2011's Message: For Transformation, 'Sauno Saath-Sauno Vikas'!

Published By : Admin | December 30, 2011 | 10:39 IST

प्रिय मित्रों,

यह समय है बीते हुए वर्ष को अलविदा कहने का और आने वाले वर्ष के स्वागत का। वर्ष 2011 में खुशी और गम की अनेक घटनाएं घटित हुई जो 2012 के लिए आशा और आशंकाएं लेकर आई है। इस समय मुझे लगता है कि, बीते हुए वर्ष में घटित हुई घटनाओं की याद ताजा करना हमारे लिए उपयोगी होगा।

वर्ष 2012 का वर्णन अगर एक शब्द में ही करना हो तो वह शब्द : जनक्रांति। टाइम मैगजीन प्रतिवर्ष च्पर्सन ऑफ दी ईयरज् का खिताब घोषित करता है। वर्ष 2011 के लिए उसने दी प्रोटेस्टर अर्थात एक आम आदमी में पैदा हुए विद्रोह को च्पर्सन ऑफ दी ईयरज् का खिताब दिया। बीता हुआ वर्ष किसी एकाद व्यक्ति के सामथ्र्य का नहीं था, बल्कि जनता के सामूहिक सामथ्र्य का अंदाज हमें देखने को मिला। लोगों की, खास तौर पर युवाओं की अपेक्षा पर खरी न उतरी हो, ऐसी सरकारों के प्रति लोगों का विरोध नजर आया। जनसमूह की सामूहिक चेतना ने वर्षों से सत्ता पर कब्जा जमाए हुए जनविरोधी शासकों को चुनौती दी। अरब देशों में इजिप्ट से लेकर मिडिल ईस्ट और ग्रीस में भी आर्थिक मंदी को लेकर लोगों का विद्रोह देखने को मिला। मानवजाति की प्राचीनतम संस्कृतियों में हुए विद्रोह की आवाज हमको आत्ममंथन करने के लिए मजबूर करती है।

2011 में जनसामान्य में उठी विरोध की आंधी की बात हो तो हमारे देश में हुई घटनाओं को किस तरह भुलाया जा सकता है। विश्व भर में हुए आंदोलन की घटनाओं में किसी न किसी तरह हमारे देश का प्रतिनिधित्व रहा है। हमारे लिए गर्व की बात तो यह है कि दुनिया भर की जनक्रांतियों में ज्यादातर जनक्रांतियां अहिंसक थी। महात्मा गांधीजी को इससे बड़ी श्रद्घांजलि और क्या हो सकती है कि आज भी जब दुनिया भर की युवा शक्ति विद्रोह करती है तब गांधी के मार्ग पर चलने को प्रेरित होती है। फिर वह आजादी की लड़ाई हो या गुजरात में तत्कालीन सरकार के खिलाफ चुनौती देने वाला 1974 का नवनिर्माण आंदोलन हो। और या फिर 1975 का आपातकाल हो, जब लोकतांत्रिक मूल्यों के समक्ष खड़े हुए खतरे के खिलाफ विद्रोह हुआ था। भारत ने हमेशा अहिंसक विद्रोह की ताकत दुनिया के समक्ष साबित की है।

गत वर्ष भारत भर में लोगों की चेतना को प्रज्जवलित करने वाली विरोध की आंधी चली। बीमार अर्थव्यवस्था और कमजोर शासन जैसे परिबलों के साथ ही इस वर्ष के दौरान सत्ताधीशों द्वारा संवैधानिक ढांचे पर गंभीर प्रहार नजर आए, जिन्होंने देश के लोगों को निराश और अधीर कर दिया। देश की हर गली और कोनें में वर्तमान केन्द्र सरकार की कमियों और उसके अनिर्णयात्मक सरकारी प्रशासन और असमर्थता की बातें चलीं। देश भर में फूंके गए विरोध के बिगुल इस तथ्य का समर्थन करते हैं।

लेकिन मुश्किल के इस समय में भी ऐसी कई बातें हैं जो हमारे लिए आशा की किरण के समान हैं। अति निराशा में चले जाने के बजाय अतिशय आलोचनात्मक बनने के बजाय हमें इन मामलों को अवसर के रूप में देखना चाहिए। मेरे चीन दौरे के दौरान वर्तमान वैश्विक मंदी के काल में एशिया किस तरह दुनिया का ग्रोथ इंजन बन सकता है, इस पर मैने चर्चा की। पश्चिम के देशों में पंूजीवाद का पतन भारत के लिए एक अवसर के समान है। यह अवसर है विकास का, दुनिया को नेतृत्व प्रदान करने का और देश के लाखों लोगों को गरीबी के गर्त में से बाहर लाने का।

मित्रों, तमाम जनआंदोलन मात्र विद्रोह के रूप में ही आकार लेते हैं, ऐसा नहीं कह सकते। मैं अपने आप को भाग्यशाली मानता हूं कि जनआंदोलन के एक सकारात्मक स्वरूप को निहारने का अवसर मुझे मिला- च्सबका साथ सबका विकासज् मंत्र के साथ ऐसे ही एक आंदोलन ने गुजरात में आकार लिया, जिसमें सामूहिक पुरुषार्थ से विकास का लाभ प्रत्येक नागरिक को पहुंचाने की भावना नजर आई। गुजरात में हमारा विकास का मॉडल तीन स् पर आधारित था - स्श्चद्गद्गस्र, स्ष्ड्डद्यद्ग और स्द्मद्बद्यद्य, जिसमें इस वर्ष हमने चौथा स् सद्भावना का शामिल किया। गुजरात के विकास का परिचय दुनिया को करवाने के लिए एकत्रित जनशक्ति को देखकर मैं भावविभोर हो उठा। राज्य सरकार के मंत्रियों सहित समग्र प्रशासन के उच्च अधिकारियों ने गांव-गांव में जाकर लोगों को उनकी बेटियों को शिक्षा दिलवाने का आह्वान किया, जिसने विकास के इस जन आंदोलन को गति दी। खेल महाकुंभ-2011 के तहत क्रिकेट स्पर्धा में एक रिकार्ड बनाने वाली विकलांग बेटी की बात एक सर्वसमावेशक जनआंदोलन की गवाह थी। ऐसी घटनाएं मुझे युवा प्रतिभाओं के सैलाब को सराहने और वह देश के विकास में अपना श्रेष्ठतम प्रदान कर सकते हैं, ऐसा वातावरण खड़ा करने की प्रेरणा देते हैं।

हमारा लोकतंत्र अब भी युवावस्था में है और सुदृढ़ भी है। आज देश जब ढेरों आंतरिक और बाहरी चुनौतियों का सामना कर रहा है, ऐसे में मुझे विश्वास है कि हम भूतकाल की तरह इस बार भी ज्यादा मजबूत होकर उभरेंगे। स्वामी विवेकानंद की 150वीं जन्मजयंति के मौके पर गुजरात सरकार ने वर्ष 2012 को युवा शक्ति वर्ष के रूप में मनाने की योजना बनाई है। अगर युवा शक्ति को उभरने का अवसर न मिले तो हमारा विकास पूर्ण नहीं कहलाएगा। मुझे विश्वास है कि, च्युवा शक्ति वर्षज् युवा प्रतिभाओं के लिए उभरने का अवसर बनेगा।

2011 का वर्ष हमारे लिए एक स्पष्ट संदेश लेकर आया है कि, जनशक्ति आवश्यक तो है लेकिन देश की कायापलट के लिए पर्याप्त नहीं है। जनशक्ति को अगर सुशासन का सहयोग मिले तो ही सच्चा और दीर्घकालिक विकास किया जा सकता है। जनशक्ति और सुशासन - यह दोनों मिल जाएं तो हर तरह के लक्ष्य को पूरा किया जा सकता है। फिर वह भ्रष्टाचार उन्मूलन हो, कुपोषण हो या फिर निरक्षरता से मुक्ति। हमारे लिए और आने वाली पीढिय़ों के लिए एक उन्नत भविष्य निर्माण का सामथ्र्य इसमें है। गुजरात में सुशासन, विकास और सौहार्द जैसे परिबलों ने छह करोड़ गुजरातियों के सामथ्र्य को बुलंद किया है। मुझे आशा है कि भारतीय के रूप में हम इस विकासगाथा का पुनरावर्तन भारत देश के लिए भी करेंगे। 2011 का वर्ष जन समूह के विद्रोह की ताकत साबित करने वाला रहा। हम कामना करें कि, 2012 का वर्ष च्सबका साथ सबका विकासज् मंत्र के जरिए जन समूह के सहयोग की ताकत को साबित करे।

आपको और आपके प्रियजनों को मैं वर्ष 2012 की शुभकामनाएं देता हूं। परम शक्तिमान परमेश्वर के आशीर्वाद से आपका आंगन खुशियों और सफलताओं से छलक उठे, यही कामना है।

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भारत की एकता और प्रगति के लिए समर्पित एक जीवन
July 06, 2026

आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं।

श्यामा प्रसाद जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से मिल सकता था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी की गिनती अपने समय के महान शिक्षाविदों में होती थी। लेकिन तमाम सुविधाओं के बावजूद श्यामा प्रसाद जी ने त्याग और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। उनका दृढ़ विश्वास था कि चाहे अंग्रेजी शासन का विरोध हो, सांप्रदायिकता से लड़ाई हो या मानवीय संकटों का सामना, वे अपने समय की इन चुनौतियों के सामने मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते। इस सफर में उन्हें कई गहरे व्यक्तिगत दुख भी झेलने पड़े। पहले उन्होंने अपने छोटे बच्चे को खोया और बाद में पत्नी का भी निधन हो गया। लेकिन इन दुखद परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने हौसले को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनका संकल्प और सशक्त हुआ, राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण और गहरा होता गया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था। देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ वर्षों बाद इसी उद्देश्य से उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी संघर्ष किया। जेल और नजरबंदी भी उन्हें रास्ते से डिगा नहीं सकी। जब नजरबंदी के दौरान उनका निधन हुआ, तब वे उन अनगिनत लोगों से बहुत दूर थे, जिनके लिए वे जीवनभर संघर्ष करते रहे। इतिहास में कुछ ऐसे पल आते हैं, जब किसी व्यक्ति का सर्वोच्च बलिदान राजनीति से ऊपर उठकर देश की स्मृति का हिस्सा बन जाता है। डॉ. मुखर्जी का बलिदान भी ऐसा ही था। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना बलिदान दिया, जिस पर उन्हें पूरा विश्वास था। दशकों बाद, साल 2019 में आर्टिकल 370 और 35(A) को हटाया जाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि थी।

डॉ. मुखर्जी ने हमेशा राष्ट्रहित और भारतीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। इसके लिए उन्होंने मजबूत संस्थानों का निर्माण किया और ऐसी व्यवस्थाएं बनाईं, जो उस समय की सोच से काफी आगे थीं। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में ऐसे बदलाव किए, जो राष्ट्रहित और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप थे। शिक्षाविदों के एक सम्मेलन में डॉ. मुखर्जी ने कहा था, ‘’शिक्षण संस्थानों को केवल बाबू या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करने की फैक्ट्री समझना गलत है। हमें विद्यार्थियों को ऐसे तैयार करना होगा ताकि वे नेतृत्व की भूमिका निभा सकें। हमारी स्वशासी संस्थाओं जैसे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन्स, प्रांतीय और केंद्रीय विधायिकाओं में बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हो सकें। इसके साथ ही वे वित्त, व्यापार और उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिभा दिखा सकें।’’

कलकत्ता विश्वविद्यालय में अपने नेतृत्व में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। इनमें लाइब्रेरी की सुविधाओं में सुधार, विज्ञान मेंरिसर्च को बढ़ावा देना, ऐतिहासिक वस्तुओं के अध्ययन को प्रोत्साहित करना और कृषि से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू करना शामिल था। उन्होंने खेलकूद, टीचर्स ट्रेनिंग और स्टूडेंट वेलफेयर जैसे क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान दिया। विद्यार्थियों में अपनी यूनिवर्सिटी के प्रति गर्व की भावना विकसित हो, इसके लिए उन्होंने 24 जनवरी को विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मनाने की परंपरा शुरू की। उन्होंने गुरुदेव टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक गीत लिखने का अनुरोध भी किया था।

उनके जीवन के बाद के वर्षों में इस भावना का एक और उदाहरण तब देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय जनसंघ बनाने का निर्णय लिया। उस समय देश में हर तरफ कांग्रेस पार्टी का ही बोलबाला था। ऐसे में उन्होंने महसूस किया कि देश को एक ऐसे नए विकल्प की बहुत जरूरत है, जो भारत की प्रगति की बात भी करे और हमारी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ा रहे।शायद इसी को ध्यान में रखते हुए पार्टी का चुनाव चिह्न 'दीपक' यानि मिट्टी का दीया रखा गया। एक अकेला दीया देखने में भले ही छोटा लगे, लेकिन उसमें अपने आस-पास के गहरे से गहरे अंधकार को मिटाने की अद्भुत शक्ति होती है। जनसंघ ने अपने सक्रिय काल में और उसके बाद भी बिल्कुल यही किया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जीका भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्यकाल बेहद अहम रहा। उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में याद किया जाता है, जिनका विजन बहुत विराट था। वे उद्योग को नए-नए आजाद हुए भारत के लोगों में सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास का संचार करने का सशक्त माध्यम मानते थे। वे वेल्थ और वैल्यू क्रिएशन के महत्व को भली-भांति समझते थे। उन्होंने दामोदर वैली कॉरपोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और मजबूत औद्योगिक नीति जैसी ऐतिहासिक पहल की। इसके माध्यम से आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव रखी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि भारत के पारंपरिक सामर्थ्य की कभी उपेक्षा न हो। वे हथकरघा, कुटीर उद्योग, कारीगरों और कपड़ा उद्योग से जुड़े श्रमिकों के हितों के भी प्रबल समर्थक थे।

यहां मैं अपना एक निजी अनुभव भी साझा करना चाहता हूं। आत्मनिर्भर भारत के स्पष्ट विजन के साथ जिस सिंदरी संयंत्र की स्थापना के लिए डॉ. मुखर्जी ने अथक प्रयास किए थे, उसकी कई दशकों तक सत्ता में रहने वाले लोगों ने घोर उपेक्षा की। मुझे इस बात का संतोष है कि हमारी सरकार को उसके पुनरुद्धार का सौभाग्य मिला। उस कार्यक्रम में उपस्थित होना मेरे सार्वजनिक जीवन के सबसे विशेष और अविस्मरणीय क्षणों में से एक बन गया।

भारत की प्राचीन परंपरा सदियों से संवाद और विचार-विमर्श का सम्मान करती आई है। डॉ. मुखर्जी इस लोकतांत्रिक भावना के सशक्त प्रतीक थे। उन्होंने पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल होना इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वे मानते थे कि देश की आजादी के शुरुआती वर्षों में राष्ट्र निर्माण का दायित्व राजनीतिक मतभेदों से कहीं ऊपर है। उन्होंने पूरी निष्ठा और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ अपनी जिम्मेदारियों को निभाया। लेकिन जब उन्हें लगा कि राष्ट्रीय महत्व के कुछ प्रश्नों पर देशहित में अलग मार्ग अपनाना आवश्यक है, तो उन्होंने पूरी गरिमा के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन उस राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए समर्पित कर दिया, जिसे वे राष्ट्र के लिए आवश्यक मानते थे।

75 वर्ष पहले पंडित नेहरू पहला संविधान संशोधन लेकर आए। इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा प्रहार माना गया। तब डॉ. मुखर्जी इसके सबसे मुखर आलोचक रहे थे। वे भली-भांति समझ चुके थे कि कांग्रेस किस हद तक जा सकती है। समय के साथ उनकी यह आशंका सही साबित हुई। जो पार्टी 75 वर्ष पहले पहला संविधान संशोधन लेकर आई थी, उसी ने 1975 में देश पर आपातकाल थोपा। इतना ही नहीं, 50 वर्ष पहले 42वां संविधान संशोधन अधिनियम लाकर एक बार फिर लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद पर कुठाराघात किया।

डॉ. मुखर्जी अपनी मानवीय संवेदनाओं और सेवाभाव के लिए भी विशेष रूप से जाने जाते हैं। वर्ष 1943 में जब बंगाल भीषण अकाल की त्रासदी से जूझ रहा था, तब उन्होंने पीड़ितों की सेवा में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि लोगों को भोजन मिल सके, जिसके लिए कई कैंटीन और रिलीफ सेंटरशुरू किए गए। एक ओर वे लोगों की पीड़ा से बहुत व्यथित थे, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश हुकूमत की असंवेदनशीलता से अत्यंत आक्रोशित भी थे। उन्होंने अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए पंचाशेर मन्वंतर नाम की एक किताब भी लिखी। 1942 में जब मेदिनीपुर में भीषण चक्रवात आया, तब उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों का नेतृत्व किया।

कोलकाता के एक कॉलेज में युवाओं को संबोधित करते हुए डॉ. मुखर्जी ने उनसे आग्रह किया था, ‘’आप जो भी कार्य करें, उसे पूरी गंभीरता, लगन और ईमानदारी से करें। किसी भी काम को कभी अधूरा न छोड़ें। तब तक स्वयं को संतुष्ट न मानें, जब तक आपने उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान न दे दिया हो।’’ आज हमारा देश विकसित भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है।ऐसे में उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम प्रतिदिन उसभारत के निर्माण की दिशा में निरंतर प्रयास करें, जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी। एक ऐसा भारत जो सशक्त हो, एकजुट हो, आत्मविश्वास से भरपूर और संवेदनशील हो। देश के युवाओं पर मुझे पूरा विश्वास है कि वे इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी करेंगे और इस संकल्प को साकार करने के लिए पूरी ऊर्जा के साथ जुट जाएंगे।