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Q. This is a question on trade, which, as you know, is often cited as one of the principal engines of economic growth. India, since you became Prime Minister, has decided not to go ahead and ratify the so-called Trade Facilitation Agreement. Also, India is, for the moment, outside both – APEC and TPP negotiations. So could you speak about your view of trade? And whether the domestic politics of India will allow you to pursue a liberal trade agenda?

A. जहां तक Trade facilitation का सवाल है, हम 101% agreed हैं। उसमें कोई दुविधा का विषय नहीं है, कयोंकि हम भी यह चाहते हैं। आज global economy का युग है। अगर global economy का युग है तो हमें हमारे infrastructure, हमारी facilities global standard की बनानी पड़ेगी। इसलिए हम भी मानते हैं कि विश्‍व के साथ हमको काम करना है। मेरे लिए Politics is not an issue at all. मैं लोकरंजक राजनीति वाला इंसान नहीं हूं। और नही लोकरंजक अर्थनीति वाला इंसान हूं। लेकिन मेरे देश में गरीब लोग हैं। गरीबों को भूखा रखकर हम नहीं चल सकते। और इसलिए food security और Trade facilitation - दोनों चीजें एक साथ चलनी चाहिए। ये मेरे देश का आग्रह है। ये पहले कर लो तो देखा जाएगा तो गरीबों के साथ अन्‍याय होगा। दुनिया को कोई तकलीफ नहीं है कि हम food security के लिए positive stand ले लें।

Q. This question deals with electricity. As I understand it, several hundred million Indians do not have adequate access to electricity. And the question a lot of people are asking is, how can these people come to enjoy a middle class life, and in the process, not set in motion economics that have a clearly negative impact on climate change given the amount of carbon that would be emitted?

A. यह बात सही है कि हमारे लिए आज बिजली जीवन में एक बड़ा महत्‍पूर्ण हिस्‍सा बन चुकी है। बिजली Luxury नहीं है। ये जीवन की Requirement बन गई है। और हम 24x7 बिजली पहुंचाने के लिए संकल्‍पबद्ध हैं। मेरी सरकार ने अपने Manifesto में कहा है, अपने Agenda में कहा है कि next 5 years में हिंदुस्‍तान के हर गांव में 24x7 power supply करेंगे। यह संभव है। हमने जिस प्रकार से energy sector में काम किया है, उसमें भी clean energy पर बल दे रहे हैं। हम solar के लिए Roof top policy लेकर के आ रहे हैं। और इसलिए हिंदुस्‍तान में अब बिजली का संकट रहेगा, ऐसी संभावनाएं बहुत कम हैं।

जहां तक Climate Change का सवाल है, शायद आप लोगों को जान के आश्‍चर्य होगा, मैंने पहले भी कहा, मैं गुजरात में जब था – Al Gore ने एक किताब लिखी है Inconvenient truth - मैंने एक किताब लिखी है, Convenient Action और वह मैंने Environment पर लिखी है। और जो किया जा सकता है, यानी political will से Environment friendly काम कैसे किया जा सकता है, वो मैंने उसमें सिद्ध करके दिखाया है। इसलिए Development and climate दुश्‍मन हैं, जो सोचा जा रहा है, गलत है। हम दोनों को Carefully Streamline करके आगे बढ़ा सकते हैं।

Q. Sir, India is, by many counts, the second largest Muslim country in the world in terms of population. Only Indonesia is larger. And as you know from your time here, America is seized by the challenge posed by the group ISIS. One of the questions that has been raised is whether you’re worried that the unrest sweeping large parts of the Arab and Muslim world might spread to India. And to the extent that you are, what are your plans to reduce your country’s susceptibility to radicalization and even violence?

A. जहां तक भारत का सवाल है, भारत में किसी भी संप्रदाय के व्‍यक्ति क्‍यों न हो, लेकिन एक मूल philosophy से वह drive करता है और भारत के philosophy के प्रतीक हैं भगवान बुद्ध, महात्‍मा गांधी। जहां अहिंसा, यह हमारे लोगों के स्‍वभाव में है। आपने देखा होगा, इतनी Terrorist Activity हमारे देश में चली। Terrorism के कारण हम परेशान हैं। लेकिन सारे Terrorist Activity हमारे यहां exported है। किसी ने हमारे यहां export किया है। Home grown नहीं है इसलिए हिंदुस्‍तान का जो मुसलमान है, उसके विषय में, मुझसे कभी एक बार CNN ने पूछा था, कि अल कायदा का ये जो चल रहा है, तो आपको क्‍या होगा, तो मैंने कहा था कि हिंदुस्‍तान का मुसलमान अलकायदा को फेल कर देगा।

Q. We hope so. Let me turn to foreign policy for a minute. For much of the Cold War, India’s articulated foreign policy was one of Non Alignment. And there was always the rhetoric of the five principles of co-existence. But as you know, and as everybody knows, the world is no longer aligned with the end of the Cold War. So what is India’s compass? What is India’s intellectual approach to this post-Cold War world when it comes to its foreign policy?

A. देखिए, हम 18th और 19th century की तरफ जाएं तो वह युग पूरा संघर्ष का युग था। हर शासक जो भी उसका दायरा होगा, वह अपने विस्‍तार के लिए लड़ाई लड़ता था। पूरे दो शताब्‍दी का इतिहास संघर्ष का इतिहास है, लड़ने का इतिहास है। बाद में आया इतिहास, समय जो आया, वह गुट का इतिहास आया। एक गुट ये, तो दूसरा गुट ये। ये आया। अब वक्‍त बड़ी तेजी से बदला है। 21वीं सदी गुट से चलने वाली नहीं है। और एक प्रकार से Irrelevant हुआ यह गुट। आज हर देश Inter dependent है। विश्‍व के सब देश को सब देशों की जरूरत हो, ऐसे युग में हम प्रवेश कर चके हैं। और इसलिए गुट या समूहों के द्वारा नहीं, सह-अस्तित्‍व के विश्‍वास को लेकर आगे बढ़ना पड़ेगा। इसलिए एक नई philosophy, हम चाहे या न चाहें, already, practically जगह ले चुकी है। सभी देश मान लीजिए जो लोग G-20 में होंगे, वही G-4 में भी होंगे। जो G-7 में होंगे वही G-9 में होंगे। यानी आप देख सकते हैं कि कोई ऐसा समूह नहीं बन पा रहा है। हर कोई हर जगह पे भी जगह बना रहा है तो जगत पूरा बदल चुका है। हम ये पुराने समूहों की कल्‍पना लेकर के चलते थे, उसमें से बाहर निकल जाएं और हम Inter-dependent world है, उसको accept करें। ये जगत तेजी से जुड़ा रह है। Technology ने जोड़ा है, हमारी अपनी आवश्‍यकताओं से जुड़ रहे है, और हमारी युवा पीढ़ी ने एक नए बदलाव को स्वीकार कर लिया है, इसलिए पुराने सारे parameters अब काम नहीं आएंगे।

Q. After this meeting here in New York, you are heading for Washington. You’ll meet with the President tonight, you’ve got meetings tomorrow. I expect one word you’re going to hear again and again and again is the word “partnership”. To describe the US-Indian relationship. So my question for you is whether you are comfortable with that word and to the extent you are or are not, what is your definition of the word “partnership” when it comes to India and the United States?

A. पहली बात यह है कि हर चीज में comfort नहीं होने की जरूरत होती भी है। अब पति-पत्‍नी में भी 100% comfort नहीं होता है। लेकिन उसके बावजूद भी एक लंबे समय तक Binding रहता है। कुछ चीजे हैं, जो भारत और अमेरिका को जोड़ती हैं। और वो है:

सबसे बड़ी चीज लोकतंत्र। Openness, सोसाइटी में जो openness है, वह दोनों के संस्‍कारों में है। तीसरी बात, आप देखिए अमेरिका - सारी दुनिया अमेरिका में आके बसी है, यह अमेरिका के character का हिस्‍सा है कि सबको assimilate करती है। और Indian, दूसरी दुनिया में बसा हुआ है। तो सारी दुनिया को assimilate करने की ताकत Indian में है। ये दोनों ऐसे character हैं, जो एक-दूसरे को जोड़ते हैं। और तीसरी बात है, आर्थिक। आर्थिक बात वो लेन देन का विषय रहता है। व्‍यापारिक संबंध रहते हैं कभी आपके फायदे में, कभी हमारे फायदे में। वह give & take formula के आधार पर चलते हैं। लेकिन दोनों देशों के लोकतंत्र के प्रति श्रद्धा दोनों देशों को जोड़कर रखती है।

Q. You’ve described what features India and US have in common. But another word you’re going to hear a lot tomorrow is “strategic partnership”. Do you have a vision for that partnership and how the US and India can work together on global and regional issues?

A. देखिए, अभी भारत और अमेरिका ने मिलकर के - शांति की दिशा में प्रयास करना, एक विषय है, लेकिन आर्थिक विकास को लेकर के - अभी हम मिलने वाले हैं तो उस विषय को भी जोड़ने वाले हैं। यहां पर जो रिसर्च होता है, उस रिसर्च का उपयोग, हो सकता है कि अन्‍य देशों के साथ मिलकर विशेषकर भारत के साथ मिलकर के, जहां पर उस रिसर्च के धरती पर उतरने में utility ज्‍यादा है, तो हम उन क्षेत्रों में भी काम कर सकते हैं। दुनिया की तरफ देखने का हमारा दृष्टिकोण, वो सिर्फ उपयोगितावाद पर नहीं है। मैं आज भी मानता हूं, कि भारत और अमेरिका के संबंध, अमेरिका के हित के लिए अमेरिका के संबंध और भारत के हित के लिए भारत के संबंध, उसके बजाय, अमेरिका और भारत मिलकर के दुनिया के हित में हम क्‍या कर सकते हैं अगर ये Base line बनती है तो हम दोनों की ताकत विश्‍व को बहुत काम आ सकती है। और मैं जब Mr. Kerry मुझसे मिले थे, तो मैंने इस विषय को बड़े विस्‍तार से उनके सामने मैंने प्रस्‍तुत किया था।

Q. Is Afghanistan one of the areas where you think we can work together in a productive way?

A. अफगानिस्‍तान, ये तो बड़ा example है। अफगानिस्‍तान, actually एक example है। भारत के बहुत लोग अफगानिस्‍तान में रहते हैं। और एक प्रकार से अमेरिका और India के Partnership ने अफगानिस्‍तान में बहुत बड़ा Role play किया है। हम भी चाहते हैं कि अफगानिस्‍तान स्थिर, लोकतांत्रिक तरीके से विकास की यात्रा को आगे बढाए। ये हम भी चाहते हैं। अमेरिका ने वहां जो security measures में मदद की, उसके कारण वहां एक stability मिली। आज भी हमारी कोशिश ये है। और जो अभी चुनाव होने के बाद नई सरकार वहां प्रस्‍थापित हुई है, उस सरकार में भी तालमेल करने में भारत और अमेरिका ने, दोनों ने मिलकर के बहुत ही सद्भावना अपनी प्रकट करते रहे हैं। और एक अच्‍छे नतीजे की तरफ अफगानिस्‍तान गया है। लेकिन हमने अमेरिका से यही Request की है कि आप जो, withdrawal वाला, defence के withdrawal का विषय है - इराक जैसी गलती नहीं करनी चाहिए। क्‍योंकि इसके बाद इतना तेजी से withdraw करने के बाद इराक का जो हाल हुआ, अफगानिस्‍तान में withdrawal की process बहुत slow होनी चाहिए। अफगानिस्‍तान को अपने बल पर खड़े होने देना चाहिए। तभी जाकर के तालिबान को उभरने से वह रोक पाएगा। और इसलिए अमेरिका और भारत दोनों ने मिलकर के अफगानिस्‍तान में पूरी तरह कंधे से कंधा मिलाकर के काम किया है।

Q. Mr Prime Minister, you set an admirable example for the world in June when you accepted the arbitration decision of a Law of the Sea Tribunal, even though it awarded most of the Bay of Bengal that was under dispute to Bangladesh. Would you be willing to submit your land border problems with China to arbitration or adjudication? The Chinese government has thus far rejected the use of arbitration or adjudication. The Philippines is now putting China to the test. Would India be willing to do something similar?

A. चीन और भारत दोनों सक्षम हैं, बातचीत के द्वारा अपनी समस्‍या का समाधान करने के लिए। चीन और भारत Direct बातचीत कर रहे हैं। इसलिए कोई अलग arbitration की आवश्‍यकता नहीं रहती है। अभी भी, चीन के साथ मेरे व्‍यक्तिगत संबंध भी अच्‍छे रहे हैं। चीन के राष्‍ट्रपति अभी-अभी आए थे। और Border dispute को हम मानते हैं, Border dispute है और कई बातों में हमने चर्चा की है। उस चर्चा को हम और आगे बढ़ाएंगे। लेकिन हम दोनों इस बात से सहमत हैं, कि हम मिलकर के बहुत ही जल्‍द इन समाधानों को करेंगे। इसलिए हमें arbitration की जरूरत नहीं पड़ेगी।

Q. You’ve often said that there is no compromise on the dignity of women. So given the enormous potential of Indian women, and the challenges they face everyday, what is your vision for a Made in India approach for ending gender-based violence and inequality? Is your government exploring the establishment of a Prime Ministerial task force or any other concrete milestones to be a global leader on this issue that is so fundamental to the lives of so many?

A. मैं आपका बहुत आभारी हूं कि आपने, जो मैंने initiative लिए, उसके विषय में अच्‍छे शब्‍द सुनाए। दुनिया के कई भाग ऐसे है, जहां देश का प्रमुख महिला नहीं बन पाती है। Prime Minister या President किसी महिला को बनना है, आज भी कई देशों में दिक्‍कत है, लेकिन भारत और एशिया के देश ऐसे हैं, जहां महिलाएं प्रधानमंत्री रही हैं। और आज मेरी Foreign Minister भी महिला हैं, सुषमा स्‍वराज यहां बैठी हैं। मेरी Foreign Secretary भी महिला हैं, सुजाता सिंह। और मेरी Cabinet में 25% women हैं, Cabinet Ministers. लेकिन इस बात से बात पूरी नहीं होती है। Women empowerment के लिए सबसे पहली बात है girl child education. हम लोग dedicated हैं, girl child education के लिए। और I would like to share my experience in Gujarat. मैं जब गुजरात में मुख्‍यमंत्री था तो मेरे यहां girl child education को जब मैंने जाना, पहली बार जब मैं मुख्‍यमंत्री बना। It was Painful for me कि गुजरात जैसे राज्‍य में girl child education का ये हाल है? फिर मैंने, मेरे यहां school शुरू होती है 15th June को। जबकि हमारे यहां temperature होता है 45 डिग्री। यहां पर 24 डिग्री में भी गर्मी लगती है। हम 45 डिग्री में वहां रहते है। तो 13, 14, 15 जून, मैं खुद गांव जाता था। मेरे पूरे मंत्रिपरिषद के लोग गांव जाते थे। सारे मेरे MLA, MP जाते थे। मैं घर-घर जाकर भिक्षा मांगता था और लोगों को मैं कहता था कि भिक्षा में आप मुझे वचन दीजिए कि आप अपनी बेटी को पढ़ाओगे। मैं खुद बच्चियों को स्‍कूल लेकर जाता था। और मैं 100% enrolment में सफल हुआ। When I was a Chief Minister, 100% मैं सफल हुआ। वहां पर मैं अटका नहीं।

मैं कहीं पर भी जाता था, Public function में, तो मुझे gift कुछ न कुछ देते रहते हैं लोग, वह gift देते थे। उस gift को मैं auction करता था। जब मैं मुख्य मंत्री पद से गुजरात से वापिस निकला, तो उस auction में मुझे 78 करोड़ रुपये Total मिले। 78 करोड़ रुपये मैंने girl child education के लिए दान दे दिया सरकार को। ये commitment है हम लोगों का। तो girl child education और मेरी सरकार का Agenda है ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ और उस दिशा में हम काम कर रहे हैं। दुनिया के कई देश हैं, जहां महिलाओं को Voting right पाने के लिए सालों तक संघर्ष करने पड़े। आंदोलन चलाने पड़े। Develop countries में भी women को voting right के लिए लड़ाई लड़नी पड़ी। भारत में women को election में भी 30% Reservation है। कोई भी Body होगी, 30% महिलाएं compulsory है। इतना हम forward looking देश हैं।

Q. You mentioned about the Jammu and Kashmir floods. I was originally born in Srinagar. Our families have obviously been tremendously affected. So my question, or rather request, is that Government of India should allow international organization to come in. Currently, there is a tremendous amount of bureaucracy in allowing international organization to come in.

A. पहली बात है कि दुनिया के कई देशों ने अपने आप कश्‍मीर को मदद पहुंचाई है। जब गुजरात में भूकंप हुआ था, गुजरात में भी अंतर्राष्‍ट्रीय community ने काफी मदद पहुंचाई थी। और ये तो बात सही है कि दुनिया भर में एक अच्‍छी चीज बनी है कि कहीं पर भी Natural Calamity होती तो सभी देश मदद करते ही हैं। जब पाकिस्‍तान में भूकंप हुआ था, तो मैं सबसे पहले, क्‍योंकि गुजरात उसके पड़ोस में ही है, तो हमने सबसे ज्‍यादा पाकिस्‍तान में मदद पहुंचाई थी। तो यह मानवता का काम है। सब लोग मानवता का काम करते रहते हैं।

Q. You’ve now been in office for 4 months. Is there any leader – whether in India or another country – about whom you say, “That’s someone who set a model that I would like to follow in my position as Prime Minister”?

A. मैं मानता हूं, ऐसा मैं कहूंगा तो कइयों के साथ अन्‍याय होगा, क्‍योंकि इतने सारे लोग हैं, हरेक से मुझे कुछ सीखना है। अगर मैं एक का नाम लूंगा तो 50 लोग नाराज हो जाएंगे। इसलिए मुझे दुनिया में जो भी अनुभवी लोग हैं, सबसे कुछ न कुछ सीखना है। और सबसे सीख करके मेरे देश के लिए मुझे अच्‍छा करना है। इसलिए मैं कहता हूं, दुनिया में जो श्रेष्‍ठ है, वो मुझे मेरे देश में लाना है।

Thank You.

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Government of India to provide free vaccine to all Indian citizens above 18 years of age: PM Modi
June 07, 2021
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Government of India to provide free vaccine to all Indian citizens above 18 years of age
25 per cent vaccination that was with states will now be undertaken by Government of India: PM
Government of India will buy 75 per cent of the total production of the vaccine producers and provide to the states free of cost: PM
Pradhan Mantri Garib Kalyan Anna Yojna extended till Deepawali: PM
Till November, 80 crore people will continue to get free food grain every month: PM
Corona, Worst Calamity of last hundred years: PM
Supply of vaccine is to increase in coming days: PM
PM informs about development progress of new vaccines
Vaccines for children and Nasal Vaccine under trial: PM
Those creating apprehensions  about vaccination are playing with the lives of people: PM

मेरे प्यारे देशवासियों, नमस्कार! कोरोना की दूसरी वेव से हम भारतवासियों की लड़ाई जारी है।  दुनिया के अनेक देशों की तरह, भारत भी इस लड़ाई के दौरान बहुत बड़ी पीड़ा से गुजरा है। हममें से कई लोगों ने अपने परिजनों को, अपने परिचितों को खोया है। ऐसे सभी परिवारों के साथ मेरी पूरी संवेदनाएं हैं।

साथियों,

बीते सौ वर्षों में आई ये सबसे बड़ी महामारी है, त्रासदी है। इस तरह की महामारी आधुनिक विश्व ने न देखी थी, न अनुभव की थी। इतनी बड़ी वैश्विक महामारी से हमारा देश कई मोर्चों पर एक साथ लड़ा है। कोविड अस्पताल बनाने से लेकर ICU बेड्स की संख्या बढ़ानी हो, भारत में वेंटिलेटर बनाने से लेकर टेस्टिंग लैब्स का एक बहुत बड़ा नेटवर्क तैयार करना हो, कोविड से लड़ने के लिए बीते सवा साल में ही देश में एक नया हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया है। सेकेंड वेव के दौरान अप्रैल और मई के महीने में भारत में मेडिकल ऑक्सीजन की डिमांड अकल्पनीय रूप से बढ़ गई थी। भारत के इतिहास में कभी भी इतनी मात्रा में मेडिकल ऑक्सीजन की जरूरत कभी भी महसूस नहीं की गई। इस जरूरत को पूरा करने के लिए युद्धस्तर पर काम किया गया। सरकार के सभी तंत्र लगे। ऑक्सीजन रेल चलाई गई, एयरफोर्स के विमानों को लगाया गया, नौसेना को लगाया गया। बहुत ही कम समय में लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन के प्रॉडक्शन को 10 गुना से ज्यादा बढ़ाया गया। दुनिया के हर कोने से, जहां कही से भी, जो कुछ भी उपलब्ध हो सकता था उसको प्राप्त करने का भरसक प्रयास  किया गया, लाया गया। इसी तरह ज़रूरी दवाओं के production को कई गुना बढ़ाया गया, विदेशों में जहां भी दवाइयां उपलब्ध हों, वहां से उन्हें लाने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी गई।

साथियों,

कोरोना जैसे अदृश्य और रूप बदलने वाले दुश्मन के खिलाफ लड़ाई में सबसे प्रभावी हथियार, कोविड प्रोटोकॉल है, मास्क, दो गज की दूरी और बाकी सारी सावधानियां उसका पालन ही है। इस लड़ाई में वैक्सीन हमारे लिए सुरक्षा कवच की तरह है। आज पूरे विश्व में वैक्सीन के लिए जो मांग है, उसकी तुलना में उत्पादन करने वाले देश और वैक्सीन बनाने वाली कंपनियां बहुत कम हैं, इनी गिनी है। कल्पना करिए कि अभी हमारे पास भारत में बनी वैक्सीन नहीं होती तो आज भारत जैसे विशाल देश में क्या होता?  आप पिछले 50-60 साल का इतिहास देखेंगे तो पता चलेगा कि भारत को विदेशों से वैक्सीन प्राप्त करने में दशकों लग जाते थे। विदेशों में वैक्सीन का काम पूरा हो जाता था तब भी हमारे देश में वैक्सीनेशन का काम शुरू भी नहीं हो पाता था। पोलियो की वैक्सीन हो, Smallpox जहां गांव में हम इसको चेचक कहते हैं। चेचक की  वैक्सीन हो, हेपिटाइटिस बी की वैक्सीन हो, इनके लिए देशवासियों  ने दशकों तक इंतज़ार किया था। जब 2014 में देशवासियों ने हमें सेवा का अवसर दिया तो भारत में वैक्सीनेशन का कवरेज, 2014 में भारत में वैक्सीनेशन का कवरेज सिर्फ 60 प्रतिशत के ही आसपास था। और हमारी दृष्टि में ये बहुत चिंता की बात थी। जिस रफ्तार से भारत का टीकाकरण कार्यक्रम चल रहा था, उस रफ्तार से, देश को शत प्रतिशत टीकाकरण कवरेज का लक्ष्य हासिल करने में करीब-करीब 40 साल लग जाते। हमने इस समस्या के समाधान के लिए मिशन इंद्रधनुष को लॉन्च किया। हमने तय किया कि मिशन इंद्रधनुष के माध्यम से युद्ध स्तर पर वैक्सीनेशन किया जाएगा और देश में जिसको भी वैक्सीन की जरूरत है उसे वैक्सीन देने का प्रयास होगा। हमने मिशन मोड में काम किया, और सिर्फ 5-6 साल में ही वैक्सीनेशन कवरेज 60 प्रतिशत से बढ़कर 90 प्रतिशत से भी ज्यादा हो गई। 60 से 90,  यानि हमने वैक्सीनेशन की स्पीड भी  बढ़ाई और दायरा भी बढ़ाया।

 हमने बच्चों को कई जानलेवा बीमारियों से बचाने के लिए कई नए टीकों को भी भारत के टीकाकरण अभियान का हिस्सा बना दिया। हमने ये इसलिए किया, क्योंकि हमें हमारे देश के बच्चों की चिंता थी, गरीब की चिंता थी, गरीब के उन बच्चों की चिंता थी जिन्हें कभी टीका लग ही नहीं पाता था। हम शत प्रतिशत टीकाकरण कवरेज की तरफ बढ़ रहे थे कि कोरोना वायरस ने हमें घेर लिया। देश ही नहीं, दुनिया के सामने फिर पुरानी आशंकाएं घिरने लगीं कि अब भारत कैसे इतनी बड़ी आबादी को बचा पाएगा? लेकिन साथियों,जब नीयत साफ होती है, नीति स्पष्ट होती है, निरंतर परिश्रम होता है, तो नतीजे भी मिलते हैं। हर आशंका को दरकिनार करके भारत ने एक साल के भीतर ही एक नहीं बल्कि दो 'मेड इन इंडिया' वैक्सीन्स लॉन्च कर दीं। हमारे देश ने, देश के वैज्ञानिकों ने ये दिखा दिया कि भारत बड़े बड़े देशों से पीछे नहीं है। आज जब मैं आपसे बात कर रहा हूं तो देश में 23 करोड़ से ज्यादा वैक्सीन की डोज़ दी जा चुकी हैं।

साथियों,

हमारे यहाँ कहा जाता है- विश्वासेन सिद्धि: अर्थात, हमारे प्रयासों में हमें सफलता तब मिलती है, जब हमें स्वयं पर विश्वास होता है। हमें पूरा विश्वास था कि हमारे वैज्ञानिक बहुत ही कम समय में वैक्सीन बनाने में सफलता हासिल कर लेंगे। इसी विश्वास के चलते जब हमारे वैज्ञानिक अपना रिसर्च वर्क कर ही रहे थे तभी हमने लॉजिस्टिक्स और दूसरी तैयारियां शुरू कर दीं थीं। आप सब भली-भांति जानते हैं कि पिछले साल यानि एक साल पहले, पिछले साल अप्रैल में, जब कोरोना के कुछ ही हजार केस थे, उसी समय वैक्सीन टास्क फोर्स का गठन कर दिया गया था। भारत में, भारत के लिए वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को सरकार ने हर तरह से सपोर्ट किया। वैक्सीन निर्माताओं को क्लिनिकल ट्रायल में मदद की गई, रिसर्च और डवलपमेंट के लिए ज़रूरी फंड दिया गया, हर स्तर पर सरकार उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चली। 

आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत मिशन कोविड सुरक्षा के माध्यम से भी उन्हें हज़ारों करोड़ रुपए उपलब्ध कराए गये। पिछले काफी समय से देश लगातार जो प्रयास और परिश्रम कर रहा है, उससे आने वाले दिनों में वैक्सीन की सप्लाई और भी ज्यादा बढ़ने वाली है। आज देश में 7 कंपनियाँ, विभिन्न प्रकार की वैक्सीन का प्रॉडक्शन कर रही हैं। तीन और वैक्सीन का ट्रायल भी एडवांस स्टेज पर चल रहा है। वैक्सीन की उपलब्धता बढ़ाने के लिए दूसरे देशों की कंपनियों से भी वैक्सीन खरीदने की प्रक्रिया को तेज किया गया है। इधर हाल के दिनों में, कुछ एक्सपर्ट्स द्वारा हमारे बच्चों को लेकर भी चिंता जताई गई है। इस दिशा में भी 2 वैक्सीन्स का ट्रायल तेजी से चल रहा है। इसके अलावा अभी देश में एक 'नेज़ल' वैक्सीन पर भी रिसर्च जारी है। इसे सिरिन्ज से न देकर नाक में स्प्रे किया जाएगा। देश को अगर निकट भविष्य में इस वैक्सीन पर सफलता मिलती है तो इससे भारत के वैक्सीन अभियान में और ज्यादा तेजी आएगी।

साथियों,

इतने कम समय में वैक्सीन बनाना, अपने आप में पूरी मानवता के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इसकी अपनी सीमाएं भी हैं। वैक्सीन बनने के बाद भी दुनिया के बहुत कम देशों में वैक्सीनेशन प्रारंभ हुआ, और ज्यादातर समृद्ध देशों में ही शुरू हुआ। WHO ने वैक्सीनेशन को लेकर गाइडलाइंस दीं। वैज्ञानिकों ने वैक्सीनेशन की रूप रेखा रखी। और भारत ने भी जो अन्य देशों की best practices थी , विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक  थे, उसी आधार पर चरणबद्ध तरीके से वैक्सीनेशन करना तय किया। केंद्र सरकार ने मुख्यमंत्रियों के साथ हुई अनेकों बैठकों से जो सुझाव मिले, संसद के विभिन्न दलों के साथियों द्वारा जो सुझाव मिले, उसका भी पूरा ध्यान रखा। इसके बाद ही ये तय हुआ कि जिन्हें कोरोना से ज्यादा खतरा है, उन्हें प्राथमिकता दी जाएगी। इसलिए ही, हेल्थ वर्कर्स, फ्रंटलाइन वर्कर्स, 60 वर्ष की आयु से ज्यादा के नागरिक, बीमारियों से ग्रसित 45 वर्ष से ज्यादा आयु के नागरिक, इन सभी को वैक्सीन पहले लगनी शुरू हुई। आप कल्पना कर सकते हैं कि अगर कोरोना की दूसरी वेव से पहले हमारे फ्रंटलाइन वर्कर्स को वैक्सीन नहीं लगी होती तो क्या होता? सोचिए, हमारे डॉक्टर्स, नर्सिंग स्टाफ को वैक्सीन ना लगी तो क्या होता? अस्पतालों में सफाई करने वाले हमारे भाई-बहनों को, एंबुलेंस के हमारे ड्राइवर्स भाई - बहनों को वैक्सीन ना लगी होती तो क्या होता? ज्यादा से ज्यादा हेल्थ वर्कर्स का वैक्सीनेशन होने की वजह से ही वो निश्चिंत होकर दूसरों की सेवा में लग पाए, लाखों देशवासियों का जीवन बचा पाए।

लेकिन देश में कम होते कोरोना के मामलों के बीच, केंद्र सरकार के सामने अलग-अलग सुझाव भी आने लगे, भिन्न-भिन्न मांगे होने लगीं। पूछा जाने लगा, सब कुछ भारत सरकार ही क्यों तय कर रही है? राज्य सरकारों को छूट क्यों नहीं दी जा रही? राज्य सरकारों को लॉकडाउन की छूट क्यों नहीं मिल रही? One Size Does Not Fit All जैसी बातें भी कही गईं। दलील ये दी गई कि संविधान में चूंकि Health-आरोग्य, प्रमुख रूप से राज्य का विषय है, इसलिए अच्छा है कि ये सब राज्य ही करें। इसलिए इस दिशा में एक शुरूआत की गई। भारत सरकार ने एक बृहद गाइडलाइन बनाकर राज्यों को दी ताकि राज्य अपनी आवश्यकता और सुविधा के अनुसार काम कर सकें। स्थानीय स्तर पर कोरोना कर्फ्यू लगाना हो, माइक्रो कन्टेनमेंट जोन बनाना हो, इलाज से जुड़ी व्यवस्थाएं हो, भारत सरकार ने राज्यों की इन मांगों को स्वीकार किया।

साथियों,

इस साल 16 जनवरी से शुरू होकर अप्रैल महीने के अंत तक, भारत का वैक्सीनेशन कार्यक्रम मुख्यत: केंद्र सरकार की देखरेख में ही चला। सभी को मुफ्त वैक्सीन लगाने के मार्ग पर देश आगे बढ़ रहा था। देश के नागरिक भी, अनुशासन का पालन करते हुए, अपनी बारी आने पर वैक्सीन लगवा रहे थे। इस बीच, कई राज्य सरकारों ने फिर कहा कि वैक्सीन का काम डी-सेंट्रलाइज किया जाए और राज्यों पर छोड़ दिया जाए। तरह-तरह के स्वर उठे। जैसे कि वैक्सीनेशन के लिए Age Group क्यों बनाए गए? दूसरी तरफ किसी ने कहा कि उम्र की सीमा आखिर केंद्र सरकार ही क्यों तय करे? कुछ आवाजें तो ऐसी भी उठीं कि बुजुर्गों का वैक्सीनेशन पहले क्यों हो रहा है? भांति-भांति के दबाव भी बनाए गए, देश के मीडिया के एक वर्ग ने इसे कैंपेन के रूप में भी चलाया।

साथियों,

काफी चिंतन-मनन के बाद इस बात पर सहमति बनी कि राज्य सरकारें अपनी तरफ से भी प्रयास करना चाहती हैं, तो भारत सरकार क्यों ऐतराज करे? और भारत सरकार ऐतराज क्यों करे? राज्यों की इस मांग को देखते हुए, उनके आग्रह को ध्यान में रखते हुए 16 जनवरी से जो व्यवस्था चली आ रही थी, उसमें प्रयोग के तौर पर एक बदलाव किया गया। हमने सोचा कि राज्य ये मांग कर रहे हैं, उनका उत्साह है, तो चलो भई 25 प्रतिशत काम उन्ही की शोपित कर दिया जाये, उन्ही को दे दिया जाए। स्वभाविक है, एक मई से राज्यों को 25 प्रतिशत काम उनके हवाले दिया गया, उसे पूरा करने के लिए उन्होंने अपने-अपने तरीके से प्रयास भी किए। 

इतने बड़े काम में किस तरह की कठिनाइयां आती हैं, ये भी उनके ध्यान में आने लगा, उनको पता चला। पूरी दुनिया में वैक्सीनेशन की क्या स्थिति है, इसकी सच्चाई से भी राज्य परिचित हुए। और हमने देखा, एक तरफ मई में सेकेंड वेव, दूसरी तरफ वैक्सीन के लिए लोगों का बढ़ता रुझान और तीसरी तरफ राज्य सरकारों की कठिनाइयां। मई में दो सप्ताह बीतते-बीतते कुछ राज्य खुले मन से ये कहने लगे कि पहले वाली व्यवस्था ही अच्छी थी। धीरे-धीरे इसमें कई राज्य सरकारें जुड़ती चली गईं। वैक्सीन का काम राज्यों पर छोड़ा जाए, जो इसकी वकालत कर रहे थे, उनके विचार भी बदलने लगे। ये एक अच्छी बात रही कि समय रहते राज्य, पुनर्विचार की मांग के साथ फिर आगे आए। राज्यों की इस मांग पर, हमने भी सोचा कि देशवासियों को तकलीफ ना हो, सुचारू रूप से उनका वैक्सीनेशन हो, इसके लिए एक मई के पहले वाली, यानि 1 मई के पहले 16 जनवरी से अप्रैल अंत तक जो व्यवस्था थी, पहले वाली पुरानी व्यवस्था को फिर से लागू किया जाए।

 

साथियों,

आज ये निर्णय़ लिया गया है कि राज्यों के पास वैक्सीनेशन से जुड़ा जो 25 प्रतिशत काम था, उसकी जिम्मेदारी भी भारत सरकार उठाएगी। ये व्यवस्था आने वाले 2 सप्ताह में लागू की जाएगी। इन दो सप्ताह में केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर नई गाइड-लाइंस के अनुसार आवश्यक तैयारी कर लेंगी। संयोग है कि दो सप्ताह बाद, 21 जून को ही अंतरराष्ट्रीय योग दिवस भी है। 21 जून, सोमवार से देश के हर राज्य में, 18 वर्ष से ऊपर की उम्र के सभी नागरिकों के लिए, भारत सरकार राज्यों को मुफ्त वैक्सीन मुहैया कराएगी। वैक्सीन निर्माताओं से कुल वैक्सीन उत्पादन का 75 प्रतिशत हिस्सा भारत सरकार खुद ही खरीदकर राज्य सरकारों को मुफ्त देगी। यानि देश की किसी भी राज्य सरकार को वैक्सीन पर कुछ भी खर्च नहीं करना होगा। अब तक देश के करोड़ों लोगों को मुफ्त वैक्सीन मिली है।

 अब 18 वर्ष की आयु के लोग भी इसमें जुड़ जाएंगे। सभी देशवासियों के लिए भारत सरकार ही मुफ्त वैक्सीन उपलब्ध करवाएगी। गरीब हों, निम्न मध्यम वर्ग हों, मध्यम वर्ग हो या फिर उच्च वर्ग, भारत सरकार के अभियान में मुफ्त वैक्सीन ही लगाई जाएगी। हां, जो व्यक्ति मुफ्त में वैक्सीन नहीं लगवाना चाहते, प्राइवेट अस्पताल में वैक्सीन लगवाना चाहते हैं, उनका भी ध्यान रखा गया है। देश में बन रही वैक्सीन में से 25 प्रतिशत,  प्राइवेट सेक्टर के अस्पताल सीधे ले पाएं, ये व्यवस्था जारी रहेगी। प्राइवेट अस्पताल, वैक्सीन की निर्धारित कीमत के उपरांत एक डोज पर अधिकतम 150 रुपए ही सर्विस चार्ज ले सकेंगे। इसकी निगरानी करने का काम राज्य सरकारों के ही पास रहेगा।

साथियों,

हमारे शास्त्रों में कहा गया है-प्राप्य आपदं न व्यथते कदाचित्, उद्योगम् अनु इच्छति चा प्रमत्तः॥ अर्थात्, विजेता आपदा आने पर उससे परेशान होकर हार नहीं मानते, बल्कि उद्यम करते हैं, परिश्रम करते हैं, और परिस्थिति पर जीत हासिल करते हैं। कोरोना से लड़ाई में 130 करोड़ से अधिक भारतीयों ने अभी तक की यात्रा आपसी सहयोग, दिन रात मेहनत करके तय की है। आगे भी हमारा रास्ता हमारे श्रम और सहयोग से ही मजबूत होगा। हम वैक्सीन प्राप्त करने की गति भी बढ़ाएंगे और वैक्सीनेशन अभियान को भी और गति देंगे। हमें याद रखना है कि, भारत में वैक्सीनेशन की रफ्तार आज भी दुनिया में बहुत तेज है, अनेक विकसित देशों से भी तेज है। हमने जो टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म बनाया है- Cowin, उसकी भी पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। अनेक देशों ने भारत के इस प्लेटफॉर्म को इस्तेमाल करने में रुचि भी दिखाई है। हम सब देख रहे हैं कि वैक्सीन की एक एक डोज कितनी महत्वपूर्ण है, हर डोज से एक जिंदगी जुड़ी हुई है। केंद्र सरकार ने ये व्यवस्था भी बनाई है कि हर राज्य को कुछ सप्ताह पहले ही बता दिया जाएगा कि उसे कब, कितनी डोज मिलने वाली है। मानवता के इस पवित्र कार्य में वाद-विवाद और राजनीतिक छींटाकशी, ऐसी बातों को कोई भी अच्छा नहीं मानता है। वैक्सीन की उपलब्धता के अनुसार, पूरे अनुशासन के साथ वैक्सीन लगती रहे, देश के हर नागरिक तक हम पहुंच सकें, ये हर सरकार, हर जनप्रतिनिधि, हर प्रशासन की सामूहिक जिम्मेदारी है।

प्रिय देशवासियों,

टीकाकरण के अलावा आज एक और बड़े फैसले से मैं आपको अवगत कराना चाहता हूं। पिछले वर्ष जब कोरोना के कारण लॉकडाउन लगाना पड़ा था तो प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत, 8 महीने तक 80 करोड़ से अधिक देशवासियों को मुफ्त राशन की व्यवस्था हमारे देश ने की थी। इस वर्ष भी दूसरी वेव के कारण मई और जून के लिए इस योजना का विस्तार किया गया था। आज सरकार ने फैसला लिया है कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना को अब दीपावली तक आगे बढ़ाया जाएगा। महामारी के इस समय में, सरकार गरीब की हर जरूरत के साथ, उसका साथी बनकर खड़ी है। यानि नवंबर तक 80 करोड़ से अधिक देशवासियों को, हर महीने तय मात्रा में मुफ्त अनाज उपलब्ध होगा। इस प्रयास का मकसद यही है कि मेरे किसी भी गरीब भाई-बहन को, उसके परिवार को, भूखा सोना ना पड़े।

साथियों,

देश में हो रहे इन प्रयासों के बीच कई क्षेत्रों से वैक्सीन को लेकर भ्रम और अफवाहों की  चिंता बढ़ाती है। ये चिंता भी मैं आपके सामने व्यक्त करना चाहता हूं। जब से भारत में वैक्सीन पर काम शुरू हुआ, तभी से कुछ लोगों द्वारा ऐसी बातें कही गईं जिससे आम लोगों के मन में शंका पैदा हो। कोशिश ये भी हुई कि भारत के वैक्सीन निर्माताओं का हौसला पस्त पड़ जाए और उनके सामने अनेक प्रकार की बाधाएं आएं। जब भारत की वैक्सीन आई तो अनेक माध्यमों से शंका-आशंका को और बढ़ाया गया। वैक्सीन न लगवाने के लिए भांति-भांति के तर्क प्रचारित किए गए। इन्हें भी देश देख रहा है। जो लोग भी वैक्सीन को लेकर आशंका पैदा कर रहे हैं, अफवाहें फैला रहे हैं, वो भोले-भाले भाई-बहनों के जीवन के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं।

ऐसी अफवाहों से सतर्क रहने की जरूरत है। मैं भी आप सबसे, समाज के प्रबुद्ध लोगों से, युवाओं से अनुरोध करता हूँ, कि आप भी वैक्सीन को लेकर जागरूकता बढ़ाने में सहयोग करें। अभी कई जगहों पर कोरोना कर्फ्यू में ढील दी जा रही है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हमारे बीच से कोरोना चला गया है। हमें सावधान भी रहना है, और कोरोना से बचाव के नियमों का भी सख्ती से पालन करते रहना है। मुझे पूरा विश्वास है, हम सब कोरोना से इस जंग में जीतेंगे, भारत कोरोना से जीतेगा। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ, आप सभी देशवासियों का बहुत बहुत धन्यवाद!