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प्लांट से लेकर आपकी प्लेट तक, शारीरिक मजबूती से लेकर मानसिक कल्याण तक, आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा का प्रभाव अत्यधिक है : प्रधानमंत्री मोदी
लोग इम्यूनिटी बढ़ाने में आयुर्वेद के लाभों को महसूस कर रहे हैं: प्रधानमंत्री मोदी
वेलनेस टूरिज्म का सबसे मजबूत स्तंभ आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा है: प्रधानमंत्री मोदी

आप सभी का अभिनंदन।

नमस्कार!

मंत्रालय में मेरे सहयोगी किरन रिजिजू जी, मुरलीधरन जी, वैश्विक आयुर्वेद महोत्सव के महासचिव डॉ. गंगाधरन जी, फिक्की के अध्यक्ष उदय शंकर जी, डॉ. संगीता रेड्डी जी।

 

प्रिय मित्रों,

चौथे वैश्विक आयुर्वेद महोत्‍सव को संबोधित करते हुए मुझे प्रसन्‍नता हो रही है। यह जानकार काफी अच्‍छा लगा कि यहां कई विशेषज्ञ अपने विचारों और अनुभवों को साझा करने जा रहे हैं। इसमें प्रतिनिधत्‍व करने वाले देशों की संख्‍या 25 से अधिक है। यह एक अच्‍छा संकेत है। यह आयुर्वेद एवं पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में लोगों की बढ़ती रुचि को दर्शाता है। मैं इस मंच से दुनिया भर में आयुर्वेद पर काम करने वाले सभी लोगों के प्रयासों की सराहना करना चाहूंगा। उनके जुनून और दृढ़ता से पूरी मानवता को लाभ होगा।

 

मित्रों,

आयुर्वेद प्रकृति एवं पर्यावरण के लिए भारतीय संस्कृति के सम्मान के साथ करीब से जुड़ा हुआ है। हमारे ग्रंथों में आयुर्वेद का शानदार वर्णन करते हुए कहा गया है: हिता-हितम् सुखम् दुखम्, आयुः तस्य हिता-हितम्। मानम् च तच्च यत्र उक्तम्, आयुर्वेद स उच्यते।। यानी आयुर्वेद कई पहलुओं का ध्यान रखता है। यह स्वास्थ्य एवं दीर्घायु को सुनिश्चित करता है। आयुर्वेद को एक समग्र मानव विज्ञान के रूप में वर्णित किया जा सकता है। पौधों से लेकर आपकी थाली तक, शारीरिक ताकत से लेकर मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य तक आयुर्वेद एवं पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का प्रभाव अपार है।

 

मित्रों,

यह भी कहा गया है कि 'स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं'। इसका अर्थ यह है कि आयुर्वेद मौजूदा बीमारियों का इलाज करने के अलावा शरीर के समग्र स्वास्थ्य की भी रक्षा करता है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि आयुर्वेद रोग से ज्यादा नीरोग की बात करता है। यदि कोई वैद्य के पास जाता है तो उसे न केवल दवा दी जाती है बल्कि कुछ मंत्र भी दिया जाता है जैसे- भोजन करें आराम से, सब चिंता को मार। चबा-चबा कर खाइए, वैद्य न आवे द्वार॥ इसका तात्‍पर्य यह है कि बिना किसी तनाव के भोजन का आनंद लें। भोजन के हरेक कौर का आनंद लें और उसे धैर्यपूर्वक चबाएं। ऐसा करने से आपको आपको फिर कभी वैद्यराज को घर नहीं बुलाना पड़ेगा यानी आप निरोग बने रहेंगे।

 

मित्रों,

मैंने जून 2020 में फाइनेंशियल टाइम्स का एक लेख पढ़ा था। शीर्षक था- कोरोनावायरस गीव्‍स 'हेल्‍थ हैलो' प्रोडक्‍ट्स अ बूस्‍ट यानी कोरोनावायरस से 'स्वास्थ्यवर्धक' उत्पादों को बढ़ावा। इसमें हल्दी, अदरक एवं अन्य मसालों को का उल्‍लेख किया गया था जिनकी मांग कोविड-19 वैश्विक महामारी के कारण लगातार बढ़ रही है। मौजूदा परिस्थिति आयुर्वेद एवं पारंपरिक दवाओं को वैश्विक स्तर पर कहीं अधिक लोकप्रिय होने के लिए उपयुक्‍त समय उपलब्‍ध कराती है। उनके प्रति लोगों की रुचि बढ़ रही है। दुनिया यह देख रही है कि आधुनिक और पारंपरिक दोनों प्रकार की दवाएं किस प्रकार तंदुरुस्‍ती के लिए के लिए महत्वपूर्ण हैं। लोग आयुर्वेद और प्रतिरक्षा बेहतर करने में इसकी भूमिका के फायदों को महसूस कर रहे हैं। लोग काढ़ा, तुलसी, काली मिर्च को अपने जीवन का अभिन्न हिस्‍सा बना रहे हैं।

 

मित्रों,

आज पर्यटन की कई विशेषताएं हैं। लेकिन भारत आपको विशेष तौर पर वेलनेस टूरिज्म की पेशकश करता है, मैं एक बार फिर दोहराता हूं वेलनेस टूरिज्म। वेलनेस टूरिज्म का मूल सिद्धांत है - बीमारी का इलाज और आगे की तंदुरुस्‍ती। और जब मैं वेलनेस टूरिज्म के बारे में बात करता हूं तो इसका सबसे मजबूत स्तंभ आयुर्वेद एवं पारंपरिक चिकित्सा है। कल्‍पना कीजिए आप सुंदर राज्य केरल के हरे-भरे वातावरण में डिटॉक्स ले रहे हैं। कल्‍पना कीजिए कि आप उत्तराखंड में पहाड़ पर हवाओं के झोंकों के बीच एक खूबसूरत नदी तट पर योग कर रहे हैं। कल्‍पना कीजिए कि आप पूर्वोत्तर के हरे भरे जंगल में हैं। यदि आप अपने जीवन के तनाव से परेशान हैं तो समझ लीजिए कि आपको भारत की कालातीत संस्कृति को अपनाने का समय आ गया है। जब कभी आप अपने शरीर का इलाज करना चाहते हैं अथवा अपने मन का उपचार करना चाहते हैं तो भारत आएं।

 

मित्रों,

आयुर्वेद की लोकप्रियता के कारण हमारे सामने जबरदस्‍त अवसर मौजूद है। हमें इस अवसर को गंवाना नहीं चाहिए। पारंपरिक को आधुनिक के साथ मिलाने के फायदे हुए हैं। युवा पीढी तमाम आयुर्वेदिक उत्पादों का उपयोग कर रही है। आयुर्वेद को प्रमाण पर आधारित चिकित्सा विज्ञान के साथ एकीकृत करने की मांग बढ़ती जा रही है। इसी प्रकार आयुर्वेदिक पूरक की भी काफी चर्चा हो रही है। व्यक्तिगत देखभाल श्रेणी के उत्पाद आयुर्वेद पर केंद्रित हैं। इन उत्पादों की पैकेजिंग में काफी सुधार हुआ है। मैं अपने शिक्षाविदों से आह्वान करता हूं कि वे आयुर्वेद एवं पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में गहन शोध करें। मैं हमारे जीवंत स्टार्ट-अप समुदाय से आग्रह करना चाहूंगा कि वे विशेष तौर पर आयुर्वेदिक उत्पादों पर ध्‍यान केंद्रित करें। मैं विशेष तौर पर हमारे युवाओं को इस बात के लिए सराहना करना चाहूंगा कि उन्‍होंने हमारे पारंपरिक रूपों को एक ऐसी भाषा में प्रस्तुत करने का बीड़ा उठाया है जो वैश्विक स्तर पर समझी जाती है। जब मुझे लगता है कि हमारी भूमि का लोकाचार और हमारे युवाओं की उद्यम भावना चमत्‍कार कर सकती है तो इसमें कोई आश्‍चर्य की बात नहीं है।

 

मित्रों,

सरकार की ओर से मैं आयुर्वेद की दुनिया को पूरा समर्थन देने का आश्वासन देता हूं। भारत ने राष्ट्रीय आयुष मिशन की स्थापना की है। राष्ट्रीय आयुष मिशन को कम लागत वाली आयुष सेवाओं के जरिये आयुष चिकित्सा पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया है। यह शैक्षिक व्‍यवस्‍थाओं को मजबूत करने के लिए भी काम कर रहा है। यह आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और होम्योपैथी दवाओं के गुणवत्ता नियंत्रण के प्रवर्तन और कच्चे माल की सतत उपलब्धता सुनिश्चित करने की सुविधा भी प्रदान कर रहा है। सरकार भी गुणवत्ता नियंत्रण के कई उपायों को लागू करने की कोशिश कर रही है। आयुर्वेद एवं अन्‍य भारतीय चिकित्सा पद्धतियों के बारे में हमारी नीति पहले से ही विश्व स्वास्थ्य संगठन की पारंपरिक चिकित्सा रणनीति 2014-2023 के अनुरूप है। डब्‍ल्‍यूएचओ ने भारत में ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन की स्थापना की भी घोषणा की है। हम इस कदम का स्‍वागत करते हैं। आपको यह जानकर खुशी होगी कि आयुर्वेद एवं चिकित्‍सा पद्धति के बारे में अध्ययन करने के लिए विभिन्न देशों के छात्र पहले से ही भारत आ रहे हैं। यह विश्व व्यापी कल्याण के बारे में सोचने का यह बिल्‍कुल सही समय है। संभवत: इस विषय पर एक वैश्विक शिखर सम्मेलन का आयोजन किया जा सकता है। हमें आने वाले समय में आयुर्वेद और अहार के बारे में भी सोचना चाहिए। आयुर्वेद से संबंधित खाद्य पदार्थ और अच्छे स्वास्थ्य के लिए आवश्‍यक खाद्य पदार्थ के बारे में हमें सोचना चाहिए। आप में से बहुत से लोगों को यह पता होगा कि कुछ दिनों पहले संयुक्त राष्ट्र ने 2023 को अंतरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष घोषित किया था। आइए हम बाजरा के लाभ के बारे में जागरूकता फैलाएं।

 

मित्रों,

मैं महात्मा गांधी के एक उद्धरण के साथ अपनी बात को खत्‍म करना चाहूंगा। मैंने कहा है कि मुझे लगता है कि आयुर्वेद कहीं अधिक प्रासंगिक है। यह भारत के उन प्राचीन विज्ञानों में से एक है जो हजारों गांवों के लाखों लोगों के लिए बेहतर स्वास्थ्य को सुनिश्चित करता है। मैं हरेक नागरिक को आयुर्वेद के सिद्धांतों के अनुसार जीवन जीने की सलाह देता हूं। फार्मेसी, औषधालय और वैद्यराज, सभी को मेरा आशीर्वाद है कि वे आयुर्वेद को सर्वोत्तम सेवा प्रदान बनाने में समर्थ हो सकें। महात्‍मा गांधी ने निर्विवाद तौर पर करीब सौ साल से यह बात कही थी। लेकिन उनकी भावना अब भी अपेक्षाकृत कम है। आइए हम आयुर्वेद में अपनी उपलब्धियों के बारे में बताते रहें। आयुर्वेद को एक प्रेरणा शक्ति बनने दें जो दुनिया को हमारी भूमि तक लाने में समर्थ हो। यह हमारे युवाओं के लिए समृद्धि का अवसर भी पैदा कर सकता है। मैं इस सम्मेलन की पूरी सफलता की कामना करता हूं। सभी प्रतिभागियों को मेरी शुभकामनाएं।

 

धन्‍यवाद।

बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

 

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Text of PM’s address at the Krishnaguru Eknaam Akhand Kirtan for World Peace
February 03, 2023
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“Krishnaguru ji propagated ancient Indian traditions of knowledge, service and humanity”
“Eknaam Akhanda Kirtan is making the world familiar with the heritage and spiritual consciousness of the Northeast”
“There has been an ancient tradition of organizing such events on a period of 12 years”
“Priority for the deprived is key guiding force for us today”
“50 tourist destination will be developed through special campaign”
“Gamosa’s attraction and demand have increased in the country in last 8-9 years”
“In order to make the income of women a means of their empowerment, ‘Mahila Samman Saving Certificate’ scheme has also been started”
“The life force of the country's welfare schemes are social energy and public participation”
“Coarse grains have now been given a new identity - Shri Anna”

जय कृष्णगुरु !

जय कृष्णगुरु !

जय कृष्णगुरु !

जय जयते परम कृष्णगुरु ईश्वर !.

कृष्णगुरू सेवाश्रम में जुटे आप सभी संतों-मनीषियों और भक्तों को मेरा सादर प्रणाम। कृष्णगुरू एकनाम अखंड कीर्तन का ये आयोजन पिछले एक महीने से चल रहा है। मुझे खुशी है कि ज्ञान, सेवा और मानवता की जिस प्राचीन भारतीय परंपरा को कृष्णगुरु जी ने आगे बढ़ाया, वो आज भी निरंतर गतिमान है। गुरूकृष्ण प्रेमानंद प्रभु जी और उनके सहयोग के आशीर्वाद से और कृष्णगुरू के भक्तों के प्रयास से इस आयोजन में वो दिव्यता साफ दिखाई दे रही है। मेरी इच्छा थी कि मैं इस अवसर पर असम आकर आप सबके साथ इस कार्यक्रम में शामिल होऊं! मैंने कृष्णगुरु जी की पावन तपोस्थली पर आने का पहले भी कई बार प्रयास किया है। लेकिन शायद मेरे प्रयासों में कोई कमी रह गई कि चाहकर के भी मैं अब तक वहां नहीं आ पाया। मेरी कामना है कि कृष्णगुरु का आशीर्वाद मुझे ये अवसर दे कि मैं आने वाले समय में वहाँ आकर आप सभी को नमन करूँ, आपके दर्शन करूं।

साथियों,

कृष्णगुरु जी ने विश्व शांति के लिए हर 12 वर्ष में 1 मास के अखंड नामजप और कीर्तन का अनुष्ठान शुरू किया था। हमारे देश में तो 12 वर्ष की अवधि पर इस तरह के आयोजनों की प्राचीन परंपरा रही है। और इन आयोजनों का मुख्य भाव रहा है- कर्तव्य I ये समारोह, व्यक्ति में, समाज में, कर्तव्य बोध को पुनर्जीवित करते थे। इन आयोजनों में पूरे देश के लोग एक साथ एकत्रित होते थे। पिछले 12 वर्षों में जो कुछ भी बीते समय में हुआ है, उसकी समीक्षा होती थी, वर्तमान का मूल्यांकन होता था, और भविष्य की रूपरेखा तय की जाती थी। हर 12 वर्ष पर कुम्भ की परंपरा भी इसका एक सशक्त उदाहरण रहा है। 2019 में ही असम के लोगों ने ब्रह्मपुत्र नदी में पुष्करम समारोह का सफल आयोजन किया था। अब फिर से ब्रह्मपुत्र नदी पर ये आयोजन 12वें साल में ही होगा। तमिलनाडु के कुंभकोणम में महामाहम पर्व भी 12 वर्ष में मनाया जाता है। भगवान बाहुबली का महा-मस्तकाभिषेक ये भी 12 साल पर ही होता है। ये भी संयोग है कि नीलगिरी की पहाड़ियों पर खिलने वाला नील कुरुंजी पुष्प भी हर 12 साल में ही उगता है। 12 वर्ष पर हो रहा कृष्णगुरु एकनाम अखंड कीर्तन भी ऐसी ही सशक्त परंपरा का सृजन कर रहा है। ये कीर्तन, पूर्वोत्तर की विरासत से, यहाँ की आध्यात्मिक चेतना से विश्व को परिचित करा रहा है। मैं आप सभी को इस आयोजन के लिए अनेकों-अनेक शुभकामनाएं देता हूँ।

साथियों,

कृष्णगुरु जी की विलक्षण प्रतिभा, उनका आध्यात्मिक बोध, उनसे जुड़ी हैरान कर देने वाली घटनाएं, हम सभी को निरंतर प्रेरणा देती हैं। उन्होंने हमें सिखाया है कि कोई भी काम, कोई भी व्यक्ति ना छोटा होता है ना बड़ा होता है। बीते 8-9 वर्षों में देश ने इसी भावना से, सबके साथ से सबके विकास के लिए समर्पण भाव से कार्य किया है। आज विकास की दौड़ में जो जितना पीछे है, देश के लिए वो उतनी ही पहली प्राथमिकता है। यानि जो वंचित है, उसे देश आज वरीयता दे रहा है, वंचितों को वरीयता। असम हो, हमारा नॉर्थ ईस्ट हो, वो भी दशकों तक विकास के कनेक्टिविटी से वंचित रहा था। आज देश असम और नॉर्थ ईस्ट के विकास को वरीयता दे रहा है, प्राथमिकता दे रहा है।

इस बार के बजट में भी देश के इन प्रयासों की, और हमारे भविष्य की मजबूत झलक दिखाई दी है। पूर्वोत्तर की इकॉनमी और प्रगति में पर्यटन की एक बड़ी भूमिका है। इस बार के बजट में पर्यटन से जुड़े अवसरों को बढ़ाने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। देश में 50 टूरिस्ट डेस्टिनेशन्स को विशेष अभियान चलाकर विकसित किया जाएगा। इनके लिए आधुनिक इनफ्रास्ट्रक्चर बनाया जाएगा, वर्चुअल connectivity को बेहतर किया जाएगा, टूरिस्ट सुविधाओं का भी निर्माण किया जाएगा। पूर्वोत्तर और असम को इन विकास कार्यों का बड़ा लाभ मिलेगा। वैसे आज इस आयोजन में जुटे आप सभी संतों-विद्वानों को मैं एक और जानकारी देना चाहता हूं। आप सबने भी गंगा विलास क्रूज़ के बारे में सुना होगा। गंगा विलास क्रूज़ दुनिया का सबसे लंबा रिवर क्रूज़ है। इस पर बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटक भी सफर कर रहे हैं। बनारस से बिहार में पटना, बक्सर, मुंगेर होते हुये ये क्रूज़ बंगाल में कोलकाता से आगे तक की यात्रा करते हुए बांग्लादेश पहुंच चुका है। कुछ समय बाद ये क्रूज असम पहुँचने वाला है। इसमें सवार पर्यटक इन जगहों को नदियों के जरिए विस्तार से जान रहे हैं, वहाँ की संस्कृति को जी रहे हैं। और हम तो जानते है भारत की सांस्कृतिक विरासत की सबसे बड़ी अहमियत, सबसे बड़ा मूल्यवान खजाना हमारे नदी, तटों पर ही है क्योंकि हमारी पूरी संस्कृति की विकास यात्रा नदी, तटों से जुड़ी हुई है। मुझे विश्वास है, असमिया संस्कृति और खूबसूरती भी गंगा विलास के जरिए दुनिया तक एक नए तरीके से पहुंचेगी।

साथियों,

कृष्णगुरु सेवाश्रम, विभिन्न संस्थाओं के जरिए पारंपरिक शिल्प और कौशल से जुड़े लोगों के कल्याण के लिए भी काम करता है। बीते वर्षों में पूर्वोत्तर के पारंपरिक कौशल को नई पहचान देकर ग्लोबल मार्केट में जोड़ने की दिशा में देश ने ऐतिहासिक काम किए हैं। आज असम की आर्ट, असम के लोगों के स्किल, यहाँ के बैम्बू प्रॉडक्ट्स के बारे में पूरे देश और दुनिया में लोग जान रहे हैं, उन्हें पसंद कर रहे हैं। आपको ये भी याद होगा कि पहले बैम्बू को पेड़ों की कैटेगरी में रखकर इसके काटने पर कानूनी रोक लग गई थी। हमने इस कानून को बदला, गुलामी के कालखंड का कानून था। बैम्बू को घास की कैटेगरी में रखकर पारंपरिक रोजगार के लिए सभी रास्ते खोल दिये। अब इस तरह के पारंपरिक कौशल विकास के लिए, इन प्रॉडक्ट्स की क्वालिटी और पहुँच बढ़ाने के लिए बजट में विशेष प्रावधान किया गया है। इस तरह के उत्पादों को पहचान दिलाने के लिए बजट में हर राज्य में यूनिटी मॉल-एकता मॉल बनाने की भी घोषणा इस बजट में की गई है। यानी, असम के किसान, असम के कारीगर, असम के युवा जो प्रॉडक्ट्स बनाएँगे, यूनिटी मॉल-एकता मॉल में उनका विशेष डिस्प्ले होगा ताकि उसकी ज्यादा बिक्री हो सके। यही नहीं, दूसरे राज्यों की राजधानी या बड़े पर्यटन स्थलों में भी जो यूनिटी मॉल बनेंगे, उसमें भी असम के प्रॉडक्ट्स रखे जाएंगे। पर्यटक जब यूनिटी मॉल जाएंगे, तो असम के उत्पादों को भी नया बाजार मिलेगा।

साथियों,

जब असम के शिल्प की बात होती है तो यहाँ के ये 'गोमोशा' का भी ये ‘गोमोशा’ इसका भी ज़िक्र अपने आप हो जाता है। मुझे खुद 'गोमोशा' पहनना बहुत अच्छा लगता है। हर खूबसूरत गोमोशा के पीछे असम की महिलाओं, हमारी माताओं-बहनों की मेहनत होती है। बीते 8-9 वर्षों में देश में गोमोशा को लेकर आकर्षण बढ़ा है, तो उसकी मांग भी बढ़ी है। इस मांग को पूरा करने के लिए बड़ी संख्या में महिला सेल्फ हेल्प ग्रुप्स सामने आए हैं। इन ग्रुप्स में हजारों-लाखों महिलाओं को रोजगार मिल रहा है। अब ये ग्रुप्स और आगे बढ़कर देश की अर्थव्यवस्था की ताकत बनेंगे। इसके लिए इस साल के बजट में विशेष प्रावधान किए गए हैं। महिलाओं की आय उनके सशक्तिकरण का माध्यम बने, इसके लिए 'महिला सम्मान सेविंग सर्टिफिकेट' योजना भी शुरू की गई है। महिलाओं को सेविंग पर विशेष रूप से ज्यादा ब्याज का फायदा मिलेगा। साथ ही, पीएम आवास योजना का बजट भी बढ़ाकर 70 हजार करोड़ रुपए कर दिया गया है, ताकि हर परिवार को जो गरीब है, जिसके पास पक्का घर नहीं है, उसका पक्का घर मिल सके। ये घर भी अधिकांश महिलाओं के ही नाम पर बनाए जाते हैं। उसका मालिकी हक महिलाओं का होता है। इस बजट में ऐसे अनेक प्रावधान हैं, जिनसे असम, नागालैंड, त्रिपुरा, मेघालय जैसे पूर्वोत्तर राज्यों की महिलाओं को व्यापक लाभ होगा, उनके लिए नए अवसर बनेंगे।

साथियों,

कृष्णगुरू कहा करते थे- नित्य भक्ति के कार्यों में विश्वास के साथ अपनी आत्मा की सेवा करें। अपनी आत्मा की सेवा में, समाज की सेवा, समाज के विकास के इस मंत्र में बड़ी शक्ति समाई हुई है। मुझे खुशी है कि कृष्णगुरु सेवाश्रम समाज से जुड़े लगभग हर आयाम में इस मंत्र के साथ काम कर रहा है। आपके द्वारा चलाये जा रहे ये सेवायज्ञ देश की बड़ी ताकत बन रहे हैं। देश के विकास के लिए सरकार अनेकों योजनाएं चलाती है। लेकिन देश की कल्याणकारी योजनाओं की प्राणवायु, समाज की शक्ति और जन भागीदारी ही है। हमने देखा है कि कैसे देश ने स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया और फिर जनभागीदारी ने उसे सफल बना दिया। डिजिटल इंडिया अभियान की सफलता के पीछे भी सबसे बड़ी वजह जनभागीदारी ही है। देश को सशक्त करने वाली इस तरह की अनेकों योजनाओं को आगे बढ़ाने में कृष्णगुरु सेवाश्रम की भूमिका बहुत अहम है। जैसे कि सेवाश्रम महिलाओं और युवाओं के लिए कई सामाजिक कार्य करता है। आप बेटी-बचाओ, बेटी-पढ़ाओ और पोषण जैसे अभियानों को आगे बढ़ाने की भी ज़िम्मेदारी ले सकते हैं। 'खेलो इंडिया' और 'फिट इंडिया' जैसे अभियानों से ज्यादा से ज्यादा युवाओं को जोड़ने से सेवाश्रम की प्रेरणा बहुत अहम है। योग हो, आयुर्वेद हो, इनके प्रचार-प्रसार में आपकी और ज्यादा सहभागिता, समाज शक्ति को मजबूत करेगी।

साथियों,

आप जानते हैं कि हमारे यहां पारंपरिक तौर पर हाथ से, किसी औजार की मदद से काम करने वाले कारीगरों को, हुनरमंदों को विश्वकर्मा कहा जाता है। देश ने अब पहली बार इन पारंपरिक कारीगरों के कौशल को बढ़ाने का संकल्प लिया है। इनके लिए पीएम-विश्वकर्मा कौशल सम्मान यानि पीएम विकास योजना शुरू की जा रही है और इस बजट में इसका विस्तार से वर्णन किया गया है। कृष्णगुरु सेवाश्रम, विश्वकर्मा साथियों में इस योजना के प्रति जागरूकता बढ़ाकर भी उनका हित कर सकता है।

साथियों,

2023 में भारत की पहल पर पूरा विश्व मिलेट ईयर भी मना रहा है। मिलेट यानी, मोटे अनाजों को, जिसको हम आमतौर पर मोटा अनाज कहते है नाम अलग-अलग होते है लेकिन मोटा अनाज कहते हैं। मोटे अनाजों को अब एक नई पहचान दी गई है। ये पहचान है- श्री अन्न। यानि अन्न में जो सर्वश्रेष्ठ है, वो हुआ श्री अन्न। कृष्णगुरु सेवाश्रम और सभी धार्मिक संस्थाएं श्री-अन्न के प्रसार में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। आश्रम में जो प्रसाद बँटता है, मेरा आग्रह है कि वो प्रसाद श्री अन्न से बनाया जाए। ऐसे ही, आज़ादी के अमृत महोत्सव में हमारे स्वाधीनता सेनानियों के इतिहास को युवापीढ़ी तक पहुंचाने के लिए अभियान चल रहा है। इस दिशा में सेवाश्रम प्रकाशन द्वारा, असम और पूर्वोत्तर के क्रांतिकारियों के बारे में बहुत कुछ किया जा सकता है। मुझे विश्वास है, 12 वर्षों बाद जब ये अखंड कीर्तन होगा, तो आपके और देश के इन साझा प्रयासों से हम और अधिक सशक्त भारत के दर्शन कर रहे होंगे। और इसी कामना के साथ सभी संतों को प्रणाम करता हूं, सभी पुण्य आत्माओं को प्रणाम करता हूं और आप सभी को एक बार फिर बहुत बहुत शुभकामनाएं देता हूं।

धन्यवाद!