Entire world is today looking towards India with a new hope: PM Modi
It has been 18 months since we formed Govt & there have been no charges of corruption: PM Modi
Be it the World Bank or any other rating agency, they are upbeat about India & consider the country as a bright spot: PM
Despite a global turmoil, India is scaling new heights of progress at fast pace: PM Modi
PM Modi sheds light on various aspects of Pradhan Mantri Krishi Sinchai Yojana
Our focus is on ‘Jal Sanchay’ as well as ‘Jal Sinchan’: PM Modi
We want to focus on ‘Per Drop, More Crop’, says PM Modi highlighting benefits of micro-irrigation
With neem-coating of urea, we have been able to stop its theft as well as boost crop productivity: PM
Our new Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana is a boon for the farmers: PM Modi
With Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana, now farmers have to pay very low premium, 2% for Kharif, 1.5% for Rabi: PM
I urge more and more farmers to join the Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana: PM Modi

मंच पर विराजमान कर्नाटक प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष श्रीमान प्रह्लाद जोशी जी, भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और गणमान्य किसान नेता श्रीमान येदुरप्पा जी, केंद्र में मंत्रिपरिषद के मेरे साथी श्री अनंत कुमार, श्रीमान सदानंद गौड़ा, कर्नाटक विधान परिषद् विपक्ष नेता श्रीमान ईश्वरप्पा जी, विधानसभा नेता विपक्ष श्रीमान जगदीश जी, राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव श्री संतोष जी, केंद्र में मंत्रिपरिषद के मेरे साथी श्रीमान श्री सिद्धेश्वर जी, श्री मुरलीधर राव, राज्यसभा में सांसद श्री प्रभाकर राव, यहाँ के जनप्रिय सांसद श्रीमान सुरेश जी और विशाल संख्या में आये हुए मेरे लाखों-लाखों किसान भाईयों और बहनों।

आज हमारे किसान नेता श्रीमान येदुरप्पा जी के जन्मदिन पर मैं उनको बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूँ और यह शुभ संयोग है कि उनके जन्मदिन के अवसर पर ये किसान रैली भी है। भाईयों-बहनों, आप लोग परसों आने वाले बजट का इंतज़ार कर रहे होंगे। देश भी और दुनिया भी आज भारत की विकासयात्रा का गौरवगान कर रही है। आपको पता है जिन दिनों मुझे दिल्ली की जिम्मेवारी मिली, तब देश की हालत क्या थी? अखबार किन बातों से भरे रहते थे? पूरा देश भ्रष्टाचार के कारण परेशान था। जल, थल, नभ, हर जगह बस एक ही बात कान पर आती थी, भ्रष्टाचार। 18 महीने हो गए जब आपने मुझे प्रधानसेवक के रूप में काम करने का अवसर दिया। हमारे विरोधी उन मुद्दों पर भी बयानबाजी करते हैं, जिन्हें कोई गिनता नहीं, इन लोगों ने भी इस सरकार पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगाया है। झूठा आरोप लगाने का भी हिम्मत नहीं कर पाए हैं।

एक तरफ दुनिया में हिन्दुस्तान की साख पूरी तरह गिर चुकी थी, विश्व भारत को गिनने को तैयार नहीं था। भारत आर्थिक संकटों से गुजर रहा था, हर तरह से देश की आर्थिक स्थिति बेहाल हो चुकी थी। ऊपर से भ्रष्टाचार भारत को दीमक की तरह तबाह कर रहा था और एक निराशा का माहौल था। आज वर्ल्ड बैंक हो या दुनिया की रेटिंग एजेंसी हो, पूरा विश्व एक स्वर से कह रहा है कि आज अगर आशा की एक किरण है तो वो हिन्दुस्तान है। सारी दुनिया में आर्थिक स्थिति ख़राब है, दुनिया के महारथी देश भी आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं। पूरे विश्व में इतना बड़ा भयंकर मंदी का माहौल होने के बावजूद भारत तेज़ गति से आर्थिक प्रगति कर रहा है। एक तरफ दुनिया में मंदी हो, दो साल लगातार भारत में सूखा रहा हो, विरासत में आर्थिक संकटों के सिवाय कुछ ना मिला हो, इसके बावजूद हमने डेढ़ साल के भीतर देश को इन संकटों से बाहर निकाला है और विश्वास से बढ़ते भारत को दुनिया के सामने खड़ा कर दिया है।

इस देश को आने वाले दिनों में और तेज़ गति से आगे बढ़ना है तो विकास की यात्रा को तीन मजबूत आर्थिक स्तंभों पर खड़ा करना होगा; एक-तिहाई हमारी खेती, एक-तिहाई मैन्युफैक्चरिंग, और एक-तिहाई सर्विस सेक्टर, इन तीनों को हम एक साथ बढ़ावा देंगे, तभी यह देश किसी भी संकट को पार कर सकता है। हमने विकास के लिए तीन मूलभूत बातों पर बल दिया है – हमारा किसान कैसे ताक़तवर बने, हमारे देश में कैसे नौजवानों को रोजगार मिले, इसके लिए नए-नए उद्योग कैसे प्रस्तावित हो और यहाँ सर्विस सेक्टर के लिए बहुत सुविधा हो, दुनिया को जो चाहिए उसे दे सकने की ताकत जिस देश में हो, वो देश क्यों न आगे बढ़े।

हमने कृषि क्षेत्र में बहुत सुविचारित रूप से कदम उठाए हैं और उन कदमों को आज नतीज़ा नज़र आने लगा है। हमारे देश में आजादी के बाद जल प्रबंधन को प्राथमिकता दी गई होती तो आज सूखे की मार से हमारे किसानों को आत्महत्या करने की नौबत नहीं आती। किसान को अगर पानी मिल जाए तो मिट्टी में से सोना पैदा करने की ताकत रखता है। किसान किसी की मेहरबानी का मोहताज नहीं होता है।

भाईयों-बहनों, हमने 50 हज़ार करोड़ रुपये की लागत से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना बनाई ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसानों के खेतों तक पानी पहुंचे। नदियों को जोड़ने का काम देश को बचाएगा। मेरा-तेरा का भाव छोड़कर हम सब को नदियों को जोड़ने का मन बनाना पड़ेगा। हमारे सामने दुनिया के कई ऐसे देश हैं जो बारिश नहीं होने, नदियाँ नहीं होने के बावजूद जल प्रबंधन कर उत्तम से उत्तम खेती कर दुनिया के सामने प्रस्तुत किया है। इज़राइल एक बहुत बड़ा उदाहरण है जिसने कम से कम पानी में कृषि क्रांति कैसे हो, यह करके दिखाया है और इसलिए हमें भी जल संचय और जल सिंचन पर बल देना होगा।

पानी कारखाने में बनने वाली चीज़ नहीं है, यह तो परमात्मा का प्रसाद है। किसी तीर्थस्थल पर जाएं और अगर एक भी दाना प्रसाद का गिर जाए तो हमें अफ़सोस होता है और हम भगवान से माफ़ी मांगकर उस प्रसाद को उठा लेते हैं। उसी तरह पानी भी भगवान का प्रसाद है, इसकी अगर एक बूँद भी बर्बाद हो तो हमें ईश्वर से माफ़ी मांगनी चाहिए। इस पानी को बर्बाद होने से रोकना है।

हमने एक और बात पर बल दिया है कि मनरेगा सिर्फ़ गड्ढ़े खोदने के लिए नहीं होना चाहिए। पैसों का प्रोडक्टिव उपयोग होना चाहिए और इसलिए हमने गत वर्ष से मनरेगा से संबंधित कई आग्रह रखे हैं, राज्यों पर दवाब दिया है और कहा है कि मनरेगा पर काम होगा तो पहली प्राथमिकता पानी को ही दी जाएगी, केनल ठीक करना है, तालाब बनाने हैं, छोटे-छोटे चेक डेम बनाने हैं। अगर एक बार मनरेगा का पैसा पानी बचाने के लिए किया जाएगा तो पानी शुद्ध होगा, इसका स्तर बढ़ेगा।

दूसरी बात हमने कही है, पर ड्रॉप, मोर क्रॉप अर्थात एक-एक बूँद से ज्यादा से ज्यादा फ़सल। जितना महत्व जल संचय का है, उतना ही महत्व जल सिंचन का भी है। आज स्प्रिंकलर माइक्रो इरीगेशन के द्वारा फ़सल पैदा करना आसान हो गया है। हमारे किसानों के दिमाग में सालों से भरा पड़ा है कि जब तक खेत पानी से लबालब भरा न हो तब तक फ़सल पैदा नहीं होती है और इस वजह से जरुरत हो न हो, वे पानी डालते जाते हैं। किसान ये मानने को तैयार नहीं है कि माइक्रो इरीगेशन से गन्ने की खेती हो सकती है। मैंने देखा है कि माइक्रो इरीगेशन से भी गन्ने की उत्तम से उत्तम खेती हो सकती है। इतना ही नहीं, इससे सुगर केन मजबूत होता है और चीनी भी ज्यादा निकलती है। पानी बचता है और वो पानी अन्य जगहों पर काम आ सकता है। इसलिए हमने कोटि-कोटि रुपये जल संचय, माइक्रो इरीगेशन के लिए किसानों की योजनाओं के लिए दिया है।

अगर हमें किसान को सफल करना है तो पानी का प्रबंधन पहला कदम है। दूसरा कदम है –उसकी जमीन की चिंता। अगर हम इसी प्रकार से फ़सल लेते रहेंगे, दुनियाभर की दवाईयां और फ़र्टिलाइज़र डालते रहेंगे तो हमारी जमीन बर्बाद होती रहेगी। जब हम बीमार होते हैं तो लोग कहते हैं कि ज्यादा दवाईयां मत लो। जिस तरह से फालतू दवाईयां खा-खा करके शरीर बर्बाद हो जाता है तो वैसे ही हमारी भारतमाता भी बीमार हो जाती हैं। हमें यह पता होना चाहिए कि हमारी ज़मीन की तबीयत कैसी है, जमीन ने कोई ताकत खो तो नहीं दी और इसलिए हमने एक बहुत बड़ा अभियान चलाया है – स्वायल हेल्थ कार्ड। स्वस्थ धरा है तो खेत हरा है और इसलिए गाँव-गाँव में किसानों की ज़मीन का सैंपल लेकर लेबोरेटरी ले जाए जा रहे हैं, उसका रिपोर्ट किसानों को पहुँचाया जा रहा है। इस वर्ष में कोटि-कोटि किसानों तक पहुँचाने का प्रयास किया गया है। 2017 में जब भारत की आज़ादी के 70 साल होंगे तो यहाँ के किसानों के पास स्वायल हेल्थ कार्ड पहुँचाने का हमारा इरादा है और हम लगे हैं। हमें हमारी ज़मीन की रिपोर्ट के आधार पर अपनी फ़सल तय करनी चाहिए।

हम एक तरफ जल पर और दूसरी तरफ ज़मीन पर जोर दे रहे हैं। मैं नौजवानों, खासकर बंगलौर के नौजवानों से आग्रह करता हूँ कि आज जब हमने स्टार्ट-अप का अभियान चलाया है, वे नए-नए इनोवेशन करें। आज विज्ञान का महत्व बढ़ रहा है और आप बहुत चीजें घर बैठे कर सकते हैं, क्या वे ऐसा छोटा सा इंस्ट्रूमेंट नहीं बना सकते जो किसान खुद अपनी जमीन की तबीयत को नाप सके। गाँव के नौजवानों से मैं कहता हूँ कि जिस तरह शहरों में पैथोलॉजी होती है, हमारे नौजवान जमीन की तबीयत देखने वाले लेबोरेटरी क्यों न खोलें। अगर आप ये करने के लिए तैयार हैं तो सरकार इसके लिए योजना बनाने को तैयार है, मुद्रा योजना के तहत पैसे देने के लिए तैयार है और किसान को आदत लग जाएगी कि वे अपनी ज़मीन के नमूनों को हर साल चेक करवाता रहे तो आप देखिये कि कितना बड़ा बदलाव आता है। नौजवानों को रोजगार मिल जाएगा, देश तकनीकी तौर पर आगे बढ़ेगा और किसान को हर साल पता लगेगा कि उनकी ज़मीन में कोई बीमारी तो नहीं घुस गई है।

तीसरी बात जो महत्वपूर्ण है, वो है बीज। उत्तम से उत्तम बीज हो, किसान ठगा न जाए क्योंकि कई बार ऐसा होता है कि बीज रोप देने के महीनों बाद पता चलता है कि कुछ भी नहीं निकला, मैं तो बर्बाद हो गया। फिर उसके पास रोने के अलावा कोई सहारा नहीं रहता है। सरकार ने आग्रहपूर्वक बीज की दिशा में ध्यान देने का प्रयास किया है। किसान को फ़र्टिलाइज़र चाहिए। मुझे याद है कि पिछली बार जब हमारी नई सरकार बनी थी, सरकार को 1-2 महीने ही हुए थे और राज्यों के मुख्यमंत्री लिख रहे थे कि हमारे किसान परेशान हैं, उन्हें यूरिया चाहिए। उनके अफसर और कृषि मंत्री दिल्ली आते थे और अपनी चिंता जाहिर करते थे और कई-कई स्थानों पर तो यूरिया लेने के लिए लंबी-लंबी कतारें लगती थी। यूरिया की कालाबाज़ारी होती थी और कई स्थानों पर भीड़ इतनी हो जाती थी कि पुलिस को लाठी चार्ज करनी पड़ती थी।

हमने इन सभी बातों पर ध्यान दिया और मैं अपने मित्र आनंद कुमार को बधाई देता हूँ कि फ़र्टिलाइज़र मिनिस्टर के नाते उन्होंने इतना अद्भुत काम किया कि इस वर्ष मुझे एक भी मुख्यमंत्री ने यूरिया के लिए चिट्ठी नहीं लिखी। यूरिया के लिए लंबी लाइन लगी हो, किसी अख़बार या न्यूज़ पेपर में ऐसी फोटो देखने को नहीं मिली और कहीं पर भी किसान को लाठी चार्ज का शिकार नहीं होना पड़ा। हमने जो सबसे बड़ा काम किया, वो यह कि यूरिया की जो चोरी होती थी, भ्रष्टाचार होता था, उस पर हमने लगाम लगा दी। ये लोग जो परेशान रहते हैं, इसी लिए तो वे परेशान रहते हैं। अब वे मोदी से नाराज़ नहीं होंगे तो क्या होंगे; मोदी उनके आँखों में चुभता है क्योंकि 60 साल तक मुफ़्त की मलाई खायी हुई है और अब वो बंद हो गया है तो इसलिए वे परेशान हैं।

मैंने चुनाव में भी वादा किया था कि जब तक मैं बैठा हूँ, दिल्ली की तिजोरी पर कोई पंजा नहीं पड़ने दूंगा। फ़र्टिलाइज़र की चोरी रोकने के अलावा हमने एक और कदम उठाया है – नीम कोटिंग यूरिया। ये कोई मेरी खोज नहीं है और कागज़ पर सरकारें पहले भी इसके बारे में बातें करती थी लेकिन लागू नहीं करते थे। हमने तय किया कि सरकार का पैसा जाएगा और हम 100% यूरिया का नीम कोटिंग करेंगे। आज मैं गर्व से कहता हूँ कि अपने साथी आनंद कुमार के साथ मिलकर हमने यूरिया का 100% नीम कोटिंग कर दिया है।

नीम कोटिंग का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि मानो किसान अगर 10 किलो यूरिया का प्रयोग करता है लेकिन अगर नीम कोटिंग वाला इस्तेमाल करता है तो 7 किलो से भी काम चल जाएगा और 3 किलो का पैसा बच जाता है। नीम कोटिंग से यूरिया में एक नई ताकत आ जाती है। दूसरा फ़ायदा है कि पहले फ़र्टिलाइज़र केमिकल कंपनियों में सीधा चला जाता था क्योंकि सब्सिडी वाला होता था और उनको तो खरबों रुपये मिल जाते थे। नीम कोटिंग करने के कारण अब ये यूरिया किसान के अलावा किसी के काम नहीं आ सकता है। तीसरा फ़ायदा कि इन दिनों गांवों में वुमन सेल्फ़ हेल्प ग्रुप ने एक नया उद्योग शुरू किया है, नीम के पेड़ की जो फली होती है, उसे इकठ्ठा करती है और कंपनियों उसे खरीदती है क्योंकि वो नीम कोटिंग में इस्तेमाल होता है। इसके कारण गाँव के गरीब लोगों की कमाई होने लगी। मैं अपने किसान भाईयों से आग्रह करता हूँ कि आप नीम कोटिंग यूरिया का ही इस्तेमाल करना और पहले जहाँ 10 किलो का इस्तेमाल होता था, वहां सिर्फ़ 7 किलो से काम होगा। आप कीजिये, देखिये कैसे आपकी फ़सल भी बढ़ती है, जमीन भी सुधरती है, ये आपको नज़र आ जाएगा।

भाईयों-बहनों, किसान को सुरक्षा कैसे मिले, ये चिंता मुझे बारंबार सताती रहती थी। मैं किसानों को यह विश्वास दिलाना चाहता था कि परमात्मा रूठ जाए तो रूठ जाए लेकिन सरकार रूठनी नहीं चाहिए। इसके लिए मैं खुद समय देता था, किसान समूह से बात करता था, प्रोग्रेसिव किसानों, वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों से बात की। बड़े मंथन के बाद मैंने ये प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना प्रस्तुत की है। सबसे पहले हमारे देश में फ़सल बीमा योजना लाने का काम श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने किया था। उसके बाद दूसरी सरकार ने उसमें कुछ-कुछ कर दिया लेकिन इन सबके बावजूद ज्यादातर किसानों को बीमा योजना का लाभ नहीं मिला क्योंकि उन्हें लगता है कि पैसा जाएगा तो लेकिन आएगा नहीं। वो योजना ही ऐसी थी कि कोई किसान फ़सल बीमा योजना पर भरोसा नहीं कर सकता था। एक तो प्रीमियम ज्यादा थी और कुछ फ़सल ऐसी थी कि जिसमें 50% से भी ज्यादा की प्रीमियम की बातें होती थी। अब किसान इतना कैसे देगा।

हमने मौसम के अनुसार प्रीमियम तय किया; खरीफ़ के लिए 2% और रबी के लिए 1.5%; अतः किसानो जो पैसा देगा, उससे 90% ज्यादा पैसा सरकार के ख़जाने से जाएगा। हमने किसान को चिंतामुक्त कर दिया है। हमने कुछ नई चीजें भी जोड़ी हैं। पहले फ़सल कटाई के बाद जो नुकसान होता था, उसे बीमा में कवर नहीं किया जाता था। हम ऐसा बीमा लेकर आए हैं जिसमें अगर फ़सल कटाई के 14 दिनों के भीतर कोई नुकसान होता है तो भी किसान को उस फ़सल का बीमा दिया जाएगा। ये पहली बार देश में हो रहा है।

पहले फ़सल बीमा तय होता था तो औसतन 50 गांवों का हिसाब लिया जाता था। अगर कुछ गांवों में अच्छी बारिश हो गई और कुछ गांवों में बारिश नहीं हुई और औसत निकलने पर सब समान हो जाता था। हमने इसे भी ठीक करते हुए यह किया कि अगर किसी किसान का अपना नुकसान हुआ है तो उसे बीमा का लाभ मिलेगा भले ही दूसरे किसान को नुकसान न हुआ हो। दूसरी बात ये कि अगर ओले गिर जाएं, भूस्खलन हो जाए, जलभराव हो जाए तो हमारे किसानों को कुछ नहीं मिलता था और ओले तो ऐसा भी है नहीं कि सभी खेतों में ओले गिरे ही। हमने प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना में यह तय किया कि अगर एक भी किसान इन चीजों से प्रभावित होता है तो उसे इस योजना के तहत लाभ मिलेगा।

हमने एक और महत्वपूर्ण निर्णय किया अब तक होता था कि आप बारिश का अनुमान लगाएं और अगर बारिश न हो तो आप फ़सल बोते ही नहीं थे। पहली बार हम ऐसी योजना लेकर आए हैं कि मान लीजिए आपने सारी तैयारियां की लेकिन बारिश न आने की वजह से आप बौनी नहीं कर पाए तो साल भर अपना गुजारा करने के लिए पैसा दिया जाएगा। मैं बड़े विश्वास से कहता हूँ कि किसानों ने मेरा जो मार्गदर्शन किया और इसके बाद हमने पिछली सभी बीमा योजनाओं की कमियों को दूर किया है और एक परफेक्ट प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना लेकर आए हैं।

मैं चाहता हूँ कि आप भारी से भारी संख्या में प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना से जुड़ें। आजादी के बाद कर्नाटक को जितना पैसा अकाल के समय मिला है, उससे ज्यादा पैसा इस बार भारत सरकार ने कर्नाटक की सरकार को दिया है। किसानों के लिए 1540 करोड़ रूपया भारत सरकार ने दिया है। पैसे तो यहाँ आते थे लेकिन यहाँ के अफसर उसे खर्च नहीं करते थे। जब मुझे पता चला तो मैंने दवाब बनाया और तब जाकर किसानों को पैसा भेजना शुरू हुआ और हमारा आग्रह है कि ये पैसा उनके जन-धन अकाउंट में जाना चाहिए।

हम जब आए तो गन्ना किसानों का 21 हज़ार करोड़ रूपया बकाया था, हमने इस काम को हाथ में लिया, योजनाएं बनाईं, चीनी मीलों, गन्ना किसानों और बैंक वालों से बात की और आज मैं बड़े संतोष से कहता हूँ कि इतने कम समय में और सूखा होने के बावजूद 21 हज़ार करोड़ रूपया में सिर्फ़ 1800 करोड़ रूपया बकाया बच गया है। मेरा ट्रैक रिकॉर्ड कहता है कि अगर किसान किसी पर भरोसा कर सकता है तो दिल्ली में बैठी सरकार पर भरोसा कर सकता है।

मैं किसानों के लिए आया हूँ, उनके जीवन में बदलाव लाने के लिए आया हूँ। मुझे गांवों में, किसानों और गरीबों के जीवन में बदलाव लाना है। मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूँ कि आपकी कृपा और आशीर्वाद से हम और अच्छा काम करेंगे। सब पूरी ताकत के साथ बोलिये – जय जवान, जय किसान!
बहुत-बहुत धन्यवाद।

Explore More
ଶ୍ରୀରାମ ଜନ୍ମଭୂମି ମନ୍ଦିର ଧ୍ଵଜାରୋହଣ ସମାରୋହରେ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ଅଭିଭାଷଣ

ଲୋକପ୍ରିୟ ଅଭିଭାଷଣ

ଶ୍ରୀରାମ ଜନ୍ମଭୂମି ମନ୍ଦିର ଧ୍ଵଜାରୋହଣ ସମାରୋହରେ ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ଅଭିଭାଷଣ
Ayushman Bharat Crosses 90 Cr ABHA Accounts: How Modi govt is building the world’s largest digital health ecosystem

Media Coverage

Ayushman Bharat Crosses 90 Cr ABHA Accounts: How Modi govt is building the world’s largest digital health ecosystem
NM on the go

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
In the National Senior Athletics Federation Competition held in Ranchi, Jharkhand, four national records were broken in four different events: PM Modi
My dear countrymen, it is very hot in most parts of the country right now. Strong sun, hot winds, it is very important to take care of yourself in such weather: PM Modi
Sattu sherbet in Bihar, Jharkhand and Eastern Uttar Pradesh is simply amazing – it fills the stomach and provides strength: PM Modi
Service doesn't require vast resources - what's needed is a good intent and consistent effort: PM Modi
In a special ceremony held in the Netherlands, ancient copper plates from the Chola period were returned to India: PM Modi
Astronomy has aroused curiosity in every generation in our country. It has inspired exploration; a lot of enthusiasm is visible in today’s youth: PM Modi
Dolphin rescue ambulance has been designed like a mobile hospital. It has arrangements for keeping the dolphin safe: PM Modi
Friends, when we save the Gangetic dolphin, we don't just save a species; we save the biodiversity of the Ganga: PM Modi
Girija Amma ji’s patriotic spirit inspires every Indian. Inspired by 'Mann Ki Baat', she pledged to contribute to many soldiers in the country: PM Modi

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ, ନମସ୍କାର ।

‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ରେ ପୁଣିଥରେ ଆପଣମାନଙ୍କ ସହ ଯୋଡ଼ିହୋଇ ମୋତେ ବହୁତ ଖୁସି ଲାଗୁଛି । ଦେଶର ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ଅଞ୍ଚଳରେ ଆମ ଦେଶର ଲୋକେ ଦେଶ ହିତ, ସମାଜର ହିତ ପାଇଁ ଏଭଳି ଚମତ୍କାର କରୁଛନ୍ତି ଯେ ସେମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ଶୁଣିଲେ ଆମକୁ ନୂତନ ପ୍ରେରଣା ମିଳୁଛି । ଆଜିର କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମର ଆରମ୍ଭ ମୁଁ ଆଥଲେଟିକ୍ସରେ ଦେଶର ଏଭଳି ଗୋଟିଏ ଉପଲବ୍ଧିରୁ କରୁଛି । କିଛିଦିନ ପୂର୍ବେ ଝାଡ଼ଖଣ୍ଡର ରାଞ୍ଚିରେ ଜାତୀୟ ସିନିୟର ଆଥଲେଟିକ୍ସ ଫେଡେରେସନ ପ୍ରତିଯୋଗିତା ଅନୁଷ୍ଠିତ ହୋଇଥିଲା । ଏଥିରେ ସମଗ୍ର ଦେଶରୁ ଆସିଥିବା ପ୍ରାୟ ୮୦୦ ଖେଳାଳି ଅଂଶଗ୍ରହଣ କରିଥିଲେ । ଏଥିରେ ଚାରୋଟି ଭିନ୍ନ ଇଭେଣ୍ଟରେ ଚାରୋଟି ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡ ଭଙ୍ଗ ହେଲା । ଗୁରିନ୍ଦରବୀର ସିଂ, ବିଶାଳ ଟିକେ, ତେଜସ୍ୱୀନ ଶଙ୍କର, ଦେବ୍ ମୀଣା ଏବଂ କୂଲଦୀପ କୁମାର । ଏହି ବନ୍ଧୁମାନେ ବିଭିନ୍ନ ଶ୍ରେଣୀରେ ନୂତନ ରେକର୍ଡ ସୃଷ୍ଟି କଲେ । ସର୍ବପ୍ରଥମେ ମୁଁ ଏମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଅନେକ ଅନେକ ଅଭିନନ୍ଦନ ଜଣାଉଛି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗୋଟିଏ ଘଟଣା, ଯାହା ସାରାଦେଶରେ ଚର୍ଚ୍ଚିତ ହୋଇଛି ତାହା ହେଉଛି ୧୦୦ ମିଟର ରେସ୍ । ୧୦୦ ମିଟର ଦୌଡ଼ ପ୍ରତିଯୋଗିତା । ମାତ୍ର ଦୁଇଦିନ ମଧ୍ୟରେ ପୁରୁଷ ୧୦୦ ମିଟର ଦୌଡ଼ ପ୍ରତିଯୋଗିତାରେ ତିନିଥର ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡ ଭଙ୍ଗ ହେଲା । ଯେଉଁ ଦୁଇ କ୍ରୀଡ଼ାବିତ୍ ଏହି ଚମତ୍କାର କରି ଦେଖାଇଲେ ସେମାନେ ହେଉଛନ୍ତି ଗୁରିନ୍ଦରବୀର୍ ସିଂ ଏବଂ ଅନିମେଷ କୁଜୁର । ମୁଁ ଭାବିଲି, ଏଥର ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ରେ ଏହି ଦୁଇ ଖେଳାଳିଙ୍କ ସହ କଥା ହେବା ।

(ଫୋନ୍ କଲ୍)

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ: ଅନିମେଷ ଜୀ ନମସ୍କାର । ଗୁରୀନ୍ଦରବୀର ଆପଣଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ନମସ୍କାର । ସତଶ୍ରୀ ଅକାଲ୍ ।

ଅନିମେଷ, ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ନମସ୍କାର ସାର, ନମସ୍କାର ସାର ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଆଚ୍ଛା ଭାଇ ଆପଣମାନେ ତ ବହୁତ ବଡ଼ ଉପଲବଧି ହାସଲ କରିଛନ୍ତି । ଆପଣଙ୍କ ଯୋଡ଼ି ଖୁବ୍ ଚମତ୍କାର ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିଛି । ଆମେ ସଙ୍ଗୀତରେ ତ ଯୁଗଳବନ୍ଦୀ ଦେଖିଥିଲୁ କିନ୍ତୁ ଏବେ ତ ଆହ୍ୱାନରେ ଯୁଗଳବନ୍ଦୀ ହେଉଛି । ଜଣେ ଗୋଟିଏ ଆହ୍ୱାନ ଦେଉଛି, ଅନ୍ୟ ଜଣକ ଏହାକୁ ଗ୍ରହଣ କରୁଛି । ପୁଣି ତୃତୀୟ ଥର ହେଉଛି । ଆପଣଙ୍କ ବିଷୟଟି ଖୁବ୍ କୌତୁହଳପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା । ମୁଁ ଚାହୁଁଛି ଯେ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ର ଶ୍ରୋତାମାନେ ଆପଣମାନଙ୍କ ବିଷୟରେ ଜାଣନ୍ତୁ । ଆପଣମାନେ କରିଦେଖାଇଥିବା ପରାକ୍ରମ ସମ୍ପର୍କରେ ଜାଣନ୍ତୁ ।

ଅନିମେଷ : ସାର ନମସ୍କାର । ମୋ ନାଁ ଅନିମେଷ କୁଜୁର୍ । ମୁଁ ୨୦୦ ମିଟର ଓ ୪୦୦ ମିଟରର ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡଧାରୀ ଏବଂ ମୁଁ ଛତିଶଗଡ଼ର ବାସିନ୍ଦା ଆଉ ଏବେ ମୁଁ ଓଡ଼ିଶା ତରଫରୁ ଖେଳୁଛି । ଗତବର୍ଷ ମୁଁ ଏସୀୟ ପଦକ ଆଉ ବିଶ୍ୱ ବିଶ୍ୱବିଦ୍ୟାଳୟ ଖେଳ ପଦକ ପାଇଥିଲି ଆଉ ସ୍କୁଲ ଛାଡ଼ିବା ପରେ ୨୦୨୧ରେ ମୁଁ ଆଥଲେଟିକ୍ସ ଆରମ୍ଭ କରିଥିଲି ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ସ୍କୁଲରୁ ପାସ୍ କରିଥିଲି । ମୁଁ ସୈନିକ ସ୍କୁଲ ଅମ୍ବିକାପୁରରୁ ପାସ୍ କରିଛି ଆଉ ଆଗରୁ ମୁଁ ଫୁଟବଲ ଖେଳୁଥିଲି । ମୋ ବାପା ମା’ କୋଭିଡ୍ ସମୟରେ ମୋତେ ଖେଳକୁଦ ପାଇଁ ଟିକିଏ ଅନୁମତି ଦେଉଥିଲେ କି ମୁଁ ଟିକେ ବାହାରେ ଯାଇ ଖେଳାବୁଲା କରିବି । କୋଭିଡ୍ ସରିବା ପରେ ମୋ ସହିତ ଫୁଟବଲ୍ ଖେଳୁଥିବା ସାଙ୍ଗମାନେ ମୋତେ କହିଲେ ଯେ, “ରାଜ୍ୟ ସମ୍ମିଳନୀ ହେଉଛି, ତୁ ସେଥିରେ ଅଂଶଗ୍ରହଣ କର” ଆଉ ମୁଁ ସେଥିରେ ଅଂଶଗ୍ରହଣ କଲି, କିନ୍ତୁ ସେଠି ଜାତୀୟ ସ୍ତର ପାଇଁ ଚୟନ ହେବ ସେକଥା ମୁଁ ଜାଣିନଥିଲି । ସେଠୁ ମୁଁ ଜାତୀୟକୁ ସିଲେକ୍ଟ ହେଲି ଆଉ ଆଜି ମୁଁ ଆନ୍ତର୍ଜାତିକ ସ୍ତରରେ ଭାରତର ପ୍ରତିନିଧିତ୍ୱ କରୁଛି ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଆଉ ଗୁରିନ୍ଦରବୀର ଜୀ ? ଆପଣଙ୍କ ଖବର କ’ଣ ?

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ନମସ୍କାର ସାର୍ । ମୋ ନାଁ ଗୁରିନ୍ଦରବୀର ଆଉ ମୁଁ ଭାରତୀୟ ନୌସେନାର ଜଣେ Patty Officer। ମୁଁ ଭାରତର ସବୁଠାରୁ ଦ୍ରୁତ ସ୍ପ୍ରିଣ୍ଟର । ଏଥର ମୁଁ ୧୦୦ ମିଟରରେ ୧୦.୦୯ର ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡ ସୃଷ୍ଟି କରିଛି । ୧୦.୧୦ର ସୀମା ତଳକୁ ଯିବାରେ ମୁଁ ପ୍ରଥମ ଭାରତୀୟ । ମୁଁ ଉଭୟ ଟ୍ରାକ୍ ଓ ୟୁନିଫର୍ମରେ ନିଜ ଦେଶର ସେବା କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରୁଛି । ମୋ ବାପା ଓ ଜେଜେବାପା ଦୁହେଁ ଖେଳାଳି ଥିଲେ । ଆମ ଭାରତୀୟ ସଂସ୍କୃତିରେ ପର୍ବପର୍ବାଣୀ ଯେମିତିକି ଦୀପାବଳୀ, ନୂଆବର୍ଷ ଆଦି ସମୟରେ ଆମେ ନିଜ ଘରକୁ ସଫାସୁତୁରା କରିଥାଉ । ତେଣୁ ଯେତେବେଳେ ମୋ ବାପାଙ୍କ ଟ୍ରଫି ଓ ମେଡ଼ାଲଗୁଡ଼ିକ ମୁଁ ସଫା କରୁଥିଲି ମୋତେ ବହୁତ ଭଲ ଲାଗୁଥିଲା । ମୁଁ ବହୁତ ଖୁସି ହେଉଥିଲି । ଯେତେବେଳେ ମୁଁ କୌଣସି ଟ୍ରଫି ବା ମେଡାଲ ସଫା କରୁଥିଲି କିମ୍ବା କୌଣସି ଫଟୋ ଦେଖୁଥିଲି ତାହା ବିଷୟରେ ମୁଁ ବାପାଙ୍କୁ ପଚାରୁଥିଲି ସେତେବେଳେ ସେ ତାଙ୍କ କାହାଣୀ ଶୁଣାଉଥିଲେ । “ମୁଁ ସେଠିକି ଖେଳିବାକୁ ଯାଇଥିଲି । ସେଇଠି ମୁଁ ଏହି ଜାତୀୟ ପଦକ ପାଇଲି, ଏଥିରେ ମୁଁ ମୋ ଦଳକୁ ଜିତାଇଥିଲି ।” ସେତେବେଳେ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ କହୁଥିଲି ଯେ ମୁଁ ବି କିଛି ଗୋଟେ ଖେଳ ଖେଳିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ସେ ସକାଳୁ ସକାଳୁ ଦୌଡ଼ିବାକୁ ଯାଉଥିଲେ । ମୋତେ ତାଙ୍କ ସାଙ୍ଗରେ ନେଇଯିବାକୁ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ କହିଲି । ସେ ମୋତେ ବି ସାଙ୍ଗରେ ନେବା ଆରମ୍ଭ କରିଦେଲେ । ଖେଳ ବିଷୟରେ ସେ ଯାହାସବୁ ଶିଖିଥିଲେ ସେସବୁ ସେ ମୋତେ ଶିଖାଇବାକୁ ଲାଗିଲେ । ତେଣୁ ମୋର ଆଗ୍ରହ ବଢ଼ିଚାଲିଲା । ମୁଁ ଉସେନ ବୋଲ୍ଟଙ୍କର ବିଶ୍ୱରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିବା ଦେଖିଲି । ଗୋଟିଏ କୌତୁକିଆ କାହାଣୀ ରହିଛି । ଥରେ ମୁଁ ଟିଭି ଦେଖୁଥିଲି, ମା’ ଟିଭି ବନ୍ଦ କରି କହିଲେ “ପୁଅ, ପାଠ ପଢ଼ିବା ସମୟ ହେଲାଣି, ତୁ ପାଠ ପଢ଼ ।” ସେତେବେଳେ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ କହିଥିଲି ଯେ ଆପଣ ସିନା ମୋତେ ଟିଭି ଦେଖିବାକୁ ଦେଉନାହାଁନ୍ତି କିନ୍ତୁ ଦିନେ ଆପଣ ଟିଭିରେ ମୋତେ ଖୋଜି କହିବେ ହେଇ ଦେଖ ଗୁରିନ୍ଦର ଦୌଡ଼ୁଛି । ତେଣୁ ମୋ ମା’ ଯେତେବେଳେ ଟିଭି ପରଦାରେ ମୋତେ ଦୌଡ଼ୁଥିବା ଦେଖନ୍ତି ସେତେବେଳେ ମୋତେ ମଧ୍ୟ ଖୁସି ଲାଗେ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ବାଃ ବାଃ ବାଃ । ଆପଣଙ୍କ କଥା ତ ବଡ଼ ଚମତ୍କାର!

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ହଁ ସାର୍ । ଆମର ହେଉଛି ଏକ ମଧ୍ୟବିତ୍ତ ପରିବାର, ମୋ ବାପା ଭଲିବଲ ଖେଳୁଥିଲେ ହେଲେ ଘରର ସମସ୍ୟାଗୁଡ଼ିକ ଯୋଗୁଁ ସେ ନିଜର ଖେଳାଖେଳି ଛାଡ଼ିଦେଲେ । ତାଙ୍କ ସ୍ୱପ୍ନ ଅସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ରହିଗଲା । ତେଣୁ ସେ ମୋ ଭିତରେ ସେହି ସ୍ୱପ୍ନ ଦେଖିଲେ ଯେ, ସେହି ସ୍ୱପ୍ନକୁ ମୋ ପୁଅ ପୂରଣ କରିବ । ମୁଁ ତାଙ୍କ ସହିତ ଅନେକ ଥର କଥା ହୋଇଥିଲି । ତାଙ୍କଠୁ ଶୁଣୁଥିଲି ମିଲଖା ସିଂ କେତେ ପରିଶ୍ରମ କରୁଥିଲେ, ମୁଁ ତାଙ୍କୁ କହୁଥିଲି ଯେ ଦିନେ ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ସ୍ୱପ୍ନକୁ ପୂରଣ କରିବି । ସେତେବେଳେ ସେ କହୁଥିଲେ ଯେ ସ୍ୱପ୍ନ ସେମିତି ପୂରଣ ହୋଇଯାଏନି, ତାହାପାଇଁ କଠିନ ପରିଶ୍ରମ କରିବାକୁ ପଡିଥାଏ । ମିଲଖା ସିଂ ଜୀ ରକ୍ତବାନ୍ତି କରୁଥିଲେ, ଖରାରେ ଦୌଡ଼ୁଥିଲେ । ଦିନସାରା ତାଲିମ ନେଉଥିଲେ । ଏହି କଥାଗୁଡ଼ିକ ମୋତେ ପ୍ରେରିତ କରୁଥିଲା । ମୋ ବାପା ମୋତେ ପ୍ରେରଣା ଦେଉଥିଲେ ଯେ, ଏହାଦ୍ୱାରା ମୁଁ ମୋ ଦେଶ ପାଇଁ ପଦକ ଆଣିପାରିବି । ଆଉ ପୁଣି ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ୧୦୦ ମିଟର ରେସକୁ ନିଜ ଇଭେଣ୍ଟ ଭାବେ ଚୟନ କଲି ସେତେବେଳେ ସମସ୍ତେ ମୋତେ ସେଥିପାଇଁ ମନା କରି କହିଥିଲେ ଯେ ୧୦୦ ମିଟର ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଇଭେଣ୍ଟ ନୁହେଁ । ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଶରୀର ୧୦୦ ମିଟର ପାଇଁ ତିଆରି ହୋଇନାହିଁ । ସେତେବେଳେ ମୁଁ ଆଉ ମୋ ବାପା କହୁଥିଲୁ ଯେ, ଏବେ ଗୁରିନ୍ଦର ଆଉ ମୁଁ ଏହାକୁ ବାଛିଛୁ ଆଉ ଏଥିରେ ପଛଘୁଞ୍ଚା ଦେବାର ନାହିଁ । ଆମେ ଯାହାକୁ ଅସମ୍ଭବ ବୋଲି ଭାବୁଛୁ ତାହା ଆମେ କରି ଦେଖାଇବୁ । ବାପା କହୁଥିଲେ ଯେ ତୁ ଏହା କରି ଦେଖାଇବୁ, ତୋ ଉପରେ ମୋର ବିଶ୍ୱାସ ରହିଛି । ବାପା ଯେତେବେଳେ ମୋ ଉପରେ ବିଶ୍ୱାସ କଲେ ତାଙ୍କର ସେହି ବିଶ୍ୱାସକୁ ମୁଁ ନିଜର ସାହସରେ ପରିଣତ କରିଦେଲି । ଆଉ ଆଜି ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାରତୀୟ କହୁଛି ଯେ ଭାରତୀୟମାନେ ମଧ୍ୟ ସ୍ପ୍ରିଣ୍ଟ କରନ୍ତୁ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଦେଖନ୍ତୁ, ଆପଣ ଦୁହେଁ ଖୁବ୍ ଚମତ୍କାର ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିଛନ୍ତି ଆଉ ମାତ୍ର ଦୁଇଦିନ ମଧ୍ୟରେ ଆପଣ ଦୁହେଁ ତିନିଥର ଜାତୀୟ ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିଛନ୍ତି । ୧୦୦ ମିଟର ରେସରେ ଦୌଡ଼ିବା, ଯାହା ଗୁରିନ୍ଦରବୀର କହିଲେ ଯେ ଲୋକେ କହନ୍ତି ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଶରୀର ଏଥିପାଇଁ ଗଢ଼ା ହୋଇନାହିଁ । ଏତେ କଷ୍ଟ ହୋଇଥିବା ସତ୍ତ୍ୱେ ଆପଣ ଏହି କାମ କରି ଦେଖାଇଲେ । ଆପଣ ଦୁଇଜଣଙ୍କଠାରୁ ମୁଁ ଜାଣିବାକୁ ଚାହୁଁଛି, ଆଉ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ର ଶ୍ରୋତାମାନେ ମଧ୍ୟ ଶୁଣିବାକୁ ଚାହିଁବେ ଯେ, ଏହା କିଭଳି ଉତ୍ସାହ ଥିଲା, କ’ଣ ଜିଦ୍ଦି ଥିଲା, କ’ଣ ଭାବିଥିଲେ, ଆଉ କ’ଣ କରୁଥିଲେ? ଏହା କେତେ କଷ୍ଟ?

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ଆଜ୍ଞା, ମୁଁ ଗୁରିନ୍ଦର, ଆରମ୍ଭରେ ଏହା ଖୁବ୍ ସଂଘର୍ଷପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା । ମୁଁ ଠିକ୍ କରୁଛି କି ନାହିଁ ସେ ବିଷୟରେ ବହୁତ ଥର ସନ୍ଦେହ ମଧ୍ୟ ହେଲା । ମୁଁ ଠିକ୍ ଜିନିଷକୁ ବାଛିଲି କାରଣ ସବୁବେଳେ ଆପଣ ଜିଣିନଥାନ୍ତି, ବେଳେବେଳେ ଆପଣ ଶିଖିଥାନ୍ତି । ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ହାରୁଥିଲି, ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ଠିକ୍ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିପାରୁନଥିଲି, କୌଣସି ଆଘାତ ଲାଗୁଥିଲା ସେତେବେଳେ ମୋ ଘର ଲୋକେ ମୋତେ ସହଯୋଗ କରି କହୁଥିଲେ ଯେ ଦିନେଅଧେ ବେଳ ଖରାପ ପଡ଼ିଲା କିମ୍ବା ବର୍ଷେ ଖରାପ ପଡ଼ିଲା ସେଥିରେ ସାରାଜୀବନ ନଷ୍ଟ ହୋଇଯାଏ ନାହିଁ । ସ୍ୱପ୍ନ ଦେଖିବା ବନ୍ଦ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ । ମୋ କୋଚ୍ ବି ମୋତେ ଏହି କଥା କହିଲେ ଯେ ଯଦି ତୁ ନ କରିପାରିବୁ ତାହାଲେ ଆଉ କେହି ପାରିବ ନାହିଁ । ତେଣୁ ଯେତେବେଳେ ଆମ ନିଜ ଲୋକ, ଆମ ଆଖପାଖର ଲୋକ ଆମକୁ ଉତ୍ସାହିତ କରନ୍ତି ତେବେ ମନୋବଳ କେବେହେଲେ ଭାଙ୍ଗେନାହିଁ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଅନିମେଷ ଜୀ ...

ଅନିମେଷ : ସାର, ୨୦୨୧ରେ ଯେତେବେଳେ ମୁଁ ଆଥଲେଟିକ୍ସ ଆରମ୍ଭ କଲି ମୋତେ ତ ଲୋକେ କହୁଥିଲେ ଯେ, ଦେଖ୍ ଇଏ ଗୋଟିଏ ନୂଆ କ୍ଷେତ୍ର ତୁ କରିପାରିବୁ କି ନାହିଁ? ସେତେବେଳେ ମୁଁ କହୁଥିଲି ଯେ ଯଦି ଏ କ୍ଷେତ୍ରକୁ ବାଛିଛି ତାହାଲେ ଯେମିତି ହେଲେ ବି କରିବି । ମୋ ବାପା ମଧ୍ୟ କହୁଥିଲେ ଯେ ତୁ ଏହି କ୍ଷେତ୍ରରେ ପ୍ରବେଶ କରିଛୁ ତେଣୁ କେବେହେଲେ ପଛକୁ ଚାହିଁବୁ ନାହିଁ । କାରଣ ଅନେକ ଲୋକ ବହୁତ କଥା କରିବା ଭାବନ୍ତି କିନ୍ତୁ ବହୁତ କମ ଲୋକ କରିଦେଖାନ୍ତି । ତୁ ଏ କ୍ଷେତ୍ରରେ ପ୍ରବେଶ କରିଛୁ ତେବେ ଏଥିରେ ଦୃଢ଼ ହୋଇ ରହିବୁ, ଏଥିରେ ଆଗେଇ ଚାଲିବୁ । ତୋତେ ଆମେ ପରିବାର ତରଫରୁ ଆର୍ଥିକ ଆଉ ଅନ୍ୟ ସବୁ ପ୍ରକାର ସହଯୋଗ ଓ ସୁବିଧାସୁଯୋଗ ଯୋଗାଇବୁ, କେବଳ ତୁ ପରିଶ୍ରମ କର ଆଉ ଭାରତକୁ ଦେଖାଇଦେ ଯେ ଭାରତୀୟମାନେ ମଧ୍ୟ ଦୌଡ଼ିପାରନ୍ତି କାରଣ ମୋତେ ବି ଲୋକେ କହୁଥିଲେ ଯେ ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ଜିନ୍ ୧୦ କିମ୍ବା ୧୦.୧ରୁ କମ୍ ଦୌଡ଼ିବା କିମ୍ବା ସ୍ପ୍ରିଣ୍ଟ କରିବା ପାଇଁ ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ କିନ୍ତୁ ଏବେ ଆମେ ଦୁହେଁ ପ୍ରମାଣିତ କରିଦେଇଛୁ ଯେ ଭାରତୀୟମାନେ ମଧ୍ୟ ଏହା କରିପାରନ୍ତି । ଆମପାଇଁ କୌଣସି କାର୍ଯ୍ୟ କଠିନ ନୁହେଁ । ଆମେ ସବୁକିଛି କରିପାରୁ । ତେଣୁ ସାର୍ ଏହି ସବୁକଥା ମୋତେ ବହୁତ ପ୍ରେରଣା ଯୋଗାଇଥାଏ ଆଉ ଆମେ ଯେମିତି ତାଲିମ ଗ୍ରହଣ କରିଚାଲିଛୁ ଆଉ ସମୟ ଭଙ୍ଗ କରିଚାଲିଛୁ ଏହାଦେଖି ଅନ୍ୟମାନେ ଅନୁଭବ କରୁଛନ୍ତି ଯେ ଭାରତୀୟମାନେ ମଧ୍ୟ ଏହା କରିପାରନ୍ତି । ଆମେ ଆହୁରି ପରିଶ୍ରମ କରିବା । ଏବେ ଆମ ଦୁହିଁଙ୍କ ଚୟନ ରାଜ୍ୟଗୋଷ୍ଠୀ ଖେଳ ପାଇଁ ହୋଇଛି । ସେଠାରେ ହେବାକୁ ଥିବା ପ୍ରତିଯୋଗିତାରେ ଆମେ ଆହୁରି ଭଲ ପ୍ରଦର୍ଶନ କରିବୁ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଠିକ୍ ଅଛି, ଶୁଣ । ମୋ ମନରେ ବି କୌତୁହଳ ରହିଛି । ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ମନରେ ବି ଥିବ । ମୁଁ ଶୁଣିଛି ଆପଣ ଦୁହେଁ ଖୁବ୍ ଭଲ ସାଙ୍ଗ । ଆପଣ ଉଭୟ ପ୍ରତିଜ୍ଞା କରିଛନ୍ତି ଯେ ଯଦି ତୁ ମୋ ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିବୁ ତେବେ ମୁଁ ବି ତୋ ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିବି । କଥା କ’ଣ, ପ୍ରଥମେ ଅନିମେଷ କୁହନ୍ତୁ ।

ଅନିମେଷ : ସାର୍, ପ୍ରଥମ ୧୦.୧୮ ରେକର୍ଡ ଥିଲା ଯାହା ମୁଁ ହିଁ କରିଥିଲି । ଏବଂ ତା’ପରେ ସେମି-ଫାଇନାଲ୍ରେ ଗୁରିନ୍ଦରବୀର ଭାଇ ୧୦.୧୭ କରି ତାହାକୁ ଭାଙ୍ଗିଥିଲେ । ତା’ପରେ ପୁଣିଥରେ ସେମି-ଫାଇନାଲ୍-୨ରେ ୧୦.୧୫ କରି ମୁଁ ତାଙ୍କର ସେହି ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିଲି । ତା’ପରେ ଯେତେବେଳେ ସେମି-ଫାଇନାଲ୍ ହେଲା ସେତେବେଳେ ଆମେ ଦୁହେଁ ଖୁସି ଥିଲୁ । ଯାହାହେଉ ଠିକ୍ ଅଛି, ଆଜି ରେକର୍ଡ ଭାଙ୍ଗିଲା ଏବଂ ଆମେ ଦୁହେଁ ଏହା ଭାଙ୍ଗିଲୁ । ପ୍ରତିଯୋଗିତା ସମୟରେ ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦିତା ରହେ କିନ୍ତୁ ପ୍ରତିଜ୍ଞା ଆମେ ବହୁପୂର୍ବରୁ କରିଥିଲୁ । ଏହାପୂର୍ବରୁ ଆମେ ପ୍ରତିଯୋଗିତା ପାଇଁ ସାଉଦି ଆରବ ଯାଇଥିଲୁ । ସେଠି ବି ଆମେ ଦୁହେଁ ରୁମମେଟ୍ ଥିଲୁ । ସେଠି ବି ଆମେ ଦୁହେଁ କଥାହେଉଥିଲୁ ଯେ ଇଣ୍ଡିଆର ସ୍ପ୍ରିଣ୍ଟିଂକୁ ବହୁ ଆଗକୁ ନେବାର ଅଛି ଏବଂ ଏସବୁ ଜିନିଷ ଆମ ହାତରେ ହିଁ ଅଛି । ଆମେ ଯାହା କରିବା ତାହା ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ପ୍ରେରଣା କରିବ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଗୁରିନ୍ଦରବୀର କିଛି କହିବେ ?

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର : ଆମେ ଦୁହେଁ ନିଷ୍ପତ୍ତି କରିଥିଲୁ ଯେ ଆମେ ଖୁବ୍ ଭଲ ଦୌଡ଼ିବୁ । ସାର୍ ଯେତେବେଳେ ବି ଜଣଙ୍କୁ ଅନ୍ୟ ଜଣଙ୍କର ସାହାଯ୍ୟ ଆବଶ୍ୟକ ହୁଏ ସେତେବେଳେ ଆମେ ପରସ୍ପର ସହ ଛିଡ଼ାହେଉ । ଯେମିତିକି ଏବେ ରେକର୍ଡ କରିବା ପୂର୍ବରୁ ପ୍ରଥମେ ମୁଁ ରେକର୍ଡ କଲି, ତା’ପରେ ଅନିମେଷ କହିଲେ । ଯେତେବେଳେ ଆମେ ୱାର୍ମ-ଅପ୍ କରୁଥିଲୁ ସେତେବେଳେ ମୁଁ ଅନିମେଷକୁ ବତାଉଥିଲି, ଅନିମେଷ, ଏବେ ସେହି ବ୍ଲକଟି ଠିକ୍ ଅଛି । ସେଇଠି ଯାଇ ବସ । ସେଠାରେ ଯାଇ ଷ୍ଟ୍ରାଇଡ୍ କର । ଆମେ ଦୁହେଁ ଏଠାରେ ୱାର୍ମ-ଅପ୍ କରିବା । ଏଠାରେ ୱାର୍ମ-ଅପ୍ ଠିକ୍ ହେବ । ତେବେ ଜଣେ ଅନ୍ୟଜଣକୁ ସାହାଯ୍ୟ କରିବ । ପରସ୍ପରକୁ ସାହାଯ୍ୟ କଲେ, ଜଣେ ଉନ୍ନତ କଲେ ଅନ୍ୟଜଣେ ମଧ୍ୟ ଉନ୍ନତ କରିଥାନ୍ତି । ହଁ, ସାଙ୍ଗ ବି ଦରକାର । କିନ୍ତୁ ସାର୍ ଆମେ ଯେତେବେଳେ ଗ୍ରାଉଣ୍ଡ ବାହାରେ ଥାଉ, ପ୍ରତିଯୋଗିତାରୁ ବାହାରେ ଥାଉ ସେତେବେଳେ ଆମେ ସାଙ୍ଗ । ଯେତେବେଳେ ଆମେ ଗ୍ରାଉଣ୍ଡ ଭିତରକୁ ଯାଉ ସେତେବେଳେ ଆମେ ପରସ୍ପରର ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦୀ ହୋଇଯାଉ । ସେତେବେଳେ ଭାବୁ ଯେ ମୁଁ ତା’ଠାରୁ ଦୃତବେଗରେ ଦୌଡ଼ିବି, ମୁଁ ତା’ଠାରୁ ଦୃତବେଗରେ ଦୌଡ଼ିବି ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ଦେଖନ୍ତୁ ଆପଣ ଦୁହେଁ ଯେଉଁ ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦିତା କରିଛନ୍ତି ତାହା ଦେଶର ସମ୍ମାନ ବଢ଼ାଇବା ପାଇଁ କରିଛନ୍ତି । ଭବିଷ୍ୟତରେ ଦେଶକୁ ସେହି ଜାଗାରେ ପହଞ୍ଚାଇବା ପାଇଁ କରିଛନ୍ତି । ଆଉ ଏକ ସକାରାତ୍ମକ ସ୍ପିରିଟ୍ ସହ କରିଛନ୍ତି । ମୋ ମତରେ ଆପଣଙ୍କର ଏ ଯେଉଁ ସ୍ପୋର୍ଟସମ୍ୟାନ ସ୍ପିରିଟ୍ ଅଛି, ଖେଳିବା ହେଉ, ପରସ୍ପରକୁ ଚୁନୌତି ଦେବା ହେଉ, ଆଉ ପୁଣି ଆଗକୁ ବଢ଼ିବାର ପ୍ରୟାସ ହେଉ, ଅବା ଆଗକୁ ଯିବାପାଇଁ ପରସ୍ପରକୁ ସାହାଯ୍ୟ କରିବା ହେଉ, ସତରେ ଆପଣମାନେ ଅଦ୍ଭୁତ କାମ କରିଛନ୍ତି । ମୋ ତରଫରୁ ଅନେକ ଅନେକ ଅଭିନନ୍ଦନ, ବହୁତ ବହୁତ ଶୁଭକାମନା। ମୋର ପୂର୍ଣ୍ଣ ବିଶ୍ୱାସ ଆପଣ ଦୁହେଁ ଦେଶର ନାଁ ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ କରିବେ । ଆପଣ ଏପରି ପରିଶ୍ରମ କରିଚାଲନ୍ତୁ । ବହୁତ ଉନ୍ନତି କରିବେ । ମୋର ଅନେକ ଅନେକ ଶୁଭେଚ୍ଛା।

ଗୁରିନ୍ଦରବୀର

ଅନିମେଷ : ଧନ୍ୟବାଦ ସାର୍, ଆପଣଙ୍କୁ ଧନ୍ୟବାଦ ।

ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ : ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ,

ସମ୍ପ୍ରତି ଦେଶର ଅଧିକାଂଶ ଭାଗରେ ବହୁତ ଗ୍ରୀଷ୍ମପ୍ରବାହ ହେଉଛି । ପ୍ରଚଣ୍ଡ ଖରା, ଗରମ ପବନ ଏପରି ପାଣିପାଗରେ ନିଜର ଧ୍ୟାନ ରଖିବା ଖୁବ୍ ଜରୁରୀ । ପାଣି ପିଅନ୍ତୁ । ଖରାରେ ଯଦି ଯିବାର ହୁଏ ତେବେ ଦେଖିଚାହିଁ ବାହାରନ୍ତୁ । ଖରାକୁ ଆଖି ଆଗରେ ରଖି ସରକାରଙ୍କର ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ବିଭାଗର ଯେଉଁ ମାର୍ଗଦର୍ଶିକା ଜାରି କରିଛନ୍ତି ତାକୁ ଆଦୌ ଭୁଲନ୍ତୁ ନାହିଁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଆମର ଏଠି ଗରମ ସହ ଲଢ଼ିବାର ଉପାୟ ଅନେକ ଥର ରୋଷେଇରେ ବି ମିଳିଥାଏ । ଆପଣମାନେ ଦେଖିଥିବେ ଯେମିତି ଗରମ ବଢ଼ି ବଢ଼ି ଚାଲେ, ସେମିତି ଘରର ରୋଷେଇର ସ୍ୱାଦ ମଧ୍ୟ ବଦଳିଯାଏ । ରୋଷେଇର ପ୍ରକାର ମଧ୍ୟ ବଦଳିଯାଏ । କେଉଁଠି ମାଠିଆରୁ ପାଣି ଆସେ, କେଉଁଠି ଦହି ବସାହୁଏ, ଆଉ କେଉଁଠି କଞ୍ଚା ଆମ୍ବକୁ ଶିଝାଯାଏ - ଆଉ ତା’ପରେ ଆରମ୍ଭ ହୁଏ ଦେଶୀ ପାନୀୟର ସମୟ । ଦେଶୀ ପାନୀୟ ସହ ଆପଣମାନେ ବି ପରିଚିତ । ଯଦି ଆପଣ ଉତ୍ତର-ଭାରତ ଯିବେ ତେବେ ଆପଣଙ୍କୁ ଅନେକ ସ୍ଥାନରେ ଆମ୍ବପଣା, କଞ୍ଚା ଆମ୍ବର ସ୍ୱାଦ ମିଳିବ ଏବଂ ଏହାଛଡ଼ା ଗରମରୁ ନିସ୍ତାର ମଧ୍ୟ ମିଳିବ । ପଞ୍ଜାବ-ହରିୟାଣା ଗଲେ ଲସି ପାଇବେ । ବଡ଼ ବଡ଼ ଗିଲାସବାଲା ଲସି । ରାଜସ୍ଥାନ ଓ ଗୁଜରାଟରେ ଘୋଳଦହି ସତେଯେମିତି ସବୁ ଭୋଜନର ସାଥୀ ହୋଇଯାଏ । ବିହାର, ଝାଡ଼ଖଣ୍ଡ ଓ ପୂର୍ବ ଉତ୍ତରପ୍ରଦେଶରେ ସତ୍ତୁ ସରବତ – ତା’ କଥା ତ ନିଆରା – ପେଟ ପୁରିବ, ବଳ ବି ଦେବ । କୋଙ୍କଣ ଓ ଗୋଆରେ କୋକମ ସରବତ, ସୋଲ କଢ଼ି । ଦକ୍ଷିଣ ଭାରତରେ ପାନକମ, ନୀର ମୋର, ସାମ୍ବରମ୍ ଓ ଓଡ଼ିଶାରେ ବେଲପଣା । ଏସବୁ କେବଳ ପାନୀୟ ନୁହେଁ, ଏହା ହେଉଛି ଭାରତର ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ଅଞ୍ଚଳର ପରମ୍ପରାର ଅଂଶବିଶେଷ ମଧ୍ୟ । ଆଉ ଏହାରି ଭିତରେ ‘ଏକ ଭାରତ, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭାରତ’ର ଝଲକ ଦେଖିବାକୁ ମିଳେ । ଆଉ ଗୋଟିଏ କଥା ନିଶ୍ଚୟ ମନେରଖିବେ, ଏଥିରୁ ଅଧିକାଂଶ ଜିନିଷ ଆମ ରୋଷେଇଘରୁ ସୃଷ୍ଟି ହୋଇଛି, ଆମ ବିଲବାଡ଼ିରୁ ବାହାରିଛି । ଏହା କୌଣସି ବଡ଼ ବ୍ରାଣ୍ଡିଂ ନୁହେଁ । କିନ୍ତୁ ପିଢ଼ୀ ପିଢ଼ୀର ଅନୁଭବ ଏହା ଭିତରେ ସମାହିତ ହୋଇରହିଛି । ଆପଣମାନେ ମଧ୍ୟ ଗରମରେ ଦେଶୀ ପାନୀୟର ଖୁବ୍ ଆନନ୍ଦ ଉଠାନ୍ତୁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗ୍ରୀଷ୍ମ ଆସିବା ସମୟ ଆଉ ଏକ ଚର୍ଚ୍ଚା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଘରେ ଆରମ୍ଭ ହୋଇଯାଏ, ଆଉ ତାହା ହେଉଛି ଆମ୍ବ । ଆମ୍ବ ସାଧାରଣ ଚର୍ଚ୍ଚାର ବିଷୟ ପାଲଟିଯାଏ । ଭାରତରେ ବୋଧହୁଏ ଏପରି କୌଣସି ଘର ନ ଥିବ ଯେଉଁଠି ଗରମ ଦିନେ ଆମ୍ବର କଥା ପଡୁନଥିବ । ପ୍ରତ୍ୟେକ ଅଞ୍ଚଳର ନିଜସ୍ୱ ଆମ୍ବ, ନିଜସ୍ୱ ସ୍ୱାଦ ଓ ନିଜସ୍ୱ ସୁଗନ୍ଧ ରହିଛି । ମହାରାଷ୍ଟ୍ର ଓ କୋଙ୍କଣର ହାପୁସ୍, ଆଲଫୋନ୍ସୋ । ଗୁଜୁରାଟର କେସର, ଉତ୍ତରପ୍ରଦେଶର ଦଶହରି, ଓ ମୋ କାଶିର ଲଙ୍ଗଡା – ଏମାନେ ତ ଆମ୍ବ ଭିତରେ ରାଜା । ଦେଖିବାକୁ ଗଲେ ଲଙ୍ଗଡା ଆମ୍ବର ଏକ ବିଶେଷତ୍ୱ ରହିଛି - ପାଚିବା ପରେ ମଧ୍ୟ ତା’ର ରଙ୍ଗ ସବୁଜ ଦେଖାଯାଏ । ବିହାରର ଜର୍ଦ୍ଦାଲୁ – ବାସ୍ନାରୁ ଯାହାକୁ ଦୂରରୁ ଥାଇ ଚିହ୍ନିହୁଏ । ଚୌଷା, ମାଲଦା - ପ୍ରତ୍ୟେକ ନାଁ ସହ ଲୋକମାନଙ୍କ ସ୍ମୃତି ଜଡ଼ିତ । ଦକ୍ଷିଣ ଭାରତ ଯାଆନ୍ତୁ, ସେଠି ବେଗନ୍ ପଲ୍ଲୀ, ତୋତାପୁରୀ, ନିଲମ୍, ମଲଗୋବା, ବେଙ୍ଗଲରେ ହିମସାଗର, ଓଡ଼ିଶା ଓ ଆନ୍ଧ୍ରପ୍ରଦେଶରେ ସୁବର୍ଣ୍ଣରେଖା ପାଇବେ । ଅର୍ଥାତ୍ ସ୍ଥାନ ବଦଳିବା ସଙ୍ଗେ ସଙ୍ଗେ ଆମ୍ବର ରଙ୍ଗ, ରୂପ ଓ ସ୍ୱାଦ ମଧ୍ୟ ବଦଳିଯାଏ । ଆଉ ବନ୍ଧୁଗଣ, ଆମ୍ବର ଏହି ଯାତ୍ରା ଏବେ ଗାଁରୁ ବିଶ୍ୱ ବଜାର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପହଂଚିପାରିଛି । ଆଜି ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ ଜରିଆରେ ଆମ୍ବ ଚାଷ ସହ ଜଡ଼ିତ ମୋ କୃଷକ ଭାଇଭଉଣୀଙ୍କୁ ପ୍ରଶଂସା କରିବି । ଆପଣ ଦେଶର କୃଷିଭିତ୍ତିକ ଅର୍ଥନୀତି ପାଇଁ ଜଣେ ସାଧାରଣ ଚାଷୀ ନୁହଁନ୍ତି । ଆପଣଙ୍କ ସ୍ଥାନ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର । ଏହିପରି ଲାଗି ରୁହନ୍ତୁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗରମ ଦିନେ ଏମିତି ତ ସ୍କୁଲ ଛୁଟି ହୋଇଥାଏ । କିନ୍ତୁ ମୁଁ ଏପରି ଏକ କ୍ଲାସର କଥା କହିବି ଯେଉଁଠି ଆପଣ ପ୍ରବେଶ ନେବାପାଇଁ ମନ କରିବେ । ବନ୍ଧୁଗଣ, ଏପରି ଏକ ସ୍ଥିତିର କଳ୍ପନା କରନ୍ତୁ – ଏପରି ଏକ ସ୍କୁଲ ଯେଉଁଠି ପିଲା ବି ଆସନ୍ତି, ଯୁବକମାନେ ବି ଆସନ୍ତି ଓ ବୟସ୍କମାନେ ବି ଆସନ୍ତି । ଯେଉଁଠି କିଛି ଫିସ ନାହିଁ । କୌଣସି ବଡ କୋଠା ନାହିଁ, କୌଣସି ଶ୍ରେଣୀଗୃହ ମଧ୍ୟ ନାହିଁ । ଆଉ ସବୁଠାରୁ ମଜାକଥା ହେଲା ଏହି କ୍ଲାସ ନଦୀରେ ହିଁ ହୋଇଥାଏ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହା କୌଣସି କାହାଣୀ ନୁହେଁ । ଏହା ହେଉଛି ଏକ ସତପ୍ରୟାସ । କେରଳମର ଆଲୁୱାରେ, ସାଜି ୱଲାଶେରିଲ ଜୀ ଏପରି ଏକ ସ୍ବିମିଂଗ କ୍ଲବ ଚଳାଉଛନ୍ତି ଯେଉଁଠାରେ ବର୍ତ୍ତମାନ ସୁଦ୍ଧା ୧୫ ହଜାରରୁ ଊର୍ଦ୍ଧ୍ୱ ଲୋକ ପହଁରା ଶିଖିସାରିଲେଣି । ସାଜି ଜୀ ଦିବ୍ୟାଙ୍ଗ ପିଲାମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ପହଁରା ଶିଖାଇଛନ୍ତି । ଏହି ପ୍ରଚେଷ୍ଟା ପଛରେ ଏକ ଯନ୍ତ୍ରଣା ଲୁଚିରହିଛି । କିଛିବର୍ଷ ତଳେ ଏକ ନୌକା ଦୁର୍ଘଟଣାରେ ଅନେକ ଛାତ୍ର ମୃତ୍ୟୁବରଣ କରିଥିଲେ । ଏହି ଘଟଣା ସାଜି ଜୀଙ୍କୁ ଖୁବ୍ ଆନ୍ଦୋଳିତ କରିଥିଲା । ସେ ଚିନ୍ତା କଲେ, ଯଦି ପିଲାମାନେ ପହଁରା ଜାଣିଥାନ୍ତେ, ତେବେ ବୋଧହୁଏ କିଛି ଜୀବନ ବଞ୍ଚିଯାଇଥାନ୍ତା, ବାସ୍, ଏହିଠାରୁ ଆରମ୍ଭ ହେଲା ଏହି ଅଭିଯାନ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ସାଜି ୱଲାଶେରିଲ ଜୀଙ୍କ ଜୀବନ ଆମକୁ ବହୁତ ବଡ଼ ଶିକ୍ଷା ଦିଏ । ସେବା କରିବା ପାଇଁ ବହୁତ ବଡ଼ ସାଧନ ଦରକାର ହୁଏନାହିଁ । ଦରକାର ହୁଏ ସଦିଚ୍ଛା ଓ ନିରନ୍ତର ପ୍ରୟାସ । ଏହା ବଳରେ ହଜାର ହଜାର ଲୋକଙ୍କ ଜୀବନରେ ପରିବର୍ତ୍ତନ ଅଣାଯାଇପାରେ ।

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ,

ବିଗତ ଦିନରେ ମୋତେ ୟୁରୋପର ନେଦରଲାଣ୍ଡସ୍ ଯିବାର ସୁଯୋଗ ମିଳିଥିଲା । ସେଠି ମୁଁ ଅନେକ ମିଟିଂରେ ସାମିଲ ହେଲି । ଆଉ ସେତେବେଳେ ଏପରି ଏକ ମୁହୂର୍ତ୍ତ ଆସିଲା, ଯାହା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାରତୀୟଙ୍କୁ ଗର୍ବିତ କରିଥିଲା । ନେଦରଲାଣ୍ଡସରେ ଆୟୋଜିତ ଏକ ବିଶେଷ ସମାରୋହରେ ଚୋଳ ସାମ୍ରାଜ୍ୟର ପ୍ରାଚୀନ ତାମ୍ରଫଳକ ଭାରତକୁ ଫେରାଇ ଦିଆଗଲା । ଏହି କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମରେ ନେଦରଲାଣ୍ଡର ପ୍ରଧାନମନ୍ତ୍ରୀ ମଧ୍ୟ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ । ଏହି ତାମ୍ରଫଳକକୁ ନେଇ ଦେଶବିଦେଶରୁ ମୋ ପାଖକୁ ନିରନ୍ତର ବାର୍ତ୍ତା ଆସିବାରେ ଲାଗିଛି । ଲୋକମାନେ ଆନନ୍ଦ ପ୍ରକାଶ କରୁଛନ୍ତି । ଗର୍ବ ବ୍ୟକ୍ତ କରୁଛନ୍ତି । ସମଗ୍ର ବିଶ୍ୱର ତାମିଲ ସମୁଦାୟ ମଧ୍ୟରେ ଏହାକୁ ନେଇ ଖୁବ୍ ଉତ୍ସାହ ପରିଲକ୍ଷିତ ହେଉଛି।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହି ତାମ୍ରଫଳକଗୁଡ଼ିକୁ ନେଇ ଲୋକମାନଙ୍କ ଭିତରେ ଖୁବ ଜିଜ୍ଞାସା ରହିଛି । ସେଥିପାଇଁ ଆଜି ମୁଁ ଏହାସହ ଜଡ଼ିତ କିଛି କଥା ଆପଣମାନଙ୍କୁ କହିବାକୁ ଚାହୁଁଛି । ଏହି ତାମ୍ରଫଳକଗୁଡ଼ିକ ମଧ୍ୟରୁ ୨୧ଟି ବଡ଼ ଓ ୩ଟି ଛୋଟ ତାମ୍ରଫଳକ ରହିଛି । ଏହା ମୁଖ୍ୟତଃ ରାଜା ରାଜେନ୍ଦ୍ର ଚୋଳ-ପ୍ରଥମଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ନିଜ ପିତା ରାଜା ରାଜରାଜା ଚୋଳଙ୍କ ଏକ ବଚନକୁ ପୂରଣ କରିବା ସହ ଜଡ଼ିତ । ଏଥିରେ ଆନଇମଙ୍ଗଲମ୍ ଗାଁକୁ ଏକ ବୌଦ୍ଧବିହାରକୁ ଦାନ ଦେଇଥିବାର ଉଲ୍ଲେଖ ରହିଛି । ଏହି ତାମ୍ରଫଳକଗୁଡ଼ିକରେ ଚୋଳବଂଶର ଉପଲବଧିର ବର୍ଣ୍ଣନା ମଧ୍ୟ ଦେଖିବାକୁ ମିଳେ । ଏଥିରୁ ଜଣାପଡ଼େ ଯେ ଚୋଳ ସାମ୍ରାଜ୍ୟର ସାମୁଦ୍ରିକ ଶକ୍ତି କେତେ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ଥିଲା । ଏଥିରୁ ଦକ୍ଷିଣ ପୂର୍ବ ଏସିଆ ଦେଶମାନଙ୍କ ସହ ଚୋଳ ଶାସକଙ୍କ ସମ୍ପର୍କ ବିଷୟରେ ମଧ୍ୟ ଜଣାପଡ଼େ ।

ଚୋଳ ସାମ୍ରାଜ୍ୟର ସମୃଦ୍ଧ ଇତିହାସ ଓ ସଂସ୍କୃତିକୁ ନେଇ ଆମେ ସମସ୍ତେ ଗର୍ବିତ । ବନ୍ଧୁଗଣ, ଆମ ସରକାର ଭାରତର ଏପରି ଅମୂଲ୍ୟ ଐତିହ୍ୟର ସଂରକ୍ଷଣ ପାଇଁ ନିରନ୍ତର ପ୍ରଚେଷ୍ଟାରତ । ଏହି କ୍ରମରେ ‘ଜ୍ଞାନଭାରତମ୍ ଅଭିଯାନ’ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଛତିଶଗଡ଼ର ମହ୍ଲାରରେ ମଧ୍ୟ ଏକ ମହତ୍ତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଅନୁସନ୍ଧାନ କରାଯାଇଛି । ସେଠାରୁ ତିନୋଟି ଦୁର୍ଲ୍ଲଭ ତାମ୍ରଫଳକ ମିଳିଛି । ଏଗୁଡ଼ିକ ପାଣ୍ଡୁବଂଶୀ ରାଜବଂଶର ମହର୍ଷି ବାଲାର୍ଜୁନଙ୍କ ଶାସନକାଳ ସହ ଜଡ଼ିତ ଥିବା ମତ ପ୍ରକାଶ ପାଉଛି । ବିଶେଷଜ୍ଞଙ୍କ ମତରେ ଏହି ଶିଳାଲେଖ ଷଷ୍ଠ-ସପ୍ତମ ଶତାବ୍ଦୀର । ୧୪୦୦-୧୫୦୦ ବର୍ଷ ପୁରୁଣା ଏହି ତାମ୍ରଫଳକଗୁଡ଼ିକ ପ୍ରାଚୀନ ବ୍ରାହ୍ମୀଲିପି ଓ ପାଲି ଭାଷାରେ ଲିଖିତ । ଏଥିରୁ ସେ ସମୟର ଶାସନ ବ୍ୟବସ୍ଥା, ଧର୍ମ ଓ ସଂସ୍କୃତି ବିଷୟରେ ମହତ୍ତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ତଥ୍ୟ ମିଳୁଛି । 

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଆମ ଭାରତୀୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ଅଥବା ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ପ୍ରତି ବିଶେଷ ଆକର୍ଷଣ ଥାଏ । ଆଜି ବି ଆମ ଦେଶରେ ଶହଶହ ବର୍ଷ ପୁରୁଣା ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣାଗାର ରହିଛି । ଏଠାରେ ଅଦ୍ଭୁତ ଗାଣିତିକ ଉଦ୍ଭାବନ ହୋଇଛି । ନାଭିଗେସନ୍ ହେଉ, ପଞ୍ଜିକା ହେଉ କିମ୍ବା ଆମର ପର୍ବପର୍ବାଣୀ, ଏସବୁର ସମ୍ପର୍କ ଆକାଶ ଏବଂ ତାରାମାନଙ୍କ ସହିତ ରହିଛି । ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ଆମ ଦେଶରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୁଗରେ କୌତୂହଳ ସୃଷ୍ଟି କରିଆସିଛି ତାକୁ ଆବିଷ୍କାର କରିବା ପାଇଁ ପ୍ରେରିତ କରିଛି ତଥା ଆଜିର ଯୁବକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ଏହାକୁ ନେଇ ବହୁତ ଉତ୍ସାହ ଦେଖିବାକୁ ମିଳୁଛି । ଆପଣମାନେ ମଧ୍ୟ ଦେଖୁଥିବେ ଆଜିକାଲି ସାରାଦେଶରେ ଆଷ୍ଟ୍ରୋନୋମି କ୍ଲବ୍ ଦ୍ରୁତ ବେଗରେ ଲୋକପ୍ରିୟ ହେଉଛନ୍ତି । ବଡ଼ ସହରଠାରୁ ଆରମ୍ଭ କରି ଛୋଟ ପଡ଼ା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ, ସ୍କୁଲରୁ ଆରମ୍ଭ କରି ପାର୍କ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଏହାର ଗତିବିଧି ଦେଖିବାକୁ ମିଳୁଛି । ମୋତେ ବାଙ୍ଗାଲୋର ଆଷ୍ଟ୍ରୋନୋମିକାଲ୍ ସୋସାଇଟି ସମ୍ପର୍କରେ ସୂଚନା ମିଳିଛି । ଏଠାରେ ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣ ଅଧିବେଶନ ଆୟୋଜିତ ହେଉଛି । ଏହି ସଂସ୍ଥା ଗ୍ରାମାଞ୍ଚଳରେ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନକୁ ଲୋକପ୍ରିୟ କରିବାର ଅଭିଯାନ ଆରମ୍ଭ କରିଛି । ‘ଖଗୋଳ ମଣ୍ଡଳ’ ନାମକ ଏକ ଦଳ ୩୦ ଘଣ୍ଟାର ଗୋଟିଏ ଅଭିନବ ପାଠ୍ୟକ୍ରମ ଆରମ୍ଭ କରିଛନ୍ତି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ରାତିରେ ତାରାମାନଙ୍କୁ ଦେଖିବା ସ୍ୱତଃ ଗୋଟିଏ ଅଦ୍ଭୁତ ଅନୁଭବ ହୋଇଥାଏ । ଆଷ୍ଟ୍ରୋ କେରଳ ନାମକ ଗୋଟିଏ ସଂସ୍ଥା ରାତ୍ରି ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣ ଶିବିର ଏବଂ କର୍ମଶାଳା ଆୟୋଜିତ କରେ । ଏଠାରେ ଯୁବବନ୍ଧୁମାନେ ଟେଲିସ୍କୋପ ତିଆରି କରିବା ଏବଂ ତାରା ମାନଚିତ୍ରର ପ୍ରୟୋଗ ଶିଖନ୍ତି । ରାଜକୋଟର ବିଗ୍ ବ୍ୟାଙ୍ଗ ଆଷ୍ଟ୍ରୋନୋମି କ୍ଲବ୍ ଗିରର ଜଙ୍ଗଲରୁ ଆରମ୍ଭ କରି କଚ୍ଛର ରଣ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଅନେକ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ଇଭେଣ୍ଟ ଆୟୋଜିତ କରିଛନ୍ତି । ‘ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଦ୍ୟା ପରିସଂସ୍ଥା’ ମଧ୍ୟ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନର ପୁରୁଣା ସଂସ୍ଥାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଗୋଟିଏ । ଏଠାରେ ପର୍ଯ୍ୟବେକ୍ଷଣ ସୁବିଧା ସହିତ ବହି, ଲାଇବ୍ରେରୀ ଏବଂ ଟେଲିସ୍କୋପ ଲାଇବ୍ରେରୀର ସୁବିଧା ମଧ୍ୟ ଅଛି । ମୁଁ ଆଇଏସଏଏସି (ଆଇସାକ୍) ସମ୍ପର୍କରେ ମଧ୍ୟ କହିବାକୁ ଚାହେଁ । ଏହା ଏକ ଛାତ୍ର-ନେତୃତ୍ୱାଧୀନ ଦେଶବ୍ୟାପୀ ନେଟୱାର୍କ,, ଯାହା ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ ଏବଂ ଜ୍ୟୋତିର୍ବିଜ୍ଞାନ କ୍ଲବକୁ ପରସ୍ପର ମଧ୍ୟରେ ଯୋଡ଼ିଥାଏ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ ନିଜର ହବି ପାଇଁ ସମୟ ବାହାର କରିବା ଏବଂ ସବୁବେଳେ କିଛି ନା କିଛି ନୂଆ ଶିଖିବା ବହୁତ ଆବଶ୍ୟକ । ମୁଁ ଯୁବକମାନଙ୍କୁ ଅନୁରୋଧ କରିବି ଯେ ସେମାନେ କୌଣସି ଆଷ୍ଟ୍ରୋନୋମି କ୍ଲବ୍ ସହିତ ନିଶ୍ଚିତ ଭାବରେ ଯୋଗ ଦିଅନ୍ତୁ, ଏବଂ ଏହି ଛୁଟିରେ କୌଣସି ପ୍ଲାନେଟୋରିୟମ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିବାକୁ ଯାଆନ୍ତୁ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ କାର୍ଯ୍ୟକ୍ରମକୁ ଯେଉଁମାନେ ଟିଭିରେ ଦେଖୁଛନ୍ତି, ମୁଁ ସେମାନଙ୍କୁ କହିବି – ଗୋଟିଏ ଭିଡିଓକୁ ନିଶ୍ଚିତ ଦେଖନ୍ତୁ । ଏହି ଭିଡିଓ ବିଗତ ଦିନରେ ଖୁବ୍ ଚର୍ଚ୍ଚାରେ ଥିଲା । ଏଥିରେ କିଛି ଲୋକ ଖୁବ୍ ଧୈର୍ଯ୍ୟର ସହିତ, ବହୁତ ସାବଧାନତାର ସହିତ ଗୋଟିଏ ଗଙ୍ଗା ଡଲଫିନ୍କୁ ବଞ୍ଚାଇବାର ଚେଷ୍ଟା କରୁଥିଲେ । ଏହା ଜାଣି ଆପଣ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ହେବେ ଯେ ଏହି ପ୍ରଚେଷ୍ଟାରେ ପାଖାପାଖି ୧୩ ଘଣ୍ଟା ଲାଗିଲା ଏବଂ ପରିଶେଷରେ ସେହି ଡଲଫିନ୍ ବଞ୍ଚିଗଲା ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଭାରତର ପ୍ରଥମ ଗଙ୍ଗା ଡଲଫିନ୍ ଉଦ୍ଧାର ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ ଏହି କାର୍ଯ୍ୟରେ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଭୂମିକା ନେଇଥିଲା । ଘଟଣାଟି ଉତ୍ତରପ୍ରଦେଶର । ସେଠାରେ ଗୋଟିଏ ଗଙ୍ଗା ଡଲଫିନ୍ କେନାଲରେ ଫଶିଯାଇଥିଲା । ଏହି ସମୟରେ ‘ନମାମି ଗଙ୍ଗେ ଅଭିଯାନ’ରେ ତିଆରି ହୋଇଥିବା ଏହି ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ ତା’ପାଇଁ ଗୋଟିଏ ଆଶାର କିରଣ ନେଇ ପହଞ୍ଚିଲା । ତା’ପରେ ବହୁତ ସାବଧାନତାର ସହିତ ତାକୁ ବାହାରକୁ ଅଣାଗଲା । ତା’ର ସ୍ୱାସ୍ଥ୍ୟପରୀକ୍ଷା କରାଗଲା, ତା’ର ଚିକିତ୍ସା କରାଗଲା ଏବଂ ଏହାପରେ ତାକୁ ସୁରକ୍ଷିତ ଭାବେ ରାପ୍ତି ନଦୀରେ ଛାଡ଼ିଦିଆଗଲା । ଯଦି କହିବା ଏହିଭଳି ଭାବରେ ଗୋଟିଏ ଜୀବନ ପୁଣି ନିଜ ଘରକୁ ଫେରିଲା ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହି ଡଲଫିନ୍ ଉଦ୍ଧାର ଆମ୍ବୁଲାନ୍ସ ବହୁତ ଅନନ୍ୟ । ଏହାକୁ ଗୋଟିଏ ଚଳମାନ ଚିକିତ୍ସାଳୟ ଭଳି ତିଆରି କରାଯାଇଛି । ଏଥିରେ ଡଲଫିନ୍କୁ ସୁରକ୍ଷିତ ରଖିବାର ବ୍ୟବସ୍ଥା ଅଛି । ଅମ୍ଳଜାନର ସୁବିଧା ଅଛି, ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ଷ୍ଟ୍ରେଚର ଅଛି, ସୁରକ୍ଷା ପାଇଁ ଉପକରଣ ଅଛି, ଅର୍ଥାତ୍ ଯଦି କୌଣସି ଡଲଫିନ୍ ଆହତ ହୋଇଯାଏ, କେନାଲରେ ଫଶିଯାଏ ବା ନଦୀରୁ ବିଚ୍ଛିନ୍ନ ହୋଇଯାଏ, ତେବେ ଯଥାଶୀଘ୍ର ତାକୁ ସାହାଯ୍ୟ କରାଯାଇପାରିବ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଯେତେବେଳେ ଆମେ ଗଙ୍ଗା ଡଲଫିନ୍କୁ ବଞ୍ଚାଉଛନ୍ତି, ତେବେ ଆମେ ଖାଲି ଗୋଟିଏ ପ୍ରଜାତିକୁ ବଞ୍ଚାଉନାହୁଁ, ଆମେ ଗଙ୍ଗାର ଜୈବ ବିବିଧତାକୁ ମଧ୍ୟ ବଞ୍ଚାଉଛୁ । ନଦୀର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଜୀବନତନ୍ତ୍ରକୁ ବଞ୍ଚାଉଛନ୍ତି ଏବଂ ଆଗାମୀ ପିଢ଼ୀ ପାଇଁ ପ୍ରକୃତିର ଗୋଟିଏ ଅମୂଲ୍ୟ ଐତିହ୍ୟକୁ ମଧ୍ୟ ବଞ୍ଚାଉଛୁ । 

ମୋର ପ୍ରିୟ ଦେଶବାସୀଗଣ,

ଆପଣମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଅନେକ ଲୋକଙ୍କର ନଦୀ, ପୋଖରୀ ଅଥବା କୂଅ ପାଣି ସହିତ ଜଡ଼ିତ ସ୍ମୃତି ନିଶ୍ଚୟ ଥିବ । କାହାକୁ ପୋଖରୀରେ ପହଁରିବା ମନେଥିବ, କେହି ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କ ସହିତ ପୋଖରୀ କୂଳରେ ଖେଳିବା ବା କାହାର ସେହି ମାଟିର ସୁଗନ୍ଧ ମଧ୍ୟ ମନେପଡୁଥିବ । ବାଲ୍ୟକାଳର ଏହିଭଳି ସ୍ମୃତିଗୁଡ଼ିକ ସାରାଜୀବନ ମନରେ ସାଇତା ହୋଇଥାଏ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହିଭଳି ସ୍ମୃତିକୁ ବଞ୍ଚାଇ ରଖିବାର ଗୋଟିଏ ପ୍ରେରକ କଥା ଉତ୍ତରପ୍ରଦେଶର ବସ୍ତୀ ଜିଲ୍ଲାରୁ ଆସିଛି । ବସ୍ତୀର ଆକାଶଗୁପ୍ତା ନିଜ ଗାଁର ମନୋରମା ନଦୀକୁ ଦେଖି ବହୁତ ଦୁଃଖୀ ହେଉଥିଲେ । କାରଣ ଯେଉଁ ନଦୀକୁ ସେ ବାଲ୍ୟକାଳରୁ ସଫା ଏବଂ ଜୀବନ୍ତ ଦେଖିଥିଲେ, ସମୟ ପରିବର୍ତ୍ତନ ସଙ୍ଗେସଙ୍ଗେ ସେ ନଦୀରେ ପ୍ଲାଷ୍ଟିକ୍ ଜମା ହେବାରେ ଲାଗିଛି । ଆବର୍ଜନା ବଢ଼ିଚାଲିଥିଲା । ଶ୍ରୀମାନ ଆକାଶ ସ୍ଥିର କଲେ ଯେ ସେ ଅଭିଯୋଗ କରିବେ ନାହିଁ, ଗୋଟିଏ ନୂତନ ଶୁଭାରମ୍ଭ କରିବେ । ଅଭିଯୋଗ ନୁହେଁ, ଶୁଭାରମ୍ଭ ଏକ ମନ୍ତ୍ର ହୋଇଗଲା । ସେ ନିଜର ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କୁ ସାଥୀରେ ନେଲେ । ଖାଲି ଜାଲ ଥିଲା, ଫାଉଡା ଥିଲା, ଟୋକେଇ ଥିଲା ଆଉ ସବୁଠାରୁ ବଡ଼ ଶକ୍ତି ଥିଲା କିଛି ପରିବର୍ତ୍ତନର ସଂକଳ୍ପ । ଏ ଯୁବକମାନେ ନଦୀରେ ବୁଡ଼ି ଦଳ ବାହାର କରୁଥିଲେ । ପ୍ଲାଷ୍ଟିକ୍ ଏବଂ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଆବର୍ଜନା ବାହାରକୁ ଆଣୁଥିଲେ । ଅନେକ ଥର ଦିନକୁ ପ୍ରାୟ ୫୦-୬୦ କିଲୋ ଆବର୍ଜନା ନଦୀରୁ ବାହାର କରାଗଲା । ଧିରେ ଧିରେ ମନୋରମା ନଦୀର ସେହି ଅଂଶ ପୁଣି ସଫା ଦେଖାଯିବାକୁ ଲାଗିଲା । ଏହି କାମ ପ୍ରତି ଆଖପାଖର ଲୋକମାନଙ୍କ ଧ୍ୟାନ ମଧ୍ୟ ଆକର୍ଷିତ ହେଲା । ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସ୍ୱଚ୍ଛତା ପ୍ରତି ସଚେତନତା ବଢ଼ିଲା ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଏହିଭଳି ଗୋଟିଏ ପ୍ରେରଣାଦାୟୀ କଥା ଗୋଆରେ ମଧ୍ୟ ଦେଖିବାକୁ ମିଳିଛି । ଗୋଆର ବାଳକୃଷ୍ଣ ଅଇୟା ଜଣେ ଅବସରପ୍ରାପ୍ତ ଶିକ୍ଷକ । କିନ୍ତୁ ସମାଜ ପାଇଁ କାମ କରିବା ପାଇଁ ଆଜି ବି ତାଙ୍କର ଉତ୍ସାହ ସେହିଭଳି ରହିଛି । ତାଙ୍କୁ ମଡ୍ଡୀ-ତୋଲାପ୍ ଅଞ୍ଚଳର ପାଣିର ସମସ୍ୟା ବହୁତ କଷ୍ଟ ଦେଉଥିଲା । ସେ ମଧ୍ୟ ସମାଧାନ ପାଇଁ କାମ ଆରମ୍ଭ କଲେ । ବାଳକୃଷ୍ଣ ଜୀ ପାଇପଲାଇନ୍ ବିଛାଇବାରେ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ଭୂମିକା ଗ୍ରହଣ କଲେ । ଏହାଦ୍ୱାରା ଅନେକ ଘର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପାଣି ପହଂଚିପାରିଲା । ଯେଉଁ ପରିବାରକୁ ପାଣି ପାଇଁ ପ୍ରତିଦିନ ସଂଘର୍ଷ କରିବାକୁ ପଡୁଥିଲା, ସେମାନେ ଏହାଦ୍ୱାରା ବହୁତ ଉପକୃତ ହେଲେ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗତ ମାସରେ ମୋର ଗୋଟିଏ ବହୁତ ଭଲ ଅନୁଭୂତି ହୋଇଥିଲା । ତା’ର ସମ୍ପର୍କ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ ସହିତ ଜଡ଼ିତ । ଏଥିପାଇଁ ଆଜି ଆପଣମାନଙ୍କ ସହିତ ସେ ବିଷୟ ଚର୍ଚ୍ଚା କରିବାକୁ ଚାହେଁ । ତାମିଲନାଡୁର ନାଗରକୋଇଲରେ ଜଣେ ଶିକ୍ଷକଙ୍କ ସହିତ ମୋର ସାକ୍ଷାତ ହୋଇଥିଲା । ପ୍ରାୟ ତିନିଦଶକ ପୂର୍ବେ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ତାଙ୍କୁ ଭେଟିଥିଲି । ମୁଁ ଗିରିଜା ଅମ୍ମାଙ୍କ କଥା କହିବାକୁ ଯାଉଛି । ଏହି ସାକ୍ଷାତ ସମୟରେ କିଛି ଯୁବଛାତ୍ର ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କ ସହିତ ଥିଲେ ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଗିରିଜା ଅମ୍ମା ପ୍ରାୟ ୧୫ଟି ସ୍କୁଲ ଚଳାଉଛନ୍ତି । ସେଗୁଡ଼ିକ ମଧ୍ୟରେ ଚେନ୍ନାଇର ଜୟଗୋପାଲ ଗରୋଡିଆ ହିନ୍ଦୁ ବିଦ୍ୟାଳୟ ବହୁତ ପ୍ରମୁଖ । ତାଙ୍କର ଦେଶଭକ୍ତିର ଭାବନା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାରତବାସୀ ପାଇଁ ପ୍ରେରଣାଦାୟକ । ସେ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରେରିତ ହୋଇ ଦେଶର ଅନେକ ସୈନିକମାନଙ୍କ ପାଇଁ କିଛି କରିବାର ସଂକଳ୍ପ ନେଲେ । ସେଥିପାଇଁ ସେ ନିଜ ସମସ୍ତ ସ୍କୁଲର ପିଲାମାନଙ୍କୁ ପ୍ରେରଣା ଦେଲେ । ସେ ପିଲାମାନଙ୍କୁ କହିଲେ ଯେ ସୈନିକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସେମାନେ ପ୍ରତିଦିନ ଗୋଟିଏ ଟଙ୍କା ଦିଅନ୍ତୁ । ଅର୍ଥାତ୍ ଗୋଟିଏ ବର୍ଷରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ପିଲା ଦ୍ୱାରା ୩୬୫ ଟଙ୍କା ଜମା ହେଲା । ଏହିଭଳି ଛୋଟ ଛୋଟ ଅଂଶଦାନ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରାୟ ୪୦ ଲକ୍ଷ ଟଙ୍କା ଏକତ୍ର ହେଲା । ଗିରିଜା ଅମ୍ମା ଏହି ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଟଙ୍କାର ଚେକ୍ ମୋତେ ଅର୍ପଣ କଲେ । ତାଙ୍କସହିତ କଥାବାର୍ତ୍ତା ମଧ୍ୟରେ ମୁଁ ଅନୁଭବ କଲି ଯେ ମା’ ଭାରତୀଙ୍କ ପାଇଁ ତାଙ୍କର ସମର୍ପଣ ଭାବ କେତେ ଗଭୀର । ଗତବର୍ଷ ହିଁ ଚେନ୍ନାଇର ପ୍ରଥମ ହିନ୍ଦୁ ବିଦ୍ୟାଳୟ ତା’ର ୫୦ ବର୍ଷ ପୂରଣ କଲା । ଦେଶର ଶିକ୍ଷା ଏବଂ ସାଂସ୍କୃତିକ ଗୌରବକୁ ଆଗେଇନେବାରେ ଏହି ସ୍କୁଲ ନେଟୱାର୍କର ଭୂମିକା ବହୁତ ପ୍ରଶଂସନୀୟ । ମୁଁ ଏହା ସହିତ ଜଡ଼ିତ ଥିବା ସମସ୍ତ ଲୋକଙ୍କୁ ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ ଦେଉଛି । ଏବଂ ସେହି ଛାତ୍ରଛାତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ବିଶେଷ ଭାବେ ପ୍ରଶଂସା କରୁଛି । ଯେଉଁମାନେ ଦେଶର ବୀର ସୈନିକମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଏହିଭଳି ଯୋଗଦାନ ଦେଇଛନ୍ତି ।

ବନ୍ଧୁଗଣ,

ଭାରତର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଗାଁରେ, ପ୍ରତ୍ୟେକ ସହରରେ, କିଛି ନା କିଛି ଏଭଳି ଘଟୁଛି ଯାହା ଆମକୁ ପ୍ରେରଣା ଦିଏ । ଅନେକ ଥର, ଏହି ପ୍ରୟାସଗୁଡ଼ିକର ବିଶେଷ ଚର୍ଚ୍ଚା ହୁଏନାହିଁ । କିନ୍ତୁ ଯେତେବେଳେ ଆମେ ଜାଣନ୍ତି ସେତେବେଳେ ଆମର ଏହି ବିଶ୍ୱାସ ଆହୁରି ଦୃଢ଼ ଏବଂ ମଜଭୁତ ହୁଏ ଯେ ଆମର ଦେଶ ଲୋକମାନଙ୍କ ଶକ୍ତିରେ ଆଗକୁ ଚାଲିଛି । ମୋର ଆପଣମାନଙ୍କୁ ଅନୁରୋଧ ନିଜ ଆଖପାଖର ଏହିଭଳି ପ୍ରୟାସଗୁଡ଼ିକୁ ଦେଖନ୍ତୁ । ଯେଉଁ ଲୋକମାନେ ସମାଜ ପାଇଁ ଭଲ କାମ କରୁଛନ୍ତି ତାଙ୍କୁ ଚିହ୍ନନ୍ତୁ, ପ୍ରଶଂସା କରନ୍ତୁ, ତାଙ୍କଠାରୁ ଶିଖନ୍ତୁ ଏବଂ ହେଇପାରେ ତ ନିଜେ ମଧ୍ୟ କୌଣସି ଏକ ଭଲ କାମରେ ଯୋଗ ଦିଅନ୍ତୁ । ଆସନ୍ତା ମାସ ‘ମନ୍ କି ବାତ୍’ରେ ଏହିଭଳି ଆଉକିଛି ପ୍ରେରକ କଥା ସହିତ ପୁଣି ଆପଣମାନଙ୍କ ସହିତ ସାକ୍ଷାତ ହେବ । ବହୁତ ବହୁତ ଧନ୍ୟବାଦ । ନମସ୍କାର ।