मेरे प्यारे किसान भाइयो और बहनो, आप सबको नमस्कार!

ये मेरा सौभाग्य है कि आज मुझे देश के दूर सुदूर गाँव में रहने वाले मेरे किसान भाइयों और बहनों से बात करने का अवसर मिला है। और जब मैं किसान से बात करता हूँ तो एक प्रकार से मैं गाँव से बात करता हूँ, गाँव वालों से बात करता हूँ, खेत मजदूर से भी बात कर रहा हूँ। उन खेत में काम करने वाली माताओं बहनों से भी बात कर रहा हूँ। और इस अर्थ में मैं कहूं तो अब तक की मेरी सभी मन की बातें जो हुई हैं, उससे शायद एक कुछ एक अलग प्रकार का अनुभव है।

जब मैंने किसानों के साथ मन की बात करने के लिए सोचा, तो मुझे कल्पना नहीं थी कि दूर दूर गावों में बसने वाले लोग मुझे इतने सारे सवाल पूछेंगे, इतनी सारी जानकारियां देंगे, आपके ढेर सारे पत्र, ढेर सारे सवाल, ये देखकर के मैं हैरान हो गया। आप कितने जागरूक हैं, आप कितने सक्रिय हैं, और शायद आप तड़पते हैं कि कोई आपको सुने। मैं सबसे पहले आपको प्रणाम करता हूँ कि आपकी चिट्ठियाँ पढ़कर के उसमें दर्द जो मैंने देखा है, जो मुसीबतें देखी हैं, इतना सहन करने के बावजूद भी, पता नहीं क्या-क्या आपने झेला होगा।

आपने मुझे तो चौंका दिया है, लेकिन मैं इस मन की बात का, मेरे लिए एक प्रशिक्षण का, एक एजुकेशन का अवसर मानता हूँ। और मेरे किसान भाइयो और बहनो, मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, कि आपने जितनी बातें उठाई हैं, जितने सवाल पूछे हैं, जितने भिन्न-भिन्न पहलुओं पर आपने बातें की हैं, मैं उन सबके विषय में, पूरी सरकार में जागरूकता लाऊँगा, संवेदना लाऊँगा, मेरा गाँव, मेरा गरीब, मेरा किसान भाई, ऐसी स्थिति में उसको रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। मैं तो हैरान हूँ, किसानों ने खेती से संबधित तो बातें लिखीं हैं। लेकिन, और भी कई विषय उन्होंने कहे हैं, गाँव के दबंगों से कितनी परेशानियाँ हैं, माफियाओं से कितनी परेशानियाँ हैं, उसकी भी चर्चा की है, प्राकृतिक आपदा से आने वाली मुसीबतें तो ठीक हैं, लेकिन आस-पास के छोटे मोटे व्यापारियों से भी मुसीबतें झेलनी पड़ रही हैं।

किसी ने गाँव में गन्दा पानी पीना पड़ रहा है उसकी चर्चा की है, किसी ने गाँव में अपने पशुओं को रखने के लिए व्यवस्था की चिंता की है, किसी ने यहाँ तक कहा है कि पशु मर जाता है तो उसको हटाने का ही कोई प्रबंध नहीं होता, बीमारी फैल जाती है। यानि कितनी उपेक्षा हुई है, और आज मन की बात से शासन में बैठे हुए लोगों को एक कड़ा सन्देश इससे मिल रहा है। हमें राज करने का अधिकार तब है जब हम इन छोटी छोटी बातों को भी ध्यान दें। ये सब पढ़ कर के तो मुझे कभी कभी शर्मिन्दगी महसूस होती थी, कि हम लोगों ने क्या किया है! मेरे पास जवाब नहीं है, क्या किया है? हाँ, मेरे दिल को आपकी बातें छू गयी हैं। मैं जरूर बदलाव के लिए, प्रामाणिकता से प्रयास करूंगा, और उसके सभी पहलुओं पर सरकार को, जगाऊँगा, चेताऊंगा, दौडाऊंगा, मेरी कोशिश रहेगी, ये मैं विश्वास दिलाता हूँ।

मैं ये भी जानता हूँ कि पिछले वर्ष बारिश कम हुई तो परेशानी तो थी ही थी। इस बार बेमौसमी बरसात हो गयी, ओले गिरे, एक प्रकार से महाराष्ट्र से ऊपर, सभी राज्यों में, ये मुसीबत आयी। और हर कोने में किसान परेशान हो गया। छोटा किसान जो बेचारा, इतनी कड़ी मेहनत करके साल भर अपनी जिन्दगी गुजारा करता है, उसका तो सब कुछ तबाह हो गया है। मैं इस संकट की घड़ी में आपके साथ हूँ। सरकार के मेरे सभी विभाग राज्यों के संपर्क में रह करके स्थिति का बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं, मेरे मंत्री भी निकले हैं, हर राज्य की स्थिति का जायजा लेंगे, राज्य सरकारों को भी मैंने कहा है कि केंद्र और राज्य मिल करके, इन मुसीबत में फंसे हुए सभी किसान भाइयों-बहनों को जितनी ज्यादा मदद कर सकते हैं, करें। में आपको विश्वास दिलाता हूँ कि सरकार पूरी संवेदना के साथ, आपकी इस संकट की घड़ी में, आपको पूरी तत्परता से मदद करेगी। जितना हो सकता है, उसको पूरा करने का प्रयास किया जायेगा।

गाँव के लोगों ने, किसानों ने कई मुददे उठाये हैं। सिंचाई की चिंता व्यापक नजर आती है। गाँव में सड़क नहीं है उसका भी आक्रोश है। खाद की कीमतें बढ़ रही हैं, उस पर भी किसान की नाराजगी है। बिजली नहीं मिल रही है। किसानों को यह भी चिंता है कि बच्चों को पढ़ाना है, अच्छी नौकरी मिले ये भी उनकी इच्छा है, उसकी भी शिकायतें हैं। माताओं बहनों की भी, गाँव में कहीं नशा-खोरी हो रही है उस पर अपना आक्रोश जताया है। कुछ ने तो अपने पति को तम्बाकू खाने की आदत है उस पर भी अपना रोष मुझे व्यक्त करके भेजा है। आपके दर्द को मैं समझ सकता हूँ। किसान का ये भी कहना है की सरकार की योजनायें तो बहुत सुनने को मिलती हैं, लेकिन हम तक पहुँचती नहीं हैं। किसान ये भी कहता है कि हम इतनी मेहनत करते हैं, लोगों का तो पेट भरते हैं लेकिन हमारा जेब नहीं भरता है, हमें पूरा पैसा नहीं मिलता है। जब माल बेचने जाते हैं, तो लेने वाला नहीं होता है। कम दाम में बेच देना पड़ता है। ज्यादा पैदावार करें तो भी मरते हैं, कम पैदावार करें तो भी मरते हैं। यानि किसानों ने अपने मन की बात मेरे सामने रखी है। मैं मेरे किसान भाइयों-बहनों को विश्वास दिलाता हूँ, कि मैं राज्य सरकारों को भी, और भारत सरकार के भी हमारे सभी विभागों को भी और अधिक सक्रिय करूंगा। तेज गति से इन समस्याओं के समाधान के रास्ते खोजने के लिए प्रेरित करूँगा। मुझे लग रहा है कि आपका धैर्य कम हो रहा है। बहुत स्वाभाविक है, साठ साल आपने इन्तजार किया है, मैं प्रामाणिकता से प्रयास करूँगा।

किसान भाइयो, ये आपके ढेर सारे सवालों के बीच में, मैंने देखा है कि करीब–करीब सभी राज्यों से वर्तमान जो भूमि अधिग्रहण बिल की चर्चा है, उसका प्रभाव ज्यादा दिखता है, और मैं हैरान हूँ कि कैसे-कैसे भ्रम फैलाए गए हैं। अच्छा हुआ, आपने छोटे–छोटे सवाल मुझे पूछे हैं। मैं कोशिश करूंगा कि सत्य आप तक पहुचाऊं। आप जानते हैं भूमि-अधिग्रहण का कानून 120 साल पहले आया था। देश आज़ाद होने के बाद भी 60-65 साल वही कानून चला और जो लोग आज किसानों के हमदर्द बन कर के आंदोलन चला रहे हैं, उन्होंने भी इसी कानून के तहत देश को चलाया, राज किया और किसानों का जो होना था हुआ। सब लोग मानते थे कि कानून में परिवर्तन होना चाहिए, हम भी मानते थे। हम विपक्ष में थे, हम भी मानते थे।

2013 में बहुत आनन-फानन के साथ एक नया कानून लाया गया। हमने भी उस समय कंधे से कन्धा मिलाकर के साथ दिया। किसान का भला होता है, तो साथ कौन नहीं देगा, हमने भी दिया। लेकिन कानून लागू होने के बाद, कुछ बातें हमारे ज़हन में आयीं। हमें लगा शायद इसके साथ तो हम किसान के साथ धोखा कर रहे हैं। हमें किसान के साथ धोखा करने का अधिकार नहीं है। दूसरी तरफ जब हमारी सरकार बनी, तब राज्यों की तरफ से बहुत बड़ी आवाज़ उठी। इस कानून को बदलना चाहिए, कानून में सुधार करना चाहिए, कानून में कुछ कमियां हैं, उसको पूरा करना चाहिए। दूसरी तरफ हमने देखा कि एक साल हो गया, कोई कानून लागू करने को तैयार ही नहीं कोई राज्य और लागू किया तो उन्होंने क्या किया? महाराष्ट्र सरकार ने लागू किया था, हरियाणा ने किया था जहां पर कांग्रेस की सरकारें थीं और जो किसान हितैषी होने का दावा करते हैं उन्होंने इस अध्यादेश में जो मुआवजा देने का तय किया था उसे आधा कर दिया। अब ये है किसानों के साथ न्याय? तो ये सारी बातें देख कर के हमें भी लगा कि भई इसका थोडा पुनर्विचार होना ज़रूरी है। आनन–फानन में कुछ कमियां रह जाती हैं। शायद इरादा ग़लत न हो, लेकिन कमियाँ हैं, तो उसको तो ठीक करनी चाहिए।…और हमारा कोई आरोप नहीं है कि पुरानी सरकार क्या चाहती थी, क्या नहीं चाहती थी? हमारा इरादा यही है कि किसानों का भला हो, किसानों की संतानों का भी भला हो, गाँव का भी भला हो और इसीलिए कानून में अगर कोई कमियां हैं, तो दूर करनी चाहिए। तो हमारा एक प्रामाणिक प्रयास कमियों को दूर करना है।

अब एक सबसे बड़ी कमी मैं बताऊँ, आपको भी जानकर के हैरानी होगी कि जितने लोग किसान हितैषी बन कर के इतनी बड़ी भाषणबाज़ी कर रहें हैं, एक जवाब नहीं दे रहे हैं। आपको मालूम है, अलग-अलग प्रकार के हिंदुस्तान में 13 कानून ऐसे हैं जिसमें सबसे ज्यादा जमीन संपादित की जाती है, जैसे रेलवे, नेशनल हाईवे, खदान के काम। आपको मालूम है, पिछली सरकार के कानून में इन 13 चीज़ों को बाहर रखा गया है। बाहर रखने का मतलब ये है कि इन 13 प्रकार के कामों के लिए जो कि सबसे ज्यादा जमीन ली जाती है, उसमें किसानों को वही मुआवजा मिलेगा जो पहले वाले कानून से मिलता था। मुझे बताइए, ये कमी थी कि नहीं? ग़लती थी कि नहीं? हमने इसको ठीक किया और हमने कहा कि भई इन 13 में भी भले सरकार को जमीन लेने कि हो, भले रेलवे के लिए हो, भले हाईवे बनाने के लिए हो, लेकिन उसका मुआवजा भी किसान को चार गुना तक मिलना चाहिए। हमने सुधार किया। कोई मुझे कहे, क्या ये सुधार किसान विरोधी है क्या? हमें इसीलिए तो अध्यादेश लाना पड़ा। अगर हम अध्यादेश न लाते तो किसान की तो जमीन वो पुराने वाले कानून से जाती रहती, उसको कोई पैसा नहीं मिलता। जब ये कानून बना तब भी सरकार में बैठे लोगों में कईयों ने इसका विरोधी स्वर निकला था। स्वयं जो कानून बनाने वाले लोग थे, जब कानून का रूप बना, तो उन्होंने तो बड़े नाराज हो कर के कह दिया, कि ये कानून न किसानों की भलाई के लिए है, न गाँव की भलाई के लिए है, न देश की भलाई के लिए है। ये कानून तो सिर्फ अफसरों कि तिजोरी भरने के लिए है, अफसरों को मौज करने के लिए, अफ़सरशाही को बढ़ावा देने के लिए है। यहाँ तक कहा गया था। अगर ये सब सच्चाई थी तो क्या सुधार होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए? ..और इसलिए हमने कमियों को दूर कर के किसानों का भला करने कि दिशा में प्रयास किये हैं। सबसे पहले हमने काम किया, 13 कानून जो कि भूमि अधिग्रहण कानून के बाहर थे और जिसके कारण किसान को सबसे ज्यादा नुकसान होने वाला था, उसको हम इस नए कानून के दायरे में ले आये ताकि किसान को पूरा मुआवजा मिले और उसको सारे हक़ प्राप्त हों। अब एक हवा ऐसी फैलाई गई कि मोदी ऐसा कानून ला रहें हैं कि किसानों को अब मुआवजा पूरा नहीं मिलेगा, कम मिलेगा।

मेरे किसान भाइयो-बहनो, मैं ऐसा पाप सोच भी नहीं सकता हूँ। 2013 के पिछली सरकार के समय बने कानून में जो मुआवजा तय हुआ है, उस में रत्ती भर भी फर्क नहीं किया गया है। चार गुना मुआवजा तक की बात को हमने स्वीकारा हुआ है। इतना ही नहीं, जो तेरह योजनाओं में नहीं था, उसको भी हमने जोड़ दिया है। इतना ही नहीं, शहरीकरण के लिए जो भूमि का अधिग्रहण होगा, उसमें विकसित भूमि, बीस प्रतिशत उस भूमि मालिक को मिलेगी ताकि उसको आर्थिक रूप से हमेशा लाभ मिले, ये भी हमने जारी रखा है। परिवार के युवक को नौकरी मिले। खेत मजदूर की संतान को भी नौकरी मिलनी चाहिए, ये भी हमने जारी रखा है। इतना ही नहीं, हमने तो एक नयी चीज़ जोड़ी है। नयी चीज़ ये जोड़ी है, जिला के जो अधिकारी हैं, उसको इसने घोषित करना पड़ेगा कि उसमें नौकरी किसको मिलेगी, किसमें नौकरी मिलेगी, कहाँ पर काम मिलेगा, ये सरकार को लिखित रूप से घोषित करना पड़ेगा। ये नयी चीज़ हमने जोड़ करके सरकार कि जिम्मेवारी को Fix किया है।

मेरे किसान भाइयो-बहनो, हम इस बात पर agree हैं, कि सबसे पहले सरकारी जमीन का उपयोग हो। उसके बाद बंजर भूमि का उपयोग हो, फिर आखिर में अनिवार्य हो तब जाकर के उपजाऊ जमीन को हाथ लगाया जाये, और इसीलिए बंजर भूमि का तुरंत सर्वे करने के लिए भी कहा गया है, जिसके कारण वो पहली priority वो बने।

एक हमारे किसानों की शिकायत सही है कि आवश्यकता से अधिक जमीन हड़प ली जाती है। इस नए कानून के माध्यम से मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि अब जमीन कितनी लेनी, उसकी पहले जांच पड़ताल होगी, उसके बाद तय होगा कि आवश्यकता से अधिक जमीन हड़प न की जाए। कभी-कभी तो कुछ होने वाला है, कुछ होने वाला है, इसकी चिंता में बहुत नुकसान होता है। ये Social Impact Assessment (SIA) के नाम पर अगर प्रक्रिया सालों तक चलती रहे, सुनवाई चलती रहे, मुझे बताइए, ऐसी स्थिति में कोई किसान अपने फैसले कर पायेगा? फसल बोनी है तो वो सोचेगा नहीं-नहीं यार, पता नहीं, वो निर्णय आ जाएगा तो, क्या करूँगा? और उसके 2-2, 4-4, साल खराब हो जाएगा और अफसरशाही में चीजें फसी रहेंगी। प्रक्रियाएं लम्बी, जटिल और एक प्रकार से किसान बेचारा अफसरों के पैर पकड़ने जाने के लिए मजबूर हो जाएगा कि साहब ये लिखो, ये मत लिखों, वो लिखो, वो मत लिखो, ये सब होने वाला है। क्या मैं मेरे अपने किसानों को इस अफसरसाही के चुंगल में फिर एक बार फ़सा दूं? मुझे लगता है वो ठीक नहीं होगा। प्रक्रिया लम्बी थी, जटिल थी। उसको सरल करने का मैंने प्रयास किया है।

मेरे किसान भाइयो-बहनो 2014 में कानून बना है, लेकिन राज्यों ने उसको स्वीकार नहीं किया है। किसान तो वहीं का वहीं रह गया। राज्यों ने विरोध किया। मुझे बताइए क्या मैं राज्यों की बात सुनूं या न सुनूं? क्या मैं राज्यों पर भरोसा करूँ या न करूँ? इतना बड़ा देश, राज्यों पर अविश्वास करके चल सकता है क्या? और इसलिए मेरा मत है कि हमें राज्यों पर भरोसा करना चाहिये, भारत सरकार में विशेष करना चाहिये तो, एक तो मैं भरोसा करना चाहता हूँ, दूसरी बात है, ये जो कानून में सुधार हम कर रहे हैं, कमियाँ दूर कर रहे हैं, किसान की भलाई के लिए जो हम कदम उठा रहे हैं, उसके बावजूद भी अगर किसी राज्य को ये नहीं मानना है, तो वे स्वतंत्र हैं और इसलिए मैं आपसे कहना चाहता हूँ कि ये जो सारे भ्रम फैलाए जा रहे हैं, वो सरासर किसान विरोधी के भ्रम हैं। किसान को गरीब रखने के षड्यन्त्र का ही हिस्सा हैं। देश को आगे न ले जाने के जो षडयंत्र चले हैं उसी का हिस्सा है। उससे बचना है, देश को भी बचाना है, किसान को भी बचाना है।

अब गाँव में भी किसान को पूछो कि भाई तीन बेटे हैं बताओ क्या सोच रहे हो? तो वो कहता है कि भाई एक बेटा तो खेती करेगा, लेकिन दो को कहीं-कहीं नौकरी में लगाना है। अब गाँव के किसान के बेटों को भी नौकरी चाहिये। उसको भी तो कहीं जाकर रोजगार कमाना है। तो उसके लिए क्या व्यवस्था करनी पड़ेगी। तो हमने सोचा कि जो गाँव की भलाई के लिए आवश्यक है, किसान की भलाई के लिये आवश्यक है, किसान के बच्चों के रोजगार के लिए आवश्यक है, ऐसी कई चीजों को जोड़ दिया जाए। उसी प्रकार से हम तो जय-जवान, जय-किसान वाले हैं। जय-जवान का मतलब है देश की रक्षा। देश की रक्षा के विषय में हिंदुस्तान का किसान कभी पीछे हटता नहीं है। अगर सुरक्षा के क्षेत्र में कोई आवश्कता हो तो वह जमीन किसानों से मांगनी पड़ेगी।..और मुझे विश्वास है, वो किसान देगा। तो हमने इन कामों के लिए जमीन लेने की बात को इसमें जोड़ा है। कोई भी मुझे गाँव का आदमी बताए कि गाँव में सड़क चाहिये कि नहीं चाहिये। अगर खेत में पानी चाहिये तो नहर करनी पड़ेगी कि नहीं करनी पड़ेगी। गाँव में आज भी गरीब हैं, जिसके पास रहने को घर नहीं है। घर बनाने के लिए जमीन चाहिये की नहीं चाहिये? कोई मुझे बताये कि यह उद्योगपतियों के लिए है क्या? यह धन्ना सेठों के लिए है क्या? सत्य को समझने की कोशिश कीजिये।

हाँ, मैं एक डंके की चोट पर आपको कहना चाहता हूँ, नए अध्यादेश में भी, कोई भी निजी उद्योगकार को, निजी कारखाने वाले को, निजी व्यवसाय करने वाले को, जमीन अधिग्रहण करने के समय 2013 में जो कानून बना था, जितने नियम हैं, वो सारे नियम उनको लागू होंगे। यह कॉर्पोरेट के लिए कानून 2013 के वैसे के वैसे लागू रहने वाले हैं। तो फिर यह झूठ क्यों फैलाया जाता है। मेरे किसान भाइयो-बहनो, एक भ्रम फैलाया जाता है कि आपको कानूनी हक नहीं मिलेगा, आप कोर्ट में नहीं जा सकते, ये सरासर झूठ है। हिंदुस्तान में कोई भी सरकार आपके कानूनी हक़ को छीन नहीं सकती है। बाबा साहेब अम्बेडकर ने हमें जो संविधान दिया है, इस संविधान के तहत आप हिंदुस्तान के किसी भी कोर्ट में जा करके दरवाजे खटखटा सकते हैं। तो ये झूठ फैलाया गया है। हाँ, हमने एक व्यवस्था को आपके दरवाजे तक लाने का प्रयास किया है।

एक Authority बनायी है, अब वो Authority जिले तक काम करेगी और आपके जिले के किसानों की समस्याओं का समाधान उसी Authority में जिले में ही हो जायेगा।..और वहां अगर आपको संतोष नहीं होता तो आप ऊपर के कोर्ट में जा सकते हैं। तो ये व्यवस्था हमने की है।

एक यह भी बताया जाता है कि भूमि अधिग्रहित की गयी तो वो पांच साल में वापिस करने वाले कानून को हटा दिया गया है। जी नहीं, मेरे किसान भाइयो-बहनो हमने कहा है कि जब भी Project बनाओगे, तो यह पक्का करो कि कितने सालों में आप इसको पूरा करोगे। और उस सालों में अगर पूरा नहीं करते हैं तो वही होगा जो किसान चाहेगा। और उसको तो समय-सीमा हमने बाँध दी है। आज क्या होता है, 40-40 साल पहले जमीने ली गयी, लेकिन अभी तक सरकार ने कुछ किया नहीं। तो यह तो नहीं चल सकता। तो हमने सरकार को सीमा में बांधना तय किया है। हाँ, कुछ Projects ऐसे होते हैं जो 20 साल में पूरे होते हैं, अगर मान लीजिये 500 किलोमीटर लम्बी रेलवे लाइन डालनी है, तो समय जाएगा। तो पहले से कागज़ पर लिखो कि भाई कितने समय में पूरा करोगे। तो हमने सरकार को बाँधा है। सरकार की जिम्मेवारी को Fix किया है।

मैं और एक बात बताऊं किसान-भाइयो, कभी-कभी ये एयरकंडीशन कमरे में बैठ करके जो कानून बनाते हैं न, उनको गाँव के लोगों की सच्ची स्थिति का पता तक नहीं होता है। अब आप देखिये जब डैम बनता है, जलाशय बनता है, तो उसका नियम यह है कि 100 साल में सबसे ज्यादा पानी की सम्भावना हो उस हिसाब से जमीन प्राप्त करने का नियम है। अब 100 साल में एक बार पानी भरता है। 99 साल तक पानी नहीं भरता है। फिर भी जमीन सरकार के पास चली जाती है, तो आज सभी राज्यों में क्या हो रहा है की भले जमीन कागज़ पर ले ली हो, पैसे भी दे दिए हों। लेकिन फिर भी वो जमीन पर किसान खेती करता है। क्योंकि 100 साल में एक बार जब पानी भर जाएगा तो एक साल के लिए वो हट जाएगा। ये नया कानून 2013 का ऐसा था कि आप खेती नहीं कर सकते थे। हम चाहते हैं कि अगर जमीन डूब में नहीं जाती है तो फिर किसान को खेती करने का अवसर मिलना चाहिये।..और इसीलिये वो जमीन किसान से कब्ज़ा नहीं करनी चाहिये। ये लचीलापन आवश्यक था। ताकि किसान को जमीन देने के बावजूद भी जमीन का लाभ मिलता रहे और जमीन देने के बदले में रुपया भी मिलता रहे। तो किसान को डबल फायदा हो। ये व्यवस्था करना भी जरूरी है, और व्यावहारिक व्यवस्था है, और उस व्यावहारिक व्यवस्था को हमने सोचा है।

एक भ्रम ऐसा फैलाया जाता है कि ‘सहमति’ की जरुरत नहीं हैं। मेरे किसान भाइयो-बहनो ये राजनीतिक कारणों से जो बाते की जाती हैं, मेहरबानी करके उससे बचिये! 2013 में जो कानून बना उसमे भी सरकार नें जिन योजनाओं के लिए जमीन माँगी है, उसमें सहमती का क़ानून नहीं है।...और इसीलिए सहमति के नाम पर लोगों को भ्रमित किया जाता है। सरकार के लिए सहमति की बात पहले भी नही थी, आज भी नहीं है।..और इसीलिये मेरे किसान भाइयों-बहनो पहले बहुत अच्छा था और हमने बुरा कर दिया, ये बिलकुल सरासर आपको गुमराह करने का दुर्भाग्यपूर्ण प्रयास है। मैं आज भी कहता हूँ कि निजी उद्योग के लिए, कॉर्पोरेट के लिए, प्राइवेट कारखानों के लिए ये ‘सहमति’ का कानून चालू है, है...है।

...और एक बात मैं कहना चाहता हूँ, कुछ लोग कहतें है, PPP मॉडल! मेरे किसान भाइयो-बहनो, मान लीजिये 100 करोड रुपए का एक रोड बनाना है। क्या रोड किसी उद्योगकार उठा कर ले जाने वाला है क्या? रोड तो सरकार के मालिकी का ही रहता है। जमीन सरकार की मालिकी की ही रहती है। बनाने वाला दूसरा होता है। बनाने वाला इसीलिए दूसरा होता है, क्योंकि सरकार के पास आज पैसे नहीं होते हैं। क्योंकि सरकार चाहती है कि गाँव में स्कूल बने, गाँव में हॉस्पिटल बने, गरीब का बच्चा पढ़े, इसके लिए पैसा लगे। रोड बनाने का काम प्राइवेट करे, लेकिन वो प्राइवेट वाला भी रोड अपना नहीं बनाता है। न अपने घर ले जाता है, रोड सरकार का बनाता है। एक प्रकार से अपनी पूंजी लगता है। इसका मतलब ये हुआ कि सरकार का जो प्रोजेक्ट होगा जिसमें पूंजी किसी की भी लगे, जिसको लोग PPP मॉडल कहतें हैं। लेकिन अगर उसका मालिकाना हक़ सरकार का रहता है, उसका स्वामित्व सरकार का रहता है, सरकार का मतलब आप सबका रहता है, देश की सवा सौ करोड़ जनता का रहता है तो उसमें ही हमने ये कहा है कि सहमति की आवश्यकता नहीं है और इसीलिये ये PPP मॉडल को लेकर के जो भ्रम फैलाये जातें हैं उसकी मुझे आपको स्पष्टता करना बहुत ही जरुरी है।

कभी-कभार हम जिन बातों के लिए कह रहे हैं कि भई उसमें ‘सहमति’ की प्रक्रिया एक प्रकार से अफसरशाही और तानाशाही को बल देगी। आप मुझे बताईये, एक गावं है, उस गॉव तक रोड बन गया है, अब दूसरे गॉव के लिए रोड बनाना है, आगे वाले गॉव के लिए, 5 किलोमीटर की दूरी पर वह गॉव है। इस गॉव तक रोड बन गया है, लेकिन इन गॉव वालों की ज़मीन उस गॉव की तरफ है। मुझे बताईये उस गॉव के लोगों के लिए, रोड बनाने के लिए, ये गॉव वाले ज़मीन देंगे क्या? क्या ‘सहमति’ देंगे क्या? तो क्या पीछे जो गॉव है उसका क्या गुनाह है भई? उसको रोड मिलना चाहिए कि नहीं, मिलना चाहिये? उसी प्रकार से मैं नहर बना रहा हूँ। इस गॉव वालो को पानी मिल गया, नहर बन गयी। लेकिन आगे वाले गॉव को पानी पहुंचाना है तो ज़मीन तो इसी गावंवालों के बीच में पड़ती है। तो वो तो कह देंगे कि भई नहीं, हम तो ज़मीन नहीं देंगे। हमें तो पानी मिल गया है। तो आगे वाले गावं को नहर मिलनी चाहिए कि नहीं मिलनी चाहिए?

मेरे भाइयो-बहनो, ये व्यावहारिक विषय है। और इसलिए जिस काम के लिए इतनी लम्बी प्रक्रिया न हो, हक और किसान के लिए, ये उद्योग के लिए नहीं है, व्यापार के लिए नहीं है, गावं की भलाई के लिए है, किसान की भलाई के लिए है, उसके बच्चों की भलाई के लिए है।

एक और बात आ रही है। ये बात मैंने पहले भी कही है। हर घर में किसान चाहता है कि एक बेटा भले खेती में रहे, लेकिन बाकी सब संतान रोज़ी–रोटी कमाने के लिए बाहर जाये क्योंकि उसे मालूम है, कि आज समय की मांग है कि घर में घर चलाने के लिए अलग-अलग प्रयास करने पड़ते हैं। अगर हम कोई रोड बनाते है और रोड के बगल में सरकार Industrial Corridor बनाती है, प्राइवेट नहीं। मैं एक बार फिर कहता हूँ प्राइवेट नहीं, पूंजीपति नहीं, धन्ना सेठ नहीं, सरकार बनाती है ताकि जब Corridor बनता है पचास किलोमीटर लम्बा, 100 किलोमीटर लम्बा तो जो रोड बनेगा, रोड के एक किलोमीटर बाएं, एक किलोमीटर दायें वहां पर अगर सरकार Corridor बनाती है ताकि नजदीक में जितने गाँव आयेंगे 50 गाँव, 100 गाँव, 200 गाँव उनको वहां कोई न कोई, वहां रोजी रोटी का अवसर मिल जाए, उनके बच्चों को रोजगार मिल जाए।

मुझे बताइये, भाइयों-बहनो क्या हम चाहतें हैं, कि हमारे गाँव के किसानों के बच्चे दिल्ली और मुंबई की झुग्गी झोपड़ियों में जिन्दगी बसर करने के लिए मजबूर हो जाएँ? क्या उनके घर और गाँव के 20-25 किलोमीटर की दूरी पर एक छोटा सा भी कारखाना लग जाता है और उसको रोजगार मिल जाता है, तो मिलना चाहिये की नहीं मिलना चाहिये? और ये Corridor प्राइवेट नही है, ये सरकार बनाएगी। सरकार बनाकर के उस इलाके के लोगों को रोजगार देने का प्रबंध करेगी। ..और इसीलिए जिसकी मालिकी सरकार की है, और जो गाँव की भलाई के लिए है, गाँव के किसानो की भलाई के लिए है, जो किसानों की भावी पीड़ी की भलाई के लिए हैं, जो गाँव के गरीबों की भलाई के लिए हैं, जो गाँव के किसान को बिजली पानी मोहैया कराने के लिए उनके लिए हैं, उनके लिए इस भूमि अधिग्रहण बिल में कमियाँ थी, उस कमियों को दूर करने का हमारे प्रामाणिक प्रयास हैं।...और फिर भी मैंने Parliament में कहा था की अभी भी किसी को लगता है कोई कमी हैं, तो हम उसको सुधार करने के लिए तैयार हैं।

जब हमने लोकसभा में रखा, कुछ किसान नेताओं ने आ करके दो चार बातें बताईं, हमने जोड़ दी। हम तो अभी भी कहतें कि भाई भूमि अधिग्रहण किसानों की भलाई के लिए ही होना चाहिये। ..और ये हमारी प्रतिबद्धता है, जितने झूठ फैलाये जाते हैं, कृपा करके मैं मेरे किसान भाइयों से आग्रह करता हूँ कि आप इन झूठ के सहारे निर्णय मत करें, भ्रमित होने की जरुरत नहीं है। आवश्यकता यह है की हमारा किसान ताकतवर कैसे बने, हमारा गाँव ताकतवर कैसे बने, हमारा किसान जो मेहनत करता है, उसको सही पैसे कैसे मिले, उसको अच्छा बाज़ार कैसे मिले, जो पैदा करता है उसके रखरखाव के लिए अच्छा स्टोरेज कैसे मिले, हमारी कोशिश है कि गाँव की भलाई, किसान की भलाई के लिए सही दिशा में काम उठाएं।

मेरे किसान भाइयो-बहनो, हमारी कोशिश है कि देश ऐसे आगे बढ़े कि आपकी जमीन पर पैदावार बढ़े, और इसीलिए हमने कोशिश की है, Soil Health Card. जैसे मनुष्य बीमार हो जाता है तो उसकी तबीयत के लिए लेबोरेटरी में टेस्ट होता हैं। जैसा इंसान का होता है न, वैसा अपनी भारत-माता का भी होता हैं, अपनी धरती- माता का भी होता है। और इसीलिए हम आपकी धरती बचे इतना ही नहीं, आपकी धरती तन्दुरूस्त हो उसकी भी चिंता कर रहे हैं।

....और इसलिये भूमि अधिग्रहण नहीं, आपकी भूमि अधिक ताकतवर बने ये भी हमारा काम है। और इसीलिए “Soil Health Card” की बात लेकर के आये हैं। हर किसान को इसका लाभ मिलने वाला है, आपके उर्वरक का जो फालतू खर्चा होता है उससे बच जाएगा। आपकी फसल बढ़ेगी। आपको फसल का पूरा पैसा मिले, उसके लिए भी तो अच्छी मंडियां हों, अच्छी कानून व्यवस्था हो, किसान का शोषण न हो, उस पर हम काम कर रहे हैं और आप देखना मेरे किसान भाइयो, मुझे याद है, मैं जब गुजरात में मुख्यमंत्री था इस दिशा में मैंने बहुत काम किया था। हमारे गुजरात में तो किसान की हालत बहुत ख़राब थी, लेकिन पानी पर काम किया, बहुत बड़ा परिवर्तन आया। गुजरात के विकास में किसान का बहुत बड़ा योगदान बन गया जो कभी सोच नही सकता था। गाँव के गाँव खाली हो जाते थे। बदलाव आया, हम पूरे देश में ये बदलाव चाहते हैं जिसके कारण हमारा किसान सुखी हो।

...और इसलिए मेरे किसान भाइयो और बहनो, आज मुझे आपके साथ बात करने का मौका मिला। लेकिन इन दिनों अध्यादेश की चर्चा ज्यादा होने के कारण मैंने ज़रा ज्यादा समय उसके लिए ले लिया। लेकिन मेरे किसान भाइयो बहनो मैं प्रयास करूंगा, फिर एक बार कभी न कभी आपके साथ दुबारा बात करूंगा, और विषयों की चर्चा करूँगा, लेकिन मैं इतना विश्वास दिलाता हूँ कि आपने जो मुझे लिख करके भेजा है, पूरी सरकार को मैं हिलाऊँगा, सरकार को लगाऊंगा कि क्या हो रहा है। अच्छा हुआ आपने जी भरके बहुत सी चीजें बतायी हैं और मैं मानता हूँ आपका मुझ पर भरोसा है, तभी तो बताई है न! मैं ये भरोसे को टूटने नहीं दूंगा, ये मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ।

आपका प्यार बना रहे, आपके आशीर्वाद बने रहे। और आप तो जगत के तात हैं, वो कभी किसी का बुरा सोचता, वो तो खुद का नुकसान करके भी देश का भला करता है। ये उसकी परंपरा रही है। उस किसान का नुकसान न हो, इसकी चिंता ये सरकार करेगी। ये मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ लेकिन आज मेरी मन की बातें सुनने के बाद आपके मन में बहुत से विचार और आ सकते हैं। आप जरुर मुझे आकाशवाणी के पते पर लिखिये। मैं आगे फिर कभी बातें करूँगा। या आपके पत्रों के आधार पर सरकार में जो गलतियाँ जो ठीक करनी होंगी तो गलतियाँ ठीक करूँगा। काम में तेजी लाने की जरुरत है, तो तेजी लाऊंगा और और किसी को अन्याय हो रहा है तो न्याय दिलाने के लिए पूरा प्रयास करूँगा।

नवरात्रि का पावन पर्व चल रहा है। मेरी आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

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अपनी 100 वर्षों की यात्रा में SRCC ने पीढ़ियों को गढ़ा और उन्हें उज्ज्वल भविष्य से जोड़ा: पीएम मोदी
September 05, 2026
वर्षों से, इस संस्थान ने छात्रों की कई पीढ़ियों को सीखने, आगे बढ़ने और समाज में बदलाव लाने का अवसर दिया है
नीतियों के ठहराव से लेकर नीतियों की सक्रियता तक, भारत ने एक लंबी यात्रा तय की है: प्रधानमंत्री
वैश्विक अस्थिरता के दौर में भारत की 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर देश की आर्थिक मजबूती का प्रतीक है: प्रधानमंत्री
140 करोड़ देशवासी मिलकर भारत को विकसित भी बनाएंगे और आत्मनिर्भर भी: प्रधानमंत्री
भारत आज एक नई गति से आगे बढ़ रहा है, जो काम पहले दशकों में होते थे, वे अब कुछ ही सालों में पूरे हो रहे हैं: प्रधानमंत्री
अगर भारतीय दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों को चला सकते हैं, तो भारत की कंपनियां भी पूरी दुनिया का नेतृत्व कर सकती हैं, यह पूरी तरह संभव है: प्रधानमंत्री

केंद्रीय मंत्रिमंडल के मेरे साथी श्रीमान प्रहलाद जोशी जी, डीयू के वीसी योगेश सिंह जी, SRCC की प्रिंसिपल सिमरित कौर जी, अजय जी, मल्लिका जी, रजत जी, SRCC से जुड़े हुए सभी साथी, फैकल्टी, स्टाफ, SRCC alumni और मेरे युवा साथियों!

मैं छठा खिलाड़ी हूं। आज का ये अवसर श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के लिए बहुत ऐतिहासिक है, ये देश के शिक्षा जगत के लिए भी उतना ही अहम है। यहां SRCC का हिस्सा रहीं अनेक पीढ़ियां एक साथ जुटी हैं। मैं आप सभी को, SRCC के इस शताब्दी समारोह के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं। मैं इसके संस्थापक सर श्रीराम जी को आदरपूर्वक श्रृद्धांजलि देता हूं, उनके विजन को नमन करता हूं।

साथियों,

जब कोई इंसान 100 वर्ष जीता है, तो उसे अनुभवों का सागर माना जाता है। और जब कोई संस्थान 100 वर्ष का होता है, तो वो उपलब्धियों और प्रेरणाओं का महासागर हो जाता है। अपनी 100 वर्षों की इस यात्रा में, SRCC ने पीढ़ियों को गढ़ा है, उन्हें उज्ज्वल भविष्य से जोड़ा है। जो आए उन्होंने पढ़ा, और जो निकले वो गढ़े हुए निकले। इस कॉलेज की यात्रा दरियागंज की, वहां एक छोटे से स्थान से शुरु हुई थी, और आज वही छोटा सा कॉलेज, एक विशाल वृक्ष बन चुका है। एक ऐसा विशाल वृक्ष जिसने कई पीढ़ियों को छांव भी दी है, और अपनी शीतलता से समृद्ध भी किया है। आज भी DU में जब कोई पूछता है कि कौन सा college, तो SRCC कहना ही, SRCC कहना ही अपने आप में ही एक flex होता है।

साथियों,

SRCC के alumni भी बहुत special रहे। अगर मैं आपकी भाषा में कहूं, तो यहां के alumni, OG हैं, जिन्होंने SRCC का नाम दुनिया भर में पहुँचाया, अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी एक पहचान बनाई। और रजत जी ने बड़ी लंबी सूची बताई थी। और इनमें से कुछ के साथ मुझे भी काम करने का अवसर मिला है। हमारे अरुण जेटली जी, यहीं पढ़े थे। और मैं कह सकता हूं कि शायद हमारी कोई मुलाकात ऐसी नहीं होती थी, कि वो SRCC की घटना न सुनाते हों। और कभी-कभी मैं तंग आ जाता था, कि एक ही घटना बार-बार सुनाते थे। अभी मेरी टीम में भाई संजीव सान्याल भी, यहीं से पढ़े हुए हैं। बाकी भी काफी साथी हैं यहां मेरे। और ऐसा नहीं है कि यहां से सिर्फ अर्थ-जगत के ही लोग निकले, कितने ही आर्टिस्ट्स से लेकर नेता, वकील, जस्टिस सब यहां से निकले हैं। यानी SRCC के लोगों ने हर क्षेत्र में अपनी धूम मचाई है। धुरंधर न हो लेकिन धूम तो मचाई है।

साथियों,

बीते कुछ दिनों से इस कार्यक्रम की बहुत चर्चा चल रही है। खासतौर पर लोग 2013 के मेरे संबोधन को याद कर रहे हैं। लोगों ने उसको फिर से सुना है, फिर से पढ़ा है, संभव है, इस नई पीढ़ी के लोगों ने भी उसको री-विजिट किया होगा। उस स्पीच के एक प्रकार से मैं कह सकता हूं कि Wave बन गई थी, एक लहर सी चल पड़ी थी। और आज भी, 13-14 साल बाद भी, उस सभा का, उस संबोधन का प्रभाव बरकरार है।

साथियों,

तब आपकी जगह आपके सीनियर बैठे थे। और मैं तब सीएम तो था, लेकिन मैं देश की मुख्य विपक्षी पार्टी का एक सदस्य भी था। और संभवत: तब लोग ये उम्मीद कर रहे थे, कि मैं तब की केंद्र सरकार पर लंबे-चौड़े अटैक करूंगा, आरोपों की झड़ी लगा दूंगा।

लेकिन साथियों,

विपक्ष में होने के बाद भी, तत्कालीन सरकार का आलोचक होने के बावजूद, मैंने इस मंच का वो उपयोग नहीं किया था, मैंने एक विजन रखा, सकारात्मक बातें कहीं। मैंने तब जो कुछ भी कहा, वो मेरा कन्विक्शन था। मैं उन बातों को, उन सपनों को हमेशा से जीता आया हूँ, उस रास्ते पर ही चलता रहा हूँ, देश के लिए जी-जान से जुटना, देश के लिए जीने का जज्बा, जो मेरे भीतर का भाव-विश्व है, वो उस दिन 2013 में इसी मंच से, मेरा वो भाव-विश्व शब्दों की माला में एक एक करके प्रकट होता चला गया था। और मैं देर तक बोला था फिर मैंने मैंने स्टूडेंट्स से पूछा कि क्या मैं continue कर दूं, उन्होंने जोर से कहा हाँ continue कीजिए।

साथियों,

मैंने उस दिन पानी के ग्लास का एक उदाहरण दिया था, और देश में उसकी खूब चर्चा भी हुई थी। मैंने बताया था कि पानी से आधे भरे ग्लास को देखने के तीन नज़रिए क्या होते हैं। एक, जिनको ग्लास पानी से आधा भरा दिखता है, दूसरा, जिनको ग्लास आधा खाली दिखता है, और तीसरा, जिनको ग्लास पूरा भरा हुआ दिखता है, आधा पानी और आधा हवा से भरा।

साथियों,

ये वो समय था, जब देश निराशा के दलदल में धंसा हुआ था। मैंने तब भी कहा था, कि मैं ग्लास को आधा नहीं देखता, अधूरा नहीं देखता, गिलास को पूरा भरा हुआ देखता हूं। आधा पानी से, आधा हवा से। और उस समय आप सब तो स्कूल में रहे होंगे, लेकिन आज इंटरनेट पर जाकर के 2013 और उसके आसपास की खबरें अगर पढ़ेंगे, तो आपको अंदाजा आएगा, तब सिचुएशन क्या थी? और मैं तो आपसे आग्रह करूंगा नौजवानों से, कि जरा 2013 के उस कालखंड की तरफ इंटरनेट पर जाकर के नजर करिए। 2013 में मेरे उस भाषण के आसपास के कालखंड की उस समय जो हेडलाइन्स हुआ करती थीं। अखबारों की हो या टीवी चैनल्स की हो। मैं जरा आज उस हेडलाइन्स में क्या क्या था, उसकी एक झलक आपको दिखाना चाहता हूं। अब एक गैंग है, जो क्या करेगी, मैं जो बोल रहा हूं ना उसके छोटे-छोटे टुकड़े करके मेरे खाते में डाल देगी। और इसलिए मैं पहले से आगाह करता हूं कि मैं जो बातें बता रहा हूं 2013 के उस कालखंड में मीडिया में क्या छाया रहता था जैसे-

LoC पर भारतीय सैनिकों की हत्या, अब इस पीढ़ी को जरा अजूबा लगता होगा ऐसा भी होता था। होता था।

वर्ल्ड बैंक ने GDP ग्रोथ रेट का अनुमान घटाया

करंट अकाउंट डेफिसिट ऑल टाइम हाई

महंगाई दर करीब दस परसेंट पर

इडस्ट्रियल सेक्टर मंदी की चपेट में

हेलीकॉप्टर सौदे में घूसखोरी का पर्दाफाश

हैदराबाद में बम धमाके

ये सारी उस समय की हेडलाइन्स थीं। मैं पक्का मानता हूं, ये जो हमारे आज जो विद्यार्थी हैं, उनको इन सारी बातों का पता नहीं होगा। ये सारी बातें बताती हैं कि तब देश की क्या हालत थी। ग्रोथ फर्श पर थी और महंगाई अर्श पर थी। घोटाले चरम पर थे और भ्रष्टाचारी बेखौफ घूमते थे। अर्थव्यवस्था बेहाल थी, चारों तरफ पॉलिसी पैरालिसिस की ही चर्चा थी। दुनिया भारत को फ्रैजाइल फाइव में गिन रही थी। आतंकी बेलगाम थे और पाकिस्तान बेकाबू था। यानी तब निराशा और हताशा के अलावा कुछ नहीं था।

साथियों,

एक वो दिन था जब हर मोर्चे पर, देश में स्ट्रगल ही स्ट्रगल था, और एक आज का दिन है, आज आतंकवाद फैलाने वाले पस्त पड़े हैं। पाकिस्तान कोई नापाक हरकत करता है, तो भारत की सेनाएं घर में घुसकर मारती हैं। जम्मू-कश्मीर से लेकर नॉर्थ ईस्ट तक शांति बढ़ी है। माओवादी आतंक, नक्सलवाद की कमर तोड़ दी गई है। जो दुनिया तब भारत में पॉलिसी पैरालिसिस से चिंतित थी, वो दुनिया आज भारत के पॉलिसी डायनामिज्म की चर्चा कर रही है। तब दुनिया भारत को फ्रजाइल फाइव बता रही थी, आज दुनिया भारत को फास्टेस्ट ग्रोइंग मेजर इकॉनॉमी बनते हुए देख रही है। अभी हफ्तेभर में ही, भारत की इकॉनॉमी को लेकर कई सारी पॉजिटिव खबरें आई हैं। Seven point eight percent क्वाटर्ली ग्रोथ ने देश का जोश बढ़ाया है, और इसी बीच जैपनीज़ Credit Rating Agency ने भारत की रेटिंग अपग्रेड कर दी है।

और साथियों,

ये Seven point eight percent की ग्रोथ भी ऐसे समय में आई है, जब west asia का युद्ध चल रहा है, जब ट्रेड से जुड़ी कई तरह की अड़चनें रही हैं, उस समय ऐसी ग्रोथ हासिल करना, ये अपने आप में भारत के सामर्थ्य को दिखाता है।

साथियों,

मैं जानता हूं, आप भी जानते हैं, जो लोग, भारत को फ्रैजाइल फाइव में धकेलने के लिए बदनाम रहे हैं, उनको ये आंकड़े हज़म नहीं हो रहे हैं। लेकिन आप सभी आंकड़ों को गंभीरता से समझते हैं। अप्रैल से जून के बीच, बिजली उत्पादन, नाइन परसेंट बढ़ा, गाड़ियों की सेल में ट्वेंटी परसेंट से अधिक की वृद्धि हुई। इसमें भी, टू-व्हीलर में, ट्वेंटी परसेंट, और थ्री व्हीलर की बिक्री में करीब करीब थर्टी परसेंट की ग्रोथ रही है। यानी consumer demand भी चल रही है, और commercial activity भी तगड़ी हो रही है। Steel और सीमेंट कंजम्शन की ग्रोथ में 8 परसेंट की वृद्धि हुई है। यानी construction, housing, infrastructure और industrial activity, ये सब बढ़ रहा है। यानी भारत, ग्रो भी कर रहा है, और रोजगार के नए अवसर भी बना रहा है। बावजूद इसके, जिन लोगों के लिए साल 2013 में ग्लास आधा खाली था, उनकी सोच आज भी वैसी ही है। उनके लिए ग्लास हमेशा आधा खाली रहेगा। मैं ग्लास की बात करता हूं, और कुछ खाली रहने की बात नहीं कर रहा हूं।

साथियों,

2013 में यहां SRCC में बात करते हुए, मैंने P2G2 यानी प्रो-पीपल गुड-गवर्नेंस की भी चर्चा की थी। जिन्होंने लंबे समय तक देश में सरकारें चलाई हैं, उनका एक स्टाइल था, जब आग लगे तभी नींद से जागो, जब सूखा पड़े तब जाकर कुआं खोदो। मैंने इसी अप्रोच को बदलने की बात कही थी। और 2014 में सरकार बनने के बाद हमने ये करके दिखाया है। मैं आपको एक उदाहरण देता हूं।

साथियों,

हाल में ही, जनधन योजना को 12 साल पूरे हुए हैं। आज आप फिनटेक के अलग ही दौर में जी रहे हैं, लेकिन 2013 के वो दिन भी थे जब गांव या छोटे शहरों के स्टूडेंट्स को, सेविंग बैंक अकाउंट्स खुलवाने के लिए भी कई पापड़ बेलने प़ड़ते थे। उस समय हमारी आबादी सवा सौ करोड़ के पार थी, लेकिन मार्च 2014 तक, देश की 50 प्रतिशत से ज्यादा आबादी के पास बैंक अकाउंट्स तक नहीं थे। और जो बैंकिंग सिस्टम से बाहर थे, वो ज्यादातर गरीब थे, महिलाएं थीं, माइग्रेंट लेबरर थे, स्टूडेंट्स थे। इसलिए हम जनधन स्कीम लेकर आए, और बीते 12 वर्षों में जनधन योजना की वजह से, करीब 60 करोड़ नए बैंक अकाउंट खुले। आज देश में लगभग हर परिवार बैकिंग सिस्टम से जुड़ा हुआ है। यही भारत की फिनटेक क्रांति का आधार बना है।

साथियों,

अब आप उन लोगों के बारे में भी सोचिए, जो करोड़ों लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने का भी विरोध कर रहे थे। दरअसल ऐसे लोगों को, आधे भरे ग्लास में ही मज़ा आता है, ताकि देश के गरीब सामान्य नागरिक उनके आगे-पीछे घूमते रहें, यही माई-बाप कल्चर ये दशकों से चला रहे थे। लेकिन ये मोदी है, माई-बाप कल्चर पसंद करने वालों के सामने वो चट्टान की तरह खड़ा है।

साथियों,

पुरानी कहावत है, सांच को आंच नहीं। मुझमें हिम्मत है, इसीलिए मैं उस दिन कही बातों को याद करा रहा हूं, अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर आया हूं आपके पास। मैं जानता हूं, सच की हुंकार के आगे, झूठ की गूंज टिक नहीं सकेगी।

साथियों,

2013 के उसी कार्यक्रम में जब मैंने कहा कि हमें मेड इन इंडिया पर काम करना है, तो पुराने उस समय के इकोसिस्टम के लोगों को ये समझ ही नहीं आया था। उनको लगता था, कि निराशा के उस दौर में मेड इन इंडिया संभव ही नहीं होगा! और उस सोच में पले-बड़े लोग आज भी, मेड इन इंडिया का मजाक करते हैं।

लेकिन साथियों,

आज आप मेक इन इंडिया की ब्रैंड वैल्यू देख रहे हैं। आपसे मैं एक उदाहरण के साथ बात बताना चाहता हूं। आज हर हाथ में स्मार्टफोन है, दुनिया के बड़े से बड़े फोन ब्रैंड, आज भारत को अपना बेस बना रहे हैं। मेड इन इंडिया स्मार्टफोन, दुनिया के कोने-कोने में पहुंच रहा है। 2014 में भारत अपने ज्यादातर मोबाइल फोन इंपोर्ट करता था। आज भारत ढाई लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के मोबाइल एक्सपोर्ट करता है।

साथियों,

मैं छोटे और आसान लक्ष्य लेकर चलने वाला व्यक्ति नहीं हूं। मैं देश के लिए बड़े लक्ष्य रखता हूं, और उन्हें पूरा करने के लिए जी-जान लगा देता हूं। आप डिफेंस का सेक्टर देखिए, पहले भारत की सेनाओं के लिए ज्यादातर चीज़ें बाहर से खरीदी जाती थीं। मैंने आते ही डिफेंस वालों को बोला नेगेटिव लिस्ट बनाईये। पहले उन्होंने 500 नेगेटिव लिस्ट बनाई, बोले ये हम बाहर से नहीं लाएंगे। फिर हजार बनाई, फिर तीन हजार बनाई। आर्मी, नेवी, एयरफोर्स को, कई बार छोटे से किसी इक्विप्मेंट के लिए भी महीनों इंतजार करना पड़ता था। हमने देश की सेनाओं के साथ मिलकर एक प्लान बनाया, चीज़ों की लिस्ट बनाई, फिर भारतीय कंपनियों को कहा कि ये सब बनाओ, और आज आप देखिए, देश की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग, अपने ऑल टाइम हाई पर है। आज भारत करीब-करीब 2 लाख करोड़ रुपये का डिफेंस प्रोडक्शन कर रहा है। 2013-14 में, हम 600-700 करोड़ रुपये का डिफेंस एक्सपोर्ट करते थे। आज ये आंकड़ा, करीब-करीब 40 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। और ये अचीवमेंट्स इसलिए हो पा रहे हैं, क्योंकि आज देश में एक वाइब्रेंट डिफेंस मैन्युफेक्चरिंग इकोसिस्टम बन रहा है।

साथियों,

मुझे देश पर भरोसा है, देश के सामर्थ्य पर भरोसा है, आप युवाओं पर मेरा भरोसा है, और इसी भरोसे के आधार पर मैं विकसित भारत की बात भी कहता हूं। मुझे विश्वास है, हम 140 करोड़ भारतीय मिलकर अपने देश को विकसित भी बनाएंगे, आत्मनिर्भर भी बनाएंगे।

आने वाले समय में, भारत, मैन्यूफैक्चरिंग का हब होगा।

आने वाले समय में रिसर्च एंड इनोवेशन का हब हिन्दुस्तान होगा।

भारत,एग्रीकल्चर एक्सपोर्ट की सुपर पावर होगा।

मेरे नौजवान दोस्तों,

भारत का अपना स्पेस स्टेशन होगा,

और वो दिन भी आप देखेंगे, जब भारत एक दिन ऐसे ओलंपिक्स का आयोजन करेगा कि दुनिया देखती रह जाएगी।

और ये केवल बातें नहीं है, ये हमारे संकल्प हैं। और इन संकल्पों को सिद्धि में बदलने के लिए देश में लगातार काम हो रहा है।

साथियों,

अभी तो आपकी ज़िंदगी SRCC मोड में चल रही है। को-ऑप में चाय हो, या cold coffee पर होने वाली discussions हों, exam में last-minute notes, और printouts के लिए भाग-दौड़ करना, या फिर Crossroads और Business Conclave पर की गई मेहनत है, आप सब ने यहाँ के हर मोमेंट को अपने जीवन की एक memory बनाया है। लेकिन इस कैंपस के बाहर एक नई दुनिया आपको मिलेगी। आपको दो तरह के लोग मिलेंगे। एक वो लोग, जो पॉजिटिव तरीके से समाज की शक्ति को राष्ट्र की शक्ति में बदलते हैं। दूसरी प्रजाति उन लोगों की है, जो कोई भी काम शुरू होने पर नाराज़ फूफा बन जाते हैं, उनका फेवरेट काम होता है, हर काम का विरोध करना। इनका एक ही डायलॉग होता है, इसकी क्या ज़रूरत है?, इसकी क्या ज़रूरत है?, ये हर फूफा का परमानेंट डॉयलोग होता है। जब हम दुनिया का सबसे बड़ा Statue बना रहे थे, तो फूफा जी ने कमर कस ली, कहा इसकी ज़रूरत ही क्या है? हमने High-Speed Train पर काम शुरू किया, तो फूफा जी फिर बोले, इसकी ज़रूरत ही क्या है? हम UPI लेकर आए, तो यही फूफा लोग कहते थे - Why UPI? UPI की ज़रूरत ही क्या है? हमने चिप बनाने की बात की, तो फिर कहा गया, कि ज़रूरत ही क्या है? हमने नई पार्लियामेंट बिल्डिंग बनाई, तो ये फिर बोले - इसकी जरूरत ही क्या है? हमने देश के लिए मरने मिटने वाले, सर्वश्रेष्ठ बलिदान देने वाले हमारे वीर सेनानायकों का मेमोरियल बनवाया, फूफा फिर मैदान में आ गए, इसकी क्या जरूरत थी? लेकिन भारत ने ऐसे सारे फूफाओँ को जवाब दिया, जो देश के लिए जरूरी है, वो भारत को करने से कोई रोक नहीं सकता।

साथियों,

आज भारत एक अलग मिजाज के साथ आगे बढ़ रहा है। जो काम पहले दशकों में होता था, अब वो कुछ वर्षों में ही हो रहा है। मैं पूरे Facts के साथ एक और उदाहरण दूंगा। भारत की पहली Electric ट्रेन 1925 में चली थी। आपकी कॉलेज 1926 में शुरू हुई, Electric ट्रेन 1925 में चली थी। 1925 में चली थी ये ट्रेन, इसके बाद 2014 तक, यानी 90 इयर्स, 90 साल में सिर्फ 30 परसेंट से भी कम काम हुआ। 30 परसेंट से भी कम रेलवे लाइनों का इलेक्ट्रिफिकेशन हो पाया था। हमने सिर्फ 12 साल में, 12 साल में रेलवे लाइनों का करीब-करीब Hundred Percent इलेक्ट्रिफिकेशन करके दिखा दिया।

साथियों,

भारत की नीति-निर्णयों में आई ये गति दुनिया के बाकी देश भी देख रहे हैं, समझ रहे हैं। इसलिए वो भारत के साथ अपनी पार्टनरशिप बढ़ा रहे हैं। बीते दशक में करीब 40 देशों के साथ व्यापार समझौते हुए हैं, Free Trade Agreement हुए हैं। इससे लेदर हो, टेक्स्टाइल हो, फ्रूट-वेजिटेबल हो, हमारा प्रोसेस्ड फूड हो, श्रिंप हो, ऐसी हर चीज के लिए नए-नए बाज़ार खुल रहे हैं। आपसे बेहतर कौन जानता है कि जब नए बाज़ार खुलते हैं, भारत के गुड्स और सर्विसेज़ के लिए टैरिफ कम होते हैं, तो उसका क्या मतलब होता है। ये भारत के नौजवानों के लिए, अवसरों का नया आसमान बन रहा है।

साथियों,

आज 2013 के मुकाबले, देश आर्थिक रूप से, सामाजिक रूप से कहीं अधिक सुरक्षित है। लेकिन ये देखकर कुछ लोगों की छटपटाहट बढ़ रही है, बौखलाहट बढ़ रही है। अभी 15 अगस्त का मेरा भाषण आपने सुना होगा, ऐसे लोगों के लिए अभी मैंने लाल किले से, एक होम्योपैथी का डोज दिया था, होम्योपैथी की गोली एक छोटी सी गोली दी थी लाल किले से, और आप जानते हैं होम्योपैथी के कहते हैं कि स्वभाव ऐसा है कि होम्योपैथी की दवाई जब शुरू करते हैं, तो शुरू के दौर में बीमारी एक दम से ज्यादा बढ़ जाती है, ये होम्योपैथी का स्वभाव है। तो मैंने लाल किले से एक होम्योपैथी की गोली दी थी - दिमाग़ी नक्सल। ये दिमागी नक्सल होम्योपैथी का इलाज, जैसा मैंने कहा बीमारी को कुछ समय के लिए और उभार देता है। और उसके बाद उसका इलाज शुरू करता है। इसी तरह जैसे ही मैंने दिमाग़ी नक्सल वाली होम्योपैथी की गोली दी, सारे दिमागी नक्सल निकल-निकल के बाहर आने लगे। और जो इस बीमारी को बढ़ावा दे रहे हैं, अब जनता उनका भी असली रंग देख रही है।

साथियों,

मैंने इतनी सारी बातें बताईं, कुछ लोगों को लग सकता है, अरे क्या है भाई, 140 करोड़ का देश है, बहुत आसान था, मोदी ने क्या नया किया? लेकिन क्या ये वाकई इतना आसान था? मैं आपको फिर एक बार पुराने दिनों में ले जाना चाहता हूं। याद कीजिए आप जब स्कूल में पढ़ते होंगे। 2013 में केदारनाथ में आपदा आई थी। तो पूरी सरकार हिल गई थी। उनको समझ ही नहीं आ रहा था कि, क्या किया जाए? कैसे किया जाए? 2008 में बैंकों का संकट आया था, तो तब की सरकार ने 2014 तक उस संकट के पीछे छुपने की कोशिश की थी, हाथ तक लगाने की हिम्मत नहीं की। भारत का पूरा बैंकिंग सिस्टम, तबाह होने के कगार पर पहुंचा दिया गया था। 2008 में ही मुंबई में भयंकर आतंकी हमला हुआ था, तो तब की सरकार पर बाहर से दबाव पड़ा, और उसने पाकिस्तान को सबक सिखाने की हिम्मत तक नहीं दिखाई।

साथियों,

पिछले 12 वर्षों में तो देश में कई सारी आपदाएं आईं, इतने बड़े-बड़े साइक्लोन हमने झेलें हैं, लेकिन देश ने बहुत मजबूती से उनका सामना किया। पिछले 6 वर्षों में तो बहुत बड़े संकट आए हैं। पहले कोरोना जैसी महामारी आई, जिसने पूरी दुनिया को ठप कर दिया। फिर रूस और यूक्रेन में युद्ध छिड़ गया। उसके बाद, ट्रेड को, सप्लाई चैन को ही वेपनाइज करने का दौर शुरु हो गया। फिर वेस्ट एशिया का ये संकट आया, हर बार ये कहा गया कि अब तो भारत नहीं बचेगा और जो मेरे ज्यादा ही प्रशंसक हैं, वो ये सोचकर खुश थे कि अब तो मोदी फंसा, अब तो मोदी गिरा, अब तो उसे कुचल ही देंगे, लेकिन मेरे देश के लोगों के आशीर्वाद में इतना दम है, इतना दम है कि, भारत का बुरा चाहने वालों की हर हसरत धरी की धरी रह जा रही है।

दोस्तों,

अब 21वीं सदी में नए अवसरों की दुनिया हमारे सामने है। मुझे खुशी है कि आप ambitious हैं, क्योंकि ambition किसी textbook से नहीं सिखाई जा सकती। Ambitions उस माहौल से आती है, जो आपको बड़े सपने देखने के लिए आपको प्रेरित करती है। आज हमारा नौजवान साथी कहता है कि अपना कुछ काम करुंगा, तो स्टार्ट-अप करुंगा, कंपनी बनाऊँगा, तो unicorn बनाऊँगा। स्पेस और ड्रोन जैसे सेक्टर में जुडूंगा, कुछ बड़ा करूंगा। Cutting-edge AI सोल्यूशन्स बनाऊँगा, खेती में इनोवेशन करूंगा। 13 साल पहले आपके सीनियर्स, ऐसे सपने नहीं देख पाते थे। लेकिन आज आप ये सपने भी देख रहे हैं, क्योंकि आज के भारत में उन सपनों को सपोर्ट करने वाला इकोसिस्टम भी बन गया है।

साथियों,

अब समय बड़े लक्ष्य बनाने और उन्हें प्राप्त करने का है। अभी मैंने लाल किले से कुछ बातें कहीं थीं। मैं आपके बीच भी उन्हें दोहराना चाहूंगा। आप संकल्प लीजिए, भारत की global consulting firms क्यों नहीं हो सकतीं? हमारी accounting Firms, हमारी legal firms, हमारी financial firms, ये सब global leaders क्यों नहीं बन सकतीं? हम गर्व से कहते हैं कि आज भारतीय दुनिया की टॉप कंपनीज़ को लीड कर रहे हैं, अगर भारतीय दुनिया की टॉप कंपनियों को लीड कर रहे हैं, तो भारतीयों की बनाई कंपनियां, दुनिया को क्यों लीड न करें?

साथियों,

ये सब संभव है, इसके लिए आपके पास networks भी हैं और knowledge भी है।

साथियों,

हमारी आपकी प्रेरणा SRCC का ये कॉलेज क्रेस्ट भी है। इसमें दो सुंदर प्रतीक हैं। एक है- उगता हुआ सूरज, और दूसरा है - समुद्र में आगे बढ़ता हुआ जहाज। सूरज, जो दिशा दिखाता है और जहाज, जो उस दिशा में आगे बढ़ता है। हमें ऐसे नए रास्ते पर चलना है, जिसमें सूरज हमारा हो, समंदर भी हमारा हो। नाव हमारी हो, नाविक भी हमारा हो। लहरों पर विजय लिखे, वो हौसला हमारा हो। उड़ान हमारी हो, आसमान हमारा हो। तेज हवाओं से टकराए, वो जज़्बा हमारा हो। सपना हमारा हो, संकल्प हमारा हो, आत्मनिर्भर भारत का परचम हमारा हो। विकसित भारत की राह में, विकसित भारत की राह में तेजी से उठता हर कदम हमारा हो। एक बार फिर इस विशेष अवसर पर SRCC से जुड़े सभी लोगों को मेरी ढेर सारी शुभकामनाएँ।

वंदेमातरम्