"स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0' का लक्ष्य शहरों को पूरी तरह से कचरा-मुक्त बनाना है"
"मिशन अमृत के अगले चरण में देश का लक्ष्य है: 'सीवेज और सेप्टिक प्रबंधन में सुधार, हमारे शहरों को जल-सुरक्षित शहर बनाना और यह सुनिश्चित करना कि कहीं भी कोई सीवेज का गंदा नाला हमारी नदियों में आकर न गिरे"
"स्वच्छ भारत अभियान और अमृत मिशन की यात्रा में मिशन भी है, मान भी है, मर्यादा भी है, एक देश की महत्वाकांक्षा भी है और मातृभूमि के लिए अप्रतिम प्रेम भी है"
"बाबासाहेब अंबेडकर शहरी विकास को असमानता दूर करने का बहुत बड़ा माध्यम मानते थे.... स्वच्छ भारत मिशन और अमृत मिशन का अगला चरण बाबासाहेब के सपनों को पूरा करने की दिशा में एक अहम कदम सिद्ध होगा"
स्वच्छता हर किसी का, हर दिन, हर पखवाड़े, हर साल, पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाला महाअभियान है, स्वच्छता जीवनशैली है, स्वच्छता जीवन मंत्र है।”
“2014 में, 20 प्रतिशत से भी कम कचरे को प्रोसेस किया जाता था, आज हम दैनिक कचरे के लगभग 70 प्रतिशत को प्रोसेस कर रहे हैं, अब, हमें इसे 100 प्रतिशत तक ले जाना है"

नमस्कार! कार्यक्रम में मेरे साथ उपस्थित कैबिनेट में मेरे सहयोगी श्री हरदीप सिंह पुरी जी, श्री गजेंद्र सिंह शेखावत जी, श्री प्रह्लाद सिंह पटेल जी, श्री कौशल किशोर जी, श्री बिंश्वेश्वर जी, सभी राज्यों के उपस्थित मंत्रीगण, अर्बन लोकल बॉडीज़ के मेयर्स और चेयरपर्सन्स, म्यूनिसिपल कमिश्नर्स, स्वच्छ भारत मिशन के, अमृत योजना के आप सभी सारथी, देवियों और सज्जनों!

मैं देश को स्वच्छ भारत अभियान और अमृत मिशन के अगले चरण में प्रवेश की बहुत-बहुत बधाई देता हूं। 2014 में देशवासियों ने भारत को खुले में शौच से मुक्त करने का-ODF बनाने का संकल्प लिया था। 10 करोड़ से ज्यादा शौचालयों के निर्माण के साथ देशवासियों ने ये संकल्प पूरा किया। अब ‘स्वच्छ भारत मिशन-अर्बन 2.0’ का लक्ष्य है Garbage-Free शहर, कचरे के ढेर से पूरी तरह मुक्त ऐसा शहर बनाना। अमृत मिशन इसमें देशवासियों की और मदद करने वाला है। शहरों में शत प्रतिशत लोगों की साफ पानी तक पहुंच हो, शहरों में सीवेज का बेहतरीन प्रबंधन हो, इस दिशा में हम आगे बढ़ रहे हैं। मिशन अमृत के अगले चरण में देश का लक्ष्य है- ‘सीवेज और सेप्टिक मैनेजमेंट बढ़ाना, अपने शहरों को Water secure cities’ बनाना और ये सुनिश्चित करना कि हमारी नदियों में कहीं पर भी कोई गंदा नाला न गिरे।

साथियों,

स्वच्छ भारत अभियान और अमृत मिशन की अब तक की यात्रा वाकई हर देशवासी को गर्व से भर देने वाली है। इसमें मिशन भी है, मान भी है, मर्यादा भी है, एक देश की महत्वाकांक्षा भी है और मातृभूमि के लिए अप्रतिम प्रेम भी है। देश ने स्वच्छ भारत मिशन के माध्यम से जो हासिल किया है, वो हमें आश्वस्त करता है कि हर भारतवासी अपने कर्तव्यों के लिए कितना संवेदनशील है, कितना सतर्क है। इस सफलता में भारत के हर नागरिक का योगदान है, सबका परिश्रम है और सबका पसीना है। और हमारे स्वच्छता कर्मी, हमारे सफाई मित्र, हर रोज झाड़ू उठाकर सड़कों को साफ करने वाले हमारे भाई-बहन, कूड़े की बदबू को बर्दाश्त करते हुए कचरा साफ करने वाले हमारे साथी सच्‍चे अर्थ में इस अभियान के महानायक हैं। कोरोना के कठिन समय में उनके योगदान को देश ने करीब से देखा है, अनुभव किया है।

मैं देश की इन उपलब्धियों पर हर भारतवासी को बधाई के साथ ही, ‘स्वच्छ भारत मिशन-अर्बन टू प्वाइंट ओ’ और ‘अमृत टू प्वाइंट ओ’ के लिए शुभकामनाएं देता हूँ। और इससे सुखद और क्या होगा कि नई शुरुआत आज गांधी जयंती के एक दिन पहले हो रही है। ये अभियान पूज्‍य बापू की प्रेरणा का ही परिणाम है, और बापू के आदर्शों से ही सिद्धि की ओर बढ़ रहा है। आप कल्पना करिए, स्वच्छता के साथ साथ इससे हमारी माताओं-बहनों के लिए कितनी सुविधा बढ़ी है! पहले कितनी ही महिलाएं घर से नहीं निकल पाती थीं, काम पर नहीं जा पातीं थीं क्योंकि बाहर टॉयलेट की सुविधा ही नहीं होती थी। कितनी ही बेटियों को स्कूल में शौचालय ना होने की वजह से पढ़ाई छोड़नी पड़ती थी। अब इन सबमें बदलाव आ रहा है। आजादी के 75वें वर्ष में देश की इन सफलताओं को, आज के नए संकल्पों को, पूज्य बापू के चरणों में अर्पित करता हूँ और नमन करता हूँ।

साथियों,

हम सभी का ये भी सौभाग्य है कि आज ये कार्यक्रम बाबा साहेब को समर्पित इस इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित हो रहा है। बाबा साहेब, असमानता दूर करने का बहुत बड़ा माध्यम शहरी विकास को मानते थे। बेहतर जीवन की आकांक्षा में गांवों से बहुत से लोग शहरों की तरफ आते हैं। हम जानते हैं कि उन्हें रोजगार तो मिल जाता है लेकिन उनका जीवन स्तर गांवों से भी मुश्किल स्थिति में रहता है। ये उन पर एक तरह से दोहरी मार की तरह होता है। एक तो घर से दूर, और ऊपर से ऐसी कठिन स्थिति में रहना। इस हालात को बदलने पर, इस असमानता को दूर करने पर बाबा साहेब का बड़ा जोर था। स्वच्छ भारत मिशन और मिशन अमृत का अगला चरण, बाबा साहेब के सपनों को पूरा करने की दिशा में भी एक अहम कदम है।

साथियों,

आज़ादी के इस 75वें साल में देश ने ‘सबका साथ, सबका विकास, और सबका विश्वास’ के साथ ‘सबका प्रयास’ का आह्वान भी किया है। सबका प्रयास की ये भावना, स्वच्छता के लिए भी उतनी ही जरूरी है। आपमें से कई लोग दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में घूमने गए होंगे, आदिवासी समाज के पारंपरिक घरों को जरूर देखा होगा। कम संसाधनों के बावजूद उनके घरों में स्वच्छता और सौन्दर्य को देखकर हर कोई भी आकर्षित हो जाता है। ऐसे ही आप नॉर्थ ईस्ट में जाइए, हिमाचल या उत्तराखंड के पहाड़ों पर जाइए, पहाड़ों पर छोटे छोटे घरों में भी साफ-सफाई की वजह से एक अलग ही सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है। इन साथियों के साथ रहकर हम ये सीख सकते हैं कि स्वच्छता और सुख का कितना गहरा संबंध होता है।

इसीलिए, जब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री बना और प्रगति के लिए पर्यटन की संभावनाओं को निखारना शुरू किया, तो सबसे बड़ा फोकस स्वच्छता और इस प्रयास में सभी को जोड़ने पर किया गया। निर्मल गुजरात अभियान, जब जन अंदोलन बना, तो उसके बहुत अच्छे परिणाम भी मिले। इससे गुजरात को नई पहचान तो मिली ही, राज्य में पर्यटन भी बढ़ा।

भाइयों बहनों,

जन-आंदोलन की ये भावना स्वच्छ भारत मिशन की सफलता का आधार है।पहले शहरों में कचरा सड़कों पर होता था, गलियों में होता था, लेकिन अब घरों से न केवल waste collection पर बल दिया जा रहा है, बल्कि waste segregation पर भी जोर है। बहुत से घरों में अब हम देखते हैं कि लोग गीले और सूखे कूड़े के लिए अलग अलग डस्ट्बिन रख रहे हैं।घर ही नहीं, घर के बाहर भी अगर कहीं गंदगी दिखती है तो लोग स्वच्छता ऐप से उसे रिपोर्ट करते हैं, दूसरे लोगों को जागरूक भी करते हैं। मैं इस बात से बहुत खुश होता हूं कि स्वच्छता अभियान को मजबूती देने का बीड़ा हमारी आज की पीढ़ी ने उठाया हुआ है। टॉफी के रैपर अब जमीन पर नहीं फेंके जाते, बल्कि पॉकेट में रखे जाते हैं। छोटे-छोटे बच्चे, अब बड़ों को टोकते हैं कि गंदगी मत करिए। दादाजी, नानाजी, दादीजी को बताते हैं कि मत करो। शहरों में नौजवान, तरह-तरह से स्वच्छता अभियान में मदद कर रहे हैं। कोई Waste से Wealth बना रहा है तो कोई जागरूकता बढ़ाने में जुटा है।

लोगों में भी अब एक स्पर्धा है कि स्वच्छ भारत रैंकिंग में उनका शहर आगे आना चाहिए और अगर पीछे रह जाता है तो गांव में दबाव खड़ा होता है भई क्‍या हुआ, वो शहर आगे निकल गया हम क्‍यों पीछे रह गए? हमारी क्‍या कमी है? मीडिया के लोग भी उस शहर की चर्चा करते हैं, देखिए वो तो आगे बढ़ गए हैं तुम रह गए। एक दबाव पैदा हो रहा है। अब ये माहौल बन रहा है कि उनका शहर स्वच्छता रैंकिंग में आगे रहे, उनके शहर की पहचान गंदगी से भरे शहर की ना हो! जो साथी इंदौर से जुड़े हैं या टीवी पर देख रहे होंगे, वो मेरी बात से और भी ज्यादा सहमत होंगे। आज हर कोई जानता है कि इन्दौर यानी स्वच्छता में Topper शहर! ये इंदौर के लोगों की साझा उपलब्धि है। अब ऐसी ही उपलब्धि से हमें देश के हर शहर को जोड़ना है।

मैं देश की हर राज्य सरकार से, स्थानीय प्रशासन से, शहरों के मेयर्स से ये आग्रह करता हूं कि स्वच्छता के इस महाअभियान में एक बार फिर से जुट जाएं। कोरोना के समय में कुछ सुस्ती भले आई है, लेकिन अब नई ऊर्जा के साथ हमें आगे बढ़ना है। हमें ये याद रखना है कि स्वच्छता, एक दिन का, एक पखवाड़े का, एक साल का या कुछ लोगों का ही काम है, ऐसा नहीं है। स्वच्छता हर किसी का, हर दिन, हर पखवाड़े, हर साल, पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाला महाअभियान है। स्वच्छता ये जीवनशैली है, स्वच्छता ये जीवन मंत्र है।

जैसे सुबह उठते ही दांतों को साफ करने की आदत होती है ना वैसे ही साफ-सफाई को हमें अपने जीवन का हिस्सा बनाना ही होगा। और मैं ये सिर्फ पर्सनल हाईजीन की बात नहीं कर रहा हूं। मैं सोशल हाईजीन की बात कर रहा हूं। आप सोचिए, रेल के डिब्बों में सफाई, रेलवे प्लेटफॉर्म पर सफाई ये कोई मुश्किल नहीं था। कुछ प्रयास सरकार ने किया, कुछ सहयोग लोगों ने किया और अब रेलवे की तस्वीर ही बदल गई है।

साथियों,

शहर में रहने वाले मध्यम वर्ग की, शहरी गरीबों के जीवन में Ease of Living बढ़ाने के लिए हमारी सरकार रिकॉर्ड invest कर रही है। अगर 2014 के पहले के 7 वर्षों की बात करें, तो शहरी विकास मंत्रालय के लिए सवा लाख करोड़ के आसपास का बजट ही आवंटित किया गया था। जबकी हमारी सरकार के 7 वर्षों में शहरी विकास मंत्रालय के लिए करीब-करीब 4 लाख करोड़ रुपए का बजट आवंटित किया गया है। ये investment, शहरों की सफाई, Waste Management, नए सीवेज ट्रींटमेंट प्लांट बनाने पर हुआ है। इस investment से शहरी गरीबों के लिए घर, नए मेट्रो रूट और स्मार्ट सिटी से जुड़े प्रोजेक्ट्स पूरे हो रहे हैं। हम भारतवासी अपने लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं, इसका मुझे पूरा भरोसा है। स्वच्छ भारत मिशन और मिशन अमृत की स्पीड और स्केल दोनों ही ये भरोसा और बढ़ाते हैं।

आज भारत हर दिन करीब एक लाख टन waste process कर रहा है। 2014 में जब देश ने अभियान शुरू किया था तब देश में हर दिन पैदा होने वाले वेस्ट का 20 प्रतिशत से भी कम process होता था। आज हम करीब-करीब 70 प्रतिशत डेली वेस्ट process कर रहे हैं। 20 से 70 तक पहुंचे हैं। लेकिन अब हमें इसे 100 प्रतिशत तक लेकर जाना ही जाना है। और ये काम केवल waste disposal के जरिए नहीं होगा, बल्कि waste to wealth creation के जरिए होगा। इसके लिए देश ने हर शहर में 100 प्रतिशत waste सेग्रीगेशन के साथ-साथ इससे जुड़ी आधुनिक मैटेरियल रिकवरी फेसिलिटीज बनाने का लक्ष्य तय किया है। इन आधुनिक फेसिलिटीज में कूड़े-कचरे को छांटा जाएगा, री-साइकिल हो पाने वाली चीजों को प्रोसेस किया जाएगा, अलग किया जाएगा। इसके साथ ही, शहरो में बने कूड़े के पहाड़ों को, प्रोसेस करके पूरी तरह समाप्त किया जाएगा। हरदीप जी, जब मैं ये कूड़े के बड़े-बड़े ढेर साफ करने की बात कर रहा हूं, यहां दिल्ली में भी ऐसा ही एक पहाड़, बरसों से डेरा डाले हुए है। ये पहाड़ भी हटने का इंतजार कर रहा है।

साथियों,

आजकल जो दुनिया में Green Jobs की संभावना की चर्चा हो रही है, भारत में शुरू हो रहा ये अभियान अनेकों Green Jobs भी बनाएगा। देश में शहरों के विकास के लिए आधुनिक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल भी लगातार बढ़ रहा है। अभी अगस्त के महीने में ही देश ने National Automobile Scrappage Policy लॉन्च की है। ये नई स्क्रैपिंग पॉलिसी, Waste to Wealth के अभियान को, सर्कुलर इकॉनॉमी को और मजबूती देती है। ये पॉलिसी, देश के शहरों से प्रदूषण कम करने में भी बड़ी भूमिका निभाएगी। इसका सिद्धांत है - Reuse, Recycle और Recovery. सरकार ने सड़कों के निर्माण में भी waste के उपयोग पर बहुत ज्यादा जोर दिया है। जो सरकारी इमारतें बन रही हैं, सरकारी आवास योजनाओं के तहत जो घर बनाए जा रहे हैं, उनमें भी रीसाइक्लिंग को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

साथियों,

स्वच्छ भारत और संतुलित शहरीकरण को एक नई दिशा देने में राज्यों की बहुत बड़ी भागीदारी रही है। अभी हमने कई साथी मुख्यमंत्रियों का संदेश भी सुना है। मैं देश की प्रत्येक राज्य सरकार का आज विशेष आभार व्यक्त करता हूं। सभी राज्यों ने अपने शहरों की बेसिक जरूरतों को एड्रैस किया, वॉटर सप्लाई से लेकर sanitation तक के लिए प्लानिंग की। अमृत मिशन के तहत 80 हजार करोड़ से ज्यादा के प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है। इससे शहरों के बेहतर भविष्य के साथ साथ युवाओं को नए अवसर भी मिल रहे हैं। पानी का कनेक्शन हो, सीवर लाइन की सुविधा हो, अब हमें इन सुविधाओं का लाभ भी शत-प्रतिशत शहरी परिवारों तक पहुंचाना है। हमारे शहरों में सीवेज़ वॉटर ट्रीटमेंट बढ़ेगा, तो शहरों के जल संसाधन स्वच्छ होंगे, हमारी नदियां साफ होंगी। हमें इस संकल्प के साथ आगे बढ़ना होगा कि देश की किसी भी नदी में, थोड़ा सा भी पानी बिना ट्रीटमेंट के ना गिरे, कोई गंदा नाला नदी में ना गिरे।

साथियों,

आज शहरी विकास से जुड़े इस कार्यक्रम में, मैं किसी भी शहर के सबसे अहम साथियों में से एक की चर्चा अवश्य करना चाहता हूं। ये साथी हैं हमारे रेहड़ी-पटरी वाले, ठेला चलाने वाले- स्ट्रीट वेंडर्स। इन लोगों के लिए पीएम स्वनिधि योजना, एक आशा की नई किरण बनकर आई है। आजादी के दशकों बाद तक हमारे इन साथियों की सुध नहीं ली गई थी। थोड़े से पैसे के लिए उन्हें किसी से बहुत ज्यादा ब्याज पर कर्ज लेना पड़ता था। वो कर्ज के बोझ में डूबा रहता था। दिनभर मेहनत करके कमाता था, परिवार के लिए जितना देता था उससे ज्‍यादा ब्‍याज वाले को देना पड़ता था। जब लेन-देन का कोई इतिहास ना हो, कोई डॉक्यूमेंट ना हो तो उन्हें बैंकों से मदद मिलना भी असंभव था।

इस असंभव को संभव किया है - पीएम स्वनिधि योजना ने। आज देश के 46 लाख से ज्यादा रेहड़ी-पटरी वाले भाई-बहन, स्ट्रीट वेंडर्स इस योजना का लाभ उठाने के लिए आगे आए हैं। इनमें से 25 लाख लोगों को करीब-करीब ढाई हजार करोड़ रुपए दिए भी जा चुके हैं। स्ट्रीट वेंडर्स की जेब में ढाई हजार करोड़ पहुंचा ये छोटी बात नहीं है जी। ये अब डिजिटल ट्रांजेक्शन कर रहे हैं और बैंकों से जो कर्ज लिया है, वो भी चुका रहे हैं। जो स्ट्रीट वेंडर्स समय पर लोन चुकाते हैं, उन्हें ब्याज में छूट भी दी जाती है। बहुत ही कम समय में इन लोगों ने 7 करोड़ से अधिक ट्रांजेक्शन किए हैं। कभी-कभी हमारे देश में बुद्धिमान लोग कह देते हैं कि ये गरीब आदमी को ये कहां से आयेगा, ये यही लोग हैं जिन्‍होंने ये करे दिखाया है यानि पैसे देने या लेने के लिए 7 करोड़ बार कोई ना कोई डिजिटल तरीका अपनाया है।

ये लोग क्‍या करते हैं, थोक विक्रेताओं से जो सामान खरीद रहे हैं, उसका पेमेंट भी अपने मोबाइल फोन से डिजिटल तरीके से करने लगे हैं और जो फुटकर सामान बेच रहे हैं, उसके पैसे भी नागरिकों से वो डिजिटल तरीके से लेने की शुरूआत कर चुके हैं। इसका एक बड़ा लाभ ये भी हुआ है कि उनकी लेनदेन की डिजिटल हिस्ट्री भी बन गई। और इस डिजिटल हिस्ट्री की वजह से बैंकों को पता चलता है कि हां इनका कारोबार ऐसा है और इतना चल रहा है, तो बैंक द्वारा द्वारा उन्हें अगला लोन देने में आसानी हो रही है।

साथियों,

पीएम स्वनिधि योजना में 10 हजार रुपए का पहला लोन चुकाने पर 20 हजार का दूसरा लोन और दूसरा लोन चुकाने पर 50 हजार का तीसरा लोन स्ट्रीट वेंडर्स को दिया जाता है। आज सैकड़ों स्ट्रीट वेंडर्स, बैंकों से तीसरा लोन लेने की तैयारी कर रहे हैं। मैं ऐसे हर साथी को, बैंकों से बाहर जाकर ज्यादा ब्याज पर कर्ज उठाने के दुष्चक्र से मुक्ति दिलाना चाहता हूं। और आज देशभर के मेयर मेरे साथ जुड़े हुए हैं, नगरों के अध्‍यक्ष जुड़े हुए हैं। ये सच्‍चे अर्थों में गरीबों की सेवा का काम है, सच्‍चे अर्थ में गरीब से गरीब को empower करने का काम है। ये सच्‍चे अर्थ में गरीब को ब्‍याज के दुष्‍चक्र से मुक्ति दिलाने का काम है। मेरे देश का कोई भी मेयर ऐसा नहीं होना चाहिए, कोई भी जुड़ा हुआ कॉर्पोरेटर, काउंसलर ऐसा नहीं होना चाहिए कि जिसके दिल में ये संवेदना न हो और वो इस पीएम स्‍वनिधि को सफल करने के लिए कुछ न कुछ कोशिश न करता हो।

अगर आप सभी साथी जुड़ जाएं तो इस देश का हमारा ये गरीब व्‍यक्ति...और हमने कोरोना में देखा है, अपनी सोसाइटी, चाल में, मोहल्‍ले में सब्‍जी देने वाला अगर नहीं पहुंचता है तो हम कितनी परेशानी से गुजरते हैं। दूध पहुंचाने वाला नहीं आता था तो हमें कितनी परेशानी होती थी। कोरोना काल में हमने देखा है कि समाज के एक-एक व्‍यक्ति का हमारे जीवन में कितना मूल्‍य था। जब ये हमने अनुभव किया तो क्‍या ये हमारा दायित्‍व नहीं है कि इतनी बढ़िया स्‍कीम आपके पास मौजूद है। उसको ब्‍याज में मदद मिल रही है, उसको अपना कारोबार बढ़ाने के लिए पैसे लगातार मिल रहे हैं। क्‍या आप उसे डिजिटल लेनदेन की ट्रेनिंग नहीं दे सकते? क्‍या आप अपने शहर में हजार, दो हजार, 20 हजार, 25 हजार, ऐसे हमारे साथी होंगे, क्‍या उनके जीवन को बदलने के लिए कदम नहीं उठ सकते?

मैं पक्‍का कहता हूं दोस्‍तो, भले ये प्रोजेक्‍ट भारत सरकार का हो, भले ये पीएम स्‍वनिधि हो, लेकिन अगर आप इसको करेंगे तो उस गरीब के दिल में जगह आपके लिए बनेगी। वो जय-जयकार उस शहर के मेयर का करेगा, वो जय-जयकार उस शहर के कॉर्पोरेटर का करेगा। वो जिसने उसकी मदद के लिए हाथ फैलाया है, उसकी जय-जयकार करेगा। मैं चाहता हूं कि जय-जयकार आपका हो। मेरे देश के हर शहर के मेयर का हो, मेरे देश के हर कॉर्पोरेटर का हो, मेरे देश के हर काउंसलर का हो। ये जय-जयकार आपका हो ताकि जो गरीब ठेला और रेहड़ी-पटरी ले करके बैठा हुआ है वो भी हमारी तरह शान से जिए। वो भी अपने बच्‍चों को अच्‍छी शिक्षा लेने के लिए महत्‍वपूर्ण निर्णय कर सके।

बड़ी आसानी से किया जा सकता है साथियो, लेकिन इस काम में हम सबका योगदान...मैं सभी कमिशनर्स से कहना चाहता हूं ये मानवता का काम है, ये grass root level पर आर्थिक सफाई का भी काम है। एक स्‍वाभिमान जगाने का काम है। देश ने आपको इतने प्रतिष्ठित पद पर बिठाया है। आप दिल से इस पीएम स्‍वनिधि कार्यक्रम को अपना बना लें। जी-जान से उसके साथ जुटिए। देखते ही देखते देखिए आपके गांव का हर परिवार सब्‍जी भी खरीदता है डिजिटल पेमेंट के साथ, दूध खरीदता है डिजिटल पेमेंट से, जब वो थोक में लेने जाता है डिजिटल पेमेंट करता है। एक बड़ा रेव्‍यूलेशन आने वाला है। इन छोटी सी संख्‍या के लोगों ने 7 करोड़ ट्रांजेक्‍शन किए। अगर आप सब लोग उनकी मदद में पहुंच जाएं तो हम कहां से कहां पहुंच सकते हैं।

मेरा आज इस कार्यक्रम में उपस्थित शहरी विकास के साथ जुड़ी हुई सभी इकाइयों से व्‍यक्तिगत रूप से आग्रह है कि आप इस काम में पीछे मत रहिए। और बाबा साहेब अंबेडकर के नाम से जुड़े भवन से जब मैं बोल रहा हूं तब तो गरीब के लिए कुछ करना हमारा दायित्‍व बन जाता है।

साथियो,

मुझे खुशी है कि देश के दो बड़े राज्य, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश, इन दोनों राज्‍यों में सबसे ज्यादा स्ट्रीट वेंडर्स को बैंकों से लोन दिया गया है। लेकिन मैं सभी राज्‍यों से आग्रह करूंगा इसमें भी स्‍पर्धा हो कौन राज्‍य आगे निकलता है, कौन राज्‍य सबसे ज्‍यादा डिजिटल ट्रांजेक्‍शन करता है, कौन राज्‍य सबसे ज्‍यादा तीसरा लोन स्‍ट्रीट वेंडर्स को तीसरे लोन तक ले गया है। 50 हजार रुपया उसके हाथ में आया है, ऐसा कौन राज्‍य कर रहा है, कौन राज्‍य सबसे ज्‍यादा करता है। मैं चाहूंगा उसकी भी एक स्‍पर्धा कर ली जाए और हर छह महीने, तीन महीने इसके लिए भी उन राज्‍यों को पुरस्‍कृत किया जाए, उन शहरों को पुरस्‍कृत किया जाए। एक तंदुरूस्‍त स्‍पर्धा गरीबों का कल्‍याण करने की, एक तंदुरूस्‍त स्‍पर्धा गरीबों का भला करने की, एक तंदुरूस्‍त स्‍पर्धा गरीबों को सशक्‍त करने की। आइए, उस स्‍पर्धा में हम सब जुड़ें। सभी मेयर जुड़ें, सभी नगर अध्‍यक्ष जुड़ें, सभी कॉर्पोरेटर जुड़ें, सभी काउंसलर जुड़ें।

साथियों,

हमारे यहां शास्त्रों में कहा गया है,

आस्ते भग आसीनः यः ऊर्ध्वः तिष्ठति तिष्ठतः।

शेते निपद्य मानस्य चराति चरतो भगः चरैवेति॥

अर्थात, कर्म पथ पर चलते हुए अगर आप बैठ जाएंगे तो आपकी सफलता भी रुक जाएगी। अगर आप सो जाएंगे तो सफलता भी सो जाएगी। अगर आप खड़े होंगे तो सफलता भी उठ खड़ी होगी। अगर आप आगे बढ़ेंगे तो सफलता भी वैसे ही आगे बढ़ेगी। और इसलिए, हमें निरंतर आगे बढ़ते ही रहना है। चरैवेति चरैवेति। चरैवेति चरैवेति। ये चरैवेति चरैवेति के मंत्रों को लेकर आप चल पड़ें और अपने शहर को इन सभी मुसीबतों से मुक्ति दिलाने का बीड़ा उठाएं। हमें एक ऐसा भारत बनाना है जो स्वच्छ हो, समृद्ध हो, और दुनिया को sustainable life के लिए दिशा दे।

मुझे पूरा विश्वास है, हम सभी देशवासियों के प्रयासों से देश अपना ये संकल्प जरूर सिद्ध करेगा। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद! बहुत-बहुत शुभकामनाएं!

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21वीं सदी के इस दशक में भारत रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार है: ET Now ग्लोबल बिजनेस समिट में पीएम मोदी
February 13, 2026
Amid numerous disruptions, this decade has been one of unprecedented development for India, marked by strong delivery and by efforts that have strengthened our democracy: PM
In this decade of the 21st century, India is riding the Reform Express: PM
We have made the Budget not only outlay-focused but also outcome-centric: PM
Over the past decade, we have regarded technology and innovation as the core drivers of growth: PM
Today, we are entering into trade deals with the world because today's India is confident and ready to compete globally: PM

आप सभी का इस ग्लोबल बिजनेस समिट में, आप सबका मैं अभिनंदन करता हूं। हम यहां A Decade Of Disruption, A Century Of Change, इस विषय पर चर्चा कर रहे हैं। विनीत जी का भाषण सुनने के बाद मुझे लगता है कि मेरा काम बहुत सरल हो गया है। लेकिन एक छोटी request करूं, इतना सारा आपको पता है, तो कभी ET में तो दिखना चाहिए।

साथियों,

21वीं सदी का बीता दशक अभूतपूर्व डिसरप्शन का रहा है। ग्लोबल Pandemic, ग्लोब के अलग-अलग हिस्सों में तनाव, युद्ध और ग्लोब के संतुलन को हिला देने वाले Supply Chain Breakdowns, दुनिया ने एक दशक के भीतर काफी कुछ देख लिया। लेकिन साथियों, कहते हैं, संकट के समय ही किसी देश के सामर्थ्य पता चलता है और मुझे बहुत गर्व है, अनेक Disruptions के बीच भी भारत के लिए यह दशक, अभूतपूर्व डेवलपमेंट का रहा है, शानदार डिलीवरी का रहा है और डेमोक्रेसी को मजबूत करने वाला रहा है। जब पिछला दशक शुरू हुआ था, तो भारत ग्यारहवें नंबर की अर्थव्यवस्था था। इतनी उथल-पुथल में पूरी आशंका थी कि भारत और नीचे चला जाएगा, लेकिन आज भारत, बहुत तेजी के साथ दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी बनने जा रहा है। और आप जिस Century Of Change की बात कर रहे हैं, उसका बहुत बड़ा आधार और यह मैं बहुत जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूं, इसका बहुत बड़ा आधार भारत ही होने जा रहा है। आज भारत, दुनिया की ग्रोथ में 16 परसेंट से ज्यादा योगदान दे रहा है। और मुझे विश्वास है, इस सेंचुरी के हर आने वाले साल में हमारा योगदान और भी बढ़ता रहेगा, निरंतर बढ़ता रहेगा। मैं वह मदान की तरह astrologer के रूप में नहीं आया हूं। भारत, दुनिया की ग्रोथ को ड्राइव करेगा, दुनिया की ग्रोथ का नया इंजन बनेगा।

साथियों,

दुनिया में सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद एक नई वैश्विक व्यवस्था बनी थी, एक नए वर्ल्ड ऑर्डर ने आकार लिया था। लेकिन सात दशक के बाद, वो व्यवस्था टूट रही है। दुनिया आज एक नए वर्ल्ड ऑर्डर की तरफ बढ़ रही है। आखिर यह क्यों हो रहा है? ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि तब जो व्यवस्था बनी थी, उसकी नींव One Size Fits All, इसी सोच पर टिकी थी। तब ये माना गया कि World Economy Core में होगी, Supply Chains मजबूत और विश्वसनीय हो जाएगी। इस व्यवस्था में नेशन्स को केवल कंट्रीब्यूटर्स के रूप में ही देखा गया। लेकिन आज, इस मॉडल को चुनौती मिल रही है। यह अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है। आज हर देश को यह पता चल रहा है कि उसे अपनी रज़ीलियन्स खुद बनानी होगी।

साथियों,

आज दुनिया जिसकी चर्चा कर रही है। उसको भारत ने 2015 में, आज से 10 साल से पहले, 2015 में ही अपनी नीति का हिस्सा बना लिया था। दस साल पहले जब नीति आयोग बना, तो उसके फाउंडिंग डॉक्यूमेंट में ही भारत ने अपना विजन क्लीयर कर दिया था और विजन यह कि भारत किसी दूसरे देश से कोई सिंगल डेवलपमेंट मॉडल इंपोर्ट नहीं करेगा। हम भारत के विकास के लिए भारतीय अप्रोच को लेकर ही चलेंगे। इस नीति ने भारत को अपने हिसाब से, अपनी रिक्वायरमेंट के हिसाब से, अपने हित में फैसले लेने का आत्मविश्वास दिया और यह एक बड़ा कारण है कि डिसरप्शन के दशक में भी भारत की इकोनॉमी कमजोर नहीं पड़ी, निरंतर मजबूत होती गई।

साथियों,

आज 21वीं सदी के इस दशक में भारत Reform Express पर सवार है और इस Reform Express की सबसे बड़ी खासियत यह है कि हम इसे compulsion में नहीं, बल्कि conviction के साथ, Reform के कमिटमेंट के साथ गति दे रहे हैं। यहां तो बहुत बड़ी-बड़ी संख्या में बड़े-बड़े expert बैठे हैं, अर्थजगत के दिग्गज बैठे हैं। आपने भी 2014 से पहले का दौर देखा है। जब तक हालात मजबूर न कर दें, जब तक कोई संकट न आ जाए, जब कोई और रास्ता न बचे, तब मजबूरन रिफॉर्म्स किए जाते थे। आप याद करिए, 1991 का रिफॉर्म्स भी तब हुआ, जब देश पर दिवालिया होने का खतरा आ गया था। जब देश को सोना गिरवी रखना पड़ा था। पहले की सरकारों का यही तरीका था, वो reforms compulsion में ही किया करती थीं। जब 26/11 का आतंकी हमला हुआ, कांग्रेस सरकार की कलई खुल गई, तो NIA का गठन किया गया। जब पावर सेक्टर बर्बाद हो गया, ग्रिड फेल होने लगे, तब मजबूरी में कांग्रेस को पावर सेक्टर में याद आई।

साथियों,

ऐसी एक लंबी सूची है, जो याद दिलाती है कि जब compulsion में, मजबूरी में reform होता है, तो न सही नतीजे मिलते हैं, न देश को सही परिणाम मिलते हैं।

साथियों,

आज मुझे गर्व है कि बीते 11 वर्षों में हमने पूरे conviction के साथ रिफॉर्म किए हैं और यह रिफॉर्म Policy में हुए हैं, Process में हुए, Delivery में हुए और इतना ही नहीं, Mindset में भी reform हुआ है। क्योंकि साथियों, अगर पॉलिसी बदले, लेकिन प्रोसेस वही रहे, माइंडसेट वही रहे, डिलीवरी ठीक से ना हो, तो रिफॉर्म्स सिर्फ और सिर्फ कागज का टुकड़ा बनकर रह जाता है। इसलिए हमने पूरे सिस्टम को बदलने के लिए ईमानदारी से कोशिश की है।

साथियों,

मैं प्रोसेस की बात करूं, तो एक साधारण लेकिन बहुत जरूरी प्रोसेस है, कैबिनेट नोट्स का। यहां कई लोगों को अंदाजा होगा कि पहले की सरकारों में एक कैबिनेट नोट बनने में ही कुछ महीने लग जाते थे, महीने। अब इस स्पीड से देश का विकास कैसे होता? इसलिए हमने इस process को बदला। हमने डिसीजन मेकिंग को time-bound और technology-driven बनाया। हमने यह तय कर दिया कि इस अफसर की टेबल पर यह कैबिनेट नोट इतने घंटे से ज्यादा रहेगा ही नहीं। या तो रिजेक्ट करो या निर्णय लो और इसका नतीजा आज देश देख रहा है।

साथियों,

मैं आपको रेलवे ओवर ब्रिज के अप्रूवल का भी उदाहरण दूंगा। पहले R.O.B का एक डिजाइन अप्रूव कराने के लिए कई वर्ष लग जाते थे, कई सारी क्लीयरेंस की ज़रूरत थीं, कई जगह चिट्ठियां लिखनी पड़ती थीं और यह मैं प्राइवेट के लिए नहीं कह रहा हूं, सरकार को। हमने इसको भी बदला और आज देखिए कितनी तेजी से रोड और रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर बन रहा है। विनीत जी ने बहुत विस्तार से इस बात को बताया।

साथियों,

एक बड़ा Interesting उदाहरण बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर का है। अब बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर देश की security से जुड़ा हुआ होता है। आप कल्पना कर सकते हैं, एक समय था, जब बॉर्डर एरियाज़ में एक साधारण सी सड़क बनाने के लिए भी कुछ परमिशन दिल्ली से लेनी पड़ती थी। जिला स्तर पर निर्णय लेने के यानी इसके सामने एक प्रकार से उसका कोई अधिकारी ही नहीं थे, दीवार ही दीवार थीं, वो निर्णय नहीं कर सकता था और इसलिए तो दशकों बाद भी हमारे देश में बॉर्डर इंफ्रा इतना बेहाल रहा। 2014 के बाद हमने इस प्रोसेस में भी रिफॉर्म किया, हमने स्थानीय प्रशासन को Empower किया और आज हम देश के बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर को तेजी से डेवलप होते देख रहे हैं।

साथियों,

बीते दशक में भारत के जिस Reform ने दुनिया में हलचल मचा दी है, वो है UPI, भारत का डिजिटल पेमेंट सिस्टम। यह सिर्फ एक App नहीं है, यह policy, process और delivery के एक शानदार कन्वर्जेंस का प्रमाण है। जो लोग कभी बैंकिंग और फाइनेंस से जुड़े बेनिफिट्स के बारे में सोच भी नहीं सकते थे, UPI देश के ऐसे नागरिकों को सर्व कर रहा है। यह जो डिजिटल इंडिया है, डिजिटल पेमेंट सिस्टम है, जनधन आधार मोबाइल की ट्रिनिटी है, यह रिफॉर्म किसी compulsion से नहीं हुआ, यह हमारा कन्विक्शन था। और कन्विक्शन यह था कि जिन लोगों तक पहले की सरकारें कभी नहीं पहुंची, हमें ऐसे नागरिकों का इंक्लूजन करना है। जिसे कोई नहीं पूछता, उसे मोदी पूजता है। और इसलिए यह रिफॉर्म्स किए गए हैं और आज भी हमारी सरकार इसी सोच के साथ चल रही है।

साथियों,

भारत का यह जो नया मिज़ाज है, वो हमारे बजट में भी रिफ्लेक्ट होता है। पहले जब बजट की चर्चा होती थी, तो फोकस सिर्फ Outlay पर होता था। कितना पैसा आवंटित हुआ, क्या सस्ता हुआ, क्या महंगा हुआ और उस दिन टीवी देखेंगे, तो पूरी टीवी एक ही यानी इनके लिए, बजट मतलब इंकम टैक्‍स ऊपर गया कि नीचे गया, इसके आगे उनको देश दिखता ही नहीं है। और होता क्‍या था, कितनी नई ट्रेनें घोषित हुईं, यही चलता रहता था, उन घोषणाओं का बाद में क्या हुआ, कोई पूछने वाला ही नहीं था। और इसलिए हमने बजट को Outlay के साथ-साथ Outcome सेंट्रिक बनाया।

साथियों,

बजट में एक और बड़ा बदलाव आया है। 2014 से पहले Off-Budget Borrowing पर बहुत अधिक चर्चा होती थी। लेकिन अब Off-Budget Reforms की चर्चा होती है। बजट से बाहर, नेक्स्ट जनरेशन GST रिफॉर्म्स हुए, प्लानिंग कमीशन की जगह नीति आयोग बनाया, आर्टिकल 370 की दीवार गिरा दी, तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाया, नारी शक्ति वंदन अधिनियम बनाया।

साथियों,

बजट में घोषित हों, या बजट से बाहर, रिफॉर्म एक्सप्रेस लगातार गति पकड़ रही है। अगर मैं पिछले एक साल की ही बात करूं तो हमने Ports & Maritime सेक्टर में Reform किया, शिप बिल्डिंग इंडस्ट्री के लिए अनेक Initiative लिए, जन-विश्वास एक्ट के तहत रिफॉर्म्स को और आगे बढ़ाया, Energy Security के लिए Shanti Act बनाया, लेबर कानूनों से जुड़े रिफॉर्म्स को लागू किया, भारतीय न्याय संहिता लेकर आए, वक्फ कानून में Reform किया गया है, गांव में रोजगार के लिए नया G RAM G कानून बनाया, ऐसे अनेक Reforms साल भर होते रहे हैं।

साथियों,

इस साल के बजट ने रिफॉर्म एक्सप्रेस को और आगे बढ़ाया है। वैसे तो बजट के बहुत सारे आयाम हैं, लेकिन मैं दो Important फैक्टर्स की बात करूंगा। Capex और Technology, बीते वर्षों की भांति इस बजट में भी, इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च को बढ़ाकर करीब 17 लाख करोड़ रुपए कर दिया गया है। और आप जानते हैं कि कैपेक्स का मल्टीप्लायर effect कितना बड़ा होता है। इससे देश की कैपेसिटी और प्रोडक्टिविटी बढ़ती है। अनेकों सेक्टर्स में बहुत बड़ी संख्या में जॉब क्रिएशन भी होती है। पांच यूनिवर्सिटी टाउनशिप का निर्माण, देश के टीयर-2, टीयर-3 शहरों के लिए सिटी इकोनॉमिक रीजन्स का निर्माण और सात नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, ऐसे बजट अनाउंसमेंट्स, सही मायने में युवाओं पर, देश के फ्यूचर पर, यह इन्वेस्टमेंट हैं।

साथियों,

बीते दशक में हमने टेक्नोलॉजी और इनोवेशन को ग्रोथ का कोर ड्राइवर माना है। इसी सोच के साथ, देश में स्टार्टअप कल्चर, हैकाथॉन कल्चर, उसको हमने प्रमोट किया। आज देश में, दो लाख से अधिक स्टार्टअप, रजिस्टर्ड स्टार्टअप्स हैं और यह डायवर्स सेक्टर्स में काम कर रहे हैं। हमने युवाओं को प्रोत्साहित किया, देश में रिस्क टेकिंग कल्चर को पुरस्कृत करने का भाव जगाया और परिणाम हमारे सामने है। इस साल का बजट, हमारी इसी प्राथमिकता को और मजबूत करता है। विशेष तौर पर बायोफार्मा, सेमीकंडक्टर और AI जैसे सेक्टर के लिए, इस बजट में महत्वपूर्ण घोषणाएं की गई हैं।

साथियों,

आज जब देश की आर्थिक ताकत बढ़ी है, तो हम राज्यों को भी उतना ही ज्यादा सशक्त कर रहे हैं। मैं एक और आंकड़ा आपको देना चाहता हूं। 2004 से 2014, 10 साल, इस दरमियान राज्यों को टैक्स डिवोल्यूशन के तौर पर 18 लाख करोड़ रुपए के आसपास ही मिले थे, 2004 से 2014 तक। जबकि 2014 से लेकर 2025 तक, राज्यों को 84 लाख करोड़ रुपए दिए जा चुके हैं। अगर मैं इस साल बजट में प्रस्तावित लगभग 14 लाख करोड़ का आंकड़ा और जोड़ दूं, तो हमारी सरकार में राज्यों को टैक्स डिवोल्यूशन के करीब-करीब 100 लाख करोड़ रुपए मिलने तय हुए हैं। यह राशि केंद्र सरकार की तरफ से अलग-अलग राज्य सरकारों को मिली है, ताकि वो अपने यहां विकास के कार्यों को आगे बढ़ा सकें।

साथियों,

आजकल आप लोग भारत के FTA’s यानि फ्री ट्रेड डील्स पर काफी चर्चा कर रहे हैं और मैं यहां enter हुआ, वहीं से शुरू हो गए लोग। दुनियाभर में इसका एनालिसिस हो रहा है। लेकिन मैं आज इसका एक और इंटरेस्टिंग एंगल आपको बताता हूं, मीडिया को जो चाहिए, वो तो इसमें नहीं होगा शायद, लेकिन हो सकता है कि कुछ काम में आ जाए। और मैं पक्का मानता हूं, जो बात मैं कहने जा रहा हूं, आपने भी इसके बारे में विचार नहीं किया होगा। क्या आपने कभी सोचा है कि आज इतने सारे विकसित देशों के साथ फ्री-फ्री ट्रेड डील्स हो रहे हैं, क्या यही काम 2014 से पहले क्यों नहीं हो पाए? देश वही, युवा शक्ति वही, सरकारी सिस्टम वही, तो बदला क्या? बदलाव, सरकार के विजन में आया है, नीति और नीयत में बदलाव आया है, भारत के सामर्थ्य में बदलाव आया है।

साथियों,

आप ज़रा सोचिए, फ्रेजाइल फाइव इकोनॉमी जब थी, तब कौन हमारे साथ डील करता? गांव में भी गरीब की बेटी को कोई रईस के परिवार वाला शादी करता है क्या? वो उसको छोटा मानता है, हमारा भी यही हाल था भाई दुनिया में। जब देश पॉलिसी पैरालिसिस से घिरा था, चारों तरफ घोटाले और घपले थे, तब कौन भारत पर भरोसा कर पाता? 2014 से पहले भारत में मैन्युफैक्चरिंग का बेस बहुत कमजोर था और जिसके कारण, पहले की सरकारें भी डरती थी, एक तो कोई आता नहीं था और जरा सा भी कोई कोशिश करें, तो यह लोग भी डरते थे और डर यह था कि अगर विकसित देशों के साथ डील हो गई, तो वो हमारे बाजार पर कब्जा कर लेंगे, वो यहां अपने प्रोडक्ट डंप करने लगेंगे, हताशा-निराशा के उस माहौल में 2014 से पहले यूपीए सरकार सिर्फ चार देशों के साथ ही कॉम्प्रिहेंसिव ट्रेड एग्रीमेंट कर पाई थी। जबकि, बीते दशक में भारत ने जो ट्रेड डील्स की हैं, उनमें दुनिया के 38 कंट्री कवर होते हैं, 38 कंट्री। और यह दुनिया के अलग-अलग रीजन्स में हैं। आज हम इसलिए दुनिया के साथ ट्रेड डील्स कर रहे हैं क्योंकि आज का भारत आत्मविश्वास से भरा हुआ है। आज का भारत, दुनिया के साथ कंपीट करने के लिए तैयार है। बीते 11 वर्षों में भारत ने मैन्युफैक्चरिंग का एक मजबूत इकोसिस्टम देश में विकसित किया है। इसलिए, आज भारत समर्थ है, सशक्त है और इसलिए दुनिया भी हम पर भरोसा करती है। यही बदलाव हमारी Trade Policy में आए Paradigm Shift का आधार बने और यही Paradigm Shift विकसित भारत की हमारी यात्रा का अनिवार्य स्तंभ बना है।

साथियों,

आज हमारी सरकार पूरी संवेदनशीलता के साथ देश के हर नागरिक को विकास में सहभागी बनाते हुए कार्य कर रही है। जो विकास की दौड़ में पीछे छूट गया, हम उसके विकास को प्राथमिकता दे रहे हैं। पहले की सरकारों ने दिव्यांग जनों के लिए सिर्फ घोषणाएं कीं, हम भी उसी रास्ते को जारी रख सकते थे, लेकिन ये सरकार की संवेदनशीलता का उदाहरण है। आप में से शायद जो बातें मैं बता रहा हूं, आप जिस लेवल के लोग हैं, शायद उसमें फिट नहीं बैठती होगी। हमारे दिव्यांग जनों के लिए जैसे हमारे यहां Language में बिखराव है ना, Sign Language का भी वही हाल था जी। तमिलनाडु में जाओ तो एक Sign Language, उत्तर प्रदेश में जाओ तो दूसरी, गुजरात में जाओ तो तीसरी, असम में जाओ तो चौथी, अगर यहां का दिव्‍यांग असम गया, तो बेचारा समझ ही नहीं पाता था। अब यह कोई बड़ा काम तो नहीं था। अगर संवेदनशील सरकार होती है ना, तो उसको यह काम छोटा नहीं लगता है। और देश ने पहली बार Indian Sign Language को institutionalise किया, common किया, व्यवस्था बनाई है। ऐसे ही, देश की Transgender community कब से अपने अधिकारों के लिए लड़ रही थी। हमने उनके लिए भी कानून बनाकर उन्हें सम्मान से जीने का कवच दिया है। बीते दशक में ही देश की करोड़ों बहनों को तीन-तलाक की कुरीति से मुक्ति मिली, लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए आरक्षण पक्का हुआ।

साथियों,

आज सरकारी मशीनरी की सोच भी बदली है, उसमें संवेदनशीलता आई है। सोच का अंतर क्या होता है, यह हम जरूरतमंदों को मुफ्त अनाज देने वाली स्कीम में भी देखते हैं। विपक्ष के कुछ लोग हमारा मजाक उड़ाते हैं और कुछ अखबारों में जरा छपता भी ज्यादा है। कोई मजाक उड़ाता है कि जब 25 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकल ही गए हैं, तो उनको मुफ्त राशन क्यों मिलता है? अजीबोगरीब सवाल है। अगर आप बीमार हैं, अस्पताल में गए और अस्पताल से आपको छुट्टी मिली, तो भी डॉक्टर कहता है कि सात दिन तक यह-यह संभालना, पंद्रह दिन तक यह-यह संभालना, कहता है कि नहीं कहता है? गरीबी से बाहर निकले हैं, लेकिन यह सवाल पूछ रहे हैं कि निकले हैं, तो फिर अनाज क्यों देते हो? ऐसी संकीर्ण मानसिकता वाले लोग, यह नहीं सोचते कि सिर्फ गरीबी से बाहर निकालना काफी नहीं होता, बल्कि जो व्यक्ति नियो मिडिल क्लास में आया है, वो फिर गरीबी के चंगुल में न फंस जाए, यह भी सुनिश्चित करना पड़ता है। इसलिए उसे आज अनाज मुफ्त की सुविधा मिल रही है, यह आवश्यक है। बीते वर्षों में केंद्र सरकार ने इस योजना पर लाखों करोड़ रुपए खर्च किए हैं, इससे गरीब और नियो मिडिल क्लास को बहुत बड़ा संबल मिला है।

साथियों,

सोच का एक और फर्क हम अपने आसपास भी देखते हैं। कुछ लोग हैं, जो कहते हैं कि ये मोदी 2047 की बात क्यों करता है? 2047 में विकसित भारत बनेगा, नहीं बनेगा, किसने देखा? हम रहें या ना रहें, उससे हमारा लेना देना क्या है? अब देखिए, यह सोच है और यह बड़े-बड़े लोगों की सोच है, यह कोई मैं अपने शब्द नहीं बता रहा हूं।

साथियों,

जिन लोगों ने आजादी के लिए लड़ाई लड़ी, लाठियां खाईं, कालापानी की सज़ाएं पड़ी, फांसी के तख्त पर चढ़ गए, अगर वो भी यही सोचते कि आजादी पता नहीं कब मिले, हम क्यों आज आजादी के लिए लाठी खाएं, तो सोचिए, क्या उस सोच के साथ देश कभी आजाद हो पाता क्या? जब राष्ट्र प्रथम का भाव हो, जब देश हित सर्वोपरि हो, तो हर निर्णय देश के लिए होता है, हर नीति देश के लिए बनती है। हमारी सोच स्पष्ट है, विजन साफ है, हमें देश को विकसित बनाने के लिए निरंतर काम करना है। 2047 तक हम रहें न रहें, लेकिन यह देश रहेगा, इस देश की संतानें रहेंगी। इसलिए हमें और इसलिए हमें अपना आज खपाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियों का कल सुरक्षित रहे, उज्ज्वल रहे। मैं आज अपनी आज बो रहा हूं क्योंकि कल की पीढ़ी को फल खाने को मौका मिले।

साथियों,

दुनिया को अब डिसरप्शन के साथ जीने के लिए तैयार रहना होगा। समय के साथ इनके नेचर में बदलाव आएगा, लेकिन यह तय है कि अब व्यवस्थाएं बहुत तेजी से बदलेंगी। AI से जो Disruption हो रहे हैं, वो तो आप देख ही रहे हैं। आने वाले समय में AI और भी क्रांतिकारी बदलाव लेकर आने वाली है, भारत इसके लिए भी तैयार है। कुछ ही दिनों में भारत में ग्लोबल AI इम्पैक्ट समिट होने जा रही है। दुनिया के अनेक देश, दुनियाभर के टेक लीडर्स, इस समिट में हिस्सा लेने के लिए भारत आ रहे हैं। सभी के साथ मिलकर, हम एक बेहतर विश्व बनाने के लिए निरंतर प्रयास करते रहेंगे। इसी भरोसे के साथ, एक बार फिर इस Summit के लिए आप सभी को बहुत सारी मेरी शुभकामनाएं।

बहुत-बहुत धन्यवाद!

वंदे मातरम!