खेल समाज के मानव संसाधन विकास के लिए एक महत्त्वपूर्ण निवेश: प्रधानमंत्री मोदी 
SPORTS अर्थात Skill  (कौशल); Perseverance (धैर्य); Optimism (आशावाद); Resilience (लचीलापन); Tenacity (दृढ़ता); Stamina (ताकत): पीएम  मोदी 
देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं, बस सही अवसर उपलब्ध कराने और प्रतिभाओं का पोषण करने के लिए एक पारिस्थितिक तंत्र बनाने की जरूरत: पीएम मोदी
हमारे देश में महिलाओं ने खेल सहित सभी क्षेत्रों में अपनी उपलब्धियों से हमें गौरवान्वित किया है: प्रधानमंत्री मोदी
खेल से टीम वर्क बढ़ता है। यह हममें दूसरों के योगदान को स्वीकार करने की भावना विकसित करता है: पीएम मोदी

'उषा स्‍कूल ऑफ एथलेटिक्‍स' में सिंथेटिक ट्रैक के उद्घाटन अवसर पर सभी खेल प्रेमियों को बधाई।

यह ट्रैक उषा स्‍कूल के विकास में एक महत्‍वपूर्ण पड़ाव है और यह प्रशिक्षुओं को आधुनिक सुविधाएं प्रदान करेगा। मैं इस स्‍कूल के विकास में हमारी अपनी भारत की पायोली एक्‍सप्रेस, 'उड़न परी' और 'गोल्‍डन गर्ल' पीटी उषा जी के योगदान के बारे में बताना चाहूंगा।

पीटी उषा भारत में खेल की एक चमकती रोशनी रही हैं।

उन्‍होंने जीवन में कई चुनौतियों का सामना किया और ओलंपिक के अंतिम मुकाबले तक पहुंचने में सफल रहीं। लेकिन महज एक मामूली अंतर से वह पदक हासिल करने से चूक गईं।

भारतीय एथलेटिक्‍स के इतिहास में कुछ ही खिलाडि़यों ने उनके जैसा ट्रैक रिकॉर्ड हासिल किए हैं।

उषा जी, राष्‍ट्र को आप पर गर्व है। लेकिन इससे भी अच्‍छी बात यह है कि उषा जी ने खेल के साथ अपना लगाव लगातार जारी रखा है। उनके व्‍यक्तिगत ध्‍यान और केंद्रित दृष्टिकोण ने अच्‍छे परिणाम लाने शुरू कर दिए हैं और अब मिस टिंटू लुका एवं मिस जिस्‍ना मैथ्‍यू जैसी उनकी प्रशिक्षु अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर अपनी छाप पहले ही छोड़ चुकी हैं।

उषा जी की ही तरह 'उषा स्‍कूल' भी सरल और सीमित संसाधनों के इस्‍तेमाल के जरिये हर अवसर का बेहतरीन उपयोग कर रहा है।

मैं इस अवसर पर खेल एवं युवा मामलों के मंत्रालय, भारतीय खेल प्राधिकरण और सीपीडब्‍ल्‍यूडी को भी इस परियोजना को पूरा करने के लिए बधाई देता हूं। हालांकि तमाम बाधाओं के कारण इस परियोजना को पूरा होने में थोड़ी देरी हो गई। लेकिन फिर भी, देर आए दुरुस्त आए।

परियोजनाओं के कार्यान्‍वयन में तेजी लाना और उन्‍हें निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरा करना हमारी सरकार की शीर्ष प्राथमिकताओं में शामिल है।

वास्‍तव में इस परियोजना को 2011 में स्‍वी‍कृति दी गई थी लेकिन सिंथेटिक ट्रैक के लिए वर्क ऑर्डर 2015 में ही दिया जा सका। मुझे बताया गया है कि यह ट्रैक पूरी तरह पीयूआर ट्रैक है।

इसे इस तरह से डिजाइन किया गया है कि ताकि चोट लगने की संभावना को काफी कम किया जा सके और यह अंतरराष्‍ट्रीय मानकों के अनुरूप हो।

समाज के मानव संसाधन के विकास से खेल का काफी निकट संबंध है।

मैं हमेशा से यह मानता रहा हूं कि खेल शरीर को स्‍वस्‍थ बनाए रखने के अलावा हमारे व्‍यक्तित्‍व को भी संवारता है और समग्र विकास को बढ़ावा देता है। यह कठिन परिश्रम और अनुशासन का संस्‍कार पैदा करता है।
यह जीवन के लिए शिक्षा प्रदान करता है जो हमारी सोचने की प्रक्रिया को समृद्ध करती है। खेल का मैदान एक उत्‍कृष्‍ट शिक्षक है। खेल के मैदान में हम जो एक सबसे अच्‍छी बात सीखते हैं, वह है समभाव- यानी हार और जीत दोनों को जीवन के एक हिस्‍से के रूप में स्‍वीकार करना।

हम विजयी होने पर विनम्र होना सीखते हैं और ठीक उसी समय हम यह भी सीखते हैं कि हमें हार में ही नहीं फंस जाना चाहिए। हार कोई अंत नहीं है, बल्कि यह नए सिरे से ऊपर उठने और वांछित परिणाम हासिल करने की शुरुआत है।

खेल हमारी टीमवर्क यानी साथ मिलकर काम करने की क्षमता को समृद्ध करता है। साथ ही खुलेपन की भावना भी लाता है और हमें दूसरों को स्‍वीकार करने की क्षमता प्रदान करता है। इसलिए यह जरूरी है कि हम अपने देश में युवाओं के जीवन के एक हिस्‍से के तौर पर खेल को अपनाएं।

मेरे लिए खेल में निम्‍नलिखित विशेषताएं समाहित होती हैं।

मैं इसे समझाने के लिए खेल यानी स्‍पोर्ट्स शब्‍द को विस्‍तारित करना चाहूंगा:
एस यानी स्किल अर्थात कौशल,
पी यानी पर्सविरन्‍स अर्थात धीरज,
ओ यानी ऑप्टिमीज्‍म अर्थात आशावादिता,
आर यानी रिजिलीयन्‍स अर्थात लचीलापन,
टी यानी टिनैसिटी अर्थात दृढ़ता,
एस यानी स्‍टैमिना अर्थात सहन शक्ति।

खेल हमारे भीतर खेलकूद की भावना पैदा करता है जो मैदान पर और मैदान के बाहर दोनों जगह काफी मायने रखती है।

इसलिए मैं अक्‍सर कहता हूं- जो खेले, वो खिले- यानी जो खेलता है वही चमकता है।

आपस में एक-दूसरे से जुड़े और एक-दूसरे पर निर्भर इस दुनिया में एक देश की नरम ताकत काफी मायने रखती है। किसी देश की आर्थिक एवं सैन्‍य शक्ति के अलावा नरम ताकत को उसकी प्रमुख पहचान के तौर पर देखा जाता है। खेल उसी नरम ताकत का एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा बन चुका है।

विभिन्‍न खेल एवं खिलाडि़यों की वैश्विक पहुंच एवं प्रशंसकों को देखते हुए एक देश खेल के माध्‍यम से दुनिया में अपनी एक विशेष पहचान बना सकता है।

किसी भी खेल में उपलब्धियां हासिल करने वाले खिलाड़ी प्रेरणा के वैश्विक स्रोत हैं। युवाओं को उनकी सफलता और संघर्ष से प्रेरणा मिलती है। हरेक प्रमुख अंतरराष्‍ट्रीय प्रतिस्‍पर्धा के दौरान, चाहे ओलंपिक हो अथवा विश्‍व कप या कोई अन्‍य इस प्रकार का मंच, पूरा विश्‍व अन्‍य देशों की उपलब्धियों का जश्‍न मनाता है चाहे वे छोटे हों अथवा बड़े।

यह खेल की एकजुटता की ताकत है। खेल एवं संस्‍कृति में परिवर्तन करने की क्षमता होती है जो लोगों के बीच संबंधों को और गहराई देती है। यहां तक कि भारत में घर पर भी एक खिलाड़ी पूरे देश की कल्‍पना करता है। उनका प्रदर्शन एकजुटता की ताकत को दर्शाता है- जब वह मैदान पर होता है तो हर कोई उसके लिए प्रार्थना करता है।

इन एथलीटों की लोकप्रियता उनके समय के गुजरने के बाद भी बरकरार रहती है। वर्षों से खेल ज्ञान की खोज की तरह भारतीय संस्‍कृति एवं परंपरा का हिस्‍सा रहा है।

तीरंदाजी, तलवारवाजी, कुश्‍ती, मालखम्‍ब और नौकायन जैसी खेल गतिविधियां सदियों से अस्तित्‍व में हैं।

केरल में कुट्टीयुमक्‍लुम, कलारी जैसे खेल लोकप्रिय रहे हैं।

मुझे यह भी पता है कि कीचड़ फुटबॉल कितना लोकप्रिय है। मुझे यकीन है कि आप में से कई लोगों को सागोल कांगजी के बारे में पता होगा जो मूल रूप से मणिपुर से है। इसे पोलो से भी पुराना खेल कहा जाता है और इसने भी समाज को जोड़ने में एक बड़ी भूमिका निभाई है।

हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे पारंपरिक खेलों की लोकप्रियता कम न होने पाए। स्‍वदेशी खेलों को भी निश्चित तौर पर बढ़ावा दिया जाना चाहिए क्‍योंकि वे हमारी खुद की जीवनशैली से विकसित हुए हैं।

लोग इन खेलों को स्‍वाभाविक तौर पर लेते हैं और उन्‍हें खेलने से व्‍यक्तित्‍व और विकसित हो रहे दिमाग के आत्‍मसम्‍मान पर काफी सकारात्‍मक प्रभाव पड़ता है।

उनकी जड़ें मजबूत होंगी। आज योग में दुनिया फिर से दिलचस्‍पी ले रही है। योग को चुस्‍ती और तंदुरुस्‍ती के एक साधन के रूप में देखा जा रहा है जो तनाव को कम करने का एक तरीका है। हमारे एथलीटों को भी योग को अपने दिनचर्या और प्रशिक्षण का एक हिस्‍सा बनाने पर विचार करना चाहिए। उसका जबरदस्‍त नतीजा हम सब के सामने होगा।

योग की जन्‍मभूमि होने के कारण, दुनियाभर में इसे कहीं अधिक लोकप्रिय बनाना हमारी अतिरिक्‍त जिम्‍मेदारी है। और, जिस प्रकार योग लोकप्रिय हो गया है, उसी प्रकार हमें अपने पारंपरिक खेलों को भी दुनियाभर में लोकप्रिय बनाने के तरीके पर जरूर सोचना चाहिए।

हाल के वर्षों में आपने देखा है कि कबड्डी जैसा खेल किस प्रकार अंतरराष्‍ट्रीय प्रतियोगिताओं का हिस्‍सा बन गया और अब देश में भी बड़े स्‍तर पर कबड्डी टूर्नामेंटों का आयोजन किया जा रहा है। कंपनियां इन प्रतियोगिताओं को प्रायोजित कर रही हैं और मुझे बताया गया है कि इन टूर्नामेंटों को व्‍यापक तौर पर देखा जा रहा है।

कबड्डी की ही तरह हमें देश के विभिन्‍न कोनों से स्‍थानीय एवं स्‍वदेशी खेलों को राष्‍ट्रीय स्‍तर पर लाना होगा। इसमें सरकार के साथ-साथ खेल से जुड़ी अन्‍य संस्‍थाओं और समाज की भी प्रमुख भूमिका होगी।

हमारा देश एक समृद्ध एवं विविध संस्‍कृति वाला देश है जहां लगभग 100 भाषाएं और 1,600 से अधिक बोलियां बोली जाती हैं, लोगों के खानपान, पहनावे और त्‍योहारों में भी विविधता है। लेकिन खेल हमें एकजुट करने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाता है।

लगातार बातचीत, प्रतियोगिता, मैच, प्रशिक्षण आदि के लिए की जाने वाली यात्रा से हमें देश के अन्‍य क्षेत्रों की संस्‍कृति एवं परंपरा को समझने का अवसर मिलता है।

इससे एक भारत श्रेष्‍ठ भारत की भावना मजबूत होती है और राष्‍ट्रीय एकता को काफी बल मिलता है।

हमारे पास प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। लेकिन हमें उन प्रतिभाओं को निखारने के लिए उचित अवसर प्रदान करने और एक माहौल बनाने की जरूरत है। हमने एक कार्यक्रम 'खेलो इंडिया' की शुरुआत की है। इस कार्यक्रम के तहत स्‍कूल एवं कॉलेज स्‍तर से लेकर राष्‍ट्रीय स्‍तर तक विभिन्‍न खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाएगा। इसके जरिये प्रतिभाओं को पहचानने और उसके बाद उचित मदद मुहैया कराते हुए उसके पोषण पर ध्‍यान केंद्रित किया जाएगा।

खेलो इंडिया खेल बुनियादी ढांचे का भी समर्थन करता है। हमारे देश की महिलाओं ने सभी क्षेत्रों में- खेल में कहीं अधिक- अपनी उपलब्धियों से हमें गौरवान्वित किया है।

हमें विशेष तौर पर हमारी बेटियों को अवश्‍य प्रोत्‍साहित करना चाहिए और उन्‍हें खेल में आगे बढ़ने के लिए अवसर प्रदान करना चाहिए। सबसे अधिक प्रसन्‍नता की बात यह है कि पिछले पैरालिंपिक्‍स में हमारे खिलाडि़यों ने अपना सर्वश्रेष्‍ठ प्रदर्शन किया।

इन खेल उपलब्धियों से इतर, इन पैरालिंपिक्‍स और हमारे एथलीटों के प्रदर्शन ने हमारे दिव्‍यांग बहनों और भाइयों के प्रति हमारा नजरिया बदल दिया है। मैं यह कभी नहीं भूल सकता कि दीपा मलिक ने पदक से सम्‍मानित होते समय क्‍या कहा था।

उन्‍होंने कहा था- 'वास्‍तव में इस पदक के माध्‍यम से मैंने विकलांगता को हरा दिया है।'

इस टिप्‍पणी में बड़ी ताकत है। हमें खेल के लिए एक जन आधार तैयार करने के लिए लगातार काम करना होगा।

पहले के दशकों के दौरान एक ऐसा वातावरण था जिसमें खेल को एक करियर के तौर पर नहीं अपनाया गया था। अब यह सोच बदलने लगा है। जल्‍द ही इसके परिणाम खले के मैदान पर स्‍पष्‍ट रूप से दिखेंगे। एक मजबूत खेल संस्‍कृति खेल अर्थव्‍यवस्‍था के विकास में मदद कर सकती है।
एक पूर्ण विकसित पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में खेल रोजगार के काफी अवसर सृजित करने के अलावा हमारी अर्थव्‍यवस्‍था में व्‍यापक योगदान कर सकता है। खेल उद्योग पेशेवर लीग, खेल उपकरण एवं जगह, खेल विज्ञान, चिकित्‍सा सहायता खल कर्मी, परिधान, पोषण, कौशल विकास, खेल प्रबंधन आदि विभिन्‍न क्षेत्रों में अवसर प्रदान करता है।

खेल अरबों डॉलर का एक वैश्विक उद्योग है जो अपार उपभोक्‍ता मांग से प्रेरित है। वैश्विक खेल उद्योग का आकार करीब 600‍ बिलियन अमेरिकी डॉलर होने का अनुमान है। भारत में पूरे खेल उद्योग का आकार महज 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर होने का अनुमान है।

हालांकि, भारत में खेल की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। भारत एक खेल प्रेमी देश है। यहां हमारे युवा दोस्‍त जिस जुनून के साथ इन दिनों चल रहे क्रिकेट चैम्पियंस ट्रॉफी को देखते हैं, वे उसी जुनून के साथ ईपीएल फुटबॉल अथवा एनबीए बास्‍केटबॉल फिक्‍सचर्स और एफ1 रेस को भी देखेंगे।

और, जैसा कि मैंने पहले कहा था, वे कबड्डी जैसे खेल पर भी आकर्षित हो रहे हैं। हमारे खेल के मैदान और स्‍टेडियम का अधिकतम उपयोग किया जाना चाहिए। छुट्टियों में भी बाहर जाकर खेलना चाहिए। इसके लिए स्‍कूल और कॉलेज के मैदान अथवा जिले में आधुनिक सुविधाओं से लैस स्‍टेडियम का उपयोग किया जा सकता है।

अपने भाषण के समापन से पहले मैं खेल के क्षेत्र में केरल के योगदान की अवश्‍य सराहना करना चाहता हूं। मैं भारत के लिए खेलने वाले हरेक खिलाड़ी को बधाई देता हूं। मैं उन खिलाडि़यों का अभिनंदन करता हूं जो उत्‍कृष्‍टता हासिल करने के लिए कठिन परिश्रम करते हैं।

मैं उषा स्‍कूल के उज्‍ज्‍वल भविष्‍य के लिए भी कामना करता हूं और उम्‍मीद करता हूं कि यह नया सिंथेटिक ट्रैक उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचने में मदद करेगा। और उम्‍मीद है‍ कि यह 2020 में टोक्‍यो ओलंपिक सहित प्रमुख अंतरराष्‍ट्रीय खेल आयोजन के लिए हमारी तैयारी में योगदान करेगा।

मैं खेल समुदाय से भी आग्रह करता हूं कि वे 2022 में हमारे देश की आजादी की 75वीं वर्षगांठ के लिए खेल के क्षेत्र में लक्ष्‍य निर्धारित करें और उन्‍हें एहसास करने का प्रण लें।

मुझे विश्‍वास है कि उषा स्‍कूल ओलंपिक एवं विश्‍व स्‍पर्धाओं में ट्रैक एंड फील्‍ड प्रतियोगिताओं के लिए और अधिक चैम्पियन तैयार करेगा। भारत सरकार पूरी तरह आपकी सहायता करेगी और एथलेटिक्‍स में उत्‍कृष्‍टता हासिल करने के लिए हरसंभव मदद करेगी।

धन्‍यवाद,
बहुत-बहुत धन्‍यवाद। 

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डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर तेजी से विकसित होते भारत की जीवन रेखा: वडोदरा, गुजरात में पीएम मोदी
September 08, 2026
हम भारत के बुनियादी ढांचे को मजबूत कर रहे हैं ताकि तेज गति से लोगों और सामानों की आवाजाही हो सके, नए अवसर पैदा हो सकें और आर्थिक विकास को गति मिल सके: प्रधानमंत्री
समर्पित माल ढुलाई गलियारा तीव्र गति से विकसित हो रहे भारत की जीवनरेखा है: प्रधानमंत्री
चिप्स से लेकर जहाजों तक, भारत अब विनिर्माण क्षेत्र के नए भविष्य का निर्माण कर रहा है: प्रधानमंत्री

भारत माता की जय।

भारत माता की जय।

गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत जी, यहां के लोकप्रिय मुख्यमंत्री श्री भूपेंद्र भाई पटेल, इस कार्यक्रम में ऑनलाइन हमारे साथ अनेक राज्यों के महानुभाव जुड़े हैं। महाराष्ट्र के गवर्नर जिष्णु देव वर्मा जी, मुख्यमंत्री देवेंद्र फ़डणवीस जी, डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे जी, डिप्टी सीएम श्रीमती सुनेत्र पवार जी, अन्य मंत्रीगण, सांसदगण, विधायकगण और वहां पर भी इकट्ठे हुए लाखों नागरिक भाई-बहन। यहां मंच पर उपस्थित केंद्रीय मंत्रिमंडल के मेरे साथी अश्विनी वैष्णव, उपमुख्यमंत्री, युवा नेता हर्ष संघवी, गुजरात सरकार के मंत्रीगण, उपस्थित अन्य जनप्रतिनिधिगण, गुजरात के मेरे प्यारे भाइयों और बहनों।

और खास इसलिए के मेरे ब़डौदा के महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी का ये मैदान अलग-अलग फील्ड में काम करने वाले सभी साथियों का साथ और विकास का ये उत्सव, यहां सबकुछ एक साथ हो रहा है।

साथियों,

आज मैं विकसित भारत की यात्रा को और गति देने के लिए आपके बीच आया हूं। थोड़ी देर पहले यहां देश के विकास से जुड़े हज़ारों करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट्स का शिलान्यास और लोकार्पण हुआ है। मैं देश की जनता को बहुत-बहुत बधाई देता हूं। इस विकास पर्व पर आप सभी ने जिस सेवा भाव से और सेवा भाव के साथ पूरे वडोदरा शहर में स्वच्छता से स्वागत अभियान चलाया है, इसके लिए मैं वड़ोदरा के हर एक नागरिक को ह्दय से बहुत-बहुत बधाई देता हूं, उनकी सराहना करता हूं। और ये जो आपने रंग दिखाया ना, मैं कल एक वीडियो देख रहा था, सीना चौड़ा हो गया, वाह! क्या ये मेरा वडोदरा है? और अब तो गणेशोत्सव की तैयारी, बाद में नवरात्रि। और गणेशोत्सव और नवरात्रि पूरा गुजरात का ध्यान वडोदरा पर होता है। और आज आपने, मैं देख रहा था पिछले एक सप्ताह से हर परिवार में वातावरण बन गया है स्वच्छता का। मुझे लगता है कि इस बार जब गणेश जी पधारेंगे ना, सारे आशीर्वाद वड़ोदरा पर बरसने वाले हैं।

साथियों,

इस वर्ष लाल किले से मैंने विकसित भारत के लिए संकल्प की सप्तधारा का आह्वान किया है। इस सप्तधारा में एक धारा गतिशक्ति की भी है। विकसित भारत के लिए हमें ऐसी कनेक्टिविटी चाहिए, जो सुगम भी हो और जमाने के हिसाब से जरा तेज भी हो। वड़ोदरा तो गतिशक्ति यूनिवर्सिटी का शहर है। आज यहां से डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर की आखिरी कड़ियां भी जुड़ गई हैं। आज 2800 किलोमीटर से अधिक का डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर प्रोजेक्ट पूरा हो गया। ये 21वीं सदी के भारत के लिए बहुत ऐतिहासिक कार्य संपन्न हुआ है।

साथियों,

ये डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, इस बात का साक्षी है कि बीते 12 साल में देश की काम करने की संस्कृति कैसे बदली है। इस डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर 2004 में विचार शुरू हुआ था। यानी, यहां मैं सारे नौजवान देख रहा हूं, जब इसका विचार शुरू हुआ, आप में से बहुत लोग होंगे जिनका जन्म भी नहीं हुआ होगा, उस समय शुरू हुआ था। 2006 में एक विशेष कंपनी बनाई गई इस काम को करने के लिए और फिर 2014 तक फाइलें ही यहां से वहां होती रहीं। फाइलें टेबल पर यात्रा कर रही थी और दुर्भाग्य देखिए, इन फाइलों को भी कोई डेडिकेटेड कॉरिडोर नसीब नहीं हुआ, फाइल को भी नहीं नसीब हुआ। फाइलें अटकती थीं, लटकती थीं, भटकती थीं। और 2014 में वड़ोदरा के और गुजरात के और देश के लोगों ने मुझे गुजरात से निकाल करके दिल्ली भेज दिया। पहले वाली सरकार 2000 तक रही। आपने मुझे भेजा और उनकी विदाई हुई, और सच्चाई ये थी कि सात-आठ वर्ष में, जरा मेरे नौजवान सुन लीजिए, ये याद रखिए, सात-आठ वर्ष में एक किलोमीटर फ्रेट कॉरिडोर पर भी काम पूरा नहीं हो पाया था। अगर उनके हिसाब से देश चलाते, तो पता नहीं आपके बाद तीन-चार पीढ़ियां आती, तो भी नहीं होता। भारत के लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम को ट्रांसफॉर्म करने वाले प्रोजेक्ट की ये हालत करके रखी थी।

साथियों,

2014 के बाद आपने जो मुझे शिक्षा-दीक्षा दी थी, इस धरती ने मुझे जो सिखाया था, आपके पास से जो लेसन लेके मैं दिल्ली पहुंचा था, हमने वहां पहुंचते ही इसको गति देने का काम प्रारंभ कर दिया। 2800 किलोमीटर के कॉरिडोर का काम आज पूरा करके दिखाया। और आज ईस्टर्न और वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, देश के व्यापार-कारोबार का मुख्य आधार बन रहा है।

साथियों,

डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, तेजी से विकसित होते भारत की जीवन रेखा है। इसने भारत के ट्रांसपोर्टेशन सेक्टर का कायाकल्प कर दिया है। पहले पैसेंजर ट्रेन जिस ट्रैक पर चलती थी, उसी ट्रैक पर मालगाड़ी भी चलती थी। यानि ट्रैवल और ट्रांसपोर्ट, दोनों धीमा था। लेकिन, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर ने इस स्थिति को बदल दिया है। आज पूर्वी और पश्चिमी फ्रेट कॉरिडोर्स पर हर रोज़ 430 से ज्यादा मालगाड़ियां चलती हैं, प्रतिदिन 430 मालगाड़ी। और पहले जो मालगाड़ी, साढ़े 6 घंटे में 100 किलोमीटर का सफऱ तय करती थी और अब वही मालगाड़ी आधे से भी कम समय में 100 किलोमीटर का सफर तय कर लेगी। जिस जगह पर ट्रक से सामान भेजने में सामान्य तौर पर 30 घंटे लगते हैं, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर यही दूरी 10-12 घंटे में पूरी हो जाती है। यानि, इस कॉरिडोर पर मालगाड़ी के चलने से ट्रक और ट्रेन में लगने वाला फ्यूल बचता है, किराया-भाड़ा का खर्च कम हुआ है, समय बचा है, पर्यावरण को फायदा हुआ है। यानि, इन्वेस्टमेंट एक ट्रैक पर किया और फायदे अनेक सारे हुए हैं।

साथियों,

इस फ्रेट कॉरिडोर से पूर्वी और पश्चिमी भारत के किसानों की उपज अब तेज़ी से बड़े बाज़ार तक पहुंच पा रही है। कई तरह के फूल, कई तरह की सब्जियां, कई तरह के फल, यानि जो चीजें मौसम के हिसाब से जल्दी खराब होती हैं, उनके लिए भी सही समय पर मंडियों और लोगों के बीच पहुंचने का रास्ता बना है। इससे किसान का बहुत बड़ा फायदा हुआ है।

साथियों,

ये फ्रेट कॉरिडोर एक और वजह से कमाल का है। हाल ही में JNPT मुंबई, JNPT पोर्ट से वड़ोदरा तक Double स्टैक Container मालगाड़ी का संचालन किया गया है। यानि डिब्बे के ऊपर एक और डिब्बा लगाकर मालगाड़ी को चलाया गया। इस मालगाड़ी के चलने से एक बार में ही 250 से अधिक ट्रकों के बराबर का सामान मुंबई से वड़ोदरा चला आया, 250 ट्रक। अब ये जो नाराज फूफा जी है, वो चिल्लाएंगे कि ट्रक वालों का क्या होगा? ट्रक कहां जाएंगे? जिन्होंने ट्रक खरीदा है, उनका क्या होगा? अब फूफा जी को काम मिल गया। यानि अब बड़ी मात्रा में सामान तेजी से देश के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच पाएगा।

साथियों,

फ्रेट कॉरिडोर के साथ-साथ अब भारत में रेल वहां भी पहुंच रही है, जहां इतने दशकों तक नहीं पहुंची थी। गुजरात हो, मध्य प्रदेश हो, महाराष्ट्र हो, यहां जो आदिवासी क्षेत्र हैं, वो भी इस प्रोजेक्ट के द्वारा रेल से जुड़ रहे हैं। पहले की सरकार में बजट में एक-दो ट्रेनों की घोषणा होती थी और उसके भी साल भर ढोल पीटे जाते थे। जबकि आज देश में साल भर एक के बाद एक नई ट्रेनें चलाई जा रही हैं। आज भी इस कार्यक्रम में कई नई ट्रेन शुरु हुई हैं। नई ट्रेन से वड़ोदरा, छोटा उदयपुर और अलीराजपुर के लोगों को बहुत सुविधा होगी।

साथियों,

रोड, रेल, मेट्रो, एयरपोर्ट, गैस पाइपलाइन, गरीबों का घर, जब देश में करोड़ों लोगों के लिए ये चीजें बनती हैं, तो इससे लोगों का जीवन आसान होता है और साथ ही छोटे से बड़े कामगार को रोजगार के लाखों-लाख अवसर मिलते हैं। आप रेलवे का ही देखिए, इस वर्ष का रेल बजट पौने तीन लाख करोड़ रुपए से अधिक रहा है। जो 12 वर्ष पहले की तुलना में कई गुणा अधिक है। यानि रेलवे के आधुनिकीकरण पर हो रहा खर्च, हज़ारों हज़ार नए रोजगार बना रहा है। और ये रोजगार कंस्ट्रक्शन के दौरान तो बनता ही है। एक बार रोड, रेल, पाइपलाइन, पोर्ट, एयरपोर्ट बन गया, तो फिर उसके आसपास नए उद्योग लगना शुरू हो जाते हैं, नए बिजनेस आते हैं, ये फिर नए रोजगार बनाते हैं। वहां कुछ लोग, वो बेटी चित्र लेकर कब से खड़ी है, वो सज्जन भी कुछ कला लेकर के आए हैं। जरा हमारे साथी उसको कलेक्ट कर लें। ये आगे पहुंचा दीजिए, हां। एक और भी है कोई, हां, ले लीजिए। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।

साथियों,

मैंने देश के सामने विकसित भारत की जिन सप्तधाराओं का विजन रखा है, उनमें एक धारा मैन्युफैक्चरिंग की भी है। और वड़ोदरा शहर, इसकी ताकत अच्छे से जानता भी है, समझता भी है। एजुकेशन, स्किल और इंडस्ट्री का कोलैब कैसे होता है, ये वड़ोदरा करीब डेढ़ सौ साल से इसका प्रतिबिंब है। दशकों पहले, यहां टेक्स्टाइल और टाइल्स के निर्माण से एक यात्रा शुरु हुई थी, जो बाद में ऑयल और पेट्रोकेमिकल्स के साथ आगे बढ़ी। पिछले दो-ढाई दशक में वड़ोदरा MSMEs का एक बड़ा हब बन गया है। और मुझे याद है, जब मैं नया-नया मुख्यमंत्री बना था, तो वड़ोदरा का मेरे पर स्पेशल अधिकार रहा है हमेशा, तो हर हफ्ते कोई ना कोई डेलीगेशन आता था। बस हमारे वड़ोदरा में कुछ मैन्युफैक्चरिंग का हो, मैन्युफैक्चरिंग का हो, क्योंकि यहां पर आते थे, तो या तो ज्योति या एलएमबी या तो जीएसएफसी, यही सब दिखता था और कुछ सुनता नहीं देता। आज कहां से कहां बदल गया है। अब तो ये शहर देश के पहले मेड इन इंडिया मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के लिए भी जाना जा रहा है। C-295 एयरक्राफ्ट की पहली फ्लाइट यहां आसमान देख चुकी है। मैं वड़ोदरा के लोगों को ये गौरव पाने के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

साथियों,

जब देश की मैन्युफैक्चरिंग की बात हो रही है, तो मैं एक और आंकड़ा बताना चाहता हूं। बीते एक दशक में भारत रेल कोच-मेट्रो कोच बनाने का, रेल इंजन बनाने का भी एक बड़ा निर्माता बना है। 2014 के बाद से अब तक, भारत ने करीब 50 हज़ार, ये आंकड़ा सुनिए, 2014 के बाद भारत ने अब तक 50 हज़ार आधुनिक रेलवे कोच बनाए हैं। पुरानी सरकार 10 साल में 50 हजार टॉयलेट नहीं बना सकती थी। 50 हजार आधुनिक कोच तो किए ही हैं, करीब ढाई लाख वेगन, मालगाड़ी के लिए जो वेगन होते हैं, भारतीय रेल में जोड़े गए हैं, ढाई लाख।

साथियों,

अब भारत चिप से लेकर शिप तक, निर्माण की एक नई गाथा लिख रहा है। यानि पुर्जे भी हमारे और प्रोडक्ट भी हमारा, आत्मनिर्भरता की एक पूरी चेन भारत में ही बनेगी। और ये हम सोलर पावर के मामले में देख रहे हैं। जैसे कडाणा डैम पर जो फ्लोटिंग सोलर प्लांट का प्रोजेक्ट है, कुछ साल पहले तक देश में सोलर प्रोजेक्ट्स लगाने बहुत महंगे पड़ते थे। क्योंकि पीवी मॉड्यूल से लेकर, हर प्रकार का हार्डवेयर इंपोर्ट करना पड़ता था। लेकिन बीते वर्षों में हमने भारत में ही पीवी मॉड्यूल बनाने शुरु किए। और आज हम इसमें 200 गीगावॉट से ज्यादा की कैपेसिटी विकसित कर चुके हैं। और ऐसी ही आत्मनिर्भरता के कारण आज पीएम सूर्यघर मुफ्त बिजली योजना का विस्तार हो रहा है। अब तक देश में 55 लाख परिवार अपने छत पर, टेरेस पर सोलर प्लांट लगा चुके हैं। और इसमें 11 लाख परिवार हमारे गुजरात के हैं। यहां इतने सारे परिवार, बिजली उत्पादक बन चुके हैं और इसके कारण, प्रोडक्शन से लेकर इंस्टॉलेशन और सर्विस तक, कितने ही युवाओं को रोजगार मिला है, कितने नए वेंडर्स आए हैं।

साथियों,

‘झूठ की गूंज’ से भरमाने वाले तो हर चौराहे पर मिल जाएंगे, लेकिन भारत का नौजवान सच की हुंकार से चलता है, सच की हुंकार के साथ चलता है, सच की हुंकार के लिए चलता है। हमारे युवा साथी ये देख रहे हैं कि आज देश में सोलर हो, विंड हो, हाइड्रो हो, न्यूक्लियर हो, सारे सेक्टर्स पर सरकार कितना फोकस से काम कर रही है।

साथियों,

आने वाले दौर में हर आधुनिक सेक्टर बिजली से ही चलेगा, इलेक्ट्रिक इकोसिस्टम पर निर्भर होगा। जैसे चिप इंडस्ट्री है, डेटा सेंटर और AI से जुड़ी इंडस्ट्री है, इनका खाद पानी बिजली ही है। इसलिए अगर हमें AI में दुनिया के सामने सुपर पावर बनना है, तो देश को उसकी तैयारी, उसका इकोसिस्टम भी बनाना होगा। यही काम भारत ग्राउंड पर कर रहा है। तभी किसी देश से यूरेनियम के लिए समझौते हो रहे हैं, किसी से क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ मिनरल्स को लेकर समझौते किए जा रहे हैं। ये सारी मेहनत देश के युवाओं का फ्यूचर सुरक्षित करने के लिए दिन-रात मेहनत करके की जा रही है, आपके भविष्य के लिए किया जा रहा है।

साथियों,

दुनिया तेज़ी से बदल रही है, तो दुनिया की ज़रूरतें भी बदल रही हैं और इसी प्रकार हमारी पढ़ाई-लिखाई के तौर-तरीके भी बदल रहे हैं। पहले फोकस सिर्फ डिग्री पर होता था, लेकिन अब डिग्री के साथ-साथ स्किल पर भी फोकस है, स्किल का महत्मय बढ़ रहा है। नौजवानों के पास स्किल हो और वो स्किल समय-समय पर अपग्रेड हो, एक बड़ी जरूरत बन गई है। और इसीलिए, आज हम अपनी शिक्षा नीति को, शिक्षण और ट्रेनिंग के संस्थानों को नए रूप में ढाल रहे हैं। और इसी भाव के साथ ही मैंने लाल किले से भी युवाशक्ति के लिए दो बड़ी घोषणाएं की हैं। पहली घोषणा, देश की पारंपरिक ज़रूरत से जुड़ी है। आप सब जानते हैं कि हमारे यहां लाखों नौजवान ऐसे हैं, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। हर साल, हमारे मिडिल क्लास परिवारों की कमाई का एक बड़ा हिस्सा इन बच्चों की कोचिंग पर खर्च हो जाता है। हमारी कोशिश है कि गरीब और मिडिल क्लास के ऐसे बच्चों की, परिवारों के पैसे की बचत हो। और इसीलिए अब सरकार स्टूडेंट्स को ऑनलाइन फ्री-कोचिंग व्यवस्था देने की दिशा में आगे बढ़ रही है। और हिंदुस्तान के बेस्ट टीचर के द्वारा उनके कोचिंग हो। हमारे जो नौजवान, अपनी तैयारी कर रहे हैं, उनकी कोचिंग का ध्यान सरकार खुद रखेगी।

साथियों,

भारत के नौजवानों को AI में पारंगत होना उतना ही जरूरी है। हम चाहते हैं कि हमारे नौजवानों की पीढ़ी AI के लिए तैयार हो। ऐसा नहीं है, AI सीखने वालों की जरूरत सिर्फ आईटी सेक्टर में है, अगर कोई इस स्किल को जानता है, तो वो खेती के लिए नया AI solution बना सकता है। आरोग्य के क्षेत्र में technology विकसित कर सकता है। Manufacturing की productivity बढ़ा सकता है। Robotics में अपना startup शुरू कर सकता है। इसलिए जरूरी है कि हमारे पास देश और दुनिया की इंडस्ट्री के लिए AI को समझने वाले और AI का इस्तेमाल करने वाले युवा हों। सरकार इसके लिए एक बड़ा अभियान शुरू करने जा रही है।

साथियों,

भारत का ये कालखंड अभूतपूर्व है। ये भारत की युवाशक्ति का उत्कर्ष काल है, ये समय फिर भारत के जीवन में लौटकर नहीं आएगा। और इसलिए, हमें 2047 में विकसित भारत के लक्ष्य को सर्वोपरि रखना है। हमें भारत को विकसित बनाकर ही रहना है। इसी आह्वान के साथ, एक बार फिर आप सभी को विकास कार्यों की बहुत शुभकामनाएं।

अब मेरा एक काम करना पड़ेगा वडोदरा वालों को, करेंगे? पक्के तौर पर? आप सबने वड़ोदरा को इतना स्वच्छ बना दिया, कितनी मेहनत करनी पड़ी। मैं देख रहा था, हमारे नौजवान दिन-रात सफाई में लगे हुए थे। लेकिन एक बार हम तय करें कि अब हम वडोदरा को गंदा होने ही नहीं देंगे। मैं खुद गंदगी नहीं करूँगा, ये संकल्प लें, तो वडोदरा गंदा होगा? वडोदरा गंदा होगा? तो दिवाली ऐसी चकाचक जाएगी या नहीं, नवरात्रि शानदार जाएगी या नहीं, गणेशोत्सव में चार चाँद लगेंगे या नहीं, तो इतना काम तो हो जाएगा।

शाबाश।

धन्यवाद।

भारत माता की जय!

भारत माता की जय!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!

वंदे मातरम्!