"जन-जन का स्वस्थ जीवन न्यू इंडिया का दृढ़ संकल्प है"
"आने वाले वर्ष उन लोगों के होंगे जिन्होंने स्वास्थ्य सेवा में निवेश किया है"

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले 8 वर्षों के दौरान भारत में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को मजबूत करने के लिए किए गए उपायों का विवरण साझा किया है।

प्रधानमंत्री ने ट्वीट में कहा:

“जन-जन का स्वस्थ जीवन न्यू इंडिया का दृढ़ संकल्प है। आयुष्मान भारत से लेकर जन औषधि केंद्र तक और मेडिकल इन्फ्रास्ट्रक्चर से लेकर मुफ्त टीकाकरण तक देश ने जो राह तय की है, वो आज पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बनी है। #स्वस्थ भारत के 8 वर्ष”

“आने वाले वर्ष उन लोगों के होंगे जिन्होंने स्वास्थ्य सेवा में निवेश किया है।

हमारी सरकार ने भारत में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को मजबूत करने के लिए जो काम किया है, उस पर मुझे गर्व है। #स्वस्थ भारत के 8 वर्ष”

"स्वास्थ्य देखभाल हमारे प्रमुख फोकस क्षेत्रों में से एक है। पिछले 8 साल स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को बढ़ाने, हर भारतीय के लिए सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करने और इस क्षेत्र के साथ प्रौद्योगिकी को एकीकृत करने के बारे में रहे हैं। #स्वस्थ भारत के 8 वर्ष"

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प्रधानमंत्री ने प्रकृति के प्रति सम्मान और पर्यावरण संरक्षण पर प्रकाश डालते हुए संस्कृत सुभाषितम् साझा किया
July 30, 2026

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा कि प्रकृति, पर्यावरण और संपूर्ण सृष्टि के प्रति सम्मान हमारे अस्तित्व का मूल आधार है। उन्होंने सभी से स्वस्थ, समृद्ध और मजबूत राष्ट्र के निर्माण में कृतज्ञता और निस्वार्थ सेवा की भावना के साथ भाग लेने का आह्वान किया।

प्रधानमंत्री ने एक संस्‍कृत सुभाषितम् साझ किया

“शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु।

शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः॥”

सुभाषितम् में कहा गया है कि सृष्टि के आरंभ से ही पूजनीय द्युलोक और पृथ्वी हमारे लिए सदा श्रद्धेय रहे हैं। ईश्‍वर करे, पृथ्वी और सूर्य के बीच का मध्यवर्ती भाग हमारे जीवन को लाभप्रद और ज्ञानवर्धक बनाए। सभी औषधीय जड़ी-बूटियां और वन के पौधे हमें स्वास्थ्य, पोषण एवं सुख प्रदान करें। समस्त लोकों के सर्वव्यापी और विजयी स्वामी हमें सदा कल्याण, शांति तथा समृद्धि प्रदान करें।

प्रधानमंत्री ने एक्‍स पर लिखा;

“प्रकृति, पर्यावरण और समस्त सृष्टि का सम्मान हमारे अस्तित्व के मूल में है। आइए, हम इनके प्रति पूरी कृतज्ञता और सेवाभाव के साथ एक स्वस्थ, समृद्ध और सशक्त राष्ट्र के निर्माण में सहभागी बनें।

शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु।

शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः॥”