संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) भारत की ओर से आज जारी एक स्वतंत्र मूल्यांकन रिपोर्ट में आकांक्षी जिला कार्यक्रम (एडीपी) को 'स्थानीय क्षेत्र के विकास का एक अत्‍यंत सफल मॉडल' के रूप में सराहा गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसे कई अन्‍य देशों में भी इसे सर्वोत्‍तम प्रथा के रूप में अपनाया जाना चाहिए जहां कई कारणों से विकास में क्षेत्रीय असमानता मौजूद हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि एडीपी के तहत किए गए ठोस प्रयासों के कारण पहले से उपेक्षित जिलों, जिनमें दूरदराज के जिले और वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिलों शामिल हैं, में पिछले तीन वर्षों के दौरान पहले के मुकाबले कहीं अधिक विकास हुआ है। अपने सफर की कुछ बाधाओं के बावजूद एपीडी पिछड़े जिलों के बीच विकास को बढ़ावा देने में बेहद सफल रहा है।

यूएनडीपी इंडिया रेजिडेंट रिप्रेजेंटेटिव शोको नोडा ने आज यह रिपोर्ट नीति आयोग के वाइस चेयरमैन डॉ. राजीव कुमार और सीईओ अमिताभ कांत को सौंपी। इसमें आकांक्षी जिला कार्यक्रम की प्रगति पर ध्‍यान केंद्रित किया गया है और सुधार के लिए सिफारिशें की गई हैं। यह रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आंकड़ों के मात्रात्मक विश्लेषण के साथ-साथ विभिन्न हितधारकों के साक्षात्कार पर आधारित है जिसमें जिला कलेक्‍टर, केंद्रीय प्रभारी अधिकारी, जिला के सहायक अधिकारी एवं अन्य विकास भागीदार शामिल हैं।

यूएनडीपी का यह विश्लेषण एडीपी के 5 प्रमुख क्षेत्रों पर आधारित हैं जिनमें स्वास्थ्य एवं पोषण, शिक्षा, कृषि एवं जल संसाधन, बुनियादी ढांचा और कौशल विकास एवं वित्तीय समावेशन शामिल हैं। अध्‍ययन में पाया गया कि इस कार्यक्रम ने इन जिलों में विकास की रफ्तार बढ़ाने के लिए उत्प्रेरक का काम किया है। रिपोर्ट के अनुसार, जहां स्वास्थ्य एवं पोषण, शिक्षा और कुछ हद तक कृषि एवं जल संसाधन जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर सुधार दर्ज किया गया है, वहीं महत्वपूर्ण प्रगति के बावजूद अन्य संकेतक कहीं अधिक मजबूती की गुंजाइश को दर्शाते हैं।

आकांक्षी जिलों और उनके समकक्षों के बीच तुलना पर पाया गया कि गैर- आकांक्षी जिलों के मुकाबले आकांक्षी जिलों ने बेहतर प्रदर्शन किया है। स्वास्थ्य एवं पोषण और वित्तीय समावेशन के क्षेत्रों में रिपोर्ट में पाया गया है कि घरों पर होने वाली डिलिवरी के 9.6 प्रतिशत अधिक मामलों में एक कुशल जन्म परिचारिका ने भाग लिया। गंभीर रक्ताल्पता वाली 5.8 प्रतिशत अधिक गर्भवती महिलाओं का इलाज किया गया, डायरिया से पीड़ित 4.8 प्रतिशत अधिक बच्चों का इलाज किया गया, 4.5 प्रतिशत अधिक गर्भवती महिलाओं ने अपनी पहली तिमाही में प्रसवपूर्व देखभाल के लिए पंजीकरण करवाया, प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना और प्रधान मंत्री जन-धन योजना के तहत क्रमशः 406 एवं 847 अधिक नामांकन हुए और प्रति 1 लाख जनसंख्या पर 1,580 अधिक खाते खोले गए। यूएनडीपी ने बीजापुर और दंतेवाड़ा में 'मलेरिया मुक्त बस्तर अभियान' की भी सराहना की है जिससे इन जिलों में मलेरिया के मामलों में क्रमशः 71 प्रतिशत और 54 प्रतिशत की कमी आई है। इसे आकांक्षी जिलों का एक 'सर्वोत्तम प्रथा' करार दिया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, जिलों ने यह भी स्वीकार किया है कि स्वास्थ्य एवं पोषण कार्यक्रमों पर लगातार ध्‍यान केंद्रित करने से उन्हें कहीं अधिक आसानी से कोविड संकट से निपटने में मदद मिली है। उदाहरण के लिए ओडिशा के मलकानगिरी जिले को ही लेते हैं जो छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों के करीब स्थित है। लॉकडाउन के शुरुआती चरण के दौरान राज्य में वापस लौटने वाले कई प्रवासी श्रमिकों के लिए यह एक प्रवेश मार्ग बन गया था। जिले के अधिकारियों ने दावा किया कि उन प्रवासियों को क्‍वारंटीन करने के लिए नए बुनियादी ढांचे का उपयोग संस्थागत क्‍वारंटीन केंद्रों के रूप किया गया।

इस पहल की सफलता का श्रेय मुख्‍य तौर पर रियल-टाइम निगरानी के आंकड़े, सरकारी कार्यक्रमों एवं योजनाओं को एक साथ करने और आकांक्षी जिला कार्यक्रम के जबरदस्‍त लाभ को दिया गया है।

रिपोर्ट में इस कार्यक्रम के तहत उद्देश्‍यों और लक्ष्यों को हासिल करने के लिए केंद्र एवं स्‍थानीय सरकारों, विकास भागीदारों और नागरिकों सहित सभी हितधारकों को एकजुट करने की इसकी अनोखी सहयोगात्‍मक प्रकृति पर भी गौर किया गया है। यही वह प्रमुख स्तंभ है जिसने जिला आयुक्तों को 'एक मजबूत कोविड-19 प्रतिक्रिया तंत्र स्‍थापित करने और अपने संबंधित जिलों में पंचायतों, धार्मिक एवं समुदाय के नेताओं और विकास भागीदारों के साथ करीबी तालमेल के साथ काम करते हुए इस वैश्विक महामारी की चुनौतियों से निपटने में समर्थ बनाया।

रिपोर्ट में इस कार्यक्रम के प्रति प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी सहित देश के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व द्वारा दिखाई गई उल्लेखनीय प्रतिबद्धता को भी स्वीकार किया गया है। वर्ष 2018 में इस कार्यक्रम के शुभारंभ के बाद से ही प्रधानमंत्री ने लगातार जिला स्तर पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए जिला कलेक्टरों को प्रेरित और उत्साहित किया है।

एडीपी के दृष्टिकोण के 3सी 'कन्‍वर्जेंस, कम्पिटिशन और कोलैबरेशन' यानी अभिसरण, प्रतिस्पर्धा और सहयोग के बारे में रिपोर्ट में कहा गया है कि साक्षात्‍कार देने वाले अधिकतर लोगों ने अभिसरण के महत्व पर जोर दिया है जो कार्यक्रम के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सिंक्रनाइज्‍ड नियोजन एवं शासन की दिशा में साथ मिलकर काम करने को बढ़ावा देता है। इसी प्रकार, प्रतिस्पर्धा वाले पहलू को भी इस कार्यक्रम के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए बेहतर निगरानी और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने में काफी मददगार पाया गया। इसने जिलों के लिए अपने प्रयासों को बेहतर करने और प्रगति पर नजर रखने के लिए एक प्रेरक के रूप में काम किया।

इस कार्यक्रम ने जिलों की तकनीकी और प्रशासनिक क्षमताओं को मजबूत किया है। हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि क्षमता निर्माण पर कहीं अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। इसमें सभी जिलों में एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट फेलो अथवा टेक्निकल सपोर्ट यूनिट जैसे समर्पित कर्मियों की नियुक्ति अथवा तकनीकी विशेषज्ञता, कौशल प्रशिक्षण आदि प्रदान करने के लिए विकास भागीदारों के साथ सहयोग करना शामिल है।

रिपोर्ट में इस कार्यक्रम के चैंपियंस ऑफ चेंज डैशबोर्ड पर प्रदान की गई डेल्टा रैंकिंग की भी सराहना की गई है। इसके द्वारा प्रेरित प्रतिस्पर्धी एवं गतिशील संस्कृति ने कमजोर प्रदर्शन करने वाले कई जिलों (बेसलाइन रैंकिंग के अनुसार) को पिछले तीन वर्षों के दौरान अपनी स्थिति में सुधार लाने के लिए सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया है। रिपोर्ट में पाया गया है कि सिमडेगा (झारखंड), चंदौली (उत्तर प्रदेश), सोनभद्र (उत्तर प्रदेश) और राजगढ़ (मध्य प्रदेश) इस कार्यक्रम की शुरुआत के बाद सबसे अधिक प्रगति करने वाले जिलों में शामिल हैं।

रिपोर्ट में इस कार्यक्रम के तहत शुरू की गई कई पहल को सर्वोत्तम प्रथा करार दिया गया है। उनमें से एक उल्‍लेख्‍नीय पहल है गोल मार्ट। यह एक ई-कॉमर्स पोर्टल है जिसे असम के गोलपारा जिला प्रशासन द्वारा शुरू किया गया था ताकि जिले के ग्रामीण, जातीय एवं कृषि उत्पादों को राष्ट्रीय एवं वैश्विक बाजारों में बढ़ावा दिया जा सके। यह पहल विशेष तौर पर कोविड-19 प्रेरित लॉकडाउन के दौरान काफी मददगार साबित हुई क्योंकि इसने किसानों और खुदरा विक्रेताओं को ऑफलाइन दुकानों के चंगुल से मुक्त कर दिया। गोलपारा का काला चावल इस पोर्टल पर पसंदीदा उत्‍पाद है और यह किसानों के लिए काफी लाभदायक भी साबित हुआ है। इसी प्रकार, उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले ने वैश्विक बाजारों में काले चावल की जबरदस्‍त मांग और अच्‍छे मुनाफा मार्जिन को देखते हुए उसकी खेती के साथ प्रयोग करने का निर्णय लिया। यह परियोजना सफल रही और अब ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड को उच्च गुणवत्ता वाले काले चावल का निर्यात किया जाता है।

जहां तक चुनौतियों और सुझावों का सवाल है तो रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ हितधारकों ने ऐसे कुछ संकेतकों को संशोधित करने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला है जिन्‍हें अधिकतर जिलों द्वारा पूरा कर लिया गया है अथवा पूरा होने के करीब हैं। उदाहरण के तौर पर, बुनियादी ढांचे के संकेतक के रूप में घरों का विद्युतीकरण आदि। यह भी पाया गया कि औसतन जिलों में लचीलेपन में वृद्धि और कमजोरियों में कमी देखी गई है। लेकिन सबसे कम सुधार वाले जिलों में कमजोरियों में वृद्धि देखी गई है जिसके लिए उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है जहां इन जिलों ने कमजोर प्रदर्शन किया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि आकांक्षी जिला कार्यक्रम को किसी को भी पीछे न छोड़ने के सिद्धांत के आधार पर तैयार किया है जो एसडीजी का महत्वपूर्ण बुनियाद है। रिपोर्टमें यह भी कहा गया है कि शीर्ष स्तर पर राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के परिणामस्वरूप इस कार्यक्रम को तेजी से सफलता मिली है।

कुल मिलाकर, रिपोर्ट में इस कार्यक्रम के सकारात्मक प्रभाव की सराहना की गई है। साथ ही यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है कि विकास पर ध्यान केंद्रित करने को प्रोत्साहित किया जाए और अब तक प्राप्‍त विकास की गति को बनाए रखा जाए। रिपोर्ट में कहा गया है, 'मूल्यांकन के निष्कर्षों के आधार पर यह सिफारिश की जाती है कि इस कार्यक्रम की सफलता को बढ़ाया जाए और अन्य क्षेत्रों एवं जिलों भी उसे दोहराया जाए।'

प्रधानमंत्री द्वारा जनवरी 2018 में आकांक्षी जिला कार्यक्रम को शुरू किया गया था। नागरिकों के जीवन स्‍तर को बेहतर करने और सभी के लिए समावेशी विकास 'सबका साथ, सबका विकास' सुनिश्चित करने के लिए सरकार के प्रयास के तहत इसकी शुरुआत हुई थी।

रिपोर्ट यहां डाउनलोड करें.

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गुजरात के मुख्यमंत्री श्रीमान भूपेंद्र भाई पटेल, राज्य के उप मुख्यमंत्री श्री हर्ष भाई संघवी, केंद्रीय मंत्रिमंडल में मेरे साथी अश्विनी वैष्णव जी, राज्य के मंत्री भाई अर्जुन मोढवाडिया जी, केन्स और अल्फा ओमेगा सेमीकंडक्टर्स के प्रतिनिधिगण अन्य महानुभाव, देवियों और सज्जनों।

पिछले महीने के अंतिम दिन भी मैं साणंद में था, और इस महीने के अंतिम दिन भी मैं साणंद में हूं। 28 फरवरी को माइक्रोन के प्लांट में प्रोडक्शन की शुरुआत हुई, और आज 31 मार्च को, केन्स टेक्नॉलॉजी के सेमीकंडक्टर प्लांट में प्रोडक्शन शुरु हो रहा है। ये मात्र संयोग नहीं है, ये इस बात का प्रमाण है कि भारत का सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम, किस पेस से, किस गति से, किस स्पीड के साथ डेवलप हो रहा है। मैं केन्स टेक्नॉलॉजी की पूरी लीडरशिप को बहुत-बहुत बधाई देता हूं। रमेश रघु congratulations. गुजरात सरकार को, इस प्लांट में काम कर रहे और सभी साथियों को मैं बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

साथियों,

आज सुबह मैं एक डिवाइन वाले कार्यक्रम में था और अभी मैं डिजिटल वाले कार्यक्रम में हूं।

साथियों,

मुझे इस बात की भी बेहद खुशी है कि भारत की कंपनी ने semiconductor चिप्स बनाने में रुचि दिखाई, और नतीजा हम सबके सामने है। हमारे भारत की अपनी कंपनी केन्स अब ग्लोबल semiconductor सप्लाई चेन का एक मजबूत हिस्सा बन गई है। ये एक बहुत शानदार शुरुआत है, एक गर्व का पल है, हर भारतवासी के लिए गर्व का पल है। आने वाले दिनों में भारत की बहुत सारी कंपनियां, ग्लोबल collaboration के माध्यम से, दुनिया को एक resilient semiconductor सप्लाइ चेन देने जा रही है।

साथियों,

आज का ये दिन, मेक इन इंडिया, मेक फॉर द वर्ल्ड, इस मंत्र को सही मायने में चरितार्थ करता है। इस प्रोजेक्ट में प्रोडक्शन शुरु होने से, भारत ग्लोबल मार्केट में, एक भरोसेमंद सेमीकंडक्टर सप्लायर के रूप में अपना रोल और सशक्त कर रहा है। आज एक प्रकार से साणंद और सिलिकॉन वैली के बीच नया ब्रिज सा बन गया है। कैलिफोर्निया की कंपनी के लिए, साणंद का ये प्लांट Intelligent Power Modules दे रहा है। मुझे बताया गया है कि यहां बनने वाले प्रोडक्ट्स का एक बड़ा हिस्सा, पहले ही एक्सपोर्ट के लिए बुक हो चुका है। साणंद में बनने वाले modules अमेरिका की कंपनियों तक पहुंचेंगे, और वहां से पूरी दुनिया को पावर देंगे। मेक इन इंडिया, मेक फॉर द वर्ल्ड के मंत्र की सफलता की गूंज दुनिया के कोने-कोने में पहुंचेगी।

साथियों,

यहां बनने वाले इंटेलिजेंट पावर मॉड्यूल्स से, भारत और विश्व के इलेक्ट्रिक व्हीकल इकोसिस्टम को, हैवी इंडस्ट्री को बहुत बल मिलेगा। यही ग्लोबल पार्टनरशिप ही दुनिया के बेहतर भविष्य की मजबूत नींव है।

साथियों,

21वीं सदी का ये दशक आरंभ से दुनिया के लिए अनेक चुनौतियां लेकर आया है। संकट पेंडमिक का रहा है, conflicts का रहा है। इसमें भी सबसे बड़ी भुक्तभोगी, ग्लोबल सप्लाई चेन रही है। चाहे चिप्स हो, रेयर अर्थ मिनरल्स हों, एनर्जी हो, ये conflicts की वजह से बहुत प्रभावित हुए हैं। ये मानवता के तेज विकास से जुड़ी चीज़ें हैं, इनकी सप्लाई चेन में, इनके फ्लो में ब्रेक लगने से, पूरी ह्यूमैनिटी का विकास प्रभावित होता है। इसलिए भारत जैसे डेमोक्रेटिक देश का इस दिशा में आगे बढ़ना, पूरे विश्व के विकास के लिए बहुत अहम है।

साथियों,

हमने कोरोना की आपदा के समय ही तय कर लिया था, कि भारत सेमीकंडक्टर सेक्टर का नया ग्लोबल हब बनेगा, इस सेक्टर में आत्मनिर्भर बनेगा। और सेमीकंडक्टर में आत्मनिर्भरता, सिर्फ एक चिप तक सीमित नहीं है। इसका मतलब है, AI में, इलेक्ट्रिक व्हीकल में, क्लीन एनर्जी में, डिफेंस में, इलेक्ट्रॉनिक्स में, ऐसे अनेक सेक्टर में भी आत्मनिर्भरता को बल मिलेगा। इसलिए, साल 2021 में भारत ने इंडिया-सेमीकंडक्टर मिशन शुरु किया। यह mission सिर्फ एक industrial policy नहीं है, यह भारत के आत्मविश्वास का ऐलान है। और इसका इंपैक्ट सबके सामने है। इस मिशन के तहत, देश के 6 राज्यों में एक लाख साठ हज़ार करोड़ रुपए के 10 प्रोजेक्ट्स पर काम हो रहा है। केन्स और माइक्रोन के प्रोजेक्ट्स भी इसी का हिस्सा हैं। सेमीकंडक्टर चिप डिजाइन और मैन्यूफैक्चरिंग में आत्मनिर्भरता के लिए भारत ने ध्रुव Sixty Four जैसा, आधुनिक माइक्रोप्रोसेसर विकसित किया है। इससे 5G इंफ्रास्ट्रक्चर, ऑटोमोटिव इलेक्ट्रॉनिक्स, industrial automation, ऐसे अनेक सेक्टर्स के लिए हमें एक अपना सुरक्षित platform मिला है।

साथियों,

सेमीकंडक्टर मिशन की अब तक की सफलता के बाद, अब भारत ने इसके अगले फेज की तरफ कदम बढ़ाया है। इसी सोच के साथ, इस वर्ष के बजट में इंडिया-सेमीकंडक्टर मिशन 2.0 की घोषणा की गई है। इस फेज का फोकस, भारत में सेमीकंडक्टर इक्विपमेंट्स और मटीरियल्स के प्रोडक्शन पर है। अब हमारा प्रयास, एक फुल स्टैक भारतीय सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम तैयार करने का है। ताकि हम डोमेस्टिक और ग्लोबल सप्लाई चेन में बड़ी पार्टनरशिप कर सकें।

साथियों,

भारत आज industry led research and training centres को प्रोत्साहित कर रहा है। ताकि technology development भी हो और एक future ready skilled workforce भी तैयार हो। बहुत जल्द ही, देश में 85 हजार से अधिक डिजाइन प्रोफेशनल्स तैयार करने के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया जाएगा। साथ ही, पूरे इकोसिस्टम की जरूरतों को देखते हुए प्रोफेशनल्स की ट्रेनिंग की भी व्यवस्था की जा रही है। सेमीकंडक्टर डिजाइन को बढ़ावा देने के लिए चिप्स टू स्टार्टअप भी कार्यक्रम चल रहा है। आज देश की करीब 400 यूनिवर्सिटीज और स्टार्टअप्स को, आधुनिक डिजाइन टूल्स तक access दी गई है। इससे फिफ्टी फाइव से अधिक चिप्स का डिजाइन और निर्माण किया जा चुका है।

साथियों,

इंडस्ट्री एस्टीमेट्स के अनुसार, आज भारत का सेमीकंडक्टर मार्केट करीब फिफ्टी बिलियन डॉलर, यानी करीब-करीब साढ़े चार लाख करोड़ रुपए का है। ये इस दशक के अंत तक सौ बिलियन डॉलर यानी नौ लाख करोड़ रुपए को पार कर सकता है। ये दिखाता है कि भारत में इस सेक्टर में कितनी ज्यादा संभावनाएं हैं। हमारा टारगेट अपनी ज़रूरतों की अधिक से अधिक चिप्स, भारत में ही बनाने का है। भारत के इस संकल्प को लेकर दुनियाभर के निवेशकों में जो उत्साह है, वो हमारे लिए बहुत बड़ी पूंजी है।

साथियों,

भारत एक सशक्त सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम तो बना ही रहा है, साथ ही, रॉ मटीरियल की रिज़ीलियन्ट सप्लाई चेन के लिए भी बड़े प्रयास कर रहा है। पैक्स सिलिका में भारत का शामिल होना इसी प्रयास का ही एक हिस्सा है। दुनियाभर में जो हमारे पार्टनर्स हैं, उनके साथ मिलकर भारत में हम एक सुरक्षित सप्लाई चेन सुनिश्चित करना चाहते हैं।

साथियों,

क्रिटिकल मिनरल्स में आत्मनिर्भरता के लिए, भारत ने नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन भी शुरु किया है। इसके तहत, क्रिटिकल मिनरल्स की माइनिंग और प्रोडक्शन पर बल दिया जा रहा है। मिनरल्स की री-साइकलिंग के लिए भी 1500 करोड़ रुपए की स्कीम शुरु की गई है। इस वर्ष के बजट में, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरलम् जैसे कोस्टल स्टेट्स को मिलाकर रेयर अर्थ कॉरिडोर के निर्माण की घोषणा की गई है। ये कॉरिडोर,एक ऐसा Integrated नेटवर्क होगा, जो माइनिंग, रिफाइनिंग और मैन्युफैक्चरिंग की एक सशक्त चेन बनाएगा। हमारा प्रयास है कि देश में क्रिटिकल मिनरल्स का एक राष्ट्रीय भंडार हो। अच्छा होता कि, ये काम 30-40 वर्ष पहले शुरु होता। लेकिन अब भारत इसके लिए मिशन मोड पर काम कर रहा है।

साथियों,

भारत का मानना है, 21वीं सदी का ये कालखंड, सिर्फ economic competition का समय नहीं है। ये फ्यूचर के tech landscape को शेप करने का समय है। इसलिए, मैं इस दशक को, इस डैकेड को, भारत का टैकेड कहता हूं। इस दशक में भारत, टेक्नॉलॉजी से जुड़े जो initiatives ले रहा है, वो आने वाले दशकों में भारत की लीडरशिप को सशक्त करेंगे। आप सभी, हाल में हुई AI impact summit की सफलता से परिचित हैं। अगर AI adoption के मामले में देखें, तो भारत दुनिया में सबसे आगे है। हम भारतीय, टेक को एक्सप्लोर करते हैं। डिजिटल इंडिया की सफलता, फिनटेक में हो रहा शानदार काम, ये technology पर भारतीयों के भरोसे को ही हम देख पाते हैं, उसे दिखाता है। और भारत का जो AI इकोसिस्टम है, उसको हमारे सेमीकंडक्टर सेक्टर के उभार से बहुत मदद मिलेगी।

साथियों,

21वीं सदी का भारत केवल बदलाव का साक्षी नहीं, बल्कि बदलाव का नेतृत्व करने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है।हमारी नीतियां और हमारे निर्णय, आने वाले दशकों की टेक्नोलॉजी और एनर्जी सेक्टोरिटी की मजबूत नींव रख रहे हैं। इसलिए आज भारत हर क्रिटिकल टेक्नॉलॉजी पर अभूतपूर्व निवेश कर रहा है, रिफॉर्म्स कर रहा है। हमने space sector को private players के लिए खोला है, IN-SPACe जैसी संस्थाएं बनाई गईं हैं। इसका परिणाम आज दिख रहा है। स्पेस से जुड़े हमारे स्टार्ट अप्स बहुत ही शानदार काम कर रहे हैं। इसी तरह, हाल में ही हमने Nuclear sector में SHANTI Bill जैसे ऐतिहासिक फैसले लिए हैं। ये रीन्युएबल एनर्जी मिक्स में, न्यूक्लियर एनर्जी के हिस्से को बहुत अधिक बढ़ाने जा रहा है। ये हमारे AI फ्यूचर के लिए भी बहुत ज़रूरी है।

साथियों,

भारत क्वांटम कंप्यूटिंग को भी एक स्ट्रटीजिक एसेट मानकर, मिशन मोड पर काम कर रहा है। ये भारत के डिजिटल फ्यूचर को सशक्त करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा। यानी भारत, आज टेक्नॉलॉजी के विकास और टेक्नॉलॉजी के यूज, दोनों ही मामलों में बहुत तेज़ी से काम कर रहा है। ये पूरी दुनिया के इन्वेस्टर्स के लिए बहुत बड़ा अवसर है। हम Ease of Doing Business, Ease of Manufacturing, Ease in Logistics, इस पर भी निरंतर काम कर रहे हैं।

साथियों,

मुझे विश्वास है, केन्स के इस प्लांट से निकलने वाले प्रोडक्ट factory of the world के रूप में भारत के सफर को और मज़बूती देंगे। एक बार फिर आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं। बहुत बहुत धन्यवाद।