उपस्थित सभी महानुभाव,

मैं पीयूष जी और उनकी टीम को बधाई देता हूं कि उन्हों।ने बहुत बड़े पैमाने पर आगे बढ़ने के लिए निर्णय किया है और उसी के अनुसंधान में आज ये तीन दिवसीय workshop का आरंभ हो रहा है। एक बहुत बड़ा बदलाव हम लोगों ने नोटिस किया कि नहीं मुझे मालूम नहीं - सामान्य रूप से जब हम लोग देश में जब उर्जा की चर्चा करते आएं है तो Megawatt के संदर्भ में करते आएं हैं। पहली बार भारत ने Gigawatt की चर्चा करना शुरू किया है। कोई कल्पना कर सकता है कि Megawatt से Gigawatt की तरफ ये यात्रा कितनी Ambitious है, कितनी focussed है, और परिणाम प्राप्त करने का कितना आत्मविशवास भरा हुआ है।

भारत में, जब मैं उर्जा के संदर्भ में सोचता हूँ, तब वैश्विक संदर्भों में जो चर्चाएं हो रही हैं वो अपनी जगह पर है। मेरे चिंतन के केंद्र बिंदु और कुछ है। हम सभी जानते हैं कि मानव की जो विकास यात्रा है, उस विकास यात्रा में उर्जा की अहम भूमिका रही है। पत्थर युग में भी लोग पत्थर घिस-घिस करके ऊर्जा की भूख मिटाने की कोशिश करता था। और तब से लेकर अब तक यह यात्रा निरंतर चल रही है। निरंतर नए-नए प्रयास हो रहे हैं। क्योंकि मानव ये मानता है कि उसकी विकास यात्रा में उर्जा की एक अहम भूमिका है।

भारत में आज भी लाखों परिवार ऐसे हैं, जो ऊर्जा से वंचित हैं। गरीब से गरीब परिवार को भी यह अपेक्षा है कि उसका बच्चाि पढ़े, पढ़-लिख कर आगे जाए। लेकिन जब exam का समय होता है वो रात को पढ़ नहीं पाता है, क्योंसकि घर में ऊजाला नहीं होता है, और उसकी जिंदगी वहीं रूक जाती है। क्याक यह एक सरकार का, समाज का, देश का दायित्वक नहीं है कि हमारे गरीब से गरीब व्‍यक्ति को अपने सपनों को साकार करने के लिए जिस ऊर्जा की जरूरत है वो ऊर्जा उसे प्राप्तत हो? विकास का प्रकाश उसके घर तब तक नहीं पहुंचेगा तब तक कि वो खुद रोशनी से लाभान्वित नहीं होगा। और इसलिए मेरे दिल-दिमाग के अंदर भारत का एक सामान्यम व्य क्ति बैठा हुआ है, वह गरीब व्यदक्ति बैठा हुआ है। वो अंधेरे में डुबे हुए गांव मेरे दिमाग में सवार हैं। और उसके रास्तेय मैं खोज रहा हूं ताकि हमारे पास जो भी आज सामर्थ्य है, शक्ति है उसको optimum utilize करके हम इन आवश्यहकताओं की पूर्ति कैसे करें।

सामान्यि से सामान्य व्य क्ति आज अपने आपको विश्वम के साथ जोड़कर के देखता है। कोई भी खबर सुनता है तो उसको लगता है कि हां यह मेरे पास भी होना चाहिए। उसके सपने अब बहुत ऊंचे हैं। और इसलिए उसे ज्याउदा इंतजार भी नहीं है। अपने देखते ही अपने सामने बदलाव देखना चाहता है, अपने बच्चोंइ के लिए कुछ करके जाना चाहता है और इसलिए हम one point आगे गए, टू प्वाचइंट आगे गए, फाइव प्वाेइंट आगे गए.. आंकड़े तो बहुत अच्छेव लगते हैं। लेकिन हमें quantum jump के बिना कोई चारा नहीं है। और इसलिए हम पहले जिस गति से आगे बढ़ते होंगे,इसे हम गति तेज भी करना चाहते हैं और नई ऊंचाईयों को पार करके आगे बढ़ जाए, उस सीमा की दिशा में आगे बढ़ने की सारी योजनाओं को लेकर के चल रहे हैं। उसमें ऊर्जा एक क्षेत्र है।

दूसरी तरफ ऊर्जा के लिए जो हमारे स्रोत है। कौन से स्रोत से हम ऊर्जा पैदा कर पाएंगे उसका हिसाब लगाए बिना हम लम्बार सफर तय नहीं कर सकते। क्याओ हम ऊर्जा के संबंध में आश्रित रहना चाहते हैं? हमारे पास resources कौन से है? उनresources को optimum utilizationकरने का तरीका कैसे हो? और सफलता तब मिलती है कि जब हम हमारे पास उपलब्धu जो संसाधन है, उसको ध्या?न में रखकर के हमारी योजनाओं को बनाते हैं तो वो योजनाएं हमें लम्बे अर्से तक टिकने की ताकत देते है। और इसलिए ऊर्जा के क्षेत्र में अगर हमें हिंदुस्ताnन के हर गांव गरीब तक जाना है तो हमारी योजना का केंद्र बिंदु हमारे अपने उपलब्धह resources हैं उसी को केंद्रित करने की आवश्य कता है। एक तरफ climate को लेकर के दुनिया बहुत चिंतित है। Resources खत्मत होते जा रहे हैं लोग भयभीत हैं। और दूसरी तरफ प्रकृति के साथ जीवन जीते-जीते भी अपनी आवश्‍कताओं की पूर्ति कैसे की जाए उस पर अब गंभीरता से सोचा जा रहा है।

और उसी के तहत आज Renewal energy जिसमें भारत अपना ध्याशन केंद्रित करना चाहता है और भारत अपनी आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए, हमें दुनिया में अपना झंडा ऊंचा करने के लिए मेहनत नहीं कर रहे। मैं तो मेरे गरीब के घर में दीया जलें, रोशनी आएं उसके सपने साकार होने के लिए नए रास्तेक खुल जाएं इसलिए यह सब मेहनत कर रहे हैं। और इसलिए यह कोशिश है हमारी। और वही हमारा inspiration है। गरीब की झोपड़ी हमारा inspiration है और इसलिए इस मेहनत में रंग आएगा,यह मेरा विश्वाेस है।

आज दुनिया जो climate की चर्चा कर रही है। अलग-अलग तरीके से उसको address करने के प्रयास हो गए हैं। लेकिन मैं एक बात की जब चर्चा करता हूं दुनिया अभी मेरे साथ उस विषय को चलने को तैयार नहीं है, न ही मेरी बात मानने को तैयार है। मैं हमेशा कहता हूं कि हम climate की इतनी सारी चर्चा करते हैं लेकिन हम... Carbon Emission का क्‍या होगा क्याइ नहीं होगा, हम इस पर तो बड़े लंबे-लंबे सेमिनार करते है। लेकिन ये हमारा अपना Lifestyle क्या है और उस पर चर्चा करने के लिए कोई तैयार नहीं है, क्योंूकि सभी लोगों को मालूम है कि लाइफ स्टाऔइल की चर्चा करते ही मुश्किल कहां आने वाली है। और हम और यह आदतें इतनी बदली है कि हमें भी पता नहीं है कि हम जिंदगी को कैसे जी रहे है, पता नहीं है।

आपने देखा होगा एयरपोर्ट पर एक्स लेटर पर हम चढ़ते है जब कुछ लोगों को बाते करते हुए सुनाई देता है कि मैं रेग्युहलर 15 मिनट जिम में वॉक करता हूं। और यहां एक्स लेटर पर जाता हूं। यानी पता नहीं है उसको कि लाइफ स्टा इल कैसे बदल गया हैकि वो खुद तो एक्सेलेटर पर जाता है लेकिन कहता है कि मैं 15 मिनट जिम में रेग्यु लर दौड़ता हूं। वॉक कर जाता हूँ। यानी यहां भी बिजली खराब करता हूँ, और वहां भी। मैं किसी की आलोचना नहीं कर रहा हूं क्योंहकि मैं भी एक्स लेटर पर चढ़ता हूं। कहने का तात्परर्य यह है कि हम लोग की आदत इतनी बदल गई है कि हमें पता नहीं है कि सचमुच में हम हमारी भावी पीढ़ी के भाग्यी का जो है वो हम ही खाते चले जा रहे है। और ऐसे कैसे मां-बाप हो सकते है जो बच्चोंद का खाएं। हम अपनी भावी पीढ़ियों का खा रहे है। कोई मां-बाप ऐसा नहीं होगा जो अपने बच्चों कर्जदार देखना चाहेंगा हर मां-बाप चाहते है बच्चों के लिए कुछ विरासत छोड़कर जाएं। क्याद हम हमारी भावी पीढ़ी के लिए ये बर्बाद विश्व‍ देना चाहते है, बर्बाद पृथ्वीद देना चाहते है? हम उसको खुली हवा में जीने का अधिकार भी नहीं देना चाहते? क्याा हमारी भावी पीढ़ी के अधिकारों की रक्षा करना ये हमारा दायित्वद नहीं है? और इसलिए हमने अपने जीवनशैली में भी बदलाव लाना चाहिए। और इसलिए जब climate के issueको Address करते है तो व्यलक्ति से शुरू कर करके ब्रह्मांड तक की चर्चाएं होनी चाहिए लेकिन हो रहा है ब्रह्मांड से शुरू हो रहा है लेकिन व्यकक्ति तक आने तक कोई तैयार नहींहो रहा है। सारे Discourses बदलने की आवश्यहकता है और यह बदला जा सकता है।

दूसरी बात है कि हम लोग जिस परंपरा में पले बड़े हैं हमारे यहां जो कल्पंना जगत है उस कल्पसना जगत में कहते हैं ऊर्जा में उन्होंेने सूर्य भगवान की कल्पेना की है। और सूर्य भगवान के पास सात घोड़ों का रथ होता है। Mythology वाले या कल्पमना जगत वाले इस बारे में क्याा सोचते होंगे इसका मुझे पता नहीं लेकिन सूर्य ऊर्जा का केन्द्रन तो है ही इससे तो कोई इंकार नहीं कर सकता। आज के युग में मैं देख रहा हूं वो सात घोड़े कौन से होने चाहिए। हमारा जो यह सूर्य का घोड़ा है, ऊर्जा का घोड़ा है, वो कौन से सात घोड़े उसको चलाए? अब तक हमको आदत है एक Thermal की एक घोड़ा, दूसरी है Gas की, तीसरी Hydro की, चौथी है Nuclear करके। इसके आसपास तो थोड़ा हम चल रहे हैं। लेकिन हमें तीन और घोड़े लगाने की जरूरत है – Solar,Wind and Biogas. जो हमारी पहुंच में हैं और इसलिए इन सात घोड़ों से यह हमारा ऊर्जा का रथ आगे कैसे बढ़े, उसको लेकर के हमें चलना चाहते हैं।

मैंने इस दिशा में प्रयास शुरू किया है। दुनिया में 50 से अधिक देश ऐसे हैं कि जिनके पास Solar radiation में ईश्वंर की कृपा रही है उन देशों पर, 50 के करीब देश है। हमारी कोशिश है कि इन 50 देशों का एक संगठन बनें और वे Solar Energy के क्षेत्र में साथ मिलकर के Research करे। Solar Energy को और viable कैसे बनाया जा सकता है। Technology up gradation कैसे किया जा सकता है। ये पचासों देश, जिनके पास यह सामर्थ्यT पड़ा है, वे मिलकर के अपनी ऊर्जा के सारे सवालों का जवाब खुद मिलकर के खोजने की दिशा में प्रयास करें। इस दिशा में हम कुछ काम कर रहे हैं। मुझे विश्वाकस है कि थोड़े से प्रयास में कभी न कभी हमें इसमें सफलता मिलेगी।

मुझे याद है जब मैं गुजरात में था तो शुरू में तो Solar की बात करते ही बड़ी आग-सी लग जाती थी, क्योंहकि 19 रुपया, 20 रुपया से कम कोई बात नहीं करता था। और कोई भी ऐसी हिम्मगत करेगा तो दूसरे दिन ऐसी Headlines बनती है कि बाजार में ढ़ाई रुपये में बिजली मिलती है और मोदी 20 रूपये में ले रहा है। बहुत बड़ा भ्रष्टााचार! पता नहीं क्याे-क्याम होता, लेकिन हमने हिम्मतत रखी उस समय मैंने कहा होगी बदनामी होगी, लेकिन देश को बदलना है तो बदनामी किसी को तो झेलनी पड़ेगी। और हमने झेली, झेली लेकिन वो Game changer बना। जैसे ही हमने बड़े Mass scale पर Initiative लिया तो 20 का 19, 19 का 16, 15, 13 पर कम होते होते साढ़े सात पर आ गए है। और शायद उससे भी कम हो गया होगा इस बार। यानी हम Thermal के साथ बराबरी करने की दिशा में जा रहे हैं। यह अपने आप में Game changer बन गया, लेकिन हम सोचते ही रहते तो नहीं होता। आने वाले दिनों में मैं मानता हूं कि हम Solar Energy के क्षेत्र में जो नए Research हो रहे हैं, अवश्यन हम इसको सामान्य मानव को सुविधाजनक हो, ऐसी स्थिति में हम पहुंच पाएंगे, ऐसा मेरा पूरा विश्वायस है। और हमारे देश का Youth talent यह Research करेगा। नई नई चीजें खोजेगा।

कुछ प्रयोग और भी कर सकते हैं। कुछ Hybrid system को हमने develop करना चाहिए। हम नहीं चाहते कि ज्यागदा जमीन इसमें चली जाए। लेकिन क्याe हम पहले उन location को पसंद कर सकते हैं, जहां Solar और Wind का Hybrid system हम develop करे। जहां wind velocity भी है, Solar रेडिएशन भी है, एक ही इलाके में विंड भी हो Solar भी हो, तो फिर Transmission cost एक दम से कम हो जाता है, infrastructure का खर्चा कम हो जाता है अपने आप कीमत कम होने के कारण हमें फायदा हो सकता है। यह जो मैं idea दे रहा हूं इसकी कोई consultancy fee नहीं है। क्यों न हम इस प्रकार से करें, जैसे अभी पीयूष जी बता रहे थे गुजरात में एक प्रयोग Canal के ऊपर डाला।

हमारे देश में जो तालाब है। अब नरेगा के द्वारा तालाब खोदे भी जाते हैं। क्यां तालाब के अंदर ही Solar panel लगाए जा सकते हैं? नीचे पानी है ऊपर Solar है। पानी भी बच जाएगा, जमीन का खर्चा नहीं होगा और आपका Solar project अपने आप इतने नजदीक में आप develop कर सकते हैं। हम उस प्रकार की innovative चीजें जो हमारे देश को सुसंगत है, हम सोचे, खर्चा कम आएगा और कम खर्चे से हम ज्या दा प्राप्त कर सकते हैं। हम rooftop policy पर जा रहे हैं। जो remotest से remote area हैं जहां पर बिजली पहुंचाने के लिए infrastructure का इतना खर्चा है, कोई हिम्मeत ही नहीं नहीं करता है। क्यों न हम Solar पर काम करे?

हमारे देश की talent ऐसे हैं, मुझे याद है। मैं कई वर्षों पूर्व हिमालय में एक गांव में देखने के लिए गया था उस गांव में ऊपर से पानी का झरना बड़ी ताकत से गिरता था। तो उसने, वहीं पर एक छोटा टर्बाइन अब फौज का कोई रिटायर्ड जवान था, छोटा टर्बाइन लगाकर के वो गेहूं पीसने की चक्कीो चलाता था। अब यह उसका Hydro Project था। यानी हम इस प्रकार की विकेंद्रित व्यकवस्था ओं को कैसे विकसित करें। जितनी बड़ी मात्रा में हम विकेंद्रित अवस्थाि डिसेंटलाइज सिस्टैम को develop करेंगे, वो सामान्यव व्यंक्ति को भी भी फायदा करेगा, खर्च कम होगा और loss minimize हो जाएगा। हम उस दिशा में कैसे आगे बढ़े?

हमारे देश में किसान को कैसे इसका लाभ उठाए? मैं चाहता हूं हमारे जो Engineering field के लोग हैं उस पर काम करें। Solar pump हमारे देश के किसानों को अगर Solar पम्पक से पानी निकालने के लिए व्यrवस्था मिल जाती है, तो आज हमारे किसान की Input cost कम हो जाएगी और Input cost कम हो जाएगी, तो हमारा किसान ताकतवर बनेगा। आज उसकी Input cost में पानी की सबसे बड़ी कीमत देनी पड़ती है और पानी की कीमत का मूल कारण है बिजली। और बिजली मुहैया नहीं कर पाते फिर political पार्टियां क्याी करती हैं, हर चुनाव में घोषणा करती है “बिजली मुफ्त में देंगे”। और मुफ्त में देने की घोषणा कौन करते हैं, जिनके पास बिजली नहीं है। तो बिल देंगे, तो फिर उसका बिल आएगा न। लेकिन किसानों की समस्या,ओं को हमें समझना पड़ेगा और हमारे लिए आवश्यगक है कि हम किसानों को Solar pump के द्वारा पानी निकालने की पूरी व्यएवस्थाे मिले और अपने खेत में पानी... और एक बार उसके पास Solar Pump होगा, तो वो Micro irrigation में तुरंत चला जाएगा, क्योंेकि उसको Pumping System का भी लाभ मिलेगा। और micro irrigation में जाएगा तो न सिर्फ हम ऊर्जा की बचत करेंगे, हम पानी की भी बचत करेंगे। Not only that यह माना गया है कि agriculture sector में micro irrigation के द्वारा crop ज्यायदा मिलता है, quality ज्यामदा अच्छीे मिलती है, किसान को multiple benefit की संभावना होती है। तो हम जिस ऊर्जा के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। हम समाज जीवन में कितना बड़ा बदलाव ला सकते हैं और उन बदलाव को लेकर के हम कैसे काम कर सकते हैं। इस पर हम गंभीरता से सोचेंगे।

जैसे मैंने कहा ऊर्जा बचाना यह समय की मांग है। हमें सहज स्वहभाव बनाना पड़ेगा और ऊर्जा हम जितनी बचाएंगे, हम आने वाली पीढि़यों को बचाएंगे। ऊर्जा पीढि़यों के रक्षक के रूप में काम आ सकती है। और उस बात को गंभीरता से लेकर चलना भी आवश्य क है। भारत सरकार अकेली इस दिशा में आगे बढ़ रही है ऐसा नहीं है, आपने देखा करीब-करीब सभी राज्यर यहां पर मौजूद हैं। और यह वो राज्य हैं जिन्होंोने कुछ न कुछ achieve किया है। यानी आज हिंदुस्तामन के सभी राज्योंय में awareness है, initiative है और ज्याeदा लोग राज्यों के साथ मिलकर के इसमें काम भी कर रहे हैं। मैं इसे एक शुभ संकेत मानता हूं। सभी राज्य जैसे मिलकर के आगे बढ़ते हैं तो मेगावाट का गीगावाट होने में देर नहीं लगती जी। यह ताकत वो है सब राज्यि जब मिलकर के काम कर रहे हैं, तो मेगावाट से गीगावाट का सफर अपने आप चल पड़ता है और उस सफर को पाने के लिए हम प्रयास कर रहे हैं। मैं आपको विश्वा स दिलाता हूं। यह क्षेत्र ऐसे हैं जो मेरे article of faith हैं। मेरा इसमें विश्वामस है, मेरी इसमें श्रद्धा है।

मैं मानता हूं कि मानवजाति के कल्या ण के जो रास्तेo हैं उस रास्तोंम से हटना नहीं चाहिए और मेरा यह विश्वांस है कि दुनिया को यह global warming से बचने के रास्ते दिखाने की अगर किसी के पास सहज शक्ति है, तो हिंदुस्तायन के पास है, क्योंस‍कि हम लोग जन्मनजात रूप से प्रकृति को प्रेम करना हमें सिखाया गया है। हमारे डीएनए में है, लेकिन हम ही उसको अगर भूल जाएंगे, तो दुनिया को रास्ताय कौन दिखाएगा? और फिर दुनिया Emission के हिसाब-किताब से अपने समय बर्बाद करती रहेगी। जीने का रास्ताे क्याय हो वो दिखाने की ताकत भारत के पास के है और जो हजारों साल उसने जीकर के दिखाया है। अकेले महात्मात गांधी को लें, उन्हों ने जिन बातों को जीकर दिखाया है उसी को भी अगर दुनिया समझना शुरू करे, तो मैं समझता हूं global warming से लड़ने का रास्ताद उसको मिल जाएगा, बचने का रास्ताो मिल जाएगा। हम प्रकृति को प्रेम करने वाले लोग हैं, हम ही तो लोग हैं, जो नदी का मां कहते हैं। यह हमारे स्वामभाव में है और इसलिए मानवजाति जिस संकट की ओर आगे बढ़ रही है उसको बचाने का भी मार्ग... लेकिन भारत को खुद ने भी उसको जीने का प्रयास एक बार फिर से शुरू करना पड़ेगा। हम यह कहे कि हमारे ग्रंथों में इतना महान पड़ा हुआ है, तो हमारी गाड़ी चल जाएगी। यह होना नहीं है। जो उत्त म है उसको जीने का हौसला भी चाहिए और जो जीने का हौसला होता है तो औरों को भी उस रास्तेी पर खींच कर ले जाने की ताकत रखते हैं। उस ताकत के भरोसे हम आगे बढ़ना चाहते हैं। मैं फिर एक बार इस प्रयास को बहुत शुभकामनाएं देता हूं।

मैं चाहूंगा कि अनेक विषयों पर चर्चा होने वाली है, विभिन्न expert लोगों से विचार-विमर्श होगा और इस क्षेत्र में काम करने वाले लोग भी हमें भी मिलकर के research और innovation पर बल देना होगा। सिर्फ हम Quantum jump कितना करते हैं, पहले कितना मेगावाट थी और कितना गीगावाट हो गई उससे बात बननी नहीं है। हमें technological qualitative change लाने की जरूरत है और उसके लिए research की आवश्यoकता है। हम जो कुछ भी कर रहे हैं उस पर बल देना चाहिए।

दूसरा Manufacturing. हम Make in India की बात कर रहे हैं। हम चाहते हैं कि हमारे Solar या wind हो, Equipment manufacturing पर बल यहां पर मिले। अगर हम equipment manufacturing नहीं करेंगे और हम Equipment बाहर से लाएंगे और ईश्वमर कृपा से solar का फायदा उठाएंगे और बिजली बेचते रहेंगे तो हमारे यहां job creation ज्या‍दा नहीं होगा। अगर हमें Job create करनी है तो हमें Equipment Manufacturing पर भी बल देना पड़ेगा और उसमें भी innovations समय की मांग है। आज Wind energy में कितना Innovation हो रहा है और अब तो उसमें भी Hybrid system की संभावना दिखती है। मेरी क्षेत्र में रूचि होने के कारण इस प्रकार से काम करने वालों में, हमारे एक मित्र बता रहे थे कि अब wind mill जो होगी वो हवा में से जो humidity है उसको absorb करके वो बिजली भी दे सकती है और एक Wind Mill 10,000 litre शुद्ध पीने का पानी भी दे सकती है, हवा में से लेकर के। अब गांव में एक Wind लग जाए, मैं नहीं जानता वो technology सफल हुई है या नहीं, लेकर प्रयास चल रहे थे। अगर यह सफल होता है तो गांव में एक wind mill होगी। तो छोटा गांव होगा तो पीने के पानी की समस्याह भी अपने आप solve हो जाएगी। समुद्री तट के पीने के पानी तो तुरंत solution हो सकता है। यानी संभावनाएं जितनी पड़ी हैं हम innovation की तरफ जाए और इस समस्याu के समाधान के लिए काम करें। मुझे विश्वा स है हम एक ऐसे भारत को बना सकते हैं जो भारत में कभी आने वाली पीढि़यों का चिंता का विषय न रहे।

और हम जो भी कर रहे हैं, गरीब के घर में दीया जलाने की हमारी कोशिश है। हम जो भी कर रहे हैं भावी पीढि़यों की जिंदगी बचाने के लिए कोशिश कर रहे हैं। उस कोशिश में आप हमारे साथ चल पड़े हैं। मैं आपका स्वा गत करता हूं और विश्वाोस दिलाता हूं कि हम सब मिलकर के इन सपनों को यथाशीघ्र पूर्ण करेंगे।

बहुत-बहुत शुभकामनाएं, बहुत-बहुत धन्यावाद।

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Role of newspapers is crucial in the journey to Viksit Bharat: PM Modi at inauguration of INS Towers in Mumbai
July 13, 2024
“Role of newspapers is very important in the journey to Viksit Bharat in the next 25 years”
“The citizens of a country who gain confidence in their capabilities start achieving new heights of success. The same is happening in India today”
“INS has not only been a witness to the ups and downs of India’s journey but also lived it and communicated it to the people”
“A country’s global image directly affects its economy. Indian publications should enhance their global presence”

महाराष्ट्र के गवर्नर श्रीमान रमेश बैस जी, मुख्यमंत्री श्रीमान एकनाथ शिंदे जी, उप मुख्यमंत्री भाई देवेंद्र फडणवीस जी, अजित दादा पवार जी, इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी के प्रेसिडेंट भाई राकेश शर्मा जी, सभी वरिष्‍ठ महानुभाव, देवियों और सज्जनों!

सबले पहले मैं इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी के सभी सदस्यों को बहुत-बहुत बधाई देता हूं। आज आप सभी को मुंबई में एक विशाल और आधुनिक भवन मिला है। मैं आशा करता हूँ, इस नए भवन से आपके कामकाज का जो विस्तार होगा, आपकी जो Ease of Working बढ़ेगी, उससे हमारे लोकतंत्र को भी और मजबूती मिलेगी। इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी तो आज़ादी के पहले से अस्तित्व में आने वाली संस्‍थाओं में से एक है और इसलिए आप सबने देश की यात्रा के हर उतार-चढ़ाव को भी बहुत बारीकी से देखा है, उसे जिया भी है, और जन-सामान्‍य को बताया भी है। इसलिए, एक संगठन के रूप में आपका काम जितना प्रभावी बनेगा, देश को उसका उतना ही ज्यादा लाभ मिलेगा।

साथियों,

मीडिया केवल देश के हालातों का मूकदर्शक भर नहीं होता। मीडिया के आप सभी लोग, हालातों को बदलने में, देश को दिशा देने में एक अहम रोल निभाते हैं। आज भारत एक ऐसे कालखंड में है, जब उसकी अगले 25 वर्षों की यात्रा बहुत अहम है। इन 25 वर्षों में भारत विकसित बने, इसके लिए पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका भी उतनी ही बड़ी है। ये मीडिया है, जो देश के नागरिकों को जागरूक करता है। ये मीडिया है, जो देश के नागरिकों को उनके अधिकार याद दिलाता रहता है। और यही मीडिया है, जो देश के लोगों को ये एहसास दिलाता है कि उनका सामर्थ्य क्या है। आप भी देख रहे हैं, जिस देश के नागरिकों में अपने सामर्थ्य को लेकर आत्मविश्वास आ जाता है, वो सफलता की नई ऊंचाई प्राप्त करने लगते हैं। भारत में भी आज यही हो रहा है। मैं एक छोटा सा उदाहरण देता हूं आपको। एक समय था, जब कुछ नेता खुलेआम कहते थे कि डिजिटल ट्रांजेक्शन भारत के लोगों के बस की बात नहीं है। ये लोग सोचते थे कि आधुनिक टेक्नोलॉजी वाली चीजें इस देश में नहीं चल पाएंगी। लेकिन भारत की जनता की सूझबूझ और उनका सामर्थ्य दुनिया देख रही है। आज भारत डिजिटल ट्रांजेक्शन में दुनिया में बड़े-बड़े रिकॉर्ड तोड़ रहा है। आज भारत के UPI की वजह से आधुनिक Digital Public Infrastructure की वजह से लोगों की Ease of Living बढ़ी है, लोगों के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक पैसे भेजना आसान हुआ है। आज दुनियाभर में हमारे जो देशवासी रहते हैं, खासकर के गल्‍फ के देशों में, वो सबसे ज्यादा रेमिटेंस भेज रहे हैं और उनको जो पहले खर्च होता था, उसमें से बहुत कमी आ गई है और इसके पीछे एक वजह ये डिजिटल रेवेल्यूशन भी है। दुनिया के बड़े-बड़े देश हमसे टेक्नोलॉजी और हमारे implementation model को जानना-समझने को प्रयास कर रहे हैं। ये इतनी बड़ी सफलता सिर्फ सरकार की है, ऐसा नहीं है। इस सफलता में आप सभी मीडिया के लोगों की भी सहभागिता है औऱ इसलिए ही आप सब बधाई के भी पात्र हैं।

साथियों,

मीडिया की स्वाभाविक भूमिका होती है, discourse create करना, गंभीर विषयों पर चर्चाओं को बल देना। लेकिन, मीडिया के discourse की दिशा भी कई बार सरकार की नीतियों की दिशा पर निर्भर होती है। आप जानते हैं, सरकारों में हमेशा हर कामकाज के अच्छा है, बुरा है, लेकिन वोट का गुणा-भाग, उसकी आदत लगी ही रहती है। हमने आकर के इस सोच को बदला है। आपको याद होगा, हमारे देश में दशकों पहले बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था। लेकिन, उसके बाद की सच्चाई ये थी कि 2014 तक देश में 40-50 करोड़ गरीब ऐसे थे, जिनका बैंक अकाउंट तक नहीं था। अब जब राष्ट्रीयकरण हुआ तब जो बातें कही गई और 2014 में जो देखा गया, यानी आधा देश बैंकिंग सिस्टम से बाहर था। क्या कभी हमारे देश में ये मुद्दा बना? लेकिन, हमने जनधन योजना को एक मूवमेंट के तौर पर लिया। हमने करीब 50 करोड़ लोगों को बैंकिंग सिस्टम से जोड़ा। डिजिटल इंडिया और भ्रष्टाचार विरोधी प्रयासों में यही काम हमारा सबसे बड़ा माध्यम बना है। इसी तरह, स्वच्छता अभियान, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया जैसे अभियानों को अगर हम देखेंगे! ये वोट बैंक पॉलिटिक्स में कहीं फिट नहीं होते थे। लेकिन, बदलते हुए भारत में, देश के मीडिया ने इन्हें देश के नेशनल discourse का हिस्सा बनाया। जो स्टार्ट-अप शब्द 2014 के पहले ज्यादातर लोग जानते भी नहीं थे, उन्हें मीडिया की चर्चाओं ने ही घर-घर तक पहुंचा दिया है।

साथियों,

आप मीडिया के दिग्गज हैं, बहुत अनुभवी हैं। आपके निर्णय देश के मीडिया को भी दिशा देते हैं। इसलिए आज के इस कार्यक्रम में मेरे आपसे कुछ आग्रह भी हैं।

साथियों,

किसी कार्यक्रम को अगर सरकार शुरू करती है तो ये जरूरी नहीं है कि वो सरकारी कार्यक्रम है। सरकार किसी विचार पर बल देती है तो जरूरी नहीं है कि वो सिर्फ सरकार का ही विचार है। जैसे कि देश ने अमृत महोत्सव मनाया, देश ने हर घर तिरंगा अभियान चलाया, सरकार ने इसकी शुरुआत जरूर की, लेकिन इसको पूरे देश ने अपनाया और आगे बढ़ाया। इसी तरह, आज देश पर्यावरण पर इतना ज़ोर दे रहा है। ये राजनीति से हटकर मानवता के भविष्य का विषय है। जैसे कि, अभी ‘एक पेड़ मां के नाम’, ये अभियान शुरू हुआ है। भारत के इस अभियान की दुनिया में भी चर्चा शुरू हो गई है। मैं अभी जी7 में गया था जब मैंने इस विषय को रखा तो उनके लिए बड़ी उत्सुकता थी क्योंकि हर एक को अपनी मां के प्रति लगाव रहता है कि उसको लगता है कि ये बहुत क्लिक कर जाएगा, हर कोई कह रहा था। देश के ज्यादा से ज्यादा मीडिया हाउस इससे जुड़ेंगे तो आने वाली पीढ़ियों का बहुत भला होगा। मेरा आग्रह है, ऐसे हर प्रयास को आप देश का प्रयास मानकर उसे आगे बढ़ाएं। ये सरकार का प्रयास नहीं है, ये देश का है। इस साल हम संविधान का 75वां वर्ष भी मना रहे हैं। संविधान के प्रति नागरिकों में कर्तव्य बोध बढ़े, उनमें जागरूकता बढ़े, इसमें आप सभी की बहुत बड़ी भूमिका हो सकती है।

साथियों,

एक विषय है टूरिज्म से जुड़ा हुआ भी। टूरिज्म सिर्फ सरकार की नीतियों से ही नहीं बढ़ता है। जब हम सब मिलकर देश की ब्रांडिंग और मार्केटिंग करते हैं तो, देश के सम्मान के साथ-साथ देश का टूरिज़्म भी बढ़ता है। देश में टूरिज्म बढ़ाने के लिए आप लोग अपने तरीके निकाल सकते हैं। अब जैसे मान लीजिए, महाराष्ट्र के सभी अखबार मिलकर के तय करें कि भई हम सितम्बर महीने में बंगाल के टूरिज्म को प्रमोट करेंगे अपनी तरफ से, तो जब महाराष्ट्र के लोग चारों तरफ जब बंगाल-बंगाल देखें तो उनको करें कि यार इस बार बंगाल जाने का कार्यक्रम बनाएं, तो बंगाल का टूरिज्‍म बढ़ेगा। मान लीजिए आप तीन महीने के बाद तय करें कि भई हम तमिलनाडु की सारी चीजों पर सब मिलकर के, एक ये करें के एक दूसरा करें ऐसा नहीं, तमिलनाडु फोकस करेंगे। आप देखिए एक दम से महाराष्ट्र के लोग टूरिज्‍म में जाने वाले होंगे, तो तमिलनाडु की तरफ जाएंगे। देश के टूरिज्म को बढ़ाने का एक तरीका हो और जब आप ऐसा करेंगे तो उन राज्यों में भी महाराष्ट्र के लिए ऐसे ही कैम्पेन शुरू होंगे, जिसका लाभ महाराष्‍ट्र को मिलेगा। इससे राज्यों में एक दूसरे के प्रति आकर्षण बढ़ेगा, जिज्ञासा बढ़ेगी और आखिरकार इसका फायदा जिस राज्य में आप ये इनिशिएटिव ले रहे हें और बिना कोई एक्‍स्‍ट्रा प्रयास किए बिना आराम से होने वाला काम है।

साथियों,

आप सभी से मेरा आग्रह अपनी ग्लोबल प्रेजेंस बढ़ाने को लेकर भी है। हमें सोचना होगा, दुनिया में हम नहीं है। As far as media is concerned हम 140 करोड़ लोगों के देश हैं। इतना बड़ा देश, इतना सामर्थ्य और संभावनाएं और बहुत ही कम समय में हम भारत को third largest economy होते देखने वाले हैं। अगर भारत की सफलताएं, दुनिया के कोने-कोने तक पहुंचाने का दायित्व भी आप बहुत बखूबी ही निभा सकते हैं। आप जानते हैं कि विदेशों में राष्ट्र की छवि का प्रभाव सीधे उसकी इकोनॉमी और ग्रोथ पर पड़ता है। आज आप देखिए, विदेशों में भारतीय मूल के लोगों का कद बढ़ा है, विश्वसनीयता बढ़ी है, सम्मान बढ़ा है। क्योंकि, विश्व में भारत की साख बढ़ी है। भारत भी वैश्विक प्रगति में कहीं ज्यादा योगदान दे पा रहा है। हमारा मीडिया इस दृष्टिकोण से जितना काम करेगा, देश को उतना ही फायदा होगा और इसलिए मैं तो चाहूंगा कि जितनी भी UN लैंग्वेज हैं, उनमें भी आपके पब्लिकेशंस का विस्तार हो। आपकी माइक्रोसाइट्स, सोशल मीडिया accounts इन भाषाओं में भी हो सकते हैं और आजकल तो AI का जमाना है। ये सब काम आपके लिए अब बहुत आसान हो गए हैं।

साथियों,

मैंने इतने सारे सुझाव आप सबको दे डाले हैं। मुझे मालूम है, आपके अखबार में, पत्र पत्रिकाओं में, बहुत लिमिटेड स्पेस रहती है। लेकिन, आजकल हर अखबार पर और हर एक के पास एक publication के डिजिटल editions भी पब्लिश हो रहे हैं। वहाँ न स्पेस की limitation है और न ही distribution की कोई समस्या है। मुझे भरोसा है, आप सब इन सुझावों पर विचार करके, नए experiments करेंगे, और लोकतंत्र को मजबूत बनाएँगे। और मैं पक्‍का मानता हूं कि आपके लिए एक, भले ही दो पेज की छोटी एडिशन जो दुनिया की UN की कम से कम languages हों, दुनिया का अधिकतम वर्ग उसको देखता है, पढ़ता है… embassies उसको देखती हैं और भारत की बात पहुंचाने की एक बहुत बड़ा source आपके ये जो डिजिटल एडिशंस हैं, उसमें बन सकता है। आप जितना सशक्त होकर काम करेंगे, देश उतना ही आगे बढ़ेगा। इसी विश्वास के साथ, आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद! और आप सबसे मिलने का मुझे अवसर भी मिल गया। मेरी आपको बहुत शुभकामनाएं हैं! धन्‍यवाद!