आत्मनिर्भर भारत सेंटर फॉर डिज़ाइन (एबीसीडी) और समुन्नति - द स्टूडेंट बिनाले का उद्घाटन किया
कार्यक्रम के 7 विषयों पर आधारित 7 प्रकाशनों का अनावरण किया
स्मारक डाक टिकट जारी किया
"इंडिया आर्ट, आर्किटेक्चर एंड डिज़ाइन बिनाले, देश की विविध विरासत और जीवंत संस्कृति का उत्सव"
“किताबें दुनिया का विस्तृटत परिदृश्यब दिखाती हैं, कला मानव मन की महान यात्रा है"
"कला और संस्कृति मानव मन को अंतरात्मार से जोड़ने और उसकी क्षमता पहचानने के लिए आवश्यक हैं"
"आत्मनिर्भर भारत सेंटर फॉर डिज़ाइन भारत के अद्वितीय और दुर्लभ शिल्प को बढ़ावा देने के लिए एक मंच प्रदान करेगा"
"दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, अहमदाबाद और वाराणसी में बनाए जाने वाले सांस्कृतिक स्थल इन शहरों को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध करेंगे"
"भारत में कला, स्वाद और रंग जीवन के पर्याय माने जाते हैं"
"भारत दुनिया का सबसे विविधतापूर्ण देश है, इसकी विविधता हमें एकजुट करती है"
"कला प्रकृति-समर्थक, पर्यावरण-समर्थक और जलवायु-समर्थक है"

कार्यक्रम में उपस्थित मेरे सहयोगी श्री जी. किशन रेड्डी जी, अर्जुनराम मेघवाल जी, मीनाक्षी लेखी जी, डायना केलॉग जी, दुनिया के विभिन्न देशों से आए अतिथिगण, कला जगत के सभी गणमान्य साथियों, देवियों और सज्जनों !

लाल किले का ये प्रांगण, अपने आप में बहुत ऐतिहासिक है। ये किला केवल इमारत नहीं है, ये एक इतिहास है। आजादी के पहले और आजादी के बाद कितनी ही पीढ़ियाँ गुजर गईं, लेकिन लाल किला अडिग है, अमिट है। इस वर्ल्ड हेरिटेज साइट लाल किले में आप सभी का बहुत-बहुत अभिनंदन है।

साथियों,

हर राष्ट्र के पास उसके अपने प्रतीक होते हैं जो विश्व को उसके अतीत से और उसके मूल्यों से परिचित करवाते हैं। और, इन प्रतीकों को गढ़ने का काम राष्ट्र की कला, संस्कृति और वास्तु का होता है। राजधानी दिल्ली तो ऐसे ही कितने प्रतीकों का केंद्र है, जिनमें हमें भारतीय वास्तु की भव्यता के दर्शन होते हैं। इसलिए, दिल्ली में आयोजित हो रहे ‘इंडिया आर्ट आर्किटेक्चर एंड डिज़ाइन बियनाले’ का ये आयोजन कई मायनों में खास है। मैं अभी यहाँ बनाए गए पवेलियन्स देख रहा था, और मैं आपकी क्षमा भी मांगता हूं कि मैं लेट भी इसी के कारण आया कि वहां एक से बढ़कर ऐसे देखने योग्य, समझने योग्य चीजें हैं कि मुझे आने में विलंब हो गया, और फिर भी मैं 2-3 स्थान तो छोड़ने पड़े मुझे। इन पवेलियन्स में कलर्स भी हैं, creativity भी है। इसमें कल्चर भी है, और community connect भी है। मैं इस सफल शुरुआत के लिए संस्कृति मंत्रालय, उसके सभी अधिकारी, इसमें प्रतिभाग कर रहे सभी देशों को, और आप सभी को बधाई देता हूँ। हमारे यहां कहा जाता है कि किताब जो है वो दुनिया देखने की एक छोटी सी window के रूप में वो शुरूआत करता है। मुझे लगता है कला मानव मन के भीतर की यात्रा का महामार्ग है।

साथियों,

भारत हजारों वर्ष पुराना राष्ट्र है। एक समय था जब दुनिया में भारत की आर्थिक समृद्धि के किस्से कहे जाते थे। आज भी भारत की संस्कृति, हमारी प्राचीन धरोहरें पूरी दुनिया के पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। आज देश ‘विरासत पर गर्व’ इस भावना को लेकर अपने उस गौरव को फिर से आगे बढ़ा रहा है। आज art और architecture से जुड़े हर क्षेत्र में आत्मगौरव की भावना से काम हो रहा है। चाहे केदारनाथ और काशी जैसे हमारे सांस्कृतिक केन्द्रों का विकास हो, महाकाल महालोक जैसे पुनर्निर्माण हों या आजादी के अमृतकाल में, भारत सांस्कृतिक समृद्धि के नए आयाम गढ़ रहा है, इसके लिए ठोस प्रयास कर रहा है। भारत में हो रहा ये बियनाले इस दिशा में एक और शानदार कदम है। इसके पहले हमने देखा है, यहां दिल्ली में ही International Museum Expo हुआ था। अगस्त में Festival of Libraries का आयोजन भी किया गया था। इन कार्यक्रमों के जरिए हमारा प्रयास है कि भारत में ग्लोबल कल्चरल initiative को संस्थागत बनाया जाए, उसको institutionalized किया जाए। एक आधुनिक व्यवस्था बनाई जाए। हम चाहते हैं कि वेनिस, साओ पाउलो, सिंगापुर, सिडनी, शारजाह जैसे बियनाले और दुबई-लंदन जैसे आर्ट फेयर्स की तरह दुनिया में भारत के आयोजनों की भी बड़ी पहचान बने। और इसकी जरूरत इसलिए भी होती है कि आज मानव जीवन पर टेक्नोलॉजी का प्रभाव इतना बढ़ गया है और कोई भी दूर का जो देखता है वो नहीं चाहेगा कि उसका समाज रोबोट हो जाए। हमें रोबोट तैयार नहीं करने हैं, हमें इंसान बनाने हैं। और उसके लिए संवेदनाएं चाहिए, उम्मीद चाहिए, सद्भावना चाहिए, उमंग चाहिए, उत्साह चाहिए। आशा-निराशा के बीच जीने के तरीके चाहिए। ये सारी चीजें कला और संस्कृति के माध्यम से पैदा होती हैं। जोड़-तोड़ के लिए टेक्नोलॉजी बहुत तेज काम कर सकती है। और इसलिए इस प्रकार की चीजें मानव की भीतर के सामर्थ्य को जानना-पहचानना, उसे जोड़ना इसके लिए एक बहुत बड़ा सहारा देती है।

और साथियों,

अपने इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए ही आज ‘आत्मनिर्भर भारत सेंटर फॉर डिज़ाइन’ का लोकार्पण भी हुआ है। ये सेंटर भारत की unique और rare crafts को, दुर्लभ कलाओं को, आगे बढ़ाने के लिए मंच देगा। ये कारीगरों और डिज़ाइनर्स को साथ लाने, मार्केट के हिसाब से उन्हें इनोवेशन करने में मदद करेगा। इससे कारीगरों को डिज़ाइन डेवलपमेंट की भी जानकारी मिलेगी, और वो डिजिटल मार्केटिंग में भी पारंगत होंगे। और हम जानते हैं, भारतीय शिल्पियों में इतनी प्रतिभा है कि आधुनिक जानकारी और संसाधनों के साथ वो पूरी दुनिया में अपनी छाप छोड़ सकते हैं।

Friends,

भारत में 5 शहरों में कल्चरल स्पेस बनाने की शुरुआत होना भी एक ऐतिहासिक कदम है। दिल्ली के साथ-साथ कोलकाता, मुंबई, अहमदाबाद और वाराणसी में बनने वाले ये कल्चरल स्पेस, इन शहरों को सांस्कृतिक रूप से और समृद्ध करेंगे। ये सेंटर, लोकल आर्ट को enrich करने के लिए innovative ideas को भी आगे बढ़ाएंगे। आप सभी ने अगले 7 दिनों के लिए 7 महत्वपूर्ण थीम्स भी तय की हैं। इसमें ‘देशज भारत डिज़ाइन’ और ‘समत्व’, इन थीम्स को हमें एक मिशन के रूप में आगे लेकर चलना होगा। देशज यानी indigenous, indigenous डिज़ाइन को enrich करने के लिए ये जरूरी है कि हमारे युवाओं के लिए अध्ययन और रिसर्च का हिस्सा बने। समत्व थीम वास्तु के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी को सेलिब्रेट करती है। मुझे विश्वास है, नारीशक्ति की कल्पनाशक्ति, उनकी रचनात्मकता इस क्षेत्र को नई ऊंचाई पर लेकर जाएगी।

साथियों,

भारत में कला को, रस और रंगों को जीवन का पर्याय, synonym of life माना गया है। हमारे पूर्वजों ने तो यहाँ तक कहा है कि- साहित्य संगीत कला विहीनः, साक्षात् पशुः पुच्छ विषाण हीनः। अर्थात्, मनुष्य और दूसरे जीव जंतुओं में साहित्य, संगीत और कला का ही मुख्य अंतर है। यानी, सोने-जागने और पेट भरने की आदतें अपनी स्वाभाविक होती हैं। लेकिन, ये कला, साहित्य और संगीत ही हैं जो मनुष्य के जीवन में रस घोलते हैं, उसे खास बनाते हैं। इसीलिए, हमारे यहाँ जीवन की अलग-अलग जरूरतों को, अलग-अलग दायित्वों को, चतुसाष्ट कला, 64 arts से उसे जोड़ा गया है। जैसे कि, गीत-संगीत के लिए वाद्य, नृत्य और गायन कलाएं हैं। इनमें भी water waves आदि पर आधारित ‘उदक-वाद्यम्’ यानी जल वाद्य जैसी specific arts भी हैं। हमारे यहां कितने ही तरह के सेंट्स या परफ्यूम बनाने के लिए ‘गन्ध-युक्तिः’ कला है। मीनाकारी और नक्काशी के लिए ‘तक्षकर्म’ कला सिखाई जाती है। कढ़ाई-बुनाई के सौन्दर्य की बारीकियों को सिखाने के लिए ‘सूचीवान-कर्माणि’ कला है। हमारे यहां ये सब काम कितने perfection के साथ किए जाते थे, इसका अंदाजा आप भारत में बनने वाले प्राचीन वस्त्रों से लगा सकते हैं। कहा जाता था कि कपड़े का पूरा थान मलमल ऐसा बनता था कि एक अंगूठी में से उसको पार किया जा सकता था। यानि ये, ये सामर्थ्य था। भारत में नक्काशी मीनाकारी जैसे काम भी केवल सजावट की चीजों तक सीमित नहीं थे। बल्कि, तलवारों, ढालों, भालों जैसी युद्ध की चीजों पर भी अद्भुत कलाकारी देखने को मिलती थी। इतना ही नहीं, अगर कोई मैं तो चाहूंगा कभी कोई इस थीम पर सोचे। हमारे यहां पशुओं के आभूषण घोड़े पर, अपना डॉग रखते थे उस पर, बैल होते थे, गाय होती थी। उस पर जो आभूषण में जो विविधताएं थी, कला थी यानि ये अपने आप अजूबा है। और कितना perfection था कि उस पशु को physically तकलीफ ना हो, इसकी पूरी केयर करके बनाया जाता था। यानि अगर इन चीजों को समाहित करके देखें तब पता चलता है कि कितना सामर्थ्य इसमें भरा हुआ है।

साथियों,

ऐसी कितनी ही आर्ट्स हमारे देश में रही हैं। और यही भारत का प्राचीन इतिहास रहा है और आज भी भारत के कोने-कोने में इसके निशान हमें मिलते हैं। मैं तो जिस शहर का सांसद हूं, वो काशी, इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। काशी को अविनाशी कहते हैं। क्योंकि, काशी गंगा के साथ-साथ साहित्य, संगीत और कलाओं के अमर प्रवाह की धरती है। आध्यात्मिक तौर पर कलाओं के जन्मदाता माने जाने वाले, भगवान शिव को काशी ने अपने हृदय में स्थापित किया है। ये कलाएं, ये शिल्प और संस्कृति मानवीय सभ्यता के लिए ऊर्जा प्रवाह की तरह हैं। और ऊर्जा अमर होती है, चेतना अविनाशी होती है। इसलिए काशी भी अविनाशी है।

Friends,

भारत के इस कल्चर को देखने के लिए दुनिया भर से जो लोग आते हैं, उनके लिए कुछ महीने पहले हमने एक नई शुरुआत की थी। हमने गंगा विलास क्रूज़ चलाया था, जो काशी से असम तक गंगा के अंदर प्रवास करते हुए यात्रियों को लेकर गया था। इसमें दुनिया के अनेक टूरिस्ट आए थे, करीब 45-50 दिन का वो कार्यक्रम था। एक ही यात्रा में उन्हें गंगा के किनारे बसे कितने ही शहरों और गाँवों और इलाकों का अनुभव प्राप्त हुआ। और हमारा मानव संस्कृति का विकास भी नदी के तटों पर हुआ है। अगर एक बार नदी के तट की कोई यात्रा करता है, तो जीवन की गहराई को जानने के लिए बहुत बड़ा अवसर होता है। और इसी एक विचार से ये गंगा क्रूज को हमने शुरू किया था।

Friends,

कला का कोई भी स्वरूप क्यों न हो, उसका जन्म प्रकृति के, नेचर के निकट ही होता है। यहां भी मैंने जितना देखा कहीं ना कहीं nature का element उस art के साथ जुड़ा हुआ है, उससे बाहर एक भी चीज नहीं है। इसीलिए, Art by nature, pro-nature और pro-environment and pro-climate है। जैसे दुनिया के देशों में रिवर फ्रंट की बहुत बड़ी चर्चा होती है कि भई फलाने देश में ढिकना रिवर फ्रंट वगैरह-वगैरह। भारत में हजारों वर्षों से नदियों के किनारे घाटों की परंपरा है। हमारे कितने ही पर्व और उत्सव इन्हीं घाटों से जुड़े होते हैं। इसी तरह, कूप, सरोवर, बावड़ी, स्टेप वेल्स की एक समृद्ध परंपरा हमारे देश में थी। गुजरात में रानी की वाव हो, राजस्थान में अनेक जगहों पर दिल्ली में भी, आज भी कई स्टेप वेल्स आपको देखने को मिल जाएंगे। और जो रानी की वाव है उसकी विशेषता ये है कि पूर उल्टा टेंपल है। यानि कैसे उस समय की कला सृष्टि को सोचने वाले लोगों ने इसका निर्माण किया होगा। कहने का तात्पर्य है कि इन सारे हमारे पानी से जुड़े जितने संग्रह के स्थान हैं इनका architecture आप देखिए, इनका डिज़ाइन देखिए! देखने में ये किसी mega-marvel से कम नहीं लगते हैं। इसी तरह, भारत के पुराने किलों और दुर्गों का वास्तु भी दुनिया भर के लोगों को हैरान करता है। हर किले का अपना आर्किटैक्चर है, अपना साइन्स भी है। मैं कुछ दिन पहले ही सिंधुदुर्ग में था, जहां समंदर के भीतर बहुत ही विशाल किला निर्मित है। हो सकता है, आप में से कुछ लोग जैसलमेर में भी पटवों की हवेली भी गए होंगे! पाँच हवेलियों के इस समूह को इस तरह बनाया गया था कि वो नेचुरल एयरकंडिशनिंग कि तरह काम करता है। ये सारा आर्किटैक्चर न केवल long-sustaining होता था, बल्कि environmentally sustainable भी होता था। यानि पूरी दुनिया के पास भारत के आर्ट एंड कल्चर से बहुत कुछ जानने, सीखने के लिए अवसर है।

Friends,

Art, architecture और culture, ये मानवीय सभ्यता के लिए diversity और unity, दोनों के स्रोत रहे हैं। हम दुनिया के सबसे विविधतापूर्ण राष्ट्र हैं, लेकिन साथ ही वही विविधता हमें आपस में जोड़ती है। जब मैं अभी किलों की बात कर रहा था। मैं 1-2 साल पहले कार्यक्रम के लिए बुंदेलखंड गया था तो झांसी के किले पर एक कार्यक्रम था, फिर मैंने वहां सरकार से बातचीत की, कि हमने बुंदेलखंड को Fort Tourism के लिए develop करना चाहिए। और बाद में उन्होंने सारा research किया, उसका जो ग्रंथ तैयार हुआ है, आप हैरान हो जाएंगे एक अकेले बुंदेलखंड में इतना rich heritage सिर्फ forts का है, सिर्फ झांसी का नहीं अनेक जगह पर और पास-पास में ही सारे। यानि इतना सामर्थ्यवान है, मैं तो चाहूंगा कभी हमारे जो fine arts के students हैं, वो वहां जाकर के उसको art work करने का एक बहुत बड़ा competition रखा जा सकता है। तभी जाकर के दुनिया को पता चलेगा कि हमारे पूर्वजों ने क्या कुछ निर्माण किया है। क्या आपने सोचा है कि भारत की इस diversity का स्रोत क्या है ? इसका स्रोत है- Mother of Democracy के रूप में भारत का democratic tradition! आर्ट, आर्किटैक्चर और कल्चर तभी फलते-फूलते हैं, जब समाज में विचारों की स्वतन्त्रता होती है, अपने ढंग से काम करने की आज़ादी मिलती है। Debate और dialogue की इस परंपरा से diversity अपने आप पनपती है। इसीलिए, आज भी हमारी सरकार जब कल्चर की बात करती है, तो हम हर तरह की विविधता का स्वागत भी करते हैं, उसे support भी करते हैं। देश के अलग-अलग राज्यों और शहरों में G-20 के आयोजन के जरिए हमने अपनी इसी विविधता को दुनिया के सामने शोकेस किया।

साथियों,

भारत ‘अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्’ इस विचार को जीने वाला देश है। अर्थात्, हम अपना पराया की सोच से जीने वाले लोग नहीं हैं। हम स्वयं की जगह वयं में आस्था रखने वाले लोग हैं। हम self की जगह यूनिवर्स की बात करने वाले लोग हैं। आज जब भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभर रहा है, तो पूरा विश्व इसमें अपने लिए बेहतर भविष्य देख रहा है। जैसे भारत की economic growth से पूरे विश्व की प्रगति जुड़ी है, जैसे ‘आत्मनिर्भर भारत’ के हमारे विज़न में पूरे विश्व के लिए नए अवसर जुड़े हैं, वैसे ही, art और architecture जैसे क्षेत्रों में भी भारत के पुनरोदय से, भारत के सांस्कृतिक उत्थान से पूरे विश्व के हित जुड़े हैं। हमने योग जैसी अपनी विरासत को आगे बढ़ाया, तो आज इसका लाभ पूरी दुनिया को हो रहा है।

हमने आयुर्वेद को आधुनिक वैज्ञानिक मानकों पर मजबूत बनाने के लिए प्रयास शुरू किए तो इसकी अहमियत पूरी दुनिया समझ रही है। हमने अपने सांस्कृतिक मूल्यों को सामने रखकर sustainable लाइफस्टाइल के लिए नए विकल्प, संकल्प किए। आज मिशन LiFE जैसे अभियानों के जरिए पूरे विश्व को बेहतर भविष्य की उम्मीद मिल रही है। Art, architecture और design के क्षेत्र में भी भारत जितनी मजबूती से उभरेगा, उसका उतना ही लाभ पूरी मानवता को होने वाला है।

साथियों,

सभ्यताएं समागम और सहयोग से ही समृद्ध होती हैं। इसलिए, इस दिशा में दुनिया के दूसरे सभी देशों की भागीदारी, उनके साथ हमारी partnership बेहद महत्वपूर्ण है। मैं चाहूँगा कि आयोजन का आगे और भी विस्तार हो, इसमें ज्यादा से ज्यादा संख्या में देश साथ आयें। मुझे विश्वास है, ये आयोजन इस दिशा में एक अहम शुरुआत साबित होगा। इसी भावना के साथ, आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद! और देशवासियों से मेरा आग्रह है कि मार्च महीने तक ये आपके लिए उपलब्ध है, पूरा दिन निकालिए एक-एक चीज को देखिए हमारे यहां कैसी प्रतिभाएं हैं, कैसी परंपरा है, प्रकृति के प्रति हमारा कितना लगाव है, इन सारी बातों को एक जगह पर महसूस कर सकते हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद।

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June 22, 2026
India is not only a fast-growing economy, but also a credible one: PM
Along with being a rising power, India is also a reliable power: PM
For India, Nation First is the highest guiding principle: PM
Maoist terror is breathing its last in India: PM
The shift in mindset from "this can never be done" to "this will be done" is India's greatest achievement: PM
The government is empowering the poor and middle-class: PM
The collective efforts of 140 crore Indians will realise the dream of a Viksit Bharat: PM

स्वर साधना, मनोकामना, आराधना। एक बहुत ही शुभ शुरुआत के बाद। अच्छा होता आप ही का कार्यक्रम चलता। आप सबको नमस्कार।

रिपब्लिक टीवी नेटवर्क के सभी दर्शक और अब तो बहुत सारी भाषाओं में भी है, तो उन सबको भी मेरा प्रणाम! मैं इस समिट में हिस्सा लेने आए सभी साथियों का भी अभिनंदन करता हूं। 24 घंटे चलने वाले चैनलों में ब्रेकिंग न्यूज इसका बहुत बड़ा महत्व होता है। और आजकल तो दुनिया में ही, पूरी दुनिया में कहीं पर भी नजर डालो, पूरी दुनिया ब्रेकिंग न्यूज के मोड पर ही है, और इतनी भागदौड़ में आप सभी, इस समिट को होस्ट कर रहे हैं, इसका हिस्सा बने हैं। और इसलिए आप विशेष बधाई के पात्र हैं। और इस बार आपकी चर्चा का विषय भी उतना ही अहम है...Great Power India: Nation First...

साथियों,

हमारे यहां शास्त्रों में कहा गया है...यतो धर्मस्ततो जयः ! यानि जय का, शक्ति का, मूल धर्म है। और धर्म यानि ड्यूटी, धर्म यानि जस्टिस, धर्म यानि समभाव, धर्म यानि संवाद, धर्म यानि संवेदना और यही तो नेशन फर्स्ट की भावना में भी समाहित है। भारत, अपनी पावर को इसी लैंस से देखता है, इसी तराज़ू पर तौलता है।

साथियों,

भारत की एक और विशेषता है और अब तो दुनिया ने भी मान लिया है। हम किसी क्षणिक घटना पर उतावले होने वाले देश नहीं है, हम वो हैं जिसने विकास और विनाश, देखा भी झेला भी है। हम वो देश हैं, जिसके जेहन में युगों की मेमरी चिप लगी हुई है, हम युगों की मेमरी चिप वाले नेशन हैं। और इसलिए भारत आज जो कर रहा है, और ये मैं बहुत जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूँ, भारत जो कर रहा है वो आने वाले एक हज़ार वर्ष का फ्यूचर लिखने वाला है। और यही दुनिया के लिए सबसे बड़ी भारत की गारंटी है। भारत, Fast-Growing Economy भी है। एक Credible Economy भी है। और भारत, rising power के साथ-साथ और अभी आप तो ढेर सारी डिक्शनरी लेकर बैठ गए थे, सुपर पावर तक ले गए। लेकिन मैं इतना जरूर कहूँगा कि भारत Reliable power है। मैं अभी दो-तीन दिन पहले G7 समिट से लौटा हूं और दुनिया का हर नेता हर देश इस बात को भली-भांति समझता है कि आज के भारत के लिए नेशन फर्स्ट ही सबसे बड़ा मंत्र है, सबसे बड़ा सिद्धांत है।

साथियों,

कुछ दिन पहले ही, हमारी सरकार को 12 साल पूरे हो चुके हैं। उसके लिए भी अर्नब ने आपको तालियाँ बजाने के लिए मजबूर कर दिया। पिछले बारह वर्षों की जो भी सिद्धियां देश की रही हैं, उनके मूल में अगर आप तराजू से तौलोगे, हर निर्णय, हर कदम, हर प्रयास उनके मूल में राष्ट्र प्रथम की भावना ही केंद्र में है। स्वच्छ भारत अभियान से लेकर मेक इन इंडिया खादी खरीदने पर जोर स्थानीय वस्तुएं खरीदने पर जोर ये सारे Initiative इसलिए सफल हुए क्योंकि देश की जनता ने देश को सबसे ऊपर रखते हुए अपना कर्तव्य निभाया। देश के नागरिकों को मैं सलाम करता हूँ।

साथियों,

यहां हमारे साथी श्रीधर वेंबु जी बैठे हैं। जब हमारे उद्यमी नेशन फर्स्ट की भावना के साथ चलते हैं, जब वो देश की आवश्यकताओं को समझते हुए अपने लक्ष्य बनाते हैं तो संस्थाएं भी बनती हैं और देश भी समृद्ध होता है। श्रीधर वेंबु जी ने क्या काम किया है, शायद यहाँ बातों में कितना निकला होगा मुझे मालूम नहीं, लेकिन अभी मैं फ़्रांस में vivatech में गया था, करीब डेढ़ 2 लाख नौजवान वहाँ होंगे, चलने के लिए भी मैं और फ्रांस के राष्ट्रपति अलग अलग स्टॉल पर जा रहे थे, देखने के लिए भई नौजवानों ने क्या काम किया है। तो हम जोहो के स्टॉल पर गए, मैं हैरान था जी, और गर्व होता था कि जोहो के स्टाल पर यूरोप के नौजवानों की जो भीड़ लगी थी और वो समझना चाहते है कि क्या है ये दुनिया में नई चीज, भारत में शायद उतनी चर्चा नहीं होगी, जितनी मैंने वहाँ फ्रांस में देखी, बधाई हो आपको।

साथियों,

सरकार की नीति और निर्णयों में नेशन फर्स्ट का क्या प्रभाव होता है, इसका एक उदाहरण हमारा आदिवासी क्षेत्र है। मैं आज कोई फिलोस्फी झाड़ने वाला नहीं हूँ, कुछ बातें जो हुई है वो हल्की फुल्की बता दूंगा और उससे आप अंदाज लगा लेंगे कि काम कैसे होता है। मैं आदिवासी क्षेत्र की बात करता हूँ। भारत के 10 करोड़ से अधिक आबादी की चर्चा, मतलब कि आदिवासी समाज की चर्चा और हम सबको पता है कि दशकों से माओवादी आतंक वहाँ अपने डेरा तंबू डालकर बैठ हुआ था। जहां 21वीं सदी में भी इन आतंकियों ने एक भी सुविधा पहुंचने नहीं दी, सरकारी एक वेहिकल नहीं गुजर सकता था वहाँ से। गोलियों से भून दिया जाता था। अनेक सरकारें आई-गईं, कई पीढ़ियां आई-गईं, लगता था कि हिंसा का ये दुर्भाग्य ऐसे ही रहेगा। आप कल्पना कर सकते हैं, 2004 से 2014 के बीच, मैं उस दस साल का हिसाब बताता हूँ, 2004 से 2014 के बीच माओवादी आंतक के कारण, 17 हज़ार से भी अधिक हिंसक घटनाएं हुईं थीं। और करीब-करीब 7 हज़ार से ज्यादा जानें गईं थी।

साथियों,

आज आपके लिए वन लाइन न्यूज होगा या टीवी पर आधे घंटे डिबेट होगी कि माओवाद आतंकवाद खत्म हो गया, चीजें ऐसी नहीं होती। उसके लिए खपना पड़ता है और इसलिए मैं बताना चाहता हूँ। और इसलिए मैं बताना चाहता हूं और आजकल जो लोग, कुछ लोग संविधान दिखाते रहते हैं, लेकिन जब ये लोग सरकार में थे और नक्सल प्रभावित इलाकों में संविधान का नाम लेने पर गोली मार दी जाती थी और तब ये लोग चुप बैठे थे, तब उनके हाथो में संविधान नहीं दिखता था, कांप रहे थे उनके हाथ। उस दर्दनाक स्थिति से कांग्रेस को कोई खास फर्क नहीं पड़ता था।

साथियों,

2014 के बाद, हालात को बदलने के लिए हम राष्ट्र प्रथम के भाव से आगे बढ़े, हम निकल पड़े। बोलते नहीं थे, बताते भी नहीं थे, करते जरूर थे। हमने संकल्प लिया कि नक्सलवाद-माओवाद को जड़ से उखाड़ फेकेंगे और आज पूरा देश नतीजा देख रहा है, आज देश में माओवादी आतंक, अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है।

और साथियों,

कई बार अंतिम परिणाम इतना बड़ा और व्यापक होता है कि उसके पीछे की मेहनत पर ध्यान नहीं जाता। रिपब्लिक टीवी के दर्शकों को मैं खासतौर पर इसके बारे में बताना चाहता हूं।

साथियों,

जिन नक्सल प्रभावित इलाकों में दिन में जाने से भी, यानी सामान्य मानवी डरा रहता था, उसको लगता था कहीं अपहरण हो जाएगा तो, कभी वसूली का डर रहता था, कभी साथ में जो कुछ भी है वो लूट लेने का डर रहता था। और जहां पर विकास की बात बोल तक नहीं सकते थे आप, लेकर के जा नहीं सकते थे, सब नामुमकिन था, ऐसे क्षेत्रों में हम हम विकास का संकल्प लेकर आगे बढ़े। वहां बीते 12 वर्षों में हमारी सरकार ने 12 हज़ार किलोमीटर से अधिक की सड़कें बनाईं। और कई बार तो हमने देखा, कई बार तो हमने देखा कि सड़क बनाने के जो हमारा साजो सामान होता है उसको जला दिया जाता था। कांट्रेक्टर को भगा दिया जाता था। अगर 25 लोग रोड पर काम करते तो 200 लोग पुलिस सुरक्षा रखते थे ताकि काम चले। यह सब इसलिए करते थे- तय किया था।

साथियों,

साढ़े 9 हज़ार से अधिक मोबाइल टावर बनाए। एक टावर नहीं लगने और लगा हुआ टावर तोड़ देते थे। क्योंकि उनको हमेशा वहां आक्रोश पैदा करना था। करीब 45,000 गांव में मोबाइल कनेक्टिविटी पहुंचाई। नक्सल प्रभावित जिलों में 1800 से अधिक बैंक ब्रांच खोली गई। करीब 75,000 बैंकिंग कॉरेस्पॉन्डेंट और 6000 से अधिक नए पोस्ट ऑफिस बनाए गए। सिर्फ बम, बंदूक और गोली के सहारे काम नहीं किया है साथियों, हमने दिलों को जीतने के लिए, ईश्वर ने जो भी शक्ति दी थी उसको खपाया था।

साथियों,

हम बुलंद इरादों के साथ नक्सल प्रभावित इलाकों में जनसामान्य की आशा, आकांक्षाओं को पूर्ण करने के लिए जा रहे थे। आप हैरान हो जाएंगे एक मशहूर नक्सली, करोड़ों रुपए का इनाम थे उसके, उसकी मां के पास हम पहली बार राशन कार्ड लेकर गए। बेटा अपनी मां को राशन कार्ड लेने नहीं देता था, आतंकवाद अपना चलाने के लिए। इतनी घटनाएं हैं, मैं हैरान था। और सरकार चुप बैठी थी, उनको संविधान उस समय तो दिखता नहीं था। लेकिन इन सारे प्रयासों का परिणाम यह आया कि जन सामान्य में एक विश्वास का नया दौर आया। आज आप देखिए बस्तर जैसे इलाकों में बम बंदूक नहीं बस्तर ओलंपिक्स की धूम है। और अब तक इस ओलंपिक के दो एडिशन हो चुके हैं। पहली बार डेढ़ लाख से अधिक युवाओं ने और दूसरी बार करीब 4 लाख युवाओं ने बस्तर ओलंपिक्स में हिस्सा लिया। यानी जहां कभी टेरर था, वहां टैलेंट को अवसर मिल रहा है, वहां स्पोर्ट्स फल-फूल रहा है।

साथियों,

12 वर्षों के इस सेवाकाल की एक और बड़ी सिद्धि रही है, यह सिद्धि है, निराशा से निकलकर आशा-आकांक्षा सबसे भरे भारत का निर्माण।

साथियों,

नक्सल कहीं और होगा लेकिन घटनाओं की पीड़ा हिंदुस्तान के हर कोने में होती थी और जिस समय नक्सल खत्म होने की बातें आने लगी तो विश्वास सिर्फ नक्सली इलाके का नहीं, हिंदुस्तान के कोने-कोने में जगने लगा। 2014 से पहले के 10 वर्षों में जो कांग्रेस सरकार चली, उससे नाराजगी केवल गवर्नेंस की नहीं थी। तब देश की निराशा इससे कहीं अधिक थी, देश उम्मीद खो चुका था, लोगों को लगता था कि कुछ हो ही नहीं सकता, कुछ बदल ही नहीं सकता।

साथियों,

पिछले 12 वर्षों में भारत ने उसी निराशा को आशा में बदला है और मुझे इस बात का सबसे ज्यादा संतोष है। आज हर किसी को यह लगता है कि थोड़ी और मेहनत करेंगे, तो यह हो सकता है। वो दिन चले गए जब एक ही बात सुनाई देती थी, कतई नहीं हो सकता, कतई नहीं हो सकता, वो जमाना चला गया, आज ये होकर रहेगा। ये जो भाव आया है यही भारत की असली सिद्धि है, और यही रियल पावर है। चुनौतियां तो आज भी बहुत है और हमेशा रहेगी और चुनौतियां बहुरूपिया होती है, वो नए-नए अवतार में सामने आती रहती है, अरे आएगी, जिस रूप में आएगी, जंग उससे भी लड़ लेंगे जी और जीत भी लेंगे। लेकिन यह हो सकता है और हम यह करके रहेंगे, जब इस भाव से देश आगे बढ़ता है, तब सपने पूरे होते हैं।

साथियों,

मैं यहां भारत के 100 से ज्यादा जिलों और 500 से ज्यादा ब्लॉक्स की चर्चा करना चाहूंगा। यह विकास के हर पैरामीटर पर पीछे छूट गए थे और पहले की सरकार ने इन पर पिछड़ा होने का ठप्पा लगा दिया था, यह तो बैकवर्ड डिस्ट्रिक्ट है, ये तो बैकवर्ड इलाका है। हमने देश के इस बहुत बड़े क्षेत्र को पिछड़ेपन की निराशा से बाहर निकालकर डेवलपमेंट की एस्पिरेशन जगाई। सबसे पहले तो हमने पहचान ही बदल दी, हमने कहा ये एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट है, ये एस्पिरेशनल ब्लॉक है, हमने एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट का प्रोग्राम बनाया, एस्पिरेशनल ब्लॉक का प्रोग्राम बनाया और सरकार ने विकास के हर पैरामीटर पर बहुत बारीकी से काम शुरू किया। इस डिस्ट्रिक्ट में ये तीन पहलू है, पहले उसमें से बाहर निकलो। यहां छह पहलू है, पहले इसमें से बाहर निकलो। बड़ा फोकस वे में काम शुरू किया। आज यह एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट और ब्लॉक्स राज्य की ओवरऑल ग्रोथ को आगे बढ़ाने का काम करने लगे हैं। जो पहले ग्रोथ को पीछे खींचते थे, इन एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट में बहुत बड़ी आबादी गरीब थी, अभाव में थी। बीते वर्षों में 25 करोड़ गरीबों ने गरीबी को परास्त किया है। तो इसमें इन एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट की एक बहुत बड़ी भूमिका है।

साथियों,

हम देखते हैं कि जब एक व्यक्ति बीमारी से मुक्त होता है, तो सिर्फ घर का वो व्यक्ति ठीक होता है ऐसा नहीं है। जब एक व्यक्ति बीमारी से मुक्त होता है, तो पूरा परिवार ठीक हो जाता है। ऐसे ही, जब घर का कोई एक बेटा-बेटी कुछ अचीव करता है, तो सिर्फ वो व्यक्ति अचीव करके नहीं आता, वो पूरा परिवार, पूरा परिवार अचीवमेंट से भर जाता है, विश्वास बदल जाता है। ऐसे ही, जब कोई गरीबी से बाहर आता है, तो सम्पूर्ण समाज का फायदा होता है, देश का फायदा होता है। 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले हैं, निओ मिडिल क्लास में आए हैं, तो इसका फायदा केवल उन परिवारों तक नहीं रहता, बल्कि मिडिल क्लास का भी इसमें फायदा होता है। क्योंकि यह नया कंज्यूमर है, जो इकोनॉमी को ड्राइव करता है, उससे अल्टीमेटली मिडिल क्लास के लिए अवसर बनते हैं। यानी गरीबी कम होना केवल वेलफेयर का ही विषय नहीं है, यह अवसरों के विस्तार की गाथा है, नई एस्पिरेशंस की प्रेरणा है।

साथियों,

पिछले 12 वर्ष में जो इतना विशाल मिडिल क्लास देश में तैयार हुआ है, वो सरकार की बहुत बड़ी प्राथमिकता रहा है। मिडिल क्लास की Ease of Living के लिए सरकार ने हर स्तर पर काम किया है। अब जैसे अपने घर का सपना है। हर मिडिल क्लास परिवार की एक इच्छा रहती है कि भई खुद का घर हो, हर किसी को पूछोगे एक मन में रहता है मेरा अपना घर हो। 2014 में अगर किसी परिवार को अपना घर खरीदना होता था, तो होम लोन डबल डिजिट के इंटरेस्ट रेट पर मिलता था। लेकिन आज किसी भी बैंक से होम लोन 7-8 परसेंट के रेट पर मिल जाता है। पहले लोन लेना भी किसी युद्ध जीतने जैसा था, युद्ध जीतने में जितनी ताकत लगती थी, उतनी लोन लेने में लगती थी। आज यह घर बैठे ही संभव हो पा रहा है। मैं यहीं की बात बताता हूं, यह दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले लोग जानते हैं कि कैसे शहरी मिडिल क्लास के हजारों घर अधूरे अटके हुए थे। पैसे दे दिए थे, पूरे जिंदगी भर की कमाई बिल्डर को दे दी थी। उसने भी बढ़िया-बढ़िया पम्पलेट दिखाए, सपने दिखाए। अभी किराए पर घर में रहते हैं, तो किराया भी देना है, घर जल्दी मिलेगा। उधर किराया रहता है, घर मिल नहीं रहा, घर बन नहीं रहा, यह बहुत बुरा हाल था। इन अधूरे घरों को पूरा करने के लिए हमने 25 हजार करोड़ रुपए का स्पेशल फंड बनाया। और आपको जानकर खुशी होगी कि देश में बरसों से अटके करीब 60 हजार घरों को डिलीवरी किया जा चुका है।

साथियों,

एक और चीज है, जो रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती है। यह जरूरत है, कनेक्टिविटी की, ट्रांसपोर्ट की। आज आप सोशल मीडिया में देखिए, दुनियाभर से जो भी टूरिस्ट आता है, भारत आता है, वो हमारे मेट्रो सिस्टम को देखकर हैरान रह जाता है।

साथियों,

वर्ष 2014 में करीब 28 लाख लोग, हर रोज मेट्रो से सफर करते थे। आज करीब एक करोड़ अठाइस लाख लोग हर रोज मेट्रो से सफर कर रहे हैं। अब वंदे भारत, नमो भारत और अमृत भारत जैसी हाई स्पीड ट्रेन्स देश को कनेक्ट कर रही हैं। अच्छी सड़कों, अच्छे हाईवे से, समय तो बच ही रहा है, गाड़ियों की मैंटेनेंस पर होने वाला खर्चा भी कम हुआ है। बीते वर्षों में एयरपोर्ट्स की संख्या डबल हुई है। इससे कई छोटे-छोटे शहरों में भी मिडिल क्लास को हवाई यात्रा की सुविधा पहली बार मिली है।

साथियों,

पिछले 12 साल, मिडिल क्लास के लिए कमाई के साथ-साथ बचत के भी रहे हैं। 2013-14 में, लगभग 2 लाख रुपए तक की आय होने पर टैक्स लगता था, आप सबको वो नसीब रहा होगा। और यह टैक्स मिडिल क्लास देता रहता था। आज 12 लाख रुपए तक की आय पर कोई टैक्स नहीं है। यानी टैक्स फ्री इनकम कई गुणा बढ़ गई है।

साथियों,

GST रिफॉर्म्स के कारण भी मिडिल क्लास को बहुत सुविधा हुई है। टैक्स फाइलिंग का समय और खर्चा भी बच गया है। क्योंकि यह बहुत ही आसान हो गया है। घर बैठे ही ITR फाइल हो रहे हैं, अगर कोई सेटलमेंट का इश्यू है, तो वो फेसलेस हो रहा है।

साथियों,

मिडिल क्लास परिवारों में एक बड़ा खर्चा डायबिटीज या ऐसी लाइफस्टाइल से जुड़े इलाज का भी रहता है। जन औषधि केंद्रों पर 80 परसेंट डिस्काउंट पर ऐसी दवाएं मिल रही हैं। अगर आपका पहले हजार रुपया खर्चा होता था, तो आज 200 रुपये में काम हो जाता है, 800 रुपये बच रहा है और इससे बीते वर्षों में करीब 40 हज़ार करोड़ रुपए की बचत देश के अनेक परिवारों की हुई है। मिडिल क्लास के बजट का एक बड़ा हिस्सा बुजुर्गों के इलाज पर भी जाता है। आज 70 वर्ष से ऊपर के हर नागरिक के लिए 5 लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज उपलब्ध है।

साथियों,

एक सामान्य स्वभाव है कि जब कोई सुविधा लगातार मिलती है, तो इंसान पहले की परेशानी भूल जाता है। अब 2 लाख रुपये पर आप टैक्स देते थे, अब 12 लाख तक नहीं देना पड़ रहा, लेकिन जब मैं कहूं, तब ताली बजती है। और बस में, ट्रेन में थोड़ी देर भी अगर कुछ मुसीबत आ गई, तो ढेर सारी गालियां देना शुरू हो जाते हैं और यही क्‍लास सबसे ज्यादा बोलता है।

साथियों,

मैंने जैसा कहा ना कि भई पुरानी तकलीफे भूल जाता है आदमी। आप लोगों को आज ड्राइविंग लाइसेंस और पासपोर्ट से जुड़ी परेशानियां बिल्कुल याद नहीं होंगी। पहले ड्राइविंग लाइसेंस लेना होता था, तो कितनी दिक्कत होती थीं, पासपोर्ट लेना होता था, तो क्‍या-क्‍या कुछ नहीं करना पड़ता था, कितने पापड़ बेलने पड़ते थे। आज ड्राइविंग लाइसेंस लेना भी आसान हुआ है और तत्काल पासपोर्ट भी औसतन 3 दिन में ही मिल जाता है।

साथियों,

मैं जानता हूं, हमारी सरकार जिस तरह काम कर रही है, उसने देश के लोगों की एस्पिरेशन बहुत बढ़ा दी है। एक काम हुआ, तो लोगों की डिमांड वहीं खत्म नहीं हो जाती है। वो उससे भी बेहतर काम चाहते है, उससे भी अपग्रेड सुविधा चाहते हैं। अगर पहले डिमांड नई सड़क की थी, तो सड़क बनने के बाद लोग पूछते हैं, मेट्रो कब आएगी? पहले अपेक्षा होती थी कि ट्रेन समय पर पहुंच जाए, ट्रेन में बैठने की साफ-सुथरी जगह मिल जाए। आज डिमांड है कि हमारे रूट पर वंदे भारत क्यों नहीं चल रही है?

साथियों,

कुछ लोगों को ये असंतोष लगता है, यह एस्पिरेशन है, हमारे देश में एक फौज ऐसी है, उसको लगता है कि यह सब मामला कुछ गड़बड़ है। लेकिन लोग आखिरकार यह अपेक्षाएं किसके पास करेंगे भई, जो करता है, उससे ही करेंगे ना! सामान्‍य लोग हीनहीं, पूरी कांग्रेस पार्टी कहती है कि जरा मोदी जी, यह हो जाना चाहिए, यह होना चाहिए, कहते रहते हैं ना! उनको भरोसा है, करेगा तो ये ही करेगा!

साथियों,

एस्पिरेशंस वहीं होती है, जहां लोगों को लगता है कि सपने पूरे हो सकते हैं। और भारत के युवाओं की, भारत के गरीब और मिडिल क्लास की यही एस्पिरेशन है। आज भाजपा-एनडीए सरकारों की ऊर्जा बनी हुई है।

साथियों,

एक तरफ, देश का बहुत बड़ा वर्ग एस्पिरेशनल है, तो दूसरी तरफ, राजनीति की एक टोली है, जिसका जीवन मंत्र बन गया है- ऑलवेज अगेंस्ट! यह टोली, क्रॉनिक डिससैटिस्फैक्शन यानी स्थाई असंतोष से भरी हुई है। आज मैं रिपब्लिक टीवी के दर्शकों को जरा इस टोली के लक्षण बताने जा रहा हूं। Symptoms पता चलेगा, तो आपको समझ आ जाएगा कि मैं क्या कह रहा हूं। आप आसानी से पहचान लेंगे। जैसे मैं उदाहरण देता हूं, आप समझ जाएंगे। इनको आप अक्सर कहते सुनेंगे, अरे फलां जगह तो चौबीस घंटे बिजली आती है, यहां क्यों नहीं? और अगले ही दिन ये लोग डैम्स का, सोलर पार्क का, थर्मल का, न्यूक्लियर प्लांट का विरोध करने के लिए ढपली लेकर के आ जाएंगे। यानी पहले दिन बिजली क्‍यों नहीं और दूसरे दिन तुम हाइड्रो पावर का डैम क्यों बना रहे हो, यह जमात ऐसी है। यह वो लोग हैं, जो खनिजों के खनन का विरोध करते थे, लेकिन आज पूछते हैं कि भारत का रेयर अर्थ मिनरल्स भंडार कहां है, सप्लाई चेन कहां है? और भारत में फलाने देश की तरह, इलेक्ट्रिक व्हीकल का इकोसिस्टम क्यों नहीं है? यह वही लोग हैं, जो कभी डेटा या आटा, इसकी डिबेट चलाते थे। पहले डाटा कि आटा, डाटा कि आटा, बड़ा मजा आता था। आज यही लोग पूछते हैं कि बताओ मोदी जी, AI में क्या काम हुआ? हद देखिए, एक सांस में कहते हैं, एक ही सांस में कहते हैं कि AI में यह होना चाहिए था, वो होना चाहिए था, हुआ क्यों नहीं? लेकिन दूसरी सांस में वही लोग कहते मिलेंगे, अरे यह डेटा सेंटर क्यों बना रहे हो? यह सेमीकंडक्टर प्लांट क्यों लगा रहे हो? और फिर यह लोग उसके 100 नुकसान गिनाने के लिए घंटे-घंटे भर सोशल मीडिया के स्‍क्रीन पर दिखेंगे, टीवी डिबेट पर दिखेंगे, अखबारों में भरे रहेंगे।

साथियों,

यह लोग करप्शन को लेकर दुनियाभर के इंडेक्स उठाकर लाते हैं, भारत को कटघरे में खड़ा करते हैं, इनके इकोसिस्टम का मीडिया भी 24-24 घंटे उछालता रहता है, लेकिन जब करप्शन के विरुद्ध एक्शन होता है, जब कार्रवाई होती है, तो यही लोग चिल्लाते हैं, सबसे पहले हल्ला मचाने का काम कौन करते हैं, यही गलत हो रहा है, फलाना गया ढीकना गया, रेड कर दी, जांच कर दी, harass कर दिया। सवाल उठाए जाते हैं, कार्रवाई ऐसे क्यों हो रही है, वैसे क्यों नहीं, अब क्यों हो रही है, तब क्यों नहीं, A पर क्यों हो रही है, B पर क्यों नहीं हो रही है, यही उनका खेल है।

साथियों,

इन लोगों का कैरेक्टर समझना देश के लिए बहुत जरूरी है। खासतौर पर मेरे देश के युवाओं को इनको पहचानने की जरूरत है और हमारी जेन जी को तो बहुत जल्दी समझना चाहिए, जल्दी समझो वरना अब सूर्यवंशी आया है, वो तेज गति से समझाता है।

साथियों,

यह लोग एक तरफ कहेंगे कि देश की सेनाओं को छूट नहीं है, हथियार नहीं मिल रहे हैं, लेकिन जब सरकार कोई डिफेंस डील करेगी, कोई आधुनिक हथियार खरीदती है, तो सबसे पहले आकर कहते हैं कि यह क्यों खरीदा? यह दुनिया भर में भारत की कूटनीति पर सवाल करेंगे, लेकिन जब भारत कूटनीति के लिए, सुरक्षा के लिए कहीं कोई इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट बनाने लगेगा, तो यह लोग ढोल-ढपली लेकर हल्ला मचाना शुरू कर देते हैं।

साथियों,

आज भारत जिस अहम कालखंड में है, इसमें ऐसे लोगों को पहचानना होगा, उनके कुतर्क को समझना होगा और उनसे सतर्क रहना बहुत जरूरी होगा। और आज दुर्भाग्य से, आज देश के मुख्य विपक्षी दल, कांग्रेस पर, ऐसे ही लोगों का कब्जा हो गया है। कांग्रेस कभी नेशन फर्स्ट की बात करेगी, यह सोचना भी अब झूठे सपने जैसा हो गया है। कल्पना ही नहीं कर सकते क्या कभी कांग्रेस में यह फिर से आएगी बात, जो गांधी जी के जमाने में थी।

साथियों,

आज दुनिया पुरानी धाराओं को चैलेंज कर रही है, डिसरप्शन्स की स्केल बहुत बड़ी हो गई है, लेकिन इसका एक और पक्ष है। यह चुनौतियां, नए अवसर भी ला रही है। भारत के हर युवा, हर उद्यमी, हर इनोवेटर, हर स्टार्टअप को, इन्हीं अवसरों पर फोकस करना है और इसमें सरकार, नेशन फर्स्ट की भावना के साथ पूरी तरह देश के लोगों के साथ है। भारत आज रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार हो चुका है। यह गति आगे और तेज होगी, मैं रिपब्लिक टीवी के इस मंच से देशवासियों से फिर कहूंगा कि हमारा सपना जितना बड़ा है, हमारे प्रयास भी उतने ही विराट होंगे और 140 करोड़ देशवासियों का यही साझा प्रयास, विकसित भारत बनाकर रहेगा। और आप सब लोग, मैं विश्वास से कहता हूं, अपनी आंखों से विकसित भारत देखने वाले हैं। आने वाली पीढ़ियों तक इंतजार करना पड़े, इस प्रकार से मैं काम नहीं करता, आप खुद अपनी आंखों से देखकर के जाएंगे। इसी विश्वास के साथ, मैं फिर एक बार रिपब्लिक टीवी को, उसके दर्शकों को और आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं! बहुत-बहुत धन्यवाद!