मेरे प्यारे किसान भाइयो और बहनो, आप सबको नमस्कार!

ये मेरा सौभाग्य है कि आज मुझे देश के दूर सुदूर गाँव में रहने वाले मेरे किसान भाइयों और बहनों से बात करने का अवसर मिला है। और जब मैं किसान से बात करता हूँ तो एक प्रकार से मैं गाँव से बात करता हूँ, गाँव वालों से बात करता हूँ, खेत मजदूर से भी बात कर रहा हूँ। उन खेत में काम करने वाली माताओं बहनों से भी बात कर रहा हूँ। और इस अर्थ में मैं कहूं तो अब तक की मेरी सभी मन की बातें जो हुई हैं, उससे शायद एक कुछ एक अलग प्रकार का अनुभव है।

जब मैंने किसानों के साथ मन की बात करने के लिए सोचा, तो मुझे कल्पना नहीं थी कि दूर दूर गावों में बसने वाले लोग मुझे इतने सारे सवाल पूछेंगे, इतनी सारी जानकारियां देंगे, आपके ढेर सारे पत्र, ढेर सारे सवाल, ये देखकर के मैं हैरान हो गया। आप कितने जागरूक हैं, आप कितने सक्रिय हैं, और शायद आप तड़पते हैं कि कोई आपको सुने। मैं सबसे पहले आपको प्रणाम करता हूँ कि आपकी चिट्ठियाँ पढ़कर के उसमें दर्द जो मैंने देखा है, जो मुसीबतें देखी हैं, इतना सहन करने के बावजूद भी, पता नहीं क्या-क्या आपने झेला होगा।

आपने मुझे तो चौंका दिया है, लेकिन मैं इस मन की बात का, मेरे लिए एक प्रशिक्षण का, एक एजुकेशन का अवसर मानता हूँ। और मेरे किसान भाइयो और बहनो, मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, कि आपने जितनी बातें उठाई हैं, जितने सवाल पूछे हैं, जितने भिन्न-भिन्न पहलुओं पर आपने बातें की हैं, मैं उन सबके विषय में, पूरी सरकार में जागरूकता लाऊँगा, संवेदना लाऊँगा, मेरा गाँव, मेरा गरीब, मेरा किसान भाई, ऐसी स्थिति में उसको रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। मैं तो हैरान हूँ, किसानों ने खेती से संबधित तो बातें लिखीं हैं। लेकिन, और भी कई विषय उन्होंने कहे हैं, गाँव के दबंगों से कितनी परेशानियाँ हैं, माफियाओं से कितनी परेशानियाँ हैं, उसकी भी चर्चा की है, प्राकृतिक आपदा से आने वाली मुसीबतें तो ठीक हैं, लेकिन आस-पास के छोटे मोटे व्यापारियों से भी मुसीबतें झेलनी पड़ रही हैं।

किसी ने गाँव में गन्दा पानी पीना पड़ रहा है उसकी चर्चा की है, किसी ने गाँव में अपने पशुओं को रखने के लिए व्यवस्था की चिंता की है, किसी ने यहाँ तक कहा है कि पशु मर जाता है तो उसको हटाने का ही कोई प्रबंध नहीं होता, बीमारी फैल जाती है। यानि कितनी उपेक्षा हुई है, और आज मन की बात से शासन में बैठे हुए लोगों को एक कड़ा सन्देश इससे मिल रहा है। हमें राज करने का अधिकार तब है जब हम इन छोटी छोटी बातों को भी ध्यान दें। ये सब पढ़ कर के तो मुझे कभी कभी शर्मिन्दगी महसूस होती थी, कि हम लोगों ने क्या किया है! मेरे पास जवाब नहीं है, क्या किया है? हाँ, मेरे दिल को आपकी बातें छू गयी हैं। मैं जरूर बदलाव के लिए, प्रामाणिकता से प्रयास करूंगा, और उसके सभी पहलुओं पर सरकार को, जगाऊँगा, चेताऊंगा, दौडाऊंगा, मेरी कोशिश रहेगी, ये मैं विश्वास दिलाता हूँ।

मैं ये भी जानता हूँ कि पिछले वर्ष बारिश कम हुई तो परेशानी तो थी ही थी। इस बार बेमौसमी बरसात हो गयी, ओले गिरे, एक प्रकार से महाराष्ट्र से ऊपर, सभी राज्यों में, ये मुसीबत आयी। और हर कोने में किसान परेशान हो गया। छोटा किसान जो बेचारा, इतनी कड़ी मेहनत करके साल भर अपनी जिन्दगी गुजारा करता है, उसका तो सब कुछ तबाह हो गया है। मैं इस संकट की घड़ी में आपके साथ हूँ। सरकार के मेरे सभी विभाग राज्यों के संपर्क में रह करके स्थिति का बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं, मेरे मंत्री भी निकले हैं, हर राज्य की स्थिति का जायजा लेंगे, राज्य सरकारों को भी मैंने कहा है कि केंद्र और राज्य मिल करके, इन मुसीबत में फंसे हुए सभी किसान भाइयों-बहनों को जितनी ज्यादा मदद कर सकते हैं, करें। में आपको विश्वास दिलाता हूँ कि सरकार पूरी संवेदना के साथ, आपकी इस संकट की घड़ी में, आपको पूरी तत्परता से मदद करेगी। जितना हो सकता है, उसको पूरा करने का प्रयास किया जायेगा।

गाँव के लोगों ने, किसानों ने कई मुददे उठाये हैं। सिंचाई की चिंता व्यापक नजर आती है। गाँव में सड़क नहीं है उसका भी आक्रोश है। खाद की कीमतें बढ़ रही हैं, उस पर भी किसान की नाराजगी है। बिजली नहीं मिल रही है। किसानों को यह भी चिंता है कि बच्चों को पढ़ाना है, अच्छी नौकरी मिले ये भी उनकी इच्छा है, उसकी भी शिकायतें हैं। माताओं बहनों की भी, गाँव में कहीं नशा-खोरी हो रही है उस पर अपना आक्रोश जताया है। कुछ ने तो अपने पति को तम्बाकू खाने की आदत है उस पर भी अपना रोष मुझे व्यक्त करके भेजा है। आपके दर्द को मैं समझ सकता हूँ। किसान का ये भी कहना है की सरकार की योजनायें तो बहुत सुनने को मिलती हैं, लेकिन हम तक पहुँचती नहीं हैं। किसान ये भी कहता है कि हम इतनी मेहनत करते हैं, लोगों का तो पेट भरते हैं लेकिन हमारा जेब नहीं भरता है, हमें पूरा पैसा नहीं मिलता है। जब माल बेचने जाते हैं, तो लेने वाला नहीं होता है। कम दाम में बेच देना पड़ता है। ज्यादा पैदावार करें तो भी मरते हैं, कम पैदावार करें तो भी मरते हैं। यानि किसानों ने अपने मन की बात मेरे सामने रखी है। मैं मेरे किसान भाइयों-बहनों को विश्वास दिलाता हूँ, कि मैं राज्य सरकारों को भी, और भारत सरकार के भी हमारे सभी विभागों को भी और अधिक सक्रिय करूंगा। तेज गति से इन समस्याओं के समाधान के रास्ते खोजने के लिए प्रेरित करूँगा। मुझे लग रहा है कि आपका धैर्य कम हो रहा है। बहुत स्वाभाविक है, साठ साल आपने इन्तजार किया है, मैं प्रामाणिकता से प्रयास करूँगा।

किसान भाइयो, ये आपके ढेर सारे सवालों के बीच में, मैंने देखा है कि करीब–करीब सभी राज्यों से वर्तमान जो भूमि अधिग्रहण बिल की चर्चा है, उसका प्रभाव ज्यादा दिखता है, और मैं हैरान हूँ कि कैसे-कैसे भ्रम फैलाए गए हैं। अच्छा हुआ, आपने छोटे–छोटे सवाल मुझे पूछे हैं। मैं कोशिश करूंगा कि सत्य आप तक पहुचाऊं। आप जानते हैं भूमि-अधिग्रहण का कानून 120 साल पहले आया था। देश आज़ाद होने के बाद भी 60-65 साल वही कानून चला और जो लोग आज किसानों के हमदर्द बन कर के आंदोलन चला रहे हैं, उन्होंने भी इसी कानून के तहत देश को चलाया, राज किया और किसानों का जो होना था हुआ। सब लोग मानते थे कि कानून में परिवर्तन होना चाहिए, हम भी मानते थे। हम विपक्ष में थे, हम भी मानते थे।

2013 में बहुत आनन-फानन के साथ एक नया कानून लाया गया। हमने भी उस समय कंधे से कन्धा मिलाकर के साथ दिया। किसान का भला होता है, तो साथ कौन नहीं देगा, हमने भी दिया। लेकिन कानून लागू होने के बाद, कुछ बातें हमारे ज़हन में आयीं। हमें लगा शायद इसके साथ तो हम किसान के साथ धोखा कर रहे हैं। हमें किसान के साथ धोखा करने का अधिकार नहीं है। दूसरी तरफ जब हमारी सरकार बनी, तब राज्यों की तरफ से बहुत बड़ी आवाज़ उठी। इस कानून को बदलना चाहिए, कानून में सुधार करना चाहिए, कानून में कुछ कमियां हैं, उसको पूरा करना चाहिए। दूसरी तरफ हमने देखा कि एक साल हो गया, कोई कानून लागू करने को तैयार ही नहीं कोई राज्य और लागू किया तो उन्होंने क्या किया? महाराष्ट्र सरकार ने लागू किया था, हरियाणा ने किया था जहां पर कांग्रेस की सरकारें थीं और जो किसान हितैषी होने का दावा करते हैं उन्होंने इस अध्यादेश में जो मुआवजा देने का तय किया था उसे आधा कर दिया। अब ये है किसानों के साथ न्याय? तो ये सारी बातें देख कर के हमें भी लगा कि भई इसका थोडा पुनर्विचार होना ज़रूरी है। आनन–फानन में कुछ कमियां रह जाती हैं। शायद इरादा ग़लत न हो, लेकिन कमियाँ हैं, तो उसको तो ठीक करनी चाहिए।…और हमारा कोई आरोप नहीं है कि पुरानी सरकार क्या चाहती थी, क्या नहीं चाहती थी? हमारा इरादा यही है कि किसानों का भला हो, किसानों की संतानों का भी भला हो, गाँव का भी भला हो और इसीलिए कानून में अगर कोई कमियां हैं, तो दूर करनी चाहिए। तो हमारा एक प्रामाणिक प्रयास कमियों को दूर करना है।

अब एक सबसे बड़ी कमी मैं बताऊँ, आपको भी जानकर के हैरानी होगी कि जितने लोग किसान हितैषी बन कर के इतनी बड़ी भाषणबाज़ी कर रहें हैं, एक जवाब नहीं दे रहे हैं। आपको मालूम है, अलग-अलग प्रकार के हिंदुस्तान में 13 कानून ऐसे हैं जिसमें सबसे ज्यादा जमीन संपादित की जाती है, जैसे रेलवे, नेशनल हाईवे, खदान के काम। आपको मालूम है, पिछली सरकार के कानून में इन 13 चीज़ों को बाहर रखा गया है। बाहर रखने का मतलब ये है कि इन 13 प्रकार के कामों के लिए जो कि सबसे ज्यादा जमीन ली जाती है, उसमें किसानों को वही मुआवजा मिलेगा जो पहले वाले कानून से मिलता था। मुझे बताइए, ये कमी थी कि नहीं? ग़लती थी कि नहीं? हमने इसको ठीक किया और हमने कहा कि भई इन 13 में भी भले सरकार को जमीन लेने कि हो, भले रेलवे के लिए हो, भले हाईवे बनाने के लिए हो, लेकिन उसका मुआवजा भी किसान को चार गुना तक मिलना चाहिए। हमने सुधार किया। कोई मुझे कहे, क्या ये सुधार किसान विरोधी है क्या? हमें इसीलिए तो अध्यादेश लाना पड़ा। अगर हम अध्यादेश न लाते तो किसान की तो जमीन वो पुराने वाले कानून से जाती रहती, उसको कोई पैसा नहीं मिलता। जब ये कानून बना तब भी सरकार में बैठे लोगों में कईयों ने इसका विरोधी स्वर निकला था। स्वयं जो कानून बनाने वाले लोग थे, जब कानून का रूप बना, तो उन्होंने तो बड़े नाराज हो कर के कह दिया, कि ये कानून न किसानों की भलाई के लिए है, न गाँव की भलाई के लिए है, न देश की भलाई के लिए है। ये कानून तो सिर्फ अफसरों कि तिजोरी भरने के लिए है, अफसरों को मौज करने के लिए, अफ़सरशाही को बढ़ावा देने के लिए है। यहाँ तक कहा गया था। अगर ये सब सच्चाई थी तो क्या सुधार होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए? ..और इसलिए हमने कमियों को दूर कर के किसानों का भला करने कि दिशा में प्रयास किये हैं। सबसे पहले हमने काम किया, 13 कानून जो कि भूमि अधिग्रहण कानून के बाहर थे और जिसके कारण किसान को सबसे ज्यादा नुकसान होने वाला था, उसको हम इस नए कानून के दायरे में ले आये ताकि किसान को पूरा मुआवजा मिले और उसको सारे हक़ प्राप्त हों। अब एक हवा ऐसी फैलाई गई कि मोदी ऐसा कानून ला रहें हैं कि किसानों को अब मुआवजा पूरा नहीं मिलेगा, कम मिलेगा।

मेरे किसान भाइयो-बहनो, मैं ऐसा पाप सोच भी नहीं सकता हूँ। 2013 के पिछली सरकार के समय बने कानून में जो मुआवजा तय हुआ है, उस में रत्ती भर भी फर्क नहीं किया गया है। चार गुना मुआवजा तक की बात को हमने स्वीकारा हुआ है। इतना ही नहीं, जो तेरह योजनाओं में नहीं था, उसको भी हमने जोड़ दिया है। इतना ही नहीं, शहरीकरण के लिए जो भूमि का अधिग्रहण होगा, उसमें विकसित भूमि, बीस प्रतिशत उस भूमि मालिक को मिलेगी ताकि उसको आर्थिक रूप से हमेशा लाभ मिले, ये भी हमने जारी रखा है। परिवार के युवक को नौकरी मिले। खेत मजदूर की संतान को भी नौकरी मिलनी चाहिए, ये भी हमने जारी रखा है। इतना ही नहीं, हमने तो एक नयी चीज़ जोड़ी है। नयी चीज़ ये जोड़ी है, जिला के जो अधिकारी हैं, उसको इसने घोषित करना पड़ेगा कि उसमें नौकरी किसको मिलेगी, किसमें नौकरी मिलेगी, कहाँ पर काम मिलेगा, ये सरकार को लिखित रूप से घोषित करना पड़ेगा। ये नयी चीज़ हमने जोड़ करके सरकार कि जिम्मेवारी को Fix किया है।

मेरे किसान भाइयो-बहनो, हम इस बात पर agree हैं, कि सबसे पहले सरकारी जमीन का उपयोग हो। उसके बाद बंजर भूमि का उपयोग हो, फिर आखिर में अनिवार्य हो तब जाकर के उपजाऊ जमीन को हाथ लगाया जाये, और इसीलिए बंजर भूमि का तुरंत सर्वे करने के लिए भी कहा गया है, जिसके कारण वो पहली priority वो बने।

एक हमारे किसानों की शिकायत सही है कि आवश्यकता से अधिक जमीन हड़प ली जाती है। इस नए कानून के माध्यम से मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि अब जमीन कितनी लेनी, उसकी पहले जांच पड़ताल होगी, उसके बाद तय होगा कि आवश्यकता से अधिक जमीन हड़प न की जाए। कभी-कभी तो कुछ होने वाला है, कुछ होने वाला है, इसकी चिंता में बहुत नुकसान होता है। ये Social Impact Assessment (SIA) के नाम पर अगर प्रक्रिया सालों तक चलती रहे, सुनवाई चलती रहे, मुझे बताइए, ऐसी स्थिति में कोई किसान अपने फैसले कर पायेगा? फसल बोनी है तो वो सोचेगा नहीं-नहीं यार, पता नहीं, वो निर्णय आ जाएगा तो, क्या करूँगा? और उसके 2-2, 4-4, साल खराब हो जाएगा और अफसरशाही में चीजें फसी रहेंगी। प्रक्रियाएं लम्बी, जटिल और एक प्रकार से किसान बेचारा अफसरों के पैर पकड़ने जाने के लिए मजबूर हो जाएगा कि साहब ये लिखो, ये मत लिखों, वो लिखो, वो मत लिखो, ये सब होने वाला है। क्या मैं मेरे अपने किसानों को इस अफसरसाही के चुंगल में फिर एक बार फ़सा दूं? मुझे लगता है वो ठीक नहीं होगा। प्रक्रिया लम्बी थी, जटिल थी। उसको सरल करने का मैंने प्रयास किया है।

मेरे किसान भाइयो-बहनो 2014 में कानून बना है, लेकिन राज्यों ने उसको स्वीकार नहीं किया है। किसान तो वहीं का वहीं रह गया। राज्यों ने विरोध किया। मुझे बताइए क्या मैं राज्यों की बात सुनूं या न सुनूं? क्या मैं राज्यों पर भरोसा करूँ या न करूँ? इतना बड़ा देश, राज्यों पर अविश्वास करके चल सकता है क्या? और इसलिए मेरा मत है कि हमें राज्यों पर भरोसा करना चाहिये, भारत सरकार में विशेष करना चाहिये तो, एक तो मैं भरोसा करना चाहता हूँ, दूसरी बात है, ये जो कानून में सुधार हम कर रहे हैं, कमियाँ दूर कर रहे हैं, किसान की भलाई के लिए जो हम कदम उठा रहे हैं, उसके बावजूद भी अगर किसी राज्य को ये नहीं मानना है, तो वे स्वतंत्र हैं और इसलिए मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि ये जो सारे भ्रम फैलाए जा रहे हैं, वो सरासर किसान विरोधी के भ्रम हैं। किसान को गरीब रखने के षड्यन्त्र का ही हिस्सा हैं। देश को आगे न ले जाने के जो षडयंत्र चले हैं उसी का हिस्सा है। उससे बचना है, देश को भी बचाना है, किसान को भी बचाना है।

अब गाँव में भी किसान को पूछो कि भाई तीन बेटे हैं बताओ क्या सोच रहे हो? तो वो कहता है कि भाई एक बेटा तो खेती करेगा, लेकिन दो को कहीं-कहीं नौकरी में लगाना है। अब गाँव के किसान के बेटों को भी नौकरी चाहिये। उसको भी तो कहीं जाकर रोजगार कमाना है। तो उसके लिए क्या व्यवस्था करनी पड़ेगी। तो हमने सोचा कि जो गाँव की भलाई के लिए आवश्यक है, किसान की भलाई के लिये आवश्यक है, किसान के बच्चों के रोजगार के लिए आवश्यक है, ऐसी कई चीजों को जोड़ दिया जाए। उसी प्रकार से हम तो जय-जवान, जय-किसान वाले हैं। जय-जवान का मतलब है देश की रक्षा। देश की रक्षा के विषय में हिंदुस्तान का किसान कभी पीछे हटता नहीं है। अगर सुरक्षा के क्षेत्र में कोई आवश्कता हो तो वह जमीन किसानों से मांगनी पड़ेगी।..और मुझे विश्वास है, वो किसान देगा। तो हमने इन कामों के लिए जमीन लेने की बात को इसमें जोड़ा है। कोई भी मुझे गाँव का आदमी बताए कि गाँव में सड़क चाहिये कि नहीं चाहिये। अगर खेत में पानी चाहिये तो नहर करनी पड़ेगी कि नहीं करनी पड़ेगी। गाँव में आज भी गरीब हैं, जिसके पास रहने को घर नहीं है। घर बनाने के लिए जमीन चाहिये की नहीं चाहिये? कोई मुझे बताये कि यह उद्योगपतियों के लिए है क्या? यह धन्ना सेठों के लिए है क्या? सत्य को समझने की कोशिश कीजिये।

हाँ, मैं एक डंके की चोट पर आपको कहना चाहता हूँ, नए अध्यादेश में भी, कोई भी निजी उद्योगकार को, निजी कारखाने वाले को, निजी व्यवसाय करने वाले को, जमीन अधिग्रहण करने के समय 2013 में जो कानून बना था, जितने नियम हैं, वो सारे नियम उनको लागू होंगे। यह कॉर्पोरेट के लिए कानून 2013 के वैसे के वैसे लागू रहने वाले हैं। तो फिर यह झूठ क्यों फैलाया जाता है। मेरे किसान भाइयो-बहनो, एक भ्रम फैलाया जाता है कि आपको कानूनी हक नहीं मिलेगा, आप कोर्ट में नहीं जा सकते, ये सरासर झूठ है। हिंदुस्तान में कोई भी सरकार आपके कानूनी हक़ को छीन नहीं सकती है। बाबा साहेब अम्बेडकर ने हमें जो संविधान दिया है, इस संविधान के तहत आप हिंदुस्तान के किसी भी कोर्ट में जा करके दरवाजे खटखटा सकते हैं। तो ये झूठ फैलाया गया है। हाँ, हमने एक व्यवस्था को आपके दरवाजे तक लाने का प्रयास किया है।

एक Authority बनायी है, अब वो Authority जिले तक काम करेगी और आपके जिले के किसानों की समस्याओं का समाधान उसी Authority में जिले में ही हो जायेगा।..और वहां अगर आपको संतोष नहीं होता तो आप ऊपर के कोर्ट में जा सकते हैं। तो ये व्यवस्था हमने की है।

एक यह भी बताया जाता है कि भूमि अधिग्रहित की गयी तो वो पांच साल में वापिस करने वाले कानून को हटा दिया गया है। जी नहीं, मेरे किसान भाइयो-बहनो हमने कहा है कि जब भी Project बनाओगे, तो यह पक्का करो कि कितने सालों में आप इसको पूरा करोगे। और उस सालों में अगर पूरा नहीं करते हैं तो वही होगा जो किसान चाहेगा। और उसको तो समय-सीमा हमने बाँध दी है। आज क्या होता है, 40-40 साल पहले जमीने ली गयी, लेकिन अभी तक सरकार ने कुछ किया नहीं। तो यह तो नहीं चल सकता। तो हमने सरकार को सीमा में बांधना तय किया है। हाँ, कुछ Projects ऐसे होते हैं जो 20 साल में पूरे होते हैं, अगर मान लीजिये 500 किलोमीटर लम्बी रेलवे लाइन डालनी है, तो समय जाएगा। तो पहले से कागज़ पर लिखो कि भाई कितने समय में पूरा करोगे। तो हमने सरकार को बाँधा है। सरकार की जिम्मेवारी को Fix किया है।

मैं और एक बात बताऊं किसान-भाइयो, कभी-कभी ये एयरकंडीशन कमरे में बैठ करके जो कानून बनाते हैं न, उनको गाँव के लोगों की सच्ची स्थिति का पता तक नहीं होता है। अब आप देखिये जब डैम बनता है, जलाशय बनता है, तो उसका नियम यह है कि 100 साल में सबसे ज्यादा पानी की सम्भावना हो उस हिसाब से जमीन प्राप्त करने का नियम है। अब 100 साल में एक बार पानी भरता है। 99 साल तक पानी नहीं भरता है। फिर भी जमीन सरकार के पास चली जाती है, तो आज सभी राज्यों में क्या हो रहा है की भले जमीन कागज़ पर ले ली हो, पैसे भी दे दिए हों। लेकिन फिर भी वो जमीन पर किसान खेती करता है। क्योंकि 100 साल में एक बार जब पानी भर जाएगा तो एक साल के लिए वो हट जाएगा। ये नया कानून 2013 का ऐसा था कि आप खेती नहीं कर सकते थे। हम चाहते हैं कि अगर जमीन डूब में नहीं जाती है तो फिर किसान को खेती करने का अवसर मिलना चाहिये।..और इसीलिये वो जमीन किसान से कब्ज़ा नहीं करनी चाहिये। ये लचीलापन आवश्यक था। ताकि किसान को जमीन देने के बावजूद भी जमीन का लाभ मिलता रहे और जमीन देने के बदले में रुपया भी मिलता रहे। तो किसान को डबल फायदा हो। ये व्यवस्था करना भी जरूरी है, और व्यावहारिक व्यवस्था है, और उस व्यावहारिक व्यवस्था को हमने सोचा है।

एक भ्रम ऐसा फैलाया जाता है कि ‘सहमति’ की जरुरत नहीं हैं। मेरे किसान भाइयो-बहनो ये राजनीतिक कारणों से जो बाते की जाती हैं, मेहरबानी करके उससे बचिये! 2013 में जो कानून बना उसमे भी सरकार नें जिन योजनाओं के लिए जमीन माँगी है, उसमें सहमती का क़ानून नहीं है।...और इसीलिए सहमति के नाम पर लोगों को भ्रमित किया जाता है। सरकार के लिए सहमति की बात पहले भी नही थी, आज भी नहीं है।..और इसीलिये मेरे किसान भाइयों-बहनो पहले बहुत अच्छा था और हमने बुरा कर दिया, ये बिलकुल सरासर आपको गुमराह करने का दुर्भाग्यपूर्ण प्रयास है। मैं आज भी कहता हूँ कि निजी उद्योग के लिए, कॉर्पोरेट के लिए, प्राइवेट कारखानों के लिए ये ‘सहमति’ का कानून चालू है, है...है।

...और एक बात मैं कहना चाहता हूँ, कुछ लोग कहतें है, PPP मॉडल! मेरे किसान भाइयो-बहनो, मान लीजिये 100 करोड रुपए का एक रोड बनाना है। क्या रोड किसी उद्योगकार उठा कर ले जाने वाला है क्या? रोड तो सरकार के मालिकी का ही रहता है। जमीन सरकार की मालिकी की ही रहती है। बनाने वाला दूसरा होता है। बनाने वाला इसीलिए दूसरा होता है, क्योंकि सरकार के पास आज पैसे नहीं होते हैं। क्योंकि सरकार चाहती है कि गाँव में स्कूल बने, गाँव में हॉस्पिटल बने, गरीब का बच्चा पढ़े, इसके लिए पैसा लगे। रोड बनाने का काम प्राइवेट करे, लेकिन वो प्राइवेट वाला भी रोड अपना नहीं बनाता है। न अपने घर ले जाता है, रोड सरकार का बनाता है। एक प्रकार से अपनी पूंजी लगता है। इसका मतलब ये हुआ कि सरकार का जो प्रोजेक्ट होगा जिसमें पूंजी किसी की भी लगे, जिसको लोग PPP मॉडल कहतें हैं। लेकिन अगर उसका मालिकाना हक़ सरकार का रहता है, उसका स्वामित्व सरकार का रहता है, सरकार का मतलब आप सबका रहता है, देश की सवा सौ करोड़ जनता का रहता है तो उसमें ही हमने ये कहा है कि सहमति की आवश्यकता नहीं है और इसीलिये ये PPP मॉडल को लेकर के जो भ्रम फैलाये जातें हैं उसकी मुझे आपको स्पष्टता करना बहुत ही जरुरी है।

कभी-कभार हम जिन बातों के लिए कह रहे हैं कि भई उसमें ‘सहमति’ की प्रक्रिया एक प्रकार से अफसरशाही और तानाशाही को बल देगी। आप मुझे बताईये, एक गावं है, उस गॉव तक रोड बन गया है, अब दूसरे गॉव के लिए रोड बनाना है, आगे वाले गॉव के लिए, 5 किलोमीटर की दूरी पर वह गॉव है। इस गॉव तक रोड बन गया है, लेकिन इन गॉव वालों की ज़मीन उस गॉव की तरफ है। मुझे बताईये उस गॉव के लोगों के लिए, रोड बनाने के लिए, ये गॉव वाले ज़मीन देंगे क्या? क्या ‘सहमति’ देंगे क्या? तो क्या पीछे जो गॉव है उसका क्या गुनाह है भई? उसको रोड मिलना चाहिए कि नहीं, मिलना चाहिये? उसी प्रकार से मैं नहर बना रहा हूँ। इस गॉव वालो को पानी मिल गया, नहर बन गयी। लेकिन आगे वाले गॉव को पानी पहुंचाना है तो ज़मीन तो इसी गावंवालों के बीच में पड़ती है। तो वो तो कह देंगे कि भई नहीं, हम तो ज़मीन नहीं देंगे। हमें तो पानी मिल गया है। तो आगे वाले गावं को नहर मिलनी चाहिए कि नहीं मिलनी चाहिए?

मेरे भाइयो-बहनो, ये व्यावहारिक विषय है। और इसलिए जिस काम के लिए इतनी लम्बी प्रक्रिया न हो, हक और किसान के लिए, ये उद्योग के लिए नहीं है, व्यापार के लिए नहीं है, गावं की भलाई के लिए है, किसान की भलाई के लिए है, उसके बच्चों की भलाई के लिए है।

एक और बात आ रही है। ये बात मैंने पहले भी कही है। हर घर में किसान चाहता है कि एक बेटा भले खेती में रहे, लेकिन बाकी सब संतान रोज़ी–रोटी कमाने के लिए बाहर जाये क्योंकि उसे मालूम है, कि आज समय की मांग है कि घर में घर चलाने के लिए अलग-अलग प्रयास करने पड़ते हैं। अगर हम कोई रोड बनाते है और रोड के बगल में सरकार Industrial Corridor बनाती है, प्राइवेट नहीं। मैं एक बार फिर कहता हूँ प्राइवेट नहीं, पूंजीपति नहीं, धन्ना सेठ नहीं, सरकार बनाती है ताकि जब Corridor बनता है पचास किलोमीटर लम्बा, 100 किलोमीटर लम्बा तो जो रोड बनेगा, रोड के एक किलोमीटर बाएं, एक किलोमीटर दायें वहां पर अगर सरकार Corridor बनाती है ताकि नजदीक में जितने गाँव आयेंगे 50 गाँव, 100 गाँव, 200 गाँव उनको वहां कोई न कोई, वहां रोजी रोटी का अवसर मिल जाए, उनके बच्चों को रोजगार मिल जाए।

मुझे बताइये, भाइयों-बहनो क्या हम चाहतें हैं, कि हमारे गाँव के किसानों के बच्चे दिल्ली और मुंबई की झुग्गी झोपड़ियों में जिन्दगी बसर करने के लिए मजबूर हो जाएँ? क्या उनके घर और गाँव के 20-25 किलोमीटर की दूरी पर एक छोटा सा भी कारखाना लग जाता है और उसको रोजगार मिल जाता है, तो मिलना चाहिये की नहीं मिलना चाहिये? और ये Corridor प्राइवेट नही है, ये सरकार बनाएगी। सरकार बनाकर के उस इलाके के लोगों को रोजगार देने का प्रबंध करेगी। ..और इसीलिए जिसकी मालिकी सरकार की है, और जो गाँव की भलाई के लिए है, गाँव के किसानो की भलाई के लिए है, जो किसानों की भावी पीड़ी की भलाई के लिए हैं, जो गाँव के गरीबों की भलाई के लिए हैं, जो गाँव के किसान को बिजली पानी मोहैया कराने के लिए उनके लिए हैं, उनके लिए इस भूमि अधिग्रहण बिल में कमियाँ थी, उस कमियों को दूर करने का हमारे प्रामाणिक प्रयास हैं।...और फिर भी मैंने Parliament में कहा था की अभी भी किसी को लगता है कोई कमी हैं, तो हम उसको सुधार करने के लिए तैयार हैं।

जब हमने लोकसभा में रखा, कुछ किसान नेताओं ने आ करके दो चार बातें बताईं, हमने जोड़ दी। हम तो अभी भी कहतें कि भाई भूमि अधिग्रहण किसानों की भलाई के लिए ही होना चाहिये। ..और ये हमारी प्रतिबद्धता है, जितने झूठ फैलाये जाते हैं, कृपा करके मैं मेरे किसान भाइयों से आग्रह करता हूँ कि आप इन झूठ के सहारे निर्णय मत करें, भ्रमित होने की जरुरत नहीं है। आवश्यकता यह है की हमारा किसान ताकतवर कैसे बने, हमारा गाँव ताकतवर कैसे बने, हमारा किसान जो मेहनत करता है, उसको सही पैसे कैसे मिले, उसको अच्छा बाज़ार कैसे मिले, जो पैदा करता है उसके रखरखाव के लिए अच्छा स्टोरेज कैसे मिले, हमारी कोशिश है कि गाँव की भलाई, किसान की भलाई के लिए सही दिशा में काम उठाएं।

मेरे किसान भाइयो-बहनो, हमारी कोशिश है कि देश ऐसे आगे बढ़े कि आपकी जमीन पर पैदावार बढ़े, और इसीलिए हमने कोशिश की है, Soil Health Card. जैसे मनुष्य बीमार हो जाता है तो उसकी तबीयत के लिए लेबोरेटरी में टेस्ट होता हैं। जैसा इंसान का होता है न, वैसा अपनी भारत-माता का भी होता हैं, अपनी धरती- माता का भी होता है। और इसीलिए हम आपकी धरती बचे इतना ही नहीं, आपकी धरती तन्दुरूस्त हो उसकी भी चिंता कर रहे हैं।

....और इसलिये भूमि अधिग्रहण नहीं, आपकी भूमि अधिक ताकतवर बने ये भी हमारा काम है। और इसीलिए “Soil Health Card” की बात लेकर के आये हैं। हर किसान को इसका लाभ मिलने वाला है, आपके उर्वरक का जो फालतू खर्चा होता है उससे बच जाएगा। आपकी फसल बढ़ेगी। आपको फसल का पूरा पैसा मिले, उसके लिए भी तो अच्छी मंडियां हों, अच्छी कानून व्यवस्था हो, किसान का शोषण न हो, उस पर हम काम कर रहे हैं और आप देखना मेरे किसान भाइयो, मुझे याद है, मैं जब गुजरात में मुख्यमंत्री था इस दिशा में मैंने बहुत काम किया था। हमारे गुजरात में तो किसान की हालत बहुत ख़राब थी, लेकिन पानी पर काम किया, बहुत बड़ा परिवर्तन आया। गुजरात के विकास में किसान का बहुत बड़ा योगदान बन गया जो कभी सोच नही सकता था। गाँव के गाँव खाली हो जाते थे। बदलाव आया, हम पूरे देश में ये बदलाव चाहते हैं जिसके कारण हमारा किसान सुखी हो।

...और इसलिए मेरे किसान भाइयो और बहनो, आज मुझे आपके साथ बात करने का मौका मिला। लेकिन इन दिनों अध्यादेश की चर्चा ज्यादा होने के कारण मैंने ज़रा ज्यादा समय उसके लिए ले लिया। लेकिन मेरे किसान भाइयो बहनो मैं प्रयास करूंगा, फिर एक बार कभी न कभी आपके साथ दुबारा बात करूंगा, और विषयों की चर्चा करूँगा, लेकिन मैं इतना विश्वास दिलाता हूँ कि आपने जो मुझे लिख करके भेजा है, पूरी सरकार को मैं हिलाऊँगा, सरकार को लगाऊंगा कि क्या हो रहा है। अच्छा हुआ आपने जी भरके बहुत सी चीजें बतायी हैं और मैं मानता हूँ आपका मुझ पर भरोसा है, तभी तो बताई है न! मैं ये भरोसे को टूटने नहीं दूंगा, ये मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ।

आपका प्यार बना रहे, आपके आशीर्वाद बने रहे। और आप तो जगत के तात हैं, वो कभी किसी का बुरा सोचता, वो तो खुद का नुकसान करके भी देश का भला करता है। ये उसकी परंपरा रही है। उस किसान का नुकसान न हो, इसकी चिंता ये सरकार करेगी। ये मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ लेकिन आज मेरी मन की बातें सुनने के बाद आपके मन में बहुत से विचार और आ सकते हैं। आप जरुर मुझे आकाशवाणी के पते पर लिखिये। मैं आगे फिर कभी बातें करूँगा। या आपके पत्रों के आधार पर सरकार में जो गलतियाँ जो ठीक करनी होंगी तो गलतियाँ ठीक करूँगा। काम में तेजी लाने की जरुरत है, तो तेजी लाऊंगा और और किसी को अन्याय हो रहा है तो न्याय दिलाने के लिए पूरा प्रयास करूँगा।

नवरात्रि का पावन पर्व चल रहा है। मेरी आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

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आज सम्पूर्ण भारत, सम्पूर्ण विश्व राममय है: अयोध्या में ध्वजारोहण उत्सव में पीएम मोदी

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Text of PM’s address at the News18 Rising Bharat Summit
February 27, 2026
Developed nations are eager to sign trade deals with India because a confident India is rising beyond doubt and despair: PM
In the last 11 years, a new energy has flowed into the nation's consciousness, India is determined to regain its rightful strength: PM
India's Digital Public Infrastructure has today become a subject of global discussion: PM
Today, every move India makes is closely watched and analysed across the world, the AI Summit is a clear example of this: PM
Nation-building never happens through short-term thinking; It is shaped by a long-term vision, patience and timely decisions: PM

इजराइल की हवा यहाँ भी पहुँच गई है।

नमस्कार!

नेटवर्क 18 के सभी पत्रकार, इस व्यवस्था को देखने वाले सभी साथी, यहां उपस्थित सभी महानुभाव, देवियों और सज्जनों!

आप सभी राइजिंग भारत की चर्चा कर रहे हैं। और इसमें strength within पर आपका जोर है, यानी साधारण शब्दों में कहूं, तो देश के अपने खुद के सामर्थ्य पर आपका फोकस है। और हमारे यहां तो शास्त्रों में कहा गया है - तत् त्वम असि! यानी जिस ब्रह्म की खोज मे हम निकले हैं, वो हम ही हैं, वो हमारे भीतर ही है। जो सामर्थ्य हमारे भीतर है उसे हमें पहचानना है। बीते 11 वर्षों में भारत ने अपना वही सामर्थ्य पहचाना है, और इस सामर्थ्य को सशक्त करने के लिए आज देश निरंतर प्रयास कर रहा है।

साथियों,

सामर्थ्य किसी देश में अचानक पैदा नहीं होता, सामर्थ्य पीढ़ियों में बनता है। वो ज्ञान से, परंपरा से, परिश्रम से और अनुभव से निखरता है, लेकिन इतिहास के एक लंबे कालखंड में, गुलामी की इतनी शताब्दियों में, हमारे सामर्थ्यवान होने की भावना को ही हीनता से भर दिया गया था। दूसरे देशों से आयातित विचारधारा ने समाज में कूट-कूट कर ये भर दिया था, कि हम अशिक्षित हैं और अनुगामी यानी, फॉलोअर हैं, हमारे यहां ये भी कहा गया है – यादृशी भावना यस्य, सिद्धिर्भवति तादृशी। यानी जैसी जिसकी भावना होती है, उसे वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है। जब भावना में ही हीनता थी, तो सिद्धि भी वैसी ही मिल रही है। हम विदेशी तकनीक की नकल करते थे, विदेशी मुहर का इंतजार करते थे, ये वो गुलामी थी जो राजनीतिक और भौगोलिक से ज्यादा मानसिक गुलामी थी। दुर्भाग्य से आजादी के बाद भी, भारत गुलामी की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया। और इसका नुकसान हम आज तक उठा रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण, हम ट्रेड डील्स में हो रही चर्चा में देख रहे हैं। कुछ लोग चौंक गए हैं कि अरे ये क्या हो गया, कैसे हो गया, विकसित देश भारत से ट्रेड डील्स करने में इतने उत्सुक क्यों हैं। इसका उत्तर है हताशा, निराशा से बाहर निकल रहा आत्मविश्वासी भारत। अगर देश आज भी 2014 से पहले वाली निराशा में होता, फ्रेजाइल फाइव में गिना जाता, पॉलिसी पैरालिसिस से घिरा होता, अगर ये हाल होते तो कौन हमारे साथ ट्रेड डील्स करता, अरे हमारी तरफ देखता भी नहीं।

लेकिन साथियों,

बीते 11 वर्षों में देश की चेतना में नई ऊर्जा का प्रवाह हुआ है। भारत अब अपने खोये हुए सामर्थ्य को वापस पाने का प्रयास कर रहा है। एक समय में जब भारत का वैश्विक अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा दबदबा था, तो हमारा क्या सामर्थ्य था? भारत की मैन्युफैक्चरिंग, भारत के प्रोडक्टस की क्वालिटी, भारत की अर्थ नीति, अब आज का भारत फिर से इन बातों पर फोकस कर रहा है। इसलिए हमने मैन्युफैक्चरिंग पर काम किया, हमने मेक इन इंडिया पर बल दिया, हमने अपनी बैंकिंग सिस्टम को सशक्त किया, महंगाई जो डबल डिजिट की दर से भाग रही थी, उसका कंट्रोल किया और भारत को दुनिया का ग्रोथ इंजन बनाया। भारत का यही सामर्थ्य है कि दुनिया के विकसित देश सामने से भारत के साथ ट्रेड डील करने के लिए खुद आगे आ रहे हैं।

साथियों,

जब किसी राष्ट्र के भीतर, छिपी हुई उसकी शक्ति जागती है, तो वह नई उपलब्धियां हासिल करता है। मैं आपको कुछ और उदाहरण देता हूं। जैसे मैं जब कभी दूसरी देशों के हेड ऑफ द गर्वमेंट से मिलता हूं, तो वो जनधन, आधार और मोबाइल की इतनी शक्ति के बारे में सुनने के लिए बहुत उत्सुक होते हैं। जिस भारत में एटीएम भी, दुनिया की विकसित देशों की तुलना में काफी समय बाद आया, उस भारत ने डिजिटल पेमेंट सिस्टम में ग्लोबल लीडरशिप कैसे हासिल कर ली? जहां पर सरकारी मदद की लीकेज को कड़वा सच मान लिया गया था, वो भारत डीबीटी के जरिये 24 लाख करोड़ रूपये, यानी Twenty four trillion रुपीज कैसे लाभार्थियों को भेज पा रहा है? भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, आज पूरे विश्व के लिए चर्चा का विषय बन चुका है।

साथियों,

दुनिया हैरान होती है, कि जिस भारत में 2014 तक, करीब तीन करोड़ परिवार अंधेरे में थे, वो आज सोलर पावर कैपेसिटी में दुनिया के टॉप के देशों में कैसे आ गया? जिस भारत के शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट सुधरने की कोई उम्मीद ना थी, वो भारत आज दुनिया का तीसरा बड़ा मेट्रो नेटवर्क वाला देश कैसे बन गया? जिस भारत के रेलवे की पहचान सिर्फ लेट-लतीफी और धीमी-रफ्तार से होती थी, वहां वंदे भारत, नमो भारत, ऐसी सेमी-हाईस्पीड कनेक्टिविटी कैसे संभव हो पा रही है?

साथियों,

एक समय था, जब भारत नई टेक्नोलॉजी का सिर्फ और सिर्फ कंज्यूमर था। आज भारत नई टेक्नोलॉजी का निर्माता भी है और नए मानक भी स्थापित कर रहा है। और ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि हमने अपने सामर्थ्य को पहचाना है, जिस Strength Within की आप चर्चा कर रहे हैं, ये उसका ही उदाहरण है।

साथियों,

जब हम गर्व से आगे बढ़ते हैं, तो दुनिया हमें जिस नजर से देखती रही है, वो नजर भी बदली है। आप याद कीजिए, कुछ साल पहले तक दुनिया में, ग्लोबल मीडिया में, भारत के किसी इवेंट की कितनी कम चर्चा होती थी। भारत में होने वाले इवेंट्स को उतनी तवज्जो ही नहीं दी जाती थी। और आज देखिए, भारत जो करता है, जो एक्शन यहां होते हैं, उसका वैश्विक विश्लेषण होता है। AI समिट का उदाहरण आपके सामने है, इसी भवन में हुआ है। AI समिट में 100 से ज्यादा देश शामिल हुए, ग्लोबल नॉर्थ हो या फिर ग्लोबल साउथ, सभी एक साथ, एक ही जगह, एक टेबल पर बैठे। दुनिया के बड़े-बड़े कॉर्पोरेशन्स हों या फिर छोटे-छोटे स्टार्ट अप्स, सभी एक साथ जुटे।

साथियों,

अब तक जितनी भी औद्योगिक क्रांतियां आई हैं, उनमें भारत और पूरा ग्लोबल साउथ सिर्फ फॉलोअर रहा है। लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के इस युग में, भारत निर्णयों में सहभागी भी है और उन्हें शेप भी कर रहा है। आज हमारे पास खुद का AI स्टार्टअप इकोसिस्टम है, डेटा-सेंटर में निवेश करने की ताकत है और AI डेटा को स्टोर करने के लिए, प्रोसेस करने के लिए, जिस पावर की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, उस पर भी भारत तेजी से काम कर रहा है। हमने न्यूक्लियर पावर सेक्टर में जो Reform किया है, वो भी भारत के AI इकोसिस्टम को मजबूती देने में मदद करेगा।

साथियों,

AI समिट का आयोजन पूरे भारत के लिए गौरव का पल था। लेकिन दुर्भाग्य से देश की सबसे पुरानी पार्टी ने, देश के इस उत्सव को मैला करने का प्रयास किया। विदेशी अतिथियों के सामने कांग्रेस ने सिर्फ कपड़े नहीं उतारे, बल्कि इसने कांग्रेस के वैचारिक दिवालिएपन को भी expose कर दिया है। जब नाकामी की निराशा-हताशा मन में हो, और अहंकार सिर चढ़कर बोलता हो, तब देश को बदनाम करने की ऐसी सोच सामने आती है। ज़ाहिर है, कांग्रेस की इस हरकत से देश में गुस्सा है। इसलिए, इन्होंने अपने पाप को सही ठहराने के लिए महात्मा गांधी जी को आगे कर दिया। कांग्रेस हर बार ऐसा ही करती है। जब अपने पाप को छुपाना हो तो कांग्रेस बापू को आगे कर देती है, और जब अपना गौरवगान करना हो, तो एक ही परिवार को सारा क्रेडिट देती है।

साथियों,

कांग्रेस अब विचारधारा के नाम पर केवल विरोध की टूलकिट बनकर रह गई है। और ये अंध-विरोध की मानसिकता इतनी बढ़ गई है, कि ये देश को हर मंच, हर प्लेटफॉर्म पर नीचा दिखाने से नहीं चूकते। देश कुछ भी अच्छा करे, देश के लिए कुछ भी शुभ हो रहा हो, कांग्रेस को विरोध ही करना है।

साथियों,

मेरे पास एक लंबी सूची है, देश की संसद की नई इमारत बनी, उसका विरोध। संसद के ऊपर अशोक स्तंभ के शेरों का विरोध। अब जिनके बब्बर शेर सामान्य नागरिकों के जूते खाकर के भाग रहे थे, उनके संसद भवन के शेर के दांत देखकर के डर लग गया उनको। कर्तव्य भवन बना, उसका भी विरोध। सेनाओं ने सर्जिकल स्ट्राइक की, उसका भी विरोध। बालाकोट में एयर स्ट्राइक हुई, उसका भी विरोध। ऑपरेशन सिंदूर हुआ, उसका भी विरोध। यानी देश की हर उपलब्धि पर कांग्रेस के टूलकिट से एक ही चीज निकलती है- विरोध।

साथियों,

देश ने आर्टिकल 370 की दीवार गिराई, देश खुश हुआ। लेकिन कांग्रेस ने विरोध किया। हमने CAA का कानून बनाया- उसका विरोध। हम महिला आरक्षण कानून लाए- उसका विरोध। तीन तलाक के विरुद्ध कानून लाए- उसका विरोध। हम UPI लेकर आए, उसका विरोध। स्वच्छ भारत अभियान लेकर आए, उसका विरोध। देश ने कोरोना वैक्सीन बनाई, तो उसका भी विरोध।

साथियों,

लोकतंत्र में विपक्ष का मतलब सिर्फ अंध-विरोध नहीं होता, डेमोक्रेसी में विपक्ष का मतलब वैकल्पिक विजन होता है। इसलिए देश की प्रबुद्ध जनता, कांग्रेस को सबक सिखा रही है, आज से नहीं, बीते चार दशकों से लगातार ये काम देश की जनता कर रही है। मैं जो कहने जा रहा हूं, मीडिया के साथी उसका भी ज़रा एनालिसिस करिएगा। आपको पता लगेगा कि कांग्रेस के वोट चोरी नहीं हो रहे, बल्कि देश के लोग अब कांग्रेस को वोट देने लायक ही नहीं मानते। और इसकी शुरुआत 1984 के बाद ही होनी शुरू हो गई थी। 1984 में कांग्रेस को 39 परसेंट वोट मिले थे, और 400 से अधिक सीटें मिली थीं। इसके बाद हुए चुनावों में कांग्रेस के वोट कम ही होते चले गए। और आज कांग्रेस की हालत ये है कि, देश में सिर्फ, सिर्फ चार राज्य ऐसे बचे हैं, जहां कांग्रेस के पास 50 से ज्यादा विधायक हैं। बीते 40 वर्षों में युवा वोटर्स की संख्या बढ़ती गई और कांग्रेस साफ होती गई। कांग्रेस, परिवार की गुलामी में डूबे लोगों का एक क्लब बनकर रह गई है। इसलिए पहले मिलेनियल्स ने कांग्रेस को सबक सिखाया, और अब जेन जी भी तैयार बैठी है।

साथियों,

कांग्रेस और उसके साथियों की सोच इतनी छोटी है, कि उन्होंने दूरदृष्टि से काम करने को भी गुनाह बना दिया है। आज जब हम विकसित भारत 2047 की बात करते हैं, तो कुछ लोग पूछते हैं— “इतनी दूर की बात अभी क्यों कर रहे हो?” कुछ लोग ये भी कहते हैं कि तब तक मोदी जिंदा थोड़ी रहेगा, सच्चाई यह है कि राष्ट्र निर्माण कभी भी तात्कालिक सोच से नहीं होता। वो एक बड़े विजन, धैर्य और समय पर लिए गए निर्णयों से होता है। मैं कुछ और तथ्य नेटवर्क 18 के दर्शकों के सामने रखना चाहता हूं। भारत हर साल विदेशी समुद्री जहाजों से मालढुलाई पर 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च करता है किराए पर। फर्टिलाइजर के आयात पर हर साल सवा दो लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं। पेट्रोलियम आयात पर हर साल 11 लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं। यानी हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये देश से बाहर जा रहे हैं। अगर यही निवेश 20–25 वर्ष पहले आत्मनिर्भरता की दिशा में किया गया होता, तो आज ये पूंजी भारत के इंफ्रास्ट्रचर, रिसर्च, इंडस्ट्री, किसान और युवाओं की क्षमताओं को मजबूत कर रही होती। आज हमारी सरकार इसी सोच के साथ काम कर रही है। विदेशी जहाजों को 6 लाख करोड़ रुपए ना देना पड़े इसलिए भारतीय शिपिंग और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जा रहा है। फर्टिलाइजर का domestic प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए नए प्लांट लग रहे हैं, नैनो-यूरिया को बढ़ावा दिया जा रहा है। पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने के लिए एथेनॉल ब्लेंडिंग, ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, सोलर और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को प्राथमिकता दी जा रही है।

और साथियों,

हमें भविष्य की ओर देखते हुए भी आज ही निर्णय लेने हैं। इसलिए आज भारत में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का निर्माण हो रहा है। रक्षा उत्पादन में, मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में, ड्रोन टेक्नोलॉजी में, क्रिटिकल मिनरल्स सेक्टर में, और उसमें निवेश, आने वाले दशकों की आर्थिक सुरक्षा की नींव है। 2047 का लक्ष्य कोई राजनीतिक नारा नहीं है। यह उस ऐतिहासिक भूल को सुधारने का संकल्प भी है, जहाँ कांग्रेस की सरकारों के समय कई क्षेत्रों में समय रहते निवेश नहीं किया। आज अगर हम ख़ुद स्वदेशी जहाज, स्वदेशी शिप्स बनाएँगे, ख़ुद एनर्जी का प्रोडक्शन करेंगे, ख़ुद नई टेक्नोलॉजी डेवलप करेंगे, तो आने वाली पढ़ियाँ इम्पोर्ट के बोझ की नहीं, एक्सपोर्ट की क्षमता पर चर्चा करेंगी। राष्ट्र की प्रगति “आज की सुविधा” से नहीं, “कल की तैयारी” से तय होती है। और दूरदृष्टि से की गई मेहनत ही 2047 के आत्मनिर्भर, सशक्त और समृद्ध भारत की आधारशिला है। और इसके लिए कांग्रेस अपने कितने ही कपड़े फाड़ ले, हम निरंतर काम करते रहेंगे।

साथियों,

राष्ट्र निर्माण की, Nation Building की एक बहुत अहम शर्त होती है- नेक नीयत की। कांग्रेस और उसके साथी दल, इसमें भी फेल रहे हैं। कांग्रेस और उसके साथियों ने कभी नेक नीयत के साथ काम नहीं किया। गरीब का दुख, उसकी तकलीफ से भी इन्हें कोई वास्ता नहीं है। जैसे बंगाल में आज तक आयुष्मान भारत योजना लागू नहीं हुई। अगर नेक नीयत होती तो क्या गरीबों को 5 लाख रुपए तक मुफ्त इलाज देने वाली इस योजना को बंगाल में रोका जाता क्या? नहीं। आप भी जानते हैं कि देश में पीएम आवास योजना के तहत गरीबों के लिए पक्के घर बनवाए जा रहे हैं। नेटवर्क 18 के दर्शकों को मैं एक और आंकड़ा देता हूं। तमिलनाडु के गरीब परिवारों के लिए, करीब साढ़े नौ लाख पक्के घर एलोकेट किए गए हैं, साढ़े नौ लाख। लेकिन इनमें से तीन लाख घरों का निर्माण अटक गया है, क्यों, क्योंकि DMK सरकार गरीबों के इन घरों के निर्माण में दिलचस्पी नहीं दिखा रही। इसकी वजह क्या है? इसकी वजह है, नीयत नेक नहीं है।

साथियों,

मैं आपको एग्रीकल्चर सेक्टर का भी उदाहरण देता हूं। कांग्रेस के समय में खेती-किसानी को अपने हाल पर छोड़ दिया गया था। छोटे किसानों को कोई पूछता नहीं था, फसल बीमा का हाल बेहाल था, MSP पर स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट फाइलों में दबा दी गई थी, कांग्रेस बजट में घोषणाएं जरूर करती थी, लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं होता था, क्योंकि उसकी नीयत ही नहीं थी। हमने देश के किसानों के लिए नेक नीयत के साथ काम करना शुरू किया, और आज उसके परिणाम दुनिया देख रही है। आज भारत दुनिया के बड़े एग्रीकल्चर एक्सपोर्टर्स में से एक बन रहा है। हमने हर स्तर पर किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच बनाया है। पीएम किसान सम्मान निधि के माध्यम से किसानों के खाते में चार लाख करोड़ रुपए से अधिक जमा किए गए हैं। हमने लागत का डेढ़ गुणा MSP तय किया और रिकॉर्ड खरीद भी की है। मैं आपको सिर्फ दाल का ही आंकड़ा देता हूं। UPA सरकार ने 10 साल में सिर्फ 6 लाख मीट्रिक टन दाल, किसानों से MSP पर खरीदी- 6 लाख मीट्रिक टन। और हमारी सरकार अभी तक, करीब 170 लाख मीट्रिक टन, यानी लगभग 30 गुणा अधिक दाल MSP पर खरीद चुकी है। अब आप तय करिये, कौन किसानों के लिए काम करता है।

साथियों,

यूपीए सरकार किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए भी किसानों को मदद देने में कंजूसी करती थी। अपने 10 साल में यूपीए सरकार ने सात लाख करोड़ रुपए का कृषि ऋण किसानों को दिया। 7 lakh crore rupees. जबकि हमारी सरकार इससे चार गुणा अधिक यानी 28 लाख करोड़ रुपए दे चुकी है। यूपीए सरकार के दौरान जहां सिर्फ पांच करोड़ किसानों को इसका लाभ मिलता था, आज ये संख्या दोगुने से भी अधिक करीब-करीब 12 करोड़ किसानों को पहुंची है। यानी देश के छोटे किसान को भी पहली बार मदद मिली है। हमारी सरकार ने पीएम फसल बीमा योजना का सुरक्षा कवच भी किसानों को दिया। इसके तहत करीब 2 लाख करोड़ रुपए किसानों को संकट के समय मिल चुके हैं। हम नेक नीयत से काम कर रहे हैं, इसलिए भारत के किसानों का आत्मविश्वास बढ़ रहा है, उनकी प्रोडक्टिविटी बढ़ रही है, और आय में भी वृद्धि हो रही है।

साथियों,

21वीं सदी का एक चौथाई हिस्सा बीत चुका है। अब अगला चरण भारत के विकास का निर्णायक दौर है। वर्तमान में लिए गए निर्णय ही भविष्य की दिशा तय करेंगे। हमें अपने सामर्थ्य को पहचानते हुए, उसे बढ़ाते हुए आगे चलना है। हर व्यक्ति अपने क्षेत्र में श्रेष्ठता को लक्ष्य बनाए, हर संस्था excellence को अपना संस्कार बनाए, हम सिर्फ उत्पाद न बनाएं, best-quality product बनाएं, हम सिर्फ रुटीन काम न करें, world-class काम करें, हम क्षमता को performance में बदलें। मैंने लाल किले से कहा है- यही समय है, सही समय है। यही समय है, भारत को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का। एक बार फिर आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं, बहुत-बहुत धन्यवाद। नमस्कार।