, राजेन्द्र चोळा, ये नाम भारत की पहचान और गौरव के पर्याय हैं। चोळा साम्राज्य का इतिहास और विरासत, ये भारत के वास्तविक सामर्थ्य का true potential का उद्घोष है। ये भारत के उस सपने की प्रेरणा है, जिसे लेकर आज हम विकसित भारत के लक्ष्य की ओर आगे बढ़ रहे हैं। मैं इसी प्रेरणा के साथ, राजेंद्र चोळा द ग्रेट को नमन करता हूं। पिछले कुछ दिनों में आप सभी ने आडी तिरुवादिरइ उत्सव मनाया है। आज उसका समापन इस भव्य कार्यक्रम के रूप में हो रहा है। मैं इसमें सहयोग करने वाले सभी लोगों को बधाई देता हूं।

साथियों,

इतिहासकार मानते हैं कि चोळा साम्राज्य का दौर भारत के स्वर्णिम युगों में से एक था। इस युग की पहचान उसकी सामरिक ताकत से होती है। मदर ऑफ डेमोक्रेसी के रूप में भारत की परंपरा को भी चोळा साम्राज्य ने आगे बढ़ाया था। इतिहासकार लोकतन्त्र के नाम पर ब्रिटेन के मैग्नाकार्टा की बात करते हैं, लेकिन, कई सदी पहले चोळा साम्राज्य में कुडावोलई अमईप् से लोकतान्त्रिक पद्धति से चुनाव होते थे। आज दुनियाभर में water management और ecology preservation की इतनी चर्चा होती है। हमारे पूर्वज बहुत पहले से इनका महत्व समझते थे। हम ऐसे बहुत से राजाओं के बारे में सुनते हैं, जो दूसरी जगहों पर विजय प्राप्त करने के बाद सोना-चांदी या पशुधन लेकर आते थे। लेकिन देखिए, राजेंद्र चोळा की पहचान, वे गंगाजल लाने के लिए हैं, वो गंगाजल ले आए थे। राजेंद्र चोळा ने उत्तर भारत से गंगाजल लाकर दक्षिण में स्थापित किया। “गङ्गा जलमयम् जयस्तम्बम्” उस जल को यहां चोळागंगा येरि, चोळागंगा झील में प्रवाहित किया गया, जिसे आज पोन्नेरी झील के नाम से जाना जाता है।

साथियों,

राजेंद्र चोल ने गंगै-कोंडचोळपुरम कोविल की स्थापना भी की थी। यह मंदिर आज भी विश्व का एक architectural wonder है। ये भी चोळा साम्राज्य की ही देन है, कि मां कावेरी की इस धरती पर मां गंगा का उत्सव मनाया जा रहा है। मुझे बहुत खुशी है कि आज उस ऐतिहासिक प्रसंग की स्मृति में, एक बार फिर गंगाजल को काशी से यहां लाया गया है। अभी यहां मैं जब पूजापाठ करने के लिए गया था, विधिपूर्वक अनुष्ठान सम्पन्न किया गया है, गंगाजल से अभिषेक किया गया है और मैं तो काशी का जनप्रतिनिधि हूं, और मेरा मां गंगा से एक आत्मीय जुड़ाव है। चोळा राजाओं के ये कार्य, उनसे जुड़े ये आयोजन, ये ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के महायज्ञ को नई ऊर्जा, नई शक्ति और नई गति देते हैं।

भाइयों बहनों,

चोळा राजाओं ने भारत को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में पिरोया था। आज हमारी सरकार चोळा युग के उन्हीं विचारों को आगे बढ़ा रही है। हम काशी तमिल संगमम् और सौराष्ट्र तमिल संगमम् जैसे आयोजनों के जरिए एकता के सदियों पुराने सूत्रों को मजबूत बना रहे हैं। गंगै-कोंडचोळपुरम जैसे तमिलनाडु के प्राचीन मंदिरों का भी ASI के जरिए संरक्षण किया जा रहा है। जब देश की नई संसद का लोकार्पण हुआ, तो हमारे शिव आधीनम के संतों ने उस आयोजन का आध्यात्मिक नेतृत्व किया था, सब यहां मौजूद हैं। तमिल संस्कृति से जुड़े पवित्र सेंगोल को संसद में स्थापित किया गया है। मैं आज भी उस पल को याद करता हूं, तो गौरव से भर जाता हूं।

साथियों,

मैंने अभी चिदंबरम् के नटराज मंदिर के कुछ दीक्षितरों से मुलाकात की है। उन्होंने मुझे इस दिव्य मंदिर का पवित्र प्रसाद भेंट किया, जहां भगवान शिव की नटराज रूप में पूजा होती है। नटराज का ये स्वरूप, ये हमारी philosophy और scientific roots का प्रतीक है। भगवान नटराज की ऐसी ही आनन्द ताण्डव मूर्ति दिल्ली के भारत मंडपम की शोभा भी बढ़ा रही है। इसी भारत मंडपम में जी-20 के दौरान दुनिया भर के दिग्गज नेता जुड़े थे।

साथियों,

हमारी शैव परंपरा ने भारत के सांस्कृतिक निर्माण में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। चोळा सम्राट इस निर्माण के अहम architect थे। इसीलिए, आज भी शैव परंपरा के जो जीवंत केंद्र हैं, तमिलनाडु उनमें बेहद अहम है। महान नयनमार संतों की लीगेसी, उनका भक्ति लिटरेचर, तमिल लिटरेचर, हमारे पूज्य आधीनमों की भूमिका, उन्होंने सोशल और spiritual फ़ील्ड में एक नए युग को जन्म दिया है।

साथियों,

आज दुनिया जब instability, violence और environment जैसी समस्याओं से जूझ रही है, ऐसे में शैव सिद्धांत हमें solutions का रास्ता दिखाते हैं। आप देखिए, तिरुमूलर ने लिखा था — “अन्बे शिवम्”, अर्थात्, प्रेम ही शिव है। Love is Shiva! आज अगर विश्व इस विचार को adopt करे, तो ज़्यादातर crisis अपने आप solve हो सकती हैं। इसी विचार को भारत आज One World, One Family, One Future के रूप में आगे बढ़ा रहा है।

साथियों,

आज भारत, विकास भी, विरासत भी, इस मंत्र पर चल रहा है। आज का भारत अपने इतिहास पर गर्व करता है। बीते एक दशक में हमने देश की धरोहरों के संरक्षण पर मिशन मोड में काम किया है। देश की ancient statues और artifacts, जिन्हें चुराकर विदेशों में बेच दिया गया था, उन्हें वापस लाया गया है। 2014 के बाद से 600 से ज्यादा प्राचीन कलाकृतियां, मूर्तियां दुनिया के अलग-अलग देशों से भारत वापस आई हैं। इनमें से 36 खासतौर पर हमारे तमिलनाडु की हैं। आज नटराज, लिंगोद्भव, दक्षिणमूर्ति, अर्धनारीश्वर, नंदीकेश्वर, उमा परमेश्वरी, पार्वती, सम्बन्दर, ऐसी कई महत्वपूर्ण धरोहरें अब फिर से इस भूमि की शोभा बढ़ा रही हैं।

साथियों,

हमारी विरासत और शैव दर्शन की छाप अब केवल भारत तक, या इस धरती तक ही नहीं। जब भारत चंद्रमा के साउथ पोल पर लैंड करने वाला पहला देश बना, तो हमने चंद्रमा के उस पॉइंट को भी शिवशक्ति नाम दिया। चंद्रमा के उस अहम हिस्से की पहचान अब शिव-शक्ति के नाम से होती है।

साथियों,

चोळायुग में भारत ने जिस आर्थिक और सामरिक उन्नति का शिखर छूआ है, वो आज भी हमारी प्रेरणा है। राजराजा चोळा ने एक पावरफुल नेवी बनाई। राजेंद्र चोळा ने इसे और सुदृढ़ किया। उनके दौर में कई प्रशासनिक सुधार भी किए गए। उन्होंने लोकल एड्मिनिस्ट्रेटिव सिस्टम को सशक्त बनाया। एक मजबूत राजस्व प्रणाली लागू की गई। व्यापारिक उन्नति, समुद्री मार्गों का इस्तेमाल, कला और संस्कृति का प्रचार, प्रसार, भारत हर दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा था।

साथियों,

चोळा साम्राज्य, नए भारत के निर्माण के लिए एक प्राचीन रोडमैप की तरह है। ये हमें बताता है, अगर हमें विकसित राष्ट्र बनाना है, तो हमें एकता पर ज़ोर देना होगा। हमें हमारी नेवी को, हमारी डिफेंस फोर्सेस को मजबूत बनाना होगा। हमें नए अवसरों को तलाशना होगा। और इस सबके साथ ही, अपने मूल्यों को, उसको भी सहेज कर रखना होगा। और मुझे संतोष है कि देश आज इसी प्रेरणा से आगे बढ़ रहा है।

साथियों,

आज का भारत, अपनी सुरक्षा को सर्वोपरि रखता है। अभी ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दुनिया ने देखा है कि कोई अगर भारत की सुरक्षा और संप्रभुता पर हमला करता है, तो भारत उसे कैसे जवाब देता है। ऑपरेशन सिंदूर ने दिखा दिया है कि भारत के दुश्मनों के लिए, आतंकवादियों के लिए अब कोई ठिकाना सुरक्षित नहीं है। और आज जब मैं हेलीपेड से यहां आ रहा था, 3-4 किलोमीटर का रास्ता काटते हुए, और अचानक मैंने देखा एक बड़ा रोड शो बन गया और हरेक के मुंह से ऑपरेशन सिंदूर का जय-जयकार हो रहा था। ये पूरे देश में ऑपरेशन सिंदूर ने एक नई चेतना जगाई है, नया आत्मविश्वास पैदा किया है और दुनिया को भी भारत की शक्ति को स्वीकार करना पड़ रहा है।

साथियों,

हम सब जानते हैं कि राजेन्द्र चोळा ने गंगै-कोंडचोळपुरम का निर्माण कराया, तो उसके शिखर को तंजावूर के बृहदेश्वर मंदिर से छोटा रखा। वो अपने पिता के बनाए मंदिर को सबसे ऊंचा रखना चाहते थे। अपनी महानता के बीच भी, राजेंद्र चोळा ने विनम्रता दिखाई थी। आज का नया भारत इसी भावना पर आगे बढ़ रहा है। हम लगातार मजबूत हो रहे हैं, लेकिन हमारी भावना विश्वबंधु की है, विश्व कल्याण की है।

साथियों,

अपनी विरासत पर गर्व की भावना को आगे बढ़ाते हुये आज मैं यहां एक और संकल्प ले रहा हूं। आने वाले समय में हम तमिलनाडु में राजराजा चोळा और उनके पुत्र और महान शासक राजेंद्र चोळा प्रथम की भव्य प्रतिमा स्थापित करेंगे। ये प्रतिमाएं हमारी ऐतिहासिक चेतना का आधुनिक स्तंभ बनेंगी।

साथियों,

आज डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जी की पुण्यतिथि भी है। विकसित भारत का नेतृत्व करने के लिए हमें डॉक्टर कलाम, चोळा राजाओं जैसे लाखों युवा चाहिए। शक्ति और भक्ति से भरे ऐसे ही युवा 140 करोड़ देशवासियों के सपनों को पूरा करेंगे। हम साथ मिलकर, एक भारत श्रेष्ठ भारत के संकल्प को आगे बढ़ाएँगे। इसी भाव के साथ, मैं एक बार फिर आज के इस अवसर की आप सबको बधाई देता हूं। बहुत-बहुत धन्यवाद।

मेरे साथ बोलिए,

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वणक्कम!

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Prime Minister pays heartfelt tributes to Gurudev Rabindranath Tagore on the occasion of Pochishe Boishakh
May 09, 2026

The Prime Minister, Shri Narendra Modi today paid heartfelt tributes to Gurudev Rabindranath Tagore on the special occasion of Pochishe Boishakh.

The Prime Minister said that Gurudev Tagore was a writer, thinker and poet of extraordinary brilliance who also made a mark as an exceptional philosopher, educationist, artist and a timeless voice of India’s civilisational soul.

The Prime Minister noted that Gurudev Tagore gave expression to the deepest emotions of humanity and the noblest ideals of Indian culture. He added that Gurudev enriched society with new thought, creative energy and cultural confidence.

Shri Modi said that the nation remembers Gurudev Tagore with deep reverence and gratitude. He expressed hope that Gurudev’s thoughts would continue to illuminate minds and guide people in their endeavours.

The Prime Minister wrote on X;

“Today, on the special occasion of Pochishe Boishakh, we pay our heartfelt tributes to Gurudev Tagore.

Gurudev Tagore was a writer, thinker and poet of extraordinary brilliance. He made a mark as an exceptional philosopher, educationist, artist and a timeless voice of India’s civilisational soul. He gave expression to the deepest emotions of humanity and the noblest ideals of our culture. He enriched our society with new thought, creative energy and cultural confidence.

We remember him with deep reverence and gratitude. May his thoughts continue to illuminate minds and guide us in our endeavours.”