प्रिय मित्रों,

लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव समान चुनाव का दिन आने में अब कुछ सप्ताह ही शेष वचे हैं। इस उत्सव में गुजरात भर के लोग भाग लेंगे। पिछले वर्षों के दौरान मुझे आप लोगों में से बहुतों के साथ निकटता से वार्तालाप करने का अवसर मिला है। चाहे वह विवेकानंद युवा विकास यात्रा हो, नव वर्ष की शुभकामनाएं प्रेषित करने का अवसर हो या फिर पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ मुलाकात हो। गुजरात में मुझे चारों ओर वाइब्रेंट एवं आशा से भरपूर वातावरण देखने को मिला है, जो मेरे लिए आनंद की बात है।

पिछले एक दशक से राज्य में जो राजनैतिक स्थिरता नजर आ रही है उसके बिना विकास की इस ऊंचाई तक पहुंचना हमारे लिए मुमकिन नहीं था। आप में से कई लोगों ने वह गुजरात भी देखा होगा, जहां सरकारें लम्बे वक्त तक नहीं टिक पाती थीं, और सत्ता हासिल करने का माहौल कुछ ऐसा रहता था मानों संगीतकुर्सी का खेल चल रहा हो। पिछले दशक के दौरान हमारे नीति निर्धारण में सुसंगतता एवं सातत्य रहा है, जिसका ढेर सारा लाभ लोगों को मिला है। यह राजनीतिक स्थिरता गुजरात के लोगों के विजन और उनकी दूरदृष्टि की वजह से है। उन्होंने हमेशा अन्य मामलों की बजाये विकास के मुद्दे पर अपना भरोसा जताया है।

अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं – मोदी जी, पिछले ग्यारह वर्षों में गुजरात की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि क्या रही है? शायद आप सोचेंगे कि, मैं कहूंगा – हमारे यहां स्कूल ड्रॉप आउट की दर में भारी गिरावट दर्ज हुई है, कन्या केळवणी (कन्या शिक्षा) को जबर्दस्त गति मिली है, विकास के फल वनवासी क्षेत्रों तक पहुंचे हैं, गरीब से गरीब व्यक्ति भी टेक्नोलॉजी से जुड़ सका है, गुजरात औद्योगिक हब बना है, कृषि के क्षेत्र में रिकार्ड वृद्धि हुई है इत्यादि...

लेकिन मेरे मुताबिक यदि सबसे बड़ी कोई बात है तो वह यह है कि राजनीति और लोकतंत्र पर लोगों का विश्वास प्रबल बना है, जो आजादी के बाद कांग्रेस के शासन में बिल्कुल खत्म हो चुका था।

इस बात को एक उदाहरण के जरिए रखता हूं। १९८० के दशक में भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कहा था कि एक रुपये की सहायता गांव तक पहुंचते-पहुंचते १५ पैसे जितनी रह जाती है। उनकी बात सुनकर मैं हतप्रभ रह गया। यह बात जब उन्होंने कही थी तब कांग्रेस पार्टी देश की राजनीति में मजबूती से काबिज थी, पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक प्रत्येक स्तर पर कांग्रेस ही मौजूद थी, हम कहीं नहीं थे। राजीव गांधी की यह टिप्पणी क्या बताती है – कि कांग्रेस समस्याओं की सूची बनाने में तो होशियार है, लेकिन उन समस्याओं का हल ढूंढने की बात हो तो उससे कोई अपेक्षा नहीं रखी जा सकती।

आज यह कहते हुए मुझे गर्व महसूस हो रहा है कि गांधीनगर से निकला एक-एक रुपया उसके लाभार्थी तक पहुंच रहा है। गुजरात में बिचौलिए तो कब के बेरोजगार हो चुके हैं। यही वजह है कि लोगों में व्यवस्था को लेकर प्रबल विश्वास पैदा हुआ है, उसी नियम और उसी प्रशासन के जरिए गुजरात ने दिखा दिया है कि आम आदमी के जीवन में गुणवत्तायुक्त परिवर्तन लाना संभव है।

यह जानकर आप को आश्चर्य होगा कि हम पर कैसे-कैसे आरोप लगाए जाते हैं, ‘आपने ५०० की बजाये ३५० स्कूलें बनाई’ या फिर ‘दस किलोमीटर का वचन देकर आपने आठ किलोमीटर जितनी ही सड़क बनाई’, यानी आरोपों में भी बात तो विकास की ही देखी जा सकती है। लेकिन क्या हमारे कांग्रेस के मित्रों के सन्दर्भ में यह कहा जा सकता है? नहीं, विकास को लेकर तो कहां कोई उनसे सवाल भी करता है। बात होती है तो सिर्फ घोटालों की, और आम आदमी के सिर पर बढ़ रहे बोझ की। और यह सब इसलिए कि उस पार्टी में नेता, नीति और नीयत का अभाव है।

मित्रों, बुनियादी अंतर तो राजनीति के तरीके में है। भाजपा हमेंशा विकास की राजनीति के लिए प्रतिबद्ध है जबकि कांग्रेस पर वोट बैंक की राजनीति का रंग चढ़ा हुआ है। जरा याद कीजिए, किस तरह गुजरात में उन्होंने भाई को भाई से, मित्र को मित्र से दूर करने का प्रयास किया। रथयात्रा हो या क्रिकेट का मैच हो, राज्य में कर्फ्यू तो लगा ही रहता था। आज यदि किसी बच्चे से कर्फ्यू का मतलब पूछेंगे तो उसे मालूम भी नहीं होगा। यह परिवर्तन आया है पिछले एक दशक में।

मैं लगातार कहता हूं – यदि कांग्रेस को गुजरात चाहिए तो उसे वोट बैंक की राजनीति के बजाये दिल से विकास की राजनीति अपनानी चाहिए। जब तक वे ऐसा नहीं करेंगे तब तक उन्हें इस जमीन पर पैर जमाने का अवसर नहीं मिलेगा, क्योंकि गुजरात की जनता उन्हें बखूबी पहचान गई है।

पिछले अनेक दिनों से मैं अपने कई कार्यकर्ताओं से मिल रहा हूं। हमेशा जोश में रहने वाले इन उत्साही कार्यकर्ताओं से मुलाकात का आनंद शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। हमारे कार्यकर्ता ही हमारी सच्ची ताकत हैं और उनके सराहनीय कार्य के लिए मैं उन्हें अभिनंदन देता हूं। भव्य एवं दिव्य गुजरात के निर्माण की ओर हमारी यात्रा हम जनवरी-२०१३ से शुरू करेंगे। और हां, उससे पूर्व २० दिसंबर, २०१२ के दिन हम एक दूसरी दिवाली भी मनाएंगे, पहले कभी न मनाई गई हो उतनी भव्य दिवाली... आपका,

नरेन्द्र मोदी

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महात्मा ज्योतिराव फुले: भारत के दिव्य पथ-प्रदर्शक
April 11, 2026

आज 11 अप्रैल हम सभी के लिए बहुत विशेष दिन है। आज भारत के महान समाज सुधारकों में से एक और पीढ़ियों को दिशा दिखाने वाले महात्मा ज्योतिराव फुले की जन्म-जयंती है। इस वर्ष यह अवसर और भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके 200वें जयंती वर्ष का शुभारंभ भी हो रहा है।

महान समाज सुधारक महात्मा फुले का जीवन नैतिक साहस, आत्म चिंतन और समाज के हित के लिए अटूट समर्पण का प्रेरक उदाहरण है। महात्मा फुले को केवल उनकी संस्थाओं या आंदोलनों के लिए ही याद नहीं किया जाता, बल्कि उन्होंने लोगों के मन में जो आशा और आत्मविश्वास जगाया, उसका व्यापक प्रभाव हम आज भी महसूस करते हैं। उनके विचार देशवासियों के लिए प्रेरणापुंज हैं।

महात्मा फुले का जन्म 1827 में महाराष्ट्र में एक बहुत साधारण परिवार में हुआ। लेकिन शुरुआती चुनौतियां कभी उनकी शिक्षा, साहस और समाज के प्रति समर्पण को नहीं रोक पाईं। उन्होंने हमेशा यह माना कि चाहे कितनी भी कठिनाइयां क्यों न आएं, इंसान को मेहनत करनी चाहिए, ज्ञान हासिल करना चाहिए और समस्याओं का समाधान करना चाहिए, न कि उन्हें अनदेखा करना चाहिए। बचपन से ही महात्मा फुले बहुत जिज्ञासु थे और अपनी उम्र के अन्य बच्चों की अपेक्षा कहीं अधिक पुस्तकें पढ़ते थे। वो कहते भी थे, “हम जितना ज्यादा सवाल करते हैं, उनसे उतना ही अधिक ज्ञान निकलता है।” साफ है कि बचपन से मिली जिज्ञासा उनकी पूरी यात्रा में बनी रही।

महात्मा फुले के जीवन में शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण मिशन बनी। उनका मानना था कि ज्ञान किसी एक वर्ग की संपत्ति नहीं, बल्कि एक ऐसी शक्ति है, जिसे सभी के साथ साझा किया जाना चाहिए। जब समाज के बड़े हिस्से को शिक्षा से वंचित रखा जाता था, तब उन्होंने लड़कियों और वंचित वर्गों के लिए स्कूल खोले। वे कहते थे, “बच्चों में जो सुधार मां के माध्यम से आता है, वह बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसलिए अगर स्कूल खोले जाएं, तो सबसे पहले लड़कियों के लिए खोले जाएं।” उन्होंने शिक्षा को न्याय और समानता का माध्यम बनाया।

शिक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण हमें आज भी बहुत प्रेरित करता है। पिछले एक दशक में भारत ने युवाओं के लिए रिसर्च और इनोवेशन को बहुत प्राथमिकता दी है। एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने का प्रयास किया गया है, जिसमें युवा सवाल पूछने, नई चीजें सीखने और इनोवेशन के लिए प्रेरित हों। ज्ञान, कौशल और अवसरों में निवेश करके भारत अपने युवाओं को देश की प्रगति का आधारस्तंभ बना रहा है।

अपने शैक्षिक ज्ञान और बौद्धिकता से महात्मा फुले ने कृषि, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों की गहरी जानकारी हासिल की। वे कहते थे कि किसानों और मजदूरों के साथ अन्याय समाज को कमजोर करता है। उन्होंने देखा कि सामाजिक असमानताएं खेतों और गांवों में लोगों के जीवन को कैसे प्रभावित करती हैं। इसलिए उन्होंने गरीबों, वंचितों और कमजोर वर्गों को सम्मान दिलाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के लिए भी हरसंभव प्रयास किए।

महात्मा फुले ने कहा था, “"जोपर्यंत समाजातील सर्वांना समान अधिकार मिळत नाहीत, तोपर्यंत खरे स्वातंत्र्य मिळत नाही” यानी जब तक समाज के सभी लोगों को समान अधिकार नहीं मिलते, तब तक सच्ची आजादी नहीं मिल सकती। इसी विचार को जमीन पर उतारने के लिए उन्होंने कई संस्थाओं की स्थापना की। उनका सत्यशोधक समाज, आधुनिक भारत के सबसे महत्वपूर्ण समाज सुधार आंदोलनों में से एक था। यह आंदोलन सामाजिक सुधार, सामुदायिक सेवा और मानवीय गरिमा को बढ़ावा देने में अग्रणी रहा था। यह महिलाओं, युवाओं और गांवों में रहने वाले लोगों की पुरजोर आवाज बना। यह आंदोलन उनके इस विश्वास को दर्शाता है कि समाज की मजबूती के लिए न्याय, हर व्यक्ति के प्रति सम्मान और सामूहिक प्रगति जरूरी है।

उनका व्यक्तिगत जीवन भी साहस की मिसाल रहा। लगातार लोगों के बीच रहकर काम करने का असर उनके स्वास्थ्य पर भी पड़ा। लेकिन गंभीर बीमारी भी उनके संकल्प को कमजोर नहीं कर सकी। एक गंभीर स्ट्रोक के बाद भी उन्होंने अपना काम और समाज के लिए संघर्ष जारी रखा। उनका शरीर कमजोर हुआ, लेकिन समाज के प्रति उनका समर्पण कभी नहीं डगमगाया। आज भी करोड़ों लोग उनके जीवन के इस पहलू से प्रेरणा लेते हैं।

महात्मा फुले का स्मरण, सावित्रीबाई फुले के सम्मानजनक उल्लेख के बिना अधूरा है। वह स्वयं भारत की महान समाज सुधारकों में से एक थीं। भारत की पहली महिला शिक्षिकाओं में शामिल सावित्रीबाई ने लड़कियों की शिक्षा को आगे बढ़ाने में बेहद अहम भूमिका निभाई। महात्मा फुले के निधन के बाद भी उन्होंने इस कार्य को जारी रखा। 1897 में प्लेग महामारी के दौरान उन्होंने मरीजों की इतनी सेवा की कि वह स्वयं भी इस बीमारी की शिकार हो गईं और उनका निधन हो गया।

भारतभूमि बार-बार ऐसी महान विभूतियों से धन्य होती रही है, जिन्होंने अपने विचार, त्याग और कर्म से समाज को मजबूत बनाया है। उन्होंने बदलाव का इंतजार नहीं किया, बल्कि स्वयं बदलाव का माध्यम बने। सदियों से हमारे देश में समाज सुधार की आवाज उन्हीं लोगों से उठी है, जिन्होंने पीड़ा को भाग्य नहीं माना, बल्कि उसे खत्म करने के प्रयासों में जुटे रहे। महात्मा ज्योतिराव फुले भी ऐसे ही महान व्यक्तित्व थे।

मुझे 2022 में पुणे की अपनी यात्रा याद है, जब मैंने शहर में महात्मा फुले की भव्य प्रतिमा पर उन्हें श्रद्धांजलि दी थी। उनके 200वें जयंती वर्ष की शुरुआत पर हम उनके विचारों को अपनाकर ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं। हमें शिक्षा के प्रति अपने संकल्प को मजबूत करना होगा। अन्याय के प्रति संवेदनशील बनना होगा और यह विश्वास रखना होगा कि समाज अपने प्रयासों से ही खुद को बेहतर बना सकता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि समाज की शक्ति को जनहित और नैतिक मूल्यों से जोड़कर भारत में क्रांतिकारी बदलाव लाए जा सकते हैं। यही कारण है कि आज भी उनके विचार करोड़ों लोगों में नई उम्मीद जगाते हैं। महात्मा ज्योतिराव फुले 200 साल बाद भी केवल इतिहास का नाम नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के मार्गदर्शक बने हुए हैं।