Let us make the bar, bench and courts tech savvy: PM Narendra Modi

Published By : Admin | March 12, 2016 | 13:32 IST
PM Modi attends centenary years celebration of Patna High Court
PM Modi calls for making the bar, bench and court tech savvy
Quality of argument and judgement can improve with active use of technology: PM
Patna High Court has scaled new heights of progress in last 100 years. May this continue for years to come: PM

उपस्थित सभी वरिष्‍ठ महानुभाव!

नीतीश जी ने विस्‍तार से सबके नाम बोले हैं इसलिए मैं पुनरावर्तन नहीं करता हूं लेकिन उन सबका मैं आदर से स्‍वागत करता हूं।

पटना हाईकोर्ट की शताब्‍दी का ये समापन कार्यक्रम है। एक प्रकार से नई सदी की जिम्‍मेवारियों का आरंभ है और इसलिए गत शताब्‍दी में इस हाईकोर्ट ने जिन ऊंचाइयों को प्राप्‍त किया है, जिन परंपराओं के द्वारा सामान्‍य मानविकी में एक विश्‍वास पैदा किया है, जिस कार्य संस्‍कृति के द्वारा समाज में आशा बनती चली गई हैं, उसमें से जो उत्‍तम है, उसको carry forward करते हुए पटना की अगली शताब्‍दी, इस हाईकोर्ट की अगली शताब्‍दी कैसी हो, उसकी नींव मजबूत रखने की जिम्‍मेवारी, यहां उपस्थित सभी की है।

अगर हम आने वाली शताब्‍दी का foundation जितना मजबूत रखेंगे, उतना देश के सामान्‍य मानविकी का व्‍यवस्‍थाओं के प्रति, लोकतंत्र के प्रति विश्‍वास और गहरा होता जाएगा। और इसलिए हम जब इस प्रकार से समारोह का आयोजन करते हैं तो उसके साथ-साथ नए संकल्‍पों का भी अवसर होता है। मैं आशा करूंगा कि आज जब शताब्‍दी वर्ष का समापन हो रहा है तब चाहे Bar हो या bench हो, हम नए benchmark के लिए कैसे आगे बढ़ें, मुझे विश्‍वास है कि जिस व्‍यवस्‍था के पास एक शताब्‍दी की विरासत हो, वो देश को बहुत कुछ दे सकते हैं और ये पटना, यहां का Bar जिसने अनेक महापुरुषों को जन्‍म दिया है, अनेक गणमान्य महापुरुष आप ही के बीच से निकलकर के आए हैं। आने वाले समय में भी उस उज्‍ज्‍वल परंपरा को आप बनाए रखेंगे, ऐसा मुझे आप पर पूरा भरोसा है।

कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारे देश में बहुत ही कम जगह ऐसे होती हैं जहां पर लोगों का ध्‍यान रहता है कि उसके 50 साल हुए, 100 साल हुए और उस अवसर को मनाया जाए। मैं एक बार जब मुख्‍यमंत्री था तो एक गांव के स्‍कूल में गया था। वहां शिक्षा बहुत कम थी। Hardly 30-32 percent उस गांव में शिक्षा थी। तो मेरा मन कर गया भई चलो देखें तो सही क्‍या है? मैं जब वहां गया तो मैं हैरान था, वहां जो स्‍कूल बनी थी उस स्‍कूल की उम्र करीब 120 साल थी। यानी जिस गांव में 120 साल पहले स्‍कूल का जन्‍म हुआ उस गांव की शिक्षा 30-32 पर्सेंट के इर्द-गिर्द आ करके अटकी हुई थी। तब हमारे मन में एक चुनौती पैदा होती है कि व्‍यवस्‍थाएं अगर प्राणवान नहीं होंगी, अगर ये व्‍यवस्‍थाएं dynamic नहीं होंगी, अगर ये व्‍यवस्‍थाएं progressive नहीं होंगी, तो हम न समय के साथ चल पाएंगे, न हम समय की मांग को पूरा कर पाएंगे इसलिए हम लोगों के सामने चुनौती हैं कि हमारी व्‍यवस्‍थाओं को हम प्राणवान कैसे बनाएं। कभी-कभी व्‍यवस्‍थाओं का विकास मुश्किल नहीं होता है लेकिन व्‍यवस्‍थाओं को प्राणवान बनाने के लिए बहुत ताकत लगती है, बहुत लंबे अरसे तक जूझना पड़ता है। और इसलिए उस दिशा में इन 100 साल के अनुभव से हम कुछ करें।

आने वाले दिनों में ...मैं एक सुझाव के रूप में सोच रहा हूं। जब मैं यहां बैठा था तो विचार आया, क्‍या हर वर्ष हमारे कोर्ट एक बुलेटिन निकाल सकते हैं क्‍या कि हमारी कोर्ट में सबसे पुराना pending case इतने साल पुराना है| कहीं 50 साल पुराना हो सकता है, कहीं 40 साल पुराना हो सकता है। इससे एक sensitivity पैदा होगी। समाज में भी इसके कारण एक चर्चा होगी, Bar में बैठे हुए लोग भी चर्चा करेंगे, यार हम इतने सालों से यहां बैठे हैं, ये 50 साल से मुकदमा चल रहा है हम लोगों ने कुछ करना चाहिए। एक ऐसा माहौल बनेगा जो परिणाम लक्ष्यीय  काम की योजना के लिए हमें प्रेरित करेगा। और ये कोई मुश्किल काम नहीं है। और ये गलत काम भी नहीं है। अगर मान लीजिए कि कोई 50 साल पुराना कोई केस का नाम निकल गया तो कोई आज बैठे हुए लोगों की जिम्‍मेवारी नहीं होगी, वो तो सब रिटायर्ड हो चुके होंगे। लेकिन अच्‍छा होगा कि उसके कारण pendency की जो चिन्‍ता है उसमें से बाहर निकलने का एक मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार होगा।

दूसरी एक सुविधा है इन दिनों जो आज से पुरानी पीढ़ी के जो Bar के member थे उनको ये सौभाग्‍य प्राप्‍त नहीं हुआ था, जो आज की पी‍ढ़ी को प्राप्‍त हुआ है, आज के Bar को प्राप्‍त हुआ है। और वो है technology. पहले अगर अगर आपको किसी केस को लड़ना है तो लंबे अरसे तक research में टाइम जाता था, पूरी टीम लगी रहती थी पुराने reference ढूंढने के लिए। आज Google एक ऐसा आपका bar member है कि आप जो चाहो वो Google खोज करके निकाल करके दे देता है और आसानी से perfect judgment को quote करके अपनी बात मनवा सकते हो और इसलिए हमारा Bar, हमारी bench, हमारी कोर्ट इसको हम कितने ज्‍यादा techno savy बना सकते हैं, कितनी तेजी से हम digital system को हमारी व्‍यवस्‍था में inject कर सकते हैं और उसके कारण quality of argument, quality of judgments, space of the judgment, इन सबमें एक बहुत बड़ा आमूल-चूल परिवर्तन आ सकता है। और उस दिशा में हम प्रयास करें।

हमारे देश के आजादी के आंदोलन की तरफ देखें तो इस बात को हमें स्‍वीकार करना होगा कि भारत की आजादी के आंदोलन का नेतृत्‍व प्रमुखतया वकीलों के द्वारा, बैरिस्‍टरों के द्वारा हुआ। Bar  के ही member थे जिन्‍होंने देश की आजादी की लड़ाई को लड़ा। अंग्रेज़ सल्‍तनत के सामने अपनी बुद्धि का उपयोग, कानूनी व्‍यवस्‍था का उपयोग करते हुए कैसे लड़ा जा सकता है, यह मिसाल अगर किसी ने कायम की तो इस देश की Bar की परंपरा ने की, वकीलों की परंपरा ने की है और इस इस प्रकार से इस पेश से जुड़े हुए लोगों का एक बहुत बड़ा योगदान भारत की आजादी के आंदोलन से जुड़ा हुआ है। उसके बाद भी जब-जब भारत में संकट आया, मूलभूत बातों पर संकट आया, ज्‍यादातर Bar ने आवाज़ उठाई है, ज्‍यादातर न्‍यायालयों ने उसको एक नई ताकत देने का प्रयास किया इसलिए भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए जहां विविधता इतनी है। समाज को बांधकर रखना है, देश को जोड़कर रखना है तो एक सक्रिय प्रयास और वो भी जो समाज में दूरिया पैदा न करें, समाज को जोड़ने के प्रयास में उपकारक हो, उस प्रकार के हमारे movement की आज समय की मांग है। उसको अगर हम Bar के माध्‍यम से चला दे तो बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।

कभी-कभार एक Intuit democratic values में किस प्रकार का बदलाव आता है। एक घटना मेरे लिए बड़ी.. It was a touchy for me so मैं share करना चाहूंगा। मैं पिछले दिनों UK के प्रवास में था तो वहां के प्रधानमंत्री ने मुझे एक सनद गिफ्ट की। Bar की सनद गिफ्ट की और उसका इतिहास ऐसा था कि भारत की आजादी में जो सशस्‍त्र क्रान्‍ति में विश्‍वास करते थे। दो प्रवाह थे – एक अहिंसा में विश्‍वास करता था, एक सशस्‍त्र क्रान्‍ति में विश्‍वास करता था। सशस्‍त्र क्रान्‍ति में विश्‍वास करने वाले लोगों के क्रान्‍ति गुरु थे, श्‍यामजी कृष्‍ण वर्मा। 1930 में उनका स्‍वर्गवास हुआ और लंदन में अंग्रेजों की नाक के नीचे बैठकर के वो आजादी की लड़ाई लड़ते थे। मदनलाल ढींगरा समेत कई लोगों को प्रेरणा देते रहते थे और इसलिए वहां के Bar ने उनकी सनद को withdraw कर लिया।

मैं इस Bar जब गया तो Bar ने officially पुनर्विचार किया और इतने सालों के बाद, शायद 1920 के बाद, करीब-करीब 100 साल के बाद उस सनद को उन्‍होंने सम्‍मानपूर्वक लौटाया। यानी भारत की आजादी का एक रवैया, अंग्रेजों ने जिसकी सनद को ले लिया था। बाद में ले लिया था लेकिन 100 साल के बाद उस सनद को लौटाया। इस घटना का मैं इसलिए जिक्र करता हूं कि 100 साल के बाद उस व्‍यक्‍ति का कोई रिश्‍तेदार भी वहां मौजूद नहीं है लेकिन न्‍याय व्‍यवस्‍था से जुड़े हुए लोगों के मन में एक था कि यह स्‍थिति बदलनी चाहिए और उन्‍होंने initiative लिया और बदला। भारत का प्रधानमंत्री वहां जाता है तो एक महत्‍वपूर्ण घटना के रूप में उसको लौटाया जाता है। ये है हमारे यहां मूल्‍यों की प्रतिबद्धता के संबंध में पूरी वैश्‍विक सोच, हम उन चीजों को लेकर के कैसे आगे बढ़े।

मैं आज इस शताब्‍दी समारोह के समापन के साथ नई शताब्‍दी के शुभारंभ के समय आप सबको बहुत शुभकामनाएं देता हूं और देश को बहुत-सी अमानत आपकी तरफ से मिलती रहेगी। इसी एक अपेक्षा के साथ सबका बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

Explore More
Today, the entire country and entire world is filled with the spirit of Bhagwan Shri Ram: PM Modi at Dhwajarohan Utsav in Ayodhya

Popular Speeches

Today, the entire country and entire world is filled with the spirit of Bhagwan Shri Ram: PM Modi at Dhwajarohan Utsav in Ayodhya
'Make in India' radar programme to help Tejas track targets gets Rs 2,205 crore boost

Media Coverage

'Make in India' radar programme to help Tejas track targets gets Rs 2,205 crore boost
NM on the go

Nm on the go

Always be the first to hear from the PM. Get the App Now!
...
Text of PM’s address during inauguration of the Swami Vivekananda Cultural Youth Centre-Viveka Smaraka in Mysuru
August 01, 2026

एल्लरिगू नन्ना नमस्कारगलु।

रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशनबेलूर मठ के अध्यक्ष परम पूज्य स्वामी गौतमानंद जी महाराज, श्री रामकृष्ण आश्रम, मैसुरू के अध्यक्ष पूज्य स्वामी मुक्तिदानंद जी, रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन के ट्रस्टी पूज्य स्वामी यादवेंद्रानंद जी, राज्यपाल श्री थावरचंद गहलोत जी, मुख्यमंत्री श्री डी.के. शिवकुमार जी, सांसद यदुवीर कृष्णदत्त चामराज वाडियार जी, विधायक विजयेंद्र येदियुरप्पा जी, के. हरीश गौड़ा जी, अन्य महानुभाव, पूज्य संतगण और भाईयों और बहनों।

सर्वप्रथम मैं मैसूरू की अधिष्ठात्री देवी मां चामुंडेश्वरी को प्रणाम करता हूं। अभी दो दिन पहले ही हम सभी ने गुरू पूर्णिमा भी मनाई है। आप सब जानते हैं, मेरी यात्रा जहां से शुरू हुई और आज मैं जहां हूं, इसमें राम कृष्ण मिशन का बहुत अहम योगदान है। मैं तीन महीने पहले हावड़ा में बेलूर मठ गया था। सभी पूज्य संतों से सतसंग करने का अवसर मिला था। मेरा सौभाग्य है कि आज मुझे फिर मैसूरू में श्री रामकृष्ण आश्रम से जुड़े संतों से, मेरे गुरू बंधुओं से मिलने का, उनसे आशीर्वाद लेने का अवसर मिला है। आप सभी की उपस्थिति की वजह से, आज मैसूरू की इस पवित्र भूमि पर मुझे एक अलग ही ऊर्जा अनुभव हो रही है। मैं आप सभी संतों के चरणों में सादर प्रणाम करता हूं।

साथियों,

मैसूरू भारत की अनादि सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रहा है। यहां के मंदिर, यहां की परंपराएं और उत्सव, मैसूरू का दशहरा, यहां के भव्य महल, इसका संगीत और साहित्य, भारत की विरासत इस शहर के कण-कण में रची बसी है। और यह देखकर बहुत संतोष मिलता है। इस शहर ने इस विरासत को उसी कुशलता से सहेजा भी है, संवारा भी है। श्री रामकृष्ण आश्रम और स्वामी विवेकानंद जी की स्मृतियां भी मैसुरू की विरासत का ही एक समृद्ध हिस्सा हैं। कुछ देर पहले मैं उस ऐतिहासिक भवन में भी गया था, जहां स्वामी विवेकानंद जी ने अपने प्रवास के दौरान कुछ समय बिताया था। कर्नाटका के कितने ही विद्वान और मनीषी इस स्थान से जुड़े रहे हैं। राष्ट्रकवि कुवेम्पु जैसे महापुरुष जब मैसुरू में थे, उनका भी श्रीरामकृष्ण आश्रम से गहरा जुड़ाव था। आज स्वामी विवेकानंद कल्चरल यूथ सेंटर, यानी विवेका स्मारका के उद्घाटन के जरिए, हम इस मिशन को नया विस्तार दे रहे हैं। इसके लिए मैं श्रीरामकृष्ण आश्रम और इससे जुड़े सभी विद्वानों को हार्दिक बधाई देता हूं।

साथियों,

व्यक्ति से विभूति का निर्माण एकाएक नहीं होता। इसके लिए हमें जीवन की अनगिनत परीक्षाएँ देनी होती हैं। साधना करनी होती है, तप करना होता है, खुद को तपाना पड़ता है, खपाना पड़ता है। ख्याति के बाद तो संसार पीछे खड़ा होता है। लेकिन, तप के समय महान विभूतियों को पहचानना आसान नहीं होता। जो साधक को तपस्या में पहचानता है, वो उसकी सिद्धि का सहभागी भी होता है।

इसलिए भाइयों बहनों,

स्वामी विवेकानंद के जीवन में मैसुरू का इतना अहम योगदान था। करीब 130 वर्ष पहले, स्वामी जी, एक युवा संन्यासी के रूप में भ्रमण करते हुए मैसुरू आए थे। तब उनकी प्रसिद्धि वैसी नहीं थी। लेकिन, विचार उतने ही ऊंचे थे। उस समय उन्हें जिन लोगों ने पहचाना, जो उनके साथ जुड़े, उनमें से एक प्रमुख नाम मैसुरू के तत्कालीन महाराजा का भी था। जब स्वामी विवेकानंद जी अमेरिका में थे, तो उन्होंने वहाँ से मैसुरू के तत्कालीन महाराजा को एक पत्र लिखा था। उसमें उन्होंने स्वयं महाराजा के सहयोग का उल्लेख किया था।

साथियों,

स्वामी विवेकानंद जी ने भारतीय चेतना को आत्मसात किया था। उन्होंने शास्त्रों को आत्मसात किया था जो कहते हैं- “परं परोपकारार्थं यो जीवति स जीवति”। अर्थात्, वास्तव में वही जीता है जो दूसरों के लिए जीता है। इसी मंत्र पर चलते हुए, मैसुरू के इस श्री रामकृष्ण आश्रम ने पिछले वर्ष अपने सौ साल पूरे किए हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ी सेवाएँ हों, या प्राकृतिक आपदा में राहत कार्य, श्री रामकृष्ण आश्रम ने स्वामी विवेकानंद जी की विरासत को जीवंत रखा है। मुझे विश्वास है विवेका स्मारका साधकों और श्रद्धालुओं के लिए आत्मिक उत्थान का तीर्थ बनेगा। स्वामी विवेकानंद जी की प्रेरणा थी- ‘शिव ज्ञाने जीव सेवा’। यानी जीव की सेवा ही शिव की सेवा है। हमें इस विवेका स्मारक में इसलिए, ऐसे युवाओं को गढ़ना है, जिनके लिए समाज और राष्ट्र के हित, गरीब-वंचित के दुःख, अपने सुख-दुःख से ऊपर हों। जिन युवाओं के लिए राष्ट्र प्रथम ही सर्वोपरि मंत्र हो, मां भारती की सेवा ही जिनका जीवन लक्ष्य हो।

साथियों,

स्वामी विवेकानंद जी युवाओँ की शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का मजबूत आधार मानते थे। उन्होंने स्वयं ये देखा था कि कैसे दुनिया के देश अपने युवाओं को शिक्षित बना रहे हैं। लेकिन दुर्भाग्य से तब भारत गुलाम था। भारत के युवा भी गुलामी की जंजीरों में जक़ड़े हुए थे। उस दौर से लेकर अब तक, भारत के युवा ने एक लंबी यात्रा तय की है। भारत का जो युवा कभी जंजीरों में था, आज वो युवा दुनिया के विकास को गति दे रहा है।

· आज भारत की अर्थव्यवस्था, सबसे तेजी से आगे बढ़ रही है।

· किसकी वजह से? भारत के युवाओँके सामर्थ्य से।

· आज भारत में दुनिया की तीसरा सबसे बड़ा स्टार्ट-अप इकोसिस्टम है।

· किसकी वजह से? भारत के युवाओँ के सामर्थ्य से।

· आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता बन चुका है।

· किसकी वजह से?

· भारत के युवाओं के सामर्थ्य से।

· आज भारत से बने Digital Solutions, दुनिया के अनेक देशों के लिए प्रेरणा बन रहे हैं।

· किसकी वजह से?

· भारत के युवाओं के सामर्थ्य से।

· आज भारत सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग की नई यात्रा पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।

· किसकी वजह से?

· भारत के युवाओं के सामर्थ्य से।

· आज भारत AI, Deep Tech, Space Technology और Innovation के नए अध्याय लिख रहा है।

· किसकी वजह से?

· भारत के युवाओं के सामर्थ्य से।

अभी कुछ दिन पहले ही हमने देखा है, भारत के युवाओं ने अंतरिक्ष में कमाल कर दिया है। पहली बार युवाओं का बनाया हुआ एक प्राइवेट कंपनी का रॉकेट, अंतरिक्ष तक पहुंचा है। आज कोई भी सेक्टर हो, भारत युवा अपना दम-खम दिखा रहा है। हम सभी अपने आसपास देख रहे हैं, आज छोटे से छोटे व्यवसाय में लगा युवा, भारत की डिजिटल इकॉनमी को आगे बढ़ा रहा है। वो मुद्रा लोन के जरिए नई शुरुआत कर रहा है। वो देश की स्टार्टअप revolutionको लीड कर रहा है। आत्मनिर्भर भारत का अभियान हो, मेक इन इंडिया का अभियान हो, इसकी सफलता के पीछे भारत के युवाओं की ही ताकत है।

साथियों,

किसी भी देश में, युवाओं का सामर्थ्य तभी उस राष्ट्र की शक्ति बनता है, जब उसे सही अवसर मिले, जब उसे सही दिशा मिले, और जब उसे अपनी ही धरती पर बड़े सपने देखने, उन्हें पूरा करने का भरोसा मिले। और इसमें बहुत बड़ी भूमिका हमारे शिक्षा संस्थानों की होती है। मुझे खुशी है कि आज भारत में शिक्षण संस्थाओँ की संख्या लगातार बढ़ रही है। पिछले 12 वर्षों में, 650 से ज्यादा नई यूनिवर्सिटीज बनी हैं। पिछले 12 वर्षों में करीब 14 हजार नए कॉलेज बने हैं। 4 हजार से ज्यादा नई ITI बनाई गई हैं। 9 नए आई.आई.एम, 7 नई आई.आई.टी, और13 नए एम्स भी स्थापित किए गए हैं। आज देश में MBBS की सीटें करीब 1 लाख 40 हजार हो चुकी हैं। मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़कर 823 हो गई है।

साथियों,

एक ओर हम एजुकेशन इनफ्रास्ट्रक्चर को modernize कर रहे हैं। साथ ही, शिक्षा व्यवस्था को भी आधुनिक जरूरतों के हिसाब से ढाला जा रहा है। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी, भारत के युवाओँ को 21वीं सदी के अनुरूप तैयार करने का माध्यम बन रही है।

साथियों,

स्कूली शिक्षा में भी बड़े स्तर पर काम हुआ है। देशभर में 14 हजार से ज्यादा पीएम श्री स्कूल विकसित किए गए हैं। शिक्षा केवल किताबी न रहे, बच्चों में इनोवेशन और साइंटिफिक टेंपरामेंट विकसित हो, इसके लिए,10 हजार से ज्यादा अटल टिंकरिंग लैब्स स्थापित हुई हैं।

साथियों,

स्वामी विवेकानंद जी, राष्ट्र उत्थान के लिए शिक्षा के साथ-साथ समानता को भी उतना ही अहम मानते थे। शिक्षा में भेदभाव न हो, अवसरों में भेदभाव न हो, आज ये देश का विज़न बन गया है। आज बेटियाँ भी सैनिक स्कूलों में एड्मिशन ले रहीं हैं। एनडीए में बेटियां राष्ट्र के लिए योगदान दे रही हैं। आज मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसी पढ़ाई मातृभाषा में करने की सुविधा हो गई है। इससे, भाषा के आधार पर अवसरों में होने वाले भेदभाव पर लगाम लग रही है।

साथियों,

युवा शक्ति का स्वस्थ, अनुशासित और आत्मविश्वास से भरे रहना उतना ही जरूरी है। जो देश खेलों को महत्व देते हैं, वहां के युवाओं में इन तीनों गुणों का तेजी से विकास होता है। इसलिए आज खेलों को राष्ट्र निर्माण की एक महत्वपूर्ण धारा के रूप में देखा जा रहा है। खेलो इंडिया यूथ गेम्स, यूनिवर्सिटी गेम्स, पैरा गेम्स और विंटर गेम्स जैसे आयोजनों ने देशभर के युवाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच दिया है। आज देशभर में आधुनिक स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार हो रहा है, खेलो इंडिया सेंटर के माध्यम से सुविधाएं बढ़ रही हैं, गांवों से लेकर छोटे शहरों तक नई प्रतिभाओं की पहचान की जा रही है।

और साथियों,

आज इस अभियान के परिणाम भी साफ - साफ दिखाई दे रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में भारत का प्रदर्शन बेहतर होता जा रहा है। हमारे खिलाड़ी नए-नए कीर्तिमान बना रहे हैं, हमारी बेटियां देश का गौरव बढ़ा रही हैं।

साथियों,

स्वामी विवेकानंद जी की तरह, हमें विवेका स्मारका, बड़े उद्देश्य के लिए कार्य करने की प्रेरणा देता है। ऐसे स्थान पर मैं हमारे युवाओं से कुछ आग्रह करना चाहता हूं।

साथियों,

मैसुरू को अक्सर भारत के सबसे स्वच्छ शहरों में स्थान मिला है। मैं इसके लिए यहां के लोगों को हृदय से बधाई देता हूं। क्या इस अवसर पर हम ये संकल्प ले सकते हैं, कि भविष्य में स्वच्छता के संकल्प को निरंतर मजबूत करते रहेंगे। हमें यहाँ की प्राकृतिक संपदाओं को संरक्षित करना चाहिए। हमें पर्यावरण से जुड़े संकल्प लेने चाहिए। हमें पानी की हर बूंद बचाने के लिए मिशन मोड में काम करना होगा।

साथियों,

आज ही यहां ‘वाल्मीकि रामायण’ के कन्नड़ा अनुवाद का विमोचन भी हुआ है। मैं कन्नड़ा भाषा से जुड़ी एक अपील भी करना चाहता हूं। कर्नाटका महान लेखकों और कवियों की धरती है। कन्नड़ा भाषी लोग हमेशा से पढ़ने की संस्कृति के लिए जाने जाते हैं। स्मार्टफोन के इस युग में इस स्वभाव को और बढ़ावा मिलना चाहिए। क्या हम युवा पीढ़ी को कन्नड़ा साहित्य से गहराई से जुड़ने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

साथियों,

मैसुरू अपने सिल्क, चंदन और हस्तशिल्प के लिए प्रसिद्ध है। जब भी हम किसी को उपहार दें, तो क्या हम ये सुनिश्चित कर सकते हैं कि वो किसी भारतीय के हाथों और पसीने से बनी चीज हो? इससे हमारी संस्कृति को बढ़ावा मिलेगा, साथ ही, एक और परिवार को आर्थिक सहायता भी मिलेगी।

साथियों,

स्वामी विवेकानंद जी ने जिस तरह के भारत का सपना देखा था, उसे पूरा करने का दायित्व आज की पीढ़ी पर है। मुझे विश्वास है, विवेका स्मारका इसके लिए एक ऊर्जा स्रोत का काम करेगा। मैं एक बार फिर, यहां एकत्र पूज्य संतजनों गुरू बंधुओं और मैसुरू के लोगों को नमन करते हुए मेरी वाणी को विराम देता हूं। आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद।