Hon. Chief Minister's Speech at Fergusson College, Pune

Published By : Admin | July 14, 2013 | 16:29 IST

श्रीमान डॉ. श्रीकृष्ण कानेटकर जी, डॉ. रविन्द्र सिंह परदेशी जी, मेरे साथी श्रीमान श्याम जाजू जी, उपस्थित सभी महानुभाव और सौ नौजवान मित्रों..! जो लोग इस सभा गृह में नहीं पहुंच पाए हैं और जिन्हें दूर से ही इस कार्यक्रम को देखने का अवसर आया है, उन मित्रों से मैं प्रार्थना करता हूँ कि आप कार्यक्रम के बाद रूकिए, मैं आपके पास आऊंगा। मैं श्रीमान विजय शिरके जी के परिवार को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ, उन्होंने इस ऐतिहासिक स्थल को सुरक्षित और संवर्धन करने के लिए अपने परिवार का योगदान दिया और इस पवित्र कार्य को करने के लिए जिस परिवार ने योगदान दिया, उस परिवार का सम्मान करने का मुझे सौभाग्य मिला, इसलिए मैं आप सबका बहुत आभारी हूँ..!

ई वर्षों से फर्ग्यूसन कॉलेज के संबंध में, यहाँ की शिक्षा प्रवृत्ति के संबंध में, जब भी कुछ महापुरूषों के जीवन को पढ़ने का अवसर मिला, तो अवश्य रूप से फर्ग्यूसन कॉलेज का उल्लेख आया। मन में था ही कि कभी ना कभी इस पवित्र धरती की रज अपने माथे पर चढ़ाने का सौभाग्य मिले, और वो सौभाग्य मुझे आज मिला है। वीर सावरकर जी प्रशिक्षा काल में जिस जगह पर रह कर के स्वातंत्र्य देवी की उपासना करते थे, जहाँ से वो स्वातंत्र्य का संदेश अपने साथियों को सुनाते थे, उस कक्ष में जाने का मुझे सौभाग्य मिला। भारत माँ की उत्कृष्ट सेवा करने की तीव्रतम इच्छा के वाइब्रेशन्स उस कक्ष में अनुभव किए, ये भी मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ। और जिस स्थान पर मैं अभी खड़ा हूँ, इतिहास गवाह है कि एक सौ साल पुरानी ये विरासत है, जहाँ पर देश के गणमान्य महानुभावों ने अपने विचारों से युवा पीढ़ी का और राष्ट्र का मार्गदर्शन किया है..! हम कुछ भी ना करें, किसी वक्ता को भी ना बुलाएं, सिर्फ मौन हो कर के सौ साल की उस विरासत का हम अनुभव करें और मन में फिर स्मरण करें कि इस भूमि पर गांधी आएं होंगें तो कैसा दृश्य होगा, रविन्द्रनाथ टागोर आए होंगे तो कैसा दृश्य होगा, श्री रमण आएं होंगें तो कैसा दृश्य होगा..! ऐसे-ऐसे महापुरुष जब इस कक्ष में आए होंगे तो वो पल कैसे होंगे..! अगर हम मौन रह कर के कुछ पल उस स्मृतियों का स्मरण करें, तो मित्रों मुझे विश्वास है कि उन महापुरूषों के शब्द भाव आज भी यहाँ आंदोलित होते होंगे। हम उस आंदोलित भावों को अनुभव कर सकते हैं, सिर्फ हमारे मन की स्थिति होनी चाहिए..! अगर हमारे मन की स्थिति हुई तो हम अनुभव कर सकते हैं। जैसे टीवी पर हम हमारे पंसद की चैनल चलाते हैं और वो चैनल हमारे पास आती है, वैसे ही मन की चैनल को उसके साथ जोड़ दिया जाए तो हम उसकी अनुभूति कर सकते हैं। और ऐसे स्थान पर मुझे कुछ कहने का सौभाग्य मिल रहा है, ये अपने आप में मेरे लिए एक बहुत बड़े सौभाग्य का पल है और मैं इसके लिए यहाँ के सभी व्यवस्थापकों का बहुत-बहुत आभारी हूँ..!

मेरा फर्ग्यूसन कॉलेज में आना जब तय हुआ, तो मैंने एक छोटा सा प्रयोग किया। मैं सोशल मीडिया में बहुत एक्टिव हूँ। ट्विटर, फेसबुक पर नई पीढ़ी के साथ जुड़ा रहता हूँ, उनके विचारों को जानने का मुझे बहुत अच्छा अवसर मिलता है। तो मैंने इस फर्ग्यूसन कॉलेज में आने से पहले फेसबुक पर एक रिक्वेस्ट लिखी थी कि मैं फर्ग्यूसन कॉलेज जा रहा हूँ, वहाँ के विद्यार्थी मित्रों से मिल रहा हूँ, तो आपको क्या लगता है कि मुझे क्या कहना चाहिए..? आप मुझे गाइड करें, मेरा मार्गदर्शन करें..! ऐसा मैंने सोशल मीडिया में जो नौजवान एक्टिव हैं उनसे प्रार्थना की थी। और मैं आज बड़े आनंद और गर्व से कहता हूँ कि देश के कोने-कोने से ढाई हजार से अधिक नौजवानों ने मुझे चिट्ठी लिखी। यहाँ पर क्या बोलना, क्या कहना, उनके मन में क्या व्यथा है, क्या पीड़ा है... इतने उत्तम शब्दों में उन्होंने लिखा..! मेरे भाषण में उन नौजवानों के विचारों की छाया रहेगी क्योंकि मैंने उसे पढा है। एक प्रकार से आज के मेरे भाषण को बांधने में बहुतेक मात्रा में सोशल मीडिया में मुझे एडवाइज करने वाले उन नौजवानों का योगदान है और एक प्रकार से ये भाषण मोदी का नहीं है, ये भाषण उन ढाई हजार सोशल मीडिया पर एक्टिव और प्रोएक्टिव उन नौजवानों का है, मैं सिर्फ उसको अपनी वाणी दे रहा हूँ और हो सकता है कुछ भाषा में मेरे अपने भाव प्रकट होंगे लेकिन मूल विचार उन नौजवानों ने दिए हैं। मैं फिर से एक बार उन नौजवानों का बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूँ..! और मैं एक संतोष व्यक्त करता हूँ। कभी-कभी चर्चा चलती है कि भई देश के नौजवान, देश की स्थिति, क्या चलता होगा..? ये ढाई हजार देश के हर कोने में से है। कश्मीर से भी लिखने वाले लोग हैं, नागालैंड और मिजोरम से भी लिखने वाले लोग हैं, कन्याकुमारी से भी लिखने वाले लोग हैं... देश के हर कोने से लिखने वाले लोग हैं। और मैं उसमें एक समान भाव देखता हूँ, मैं उसमें एक समान तंतु देखता हूँ। और वो समान तंतु ये नजर आता है कि ये सब के सब देश की हर बात से, हर घटना से बहुत ही कन्सर्न्ड है।

हम जो मानते हैं कि हमारे नौजवानों को कोई परवाह नहीं, वो तो बस जींस का पैंट पहनना और लंबे बाल रखना यही उसका काम है, ऐसा नहीं है..! वे सोचते हैं, वे कुछ करना चाहते हैं, वे कुछ कहना चाहते हैं और ये मैंने आज इस फर्ग्यूसन कॉलेज के मेरे लेक्चर के माध्यम से अनुभव किया कि नौजवानों के दिल में क्या आग है, क्या स्पार्क है, क्या सपने हैं, कितना सामर्थ्य पड़ा है, कठिनाइयों के बावजूद भी कुछ करने का कितना उमंग और उत्साह है..! और जिस देश का नौजवान इतना सामर्थ्यवान हो, कुछ करने के लिए प्रतिबद्घ हो, उस देश का भविष्य कभी भी अंधकारमय नहीं हो सकता है, ये मैं आज इस पवित्र धरती से कहना चाहता हूँ..! और हम बहुत भाग्यशाली हैं, हम विश्व के सबसे युवा देश हैं। हमारे देश की 65% जनसंख्या 35 से कम आयु की है। जिस देश के अंदर 65% से अधिक जनसंख्या 35 से कम आयु की हो, वो युवा देश दुनिया को क्या कुछ नहीं दे सकता है, दुनिया के लिए क्या कुछ नहीं कर सकता है..! एक प्रकार से ना सिर्फ हिन्दुस्तान की समस्याएं, बल्कि विश्व की समस्याओं के समाधान के लिए भी ये युवा शक्ति काम आ सकती है, बशर्ते कोई करने वाला हो, कोई सेाचने वाला हो, कोई दिशा देने वाला हो, कोई उंगली पकड़ कर चलने वाला हो, तो सब कुछ संभव है..!

मित्रों, आज जो देश में निराशा का माहौल है..! चारों तरफ, कोई भी मिले तो कहता है, छोड़ो यार, पिछले जन्म में क्या पाप किये होंगे जो हिन्दुस्तान में पैदा हुए..! छोड़ो यार, कुछ होना नहीं है..! अरे छोड़ो यार, तुम क्यों औरों की परवाह करते हो, तुम अपना कर लो..! ये ही भाषा सुनाई देती है। मित्रों, मैं इस भाषा को, इस निराशा के स्वर को एन्डोर्स नहीं करता हूँ। ये बहुरत्ना वसुंधरा है, हजारों सालों की सांस्कृतिक विरासत के हम धनी हैं। 1200 साल की गुलामी के बाद भी सीना तान कर खड़े रहने का सामर्थ्य इस धरती का है। क्या कारण है..? लोकमान्य तिलक ने अंग्रेज सल्तनत के सामने उस समय जो ललकार किया था, ‘स्वराज्य मेरा जन्म सिद्घ अधिकार है’, वो कौन सी ताकत थी, कौन सा आत्मविश्वास था..! अगर गुलामी के उस कालखंड में भी हमारे उस समय के नेताओं में वो सामर्थ्य था, तो आज तो देश स्वतंत्र है, निराशा किस बात की..? और इसलिए मित्रों, देश को इस निराशा के माहौल से ऊपर उठना बहुत आवश्यक है। और ऐसा नहीं है कि सब कुछ डूब चुका है, आज भी बहुत कुछ अच्छा होने की संभावना है..!

ज हमारी शिक्षा व्यवस्था की अगर हम चर्चा करें, तो ऐसे हालात क्यों हुए..? जो लोग हमारे देश के एज्यूकेशन के इतिहास को जानते हैं उनको पता होगा, हजारों वर्ष से हमारी कैसी महान परंपराएं थी..! मैं तो रिसर्च स्कॉलर्स से प्रार्थना करता हूँ कि हमारी गुरूकुल की शिक्षा परंपरा और आज की अमेरीका की मॉडर्न एज्यूकेशन सिस्टम, दोनों को आधुनिक तराजू पर तोल कर देखा जाए तो हमें ध्यान में आएगा कि जिस प्रकार से अमेरिकन एज्यूकेशन सिस्टम में व्यक्ति के भीतर की ताकत को उजागर करने के लिए एक प्रॉपर एन्वायरमेंट प्रोवाइड किया जाता है, उसकी रूचि, प्रकृति, प्रवृति के अनुसार उसको विकसित होने का माहौल दिया जाता है। उसको फ़ीड नहीं किया जाता है, उसको लर्निंग के लिए रास्ते दिखाए जाते हैं। अगर हम हमारी गुरूकुल पंरपरा को देखें, तो उसमें क्या था..? एक ही ऋषि की चर्चा हो, एक ही ऋषि के आश्रम की चर्चा हो, लेकिन उसी के वहाँ राजकुमार भी पढ़ता है, योद्घा भी पढ़ता है, राज व्यवस्था को संभालने वाले मंत्री लोग भी पढ़ रहे हैं, कर्मकाण्ड करने वाले पंडित भी पढ़ रहे हैं, वेद के ज्ञानी होना चाहते हैं वो भी पढ़ रहे हैं... क्या कारण होगा? एक ही छोटा सा आश्रम, एक ही ऋषि और वहाँ सब विधाओं को इस प्रकार से सामर्थ्यवान बनने के लिए अवसर मिलता होगा..! उसी एक जगह से राजकुमार, राजकुमार के लिए जो चाहिए वो शिक्षा-दीक्षा लेकर के निकलता था। योद्घा, योद्घा के लिए जरूरी शिक्षा-दीक्षा लेकर के निकलता था। टीचर, टीचर के लिए, क्राफ्ट मैन, क्राफ्ट मैन के लिए, पंडित, पंडित के लिए जरूरी शिक्षा-दीक्षा लेकर के निकलता था... क्या कारण था..? और आज उस पुरानी परंपराओं को देखें तो हम सोच सकते हैं कि हमारे पास कितना कुछ था, जो हमने गंवा दिया..! मित्रों, हमारा सपना होना चाहिए गुरूकुल से विश्वकुल तक की यात्रा का..! हम वो लोग हैं जिन्होंने उपनिषद से उपग्रह तक की यात्राएं की हैं, गुरूकुल से विश्वकुल तक के सपने संजोएं हैं..! लेकिन फिर भी आज विश्व जब 21वीं सदी किसकी का सवाल पूछता है तब हम सवालिया निशान के नीचे झुक कर के खड़े हो जाते हैं। ऐसी स्थिति कब तक..? मित्रों, जो यूनिवर्सिटी के इतिहास को जानते हैं उनको मालूम होगा। हमारे यहाँ यूनिवर्सिटीज़ में कॉन्वोकेशन की जो परंपरा होती है, सबसे पहले कॉन्वोकेशन का उल्लेख तैत्रेयी उपनिषद में मिलता है। दुनिया में मानव जात के इतिहास में सबसे पहला कॉन्वोकेशन तैत्रेयी उपनिषद में लिखा गया है जो कि हजारों साल पुरानी रचनाएं हैं..! मित्रों, यदि यूनिवर्सिटीज़ की अवेलेबल हिस्ट्री को देखा जाए तो कहा जाता है कि पूरी मानव संस्कृति की विकास यात्रा में यूनिवर्सिटी शिक्षा की उम्र करीब 2600 साल होगी, और आज मैं गर्व से कहता हूँ कि 2600 साल की इस शिक्षा-दीक्षा की यात्रा में 1800 साल तक एक चक्रीय शासन अगर किसी का रहा है, तो वो हिन्दुस्तान के हमारे शिक्षकों का रहा है, हमारी शिक्षा प्रणाली का रहा है। बीच के 800 साल जो हमारी गुलामी के थे, उस समय हमने सब गंवा दिया और विश्व की शिक्षा प्रणालियों ने अपना सिर ऊंचा किया।

 

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ભારતના CWG ચેમ્પિયન્સ સાથે પ્રધાનમંત્રીની વાતચીતનો મૂળપાઠ
August 10, 2026
પ્રધાનમંત્રીએ રેખાંકિત કર્યું કે રાષ્ટ્રીય રમતગમતની સફળતા માત્ર ભૌતિક ઇન્ફ્રાસ્ટ્રક્ચર પર નહીં પરંતુ વ્યાપક રમતગમત સંસ્કૃતિના નિર્માણ પર નિર્ભર કરે છે
પ્રધાનમંત્રીએ ભારપૂર્વક જણાવ્યું કે કોઈ પણ મૌખિક પ્રોત્સાહન કરતાં મેડલ શાળાઓના યુવા વિદ્યાર્થીઓને વધુ પ્રેરણા આપે છે
પ્રધાનમંત્રીએ દેશનું નામ રોશન કરવા બદલ રમતવીરોને અભિનંદન પાઠવ્યા અને તેમના ભવિષ્યના વિજયો માટે વિશ્વાસ વ્યક્ત કર્યો

 પ્રધાનમંત્રી – અહીં મને આ જ મકાનમાં લગભગ 12-13 વર્ષ થઈ ગયાં છે. જો મેં નિયમિતપણે કોઈનું સ્વાગત કર્યું હોય કે કોઈને મળ્યો હોઉં, તો તે રમતવીરો છે. છેલ્લા 10-12 વર્ષથી, આપ સૌના પુરુષાર્થને કારણે, ભારતને સતત વિજય અપાવવાના આપના પ્રયાસોને કારણે અને ઉત્તરોત્તર સફળતામાં નવી ઊંચાઈઓ પાર કરવાની પરંપરાને કારણે, જે કામ કદાચ આપણે શાળાઓમાં જઈને કહી શકતા કે રમવું જોઈએ, આ કરવું જોઈએ, તે કરવું જોઈએ, તે કામ શાળાઓમાં જઈને આપણે કરી શકતા હતા, તેના કરતાં તમારું મેડલ તેમને વધુ પ્રેરણા આપે છે.

પ્રધાનમંત્રી – શું તમે મને છેલ્લી વાર વચન આપ્યું હતું કે તમારી બંને દીકરીઓ રમતવીરો બનશે?

ખેલાડી – હા, તેઓ હજુ પણ નાની છે અને તેઓ આગામી કોમનવેલ્થ ગેમ્સમાં ત્રણ મેડલ ઘરે લાવશે.

પ્રધાનમંત્રી – ચોક્કસ.

ખેલાડી – હા.

ખેલાડી – જ્યારે હું દોડી રહ્યો હતો, જ્યારે મારી ઇવેન્ટ 29મી તારીખે હતી, ત્યારે ગુરુ પૂર્ણિમા હતી, તેથી મેં તે દિવસે મારા ગુરુને ભેટ આપી હતી.

પ્રધાનમંત્રી – ઘણી શાન વધારી તમે. એટલા આંસુ ટપકી રહ્યા હતા, મને લાગતું હતું કે આંસુના દરેક ટીપે ગોલ્ડ મેડલ ટપકી રહ્યો છે.

ખેલાડી – હું ખૂબ ખુશ હતી, હું તે દિવસે ભાવુક હતી. વધારે ખુશ હોવાથી હું રડી કારણ કે હું પેરિસ ઓલિમ્પિકમાં 1 કિલોગ્રામમાં મેડલ ચૂકી ગઈ હતી અને ખેલાડીના જીવનમાં આપણે શું શું સામનો કરીએ છીએ? તો, આ ચાર વર્ષોમાં મેં ઘણી બધી બાબતોનો સામનો કર્યો. ઇજાઓ સતત થતી રહી, કૌટુંબિક સમસ્યાઓ, અને તે બધું. તેથી, મેં આ ચાર વર્ષોનો ખૂબ જ મુશ્કેલીથી સામનો કર્યો. તેથી, જ્યારે હું પોડિયમ પર ઉભી રહી, સર અને આપણો ધ્વજ ઉપર ચઢી ગયો અને આપણું રાષ્ટ્રગીત વાગ્યું, સર, હું મારી જાતને રોકી શકી નહીં, આંસુઓ જાતે જ વહેવા લાગ્યા.

પ્રધાનમંત્રી – ખૂબ, ખૂબ જ સરસ.

પ્રધાનમંત્રી – હું તમારી આ સિદ્ધિને ફક્ત તમારી સિદ્ધિ માનતો નથી; તમારી આ જીત આવનારી પેઢીઓ માટે એક મોટી પ્રેરણા બની જાય છે.

ખેલાડી: બધા અમારાથી ડરી રહ્યા હતા કે જો ભારત સાથે મુકાબલો થઈ ગયો, તો હવે આપણે પહેલી જ લડાઈ હારી જઈશું અને આપણને મેડલ પણ નહીં મળે.

પ્રધાનમંત્રી: એટલે માનીને ચાલતા હતા

ખેલાડી – હા, સર.

પ્રધાનમંત્રી – શું થયું? શું તે રેસ્ટોરન્ટ સ્ટાફ સાથે ઝઘડો કરી રહી હતી?

ખેલાડી – અમારો જે ખૂબ જ સારો પરફોર્મન્સ હતો, એ લાસ્ટ ડે હતો અને અમે બધા જીતીને ગયા હતા. આખા ઇન્ડિયાના લોકો હતા. એટલે મને થોડું ખરાબ લાગી રહ્યું હતું. તો મેં તેમને સરને સારી રીતે વાત કરીને રિક્વેસ્ટ કરી હતી. પછી તેમણે મારી વાત માની પણ લીધી અને અત્યારે ચેન્જ પણ થઈ ગયું છે, સર.

પ્રધાનમંત્રી – આ વિજયની પરિસ્થિતિમાં ખુશી, આનંદ અને પોતાના સાથીઓ સાથે રમત પૂરી થઈ ગઈ છે. તો હસી-મજાક અને મસ્તીના મૂડમાં આવા સમયે તે મેપ પર નજર જવી અને તેને રજિસ્ટર કરવું, અને તરત જ માત્ર મેડલ લેતી વખતે જ દેશ ઊભો થઈ જાય એવું નથી. અંદરથી દેશનો ભાવ હોય છે. હું સાચું કહું છું, આ તમારો વીડિયો સામાન્ય નથી, લાંબા સમય સુધી લોકોને યાદ રહેશે. હવે તો બોક્સિંગના ખેલાડીઓથી પણ દુનિયાના ખેલાડીઓ ડરવા લાગ્યા છે.

ખેલાડી: હા, સર. બધા ડરી ગયા હતા. એક પછી એક ગોલ્ડ મેડલ આવી રહ્યા હતા, અને ફાઈનલ મેડલ ખરેખર ધમાકેદાર હતો. સતત સ્પર્ધાઓમાં અમને જે સમર્થન મળી રહ્યું છે તે એક મોટી સિદ્ધિ છે. આપણા બધા યુવા ખેલાડીઓ ખેલો ઈન્ડિયા યોજના દ્વારા આવ્યા છે અને આ સમગ્ર રમતગમતમાં મોટો ફેરફાર લાવી રહ્યું છે.

પ્રધાનમંત્રી – જો તમે ખેલો ઇન્ડિયાનું ગૌરવ વધારશો, તો ફક્ત ત્યાં જઈને રિબન કાપીને પ્રતિષ્ઠા નહીં મળે. તમે એક યુવાન વિદ્યાર્થી, એક યુવાન, એક નાના ખેલાડીની જેમ રમશો. આ એક મોટું યોગદાન આપશે. કારણ કે આપણે હજુ લાંબી મજલ કાપવાની છે, આપણે ઘણા મેડલ જીતવાની જરૂર છે. કારગિલ વિજય દિવસ પર કોણ વિજેતા બન્યું?

ખેલાડી – તે દિવસ કારગિલ દિવસ હતો, અને જે દિવસે મેં પાકિસ્તાન સામે લડાઈ કરી હતી, સર, તે જ દિવસે. હું ભારતીય સેનામાંથી છું, તેથી તે દિવસે હું પહેલાથી જ પાકિસ્તાનને હરાવવા માટે મક્કમ હતો. તેથી, મેં પાકિસ્તાનને 5-0 થી હરાવ્યું, તેથી મેં આપણી ભારતીય સેનાનો મેડલ કારગિલ નાયકોને સમર્પિત કર્યો, સાહેબ.

પ્રધાનમંત્રી – તમારે આ યાદ રાખવું જોઈએ અને કારણ કે તમે પોતે સૈન્યમાંથી છો, હું ચોક્કસપણે માનું છું કે દેશના બહાદુર સૈનિકો માટે તમે જે ભાવના વ્યક્ત કરી હતી, "હું મારો મેડલ કારગિલ વિજેતાઓને સમર્પિત કરું છું," તે વિજયના ગૌરવમાં વધારો થયો, અને તમે જેને હરાવવાનો હતો તેને હરાવ્યો.

ખેલાડી: આપણે પાકિસ્તાન વિશે વાત કરી રહ્યા છીએ અને મને એક ઘટના યાદ આવે છે, સર. તે 2015ની વર્લ્ડ મિલિટરી ગેમ્સ હતી અને મારી પાકિસ્તાન સામે પહેલી લડાઈ હતી. તે વર્લ્ડ મિલિટરી ગેમ્સ હતી, તેથી મને લશ્કર તરફથી ફોન આવ્યો કે, "મારે પાકિસ્તાન સામે હારવું જોઈએ નહીં." તેથી મેં પહેલો રાઉન્ડ 4-1 થી જીત્યો. મેં બીજો રાઉન્ડ 3-2 થી જીત્યો, પરંતુ બંનેને માથા અથડાયા અને બંનેને કટ મળ્યા અને અંતે હું ફાઈટ જીતી ગયો.

પ્રધાનમંત્રી: હા.

ખેલાડી: તે પછી, બંને ટાંકા લગડાવવા માટે હોસ્પિટલમાં ગયા. પછી, 2014માં તમે પહેલી વાર પ્રધાનમંત્રી બન્યા હતા અને અમારી સાથે આવેલા આર્મી કોચનું નામ નરેન્દ્ર રાણા હતું. તેમણે લાંબા સમય સુધી વિચાર્યું અને મને પૂછ્યું, "ભાઈ, શું હું કંઈક કહી શકું?" મેં કહ્યું, "હા, ભાઈ, તેને કહ્યું તમારું નામ નરેન્દ્ર છે. તમારા કોચનું નામ નરેન્દ્ર છે અને તમારા પ્રધાનમંત્રીનું નામ નરેન્દ્ર છે. મને નરેન્દ્ર નામથી નફરત થઈ ગઈ છે."

પ્રધાનમંત્રી: તમે ફક્ત મેડલની સંખ્યા વધારી નથી, તમે એક પેઢી તૈયાર કરી છે.

ખેલાડી – મારું હૃદય જોરથી ધક ધક થઈ રહ્યું છે, સર.

પ્રધાનમંત્રી – ચિંતા કરશો નહીં.

ખેલાડી – પણ…

પ્રધાનમંત્રી – જો તમે ઇચ્છો તો, તમને બોલવા બદલ પણ મેડલ મળી શકે છે.

ખેલાડી – મારા ફ્રેન્ડ સર્કલમાં કોઈએ મને કહ્યું કે હું તેમને તેમના ભલા માટે કંઈક કરવાનું કહેતી હતી. તેઓ ઘણીવાર મને પૂછતા, "શું તું મોદીને મળવા જઈ રહી છે?"

પ્રધાનમંત્રી – હા.

ખેલાડી – હરિયાણવીમાં કહેતા હતા સર કે, “શું તું મોદીજી સાથે મળેલી છે કે તેઓ તારી વાત માને છે?” તો આજે હું આપને મળી છું સર. હવે હું તેમને કહી શકીશ કે હા, હું મોદીજીને મળી છું.

ખેલાડી - મેં કોમનવેલ્થ ગેમ્સમાં સિલ્વર મેડલ જીત્યો અને પછી મેં સરને શ્રેય આપ્યો. મેડલ જીતવાનું મારું સ્વપ્ન હતું, પરંતુ મારી પાસે તાલીમ કેન્દ્ર નહોતું. SAIમાં આવ્યા પછી, મેં ઘણી તાલીમ લીધી અને મેડલ જીતી શક્યો. તેથી જ મેં ખુશીથી સરને શ્રેય આપ્યો કારણ કે મેં ઘણો સુધારો કર્યો.

પ્રધાનમંત્રી - તે મારા માટે ખૂબ જ સન્માનની વાત છે. તમે સખત મહેનત કરી અને મને યાદ રાખ્યો. હું તમારો ખૂબ આભારી છું, મિત્ર.

પ્રધાનમંત્રી - તમે વારાણસીમાં રમતગમતનો અભ્યાસ કરી રહ્યા હતા, ખરું ને?

ખેલાડી – જી, સર.

પ્રધાનમંત્રી – સ્ટેડિયમ કેવું બન્યું છે?

ખેલાડી – સર, તે સારી રીતે બનેલું છે. હું ત્યાં 10-12 દિવસ તાલીમ લેવા ગઈ હતી. કારણ કે હું મંદિરમાં ગઈ હતી તો ત્યાં ટ્રેનિંગ લઈને આવી હતી. અને હું ત્યાં સ્થાયી થવા માંગુ છું કારણ કે મને કાશી વિશ્વનાથ ખૂબ ગમે છે, સર.

પ્રધાનમંત્રી – તમે ભોપાલમાં તાલીમ લઈ રહ્યા હતા, ખરું ને?

ખેલાડી – હા, સર.

પ્રધાનમંત્રી – તો, તમે ઉજ્જૈન ગયા હતા કે નહીં?

ખેલાડી – હા, સર, હું ઉજ્જૈન પણ ગઈ હતી.

પ્રધાનમંત્રી – સારું, મહાકાલ પણ ગયા હતા.

ખેલાડી – હા, સર.

પ્રધાનમંત્રી – એક વખત કાશી વિશ્વનાથ પાસે પણ જઈ આવ્યા.

ખેલાડી – હા, સર.

પ્રધાનમંત્રી – હમણાં શ્રાવણ મહિનો છે.

ખેલાડી – હું ઘરે ગયા પછી ત્યાં ફરી જઈશ, સર.

પ્રધાનમંત્રી – બરોબર છે.

ખેલાડી – સાહેબ, SAI એ પણ મને ખૂબ ટેકો આપ્યો છે. આ કારણે જ હું આટલી આગળ પહોંચી શકી છું, સર. હું પણ ખેલો ઇન્ડિયા યોજનાનો ભાગ હતી. મેં 2018માં પહેલા ખેલો ઇન્ડિયામાં સિલ્વર મેડલ જીત્યો હતો. મેં તમને ત્યાં ઉદઘાટન સમારોહમાં જોયા હતા અને મને ત્યાં મેડલ મળ્યો હતો. તો, મને પણ આ યોજના મળી અને હું આટલી આગળ પહોંચી ગઈ છું, સર.

પ્રધાનમંત્રી – રમતગમત વ્યવસ્થા એક વાત છે, પરંતુ દેશમાં રમતગમતની સંસ્કૃતિનું નિર્માણ થાય ત્યારે જ દેશ મેડલ જીતે છે. મિત્રો, તમે ખૂબ જ સારું કામ કર્યું છે. તમે દેશને ગૌરવ અપાવ્યું છે. હું તમને અભિનંદન આપું છું અને તમે વિશ્વાસ રાખો કે તમે ભવિષ્યમાં વિજયી થશો, અને આપણે અહીં ફરી મળીશું. ખૂબ ખૂબ આભાર. શુભકામનાઓ.

પ્રધાનમંત્રી – આ સતત ત્રીજી વખત છે જ્યારે તમે દેશ માટે મેડલ જીત્યો છે.

ખેલાડી – આભાર, સર.

પ્રધાનમંત્રી – ખૂબ ખૂબ આશીર્વાદ,બેટા.

ખેલાડી: અને ખૂબ ખૂબ આભાર! હું સરના હાથથી લાડુ ખાઈ રહી છું. ગઈકાલે મારો જન્મદિવસ હતો, તો આજે સરના હાથે...

પ્રધાનમંત્રી: ખૂબ ખૂબ અભિનંદન, વાહ.

પ્રધાનમંત્રી: સ્માઈલ કરો, યાર

પ્રધાનમંત્રી: જે ખેલશે, તે ખીલશે