पीड़ा से भरा एक पत्र

Published By : Admin | May 8, 2010 | 08:58 IST

प्रिय मित्रो,

पिछले दिनों मेरे भाषणों और लेखो पर आधारित पुस्तक "सामाजिक समरसता" का लोकार्पण हुआ.

पुस्तक के दलित लेखक और मेरे परम मित्र किशोर मकवाना का अत्यंत पीड़ा से भरा पत्र आज मिला.

एक दलित की पीड़ा को इस blog के माध्यम से आप तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा हूँ.

 

श्री किशोर मकवाणा का अक्षरशः पत्र... 

सादर प्रणाम...

यह पत्र आपको एक सच्चई से रूबरू कराने के लिए लिख रहा हुं | मेरा जन्म दलित समाज में हुआ है, दलित-पीडित-वंजित परिवार-समुदायों की समाज में सदियों सें कैसी दुःखदायक स्थिति है उनके प्रत्यक्ष सनुभवों से मेरी जिन्दगी भरी पडी है| यही वजह है हि पीडित-वंचित मनुष्य के दुःख दर्द को जब किसी कि संवेदना का स्पर्श मिलता है तब, उसके प्रति आत्मीयता का स्वतः ही प्रादुर्भाव होता है|

मेरा सौभाग्य है कि संघर्षो के बीच ओर उसे पार कर, मुझे विचार-लेखन के व्यवसाय का अवसर मिला|

पिछले ढाई दशक से गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विचार ओर व्यवहार को अत्यंत बारिकी से देखता आया हूं| अंतःकरण में पवित्र भावना के साथ वे साथ वे पीडितों की सेवा में जुटे हुए हैं| उनके जीवनकार्य का केंद्र बिंदु हमेशा ही समाज की कतार में खडा अंतिम व्यक्ति रहा है| गुजरात के दलित बंधु आर्थिक रूप सें सक्षम हो, शोषण से मुकत हो, समग्र गुजरात समरस-एकरस बने इसके लिए श्री नरेन्द्र मोदी पूरे मनोयोग से एक अर्थ में डॉ. बाबा साहब अंबेडकर के स्वप्न को साकार कर रहे हैं| उनके विचार एवं व्यवहार में लेश मात्र का अंतर मुझे नजर नहीं आया तब लगा कि समाज के प्रति कर्तव्यभाव एवं ममत्वभाव को व्यकत करने वाले उनके लेखों एवं भाषाणों को लोगो के समक्ष रखना चाहिए| इसी विचार सें सामाजिक समरसता किताब का सृजन हुआ| हालांकि यह मेरी पहली किताब नहीं है, इससें पहले बिरसा मुंडा, संत रविदास, समर नहीं समरसता, राष्ट्रभक्त डॉं.बाबासाहब अंबेडकर, स्वामी विवेकानंद आदि विषयों पर मेरी काफी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है|

मेरे लिए यह गौरव की बात थी कि सामाजिक समरसता नामक मेरी १४वी पुस्तक लोगों के बीचा आने वाली थी| २६ अप्रैल २०१० की शाम ६.३० बजे आयोजित समारोह में गुजरात के क्रांतिकारी संत पू. स्वामी सच्चिदानंद, मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी एवं सुप्रसिध्द कवि-लेखक खरी सुरेश दलाल उपस्थित थे| यह मेरे लिए आनंद का अवसर था|

समग्र लोकार्पण समारोह अत्यंत गरिमामय रहा| मेरे पत्रकार मित्रो ने दूसरे दिन अखबारों एवं मीडिया मे अत्यंत उत्साह से इस पुस्तक विमोचन के समाचार को बेहतरीन तरीके से स्थान दिया| मुझ जैसे दलित लेखक-सृजक के लिए यह जीवन की चिरस्मरणीय एवं सर्वाधिक यशस्वी घटना थी|लेकिन एक दलित के आनंद के एस अवसर को कलंकित करने और विकृत रंग से रंगने का कांग्रेस ने हीन प्रयास लिया| श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने और विकृत रंग से रंगने का कांग्रेस ने हीन प्रयास किया|श्री नरेन्द्र मोदी ने अपने समग्र भाषण में कहीं, किसी भी स्वरूप में दलित समाज को लेकर कोई भी घटिया बात नहीं कही है| मोदी ने जो कहा ही नहीं ऍसी बात उनके मुंह में रख कांग्रेस को ने विकृत एवं मनगढंत बयानबाजी की| कांग्रेसी नेताओं ने सामाजिक समरसता के भावपूर्ण प्रसंग को कोरे झुठ के जरिए कलंकित करने का प्रयास किया|

हदय में पवित्र भाव सें दलित समाज की उन्नति के लिए कर्तव्यरत श्री नरेन्द्र मोदी के संबंध में कांग्रेस के विकृत एवं झुठे बयान से न सिर्फ मुझे बल्कि पूरे दलित समाज को गहरी ठेस पहुंची है|श्री नरेन्द्र मोदी के इस पूरे भाषण की वीडियो-डीवीडी एवं वेबसइट पर ट्रांन्सस्क्रिप्ट आज भी उपलब्ध है| मेरी दलित बंधुओं से नम्र विनती है कि इसें देख लिया जाना चाहिए, जिससे कि आप सत्य से वाकिफ हो सकें|

हिन्दुस्तान के अग्रणी अंग्रेजी दैनिक हिन्दू मे संपादक श्री एन. राम की टिप्प्णी का यहां उल्लेख कर रहा हूं| उन्होने कांग्रेसियों की ढोगी दलित भक्ति एवं विकृति का पर्दाफाश किया है| हिन्दु ने लिखा है कि सामाजिक समरसता पुस्तक विमोचन के अवसर पर मुख्यमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के भाषण में सरासर झुठ जोडकर कांग्रेस स्वयं की इज्जत ही उछाल रही है| श्री मोदी ने दलितों के खिलाफ एक शब्द का उच्चारण तक नहीं किया है और मीडिया रिपोर्टो में भी एसी किसी बात का उल्लेख नहीं है| श्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ एसे आधारहीन और जानबूझकर झुठ फैलाने से कांग्रेस दलितों की हिमायती नहीं बन सकती| कांग्रेस तो देश के लिए खतरनाक वोट बैंक की राजनीति करती है और उनसे कभी दलितों के हितों की परवाह की ही नही है, सिर्फ और सिर्फ दलितों का तथा समाज के वंचित वर्ग का उपयोग करके सत्ता सें चिपकी रहना चाहती है | चुनाव के समय खासकर अपने सत्ता स्वार्थ के लिए दलितों को उसने साधन बना दिया है|

हालांकि जिस कांग्रेस ने बाबा साहब आंबेडकर को जीवनबर अपमानित किया, दलितों को हमेशा मूर्ख बनाकर उनका वोट बैंक के रूप में उपयोग किया है, उससे दूसरी कोई अपेक्षा नहीं रखी जा सकती| डॉ. बाबा साहब जातिविहीन-एकरस समाज चाहते थे लेकिन कांग्रेस उसके स्थापना काल से ही विभिन्न जातियों के बीच वैमनस्य के बीज बोती आई है|

डॉ.बाबा साहब आंबेडकर द्वारा लिखित कांग्रेस ने अस्पूश्यों के लिए क्या किया पुस्तक पढने योग्य है| इस पुस्तक में अनेक वास्तविकताएं तथा घटनाएं वर्णित करके कांग्रेस के दलित विरोधी असली चेहरे को डॉं.बाबा साहब ने बेनकाब किया है| अहमदाबाद जिले के काविठा गांव में अस्पृश्य बालको के शाला प्रवेश के मामलें में गांव के लोगों ने अस्पृश्यों का बहिष्कार किया| उस वक्त स्वयं बाबा साहब ने काविठा गांव आकर दखल दिया था लेकिन कांग्रेस ने गांव के लोगों को समझाने के बजाय अस्पृश्यों को ही गांव छोडकर चले जाने की सलाह दें डाली थी| डॉ.बाबा साहब मुंबई से अहमदाबाद आए तब कालूपुर रेलवे स्टेशन पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने काले झंडे लहराकर उनको अपमानित किया था|

कदम्-कदम पर डॉ.बाबा साहब पर मानसिक अत्याचार करने वाले तथा दलितों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करने वाली कांग्रेस जैसी राजनैतिक पार्टी द्वारा हमारे दलित, वंचित,शोषित, पीडित समाज की पीडा दूर करने की बात सच्चाई सें परे है| इस पराई पीडा को सम्झने वाले श्री नरेन्द्रभाई मोदी जैसें समरस समाज के श्रेयस्कर चिंतक के खिलाफ सरासर झुठ दलितों के नाम पर कांग्रेस फैला रही है| ऐसे में कांग्रेस की इस रीति-नीति के खिलाफ दलितों का आक्रिश स्वाभाविक रूप सें पैदा होगा| यहां एक और बात की तरफ आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हुं| गुजरात विरोधी पिछलें आठ वर्षो सें गुजरात और श्री नरेन्द्र मोदी को बदनाम करने का एक भी मौका हाथ सें जाने नहीं देते| ऐसे समय में देश, गुजरात और समाज में वैमनस्य पैदा करने वाले तत्वो को पहचान लेना चाहिए|

अपना स्वार्थ सिध्ध करने के लिए कांग्रेस किस सीमा तक जा सकती है, यह बताने के लिए ही मैं इस पत्र द्वारा अपनी बात आप तक पहुंचा रहा हुं| मेरी इस भावना में आप सब भी सहभागी बनेंगे, यही अपेक्षा है|

किशोर मकवाणा संपादक "सामाजिक समरसता" संपादक "नमस्कार"

 

 


आप का,

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एक भारत, श्रेष्ठ भारत का जीवंत प्रतीक है काशी-तमिल संगमम
January 15, 2026

कुछ दिन पहले ही मुझे सोमनाथ की पवित्र भूमि पर सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में हिस्सा लेने का सुअवसर मिला। इस पर्व को हम वर्ष 1026 में सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार साल पूरे होने पर मना रहे हैं। इस क्षण का साक्षी बनने के लिए देश के कोने-कोने से लोग सोमनाथ पहुंचे। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतवर्ष के लोग जहां अपने इतिहास और संस्कृति से गहराई से जुड़े हैं, वहीं कभी हार ना मानने वाला साहस भी उनके जीवन की एक बड़ी विशेषता है। यही भावना उन्हें एक साथ जोड़ती भी है। इस कार्यक्रम के दौरान मेरी मुलाकात कुछ ऐसे लोगों से भी हुई, जो इससे पहले सौराष्ट्र-तमिल संगमम के दौरान सोमनाथ आए थे और इससे पहले काशी-तमिल संगमम के समय काशी भी गए थे। ऐसे मंचों को लेकर उनकी सकारात्मक सोच ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इसलिए मैंने तय किया कि क्यों ना इस विषय पर अपने कुछ विचार साझा करूं।

‘मन की बात’ के एक एपिसोड के दौरान मैंने कहा था कि अपने जीवन में तमिल भाषा ना सीख पाने का मुझे बहुत दुख है। यह हमारा सौभाग्य है कि बीते कुछ वर्षों से हमारी सरकार तमिल संस्कृति को देश में और लोकप्रिय बनाने में निरंतर जुटी हुई है। यह ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को और सशक्त बनाने वाला है। हमारी संस्कृति में संगम का बहुत महत्त्व है। इस पहलू से भी काशी-तमिल संगमम एक अनूठा प्रयास है। इसमें जहां भारत की विविध परंपराओं के बीच अद्भुत सामंजस्य दिखता है, वहीं यह भी पता चलता है कि कैसे हम एक दूसरे की परंपराओं का सम्मान करते हैं।

काशी तमिल संगमम के आयोजन के लिए काशी सबसे उपयुक्त स्थान कहा जा सकता है। यह वही काशी है, जो अनादि काल से हमारी सभ्यता की धुरी बनी हुई है। यहां हजारों वर्षों से लोग ज्ञान, जीवन के अर्थ और मोक्ष की खोज में आते रहे हैं।

काशी का तमिल समाज और संस्कृति से अत्यंत गहरा नाता रहा है। काशी बाबा विश्वनाथ की नगरी है, तो तमिलनाडु में रामेश्वरम तीर्थ है। तमिलनाडु की तेनकासी को दक्षिण की काशी या दक्षिण काशी कहा जाता है। पूज्य कुमारगुरुपरर् स्वामिजि ने अपनी विद्वता और आध्यात्म परंपरा के माध्यम से काशी और तमिलनाडु के बीच एक सशक्त और स्थायी संबंध स्थापित किया था।

तमिलनाडु के महान सपूत महाकवि सुब्रमण्यम भारती जी को भी काशी में बौद्धिक विकास और आध्यात्मिक जागरण का अद्भुत अवसर दिखा। यहीं उनका राष्ट्रवाद और प्रबल हुआ, साथ ही उनकी कविताओं को एक नई धार मिली। यहीं पर स्वतंत्र और अखंड भारत की उनकी संकल्पना को एक स्पष्ट दिशा मिली। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो काशी औैर तमिलनाडु के बीच गहरे आत्मीय संबंध को दर्शाते हैं।

वर्ष 2022 में वाराणसी की धरती पर काशी-तमिल संगमम की शुरुआत हुई थी। मुझे इसके उद्घाटन समारोह में शामिल होने का सौभाग्य मिला था। तब तमिलनाडु से आए लेखकों, विद्यार्थियों, कलाकारों, विद्वानों, किसानों और अतिथियों ने काशी के साथ साथ प्रयागराज और अयोध्या के दर्शन भी किए थे। इसके बाद के आयोजनों में इस पहल को और विस्तार दिया गया।

इसका उद्देश्य यह था कि संगमम में समय-समय पर नए विषय जोड़े जाएं, नए और रचनात्मक तरीके अपनाए जाएं और इसमें लोगों की भागीदारी ज्यादा से ज्यादा हो। प्रयास यह था कि ये आयोजन अपनी मूल भावना से जुड़े रहकर भी निरंतर आगे बढ़ता रहे। वर्ष 2023 के दूसरे आयोजन में टेक्नोलॉजी का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया, ताकि यह सुनिश्चित हो कि भाषा इसमें बाधा ना बने। इसके तीसरे संस्करण में इंडियन नॉलेज सिस्टम पर विशेष फोकस रखा गया। इसके साथ ही शैक्षिक संवादों, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों, प्रदर्शनियों और संवाद सत्रों में लोगों की बड़ी भागीदारी देखने को मिली। हजारों लोग इनका हिस्सा बने।

काशी-तमिल संगमम का चौथा संस्करण 2 दिसंबर, 2025 को आरंभ हुआ। इस बार की थीम बहुत रोचक थी- तमिल करकलम् यानि तमिल सीखें....।

इससे काशी और दूसरी जगहों के लोगों को खूबसूरत तमिल भाषा सीखने का एक अनूठा अवसर मिला। तमिलनाडु से आए शिक्षकों ने काशी के विद्यार्थियों के लिए इसे अविस्मरणीय बना दिया! इस बार कई और विशेष कार्यक्रम भी आयोजित किए गए।
प्राचीन तमिल साहित्य ग्रंथ तोलकाप्पियम का चार भारतीय और छह विदेशी भाषाओं में अनुवाद किया गया।

तेनकासी से काशी तक पहुंची एक विशेष व्हीकल एक्सपेडिशन भी देखने को मिली। इसके अलावा काशी में स्वास्थ्य शिविरों और डिजिटल लिट्रेसी कैंप के आयोजन के साथ ही कई और सराहनीय प्रयास भी किए गए। इस अभियान में सांस्कृतिक एकता के संदेश का प्रसार करने वाले पांड्य वंश के महान राजा आदि वीर पराक्रम पांडियन जी को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

पूरे आयोजन के दौरान नमो घाट पर प्रदर्शनियां लगाई गईं, बीएचयू में शैक्षणिक सत्र का आयोजन हुआ, साथ ही विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम भी हुए।

काशी-तमिल संगमम में इस बार जिस चीज ने मुझे सबसे अधिक प्रसन्नता दी, वो हमारे युवा साथियों का उत्साह है। इससे अपनी जड़ों से और अधिक जुड़े रहने के उनके पैशन का पता चलता है। उनके लिए ये एक ऐसा अद्भुत मंच है, जहां वे विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए अपनी प्रतिभा दिखा सकते हैं।

संगमम के अलावा काशी की यात्रा भी यादगार बने, इसके लिए विशेष प्रयास किए गए। भारतीय रेल ने लोगों को तमिलनाडु से उत्तर प्रदेश ले जाने के लिए विशेष ट्रेनें चलाईं। इस दौरान कई रेलवे स्टेशनों पर, विशेषकर तमिलनाडु में उनका खूब उत्साह बढ़ाया गया। सुंदर गीतों और आपसी चर्चाओं से ये सफर और आनंददायक बन गया।

यहां मैं काशी और उत्तर प्रदेश के अपने भाइयों और बहनों की सराहना करना चाहूंगा, जिन्होंने काशी-तमिल संगमम को विशेष बनाने में अपना अद्भुत योगदान दिया है। उन्होंने अपने अतिथियों के स्वागत और सत्कार में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। कई लोगों ने तमिलनाडु से आए अतिथियों के लिए अपने घरों के दरवाजे तक खोल दिए। स्थानीय प्रशासन भी चौबीसों घंटे जुटा रहा, ताकि मेहमानों को किसी प्रकार की दिक्कत ना हो। वाराणसी का सांसद होने के नाते मेरे लिए ये गर्व और संतोष दोनों का विषय है।

इस बार काशी-तमिल संगमम का समापन समारोह रामेश्वरम में आयोजित किया गया, जिसमें तमिलनाडु के सपूत उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन जी भी मौजूद रहे। उन्होंने इस कार्यक्रम को अपने विचारों से समृद्ध बनाया। भारतवर्ष की आध्यात्मिक समृद्धि पर बल देते हुए उन्होंने बताया कि कैसे इस तरह के मंच राष्ट्रीय एकता को और अधिक सुदृढ़ करते हैं।

काशी-तमिल संगमम का बहुत गहरा प्रभाव देखने को मिला है। इसके जरिए जहां सांस्कृतिक चेतना को मजबूती मिली है, वहीं शैक्षिक विमर्श और जनसंवाद को भी काफी बढ़ावा मिला है। इससे हमारी संस्कृतियों के बीच संबंध और प्रगाढ़ हुए हैं। इस मंच ने 'एक भारत, श्रेष्ठ भारत' की भावना को आगे बढ़ाया है, इसलिए आने वाले समय में हम इस आयोजन को और वाइब्रेंट बनाने वाले हैं। ये वो भावना है, जो शताब्दियों से हमारे पर्व-त्योहार, साहित्य, संगीत, कला, खान-पान, वास्तुकला और ज्ञान-पद्धतियों का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।

वर्ष का यह समय हर देशवासी के लिए बहुत ही पावन माना जाता है। लोग बड़े उत्साह के साथ संक्रांति, उत्तरायण, पोंगल, माघ बिहू जैसे अनेक त्योहार मना रहे हैं। ये सभी उत्सव मुख्य रूप से सूर्यदेव, प्रकृति और कृषि को समर्पित हैं। ये त्योहार लोगों को आपस में जोड़ते हैं, जिससे समाज में सद्भाव और एकजुटता की भावना और प्रगाढ़ होती है। इस अवसर पर मैं आप सभी को अपनी शुभकामनाएं देता हूं। मुझे पूरा विश्वास है कि इन उत्सवों के साथ हमारी साझी विरासत और सामूहिक भागीदारी की भावना देशवासियों की एकता को और मजबूत करेगी।