"इस विधानसभा भवन में एक से एक, बड़े और साहसिक निर्णय लिए गए हैं"
"यह सभा इस बात का उदाहरण है कि लोकतंत्र में सामाजिक जीवन में समान भागीदारी और समान अधिकारों का पालन कैसे किया जाता है"
"भारत में लोकतन्त्र की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है जितना प्राचीन ये राष्ट्र है, जितनी प्राचीन हमारी संस्कृति है"
"बिहार हमेशा लोकतंत्र और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए अपनी प्रतिबद्धता पर कायम रहा"
“बिहार जितना समृद्ध होगा, भारत का लोकतंत्र उतना ही शक्तिशाली होगा। बिहार जितना मजबूत बनेगा, भारत उतना ही सामर्थ्यवान बनेगा”
"पक्ष विपक्ष के भेद से ऊपर उठकर, देश के लिए, देशहित के लिए हमारी आवाज एकजुट होनी चाहिए"
"हमारे आचरण से हमारे देश की लोकतांत्रिक परिपक्वता प्रदर्शित होती है"
"लोकतांत्रिक विमर्श को आगे बढ़ाते हुए देश लगातार नए संकल्पों पर काम कर रहा है"
"अगले 25 साल देश के लिए कर्तव्य पथ पर चलने के साल हैं"
"हम अपने कर्तव्यों के लिए जितना परिश्रम करेंगे, हमारे अधिकारों को भी उतना ही बल मिलेगा। हमारी कर्तव्य निष्ठा ही हमारे अधिकारों की गारंटी है"

नमस्कार!

इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में हमारे बीच उपस्थित बिहार के राज्यपाल श्री फागू चौहान जी, यहां के जनप्रिय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी, विधानसभा स्पीकर श्री विजय सिन्हा जी, बिहार विधान परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष श्री अवधेश नारायण सिंह, उपमुख्यमंत्री श्रीमती रेणु देवी जी, ताराकिशोर प्रसाद जी, नेता प्रतिपक्ष श्री तेजस्वी यादव जी, सभी मंत्रीगण विधायकगण, अन्य महानुभाव, देवियों और सज्जनों,

आप सभी को, बिहार निवासियों को, बिहार विधानसभा भवन के शताब्दी वर्ष की बहुत-बहुत शुभकामनाएं। बिहार का ये स्वभाव है कि जो बिहार से स्नेह करता है, बिहार उसे उस प्यार को कई गुना करके लौटाता है। आज मुझे बिहार विधानसभा परिसर में आने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री होने का सौभाग्य भी मिला है। मैं इस स्नेह के लिए बिहार के जन-जन को हृदय से नमन करता हूँ। मुख्यमंत्री जी का, स्पीकर महोदय का भी हृदय से बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं।

साथियों,

मुझे कुछ देर पहले शताब्दी स्मृति स्तम्भ के लोकार्पण का अवसर भी मिला है। ये स्तम्भ बिहार के गौरवशाली अतीत का प्रतीक तो बनेगा ही, साथ ही ये बिहार की कोटि-कोटि आकांक्षाओं को भी प्रेरणा देगा। अब से कुछ देर पहले बिहार विधानसभा म्यूज़ियम और विधानसभा गेस्ट हाउस का शिलान्यास भी हुआ है। मैं इन विकास कार्यों के लिए नीतीश कुमार जी और विजय सिन्हा जी को हृदय से बधाई देता हूँ। मुझे विधानसभा परिसर के शताब्दी पार्क में कल्पतरु के रोपण का भी सुखद अनुभव मिला है। कल्पतरु के विषय में मान्यता है कि ये हमारी आशाओं आकांक्षाओं को पूरा करने वाला ये वृक्ष है। लोकतन्त्र में यही भूमिका संसदीय संस्थाओं की होती है। मैं आशा करता हूँ, बिहार विधानसभा अपनी इस भूमिका को इसी निरंतरता के साथ निभाती रहेगी, बिहार और देश के विकास में अपना अमूल्‍य योगदान देती रहेगी।

साथियों,

बिहार विधानसभा का अपना एक इतिहास रहा है और यहां विधानसभा भवन में एक से एक, बड़े और साहसिक निर्णय लिए गए हैं। आज़ादी के पहले इसी विधानसभा से गवर्नर सत्येंद्र प्रसन्न सिन्हा जी ने स्वदेशी उद्योगों को प्रोत्साहित करने, स्वदेशी चरखा को अपनाने की अपील की थी। आज़ादी के बाद इसी विधानसभा में जमींदारी उन्मूलन अधिनियम पास हुआ था। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुये, नीतीश जी की सरकार ने बिहार पंचायती राज जैसे अधिनियम को पास किया। इस अधिनियम के जरिए बिहार पहला ऐसा राज्य बना जिसने पंचायती राज में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया। लोकतन्त्र से लेकर समाज जीवन तक, समान भागीदारी और समान अधिकार के लिए कैसे काम किया जा सकता है, ये विधानसभा इसका उदाहरण है। आज जब मैं आपसे इस परिसर में, विधानसभा भवन के बारे में बात कर रहा हूं, तो ये भी सोच रहा हूं कि बीते 100 वर्ष में ये भवन, ये परिसर कितने ही महान व्यक्तित्वों की आवाज का साक्षी रहा है। मैं नाम अगर लेने जाऊंगा तो शायद समय कम पड़ जाएगा, लेकिन इस इमारत ने इतिहास के रचयिताओं को भी देखा है और खुद भी इतिहास का निर्माण किया है। कहते हैं वाणी की ऊर्जा कभी भी समाप्त नहीं होती। इस ऐतिहासिक भवन में कही गई बातें, बिहार के उत्थान से जुड़े संकल्प, एक ऊर्जा बनकर आज भी उपस्थित हैं। आज भी वो वाणी, वो शब्द गूंज रहे हैं।

साथियों,

बिहार विधानसभा भवन का ये शताब्दी उत्सव एक ऐसे समय में हो रहा है जब देश अपनी आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। विधानसभा भवन के 100 साल और देश की आज़ादी के 75 साल, ये केवल समय का संयोग नहीं है। इस संयोग का साझा अतीत भी है, और सार्थक संदेश भी हैं। एक ओर बिहार में चंपारण सत्याग्रह जैसे आंदोलन हुए तो वहीं इस धरती ने भारत को लोकतन्त्र के संस्कार और आदर्श पर चलने का रास्ता भी दिखाया। दशकों से हमें ये बताने की कोशिश होती रही है कि भारत को लोकतन्त्र विदेशी हुकूमत और विदेशी सोच के कारण मिला है और हमारे लोग भी कभी-कभी ये बातें बोलते हैं। लेकिन, कोई भी व्यक्ति जब ये कहता है तो वो बिहार के इतिहास और बिहार की विरासत पर पर्दा डालने की कोशिश करता है। जब दुनिया के बड़े भूभाग सभ्यता और संस्कृति की ओर अपना पहला कदम बढ़ा रहे थे, तब वैशाली में परिष्कृत लोकतन्त्र का संचालन हो रहा था। जब दुनिया के अन्य क्षेत्रों में जनतांत्रिक अधिकारों की समझ विकसित होनी शुरू हुई थी, तब लिच्छवी और वज्जीसंघ जैसे गणराज्य अपने शिखर पर थे।

साथियों,

भारत में लोकतन्त्र की अवधारणा उतनी ही प्राचीन है जितना प्राचीन ये राष्ट्र है, जितनी प्राचीन हमारी संस्कृति है। हजारों वर्ष पूर्व में हमारे वेदों में कहा गया है - त्वां विशो वृणतां राज्याय त्वा-मिमाः प्रदिशः पंच देवीः। अर्थात्, राजा को सभी प्रजा मिलकर स्वयं चुने, और विद्वानों की समितियां उसका निर्वाचन करें। ये वेद में कहा गया है, हजारों साल पूरे ग्रंथ में कहा गया है। आज भी हमारे संविधान में सांसदों-विधायकों का चयन, मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति का चयन, इसी लोकतान्त्रिक मूल्य पर टिका हुआ है। एक विचार के रूप में हमारे यहाँ लोकतन्त्र इसलिए हजारों वर्षों से जीवित है क्योंकि भारत लोकतन्त्र को समता और समानता का माध्यम मानता है। भारत सह अस्तित्व और सौहार्द के विचार में भरोसा करता है। हम सत् में भरोसा करते हैं, सहकार में भरोसा करते हैं, सामंजस्य में भरोसा करते हैं, और समाज की संगति शक्ति में भरोसा करते हैं। इसीलिए, हमारे वेदों ने हमें ये मंत्र भी दिया है- सं गच्छध्वं सं वदध्वं, सं वो मनांसि जानताम्॥ अर्थात्, हम मिलकर चलें, मिलकर बोलें, एक दूसरे के मनों को, एक दूसरे के विचारों को जानें और समझें। इसी वेद मंत्र में आगे कहा गया है- समानो मन्त्र: समिति: समानी। समानं मन: सह चित्तमेषां॥ अर्थात्, हम मिलकर समान विचार करें, हमारी समितियां, हमारी सभाएं और सदन कल्याण भाव के लिए समान विचार वाले हों, और हमारे हृदय भी समान हों। हृदय से लोकतन्त्र को स्वीकार करने की ऐसी विराट भावना एक राष्ट्र के रूप में भारत ही प्रस्तुत कर सका है। इसीलिए, मैं जब भी दुनिया में अलग अलग देशों में जाता हूँ, बड़े वैश्विक मंचों पर मौजूद होता हूँ, तो मैं बहुत गर्व से कहता हूं क्‍योंकि हमारे कान में किसी न किसी कारण से एक शब्‍द भर दिया गया है। हमारी मन की रचना को एक जगह पर स्थगित कर दिया गया है। हमें बार-बार सुनाया गया है कि we are a largest democracy of the world. हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्‍त्र हैं और हम भी उसी को स्वीकार कर लिया है बार-बार सुनने के कारण। मैं आज भी दुनिया के मंच पर जब भी जाता हूं बड़े गर्व से कहता हूं कि विश्व में लोकतन्त्र की जननी ये भारत है, भारत Mother of Democracy है। और हमने भी और बिहारवासियों ने तो खास दुनिया में डंका बजाते रहना चाहिए कि we are the Mother of Democracy और बिहार की गौरवशाली विरासत, पाली में मौजूद ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी इसके जीवंत प्रमाण हैं। बिहार के इस वैभव को न कोई मिटा सकता है, न कोई छिपा सकता है। इस ऐतिहासिक इमारत ने बिहार की इस लोकतांत्रिक विरासत को 100 वर्ष तक मजबूत किया है। इसलिए, मैं समझता हूं कि आज ये इमारत भी हम सभी के नमन की हकदार है।

साथियों,

इस भवन के इतिहास से बिहार की वो चेतना जुड़ी है जिसने गुलामी के कालखंड में भी अपने जनतान्त्रिक मूल्यों को समाप्त नहीं होने दिया। इसके निर्माण के साथ और उसके बाद जो घटनाक्रम जुड़ा हुआ है, वो हमें बार-बार याद करना चाहिए। किस तरह श्रीकृष्ण सिंह जी ने, श्री बाबू’ ने अंग्रेजों के सामने शर्त रखी थी कि वो सरकार तभी बनाएँगे जब ब्रिटिश हुकूमत निर्वाचित सरकार के कामकाज में दखल नहीं देगा। कैसे द्वितीय विश्व युद्ध में भारत की सहमति के बिना देश को झोंकने के खिलाफ श्री बाबू जी ने सरकार ने इस्तीफा दे दिया था और बिहार का हर व्यक्ति इस बात के लिए गर्व कर सकता है। इस घटनाक्रम ने सदैव इस संदेश का संचार किया कि बिहार, लोकतंत्र के खिलाफ कभी कुछ स्वीकार नहीं कर सकता। और भाइयों और बहनों, हम सभी ने देखा है कि कैसे आज़ादी के बाद भी बिहार अपनी लोकतान्त्रिक निष्ठा को लेकर उतना ही अडिग, उतना ही प्रतिबद्ध रहा। बिहार ने आज़ाद भारत को डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद के रूप में पहला राष्ट्रपति दिया। लोकनायक जयप्रकाश, कर्पूरी ठाकुर और बाबू जगजीवन राम, अनेकवीर जैसे नेतृत्व इस धरती पर हुए। जब देश में संविधान को कुचलने का प्रयास हुआ, तो भी उसके खिलाफ बिहार ने सबसे आगे आकर विरोध का बिगुल फूंका। आपातकाल के उस स्याह दौर में बिहार की धरती ने दिखा दिया कि भारत में लोकतन्त्र को दबाने की कोशिशें कभी भी कामयाब नहीं हो सकतीं। और इसलिए, मैं मानता हूँ कि बिहार जितना समृद्ध होगा, भारत की लोकतान्त्रिक शक्ति भी उतनी ही मजबूत होगी। बिहार जितना सशक्त होगा, भारत भी उतना ही सामर्थ्यवान बनेगा।

साथियों,

आजादी का अमृत महोत्सव और बिहार विधानसभा के 100 वर्ष का ये ऐतिहासिक अवसर हम सभी के लिए, प्रत्येक जनप्रतिनिधि के लिए आत्मविवेचना और आत्मनिरीक्षण का भी संदेश लेकर आया है। हम अपने लोकतन्त्र को जितना मजबूत करेंगे, उतनी ही मजबूती हमारी आज़ादी को मिलेगी, हमारे अधिकारों को मिलेगी। आज 21वीं सदी में दुनिया तेजी से बदल रही है। नई जरूरतों के हिसाब से भारत के लोगों की, हमारे युवाओं की आशाएँ अपेक्षाएँ भी बढ़ रही हैं। हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं को इसके हिसाब से तेज गति से कार्य करना पड़ेगा। आज जब हम आज़ादी के 75वें साल में एक नए भारत के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं, तो इन संकल्पों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हमारी संसद और विधानसभाओं पर भी है। इसके लिए हमें ईमानदारी और निष्ठा से दिन रात मेहनत करने की जरूरत है। देश के सांसद के रूप में, राज्य के विधायक के रूप में हमारी ये भी ज़िम्मेदारी है कि हम लोकतंत्र के सामने आ रही हर चुनौती को मिलकर हराएं। पक्ष विपक्ष के भेद से ऊपर उठकर, देश के लिए, देशहित के लिए हमारी आवाज़ एकजुट होनी चाहिए। जनता से जुड़े विषयों पर सदन सकारात्मक संवाद का केंद्र बने, सकारात्मक कार्यों के लिए हमारी आवाज़ उतनी ही बुलंद दिखे, इस दिशा में भी हमें निरंतर आगे बढ़ना है। हमारे आचरण से ही हमारे देश की लोकतान्त्रिक परिपक्वता प्रदर्शित होती है। और इसलिए, दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र के साथ साथ हमें दुनिया के सबसे परिपक्व लोकतन्त्र के रूप में भी खुद को आगे बढ़ाना है।

साथियों,

मुझे खुशी है कि आज देश इस दिशा में सकारात्मक बदलाव देख रहा है। मैं अगर संसद की बात करूँ, तो पिछले कुछ वर्षों में संसद में सांसदों की उपस्थिति और संसद की productivity में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है। और विजय जी ने भी विधानसभा का ब्यौरा दिया। सकारात्मकता, गतिशीलता व्यापक रूप से विषयों की चर्चा, निर्णय, उसका पूरा ब्यौरा दिया।

साथियों,

वैसे ही संसद में भी, पिछले बजट सत्र में भी लोकसभा की productivity 129 प्रतिशत थी। राज्यसभा में भी 99 प्रतिशत productivity दर्ज की गई। यानी, देश लगातार नए संकल्पों पर काम कर रहा है, लोकतान्त्रिक विमर्श को आगे बढ़ा रहा है। और हम सभी जानते हैं कि जब लोग ये देखते हैं कि उन्होंने जिन्‍हें चुनकर भेजा है, वो मेहनत कर रहा है, सदन में उनकी बात गंभीरता से रख रहा है, तो उनका भी लोकतंत्र पर विश्वास और बढ़ता है। ये विश्वास बढ़ाना भी हम सब की जिम्मेदारी है।

साथियों,

समय के साथ हमें नए विचारों की जरूरत होती है, नई सोच की जरूरत होती है। इसलिए, जैसे-जैसे लोक बदलता है, लोकतन्त्र को भी नए आयाम जोड़ते रहना पड़ता है। इन बदलावों के लिए हमें केवल नई नीतियों की ही जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि पुरानी नीतियों और पुराने क़ानूनों को भी समय के अनुसार बदलना पड़ता है। बीते वर्षो में संसद ने ऐसे करीब 15 सौ क़ानूनों को खत्म किया है। इन कानूनों से सामान्य मानवी को जो दिक्कतें होतीं थी, देश की प्रगति में जो रुकावट होती थी, उनका समाधान हुआ, और एक नया विश्वास भी पैदा हुआ। राज्य स्तर पर भी ऐसे कई पुराने कानून हैं जो वर्षों से चले आ रहे हैं। हमें मिलकर इस ओर भी ध्यान देने की जरूरत है।

साथियों,

दुनिया के लिए 21वीं सदी भारत की सदी है। हम लगातार ये सुनते आए हैं, कई लोगों के मुंह से सुनते हैं, दुनिया के लोग बताते रहते हैं लेकिन अगर मैं भारत की बात करूं तो मैं ये कहूंगा कि भारत के लिए ये सदी कर्तव्यों की सदी है। हमें इसी सदी में, अगले 25 सालों में नए भारत के स्वर्णिम लक्ष्य तक पहुँचना है। इन लक्ष्यों तक हमें हमारे कर्तव्य ही लेकर जाएंगे। इसलिए, ये 25 साल देश के लिए कर्तव्य पथ पर चलने के साल हैं। ये 25 साल कर्तव्य भावना से स्वयं को समर्पित करने का कालखंड है। हमें स्वयं को अपने लिए, अपने समाज के लिए, अपने देश के लिए कर्तव्य की कसौटी पर कसना होगा। हमें कर्तव्य की पराकाष्ठा को पार करना होगा। आज भारत वैश्विक पटल पर जो कीर्तिमान स्थापित कर रहा है, आज भारत जिस तेजी से वैश्विक ताकत बनकर उभर रहा है, उसके पीछे कोटि-कोटि भारतवासियों की कर्तव्य निष्ठा और कर्तव्य भावना है। लोकतन्त्र में, हमारे सदन, जनता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए, देशवासियों की कर्तव्यनिष्ठा हमारे सदनों और जनप्रतिनिधियों के आचरण में भी झलकनी चाहिए। हम सदन में जैसा आचरण करेंगे, कर्तव्य भाव पर सदन के भीतर जितना बल दिया जाएगा, देशवासियों को भी उतनी ही ऊर्जा और प्रेरणा मिलेगी। एक और महत्वपूर्ण बात, हमें अपने कर्तव्यों को अपने अधिकारों से अलग नहीं मानना चाहिए। हम अपने कर्तव्यों के लिए जितना परिश्रम करेंगे, हमारे अधिकारों को भी उतना ही बल मिलेगा। हमारी कर्तव्य निष्ठा ही हमारे अधिकारों की गारंटी है। इसलिए, हम सभी जनप्रतिनिधियों को कर्तव्य पालन का भी संकल्प दोहराना है। ये संकल्प ही हमारी और हमारे समाज की सफलता का मार्ग प्रशस्त करेंगे। आज जब हम देश के अमृत संकल्पों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं, तो हमें अपने कर्तव्य में, अपने श्रम में, अपने परिश्रम में कोई कमी नहीं छोड़नी है। एक राष्ट्र के रूप हमारी एकता हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। गरीब से गरीब व्यक्ति का भी जीवन आसान बने, दलित, पीड़ित, शोषित, वंचित, आदिवासी, हर किसी को हर जरूरी सुविधा मिले, ये हम सभी का संकल्प होना चाहिए। आज सबको घर, सबको पानी, सबको बिजली, सबको इलाज, जैसे जिन लक्ष्यों को लेकर देश काम कर रहा है, वो हम सबकी सामूहिक ज़िम्मेदारी है। बिहार जैसे सामर्थ्यवान और ऊर्जावान राज्य में गरीब, दलित, पिछड़े, आदिवासी और महिलाओं का उत्थान, बिहार को भी तेज गति से आगे बढ़ा रहा है और बढ़ाएगा। और बिहार जब आगे बढ़ेगा, तो भारत भी अपने स्वर्णिम अतीत को दोहराते हुए विकास और सफलता की नई ऊंचाइयों को छुएगा। इसी कामना के साथ, इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अवसर पर आप सबने मुझे निमंत्रित किया, इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बनने का अवसर दिया, इसके लिए मैं राज्‍य सरकार का, स्पीकर महोदय का और सभी यहां के वरिष्ठजनों का हृदय से बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं। अनेक-अनेक शुभकामनाओं के साथ ये सौ साल की यात्रा आने वाले सौ साल के लिए नई ऊर्जा का केंद्र बने इसी एक अपेक्षा के साथ बहुत बहुत धन्यवाद! बहुत-बहुत शुभकामनाएं!

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भारत-UK कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक ट्रेड एग्रीमेंट को प्रधानमंत्री ने द्विपक्षीय संबंधों के लिए ऐतिहासिक माइलस्टोन बताया
June 17, 2026

The Prime Minister, Shri Narendra Modi, has expressed delight that the India-UK Comprehensive Economic and Trade Agreement will enter into force on 15 July 2026.

The Prime Minister said that the agreement will significantly boost bilateral trade and investment.

Shri Modi stated that the agreement will unlock numerous opportunities for Indian farmers, workers, MSMEs, startups and innovators and contribute meaningfully to the realisation of Viksit Bharat 2047.

The Prime Minister noted that both he and UK Prime Minister Keir Starmer, who are in Evian for the G7 Summit, are very happy with the significant momentum being added to India-UK economic ties.

The Prime Minister wrote on X;

“A historic milestone for India-UK relations.

Delighted to note that the India-UK Comprehensive Economic and Trade Agreement will enter into force on 15th July 2026.

This agreement will significantly boost our bilateral trade and investment.

It will also unlock numerous opportunities for Indian farmers, workers, MSMEs, startups and innovators and contribute meaningfully to the realisation of Viksit Bharat 2047.

Both PM Starmer and I, who are in Evian for the G7 Summit, are naturally very happy with the significant momentum being added to our economic ties.

@Keir_Starmer”