देश के सभी नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलें, ये हमारी प्राथमिकता है: प्रधानमंत्री
कठिन से कठिन समय में भी भारत में चेतना जागृत रखने के लिए नए-नए सामाजिक आंदोलन चलते रहे: प्रधानमंत्री
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत की अमर संस्कृति का आधुनिक अक्षय वट है, यह अक्षय वट भारतीय संस्कृति और हमारे राष्ट्र की चेतना को निरंतर ऊर्जा प्रदान कर रहा है: प्रधानमंत्री
जब प्रयासों में मैं नहीं बल्कि हम पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, जब राष्ट्र प्रथम की भावना सर्वोपरि होती है, जब नीतियों और निर्णयों में देश के लोगों का हित सबसे महत्वपूर्ण होता है, तभी उसका प्रभाव सर्वत्र दिखाई देता है: प्रधानमंत्री
विश्‍व में जहां भी कोई प्राकृतिक आपदा आती है, भारत पूरे मनोयोग से सेवा के लिए खड़ा होता है: प्रधानमंत्री
राष्ट्र निर्माण की भावना से ओतप्रोत हमारे युवा 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की ओर आगे बढ़ रहे हैं: प्रधानमंत्री

भारत माता की जय,

भारत माता की जय,

भारत माता की जय,

गुडी पाड़-व्याच्या आणि नवीन वर्षाच्या आपल्या सर्वांन्ना अतिशय मन:पूर्वक शुभेच्छा! कार्यक्रम में उपस्थित परम पूजनीय सरसंघ चालक जी, डॉ मोहन भागवत जी, स्वामी गोविंद गिरी जी महाराज, स्वामी अवधेशानंद गिरी जी महाराज, महाराष्ट्र के लोकप्रिय मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस जी, केंद्रीय मंत्रिमंडल में मेरे साथी नितिन गडकरी जी, डॉ अविनाश चंद्र अग्निहोत्री जी, अन्य महानुभाव और उपस्थित सभी वरिष्ठ साथी, राष्ट्र यज्ञ के इस पावन अनुष्ठान में आज मुझे यहां आने का सौभाग्य मिला है। आज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का ये दिन बहुत विशेष है। आज से नवरात्रि का पवित्र पर्व शुरू हो रहा है। देश के अलग-अलग कोनों में आज गुड़ी-पड़वा, उगादि और नवरेह का त्योहार भी मनाया जा रहा है। आज भगवान झूलेलाल जी और गुरू अंगद देव जी का अवतरण दिवस भी है। ये हमारे प्रेरणापुंज, परम पूजनीय डाक्टर साहब की जयंती का भी अवसर है। और इसी साल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गौरवशाली यात्रा के 100 वर्ष भी पूरे हो रहे हैं। आज इस अवसर पर मुझे स्मृति मंदिर जाकर पूज्य डॉक्टर साहेब और पूज्य गुरुजी को श्रद्धांजलि अर्पित करने का सौभाग्य मिला है।

साथियों,

इसी कालखंड में हमने हमारे संविधान के 75 वर्ष का उत्सव भी मनाया है। अगले ही महीने संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर जी की जयंती भी है। आज मैंने दीक्षाभूमि पर बाबा साहब को नमन किया है, उनका आशीर्वाद लिया है। मैं इन विभूतियों को नमन करते हुए देशवासियों को नवरात्रि और सभी पर्वों की बहुत-बहुत बधाई देता हूँ।

साथियों,

संघ सेवा के इस पवित्र तीर्थ नागपुर में आज हम एक पुण्य संकल्प के विस्तार के साक्षी बन रहे हैं। अभी हमने माधव नेत्रालय के कुलगीत में सुना, अध्यात्म, ज्ञान, गौरव, गुरुता का ये अद्भुत विद्यालय, मानवता रत यह सेवा मंदिर कण-कण में देवालय। माधव नेत्रालय एक ऐसा संस्थान है, जो अनेक दशकों से पूज्य गुरुजी के आदर्शों पर लाखों लोगों की सेवा कर रहा है। लोगों के जीवन में रोशनी लौटी है, आज उसके नए परिसर का शिलान्यास हुआ है। अब इस नए परिसर के बाद इन सेवाकार्यों को और ज्यादा गति मिलेगी। इससे हजारों नए लोगों के जीवन में प्रकाश फैलेगा, उनके जीवन का अंधकार भी दूर होगा। मैं इस सेवा कार्य के लिए माधव नेत्रालय से जुड़े सभी लोगों को उनके कार्य की, उनके सेवाभाव की सराहना करता हूं और मेरी तरफ से अनेक-अनेक शुभकामनाएँ देता हूँ।

साथियों,

किसी भी राष्ट्र का अस्तित्व, पीढ़ी दर पीढ़ी, उसकी संस्कृति के विस्तार, उस राष्ट्र की चेतना के विस्तार पर निर्भर करता है। हम अपने देश का इतिहास देखें, तो सैकड़ों वर्षों की गुलामी, इतने आक्रमण, भारत की सामाजिक संरचना को मिटाने की इतनी क्रूर कोशिशें, लेकिन भारत की चेतना कभी समाप्त नहीं हुई, उसकी लौ जलती रही। ये कैसे हुआ? क्योंकि कठिन से कठिन दौर में भी भारत में इस चेतना को जागृत रखने वाले नए-नए सामाजिक आंदोलन होते रहे। भक्ति आंदोलन, उसका ये उदाहरण, जिससे हम सभी भलिभांति परिचित हैं। मध्यकाल के उस कठिन कालखंड में हमारे संतों ने भक्ति के विचारों से हमारी राष्ट्रीय चेतना को नई ऊर्जा दी। गुरु नानकदेव, कबीरदास, तुलसीदास, सूरदास, हमारे यहाँ महाराष्ट्र में संत तुकाराम, संत एकनाथ, संत नामदेव, संत ज्ञानेश्वर, ऐसे कितने ही संतों ने हमारी इस राष्ट्रीय चेतना में अपने मौलिक विचारों से प्राण फूंके। इन आंदोलनों ने भेदभाव के फंदों को तोड़कर समाज को एकता के सूत्र में जोड़ा।

इसी तरह, स्वामी विवेकानंद जैसे महान संत भी हुए। उन्होंने निराशा में डूब रहे समाज को झकझोरा, उसे उसके स्वरूप की याद दिलाई, उसमें आत्मविश्वास का संचार किया और हमारी राष्ट्रीय चेतना को बुझने नहीं दिया। गुलामी के आखिरी दशकों में डॉक्टर साहेब और गुरू जी जैसे महान व्यक्तित्वों ने इसे नई ऊर्जा देने का काम किया। आज हम देखते हैं, राष्ट्रीय चेतना के संरक्षण और संवर्धन के लिए जो विचारबीज 100 साल पहले बोया गया, वो महान वटवृक्ष के रूप में आज दुनिया के सामने है। सिद्धान्त और आदर्श इस वटवृक्ष को ऊंचाई देते हैं, लाखों-करोड़ों स्वयंसेवक इसकी टहनी, ये कोई साधारण वटवृक्ष नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत की अमर संस्कृति का आधुनिक अक्षय वट है। ये अक्षय वट आज भारतीय संस्कृति को, हमारे राष्ट्र की चेतना को, निरंतर ऊर्जावान बना रहा है।

साथियों,

आज जब हम माधव नेत्रालय के नए परिसर का काम शुरू कर रहे हैं, तो दृष्टि की बात स्वभाविक है। हमारे जीवन में दृष्टि ही हमें दिशा देती है। इसीलिए, वेदों में भी कामना की गई है- पश्येम शरदः शतम्! अर्थात्, हम सौ वर्षों तक देखें। ये दृष्टि आँखों की, यानी बाह्यदृष्टि भी होनी चाहिए, और अन्तः दृष्टि भी होनी चाहिए। जब अन्तःदृष्टि की बात करते हैं, तो विदर्भ के महान संत श्री गुलाबराव महाराज जी का स्मरण होना भी स्वाभाविक है। उन्हें प्रज्ञाचक्षु कहा जाता था। बहुत कम आयु में ही उनको आंखों से दिखाई देना बंद हो गया था, लेकिन फिर भी उन्होंने अनेकों पुस्तकें लिखीं थीं। और अब कोई भी पूछ सकता है कि जब आंखों से दिखाई नहीं देता है, तो उसके बावजूद भी कोई इतने ग्रंथ कैसे लिख सकता है? इसका उत्तर ये है कि उनके पास भले ही नेत्र नहीं थे, लेकिन दृष्टि थी। ये दृष्टि बोध से आती है, विवेक से प्रकट होती है। ये दृष्टि व्यक्ति के साथ ही समाज को भी बहुत शक्ति देती है। हमारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी एक ऐसा संस्कार यज्ञ है, जो अन्तः दृष्टि और बाह्य दृष्टि, दोनों के लिए काम कर रहा है। बाह्य दृष्टि के रूप में हम माधव नेत्रालय को देखते हैं और अंत: दृष्टि ने संघ को सेवा का पर्याय बना दिया है।

साथियों,

हमारे यहां कहा गया है- परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः, परोपकाराय वहन्ति नद्यः। परोपकाराय दुहन्ति गावः, परोपकारार्थ-मिदं शरीरम्।। हमारा शरीर परोपकार के लिए ही है, सेवा के लिए ही है। और जब ये सेवा संस्कारों में आ जाती है, तो सेवा ही साधना बन जाती है। यही साधना तो हर एक स्वयंसेवक के जीवन की प्राण वायु होती है। ये सेवा संस्कार, ये साधना, ये प्राण वायु, पीढ़ी दर पीढ़ी हर स्वयंसेवक को तप-तपस्या के लिए प्रेरित कर रही है। ये सेवा साधना हर स्वयंसेवक को निरंतर गतिमान रखती है, उसे कभी थकने नहीं देती, कभी रुकने नहीं देती। पूज्य गुरू जी अक्सर कहा करते थे, जीवन की अवधि का नहीं, उसकी उपयोगिता का महत्व होता है। हम देव से देश और राम से राष्ट्र के जीवन मंत्र लेकर के चले हैं, अपना कर्तव्य निभाते चलते हैं। और इसलिए हम देखते हैं, बड़ा-छोटा कैसा भी काम हो, कोई भी कार्यक्षेत्र हो, सीमावर्ती गाँव हों, पहाड़ी क्षेत्र हों, वनक्षेत्र हो, संघ के स्वयंसेवक निःस्वार्थ भाव से कार्य करते रहते हैं। कहीं कोई वनवासी कल्याण आश्रम के कामों को उसको अपना ध्येय बनाकर के जुटा हुआ है, कहीं कोई एकल विद्यालय के माध्यम से आदिवासी बच्चों को पढ़ा रहा है, कहीं कोई संस्कृति जागरण के मिशन में लगा हुआ है। कहीं कोई सेवा भारती से जुड़कर गरीबों-वंचितों की सेवा कर रहा है।

अभी हमने प्रयाग में महाकुंभ में देखा, वहां नेत्रकुंभ में कैसे स्वयंसेवकों ने लाखों लोगों की मदद की, यानी जहां सेवा कार्य, जहां सेवा कार्य, वहां स्वयंसेवक। कहीं कोई आपदा आ जाए, बाढ़ की तबाही हो या भूकंप की विभीषिका हो, स्वयंसेवक एक अनुशासित सिपाही की तरह तुरंत मौके पर पहुँचते हैं। कोई अपनी परेशानी नहीं देखता, अपनी पीड़ा नहीं देखता, बस सेवा भावना से हम काम में जुट जाते हैं। हमारे तो हृदय में बसा है, सेवा है यज्ञकुन्ड, समिधा सम हम जलें, ध्येय महासागर में सरित रूप हम मिलें।

साथियों,

एक बार एक इंटरव्यू में परम पूजनीय गुरू जी से पूछा गया, कि वो संघ को सर्व-व्यापी क्यों कहते हैं? गुरूजी का उत्तर बहुत ही प्रेरणादायी था। उन्होंने संघ की तुलना प्रकाश से की थी, उजाले से की थी। उन्होंने कहा कि प्रकाश सर्वव्यापी होता है, वो खुद ही अकेले सारे कार्य भले ना करे, लेकिन अंधेरे को दूर करके वो दूसरे को कार्य करने का रास्ता दिखा देता है। गुरू जी की ये सीख, हमारे लिए जीवन मंत्र है। हमें प्रकाश बनकर अंधेरा दूर करना है, बाधाएं मिटानी हैं, रास्ता बनाना है। उस भाव को हम जीवन भर सुनते रहें, हर कोई कम अधिक मात्रा में जीने का प्रयास करता रहा। मैं नहीं तुम, अहं नहीं वयं, “इदं राष्ट्राय इदं न मम्”।

साथियों,

जब प्रयासों के दौरान में, जब मैं नहीं, हम का ध्यान होता है, जब राष्ट्र प्रथम की भावना सर्वोपरि होती है, जब नीतियों में, निर्णयों में देश के लोगों का हित ही सबसे बड़ा होता है, तो सर्वत्र उसका प्रभाव भी और प्रकाश भी नजर आता है। विकसित भारत के लिए सबसे जरूरी है कि हम उन बेड़ियों को तोड़ें, जिनमें देश उलझा हुआ था। आज हम देख रहे हैं, भारत कैसे गुलामी की मानसिकता को छोड़कर आगे बढ़ रहा है। गुलामी की निशानियों को जिस हीनभावना में 70 वर्षों से ढोया जा रहा था, उनकी जगह अब राष्ट्रीय गौरव के नए अध्याय लिखे जा रहे हैं। वो अंग्रेजी कानून, जिन्हें भारत के लोगों को नीचा दिखाने के लिए बनाया गया था, देश ने उन्हें बदल दिया है। गुलामी की सोच से बनी दंड संहिता की जगह अब भारतीय न्याय संहिता लागू हुई है। हमारे लोकतन्त्र के प्रांगण में अब राजपथ नहीं, कर्तव्यपथ है। हमारी नौसेना के ध्वज में भी गुलामी का चिन्ह छपा हुआ था, उसकी जगह अब नौसेना के ध्वज पर छत्रपति शिवाजी महाराज का प्रतीक लहरा रहा है। अंडमान के द्वीप, जहां वीर सावरकर ने राष्ट्र के लिए यातनाएँ सहीं, जहां नेताजी सुभाष बाबू ने आज़ादी का बिगुल फूंका, उन द्वीपों के नाम भी अब आज़ादी के नायकों की याद में रखे गए हैं।

साथियों,

वसुधैव कुटुंबकम का हमारा मंत्र, आज विश्व के कोने-कोने में पहुँच रहा है। और दुनिया इसे हमारे कार्यों में भी देख रही है, महसूस कर रही है। जब कोविड जैसी महामारी आती है, तो भारत विश्व को परिवार मानकर वैक्सीन उपलब्ध करवाता है। दुनिया में कहीं भी प्राकृतिक आपदा हो, भारत पूरे मनोयोग से सेवा के लिए खड़ा होता है। अभी आपने कल ही देखा है, म्यांमार में इतना बड़ा भूकंप आया है, भारत ऑपरेशन ब्रह्मा के तहत, वहां के लोगों की मदद के लिए सबसे पहले पहुंच गया है। जब तुर्किए में भूकंप आया, जब नेपाल में भूकंप आया, जब मॉलदीव्स में पानी का संकट आया, भारत ने मदद करने में घड़ी भर की भी देर नहीं की। युद्ध जैसे हालातों में हम दूसरे देशों से नागरिकों को भी सुरक्षित निकालकर के लाते हैं। दुनिया देख रही है, भारत आज जब प्रगति कर रहा है, तो पूरे ग्लोबल साउथ की आवाज़ भी बन रहा है। विश्व-बंधु की ये भावना, हमारे ही संस्कारों का विस्तार है।

साथियों,

आज भारत की सबसे बड़ी पूंजी हमारा युवा है। और हम देखते हैं, आज भारत का युवा कितने कॉन्फिडेंस से भरा हुआ है। उसकी Risk Taking Capacity पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ गई है। वो नए-नए इनोवेशन कर रहा है, स्टार्ट अप्स की दुनिया में अपना परचम लहरा रहा है और सबसे बड़ी बात, आज के भारत का युवा अपनी विरासत पर गर्व करते हुए, अपनी संस्कृति पर गर्व करते हुए चल रहा है। अभी हमने प्रयागराज महाकुंभ में देखा, आज की युवा पीढ़ी लाखों-करोड़ों की संख्या में महाकुंभ में पहुंची और इस सनातन परंपरा से जुड़कर गौरव से भर उठी। आज भारत का युवा, देश की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए काम कर रहा है। भारत के युवाओं ने मेक इन इंडिया को सफल बनाया है, भारत का युवा लोकल के लिए वोकल हुआ है। एक जज्बा बना है, हमें देश के लिए जीना है, देश के लिए कुछ करना है, खेल के मैदान से लेकर अंतरिक्ष की ऊंचाई तक राष्ट्र निर्माण की भावना से ओतप्रोत हमारे युवा आगे बढ़ रहे हैं, आगे चलते ही जा रहे हैं। यही युवा 2047 के, जब आजादी के 100 साल होंगे, विकसित भारत के लक्ष्य की ध्वजा थामे हुए हैं और मुझे विश्वास है, संगठन, समर्पण और सेवा की ये त्रिवेणी विकसित भारत की यात्रा को निरंतर ऊर्जा देती रहेगी, दिशा देती रहेगी। संघ का इतने वर्षों का परिश्रम फलीभूत हो रहा है, संघ की इतने वर्षों की तपस्या विकसित भारत का एक नया अध्याय लिख रही है।

साथियों,

जब संघ की स्थापना हुई, तब भारत की हालत भी अलग थी, और हालात भी अलग थे। 1925 से लेकर 1947 तक, वो समय संघर्ष का समय था। आज़ादी का बड़ा लक्ष्य देश के सामने था। आज संघ की 100 वर्षों की यात्रा के बाद देश फिर एक अहम पड़ाव पर है। 2025 से 2047 तक के महत्वपूर्ण कालखंड, इस कालखंड में एक बार फिर बड़े लक्ष्य हमारे सामने हैं। कभी पूज्य गुरू जी ने एक पत्र में लिखा था, मैं अपने भव्य राष्ट्र प्रसाद की नींव में एक छोटा सा पत्थर बनकर रहना चाहता हूं, हमें सेवा के अपने संकल्प को हमेशा प्रज्ज्वलित रखना है। हमें अपने परिश्रम को बनाए रखना है। हमें विकसित भारत के स्वप्न को साकार करना है और जैसा मैंने अयोध्या में प्रभु श्रीराम के मंदिर के नव निर्माण पर कहा था, हमें अगले एक हजार वर्षों के सशक्त भारत की नींव भी रखनी है। मुझे विश्वास है, पूज्य डॉक्टर साहेब, पूज्य गुरु जी जैसी विभूतियों का मार्गदर्शन हमें निरंतर सामर्थ्य देगा। हम विकसित भारत के संकल्प को पूरा करेंगे। हम अपनी पीढ़ियों के बलिदान को सार्थक करके रहेंगे। इसी संकल्प के साथ, आप सभी को एक बार फिर इस मंगलमय नववर्ष की अनेक-अनेक शुभकामनाएँ। बहुत-बहुत धन्यवाद!

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Prime Minister extends greetings to the people of Sikkim on Statehood Day
May 16, 2026

The Prime Minister, Shri Narendra Modi, today extended greetings to the people of Sikkim on the occasion of the State’s Statehood Day, marking a historic milestone as Sikkim celebrates its 50th Statehood Day this year. Shri Modi remarked that the contribution of Sikkim to India’s development journey is deeply valued and appreciated. Recalling his recent visit to Sikkim during the 50th Statehood Day celebrations, the Prime Minister said that he was deeply touched by the warmth and affection shown by the people of the State.

Shri Modi posted on X:

“Greetings to my sisters and brothers on their Statehood Day. The contribution of Sikkim to India’s development is deeply valued. Wishing the people of the state good health and prosperity.

This occasion comes at a time when Sikkim is marking 50th Statehood Day celebrations. A few days ago, I had the good fortune of being among the people of Sikkim for the celebrations. The warmth I received in Sikkim will remain a part of my memory. The Central Government will keep supporting Sikkim’s growth trajectory in the times to come.”