मेरे प्यारे देशवासियो,

क़रीब एक महीने के बाद, मैं फिर से आज आपके बीच आया हूं । एक महीना बहुत लम्बा समय होता है । बहुत सारी घटनाएं देश और दुनिया में होती रहती हैं । आप सबने भी उमंग और उत्साह के साथ दिवाली का पर्व मनाया । उत्सव ही हैं जो समय-समय पर जीवन में उमंग भरते रहते हैं,,,गरीब हो, अमीर हो, गाँव का हो, शहर का हो, हर किसी के जीवन में उत्सव का अपना महात्म्य रहता ही है । दिवाली के बाद आज मैं पहली बार मिल रहा हूँ आपसे । मेरी आपको बहुत बहुत शुभकामनायें हैं ।

पिछली बार जो मैने बातें की थी मुझे उन बातों के बाद एक नया अहसास हुआ है, एक नई अनुभूति हुई है । कभी कभी ऐसा सोचते हैं कि छोड़ो यार .....लोग बेकार हैं, लोगों को कुछ करना नहीं है... हमारा देश ही ऐसा है । मैं पिछले मेरे मन की बात और आज मैं कहता हूं ये सोच बदलना बहुत ही जरूरी है हमारा देश ऐसा नहीं है, हमारे देश के लोग ऐसे नहीं हैं । कभी कभी तो मुझे लगता है कि देश बहुत आगे है, सरकारें बहुत पीछे हैं । और जब मैं अनुभव से कहता हूं कि शायद सरकारों को भी अपनी सोच बदलना बहुत जरूरी है । और मैं इसलिये कह रहा हूं कि मैं देख रहा हूं कि ये युवा भारत ख़ास कर के कुछ न कुछ करने के लिये कमिटेड हैं, लालायित हैं, अवसर खोज रहा हैं । और अपने तरीके से कर भी रहा है । मैंने पिछली बार कहा था, कम से कम एक खादी का वस्त्र ख़रीदिये । मैंने किसी को खादीधारी बनने के लिये नहीं कहा था । लेकिन मुझे खादी भण्डार वालों से जानकारी मिली कि एक सप्ताह में करीब करीब सवा सौ परसेन्ट हंड्रेड एंड ट्वेंटी फाइव परसेन्ट बिक्री में वृद्धि हो गयी । एक प्रकार से पिछले वर्ष की तुलना में 2 अक्तूबर से एक सप्ताह में डबल से भी ज्यादा खादी की बिक्री हुई । इसका मतलब यह हुआ कि देश की जनता हम जो सोचते हैं, उससे भी कई गुना आगे है । मैं भारतवासियों को प्रणाम करता हूं ।

सफाई........... कोई कल्पना कर सकता है कि सफाई ऐसा जन आन्दोलन का रूप ले लेगा । अपेक्षायें बहुत हैं, और होनी भी चाहिये । और एक अच्छा परिणाम मुझे नज़र आ रहा है, सफाई अब दो हिस्सों में देखी जा रही है । एक जो पुरानी गन्दगी है, जो गन्दगी के ढ़ेर हैं, उसको सरकारी तंत्र...शासन में बैठे हुए लोग उसके लिये क्या उपाय करेंगे । बहुत बड़ी चुनौती है लेकिन ! आप जिम्मेवारी से भाग नहीं सकते । सभी सरकारों ने सभी म्यूनिसिपैलिटीज़ ने, इस जिम्मेवारी के लिये कदम उठाने ही पड़ेंगे क्योंकि जनता का दबाव बढ़ने वाला है । और मीडिया भी इसमें बहुत अच्छी भूमिका निभा रहा है । लेकिन जो दूसरा पहलू है जो बहुत ही उमंग वाला है, आनन्द वाला है और मन को संतोष देने वाला है । सामान्य मानव को लगने लगा है कि चलो पहले की बात छोड़ो, अब गंदगी नहीं करेंगे । हम नई गंदगी में इज़ाफ़ा नहीं करेंगे । मुझे सतना, मध्यप्रदेश के, कोई श्रीमान् भरत गुप्ता करके हैं, उन्होंने मेरे mygov पर एक मेल भेजा । उन्होंने अपना...रेलवे में दौरा जा रहे थे, उसका अपना अनुभव कहा...उन्होंने कहा कि साहब मैं पहले भी रेलवे में जाता था, इस बार भी रेलवे में गया लेकिन मैं देख रहा हूं कि रेलवे में हर पैसेन्जर...रेलवे में लोग खाते-पीते रहते हैं, कागज-वागज फेंकते रहते हैं...बोले कि कोई फेंकता नहीं था, इतना ही नहीं, ढूंढ़ते थे कि डिब्बे में कहीं डस्टबिन है क्या, कूड़ा कचरा उसमें डालें । और जब देखा कि भई रेलवे में ये व्यवस्था तो नहीं है तो उन्होंने खुद ने कोने में ही सब लोगों ने अपना कूड़ा कचरा इकट्ठा कर दिया । बोले ये मेरे लिये बहुत ही सुखद अनुभव था । मैं भरत जी का आभारी हूं कि उन्होंने ये जानकारी मुझे पहुंचाई । लेकिन मैं ये देख रहा हूं कि सबसे ज्यादा प्रभाव छोटे-छोटे बच्चों में हुआ है । सैंकड़ों परिवार ये बात की चर्चा करते हैं कि हमारा बच्चा अभी कहीं चॉकलेट खाता है तो कागज तुरन्त उठा लेता है । मैंने अभी एक... सोशल मीडिया में किसी का देखा था कि...किसी ने लिखा था...आज का मेरा हीरो...और आज का मेरा हीरो में उन्होंने किसी बच्चे की तस्वीर दी थी । और कहा था वो बच्चा खुद इन दिनों...कहीं पर भी कूड़ा कचरा है तो उठा लेता है...स्कूल जाता है तो उठा लेता है । अपने आप कर रहा है । आप देखिये...सबको लगने लगा है कि हमारा देश, हम गन्दा नहीं करेंगे । हम गन्दगी में इज़ाफ़ा नहीं करेंगे । और जो भी करते हैं वो शर्मिन्दगी महसूस करते हैं, तुरन्त कोई न कोई उनको टोकने वाला मिल जाता है । मैं इसे शुभ संकेत मानता हूं ।

एक अच्छी बात यह भी हो रही है कि इन दिनों मुझे जो लोग मिलने आते हैं, समाज के सभी क्षेत्र के लोग मिलते हैं । सरकारी अधिकारी हों, खेल के जगत के लोग हों, सिने जगत के लोग हों, व्यापार जगत के लोग हों, वैज्ञानिक हों...इन दिनों जब भी वो मेरे से बात करते हैं...तो दस मिनट की बात में चार पांच मिनट तो वे समाज सम्बंधित विषयों पर चर्चा करते हैं । कोई सफाई पर बात करता है, कोई शिक्षा पर बात करता है, कोई सामाजिक सुधार के संबंध में चर्चा करता है । कोई हमारा पारिवारिक जीवन नष्ट हो रहा है उस पर चर्चा कर रहा है । मैं समझता हूं कि वरना पहले तो ऐसा कोई व्यापारी आयेगा तो सरकार के पास तो अपने स्वार्थ की बात करेगा । लेकिन एक बड़ा बदलाव मैं देख रहा हूं । वो अपने स्वार्थ के बात की बातें कम, समाज संबंधित कुछ न कुछ ज़िम्मेवारियाँ लेने की बात ज्यादा करते हैं । ये चीजे हैं जो मैं जब जोड़ करके देखता हूं, तो मुझे ध्यान आता है कि एक...एक बहुत अच्छे बदलाव की दिशा में हम आगे बढ़ रहे है । और ये बात सही है...गन्दगी से बीमारी आती है, लेकिन बीमारी कहाँ आती है । क्या अमीर के घर में आती है क्या ! बीमारी सबसे पहले गरीब के घर पर ही दस्तक देती है । अगर हम स्वच्छता करते हैं न ! तो गरीबों का सबसे बड़ा...मदद करने का काम करते हैं । अगर मेरा कोई गरीब परिवार बीमार नहीं होगा तो उसके जीवन में कभी आर्थिक संकट भी नहीं आयेगा । वो स्वस्थ रहेगा तो मेहनत करेगा, कमायेगा, परिवार चलायेगा । और इसलिये मेरी स्वच्छता का सीधा सम्बन्ध...मेरे गरीब भाई बहनों के आरोग्य के साथ है । हम गरीबों के और अच्छी सेवा कर पायें या न कर पायें हम गन्दगी न करें न, तो भी गरीब का भला होता है । इसको इस रूप में हम लें अच्छा होगा ।

मुझे...जो चिट्ठियाँ आती है अनेक-अनेक प्रकार की चिट्ठियाँ आती हैं । लेकिन एक जो पिछले बार कहा था कि हमारे जो स्पेशली-एबल्ड चाइल्ड है । परमात्मा ने जिसे कुछ न कुछ कमी दी है । शारीरिक क्षति दी है, तो उसके विषय में मैं अपनी भावनायें सबके सामने रखी थीं । उस पर भी मैंने देखा है कि जो जो लोग इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं वे अपनी सफलता की गाथायें मुझे भेज रहे हैं । लेकिन दो चीजें तो मुझे मेरी सरकार से पता चला । मेरे कहने के बाद हमारा जो एच.आर.डी. मिनिस्ट्री के अफसर हैं उनको लगा कि हमको भी कुछ करना चाहिये । और अफसरों ने मिल करके एक योजना बनाई । देखिये सरकार में बदलाव कैसे शुरू होता है इसका उदाहरण है । एक तो उन्होंने तय किया कि जो स्पेशली-एबल्ड चाइल्ड है अगर वो टैकनिकल एजुकेशन में जाना चाहता है तो उसको ऐसे एक हजार अच्छे स्पेशली-एबल्ड चाइल्ड को पसन्द करके उनको स्पेशल स्कॉलरशिप देने की उन्होंने योजना बनाई है । मैं विभाग के इन सारे अधिकारियों को जो विचार आया उनको बधाई देता हूं । दूसरा एक महत्वपूर्ण काम किया है उन्होंने कि जितनी केन्द्रीय विद्यालय हैं, और जितनी सैन्ट्र्ल यूनिवर्सिटीज हैं वहाँ पर स्पेशली-एबल्ड बच्चों के लिये आवश्यक होता है अलग इन्फ्रास्ट्र्क्चर...वो सीढ़ी पर नहीं चढ़ पाते तो उनके लिये ट्राइसाइकल चलाने वाला अलग व्यवस्था चाहिये । उनके लिये अलग प्रकार के टॉयलेट चाहिये । तो हमारे एच.आर.डी. मिनिस्ट्री के सब अधिकारियों ने मिल करके तय किया है कि केन्द्रीय विद्यालय और सेन्ट्र्ल यूनिवर्सिटी में एक लाख रूपये विशेष दिया जायेगा हर एक को । और एक लाख रूपये में वो स्पेशली-एबल्ड चाइल्ड के लिये जो आवश्यक इन्फ्रास्ट्र्क्चर खड़ा करना होगा, उसको खड़ा करेंगे । ये है शुभ शुरूआत...यही बाते हैं जो हमें बदलाव की ओर ले जायेंगी ।

मुझे पिछले दिनों सियाचिन जाने का अवसर मिला । मैंने दिवाली देश के लिये मर मिटने वाले जवानों के बीच में बितायी । देश जब दीवाली मना रहा था, तब मैं सियाचीन गया था । क्योंकि उन्हीं की बदौलत तो हम दिवाली मना पा रहे हैं, तो मैं उनके बीच गया था । कितनी कठिनाइयों में वो जीवन गुजारा करते हैं, उसका अनुभव मैंने किया । मैं देश की रक्षा करने वाले जवानों को सैल्यूट करता हॅूं । लेकिन आज मुझे एक और गर्व की बात कहनी है । हमारे देश के जवान सुरक्षा के क्षेत्र में काम करते हैं । प्राकृतिक आपदा के समय जान की बाजी लगाकर हमारी रक्षा करने के लिए कोई भी साहस करने को तैयार हो जाते हैं । खेल-कूद में भी हमारे देश के जवान भारत का गौरव बढाते रहते हैं । आपको जानकर के खुशी होगी कि हमारे सेना के कुछ खिलाडियों ने ब्रिटेन में आयोजित एक बहुत ही प्रस्टीजियस, कम्ब्रिअन पेट्रोल की एक स्पर्धा होती है, करीब 140 देशों को पीछे छोडकर के हमारे इन जवानों ने गोल्ड मैडल दिलाया देश को । मैं इन जवानों का विशेष रूप से अभिनन्दन करता हॅूं ।

मुझे अभी एक अवसर मिला था हमारे देश के जवान, नौजवान विद्यार्थी, युवक-युवतियां, खेल-कूद में जो विजेता होकर आई थीं, उनसे मैंने एक चाय-पान का कार्यक्रम रखा था । मुझे एक नई उर्जा मिली । उनका उत्साह, उमंग मैं देख रहा था कि और देशों की तुलना में हमारी व्यवस्थायें, सुविधायें बहुत कम होती हैं लेकिन शिकायत की बजाय उमंग और उत्साह से और अधिक कुछ करने की बात कर रहे थे । अपने आपमें मेरे लिये, इन खिलाडियों के लिये चाय-पान का कार्यक्रम बहुत ही प्रेरक रहा था । मुझे बहुत अच्छा लग रहा था ।

एक बात की ओर मैं देशवासियों को, और मैं सच में मन से कहना चाहता हूँ और मेरे मन की बात है । और मुझे विश्वास है, देशवासियों को मेरे शब्दों पर भरोसा है, मेरे इरादों पर भरोसा है । लेकिन आज एक बार फिर मैं उसको अपनी तरफ से दोहराना चाहता हॅूं । जहां तक काले धन का सवाल है, ब्लैक मनी का सवाल है, मेरे देशवासी, आपके इस प्रधान सेवक पर भरोसा कीजिये, मेरे लिये ये आर्टिकल ऑफ फेथ है । भारत के गरीब का जो पैसा जो बाहर गया है वो पाई-पाई वापिस आनी चाहिए, ये मेरा कमिटमेंट है । रास्ते क्या हो, पद्धति क्या हो, उसके विषय में, मतभिन्नता हो सकती है । और लोकतंत्र में स्वाभाविक है लेकिन मेरे देशवासी मुझे जितनी समझ है और मेरे पास जितनी जानकारी है उसके आधार पर मैं आपको विश्वास दिलाता हॅूं कि हम सही रास्ते पर हैं । आज तो किसी को पता नही है, न मुझे पता है, न सरकार को पता है, नआपको पता है, न पहले वाली सरकार को ही पता था कि कितना धन बाहर है । हर कोई अपने अपने तरीके से, अलग-अलग आंकडे बताते रहते हैं । मैं उन आंकडों में उलझना नहीं चाहता हॅूं , मेरी प्रतिबद्धता ये है, दो रूपया है, पांच रूपया है, करोड है, अरब है कि खरब है जो भी है । ये देश के गरीबों का पैसा है, वापिस आना चाहिए । और मैं आपको विश्वास दिलाता हॅूं , मेरे प्रयासों में कोई कमी नहीं रहेगी । कोई कोताही नहीं बरती जायेगी । मुझे बस, आपका आशीर्वाद बना रहे । मैं आपके लिए जो भी करना पडेगा, जब भी करना पडेगा, जरूर करता रहॅूंगा । ये मैं आपको भरोसा देता हॅूं ।

मुझे एक चिट्ठी आई है । ............. श्रीमान् अभिषेक पारिख की तरफ से आई है । वैसे इस प्रकार की भावना मुझे, मैं प्रधानमंत्री नहीं था तब भी, कई माताओं, बहनों ने प्रकट की थी । कुछ डाक्टर मित्रों ने भी मेरे सामने ये बात प्रकट की थी और मैं भी भूतकाल में इस विषय पर अपनी भावनाओं को प्रगट करता रहा हॅूं । श्रीमान अभिषेक पारिख ने मुझे कहा है कि हमारी युवा पीढी में बहुत बडी तेजी से, नशे का सेवन, ड्रग की तरफ झुकाव बढ रहा है । उन्होंने मुझसे कहा है कि आप इस विषय पर अपनी मन की बात में जरूर चर्चा करें । मैं उनकी इस पीडा से सहमत हॅू । मैं अगली मन की बात जब करूंगा, मैं जरूर ये नशाखोरी, ये ड्ग्ज, ये ड्रग माफिया और उसके कारण भारत के युवा धन को कितना बडा संकट आ सकता है, उसकी चर्चा अगली बार मैं जरूर करूंगा । इस विषय में आपके भी कुछ अनुभव हों, आपको कुछ जानकारियां हों, इस नशे की आदत वाले बच्चों को अगर आपने बचाया हो, बचाने के अगर आपके कुछ तौर-तरीके हो किसी सरकारी मुलाजिम ने अगर कोई अच्छी भूमिका निभाई हो, अगर ऐसी कोई जानकारी आप मुझे देंगे, तो देशवासियों के सामने, इन अच्छे प्रयासों की बात पहुंचाउंगा और हम सब मिलकर हर परिवार में एक माहौल बनायेंगे कि फ्रस्टेशन के कारण कोई बच्चा इस रास्ते पर न चला जाये, जरूर हम इसकी विस्तार से चर्चा करेंगे ।

मैं जानता हॅूं कि मैं ...... ऐसे विषयों को हाथ लगा रहा हॅूं जिसके संबंध में सरकार सबसे पहले कटघरे में आती है । लेकिन हम कब तक चीजों को छुपाते रखेंगे । कब तक हम पर्दे के पीछे सब बातों को टालते रहेंगे । कभी न कभी तो अच्छे इरादे के लिए, संकट मोल लेना ही पडेगा । मैं भी ये हिम्मत कर रहा हॅूं । आपके प्रेम के कारण । आपके आशीर्वाद के कारण और मैं करता रहॅूंगा ।

कुछ लोगों ने ये भी मुझे कहा है मोदी जी, आप तो कह रहे थे कि हमें सुझाव दीजिये, फेस बुक पर दीजिये, ट्वीटर पर दीजिये, ई-मेल भेजिये । लेकिन देश का बहुत बडा वर्ग है, जिनके पास ये है ही नही तो वो क्या करें । आपकी बात सही है । ये सुविधा सब के पास नहीं है । तो मैं आपको कहता हॅूं कि मेरी मन की बात के संबंध में अगर आप कुछ कहना चाहते हैं तो गांव-गांव रेडियो पर तो मेरी बात को सुनते हैं तो आप,

मन की बात, आकाशवाणी, संसद मार्ग, नई दिल्ली

अगर चिट्ठी भी भेज देंगे, कुछ सुझाव देंगे तो जरूर मुझ तक पहुंच जायेगा । और मैं जरूर उसको गंभीरता से लॅूंगा । क्योंकि सक्रिय नागरिक, विकास की सबसे बडी पूंजी होता है । आप एक चिट्ठी लिखते हैं, मतलब है कि आप बहुत सक्रिय हैं । आप अपना अभिप्राय देते हैं ........ मतलब कि आप देश की बात के विषयों से कंसर्न है और यही तो देश की ताकत होती है । मैं आपको निमंत्रण देता हॅूं ।

मेरे मन की बात के लिये, आपके मन की बात भी जुडनी चाहिए । हो सकता है आप जरूर चिट्ठी लिखेंगे । मैं कोशिश करूंगा, फिर अगले महीने आपसे बात करने की । मेरा प्रयास रहेगा, जब भी बात करूंगा, रविवार को करूंगा, दिन के 11 बजे करूंगा । तो मुझे आप तक पहुंचने की सुविधा बढ रही है ।

अब मौसम बदल रहा है । धीरे-धीरे ठंड की शुरूआत हो रही है । स्वास्थ्य के लिये बहुत अच्छा मौसम होता है । कुछ लोगों के लिये मौसम खाने के लिये बहुत अच्छा होता है । कुछ लोगों के लिये अच्छे-अच्छे कपडे पहनने के लिये होता है । लेकिन इसके साथ-साथ स्वास्थ्य के लिये भी बहुत अच्छा मौसम होता है । इसे जाने मत दीजिये । इसका भरपूर उपयोग कीजिये ।

बहुत-बहुत धन्यवाद ।

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अपनी 100 वर्षों की यात्रा में SRCC ने पीढ़ियों को गढ़ा और उन्हें उज्ज्वल भविष्य से जोड़ा: पीएम मोदी
September 05, 2026
वर्षों से, इस संस्थान ने छात्रों की कई पीढ़ियों को सीखने, आगे बढ़ने और समाज में बदलाव लाने का अवसर दिया है
नीतियों के ठहराव से लेकर नीतियों की सक्रियता तक, भारत ने एक लंबी यात्रा तय की है: प्रधानमंत्री
वैश्विक अस्थिरता के दौर में भारत की 7.8 प्रतिशत की वृद्धि दर देश की आर्थिक मजबूती का प्रतीक है: प्रधानमंत्री
140 करोड़ देशवासी मिलकर भारत को विकसित भी बनाएंगे और आत्मनिर्भर भी: प्रधानमंत्री
भारत आज एक नई गति से आगे बढ़ रहा है, जो काम पहले दशकों में होते थे, वे अब कुछ ही सालों में पूरे हो रहे हैं: प्रधानमंत्री
अगर भारतीय दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों को चला सकते हैं, तो भारत की कंपनियां भी पूरी दुनिया का नेतृत्व कर सकती हैं, यह पूरी तरह संभव है: प्रधानमंत्री

केंद्रीय मंत्रिमंडल के मेरे साथी श्रीमान प्रहलाद जोशी जी, डीयू के वीसी योगेश सिंह जी, SRCC की प्रिंसिपल सिमरित कौर जी, अजय जी, मल्लिका जी, रजत जी, SRCC से जुड़े हुए सभी साथी, फैकल्टी, स्टाफ, SRCC alumni और मेरे युवा साथियों!

मैं छठा खिलाड़ी हूं। आज का ये अवसर श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के लिए बहुत ऐतिहासिक है, ये देश के शिक्षा जगत के लिए भी उतना ही अहम है। यहां SRCC का हिस्सा रहीं अनेक पीढ़ियां एक साथ जुटी हैं। मैं आप सभी को, SRCC के इस शताब्दी समारोह के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं। मैं इसके संस्थापक सर श्रीराम जी को आदरपूर्वक श्रृद्धांजलि देता हूं, उनके विजन को नमन करता हूं।

साथियों,

जब कोई इंसान 100 वर्ष जीता है, तो उसे अनुभवों का सागर माना जाता है। और जब कोई संस्थान 100 वर्ष का होता है, तो वो उपलब्धियों और प्रेरणाओं का महासागर हो जाता है। अपनी 100 वर्षों की इस यात्रा में, SRCC ने पीढ़ियों को गढ़ा है, उन्हें उज्ज्वल भविष्य से जोड़ा है। जो आए उन्होंने पढ़ा, और जो निकले वो गढ़े हुए निकले। इस कॉलेज की यात्रा दरियागंज की, वहां एक छोटे से स्थान से शुरु हुई थी, और आज वही छोटा सा कॉलेज, एक विशाल वृक्ष बन चुका है। एक ऐसा विशाल वृक्ष जिसने कई पीढ़ियों को छांव भी दी है, और अपनी शीतलता से समृद्ध भी किया है। आज भी DU में जब कोई पूछता है कि कौन सा college, तो SRCC कहना ही, SRCC कहना ही अपने आप में ही एक flex होता है।

साथियों,

SRCC के alumni भी बहुत special रहे। अगर मैं आपकी भाषा में कहूं, तो यहां के alumni, OG हैं, जिन्होंने SRCC का नाम दुनिया भर में पहुँचाया, अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी एक पहचान बनाई। और रजत जी ने बड़ी लंबी सूची बताई थी। और इनमें से कुछ के साथ मुझे भी काम करने का अवसर मिला है। हमारे अरुण जेटली जी, यहीं पढ़े थे। और मैं कह सकता हूं कि शायद हमारी कोई मुलाकात ऐसी नहीं होती थी, कि वो SRCC की घटना न सुनाते हों। और कभी-कभी मैं तंग आ जाता था, कि एक ही घटना बार-बार सुनाते थे। अभी मेरी टीम में भाई संजीव सान्याल भी, यहीं से पढ़े हुए हैं। बाकी भी काफी साथी हैं यहां मेरे। और ऐसा नहीं है कि यहां से सिर्फ अर्थ-जगत के ही लोग निकले, कितने ही आर्टिस्ट्स से लेकर नेता, वकील, जस्टिस सब यहां से निकले हैं। यानी SRCC के लोगों ने हर क्षेत्र में अपनी धूम मचाई है। धुरंधर न हो लेकिन धूम तो मचाई है।

साथियों,

बीते कुछ दिनों से इस कार्यक्रम की बहुत चर्चा चल रही है। खासतौर पर लोग 2013 के मेरे संबोधन को याद कर रहे हैं। लोगों ने उसको फिर से सुना है, फिर से पढ़ा है, संभव है, इस नई पीढ़ी के लोगों ने भी उसको री-विजिट किया होगा। उस स्पीच के एक प्रकार से मैं कह सकता हूं कि Wave बन गई थी, एक लहर सी चल पड़ी थी। और आज भी, 13-14 साल बाद भी, उस सभा का, उस संबोधन का प्रभाव बरकरार है।

साथियों,

तब आपकी जगह आपके सीनियर बैठे थे। और मैं तब सीएम तो था, लेकिन मैं देश की मुख्य विपक्षी पार्टी का एक सदस्य भी था। और संभवत: तब लोग ये उम्मीद कर रहे थे, कि मैं तब की केंद्र सरकार पर लंबे-चौड़े अटैक करूंगा, आरोपों की झड़ी लगा दूंगा।

लेकिन साथियों,

विपक्ष में होने के बाद भी, तत्कालीन सरकार का आलोचक होने के बावजूद, मैंने इस मंच का वो उपयोग नहीं किया था, मैंने एक विजन रखा, सकारात्मक बातें कहीं। मैंने तब जो कुछ भी कहा, वो मेरा कन्विक्शन था। मैं उन बातों को, उन सपनों को हमेशा से जीता आया हूँ, उस रास्ते पर ही चलता रहा हूँ, देश के लिए जी-जान से जुटना, देश के लिए जीने का जज्बा, जो मेरे भीतर का भाव-विश्व है, वो उस दिन 2013 में इसी मंच से, मेरा वो भाव-विश्व शब्दों की माला में एक एक करके प्रकट होता चला गया था। और मैं देर तक बोला था फिर मैंने मैंने स्टूडेंट्स से पूछा कि क्या मैं continue कर दूं, उन्होंने जोर से कहा हाँ continue कीजिए।

साथियों,

मैंने उस दिन पानी के ग्लास का एक उदाहरण दिया था, और देश में उसकी खूब चर्चा भी हुई थी। मैंने बताया था कि पानी से आधे भरे ग्लास को देखने के तीन नज़रिए क्या होते हैं। एक, जिनको ग्लास पानी से आधा भरा दिखता है, दूसरा, जिनको ग्लास आधा खाली दिखता है, और तीसरा, जिनको ग्लास पूरा भरा हुआ दिखता है, आधा पानी और आधा हवा से भरा।

साथियों,

ये वो समय था, जब देश निराशा के दलदल में धंसा हुआ था। मैंने तब भी कहा था, कि मैं ग्लास को आधा नहीं देखता, अधूरा नहीं देखता, गिलास को पूरा भरा हुआ देखता हूं। आधा पानी से, आधा हवा से। और उस समय आप सब तो स्कूल में रहे होंगे, लेकिन आज इंटरनेट पर जाकर के 2013 और उसके आसपास की खबरें अगर पढ़ेंगे, तो आपको अंदाजा आएगा, तब सिचुएशन क्या थी? और मैं तो आपसे आग्रह करूंगा नौजवानों से, कि जरा 2013 के उस कालखंड की तरफ इंटरनेट पर जाकर के नजर करिए। 2013 में मेरे उस भाषण के आसपास के कालखंड की उस समय जो हेडलाइन्स हुआ करती थीं। अखबारों की हो या टीवी चैनल्स की हो। मैं जरा आज उस हेडलाइन्स में क्या क्या था, उसकी एक झलक आपको दिखाना चाहता हूं। अब एक गैंग है, जो क्या करेगी, मैं जो बोल रहा हूं ना उसके छोटे-छोटे टुकड़े करके मेरे खाते में डाल देगी। और इसलिए मैं पहले से आगाह करता हूं कि मैं जो बातें बता रहा हूं 2013 के उस कालखंड में मीडिया में क्या छाया रहता था जैसे-

LoC पर भारतीय सैनिकों की हत्या, अब इस पीढ़ी को जरा अजूबा लगता होगा ऐसा भी होता था। होता था।

वर्ल्ड बैंक ने GDP ग्रोथ रेट का अनुमान घटाया

करंट अकाउंट डेफिसिट ऑल टाइम हाई

महंगाई दर करीब दस परसेंट पर

इडस्ट्रियल सेक्टर मंदी की चपेट में

हेलीकॉप्टर सौदे में घूसखोरी का पर्दाफाश

हैदराबाद में बम धमाके

ये सारी उस समय की हेडलाइन्स थीं। मैं पक्का मानता हूं, ये जो हमारे आज जो विद्यार्थी हैं, उनको इन सारी बातों का पता नहीं होगा। ये सारी बातें बताती हैं कि तब देश की क्या हालत थी। ग्रोथ फर्श पर थी और महंगाई अर्श पर थी। घोटाले चरम पर थे और भ्रष्टाचारी बेखौफ घूमते थे। अर्थव्यवस्था बेहाल थी, चारों तरफ पॉलिसी पैरालिसिस की ही चर्चा थी। दुनिया भारत को फ्रैजाइल फाइव में गिन रही थी। आतंकी बेलगाम थे और पाकिस्तान बेकाबू था। यानी तब निराशा और हताशा के अलावा कुछ नहीं था।

साथियों,

एक वो दिन था जब हर मोर्चे पर, देश में स्ट्रगल ही स्ट्रगल था, और एक आज का दिन है, आज आतंकवाद फैलाने वाले पस्त पड़े हैं। पाकिस्तान कोई नापाक हरकत करता है, तो भारत की सेनाएं घर में घुसकर मारती हैं। जम्मू-कश्मीर से लेकर नॉर्थ ईस्ट तक शांति बढ़ी है। माओवादी आतंक, नक्सलवाद की कमर तोड़ दी गई है। जो दुनिया तब भारत में पॉलिसी पैरालिसिस से चिंतित थी, वो दुनिया आज भारत के पॉलिसी डायनामिज्म की चर्चा कर रही है। तब दुनिया भारत को फ्रजाइल फाइव बता रही थी, आज दुनिया भारत को फास्टेस्ट ग्रोइंग मेजर इकॉनॉमी बनते हुए देख रही है। अभी हफ्तेभर में ही, भारत की इकॉनॉमी को लेकर कई सारी पॉजिटिव खबरें आई हैं। Seven point eight percent क्वाटर्ली ग्रोथ ने देश का जोश बढ़ाया है, और इसी बीच जैपनीज़ Credit Rating Agency ने भारत की रेटिंग अपग्रेड कर दी है।

और साथियों,

ये Seven point eight percent की ग्रोथ भी ऐसे समय में आई है, जब west asia का युद्ध चल रहा है, जब ट्रेड से जुड़ी कई तरह की अड़चनें रही हैं, उस समय ऐसी ग्रोथ हासिल करना, ये अपने आप में भारत के सामर्थ्य को दिखाता है।

साथियों,

मैं जानता हूं, आप भी जानते हैं, जो लोग, भारत को फ्रैजाइल फाइव में धकेलने के लिए बदनाम रहे हैं, उनको ये आंकड़े हज़म नहीं हो रहे हैं। लेकिन आप सभी आंकड़ों को गंभीरता से समझते हैं। अप्रैल से जून के बीच, बिजली उत्पादन, नाइन परसेंट बढ़ा, गाड़ियों की सेल में ट्वेंटी परसेंट से अधिक की वृद्धि हुई। इसमें भी, टू-व्हीलर में, ट्वेंटी परसेंट, और थ्री व्हीलर की बिक्री में करीब करीब थर्टी परसेंट की ग्रोथ रही है। यानी consumer demand भी चल रही है, और commercial activity भी तगड़ी हो रही है। Steel और सीमेंट कंजम्शन की ग्रोथ में 8 परसेंट की वृद्धि हुई है। यानी construction, housing, infrastructure और industrial activity, ये सब बढ़ रहा है। यानी भारत, ग्रो भी कर रहा है, और रोजगार के नए अवसर भी बना रहा है। बावजूद इसके, जिन लोगों के लिए साल 2013 में ग्लास आधा खाली था, उनकी सोच आज भी वैसी ही है। उनके लिए ग्लास हमेशा आधा खाली रहेगा। मैं ग्लास की बात करता हूं, और कुछ खाली रहने की बात नहीं कर रहा हूं।

साथियों,

2013 में यहां SRCC में बात करते हुए, मैंने P2G2 यानी प्रो-पीपल गुड-गवर्नेंस की भी चर्चा की थी। जिन्होंने लंबे समय तक देश में सरकारें चलाई हैं, उनका एक स्टाइल था, जब आग लगे तभी नींद से जागो, जब सूखा पड़े तब जाकर कुआं खोदो। मैंने इसी अप्रोच को बदलने की बात कही थी। और 2014 में सरकार बनने के बाद हमने ये करके दिखाया है। मैं आपको एक उदाहरण देता हूं।

साथियों,

हाल में ही, जनधन योजना को 12 साल पूरे हुए हैं। आज आप फिनटेक के अलग ही दौर में जी रहे हैं, लेकिन 2013 के वो दिन भी थे जब गांव या छोटे शहरों के स्टूडेंट्स को, सेविंग बैंक अकाउंट्स खुलवाने के लिए भी कई पापड़ बेलने प़ड़ते थे। उस समय हमारी आबादी सवा सौ करोड़ के पार थी, लेकिन मार्च 2014 तक, देश की 50 प्रतिशत से ज्यादा आबादी के पास बैंक अकाउंट्स तक नहीं थे। और जो बैंकिंग सिस्टम से बाहर थे, वो ज्यादातर गरीब थे, महिलाएं थीं, माइग्रेंट लेबरर थे, स्टूडेंट्स थे। इसलिए हम जनधन स्कीम लेकर आए, और बीते 12 वर्षों में जनधन योजना की वजह से, करीब 60 करोड़ नए बैंक अकाउंट खुले। आज देश में लगभग हर परिवार बैकिंग सिस्टम से जुड़ा हुआ है। यही भारत की फिनटेक क्रांति का आधार बना है।

साथियों,

अब आप उन लोगों के बारे में भी सोचिए, जो करोड़ों लोगों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने का भी विरोध कर रहे थे। दरअसल ऐसे लोगों को, आधे भरे ग्लास में ही मज़ा आता है, ताकि देश के गरीब सामान्य नागरिक उनके आगे-पीछे घूमते रहें, यही माई-बाप कल्चर ये दशकों से चला रहे थे। लेकिन ये मोदी है, माई-बाप कल्चर पसंद करने वालों के सामने वो चट्टान की तरह खड़ा है।

साथियों,

पुरानी कहावत है, सांच को आंच नहीं। मुझमें हिम्मत है, इसीलिए मैं उस दिन कही बातों को याद करा रहा हूं, अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर आया हूं आपके पास। मैं जानता हूं, सच की हुंकार के आगे, झूठ की गूंज टिक नहीं सकेगी।

साथियों,

2013 के उसी कार्यक्रम में जब मैंने कहा कि हमें मेड इन इंडिया पर काम करना है, तो पुराने उस समय के इकोसिस्टम के लोगों को ये समझ ही नहीं आया था। उनको लगता था, कि निराशा के उस दौर में मेड इन इंडिया संभव ही नहीं होगा! और उस सोच में पले-बड़े लोग आज भी, मेड इन इंडिया का मजाक करते हैं।

लेकिन साथियों,

आज आप मेक इन इंडिया की ब्रैंड वैल्यू देख रहे हैं। आपसे मैं एक उदाहरण के साथ बात बताना चाहता हूं। आज हर हाथ में स्मार्टफोन है, दुनिया के बड़े से बड़े फोन ब्रैंड, आज भारत को अपना बेस बना रहे हैं। मेड इन इंडिया स्मार्टफोन, दुनिया के कोने-कोने में पहुंच रहा है। 2014 में भारत अपने ज्यादातर मोबाइल फोन इंपोर्ट करता था। आज भारत ढाई लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के मोबाइल एक्सपोर्ट करता है।

साथियों,

मैं छोटे और आसान लक्ष्य लेकर चलने वाला व्यक्ति नहीं हूं। मैं देश के लिए बड़े लक्ष्य रखता हूं, और उन्हें पूरा करने के लिए जी-जान लगा देता हूं। आप डिफेंस का सेक्टर देखिए, पहले भारत की सेनाओं के लिए ज्यादातर चीज़ें बाहर से खरीदी जाती थीं। मैंने आते ही डिफेंस वालों को बोला नेगेटिव लिस्ट बनाईये। पहले उन्होंने 500 नेगेटिव लिस्ट बनाई, बोले ये हम बाहर से नहीं लाएंगे। फिर हजार बनाई, फिर तीन हजार बनाई। आर्मी, नेवी, एयरफोर्स को, कई बार छोटे से किसी इक्विप्मेंट के लिए भी महीनों इंतजार करना पड़ता था। हमने देश की सेनाओं के साथ मिलकर एक प्लान बनाया, चीज़ों की लिस्ट बनाई, फिर भारतीय कंपनियों को कहा कि ये सब बनाओ, और आज आप देखिए, देश की डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग, अपने ऑल टाइम हाई पर है। आज भारत करीब-करीब 2 लाख करोड़ रुपये का डिफेंस प्रोडक्शन कर रहा है। 2013-14 में, हम 600-700 करोड़ रुपये का डिफेंस एक्सपोर्ट करते थे। आज ये आंकड़ा, करीब-करीब 40 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। और ये अचीवमेंट्स इसलिए हो पा रहे हैं, क्योंकि आज देश में एक वाइब्रेंट डिफेंस मैन्युफेक्चरिंग इकोसिस्टम बन रहा है।

साथियों,

मुझे देश पर भरोसा है, देश के सामर्थ्य पर भरोसा है, आप युवाओं पर मेरा भरोसा है, और इसी भरोसे के आधार पर मैं विकसित भारत की बात भी कहता हूं। मुझे विश्वास है, हम 140 करोड़ भारतीय मिलकर अपने देश को विकसित भी बनाएंगे, आत्मनिर्भर भी बनाएंगे।

आने वाले समय में, भारत, मैन्यूफैक्चरिंग का हब होगा।

आने वाले समय में रिसर्च एंड इनोवेशन का हब हिन्दुस्तान होगा।

भारत,एग्रीकल्चर एक्सपोर्ट की सुपर पावर होगा।

मेरे नौजवान दोस्तों,

भारत का अपना स्पेस स्टेशन होगा,

और वो दिन भी आप देखेंगे, जब भारत एक दिन ऐसे ओलंपिक्स का आयोजन करेगा कि दुनिया देखती रह जाएगी।

और ये केवल बातें नहीं है, ये हमारे संकल्प हैं। और इन संकल्पों को सिद्धि में बदलने के लिए देश में लगातार काम हो रहा है।

साथियों,

अभी तो आपकी ज़िंदगी SRCC मोड में चल रही है। को-ऑप में चाय हो, या cold coffee पर होने वाली discussions हों, exam में last-minute notes, और printouts के लिए भाग-दौड़ करना, या फिर Crossroads और Business Conclave पर की गई मेहनत है, आप सब ने यहाँ के हर मोमेंट को अपने जीवन की एक memory बनाया है। लेकिन इस कैंपस के बाहर एक नई दुनिया आपको मिलेगी। आपको दो तरह के लोग मिलेंगे। एक वो लोग, जो पॉजिटिव तरीके से समाज की शक्ति को राष्ट्र की शक्ति में बदलते हैं। दूसरी प्रजाति उन लोगों की है, जो कोई भी काम शुरू होने पर नाराज़ फूफा बन जाते हैं, उनका फेवरेट काम होता है, हर काम का विरोध करना। इनका एक ही डायलॉग होता है, इसकी क्या ज़रूरत है?, इसकी क्या ज़रूरत है?, ये हर फूफा का परमानेंट डॉयलोग होता है। जब हम दुनिया का सबसे बड़ा Statue बना रहे थे, तो फूफा जी ने कमर कस ली, कहा इसकी ज़रूरत ही क्या है? हमने High-Speed Train पर काम शुरू किया, तो फूफा जी फिर बोले, इसकी ज़रूरत ही क्या है? हम UPI लेकर आए, तो यही फूफा लोग कहते थे - Why UPI? UPI की ज़रूरत ही क्या है? हमने चिप बनाने की बात की, तो फिर कहा गया, कि ज़रूरत ही क्या है? हमने नई पार्लियामेंट बिल्डिंग बनाई, तो ये फिर बोले - इसकी जरूरत ही क्या है? हमने देश के लिए मरने मिटने वाले, सर्वश्रेष्ठ बलिदान देने वाले हमारे वीर सेनानायकों का मेमोरियल बनवाया, फूफा फिर मैदान में आ गए, इसकी क्या जरूरत थी? लेकिन भारत ने ऐसे सारे फूफाओँ को जवाब दिया, जो देश के लिए जरूरी है, वो भारत को करने से कोई रोक नहीं सकता।

साथियों,

आज भारत एक अलग मिजाज के साथ आगे बढ़ रहा है। जो काम पहले दशकों में होता था, अब वो कुछ वर्षों में ही हो रहा है। मैं पूरे Facts के साथ एक और उदाहरण दूंगा। भारत की पहली Electric ट्रेन 1925 में चली थी। आपकी कॉलेज 1926 में शुरू हुई, Electric ट्रेन 1925 में चली थी। 1925 में चली थी ये ट्रेन, इसके बाद 2014 तक, यानी 90 इयर्स, 90 साल में सिर्फ 30 परसेंट से भी कम काम हुआ। 30 परसेंट से भी कम रेलवे लाइनों का इलेक्ट्रिफिकेशन हो पाया था। हमने सिर्फ 12 साल में, 12 साल में रेलवे लाइनों का करीब-करीब Hundred Percent इलेक्ट्रिफिकेशन करके दिखा दिया।

साथियों,

भारत की नीति-निर्णयों में आई ये गति दुनिया के बाकी देश भी देख रहे हैं, समझ रहे हैं। इसलिए वो भारत के साथ अपनी पार्टनरशिप बढ़ा रहे हैं। बीते दशक में करीब 40 देशों के साथ व्यापार समझौते हुए हैं, Free Trade Agreement हुए हैं। इससे लेदर हो, टेक्स्टाइल हो, फ्रूट-वेजिटेबल हो, हमारा प्रोसेस्ड फूड हो, श्रिंप हो, ऐसी हर चीज के लिए नए-नए बाज़ार खुल रहे हैं। आपसे बेहतर कौन जानता है कि जब नए बाज़ार खुलते हैं, भारत के गुड्स और सर्विसेज़ के लिए टैरिफ कम होते हैं, तो उसका क्या मतलब होता है। ये भारत के नौजवानों के लिए, अवसरों का नया आसमान बन रहा है।

साथियों,

आज 2013 के मुकाबले, देश आर्थिक रूप से, सामाजिक रूप से कहीं अधिक सुरक्षित है। लेकिन ये देखकर कुछ लोगों की छटपटाहट बढ़ रही है, बौखलाहट बढ़ रही है। अभी 15 अगस्त का मेरा भाषण आपने सुना होगा, ऐसे लोगों के लिए अभी मैंने लाल किले से, एक होम्योपैथी का डोज दिया था, होम्योपैथी की गोली एक छोटी सी गोली दी थी लाल किले से, और आप जानते हैं होम्योपैथी के कहते हैं कि स्वभाव ऐसा है कि होम्योपैथी की दवाई जब शुरू करते हैं, तो शुरू के दौर में बीमारी एक दम से ज्यादा बढ़ जाती है, ये होम्योपैथी का स्वभाव है। तो मैंने लाल किले से एक होम्योपैथी की गोली दी थी - दिमाग़ी नक्सल। ये दिमागी नक्सल होम्योपैथी का इलाज, जैसा मैंने कहा बीमारी को कुछ समय के लिए और उभार देता है। और उसके बाद उसका इलाज शुरू करता है। इसी तरह जैसे ही मैंने दिमाग़ी नक्सल वाली होम्योपैथी की गोली दी, सारे दिमागी नक्सल निकल-निकल के बाहर आने लगे। और जो इस बीमारी को बढ़ावा दे रहे हैं, अब जनता उनका भी असली रंग देख रही है।

साथियों,

मैंने इतनी सारी बातें बताईं, कुछ लोगों को लग सकता है, अरे क्या है भाई, 140 करोड़ का देश है, बहुत आसान था, मोदी ने क्या नया किया? लेकिन क्या ये वाकई इतना आसान था? मैं आपको फिर एक बार पुराने दिनों में ले जाना चाहता हूं। याद कीजिए आप जब स्कूल में पढ़ते होंगे। 2013 में केदारनाथ में आपदा आई थी। तो पूरी सरकार हिल गई थी। उनको समझ ही नहीं आ रहा था कि, क्या किया जाए? कैसे किया जाए? 2008 में बैंकों का संकट आया था, तो तब की सरकार ने 2014 तक उस संकट के पीछे छुपने की कोशिश की थी, हाथ तक लगाने की हिम्मत नहीं की। भारत का पूरा बैंकिंग सिस्टम, तबाह होने के कगार पर पहुंचा दिया गया था। 2008 में ही मुंबई में भयंकर आतंकी हमला हुआ था, तो तब की सरकार पर बाहर से दबाव पड़ा, और उसने पाकिस्तान को सबक सिखाने की हिम्मत तक नहीं दिखाई।

साथियों,

पिछले 12 वर्षों में तो देश में कई सारी आपदाएं आईं, इतने बड़े-बड़े साइक्लोन हमने झेलें हैं, लेकिन देश ने बहुत मजबूती से उनका सामना किया। पिछले 6 वर्षों में तो बहुत बड़े संकट आए हैं। पहले कोरोना जैसी महामारी आई, जिसने पूरी दुनिया को ठप कर दिया। फिर रूस और यूक्रेन में युद्ध छिड़ गया। उसके बाद, ट्रेड को, सप्लाई चैन को ही वेपनाइज करने का दौर शुरु हो गया। फिर वेस्ट एशिया का ये संकट आया, हर बार ये कहा गया कि अब तो भारत नहीं बचेगा और जो मेरे ज्यादा ही प्रशंसक हैं, वो ये सोचकर खुश थे कि अब तो मोदी फंसा, अब तो मोदी गिरा, अब तो उसे कुचल ही देंगे, लेकिन मेरे देश के लोगों के आशीर्वाद में इतना दम है, इतना दम है कि, भारत का बुरा चाहने वालों की हर हसरत धरी की धरी रह जा रही है।

दोस्तों,

अब 21वीं सदी में नए अवसरों की दुनिया हमारे सामने है। मुझे खुशी है कि आप ambitious हैं, क्योंकि ambition किसी textbook से नहीं सिखाई जा सकती। Ambitions उस माहौल से आती है, जो आपको बड़े सपने देखने के लिए आपको प्रेरित करती है। आज हमारा नौजवान साथी कहता है कि अपना कुछ काम करुंगा, तो स्टार्ट-अप करुंगा, कंपनी बनाऊँगा, तो unicorn बनाऊँगा। स्पेस और ड्रोन जैसे सेक्टर में जुडूंगा, कुछ बड़ा करूंगा। Cutting-edge AI सोल्यूशन्स बनाऊँगा, खेती में इनोवेशन करूंगा। 13 साल पहले आपके सीनियर्स, ऐसे सपने नहीं देख पाते थे। लेकिन आज आप ये सपने भी देख रहे हैं, क्योंकि आज के भारत में उन सपनों को सपोर्ट करने वाला इकोसिस्टम भी बन गया है।

साथियों,

अब समय बड़े लक्ष्य बनाने और उन्हें प्राप्त करने का है। अभी मैंने लाल किले से कुछ बातें कहीं थीं। मैं आपके बीच भी उन्हें दोहराना चाहूंगा। आप संकल्प लीजिए, भारत की global consulting firms क्यों नहीं हो सकतीं? हमारी accounting Firms, हमारी legal firms, हमारी financial firms, ये सब global leaders क्यों नहीं बन सकतीं? हम गर्व से कहते हैं कि आज भारतीय दुनिया की टॉप कंपनीज़ को लीड कर रहे हैं, अगर भारतीय दुनिया की टॉप कंपनियों को लीड कर रहे हैं, तो भारतीयों की बनाई कंपनियां, दुनिया को क्यों लीड न करें?

साथियों,

ये सब संभव है, इसके लिए आपके पास networks भी हैं और knowledge भी है।

साथियों,

हमारी आपकी प्रेरणा SRCC का ये कॉलेज क्रेस्ट भी है। इसमें दो सुंदर प्रतीक हैं। एक है- उगता हुआ सूरज, और दूसरा है - समुद्र में आगे बढ़ता हुआ जहाज। सूरज, जो दिशा दिखाता है और जहाज, जो उस दिशा में आगे बढ़ता है। हमें ऐसे नए रास्ते पर चलना है, जिसमें सूरज हमारा हो, समंदर भी हमारा हो। नाव हमारी हो, नाविक भी हमारा हो। लहरों पर विजय लिखे, वो हौसला हमारा हो। उड़ान हमारी हो, आसमान हमारा हो। तेज हवाओं से टकराए, वो जज़्बा हमारा हो। सपना हमारा हो, संकल्प हमारा हो, आत्मनिर्भर भारत का परचम हमारा हो। विकसित भारत की राह में, विकसित भारत की राह में तेजी से उठता हर कदम हमारा हो। एक बार फिर इस विशेष अवसर पर SRCC से जुड़े सभी लोगों को मेरी ढेर सारी शुभकामनाएँ।

वंदेमातरम्