दोनों नेताओं ने भारत-डेनमार्क हरित रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई
यूक्रेन संघर्ष के शांतिपूर्ण और शीघ्र समाधान पर दोनों नेताओं ने विचारों का आदान-प्रदान किया
प्रधानमंत्री फ्रेडरिक्सन ने भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को शीघ्र पूरा करने के लिए समर्थन व्यक्त किया

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन के साथ टेलीफोन पर बातचीत की।

दोनों नेताओं ने व्यापार, निवेश, नवाचार, ऊर्जा, जल प्रबंधन, खाद्य प्रसंस्करण और सतत विकास जैसे क्षेत्रों में भारत-डेनमार्क हरित रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने की अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की।

प्रधानमंत्री मोदी ने यूरोपीय संघ परिषद की डेनमार्क की वर्तमान अध्यक्षता और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता की सफलता के लिए अपनी शुभकामनाएं दीं।

दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय और वैश्विक महत्व के मुद्दों पर भी चर्चा की। प्रधानमंत्री ने यूक्रेन संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान और शांति एवं स्थिरता की शीघ्र बहाली के लिए भारत के निरंतर समर्थन को दोहराया।

प्रधानमंत्री फ्रेडरिक्सन ने पारस्परिक रूप से लाभकारी भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को शीघ्रातिशीघ्र पूरा करने तथा 2026 में भारत द्वारा आयोजित किए जाने वाले एआई इम्पैक्ट शिखर सम्मेलन की सफलता के लिए भी समर्थन जताया।

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प्रधानमंत्री ने पावन पृथ्‍वी को राष्ट्र की शक्ति के स्रोत के रूप में वर्णित करने वाले संस्कृत सुभाषितम् को साझा किया
March 10, 2026

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने संस्कृत में रचित सुभाषितम् को साझा किया, जिसमें पावन पृथ्‍वी को राष्ट्र की शक्ति के स्रोत के रूप में वर्णित किया गया है।

“यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः।

यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः।

सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे॥”

सुभाषितम् का अर्थ है कि पृथ्वी, जो महासागरों के रूप में जल से परिपूर्ण है और बाहरी रूप से जल से घिरी है, जिसे विद्वानों ने अपने ज्ञान से जाना है और जिसका हृदय विशाल आकाश में शाश्वत सत्य से ओत-प्रोत है - वह पृथ्वी एक महान राष्ट्र के रूप में हमारी ऊर्जा और शक्ति को बनाए रखे।

प्रधानमंत्री ने एक्‍स पर अपनी पोस्‍ट में लिखा;

“यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः।

यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः।

सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे॥”