India’s freedom movement and its history has been a great source of inspiration for human rights: PM
The whole world sees our Bapu as a symbol of human rights and human values: PM
The concept of human rights is closely related to the dignity of the poor: PM
We have given new rights to Muslim women by enacting a law against triple talaq: PM
India has ensured 26 weeks of paid maternity leave for career women, a feat that even many developed nations could not achieve: PM
Cautions against the selective interpretation of human rights The biggest infringement of human rights takes place when they are seen from the prism of politics and political profit and loss: PM
Rights and duties are two tracks on which the journey of human development and human dignity takes place: PM

नमस्कार !

आप सभी को नवरात्री पावन पर्व की बहुत – बहुत शुभकामनाएं ! कार्यक्रम में मेरे साथ उपस्थित देश के गृहमंत्री श्री अमित शाह जी, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के चेयरपर्सन जस्टिस श्री अरुण कुमार मिश्रा जी, केंद्रीय गृह राज्यमंत्री श्री नित्यानंद राय जी, मानवाधिकार आयोग के अन्य सम्मानित सदस्यगण, राज्य मानवाधिकार आयोगों के सभी अध्यक्षगण, उपस्थित सुप्रीम कोर्ट के सभी मान्य आदरणीय जज महोदय, सदस्यगण, यूएन एजेंसीज़ के सभी प्रतिनिधि, सिविल सोसाइटी से जुड़े साथियों, अन्य सभी महानुभाव, भाइयों और बहनों !

आप सभी को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 28वें स्थापना दिवस की हार्दिक बधाई। ये आयोजन आज एक ऐसे समय में हो रहा है, जब हमारा देश अपनी आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। भारत के लिए मानवाधिकारों की प्रेरणा का, मानवाधिकार के मूल्यों का बहुत बड़ा स्रोत आज़ादी के लिए हमारा आंदोलन, हमारा इतिहास है। हमने सदियों तक अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया। एक राष्ट्र के रूप में, एक समाज के रूप में अन्याय-अत्याचार का प्रतिरोध किया! एक ऐसे समय में जब पूरी दुनिया विश्व युद्ध की हिंसा में झुलस रही थी, भारत ने पूरे विश्व को 'अधिकार और अहिंसा' का मार्ग सुझाया। हमारे पूज्य बापू को देश ही नहीं बल्कि पूरा विश्व मानवाधिकारों और मानवीय मूल्यों के प्रतीक के रूप में देखता है। ये हम सबका सौभाग्य है कि आज अमृत महोत्सव के जरिए हम महात्मा गांधी के उन मूल्यों और आदर्शों को जीने का संकल्प ले रहे हैं। मुझे संतोष है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, भारत के इन नैतिक संकल्पों को ताकत दे रहा है, अपना सहयोग कर रहा है।

साथियों,

भारत 'आत्मवत् सर्वभूतेषु' के महान आदर्शो को, संस्कारों को लेकर, विचारों को लेकर चलने वाला देश है। 'आत्मवत् सर्वभूतेषु' यानी, जैसा मैं हूँ, वैसे ही सभी मनुष्य हैं। मानव-मानव में, जीव-जीव में भेद नहीं है। जब हम इस विचार को स्वीकार करते हैं तो हर तरह की खाई भर जाती है। तमाम विविधताओं के बावजूद भारत के जनमानस ने इस विचार को हजारों सालों से जीवंत बनाए रखा। इसीलिए, सैकड़ों वर्षों की गुलामी के बाद भारत जब आज़ाद हुआ, तो हमारे संविधान द्वारा की गई समानता और मौलिक अधिकारों की घोषणा, उतनी ही सहजता से स्वीकार हुई!

साथियों,

आजादी के बाद भी भारत ने लगातार विश्व को समानता और मानवाधिकारों से जुड़े विषयों पर नया perspective दिया है, नया vision दिया है। बीते दशकों में ऐसे कितने ही अवसर विश्व के सामने आए हैं, जब दुनिया भ्रमित हुई है, भटकी है। लेकिन भारत मानवाधिकारों के प्रति हमेशा प्रतिबद्ध रहा है, संवेदनशील रहा है। तमाम चुनौतियों के बाद भी हमारी ये आस्था हमें आश्वस्त करती है कि भारत, मानवाधिकारों को सर्वोपरि रखते हुए एक आदर्श समाज के निर्माण का कार्य इसी तरह करता रहेगा।

साथियों,

आज देश सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास के मूल मंत्र पर चल रहा है। ये एक तरह से मानवाधिकार को सुनिश्चित करने की ही मूल भावना है। अगर सरकार कोई योजना शुरू करे और उसका लाभ कुछ को मिले, कुछ को ना मिले तो अधिकार का विषय खड़ा होगा ही। और इसलिए हम, हर योजना का लाभ, सभी तक पहुंचे, इस लक्ष्य को लेकर चल रहे हैं। जब भेदभाव नहीं होता, जब पक्षपात नहीं होता, पारदर्शिता के साथ काम होता है, तो सामान्य मानवी के अधिकार भी सुनिश्चित होते हैं। इस 15 अगस्त को देश से बात करते हुए, मैंने इस बात पर बल दिया है कि अब हमें मूलभूत सुविधाओं को शत-प्रतिशत सैचुरेशन तक लेकर जाना है। ये शत-प्रतिशत सैचुरेशन का अभियान, समाज की आखिरी पंक्ति में, जिसका अभी हमारे अरुण मिश्रा जी ने उल्लेख किया। आखिरी पंक्ति में खड़े उस व्यक्ति के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए है, जिसे पता तक नहीं है कि ये उसका अधिकार है। वो कहीं शिकायत करने नहीं जाता, किसी आयोग में नहीं जाता। अब सरकार गरीब के घर जाकर, गरीब को सुविधाओं से जोड़ रही है।

साथियों,

जब देश का एक बड़ा वर्ग, अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने में ही संघर्षरत रहेगा, तो उसके पास अपने अधिकारों और अपनी आकांक्षाओं के लिए कुछ करने का ना तो समय बचेगा, ना ऊर्जा और ना ही इच्छा-शक्ति। और हम सब जानते हैं गरीब की जिंदगी में हम अगर बारिकी से देखें तो जरूरत ही उसकी जिंदगी होती है और जरूरत की पूर्ति के लिए वो अपना जीवन का पल – पल, शरीर का कण-कण खपाता रहता है। और जब जरूरतें पूरी न हो तब तक तो अधिकार के विषय तक वो पहुंच ही नहीं पाता है। जब गरीब अपनी मूलभूत सुविधाओं, और जिसका अभी अमित भाई ने बड़े विस्तार से वर्णन किया। जैसे शौचालय, बिजली, स्वास्थ्य की चिंता, इलाज की चिंता, इन सबसे जूझ रहा हो, और कोई उसके सामने जाकर उसके अधिकारों की लिस्ट गिनाने लगे तो गरीब सबसे पहले यही पूछेगा कि क्या ये अधिकार उसकी आवश्यकताएं पूरी कर पाएंगे। कागज में दर्ज अधिकारों को गरीब तक पहुंचाने के लिए पहले उसकी आवश्यकता की पूर्ति किया जाना बहुत जरूरी है।

जब आवश्यकताएं पूरी होने लगती हैं तो गरीब अपनी ऊर्जा अधिकारों की तरफ लगा सकता है, अपने अधिकार मांग सकता है। और हम सब इस बात से भी परिचित हैं कि जब आवश्यकता पूरी होती है, अधिकारों के प्रति सतर्कता आती है, तो फिर आकांक्षाए भी उतनी ही तेजी से बढ़ती है। ये आकांक्षाए जितनी प्रबल होती है, उतना ही गरीब को, गरीबी से बाहर निकलने की ताकत मिलती है। गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकलकर वो अपने सपने पूरे करने की ओर बढ़ चलता है। इसलिए, जब गरीब के घर शौचालय बनता है, उसके घर बिजली पहुंचती है, उसे गैस कनेक्शन मिलता है, तो ये सिर्फ एक योजना का उस तक पहुंचना ही नहीं होता। ये योजनाएं उसकी आवश्यकता पूरी कर रही हैं, उसे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक कर रही हैं, उसमें आकांक्षा जगा रही हैं

साथियों,

गरीब को मिलने वाली ये सुविधाएं, उसके जीवन में Dignity ला रही हैं, उसकी गरिमा बढ़ा रही हैं। जो गरीब कभी शौच के लिए खुले में जाने को मजबूर था, अब गरीब को जब शौचालय मिलता है, तो उसे Dignity भी मिलती है। जो गरीब कभी बैंक के भीतर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था उस गरीब का जब जनधन अकाउंट खुलता है, तो उसमें हौसला आता है, उसकी Dignity बढ़ती है। जो गरीब कभी डेबिट कार्ड के बारे में सोच भी नहीं पाता था, उस गरीब को जब Rupay कार्ड मिलता है, जेब में जब Rupay कार्ड होता है तो उसकी Dignity बढ़ती है। जो गरीब कभी गैस कनेक्शन के लिए सिफारिशों पर आश्रित था, उसे जब घर बैठे उज्जवला कनेक्शन मिलता है, तो उसकी Dignity बढ़ती है। जिन महिलाओं को पीढ़ी दर पीढ़ी, प्रॉपर्टी पर मालिकाना हक नहीं मिलता था, जब सरकारी आवास योजना का घर उनके नाम पर होता है, तो उन माताओं- बहनों की Dignity बढ़ती है।

साथियों,

बीते वर्षों में देश ने अलग-अलग वर्गों में, अलग-अलग स्तर पर हो रहे Injustice को भी दूर करने का प्रयास किया है। दशकों से मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक के खिलाफ कानून की मांग कर रही थीं। हमने ट्रिपल तलाक के खिलाफ कानून बनाकर, मुस्लिम महिलाओं को नया अधिकार दिया है। मुस्लिम महिलाओं को हज के दौरान महरम की बाध्यता से मुक्त करने का काम भी हमारी ही सरकार ने किया है।

साथियों,

भारत की नारीशक्ति के सामने आज़ादी के इतने दशकों बाद भी अनेक रुकावटें बनी हुई थीं। बहुत से sectors में उनकी एंट्री पर पाबंदी थी, महिलाओं के साथ Injustice हो रहा था। आज महिलाओं के लिए काम के अनेक sectors को खोला गया है, वो 24 घंटे सुरक्षा के साथ काम कर सकें, इसे सुनिश्चित किया जा रहा है। दुनिया के बड़े-बड़े देश ऐसा नहीं कर पा रहे हैं लेकिन भारत आज करियर वूमेन को 26 हफ्ते की Paid मैटर्निटी Leave दे रहा है।

साथियों,

जब उस महिला को 26 सप्ताह की छुट्टी मिलती है ना, वो एक प्रकार से नवजात बच्चे के अधिकार की रक्षा करता है। उसका अधिकार है उसकी मां के साथ जिंदगी बिताने का, वो अधिकार उसको मिलता है। शायद अभी तक तो हमारे कानून की किताबों में ये सारे उल्लेख नहीं आए होंगे।

साथियों,

बेटियों की सुरक्षा से जुड़े भी अनेक कानूनी कदम बीते सालों में उठाए गए हैं। देश के 700 से अधिक जिलों में वन स्टॉप सेंटर्स चल रहे हैं, जहां एक ही जगह पर महिलाओं को मेडिकल सहायता, पुलिस सुरक्षा, साइको सोशल काउंसलिंग, कानूनी मदद और अस्थायी आश्रय दिया जाता है। महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों की जल्द से जल्द सुनवाई हो, इसके लिए देशभर में साढ़े छह सौ से ज्यादा Fast Track Courts बनाई गई हैं। रेप जैसे जघन्य अपराध के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान भी किया गया है। Medical Termination of Pregnancy Act इसमे संशोधन करके महिलाओं को अबॉर्शन से जुड़ी स्वतंत्रता दी गई है। सुरक्षित और कानूनी अबॉर्शन का रास्ता मिलने से महिलाओं के जीवन पर संकट भी कम हुआ है और प्रताड़ना से भी मुक्ति मिली है। बच्चों से जुड़े अपराधों पर लगाम लगाने के लिए भी कानूनों को कड़ा किया गया है, नई Fast Track Courts बनाई गई हैं।

साथियों,

हमारे दिव्यांग भाई-बहनों की क्या शक्ति है, ये हमने हाल के पैरालंपिक में फिर अनुभव किया है। बीते वर्षों में दिव्यांगों को सशक्त करने के लिए भी कानून बनाए गए हैं, उनको नई सुविधाओं से जोड़ा गया है। देशभर में हजारों भवनों को, सार्वजनिक बसों को, रेलवे को दिव्यांगों के लिए सुगम हो, लगभग 700 वैबसाइट्स को दिव्यांगों के अनुकूल तैयार करना हो, दिव्यांगों की सुविधा के लिए विशेष सिक्के जारी करना हो, करेंसी नोट भी आपको शायद कई लोगों को मालूम नहीं होगा, अब जो हमारी नई करेंसी है उसमें दिव्यांग यानि जो प्रज्ञाचक्षु हमारे भाई-बहन हैं। वे उसको स्पर्श करके ये करेंसी नोट कितने कीमत की है वो तय कर सकते हैं। ये व्यवस्था की गई है। शिक्षा से लेकर स्किल्स, स्किल्स से लेकर अनेक संस्थान और विशेष पाठयक्रम बनाना हो। इस पर बीते वर्षों में बहुत जोर दिया गया है। हमारे देश की अनेक भाषाएं हैं, अनेक बोलियां हैं और वैसा ही स्वभाव हमारे signages में था।

मूक बधिर हमारे दिव्यांगजन जो हैं। अगर वो गुजरात में जो signages देखता है। महाराष्ट्र में अलग, गोवा में अलग, तमिलनाडू में अलग। भारत ने इस समस्या का समाधान करने के लिए पूरे देश के लिए एक signages की व्यवस्था की, कानूनन की और उसकी पूरी ट्रेनिंग का ये उनके अधिकारों की चिंता और एक संवेदनशील अभिगम का परिणाम है। हाल में ही देश की पहली साइन लैंग्वेज डिक्शनरी और ऑडियो बुक की सुविधा देश के लाखों दिव्यांग बच्चों को दी गई है, जिससे वे ई-लर्निंग से जुड़ सकें। इस बार जो नई नेशनल एजुकेशन पॉलिसी आई उसमे भी इस बात को विशेष रूप से ध्यान रखा गया है। इसी तरह ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को भी बेहतर सुविधाएं और समान अवसर देने के लिए Transgender Persons (Protection of Rights) कानून बनाया गया है। घुमंतू और अर्ध घुमंतू समुदायों के लिए भी डेवलपमेंट एंड वेलफेयर बोर्ड की स्थापना की गई है। लोक अदालतों के माध्यम से, लाखों पुराने केसेस का निपटारा होने से अदालतों का बोझ भी कम हुआ है, और देशवासियों को भी बहुत मदद मिली है। ये सारे प्रयास, समाज में हो रहे Injustice को दूर करने करने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।

साथियों,

हमारे देश ने कोरोना की इतनी बड़ी महामारी का सामना किया। सदी की इतनी बड़ी आपदा, जिसके आगे दुनिया के बड़े बड़े देश भी डगमगा गए। पहले की महामारियों का अनुभव है कि, जब इतनी बड़ी त्रासदी आती है, इतनी बड़ी आबादी हो तो उसके साथ समाज में अस्थिरता भी जन्म लेती है। लेकिन देश के सामान्य मानवी के अधिकारों के लिए, भारत ने जो किया, उसने तमाम आशंकाओं को गलत साबित कर दिया। ऐसे कठिन समय में भी भारत ने इस बात का प्रयास किया कि एक भी गरीब को भूखा नहीं रहना पड़े। दुनिया के बड़े-बड़े देश नहीं कर पा रहे,

लेकिन आज भी भारत 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज मुहैया करा रहा है। भारत ने इसी कोरोना काल में गरीबों, असहायों, बुजुर्गों को सीधे उनके खाते में आर्थिक सहायता दी है। प्रवासी श्रमिकों के लिए 'वन नेशन वन राशन कार्ड' की सुविधा भी शुरू की गई है, ताकि वो देश में कहीं भी जाएँ, उन्हें राशन के लिए भटकना न पड़े।

भाइयों और बहनों,

मानवीय संवेदना और संवेदनशीलता को सर्वोपरि रखते हुए, सबको साथ लेकर चलने के ऐसे प्रयासों ने देश के छोटे किसानों को बहुत बल दिया है। आज देश के किसान किसी तीसरे से कर्ज लेने के लिए मजबूर नहीं हैं, उनके पास किसान सम्मान निधि की ताकत है, फसल बीमा योजना है, उन्हें बाज़ार से जोड़ने वाली नीतियाँ हैं। इसका परिणाम ये है कि संकट के समय भी देश के किसान रिकॉर्ड फसल उत्पादन कर रहे हैं। जम्मू कश्मीर और नॉर्थ ईस्ट का उदाहरण भी हमारे सामने है। इन क्षेत्रों में आज विकास पहुँच रहा है, यहां के लोगों का जीवन स्तर बेहतर बनाने का गंभीरता से प्रयास हो रहा है। ये प्रयास, मानवाधिकारों को भी उतना ही सशक्त कर रहे हैं।

साथियों,

मानवाधिकारों से जुड़ा एक और पक्ष है, जिसकी चर्चा मैं आज करना चाहता हूं। हाल के वर्षों में मानवाधिकार की व्याख्या कुछ लोग अपने-अपने तरीके से, अपने-अपने हितों को देखकर करने लगे हैं। एक ही प्रकार की किसी घटना में कुछ लोगों को मानवाधिकार का हनन दिखता है और वैसी ही किसी दूसरी घटना में इन्हीं लोगों को मानवाधिकार का हनन नहीं दिखता। इस प्रकार की मानसिकता भी मानवाधिकार को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाती है। मानवाधिकार का बहुत ज्यादा हनन तब होता है जब उसे राजनीतिक रंग से देखा जाता है, राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है, राजनीतिक नफा-नुकसान के तराजू से तौला जाता है। इस तरह का सलेक्टिव व्यवहार, लोकतंत्र के लिए भी उतना ही नुकसान-दायक है। हम देखते हैं कि ऐसे ही सलेक्टिव व्यवहार करते हुए कुछ लोग मानवाधिकारों के हनन के नाम पर देश की छवि को भी नुकसान पहुंचाने का प्रयास करते हैं। ऐसे लोगों से भी देश को सतर्क रहना है।

साथियों,

आज जब विश्व में मानवाधिकारों की बात होती है, तो उसका केंद्र individual rights होते हैं, व्यक्तिगत अधिकार होते हैं। ये होना भी चाहिए। क्योंकि व्यक्ति से ही समाज का निर्माण होता है, और समाज से ही राष्ट्र बनते हैं। लेकिन भारत और भारत की परंपरा ने सदियों से इस विचार को एक नई ऊंचाई दी है। हमारे यहाँ सदियों से शास्त्रों में बार – बार इस बात का जिक्र किया जाता है। आत्मनः प्रति-कूलानि परेषाम् न समाचारेत्। यानी, जो अपने लिए प्रतिकूल हो, वो व्यवहार दूसरे किसी भी व्यक्ति के साथ नहीं करें। इसका अर्थ ये है कि मानवाधिकार केवल अधिकारों से नहीं जुड़ा हुआ बल्कि ये हमारे कर्तव्यों का विषय भी है। हम अपने साथ साथ दूसरों के भी अधिकारों की चिंता करें, दूसरों के अधिकारों को अपना कर्तव्य बनाएँ, हम हर मानव के साथ 'सम भाव' और 'मम भाव' रखें! जब समाज में ये सहजता आ जाती है तो मानवाधिकार हमारे समाज का जीवन मूल्य बन जाते हैं। अधिकार और कर्तव्य, ये दो ऐसी पटरियां हैं, जिन पर मानव विकास और मानव गरिमा की यात्रा आगे बढ़ती है। अधिकार जितना आवश्यक हैं, कर्तव्य भी उतने ही आवश्यक हैं। अधिकार और कर्तव्य की बात अलग-अलग नहीं होनी चाहिए, एक साथ ही की जानी चाहिए। ये हम सभी का अनुभव है कि हम जितना कर्तव्य पर बल देते हैं, उतना ही अधिकार सुनिश्चित होता है। इसलिए, प्रत्येक भारतवासी, अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने के साथ ही, अपने कर्तव्यों को उतनी ही गंभीरता से निभाए, इसके लिए भी हम सबने मिलकर के निरंतर प्रयास करना पड़ेगा, निरंतर प्रेरित करते रहना होगा।

साथियों,

ये भारत ही है जिसकी संस्कृति हमें प्रकृति और पर्यावरण की चिंता करना भी सिखाती है। पौधे में परमात्मा ये हमारे संस्कार हैं। इसलिए, हम केवल वर्तमान की चिंता नहीं कर रहे हैं, हम भविष्य को भी साथ लेकर चल रहे हैं। हम लगातार विश्व को आने वाली पीढ़ियों के मानवाधिकारों के प्रति भी आगाह कर रहे हैं। इंटरनेशनल सोलर अलायंस हो, Renewable energy के लिए भारत के लक्ष्य हों, हाइड्रोजन मिशन हो, आज भारत sustainable life और eco-friendly growth की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। मैं चाहूँगा कि, मानवाधिकारों की दिशा में काम कर रहे हमारे सभी प्रबुद्धगण, सिविल सोसाइटी के लोग, इस दिशा में अपने प्रयासों को बढ़ाएँ। आप सबके प्रयास लोगों को अधिकारों के साथ ही, कर्तव्य भाव की ओर प्रेरित करेंगे, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ, मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ। आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद !

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Text of PM’s address at the News18 Rising Bharat Summit
February 27, 2026
Developed nations are eager to sign trade deals with India because a confident India is rising beyond doubt and despair: PM
In the last 11 years, a new energy has flowed into the nation's consciousness, India is determined to regain its rightful strength: PM
India's Digital Public Infrastructure has today become a subject of global discussion: PM
Today, every move India makes is closely watched and analysed across the world, the AI Summit is a clear example of this: PM
Nation-building never happens through short-term thinking; It is shaped by a long-term vision, patience and timely decisions: PM

इजराइल की हवा यहाँ भी पहुँच गई है।

नमस्कार!

नेटवर्क 18 के सभी पत्रकार, इस व्यवस्था को देखने वाले सभी साथी, यहां उपस्थित सभी महानुभाव, देवियों और सज्जनों!

आप सभी राइजिंग भारत की चर्चा कर रहे हैं। और इसमें strength within पर आपका जोर है, यानी साधारण शब्दों में कहूं, तो देश के अपने खुद के सामर्थ्य पर आपका फोकस है। और हमारे यहां तो शास्त्रों में कहा गया है - तत् त्वम असि! यानी जिस ब्रह्म की खोज मे हम निकले हैं, वो हम ही हैं, वो हमारे भीतर ही है। जो सामर्थ्य हमारे भीतर है उसे हमें पहचानना है। बीते 11 वर्षों में भारत ने अपना वही सामर्थ्य पहचाना है, और इस सामर्थ्य को सशक्त करने के लिए आज देश निरंतर प्रयास कर रहा है।

साथियों,

सामर्थ्य किसी देश में अचानक पैदा नहीं होता, सामर्थ्य पीढ़ियों में बनता है। वो ज्ञान से, परंपरा से, परिश्रम से और अनुभव से निखरता है, लेकिन इतिहास के एक लंबे कालखंड में, गुलामी की इतनी शताब्दियों में, हमारे सामर्थ्यवान होने की भावना को ही हीनता से भर दिया गया था। दूसरे देशों से आयातित विचारधारा ने समाज में कूट-कूट कर ये भर दिया था, कि हम अशिक्षित हैं और अनुगामी यानी, फॉलोअर हैं, हमारे यहां ये भी कहा गया है – यादृशी भावना यस्य, सिद्धिर्भवति तादृशी। यानी जैसी जिसकी भावना होती है, उसे वैसी ही सिद्धि प्राप्त होती है। जब भावना में ही हीनता थी, तो सिद्धि भी वैसी ही मिल रही है। हम विदेशी तकनीक की नकल करते थे, विदेशी मुहर का इंतजार करते थे, ये वो गुलामी थी जो राजनीतिक और भौगोलिक से ज्यादा मानसिक गुलामी थी। दुर्भाग्य से आजादी के बाद भी, भारत गुलामी की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया। और इसका नुकसान हम आज तक उठा रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण, हम ट्रेड डील्स में हो रही चर्चा में देख रहे हैं। कुछ लोग चौंक गए हैं कि अरे ये क्या हो गया, कैसे हो गया, विकसित देश भारत से ट्रेड डील्स करने में इतने उत्सुक क्यों हैं। इसका उत्तर है हताशा, निराशा से बाहर निकल रहा आत्मविश्वासी भारत। अगर देश आज भी 2014 से पहले वाली निराशा में होता, फ्रेजाइल फाइव में गिना जाता, पॉलिसी पैरालिसिस से घिरा होता, अगर ये हाल होते तो कौन हमारे साथ ट्रेड डील्स करता, अरे हमारी तरफ देखता भी नहीं।

लेकिन साथियों,

बीते 11 वर्षों में देश की चेतना में नई ऊर्जा का प्रवाह हुआ है। भारत अब अपने खोये हुए सामर्थ्य को वापस पाने का प्रयास कर रहा है। एक समय में जब भारत का वैश्विक अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा दबदबा था, तो हमारा क्या सामर्थ्य था? भारत की मैन्युफैक्चरिंग, भारत के प्रोडक्टस की क्वालिटी, भारत की अर्थ नीति, अब आज का भारत फिर से इन बातों पर फोकस कर रहा है। इसलिए हमने मैन्युफैक्चरिंग पर काम किया, हमने मेक इन इंडिया पर बल दिया, हमने अपनी बैंकिंग सिस्टम को सशक्त किया, महंगाई जो डबल डिजिट की दर से भाग रही थी, उसका कंट्रोल किया और भारत को दुनिया का ग्रोथ इंजन बनाया। भारत का यही सामर्थ्य है कि दुनिया के विकसित देश सामने से भारत के साथ ट्रेड डील करने के लिए खुद आगे आ रहे हैं।

साथियों,

जब किसी राष्ट्र के भीतर, छिपी हुई उसकी शक्ति जागती है, तो वह नई उपलब्धियां हासिल करता है। मैं आपको कुछ और उदाहरण देता हूं। जैसे मैं जब कभी दूसरी देशों के हेड ऑफ द गर्वमेंट से मिलता हूं, तो वो जनधन, आधार और मोबाइल की इतनी शक्ति के बारे में सुनने के लिए बहुत उत्सुक होते हैं। जिस भारत में एटीएम भी, दुनिया की विकसित देशों की तुलना में काफी समय बाद आया, उस भारत ने डिजिटल पेमेंट सिस्टम में ग्लोबल लीडरशिप कैसे हासिल कर ली? जहां पर सरकारी मदद की लीकेज को कड़वा सच मान लिया गया था, वो भारत डीबीटी के जरिये 24 लाख करोड़ रूपये, यानी Twenty four trillion रुपीज कैसे लाभार्थियों को भेज पा रहा है? भारत का डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, आज पूरे विश्व के लिए चर्चा का विषय बन चुका है।

साथियों,

दुनिया हैरान होती है, कि जिस भारत में 2014 तक, करीब तीन करोड़ परिवार अंधेरे में थे, वो आज सोलर पावर कैपेसिटी में दुनिया के टॉप के देशों में कैसे आ गया? जिस भारत के शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट सुधरने की कोई उम्मीद ना थी, वो भारत आज दुनिया का तीसरा बड़ा मेट्रो नेटवर्क वाला देश कैसे बन गया? जिस भारत के रेलवे की पहचान सिर्फ लेट-लतीफी और धीमी-रफ्तार से होती थी, वहां वंदे भारत, नमो भारत, ऐसी सेमी-हाईस्पीड कनेक्टिविटी कैसे संभव हो पा रही है?

साथियों,

एक समय था, जब भारत नई टेक्नोलॉजी का सिर्फ और सिर्फ कंज्यूमर था। आज भारत नई टेक्नोलॉजी का निर्माता भी है और नए मानक भी स्थापित कर रहा है। और ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि हमने अपने सामर्थ्य को पहचाना है, जिस Strength Within की आप चर्चा कर रहे हैं, ये उसका ही उदाहरण है।

साथियों,

जब हम गर्व से आगे बढ़ते हैं, तो दुनिया हमें जिस नजर से देखती रही है, वो नजर भी बदली है। आप याद कीजिए, कुछ साल पहले तक दुनिया में, ग्लोबल मीडिया में, भारत के किसी इवेंट की कितनी कम चर्चा होती थी। भारत में होने वाले इवेंट्स को उतनी तवज्जो ही नहीं दी जाती थी। और आज देखिए, भारत जो करता है, जो एक्शन यहां होते हैं, उसका वैश्विक विश्लेषण होता है। AI समिट का उदाहरण आपके सामने है, इसी भवन में हुआ है। AI समिट में 100 से ज्यादा देश शामिल हुए, ग्लोबल नॉर्थ हो या फिर ग्लोबल साउथ, सभी एक साथ, एक ही जगह, एक टेबल पर बैठे। दुनिया के बड़े-बड़े कॉर्पोरेशन्स हों या फिर छोटे-छोटे स्टार्ट अप्स, सभी एक साथ जुटे।

साथियों,

अब तक जितनी भी औद्योगिक क्रांतियां आई हैं, उनमें भारत और पूरा ग्लोबल साउथ सिर्फ फॉलोअर रहा है। लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के इस युग में, भारत निर्णयों में सहभागी भी है और उन्हें शेप भी कर रहा है। आज हमारे पास खुद का AI स्टार्टअप इकोसिस्टम है, डेटा-सेंटर में निवेश करने की ताकत है और AI डेटा को स्टोर करने के लिए, प्रोसेस करने के लिए, जिस पावर की सबसे ज्यादा ज़रूरत है, उस पर भी भारत तेजी से काम कर रहा है। हमने न्यूक्लियर पावर सेक्टर में जो Reform किया है, वो भी भारत के AI इकोसिस्टम को मजबूती देने में मदद करेगा।

साथियों,

AI समिट का आयोजन पूरे भारत के लिए गौरव का पल था। लेकिन दुर्भाग्य से देश की सबसे पुरानी पार्टी ने, देश के इस उत्सव को मैला करने का प्रयास किया। विदेशी अतिथियों के सामने कांग्रेस ने सिर्फ कपड़े नहीं उतारे, बल्कि इसने कांग्रेस के वैचारिक दिवालिएपन को भी expose कर दिया है। जब नाकामी की निराशा-हताशा मन में हो, और अहंकार सिर चढ़कर बोलता हो, तब देश को बदनाम करने की ऐसी सोच सामने आती है। ज़ाहिर है, कांग्रेस की इस हरकत से देश में गुस्सा है। इसलिए, इन्होंने अपने पाप को सही ठहराने के लिए महात्मा गांधी जी को आगे कर दिया। कांग्रेस हर बार ऐसा ही करती है। जब अपने पाप को छुपाना हो तो कांग्रेस बापू को आगे कर देती है, और जब अपना गौरवगान करना हो, तो एक ही परिवार को सारा क्रेडिट देती है।

साथियों,

कांग्रेस अब विचारधारा के नाम पर केवल विरोध की टूलकिट बनकर रह गई है। और ये अंध-विरोध की मानसिकता इतनी बढ़ गई है, कि ये देश को हर मंच, हर प्लेटफॉर्म पर नीचा दिखाने से नहीं चूकते। देश कुछ भी अच्छा करे, देश के लिए कुछ भी शुभ हो रहा हो, कांग्रेस को विरोध ही करना है।

साथियों,

मेरे पास एक लंबी सूची है, देश की संसद की नई इमारत बनी, उसका विरोध। संसद के ऊपर अशोक स्तंभ के शेरों का विरोध। अब जिनके बब्बर शेर सामान्य नागरिकों के जूते खाकर के भाग रहे थे, उनके संसद भवन के शेर के दांत देखकर के डर लग गया उनको। कर्तव्य भवन बना, उसका भी विरोध। सेनाओं ने सर्जिकल स्ट्राइक की, उसका भी विरोध। बालाकोट में एयर स्ट्राइक हुई, उसका भी विरोध। ऑपरेशन सिंदूर हुआ, उसका भी विरोध। यानी देश की हर उपलब्धि पर कांग्रेस के टूलकिट से एक ही चीज निकलती है- विरोध।

साथियों,

देश ने आर्टिकल 370 की दीवार गिराई, देश खुश हुआ। लेकिन कांग्रेस ने विरोध किया। हमने CAA का कानून बनाया- उसका विरोध। हम महिला आरक्षण कानून लाए- उसका विरोध। तीन तलाक के विरुद्ध कानून लाए- उसका विरोध। हम UPI लेकर आए, उसका विरोध। स्वच्छ भारत अभियान लेकर आए, उसका विरोध। देश ने कोरोना वैक्सीन बनाई, तो उसका भी विरोध।

साथियों,

लोकतंत्र में विपक्ष का मतलब सिर्फ अंध-विरोध नहीं होता, डेमोक्रेसी में विपक्ष का मतलब वैकल्पिक विजन होता है। इसलिए देश की प्रबुद्ध जनता, कांग्रेस को सबक सिखा रही है, आज से नहीं, बीते चार दशकों से लगातार ये काम देश की जनता कर रही है। मैं जो कहने जा रहा हूं, मीडिया के साथी उसका भी ज़रा एनालिसिस करिएगा। आपको पता लगेगा कि कांग्रेस के वोट चोरी नहीं हो रहे, बल्कि देश के लोग अब कांग्रेस को वोट देने लायक ही नहीं मानते। और इसकी शुरुआत 1984 के बाद ही होनी शुरू हो गई थी। 1984 में कांग्रेस को 39 परसेंट वोट मिले थे, और 400 से अधिक सीटें मिली थीं। इसके बाद हुए चुनावों में कांग्रेस के वोट कम ही होते चले गए। और आज कांग्रेस की हालत ये है कि, देश में सिर्फ, सिर्फ चार राज्य ऐसे बचे हैं, जहां कांग्रेस के पास 50 से ज्यादा विधायक हैं। बीते 40 वर्षों में युवा वोटर्स की संख्या बढ़ती गई और कांग्रेस साफ होती गई। कांग्रेस, परिवार की गुलामी में डूबे लोगों का एक क्लब बनकर रह गई है। इसलिए पहले मिलेनियल्स ने कांग्रेस को सबक सिखाया, और अब जेन जी भी तैयार बैठी है।

साथियों,

कांग्रेस और उसके साथियों की सोच इतनी छोटी है, कि उन्होंने दूरदृष्टि से काम करने को भी गुनाह बना दिया है। आज जब हम विकसित भारत 2047 की बात करते हैं, तो कुछ लोग पूछते हैं— “इतनी दूर की बात अभी क्यों कर रहे हो?” कुछ लोग ये भी कहते हैं कि तब तक मोदी जिंदा थोड़ी रहेगा, सच्चाई यह है कि राष्ट्र निर्माण कभी भी तात्कालिक सोच से नहीं होता। वो एक बड़े विजन, धैर्य और समय पर लिए गए निर्णयों से होता है। मैं कुछ और तथ्य नेटवर्क 18 के दर्शकों के सामने रखना चाहता हूं। भारत हर साल विदेशी समुद्री जहाजों से मालढुलाई पर 6 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च करता है किराए पर। फर्टिलाइजर के आयात पर हर साल सवा दो लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं। पेट्रोलियम आयात पर हर साल 11 लाख करोड़ रुपये खर्च होते हैं। यानी हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये देश से बाहर जा रहे हैं। अगर यही निवेश 20–25 वर्ष पहले आत्मनिर्भरता की दिशा में किया गया होता, तो आज ये पूंजी भारत के इंफ्रास्ट्रचर, रिसर्च, इंडस्ट्री, किसान और युवाओं की क्षमताओं को मजबूत कर रही होती। आज हमारी सरकार इसी सोच के साथ काम कर रही है। विदेशी जहाजों को 6 लाख करोड़ रुपए ना देना पड़े इसलिए भारतीय शिपिंग और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जा रहा है। फर्टिलाइजर का domestic प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए नए प्लांट लग रहे हैं, नैनो-यूरिया को बढ़ावा दिया जा रहा है। पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने के लिए एथेनॉल ब्लेंडिंग, ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, सोलर और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को प्राथमिकता दी जा रही है।

और साथियों,

हमें भविष्य की ओर देखते हुए भी आज ही निर्णय लेने हैं। इसलिए आज भारत में सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का निर्माण हो रहा है। रक्षा उत्पादन में, मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में, ड्रोन टेक्नोलॉजी में, क्रिटिकल मिनरल्स सेक्टर में, और उसमें निवेश, आने वाले दशकों की आर्थिक सुरक्षा की नींव है। 2047 का लक्ष्य कोई राजनीतिक नारा नहीं है। यह उस ऐतिहासिक भूल को सुधारने का संकल्प भी है, जहाँ कांग्रेस की सरकारों के समय कई क्षेत्रों में समय रहते निवेश नहीं किया। आज अगर हम ख़ुद स्वदेशी जहाज, स्वदेशी शिप्स बनाएँगे, ख़ुद एनर्जी का प्रोडक्शन करेंगे, ख़ुद नई टेक्नोलॉजी डेवलप करेंगे, तो आने वाली पढ़ियाँ इम्पोर्ट के बोझ की नहीं, एक्सपोर्ट की क्षमता पर चर्चा करेंगी। राष्ट्र की प्रगति “आज की सुविधा” से नहीं, “कल की तैयारी” से तय होती है। और दूरदृष्टि से की गई मेहनत ही 2047 के आत्मनिर्भर, सशक्त और समृद्ध भारत की आधारशिला है। और इसके लिए कांग्रेस अपने कितने ही कपड़े फाड़ ले, हम निरंतर काम करते रहेंगे।

साथियों,

राष्ट्र निर्माण की, Nation Building की एक बहुत अहम शर्त होती है- नेक नीयत की। कांग्रेस और उसके साथी दल, इसमें भी फेल रहे हैं। कांग्रेस और उसके साथियों ने कभी नेक नीयत के साथ काम नहीं किया। गरीब का दुख, उसकी तकलीफ से भी इन्हें कोई वास्ता नहीं है। जैसे बंगाल में आज तक आयुष्मान भारत योजना लागू नहीं हुई। अगर नेक नीयत होती तो क्या गरीबों को 5 लाख रुपए तक मुफ्त इलाज देने वाली इस योजना को बंगाल में रोका जाता क्या? नहीं। आप भी जानते हैं कि देश में पीएम आवास योजना के तहत गरीबों के लिए पक्के घर बनवाए जा रहे हैं। नेटवर्क 18 के दर्शकों को मैं एक और आंकड़ा देता हूं। तमिलनाडु के गरीब परिवारों के लिए, करीब साढ़े नौ लाख पक्के घर एलोकेट किए गए हैं, साढ़े नौ लाख। लेकिन इनमें से तीन लाख घरों का निर्माण अटक गया है, क्यों, क्योंकि DMK सरकार गरीबों के इन घरों के निर्माण में दिलचस्पी नहीं दिखा रही। इसकी वजह क्या है? इसकी वजह है, नीयत नेक नहीं है।

साथियों,

मैं आपको एग्रीकल्चर सेक्टर का भी उदाहरण देता हूं। कांग्रेस के समय में खेती-किसानी को अपने हाल पर छोड़ दिया गया था। छोटे किसानों को कोई पूछता नहीं था, फसल बीमा का हाल बेहाल था, MSP पर स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट फाइलों में दबा दी गई थी, कांग्रेस बजट में घोषणाएं जरूर करती थी, लेकिन ज़मीन पर कुछ नहीं होता था, क्योंकि उसकी नीयत ही नहीं थी। हमने देश के किसानों के लिए नेक नीयत के साथ काम करना शुरू किया, और आज उसके परिणाम दुनिया देख रही है। आज भारत दुनिया के बड़े एग्रीकल्चर एक्सपोर्टर्स में से एक बन रहा है। हमने हर स्तर पर किसानों के लिए एक सुरक्षा कवच बनाया है। पीएम किसान सम्मान निधि के माध्यम से किसानों के खाते में चार लाख करोड़ रुपए से अधिक जमा किए गए हैं। हमने लागत का डेढ़ गुणा MSP तय किया और रिकॉर्ड खरीद भी की है। मैं आपको सिर्फ दाल का ही आंकड़ा देता हूं। UPA सरकार ने 10 साल में सिर्फ 6 लाख मीट्रिक टन दाल, किसानों से MSP पर खरीदी- 6 लाख मीट्रिक टन। और हमारी सरकार अभी तक, करीब 170 लाख मीट्रिक टन, यानी लगभग 30 गुणा अधिक दाल MSP पर खरीद चुकी है। अब आप तय करिये, कौन किसानों के लिए काम करता है।

साथियों,

यूपीए सरकार किसान क्रेडिट कार्ड के जरिए भी किसानों को मदद देने में कंजूसी करती थी। अपने 10 साल में यूपीए सरकार ने सात लाख करोड़ रुपए का कृषि ऋण किसानों को दिया। 7 lakh crore rupees. जबकि हमारी सरकार इससे चार गुणा अधिक यानी 28 लाख करोड़ रुपए दे चुकी है। यूपीए सरकार के दौरान जहां सिर्फ पांच करोड़ किसानों को इसका लाभ मिलता था, आज ये संख्या दोगुने से भी अधिक करीब-करीब 12 करोड़ किसानों को पहुंची है। यानी देश के छोटे किसान को भी पहली बार मदद मिली है। हमारी सरकार ने पीएम फसल बीमा योजना का सुरक्षा कवच भी किसानों को दिया। इसके तहत करीब 2 लाख करोड़ रुपए किसानों को संकट के समय मिल चुके हैं। हम नेक नीयत से काम कर रहे हैं, इसलिए भारत के किसानों का आत्मविश्वास बढ़ रहा है, उनकी प्रोडक्टिविटी बढ़ रही है, और आय में भी वृद्धि हो रही है।

साथियों,

21वीं सदी का एक चौथाई हिस्सा बीत चुका है। अब अगला चरण भारत के विकास का निर्णायक दौर है। वर्तमान में लिए गए निर्णय ही भविष्य की दिशा तय करेंगे। हमें अपने सामर्थ्य को पहचानते हुए, उसे बढ़ाते हुए आगे चलना है। हर व्यक्ति अपने क्षेत्र में श्रेष्ठता को लक्ष्य बनाए, हर संस्था excellence को अपना संस्कार बनाए, हम सिर्फ उत्पाद न बनाएं, best-quality product बनाएं, हम सिर्फ रुटीन काम न करें, world-class काम करें, हम क्षमता को performance में बदलें। मैंने लाल किले से कहा है- यही समय है, सही समय है। यही समय है, भारत को नई ऊँचाइयों पर ले जाने का। एक बार फिर आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं, बहुत-बहुत धन्यवाद। नमस्कार।