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PM Modi attends inauguration of the birth centenary celebrations of Rani Gaidinliu in New Delhi
We are celebrating the birth centenary of Rani Maa. I bow to Rani Gaidinliu and remember her contribution: PM
Rani Maa's life is an inspiration for us. She showed the way of attaining newer heights of development while maintaining unity in the Nation: PM
India has not been made by kings or rulers, but by its people: Shri Narendra Modi
Rani Maa worshipped nature and devoted herself to service for her entire life: PM
Mahatma Gandhi's thoughts were spread across the Northeast by Rani Gaidinliu, says PM Modi

उपस्थित सभी महानुभाव,

रानी मां की शताब्‍दी हम मनाने जा रहे हैं। मैं नतमस्‍तक हो करके रानी मां को आदर पूर्वक अंजलि देता हूं और रानी मां का जीवन हम सबको प्रेरणा देता रहे, देश की एकता, अखंडता बरकरार रखते हुए विकास की नई ऊंचाइयों को हम कैसे पार करते चलें - उन सपनों को जिन्‍होंने संजोया था उनमें एक रानी मां भी थीं।

ये हमारे देश का बड़ा दुर्भाग्‍य रहा कि आजादी के इतने सालों के बाद भी आजादी के अनेक वीर सेनानी हिन्‍दुस्‍तान के अनेक कोने में, वे अभी भी इतिहास के झरोखे से ओझल हैं। किसी भी जीवन समाज का ये दायित्‍व बनता है कि अपने महान पराक्रमों की, महान इतिहास की पूंजी को संजोए रखना चाहिए और पीढ़ी-दर-पीढ़ी उसका संक्रमण होता रहना चाहिए। गाथाएं जुड़ती जानी चाहिए। और तभी समाज के लिए जीने की, मरने की प्रेरणा मिलती है।



और कभी-कभार ये भी सोच रही है कि इतिहास राजघरानों के आस पास, शासकों के आस-पास ही चि‍त्रित होता रहता है। भारत एक अलग प्रकार की परम्‍परा से पला-बढ़ा देश है। यहां जन-सामान्‍य के पराक्रमों को अधिक महत्‍व दिया जाता है। इस देश की सोच कभी ये नहीं रही है कि ये देश राजाओं-महाराजाओं ने बनाया है, ये देश शासकों ने बनाया है। इस देश की मूलभूत सोच ये है कि यह देश सामान्‍य जनों ने बनाया है। उनके पुरूषार्थ से, उनके पराक्रम से, उनके पसीने की महक से ये देश पल्‍लवित हुआ है। और इसलिए जब तक हम इन शासकों के दायरे से बाहर नहीं आते, राजकर्ताओं के दायरे से बाहर नहीं आते, हमारा कैमरा वहां से बाहर नहीं हटता, तब तक हमें जन-सामान्‍य की शक्ति का एहसास नहीं होता है।

और जब रानी मां की शताब्‍दी मना रहे हैं तब, दिल्‍ली में भी कई लोग सवाल पूछते थे कि भई ये कौन है? क्‍या है? ये क्‍या कर रहे हो आप? दोष उनका नहीं है जो सवाल पूछते थे। दोष हमारी व्‍यवस्‍थाओं में जो विकृति आई है उसका है। और उसके कारण ऐसे अनगिनत महापुरूष जो हमें पल-पल प्रेरणा दे सकते हैं - या तो हम उन्‍हें भूल गए है या जान-बूझ करके उनको भूला दिया गया है। और किसी भी समाज को ये भूलना ऐसी बातों पर दुर्लक्ष करना शक्ति नहीं देता है, प्रेरणा नहीं देता है। मैं मानता हूं कि अगर पिछले 60 साल में रानी मां जैसे नार्थ इस्‍ट के अनेक महापुरूष है, रानी मां के अतिरिक्‍त भी अनेक महापुरूष है। नार्थ इस्‍ट की मैं बात हर रहा हूं। जिनका जीवन इतना प्रेरक रहा है। अगर पिछले 60 साल में हमारी सभी पीढि़यों को - दो पीढ़ी, तीन पीढ़ी, चार पीढ़ी जिसका भी हिसाब लगा लें - उनको अगर उनकी शिक्षा मिली होती, उनकी बातों को जानने का अवसर मिला होता तो मैं नहीं मानता हूं कि उस भूमि में कभी अलगाववाद का विचार भी पैदा हो सकता था। क्‍योंकि ये लोग थे जो देश की एकता के लिए जीते थे, मरते थे।

कोई कल्‍पना कर सकता है कि एक परम्‍परा और इस परम्‍परा के मुखिया जादोनांग - उनको भर जवानी में फांसी हो जाए क्‍योंकि वे आजादी का आवाज बने थे। और एक प्रकार से ऐसी स्थिति में पूरा संगठन बिखर सकता है। लोगों को लग सकता है कि भई इतनी छोटी आयु में ये तो फांसी पर चढ़ गए, अब हम क्‍या कर सकते है? मन में तीव्र इच्‍छा होन के बाद भी बिखराव संभव है। हम कल्‍पना करें कि रानी मां में वो कौन सा संगठन कौशल्‍य था कि उन्‍होंने 12-15 साल की उम्र के बीच में अपने गुरु जी की फांसी के बाद उस झंडे को झुकने नहीं दिया, संगठन को बिखरने नहीं दिया परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए अपने आप को झोंक दिया?

गुरु की इच्छा अनुसार, शिष्य जीवन लगा देते हैं। और उनके संवाद की भी चर्चा होती है। मैं मानता हूँ गुरु-शिष्य परम्परा का कोई इससे बड़ा उदाहरण नहीं हो सकता है, कि अपने गुरु फांसी के तख्ते पर चढ़ जाएँ और एक १३ साल की युवती उस झंडे को हाथ में ले, और शिष्या के नाते, गुरु के आदर्शों का पालन करने के लिए अपनी ज़िन्दगी खपा दे, ये बहुत कम होता है। जवानी के महत्‍त्‍वपूर्ण वर्ष जेल में गुजार दे। और ये व्‍यक्तित्‍व छोटा नहीं होगा कि पंडित नेहरू उनको मिलने के लिए जेल चले जाएं - ये असामान्‍य व्‍यक्तित्व होगा, तभी तो ये संभव हुआ होगा। जब सुभाष बाबू कांग्रेस के अध्‍यक्ष बने तब गुजरात के हरिपुरा कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार कांग्रेस के जीवन में... वरना जो सशस्त्र क्रांति में विश्‍वास रखते थे, उनके लिए एक वर्ग था कुछ बोलने का साहस नहीं करता था। लेकिन रानी मां एक अपवाद थी कि गुजरात के अंदर जब हरिपुरा कांग्रेस हुई सुभाष बाबू अध्‍यक्ष बने, रानी मां की मुक्ति के लिए वहां प्रस्‍ताव किया गया। ये अपने आप में कांग्रेस पार्टी का उस समय का एक बहुत बड़ा अहम निर्णय था।

लेकिन देश आजाद होने के बाद भी रानी मां को जेल से बाहर निकलने में तीन-चार महीने लग गए थे। आजादी के बाद भी तीन-चार महीने रानी मां जेल में थी। और इससे भी बड़ा दुर्भाग्‍य - इससे भी बड़ा दुर्भाग्‍य ये था कि आजादी के बाद रानी मां को राजनीतिक कारणों से... और हमारे यहां जो राजनीति में विकृतियां आई हैं, उन विकृतियों के दर्शन वहां होते है कि आजादी के बाद रानी मां को उनके गांव में प्रवेश नहीं दिया गया।

आजादी के.. हिन्‍दुस्‍तान में जो रानी मां आजादी के लिए अपने जीवन को खपाने के लिए तैयार थीं, जिसने कभी अंग्रेजों के सामने सर नहीं झुकाया था उस रानी मां को 10 साल तक अपने ही आजाद हिन्‍दुस्‍तान में भूगर्भ में रहना पड़ा था। और कारण? सांप्रदायिक असहिष्णुता थी। वे प्र‍कृति में पूजा करती थी, वो प्रकृति को परमात्‍मा मानती थी। और आज जो ग्‍लोबल वार्मिंग के कारण दुनिया संकट में है, उनको अगर रानी मां के उपदेश है, जो कि प्रकृति प्रेम के उपदेश है, वो अगर समझे, तो आज environment के जो issues हैं, उसका जवाब भी रानी मां की philosophy में मिलता है।



वे प्रकृति की पूजा का पुष्‍कार थीं। और उनकी सारी जो परम्‍परा थी उनका जो हरा का संप्रदाय रहा, वो प्रकृति पूजा का संप्रदाय रहा है। लेकिन उसको नकारने वालों ने उनका जीना दुष्‍कृत कर दिया था। और हिन्‍दुसतान में 10 साल तक उनको भू-गर्भ में जीवन बिताना पड़ा था। और बाद में जा करके स्थितियां थोड़ी संभली। वो अपने सेवा कार्य में जीवन खपाती रही थी। समय-समय पर मान-सम्‍मान के कारण कभी-कभार वो खबरों में आया करती थीं। लेकिन उन्‍होंने जीवन के अंत तक समाज सेवा का अपना मार्ग नहीं छोड़ा था।

प्रकृति पूजा विपरीत माहौल में भी उस मार्ग को बनाए रखना, लोगों को प्रेरित करते रहना। और संघर्ष का राह अपना करके नहीं, वो वीरांग्‍ना थीं, लेकिन समन्‍वय का मार्ग अपना करके उन्‍होंने आजादी के काल में पूरा जीवन समाज के उत्‍कर्ष के लिए लगाया था। और उस अर्थ में, मैं मानता हूं कि खास करके हमारे इन-इन इलाके - सिर्फ नार्थ-इस्‍ट नहीं हिन्‍दुस्‍तान के ऐसे कई कोने है - जहां के महापुरूषों को हम अगर हमारे प्रेरणा पुरूष के रूप में हमारे प्रेरक व्‍यक्तित्‍व के रूप में अगर प्रस्‍तुत करते रहते तो हमारी नई पीढि़यों का.. महात्‍मा गांधी को रानी मां सशस्‍त्र क्रांति के कारण जेल गई थीं। उनके गुरूदेव को फांसी हुई थी। लेकिन रानी मां खुद 1932-35 के कालखंड में महात्‍मा गांधी का गौरव गान पूरे नार्थ-ईस्‍ट में किया करती थी। एक प्रकार से महात्‍मा गांधी को पूरे नार्थ ईस्‍ट में परिचित कराने का बड़ा काम रानी मां ने किया था।

और वो हमेशा सपना देखती थी, वो कहती थी कि नागा कल्‍चर, नागा परंपरा ये सब बना रहना चाहिए। मुझे नागा होने का गर्व है। लेकिन ये सब देश की एकता और अखंडता के लिए होना चाहिए। ये रानी मां उस समय कहती थीं। वो संपूर्ण भारत की आजादी की बात करती थी। और वो उनकी भाषा में कहा करती थी कि गांधी एक दिन राजा बनेगा, महात्‍मा गांधी एक दिन राजा बनेगा। क्‍योंकि वो लोकतंत्र की परिभाषा जो उनके वहां थी, उसके हिसाब से, लेकिन मूल बात ये थी कि भारत स्‍वतंत्र होगा। और महात्‍मा गांधी उसका सुकांत समाज का नेतृत्‍व करेगें। ये सपने रानी मां लगातार बोलती रहती थीं। अपने लोगों को वो प्रशिक्षित करती रहती थीं।

जिन्‍होंने इस प्रकार का जीवन दिया, हम सबका दायित्‍व बनता है कि ऐसे हमारे जितने भी अज्ञात महापुरूष है... आज कभी हम अंडमान-निकोबार के सेल्‍युलर जेल में चले जाए, और वहां देश की आजादी पर मर-मिटने वालों की सूची देखें, तो पता तक नहीं चलता है कि इतिहास के किस कोने में होगा। वहां तो एक पत्‍थर पर उनके नाम छपे हुए हैं। लेकिन शायद देश के और कोने में, शायद जिस गांव में वो पैदा हुए होंगे, उन गांव के बच्‍चों को भी मालूम नहीं होगा कि हमारे गांव का कोई व्‍यक्ति था जो आज से 100 साल पहले अंडमान-निकोबार की जेल में जा करके, भारत मां की आजादी के लिए लड़ रहा होगा - पता नहीं होगा।

ये जो हमने बहुत बड़ा... हमारे समाज जीवन का घाटा रहा गया है, कमी रह गई है। इसको हम सबने पूरा करना है। हमारी यूनिवर्सिटीज़ Research scholars research करते है। क्‍यों न हमारी universities में हर batch में एक-दो, एक-दो students ऐसे भी हो, कि जो समाज के ऐसे लोगों पर research करें, Ph.D. करें? अगर नार्थ-ईस्‍ट के इन महानुभावों, सामाजिक क्रांति करने वाले, राष्‍ट्रीय क्रांति करने वाले, अगर इन पर हमारी universities research करें - और उस इलाके की नहीं दूसरे छोर की - साउथ से, पश्चिम से, उत्‍तर से, तो जा करके उनको लगेगा “अच्‍छा भई, ऐसे-ऐसे लोग यहां थे?”

ये integration के लिए भी बहुत बड़ा काम आता है। और मुझे विश्‍वास है कि आने वाले दिनों में जो बात मणिपुर के मुख्‍यमंत्री जी ने कही है, नागालैंड के मुख्‍यमंत्री जी ने कही है। उनकी भावना, उसको आदर करते हुए हम कैसे आगे बढ़ाएं हम इन चीजों को? ये पूरे देश का दायित्‍व बनता है। जिसको हमें पूरा करना चाहिए।

उसी प्रकार से आखीर रानी मां ने अपनी जिंदगी अपनी जेल में क्‍यों खपा दी? व्‍यक्तिगत तो कुछ पाने के लिए नहीं था। सपना यही था कि हमारा देश नई ऊँचाइयों को पार करे, प्रगति करे। और देश तब तक प्रगति नहीं कर सकता जब कि पूर्वी भारत प्रगति नहीं करता, जब कि उत्‍तर-पूर्व प्रगति नहीं करता, जब तक ये हमारी अष्‍ट लक्ष्‍मी प्रगति नहीं करती है।

और इसलिए विकास की इस बात को लेकर के आपने देखा होगा इस सरकार ने infrastructure के लिए सबसे ज्‍यादा धन नार्थ-इस्‍ट के लिए लगाया है। क्‍योंकि एक बार infrastructure बन जाएगा तो वहां तो... मैं उस इलाके में रहा हूँ मुझे मालूम है क्‍या परमात्‍मा के आशीर्वाद हैं देश के अन्‍य भू-भाग को पता तक नहीं है कि क्‍या ईश्‍वर के अशीर्वाद इस भू-भाग पर है। थोड़ा सा Connectivity का मामला बन जाए, आप देखिए मैंने इन दिनों University के Students को कहा था कि जरा टूरिस्‍ट के नाते आप वहां जाने की आदत तो डालो।

पिछले साल गए काफी विद्यार्थी। वो हैरान हो गए वहां के जीवन को देख करके। वो आकर के लोगों को बताते रह गए कि अरे भई हमने वहां ये, देखा वो देखा। हमें लगातार जोड़ना है। जैसे अरूण जी ने कहा, बंग्‍लादेश सीमा विवाद का समाप्‍त होना उसका जो सबसे महत्‍त्‍वपूर्ण पहलू है, जो भारत के हित में है, वो ये है कि अब हमें हमारे नार्थ-इस्‍ट के साथ जुड़ने में जो कठिनाइयां थी, उस कठिनाइयों से मुक्ति मिल गयी है। एक प्रकार से Geographically, नार्थ-इस्‍ट हमारे बहुत निकट आ गया है। वरना वो इलाका था जो बंग्‍लादेश में होने के कारण, हमारी Connectivity नहीं थी, अब सरल हो गया है। जैसे ही Infrastructure बनेगा, इसका फायदा मिलने वाला है।

नार्थ-इस्‍ट के State Capitals को Railway से जोड़ने में बहुत तेजी से काम चल रहा है। नार्थ-इस्‍ट हिंदुस्‍तान का Organic Capital बन सके, इतना सामर्थ्‍य रखता है। आपने दुनिया भर के पाइनेपल टेस्‍ट किए होंगे कभी एक बार नार्थ-इस्‍ट जा करके वहां पाइनेपल का टेस्‍ट कीजिएगा, पता चलेगा कि परमात्‍मा ने क्‍या दिया है, क्‍या दिया है!

मैं एक बात का उल्‍लेख करता हूँ ....देखिए, हमारे जेलियांग जी कहते है कि आप सिर्फ पाइनेपल का उल्‍लेख क्‍यों करते हैं? हमारे मिर्ची का उल्‍लेख क्‍यों नहीं करते हैं? बहुत कम लोगों को मालूम होगा, सारी दुनिया में सबसे हॉट चिली कहीं की है तो वो नागालैंड की है। ये-ये विविधताओं भरा हुआ देश है। आर्थिक विकास में ये क्षेत्र बहुत बड़ी भूमिका अदा कर सकते हैं। ऐसा नहीं है कि हिंदुस्‍तान उनका विकास करेगा। उनका विकास, हिंदुस्‍तान के विकास का एक नया कारण बनेगा - ऐसा मैं देख रहा हूँ।

और इसलिए नार्थ-इस्‍ट के विकास को हम प्राथमिकता दे करके आगे बढ़ रहे हैं। नागालैंड, यहां पर आजादी के पहले से ही, अतिवाद, उग्रवाद, अलगाववाद - ये स्‍वर उसके साथ शस्‍त्र जुड़ गये। हर सरकारों ने कोई-न-काई प्रयास किया। कुछ, कभी सुधार आया, कभी फिर रूकावट आयी, सुधार आया, फिर रूकावट आयी - क्रम चलता रहा। हर किसी का अपना-अपना सहयोग रहा है। किसी एक सरकार को इसकी क्रेडिट न जाती है, और न लेनी चाहिए। हर किसी ने अच्‍छा करने में कोई न कोई योगदान किया है। और उसी का परिणाम है कि आज नागालैंड में उन लोगों के साथ सफल वार्ता हुई है। मुख्‍य धारा से जुड़ करके कंधे-से-कंधा मिला करके, न सिर्फ नागालैंड का विकास, न सिर्फ नार्थ-इस्‍ट का विकास - पूरे हिंदुस्‍तान के विकास का सपना सबने देखा है।

मुझे विश्‍वास है कि ये जो यात्रा प्रारंभ हुई है, साथ-साथ चलने की यात्रा प्रारंभ हुई है, वो उत्‍तम परिणाम दे करके रहेगी। और देश नई ऊँचाइयों को प्राप्‍त करेगा। आज रानी मां की स्‍मृति में, ये coin... यहां बैठे हुए लोगों को अंदाज नहीं होगा, नार्थ-इस्‍ट के घरों में इस coin का क्‍या सात्विक मूल्‍य होगा, जिसका हम अंदाज नहीं कर सकते हैं।

उनके लिए ये एक ऐसी पवित्र घटना के रूप में देखा जाएगा। इतना बड़ा ये प्रेरक व्‍यक्तित्‍व रहा है। सरकार के लिए खुशी की बात है कि हम इस महान विभुति की जीवन के साथ वर्तमान को जोड़ने में सफल हो रहे हैं, और भविष्‍य के निर्माण के लिए उन व्‍यक्तित्‍व से हमेशा-हमेशा हमें प्रेरणा मिलती रहेगी, ताकत मिलती रहेगी, इसी शुभभाव के साथ मैं फिर एक बार रानी मां के चरणों में वंदन करता हूँ। उनका आशीर्वाद बन रहे, और हम सब मिल करके रानी मां का “देश समृद्ध हो, देश एक हो, देश अखंड हो” - उन सपनों को पूरा करने के लिए कोई कमी न रहे, इसी एक कल्‍पना के साथ, बहुत-बहुत शुभ कामनाएं।

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With Maa Amba's blessings, we will fulfill our resolutions: PM Modi at Ambaji, Gujarat
September 30, 2022
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PM dedicates and lays foundation stone of over 45,000 houses built under PM Awas Yojana
PM lays foundation stone of Taranga Hill – Ambaji – Abu Road New Broad Gauge Line
PM lays foundation stone for development of pilgrimage facilities at Ambaji temple under PRASAD scheme
PM dedicates 62 Km long New Palanpur-New Mahesana section of the Western Freight Dedicated Corridor and the 13 Km long New Palanpur-New Chatodar Section
“With the blessings of Maa Amba, we will get strength for the fulfilment of all our resolutions”
“We see our country India as a mother, and consider ourselves to be the children of Mother India”
“Government is spending about ₹4 lakh crore on extending the free ration scheme to more than 80 crore people in the country”
“PMGKAY extended so that sisters and mothers do not face any difficulty in running the kitchen during the festive season”
“It is our good fortune that in the year of Azadi ka Amrit Mahotsav, we are dedicating this railway line at the feet of Amba Mata”

“बोल मारी माँ, बोल मारी माँ!”

जय मां अंबे!

आज मां के पांचवें स्वरूप, स्कंदमाता की पूजा का दिन है। इस शुभ अवसर पर आज मां अंबे के दर्शन और पूजन करने का सौभाग्य मिल रहा है। अंबाजी में माता के दर्शन करने के लिए एक प्रकार से मैं कहूं तो मां की गोद में ही हमारी जिंदगी बीती है, आप सबकी भी बीती है और हम हमेशा अनुभव करते हैं, जब भी यहां आते हैं एक नई ऊर्जा, नई प्रेरणा लेकर के जाते हैं, नया विश्वास लेकर के जाते हैं। इस बार ऐसे समय में यहां आया हूं, जब विकसित भारत का विराट संकल्प देश ने लिया है। 130 करोड़ देशवासियों ने लिया है कि 25 साल के अंदर-अंदर हम हिन्‍दुस्‍तान को विकसित राष्ट्र बना के रहेंगे। मां अंबा के आशीर्वाद से हमें हमारे सभी संकल्पों की सिद्धि के लिए शक्ति मिलेगी, ताकत मिलेगी। इस पावन अवसर पर मुझे बनासकांठा के साथ-साथ गुजरात के अनेक जिलों को हजारों करोड़ रुपए की योजनाओं का उपहार देने का अवसर भी मिला है। आज जिन 45 हज़ार से अधिक घरों का लोकार्पण और करीब लोकार्पण और शिलान्यास मिला दें तो 61 हजार, उन सभी लाभार्थियों को भी मेरी तरफ से बहुत-बहुत बधाई देता हूं। उन बहनों को विशेष शुभकामनाएं, जिन्हें आज अपना घर मिला है। इस बार आप सभी की दिवाली नए घर में मनेगी, अपने खुद के घर में मनेगी। हमें आनंद होगा कि नहीं होगा, खुद के घर में दिवाली मनाने की बात की जाए, जिसने जिदंगी झोपड़ी में बिताई हो, तब वह खुद के पक्के घर में दिवाली मनाए, तब यह उसके जिदंगी की बड़ी से बड़ी दिवाली होगी कि नहीं होगी।

भाइयों और बहनों,

जब हम नारी सम्मान की बात करते हैं, तो हमारे लिए ये बहुत सहज सी बात लगती है। लेकिन जब हम गंभीरता से इस पर विचार करते हैं, तो पाते हैं कि हमारे संस्कारों में नारी सम्मान कितना रचा-बसा है। दुनियाभर में जो शक्तिशाली लोग होते हैं, जहां शक्ति की चर्चा होती है उनके साथ उनके पिता का नाम जुड़ता है। आपने सुना होगा कि वो फलाना भाई का लड़का बहादुर है, ऐसा कहते हैं कि नहीं। भारत में हमारे यहां वीर पुरुषों के साथ मां का नाम जोड़ा गया है। मैं उदाहरण देता हूं, आप भी सोचिए, अब देखिए, अर्जुन, महान वीर पुरुष थे, लेकिन कभी हमने ये नहीं सुनते हैं कि पांडु पुत्र अर्जुन, ऐसा नहीं बोलते लोग, लोग क्‍या कहते हैं हम जब भी सुनते हैं तो उनका नाम पार्थ सुना, ये पार्थ क्या है, जो पृथा यानि कुंति के पुत्र हैं। अर्जुन का जब वर्णन आता है तो कौन्तेय के पुत्र कुंतिपुत्र के नाम से भी जाना गया है। इसी प्रकार से भगवान श्री कृष्ण, सर्वशक्तिमान उनका भी जब परिचय दिया जाता है तो देवकीनंदन कहते हैं। देवकी का पुत्र कृष्ण, इस प्रकार से कहते हैं। हनुमान जी की बात आती है तो हनुमान जी को भी, हनुमान जी से बड़ा कोई वीर तो हमने कभी सुना नहीं है, लेकिन उनकी भी बात आती है तो कहते हैं अंजनी पुत्र हनुमान यानि मां के नाम के साथ वीरों के नाम हमारे देश में, ये मां के नाम के महात्म्य को, नारी के महात्म्य को, स्त्री शक्ति का महात्म्य हमें हमारी संस्कार की पूंजी के साथ हमें मिला हुआ है। इतना ही नहीं, ये हमारे संस्कार ही हैं, कि हम अपने देश भारत को भी मां के रूप में देखते हैं, खुद को मां भारती की संतान मानते हैं।

साथियों,

ऐसी महान संस्कृति से जुड़े होने के बावजूद हमारे देश में ये भी हमने देखा, कि घर की संपत्ति पर, घर के आर्थिक फैसलों पर, ज्यादातर हक पिता का या बेटे का रहा। हम सबको पता है घर हो तो पुरुष के नाम, गाड़ी हो तो पुरुष के नाम पर, दुकान हो तो पुरुष के नाम पर, खेत हो तो पुरुष के नाम पर। महिला के नाम पर कुछ नहीं होता, और पति जो गुजर जाये तो सब कुछ पुत्र के नाम पर हो जाता है। हमने निर्णय लिया है कि प्रधानमंत्री आवास जो हम देंगे, दीनदयाल आवास जो हम देंगे उसमें माता का भी नाम होगा। इसलिए 2014 के बाद हमने फैसला लिया कि गरीबों को सरकार जो पक्के घर बनाकर दे रही है, वो मां के नाम होगा या फिर मां और उसके पति के नाम पर होगा, मां या उसके बेटे के संयुक्त नाम पर होगा। अभी तक देश में गरीबों को 3 करोड़ से अधिक घर बनाकर हमने गरीबों को दिए हैं। ये जो खुशी आप जिन लोगों के चेहरों पर देख रहे थे न इस देश के 3 करोड़ लोगों को घर मिला है और ऐसी ही खुशी उनके चेहरे पर आज नजर आ रही है और जिनमें से अधिकतर घरों की मालकिन माताएं बहनें हैं। अपना घर होने की वजह से, अब जो ये घर मिला है न, इस घर की जो कीमत हैं तो उससे ये सभी बहनें लखपति हो गई हैं, आप सभी को पीछे बराबर सुनाई दे रहा है न। मैं गुजरात सरकार को बधाई दूंगा कि वो हर गरीब को पक्का घर देने के अभियान को तेज़ी से पूरा करने में जुटी है। मैं भूपेंद्र भाई को धन्यवाद करता हूं। पिछले वर्ष ही डेढ़ लाख घर गुजरात में पूरे हो चुके हैं। त्योहारों के इस मौसम में गरीब परिवारों की बहनों को अपनी रसोई चलाने में समस्या ना हो, इसलिए सरकार ने मुफ्त राशन की योजना भी आने वाले तीन महीने के लिए और बढ़ा दी है। मुश्किल समय में देश के 80 करोड़ से अधिक साथियों को राहत देने वाली इस स्कीम पर केंद्र सरकार करीब-करीब 4 लाख करोड़ रुपए खर्च कर रही है। बीते 2 दशकों से माताओं-बहनों के सशक्तिकरण के लिए काम करने का बहुत बड़ा सौभाग्य मुझे मिला है। बनासकांठा तो इसका एक बहुत बड़ा साक्षी रहा है। मुझे बहुत कष्ट होता था कि जहां माता अंबाजी और माता नळेश्वरी विराजमान हैं, वहां बेटियों की पढ़ाई को लेकर भी हम पीछे क्यों हैं? इसलिए मैंने जब मां नर्मदा से बनासकांठा के खेत-खलिहान को लहलहाने का प्रण लिया था, तब आपसे मैंने मां सरस्वती को भी घर में स्थान देने का आग्रह किया था। मुझे याद है कि मैं बहनों से बार-बार कहता था कि बेटियां नहीं पढ़ेंगी, तो माँ सरस्वती घर में नहीं आएँगी। जहाँ सरस्वती न हो, वहाँ लक्ष्मीजी कभी पाँव तक नहीं रखती हैं। मुझे खुशी है कि बनासकांठा की बहनों ने, आदिवासी परिवारों ने मेरे आग्रह को स्वीकार किया। आज मां नर्मदा का नीर यहां की तकदीर बदल रहा है, तो बेटियां भी बड़े शौक से स्कूल-कॉलेज जा रही हैं। कुपोषण के विरुद्ध लड़ाई में भी बनासकांठा ने बहुत सहयोग दिया है। प्रसूति के दौरान माताओं को सुखड़ी (रेसिपी) वितरण का कार्यक्रम हो या फिर दूध दान करने का अभियान, बनासकांठा ने सफलता के साथ इसे आगे बढ़ाया है।

भाइयों और बहनों,

मातृसेवा का जो संकल्प हमने यहां लिया, 2014 के बाद इसके लिए पूरे देश में काम चल रहा है। माताओं-बहनों-बेटियों के जीवन की हर पीड़ा, हर असुविधा, हर अड़चन को दूर करने के लिए, उन्हें भारत की विकास यात्रा का सारथी बनाया जा रहा है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ से लेकर देश की सेना में बेटियों की संपूर्ण भागीदारी तक, बेटियों के लिए अवसरों के दरवाजे खोले जा रहे हैं। टॉयलेट्स हों, गैस कनेक्शन हों, हर घर जल हो, जनधन खाते हों, मुद्रा योजना के तहत मिल रहे बिना गारंटी के ऋण हों, केंद्र सरकार की हर बड़ी योजना के केंद्र में देश की मातृशक्ति है, नारी शक्ति है।

साथियों,

जब मां सुखी होती है, तो परिवार सुखी होता है, जब परिवार सुखी होता है, तो समाज सुखी होता है, और समाज सुखी होता है तो देश सुखी होता है मेरे भाइयों। यही सही विकास है, इसी विकास के लिए हम निरंतर काम कर रहे हैं। आप मुझे बताइए, यहां मंदिर के सामने जो इतना जाम लगता था, इससे मुक्ति मिलनी चाहिए थी कि नहीं मिलनी चाहिए थी? वहां शांति का वातावरण चाहिए था कि नहीं चाहिए था? मार्बल लेकर जो ये बड़े-बड़े ट्रक मंदिर के सामने से गुजरते हैं, इनके लिए अलग रास्ता होना चाहिए था कि नहीं चाहिए था? आज नई रेल लाइन और बाईपास के रूप में हम सभी की ये कामना पूरी कर रहे हैं।

भाइयों और बहनों,

आज मैं आपको एक हैरानी की बात भी बताऊंगा। आप सबको ये जानकर बड़ा आश्चर्य होगा कि आज जिस तारंगा हिल-अंबाजी-आबु रोड, मेहसाना ये जो रेल लाइन का शिलान्यास हुआ है न, देश जब गुलाम था, अंग्रेज जब राज करते थे, अंग्रेजों के ज़माने में ये रेल लाइन बनाने का फैसला अंग्रेजों ने 1930 में किया था, यानि करीब-करीब सौ साल पहले, फाइलें पड़ी हैं। इसकी परिकल्पना अंग्रेजों के जमाने में हुई थी। यानि इस क्षेत्र में रेल लाइन की कितनी अहमियत थी, रेल लाइन की जरूरत कितनी थी, ये सौ साल पहले पहचान लिया गया था। लेकिन साथियों, शायद ये काम भी परमात्मा ने, मां अंबा ने मुझे ही करने के लिए कहा होगा। दुर्भाग्य से आजादी के बाद ये काम नहीं हुआ। आज़ादी के इतने दशकों तक ये फाइल सड़ती रहीं। जब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री था तो इसके पीछे लगा हुआ था, इसका प्रस्ताव रखा था। लेकिन तब हमारी कोई सुनवाई नहीं हुई, सरकार कुछ और थी। ये हमारा सौभाग्य है कि आज जब देश आजादी के 75 साल पूरे कर रहा है, तब हमारी डबल इंजन की सरकार को इसे माता के चरणों में समर्पित करने का अवसर मिला है। इस रेल लाइन से और बायपास से जाम और दूसरी समस्याओं से तो मुक्ति मिलेगी ही, साथ ही मार्बल उद्योग को भी बल मिलेगा। वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र में है, जो आज चालू हो गया है। डेडिकेटेट फ्रेट कॉरिडोर से यहां का मार्बल, और ये हमारे किसान तो यहां आलू की खेती करने में मशगूल हो गए अब, सब्जियों की खेती कर रहे हैं, टमाटर की खेती कर रहे हैं और दूध में भी पीछे नहीं हैं। इन सारी चीज़ों के लिए बहुत आसानी से रास्ता मिल जाएगा, आसानी से इन्हें पहुंचाना सरल हो जाएगा। किसानों को विशेष लाभ इसलिए भी होगा क्योंकि आने वाले समय में विशेष किसान रेल भी यहां से चल सकती है।

भाइयों और बहनों,

सबसे बड़ा लाभ यहां के पर्यटन उद्योगों को होने वाला है। यहां तो अंबाजी मां स्वयं विराजमान हैं और जब मैं मुख्‍यमंत्री था तो हमने यहां 51 शक्तिपीठों का भी निर्माण किया है। मां अंबा स्वयं 51 शक्तिपीठों में से एक हैं और हमने दुनिया भर में जहां-जहां मां अंबा का स्थान है उसकी replica यहां बनाई है यानि एक प्रकार से ये 51 तीर्थ क्षेत्रों की यात्रा अंबा जी में आने से हो जाती है। लेकिन मैंने देखा है, अभी भी लोग इतनी तेजी से आते हैं कि मां अंबा के दर्शन किये, फिर भाग जाते हैं। मैं ऐसी स्थिति पैदा करना चाहता हूं कि जो अंबा जी आएगा उसको दो-तीन दिन यहां रहना पड़े, इतनी सारी चीजें मुझे खड़ी कर देनी है ताकि यहां पूरी रोजी-रोटी बढ़ जाए। देखिए पास में गब्बर, अब हम गब्‍बर को बदल रहे हैं, आपको नजर आता होगा। किसी ने सोचा होगा क्‍या? आज गब्बर तीर्थ क्षेत्र के विकास के लिए मैं गुजरात की सरकार की बहुत प्रशंसा करता हूं। अब अजीतनाथ जैन मंदिर, तारांगा हिल, उसके दर्शन भी आसान हो जाएंगे जैसे पालीतला का महत्व बढ़ गया है, वैसे तारांगा हिल का भी महत्‍व बढ़ेगा। ये आप लिखकर करके रखिए। ट्रेन चलेगी तो ज्यादा तीर्थ यात्री यहां आएंगे, होटल-गेस्ट हाउस, दुकान-ढाबे वालों की यानि उनकी आय बढ़ेगी। छोटे-छोटे दुकानदारों को काम मिलेगा। युवाओं के लिए गाइड से लेकर टैक्सी सेवाओं तक नए मौके मिलेंगे। और धरोई डैम से लेकर के अंबा जी तक पूरा बेल्ट मुझे विकसित करना है। जैसे आप statue of unity पर जाकर के देखते हैं वैसा ही मैं यहां करना चाहता हूं। पूरा एक क्षेत्र धरोई डैम में वॉटर स्पोर्ट्स को लेकर संभावनाएं हैं, अब उन्हें भी और विस्तार मिलेगा।

भाइयों और बहनों,

एक तरफ आस्था और उद्योगों का ये गलियारा है और दूसरी तरफ हमारा बॉर्डर है, जहां हमारे वीर जवान राष्ट्र रक्षा में तैनात रहते हैं। हाल ही में सरकार ने सुईगाम तालुका में सीमा दर्शन प्रोजेक्ट की शुरुआत की है। प्रयास ये है देशभर से लोग यहां आकर सीधे हमारे बीएसएफ के जवानों के अनुभवों को देखें, जान सकें। ये प्रोजेक्ट राष्ट्रीय एकता के पंच प्राण को भी ताकत देने वाला है और यहां पर्यटन से जुड़े नए रोजगारों का भी सृजन करेगा। मीठा-थराद-डीसा सड़क के चौड़ी होने से भी इस परियोजना को बल मिलेगा। डीसा में एयरफोर्स स्टेशन में रनवे और दूसरा इंफ्रास्ट्रक्चर बनने से हमारी वायुसेना की ताकत भी इस क्षेत्र में बढ़ने वाली है। रणनीतिक लिहाज़ से ये एयरफोर्स स्टेशन देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगा। जब इतना बड़ा स्टेशन यहां बन रहा है, तब आसपास व्यापार-कारोबार भी बढ़ेगा। यहां दूध-फल-सब्जी से लेकर अनेक प्रकार की ज़रूरतें पैदा होंगी। जिससे यहां के किसानों, पशुपालकों, सभी को लाभ तय है।

भाइयों और बहनों,

बीते 2 दशकों के निरंतर प्रयासों से बनासकांठा की तस्वीर बदल चुकी है। नर्मदा के नीर, सुजलाम-सुफलाम और ड्रिप इरीगेशन ने स्थिति को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है। इसमें बहनों की भूमिका, इस भूमिका में बहनों का रोल बहुत अग्रणी रहा है। बनासकांठा में कभी अनार की खेती होगी, अंगूर की खेती होगी, आलू और टमाटर इतने बड़े पैमाने में पैदा होंगे, कुछ साल पहले तक ये कोई सोच भी नहीं सकता था। आज जो परियोजनाएं शुरू हुई हैं, वो किसानों, युवाओं, महिलाओं, सभी का जीवन बदलने का काम करेंगी। एक बार फिर मां के चरणों में वंदन करते हुए आप सभी को विकास परियोजनाओं की बहुत-बहुत बधाई। आपका भरपूर आशीर्वाद हमें ऐसे ही मिलता रहेगा, इसी कामना के साथ बहुत-बहुत धन्यवाद। और सबसे पहले मुझे तो आपसे माफी मांगनी है, क्योंकि मुझे यहाँ आते हुए देर हो गई, मुझे इसका अंदाजा नहीं था। मुझे लगा था कि यहाँ से सीधे निकलेंगे और पहुंच जायेंगे। रास्ते में इतनी विराट संख्या में ग्रामीणों से मुलाकात हुई, तो स्वाभाविक रुप से मेरा मन हो रहा था कि उनके पैर छूने का। तो ऐसा करते करते मुझे पहुंचने में देरी हो गई। इसलिए आप सबको ज्यादा इंतज़ार करना पड़ा, उसके लिए क्षमा चाहता हूँ। परंतु अपने बनासकांठा के भाइयों, और अब तो पास में अपना खेडब्रह्मा भी है, हमारे साबरकांठा का पट्टा भी सामने आता है। हम सबको विकास और प्रगति के नये शिखर पर पहुंचना है। और यह 25 सालों का बड़ा अवसर हमारे पास है, आज दुनिया में लोगों का भारत के लिए आकर्षण बढ़ा है। हम यह अवसर जाने दे सकते है? यह अवसर हम जाने दे सकते हैं क्या? मेहनत करनी पड़ेगी कि नहीं करनी पड़ेगी, विकास के कामों में जोर देना पड़ेगा कि नहीं। सबको साथ मिलकर आगे बढ़ना चाहिए कि नहीं। यह करेंगे, तभी प्रगति होगी भाइयों और यह प्रगति करने के लिए आपने हंमेशा साथ और सहयोग दिया है। यही मेरी ताकत है, यही मेरी पूंजी है। यही आप सभी का आशीर्वाद हमें नया-नया करने के लिए प्रेरणा देता है। और इसलिए इस माता के धाम में से आप सभी गुजरात वासियों का दिल से आभार व्यक्त करता हूँ। बहुत बहुत धन्यवाद।