1 मई 1960 में, दशक के अंत तक गुजरात के गठन के आसपास का प्रारंभिक उत्साह और आशावाद  थम सा गया था। गुजरात में त्वरित सुधार और प्रगति के सपने को आम आदमी के बीच मोहभंग का रास्ता दे दिया गया था। राजनीति में पैसे और सत्ता के लालच के द्वारा इन्दुलाल याग्निक, जीवराज मेहता और बलवंत राय मेहता जैसे राजनीतिक दिग्गजों के संघर्ष और बलिदान को नष्ट कर दिया गया था। 1960 के दशक के अंत तक और 1970 के दशक के प्रारंभ में गुजरात में कांग्रेस सरकार का भ्रष्टाचार और कुशासन नई ऊंचाई पर पहुंच गया था, भारत युद्ध में पाकिस्तान को हरा चुका था और गरीबों के उत्थान के वादे पर कांग्रेस सरकार फिर से निर्वाचित हो चुकी थी। 'गरीबी हटाओ' का यह वादा धीरे - धीरे 'गरीब हटाओ' में बदल कर खाली चला गया था। गरीबों की जिंदगी बदतर हो गई, और गुजरात में यह दुख एक गंभीर अकाल और भारी कीमत वृद्धि के साथ दो गुना हो गया।

बुनियादी वस्तुओं के लिए अंतहीन कतारें राज्य में एक आम दृश्य बन चुकी थीं। आम आदमी के लिए कोई राहत नहीं मिली थी। उपचारात्मक कार्रवाई करने की बजाय, गुजरात में कांग्रेस गहरे गुटीय झगड़ों में डूब गई और स्थिति की ओर एक पूर्ण उदासीनता का प्रदर्शन किया गया। नतीजतन, घनश्याम ओझा की सरकार जल्द ही गिरा दी गई और उनकी जगह चिमनभाई पटेल की सरकार बना दी गई। बहरहाल, यह सरकार भी समान रूप से अक्षम साबित हुई  और अब गुजरात के लोगों के बीच राज्य के खिलाफ एक बढ़ता हुआ असंतोष था। यह असंतोष अब जनता के गुस्से में बदल गया  था जब दिसंबर 1973 में, मोरबी इंजीनियरिंग कॉलेज के कुछ छात्रों ने अपने भोजन के बिल में अत्यधिक वृद्धि के खिलाफ विरोध प्रकट किया था। इस प्रदर्शन ने जल्द ही व्यापक समर्थन प्राप्त कर लिया और सरकार के खिलाफ राज्यव्यापी जन आंदोलन सुलग उठा। राज्य और केंद्र सरकार अपने सभी प्रयासों के बावजूद इस असंतोष को दबाने में  विफल रही। मामला और भी बदतर हो गया जब गुजरात के तत्कालीन शिक्षा मंत्री ने आंदोलन के लिए जनसंघ पर आरोप लगाया यद्यपि यह भ्रष्टाचार और बढ़ती महंगाई के खिलाफ एक व्यापक आधार वाला जन आंदोलन था, तब भी।  1973 तक, नरेन्‍द्र मोदी सामाजिक सक्रियता में गहरी रुचि प्रदर्शित कर चुके थे और पहले से ही महंगाई और आम आदमी को प्रभावित करने वाले अन्य मुद्दों के खिलाफ कई आंदोलनों में हिस्सा ले चुके थे। एक युवा प्रचारक और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के सहयोगी के रूप में, नरेन्‍द्र नवनिर्माण आंदोलन में शामिल हो गए और सौंपें गए कार्यों का उन्होंने कर्तव्यपरायणता के साथ प्रदर्शन किया। नवनिर्माण आंदोलन हर मायने में एक जन आंदोलन था जैसे समाज के सभी वर्गों से आम नागरिक एक आवाज के रूप में उठ खड़े हुए थे। आंदोलन और अधिक सुदृढ़ हो गया जब इसने एक बहुत ही सम्मानित लोकप्रिय और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक जाने माने योद्धा जयप्रकाश नारायण का समर्थन प्राप्त कर लिया। अहमदाबाद में जयप्रकाश नारायण के साथ, नरेन्‍द्र को बारीकी से करिश्माई नेता के साथ बातचीत करने का अद्वितीय अवसर मिला। दिग्गज के साथ आयोजित अनेक वार्ताएँ युवा नरेन्द्र पर एक गहरी छाप छोड़ गईं। नवनिर्माण आंदोलन को बड़ी सफलता मिली और चिमनभाई पटेल को कार्यकाल के मात्र छह महीने के बाद ही इस्तीफा देना पड़ा। नए चुनाव कराए गए और कांग्रेस सरकार को विधिवत उखाड़ फेंका गया। विडंबना यह है कि गुजरात चुनावों का परिणाम, 12 जून 1975 को आया, वह दिन जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को चुनावी भ्रष्टाचार का दोषी पाया था और प्रधानमंत्री के रूप में उनके भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया था। एक हफ्ते बाद बाबूभाई जसभाई पटेल के नेतृत्व में एक नई सरकार गुजरात में गठित की गई। जन विरोध, सामाजिक मुद्दों पर उनके वैश्विक नजरिया के एक महत्वपूर्ण विस्तार के नेतृत्व के साथ नवनिर्माण आंदोलन, नरेन्द्र का पहला अनुभव था। इसने नरेन्‍द्र को उनके राजनीतिक कैरियर की पहली पोस्ट तक भी पहुंचाया, वे 1975 में गुजरात में लोक संघर्ष समिति के महासचिव बने। आंदोलन के दौरान उन्हें विशेष रूप से छात्र मुद्दों को नजदीक से समझने का अवसर मिला,  जब वे मुख्यमंत्री बने तब एक बार के लिए यह प्रमुख परिसंपत्ति साबित हुई।  2001 के बाद से, उन्होंने शैक्षिक सुधारों पर काफी ध्यान केंद्रित किया और गुजरात के युवाओं के लिए विश्व स्तरीय शिक्षा को सुलभ बना दिया। गुजरात में नवनिर्माण आंदोलन की आशावादिता की अवधि अल्पकालिक थी। 25 जून 1975 की आधी रात को, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत में नागरिक अधिकारों को निलंबित करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को रोकने के लिए आपातकाल की स्थिति घोषित कर दी। नरेन्‍द्र मोदी के जीवन के सबसे महत्वपूर्ण चरणों में से एक चरण शुरू हो चुका था।

 

डिस्कलेमर :

यह उन कहानियों या खबरों को इकट्ठा करने के प्रयास का हिस्सा है जो प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और लोगों के जीवन पर उनके प्रभाव पर उपाख्यान / राय / विश्लेषण का वर्णन करती हैं।

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भारत की कहानी के अगले अध्याय को आकार
September 27, 2025

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की करिश्माई उपस्थिति और संगठनात्मक नेतृत्व की खूब सराहना हुई है। लेकिन कम समझा और जाना गया पहलू है उनका पेशेवर अंदाज, जिसे उनके काम करने की शैली पहचान देती है। एक ऐसी अटूट कार्यनिष्ठा जो उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री और बाद में भारत के प्रधानमंत्री रहते हुए दशकों में विकसित की है।


जो उन्हें अलग बनाता है, वह दिखावे की प्रतिभा नहीं बल्कि अनुशासन है, जो आइडियाज को स्थायी सिस्टम में बदल देता है। यह कर्तव्य के आधार पर किए गए कार्य हैं, जिनकी सफलता जमीन पर महसूस की जाती है।

साझा कार्य के लिए योजना

इस साल उनके द्वारा लाल किले से दिए गए स्वतंत्रता दिवस के भाषण में यह भावना साफ झलकती है। प्रधानमंत्री ने सबको साथ मिलकर काम करने का आह्वान किया है। उन्होंने आम लोगों, वैज्ञानिकों, स्टार्ट-अप और राज्यों को “विकसित भारत” की रचना में भागीदार बनने के लिए आमंत्रित किया। नई तकनीक, क्लीन ग्रोथ और मजबूत सप्लाई-चेन में उम्मीदों को व्यावहारिक कार्यक्रमों के रूप में पेश किया गया तथा जन भागीदारी — प्लेटफॉर्म बिल्डिंग स्टेट और उद्यमशील जनता की साझेदारी — को मेथड बताया गया।

GST स्ट्रक्चर को हाल ही में सरल बनाने की प्रक्रिया इसी तरीके को दर्शाती है। स्लैब कम करके और अड़चनों को दूर करके, जीएसटी परिषद ने छोटे कारोबारियों के लिए नियमों का पालन करने की लागत घटा दी है और घर-घर तक इसका असर जल्दी पहुंचने लगा है। प्रधानमंत्री का ध्यान किसी जटिल रेवेन्यू कैलकुलेशन पर नहीं बल्कि इस बात पर था कि आम नागरिक या छोटा व्यापारी बदलाव को तुरंत महसूस करे। यह सोच उसी cooperative federalism को दर्शाती है जिसने जीएसटी परिषद का मार्गदर्शन किया है: राज्य और केंद्र गहन डिबेट करते हैं, लेकिन सब एक ऐसे सिस्टम में काम करते हैं जो हालात के हिसाब से बदलता है, न कि स्थिर होकर जड़ रहता है। नीतियों को एक living instrument माना जाता है, जिसे अर्थव्यवस्था की गति के अनुसार ढाला जाता है, न कि कागज पर केवल संतुलन बनाए रखने के लिए रखा जाता है।

हाल ही में मैंने प्रधानमंत्री से मिलने के लिए 15 मिनट का समय मांगा और उनकी चर्चा में गहराई और व्यापकता देखकर प्रभावित हुआ। छोटे-छोटे विषयों पर उनकी समझ और उस पर कार्य करने का नजरिया वाकई में गजब था। असल में, जो मुलाकात 15 मिनट के लिए तय थी वो 45 मिनट तक चली। बाद में मेरे सहयोगियों ने बताया कि उन्होंने दो घंटे से अधिक तैयारी की थी; नोट्स, आंकड़े और संभावित सवाल पढ़े थे। यह तैयारी का स्तर उनके व्यक्तिगत कामकाज और पूरे सिस्टम से अपेक्षा का मानक है।

नागरिकों पर फोकस

भारत की वर्तमान तरक्की का बड़ा हिस्सा ऐसी व्यवस्था पर आधारित है जो नागरिकों की गरिमा सुनिश्चित करती है। डिजिटल पहचान, हर किसी के लिए बैंक खाता और तुरंत भुगतान जैसी सुविधाओं ने नागरिकों को सीधे जोड़ दिया है। लाभ सीधे सही नागरिकों तक पहुँचते हैं, भ्रष्टाचार घटता है और छोटे बिजनेस को नियमित पैसा मिलता है, और नीति आंकड़ों के आधार पर बनाई जाती है। “अंत्योदय” — अंतिम नागरिक का उत्थान — सिर्फ नारा नहीं बल्कि मानक बन गया है और प्रत्येक योजना, कार्यक्रम के मूल में ये देखने को मिलता है।

हाल ही में मुझे, असम के नुमालीगढ़ में भारत के पहले बांस आधारित 2G एथेनॉल संयंत्र के शुभारंभ के दौरान यह अनुभव करने का सौभाग्य मिला। प्रधानमंत्री इंजीनियरों, किसानों और तकनीकी विशेषज्ञों के साथ खड़े होकर, सीधे सवाल पूछ रहे थे कि किसानों को पैसा उसी दिन कैसे मिलेगा, क्या ऐसा बांस बनाया जा सकता है जो जल्दी बढ़े और लंबा हो, जरूरी एंज़ाइम्स देश में ही बनाए जा सकते हैं, और बांस का हर हिस्सा डंठल, पत्ता, बचा हुआ हिस्सा काम में लाया जा रहा है या नहीं, जैसे एथेनॉल, फ्यूरफुरल या ग्रीन एसीटिक एसिड।

चर्चा केवल तकनीक तक सीमित नहीं रही। यह लॉजिस्टिक्स, सप्लाई-चेन की मजबूती और वैश्विक कार्बन उत्सर्जन तक बढ़ गई। उनके द्वारा की जा रही चर्चा के मूल केंद्र मे समाज का अंतिम व्यक्ति था कि उसको कैसे इस व्यवस्था के जरिए लाभ पहुंचाया जाए।

यही स्पष्टता भारत की आर्थिक नीतियों में भी दिखती है। हाल ही में ऊर्जा खरीद के मामलें में भी सही स्थान और संतुलित खरीद ने भारत के हित मुश्किल दौर में भी सुरक्षित रखे। विदेशों में कई अवसरों पर मैं एक बेहद सरल बात कहता हूँ कि सप्लाई सुनिश्चित करें, लागत बनाए रखें, और भारतीय उपभोक्ता केंद्र में रहें। इस स्पष्टता का सम्मान किया गया और वार्ता आसानी से आगे बढ़ी।

राष्ट्रीय सुरक्षा को भी दिखावे के बिना संभाला गया। ऐसे अभियान जो दृढ़ता और संयम के साथ संचालित किए गए। स्पष्ट लक्ष्य, सैनिकों को एक्शन लेने की स्वतंत्रता, निर्दोषों की सुरक्षा। इसी उद्देश्य के साथ हम काम करते हैं। इसके बाद हमारी मेहनत के नतीजे अपने आप दिखाई देते हैं।

कार्य संस्कृति

इन निर्णयों के पीछे एक विशेष कार्यशैली है। उनके द्वारा सबकी बात सुनी जाती है, लेकिन ढिलाई बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाती है। सबकी बातें सुनने के बाद जिम्मेदारी तय की जाती है, इसके साथ ये भी तय किया जाता है कि काम को कैसे करना है। और जब तक काम पूरा नहीं हो जाता है उस पर लगातार ध्यान रखा जाता है। जिसका काम बेहतर होता है उसका उत्साहवर्धन भी किया जाता है।

प्रधानमंत्री का जन्मदिन विश्वकर्मा जयंती, देव-शिल्पी के दिवस पर पड़ना महज़ संयोग नहीं है। यह तुलना प्रतीकात्मक भले हो, पर बोधगम्य है: सार्वजनिक क्षेत्र में सबसे चिरस्थायी धरोहरें संस्थाएं, सुस्थापित मंच और आदर्श मानक ही होते हैं। आम लोगों को योजनाओं का समय से और सही तरीके से फायदा मिले, वस्तुओं के मूल्य सही रहें, व्यापारियों के लिए सही नीति और कार्य करने में आसानी हो। सरकार के लिए यह ऐसे सिस्टम हैं जो दबाव में टिकें और उपयोग से और बेहतर बनें। इसी पैमाने से नरेन्द्र मोदी को देखा जाना चाहिए, जो भारत की कहानी के अगले अध्याय को आकार दे रहे हैं।

(श्री हरदीप पुरी, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री, भारत सरकार)