आपका जो हक है वो हक बरकरार रहेगा। मैं आपके हक को पूरा करने की पूरी कोशिश करूंगा। मैं दोबारा आउंगा।

आप सब विदेश में रहते हैं तो अनुभव करते होंगे कि एक भारतीय व्यक्ति के नाते इसके पूर्व दुनिया आपको कैसे देखती थी। देशों की सरकारें और शासक आपको कैसे देखते थे और पिछले कुछ महीनों में आपकी तरफ देखने का दुनिया का दृष्टिकोण कैसे बदला है। विश्व की महासत्ताएं भी भारत की तरफ जिस प्रकार से देख रहीं हैं, तो एक भारतीय व्यक्ति के नाते आप सबको भी एक गर्व महसूस होता होगा कि "हां भई, हम हिंदुस्तानी हैं!"

लेकिन जब ये अवसर आता है, तब हमारी जिम्मेदारी जरा ज्यादा बढ़ जाती है। पहले तो कोई देखता ही नहीं था, हम किस कोने में पड़े हैं, कोई पूछता ही नहीं था। लेकिन अब! अब हमारा बायां हाथ किस तरफ है, दाहिना हाथ किस तरफ है, सब चीज़ें बारीकी से देखी जाएंगी। इसलिए भारतीय समाज को - सिर्फ भारत सरकार को और भारत देश को नहीं - विश्व में फैले हुए भारतीय समाज को पूरा विश्व एक विशिष्ट नज़र से इन दिनों देख रहा है। बारीकी से हम लोगों का मूल्यांकन कर रहा है। हम तक पहुंचने के लिए रास्ता खोज रहा है। हमें अपना बनाने के लिए, जो पहले कभी हमारी नमस्ते भी नहीं लेता था, वो आजकल गले लगने की कोशिश कर रहा है। ये आप सबने भली-भांति अनुभव किया होगा। किया है कि नहीं? ऐसा ही अनुभव आ रहा है? पहले से अभी बदलाव दिखता है? लोग आपके प्रति आदर से देखते हैं?

ये एक ऐसी अमानत हमारे पास है, इस अमानत को संभालना भी है, संवारना भी है। हमें - दुनिया के किसी भी देश में हम क्यों न हों - उस देश का प्यार पाना, उस देश की प्रगति के लिए हमारा योगदान पहले से अधिक बढ़े और हम भी फले फूलें। ऐसा नहीं कि सिर्फ अड़ोस-पड़ोस वाले ही फले फूलें, हम भी फले फूलें। आप विकास की नई ऊंचाइयों को पार करें।

भारत का और यहां का इतिहास बहुत जुड़ा हुआ है. आज़ादी का संघर्ष साथ साथ किया है। हम सुख-दुख के साथी रहे हैं और आज भी यहां के लोग भारत को, एक पुण्य भूमि के रूप में, और भगवान बुद्ध के कारण बहुत आदर और सत्कार के भाव से देखते हैं। हमारी कोशिश है, खास करके, हमारे पड़ोस के जो देश हैं, भारत उनको काम कैसे आए? उनके लिए भारत क्या कर सकता है? और मैं मानता हूं ये भारत की जिम्मेवारी भी है। कुछ दिन पहले मैंने कहा था कि हम एक satellite का निर्माण करके, आकाश में उस satellite को भेजेंगे और वो पूरी तरह SAARC के लिए dedicated होगा। और आज मैं जब म्यांमार में आया हूं, तो मैं ये भी घोषणा करना चाहता हूं कि भारत का ये जो satellite हम SAARC को dedicate करने वाले हैं, उसके सारे लाभ म्यांमार को भी देंगे। इसका सर्वाधिक लाभ health sector में होता है, education में होता है, tele-medicine में होता है, long-distance education में होता है। तो एक प्रकार से आधूनिकतम विज्ञान का लाभ इस धरती को भी मिले, उस दिशा में हम सोचेंगे। हमने ये भी तय किया है कि अभी नेपाल में जब हमारी SAARC देशों की meeting होगी, हमने कहा है कि भारत ये काम, ये जिम्मा उठाने के लिए तैयार है। वो काम है, SAARC देशों में से - और उसमें हम म्यांमार को भी जोड़ सकते हैं - polio मुक्त ये हमारा क्षेत्र कैसे बने? भारत में polio के खिलाफ लड़ाई में हम सफल हुए हैं। Polio से मुक्ति में असफल रहने की पिछले पांच सात साल से कोई घटना नहीं हुई है। लेकिन, अभी भी हमारे अड़ोस-पड़ोस के देशों में ये हो रहा है, पाकिस्तान में तो अभी भी कुछ न कुछ घटनाएं हो रही हैं। जिस परिवार में किसी बालक को polio हो जाता है, तो पूरा परिवार एक प्रकार से अपंग हो जाता है। एक व्यक्ति अपंग नहीं होता है। तो ये मानवता का काम है। और इस मानवता के काम में भारत अड़ोस-पड़ोस के देशों के लिए एक वृहद योजना बना करके काम करेगा। उन देशों से सहमति तो लेनी पड़ेगी। जब हम SAARC की meeting में मिलेंगे तब उसकी चर्चा होगी, कार्य योजना बनाएंगे और उसके लिए जो कुछ भी करना होगा.. एक मानवता का काम... और भारत की तो विशेषता यही रही है। मानवता के काम में ही भारत हमेशा जाना पहचाना गया है। तो उसमें हम कहीं पीछे न रहें, उस दिशा में हमारा काम रहेगा। भारत ने अभी एक अभियान चलाया है ‘Make in India’। पूरे विश्व को हम कह रहे हैं, “आइए, भारत में अपना नसीब आजमाइए और औद्योगिक विकास में आप शरीक हो जाइए।“ भारत में बहुत संभावनाएं पड़ी हैं, विकास के लिए बहुत अवसर पड़े हैं और ये दुनिया का सबसे युवा देश है, भारत। यहां पर युवा workforce हमारे पास है, तो उसको ले करके भारत विकास की नई ऊंचाइयों को पार करें उस दिशा में हम प्रयास कर रहे हैं।

तीन दिन मुझे यहां विश्व के कई नेताओं से मिलने का अवसर मिला। मेरा बहुत ही सुखद अनुभव रहा है और इतने बड़े आयोजन को जिस प्रकार से यहां की सरकार ने कामयाब किया, मैं यहां की सरकार को, म्यांमार की जनता को इस स्वागत, सम्मान, समारोह के लिए बहुत बहुत बधाई देता हूं। आपने मुझे बुलाया, सम्मान किया। मुझे सबसे अच्छा ये लगा कि जब मैं सबसे मिल रहा था, मुझे संकोच हो रहा था कि मेरा समय कम पड़ रहा है। मुझे आपको समय ज्यादा देना चाहिए था। लेकिन, कम समय का आपने जो उत्तम उपयोग किया और discipline से किया, मैं इसके लिए आपको बहुत बधाई देता हूं। मैं जहां जाउंगा, आपका ये जो discipline वाला कार्यक्रम देखकर मेरे मन पे जो छवि बनी है, मैं डंका बजाता रहूंगा। तो मैं आपका बहुत बहुत आभारी हूं, बहुत बहुत धन्यवाद।

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श्री रामनाथ कोविंद जी की ऑटो-बायोग्राफी भारतीय लोकतंत्र और भारतीय समाज के लिए एक अनमोल धरोहर बनेगी: पीएम मोदी
August 12, 2026
आज हमें श्री राम नाथ कोविंद जी की आत्मकथा का विमोचन करने का अवसर मिला है; मुझे इस कार्यक्रम का हिस्सा बनकर प्रसन्‍नता हो रही है: प्रधानमंत्री
उनका जीवन लोगों की सेवा और राष्ट्र की प्रगति के प्रति समर्पित रहा है: प्रधानमंत्री
कोविंद जी के साथ मेरा दीर्घकालिक परिचय और उनके प्रति उनका विशेष स्नेह एवं आत्मीयता मेरे लिए सबसे बड़ी संपत्ति रही है: प्रधानमंत्री
महात्मा गांधी, बाबासाहब अंबेडकर, ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने एक ऐसे नए भारत का सपना देखा था जहाँ सबसे गरीब और सबसे वंचित लोग भी शिखर तक पहुँच सकें: पीएम मोदी
कोविंद जी जैसे व्यक्तित्वों ने न केवल खुद का जीवन बदला है, बल्कि भारत के लिए अपने सपने और विजन को साकार करने में भी अहम भूमिका निभाई है: पीएम मोदी
राष्ट्रपति पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी, वे 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' पर काम कर रहे हैं; यह संकल्‍प लोकतंत्र में एक नया अध्याय शुरू कर सकता है: प्रधानमंत्री

हमारे पूर्व राष्ट्रपति श्रीमान रामनाथ कोविंद जी, लोकसभा के अध्यक्ष आदरणीय ओम बिरला जी, श्रीमती सविता कोविंद जी, सभाग्रह में सभी वरिष्ठ जन बैठे हैं, सबका उल्लेख नहीं कर पाऊंगा, लेकिन मेरे लिए बहुत आनंद है कि एक पारिवारिक कार्यक्रम लग रहा है।

भाइयों-बहनों,

आज हमें श्री रामनाथ कोविंद जी की आत्मकथा के विमोचन का अवसर मिला है। मुझे खुशी है कि मुझे भी इस कार्यक्रम का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला है। कोविंद जी से मेरा बहुत लंबा परिचय रहा है, उन्हें करीब से जानने का भी अवसर मिला और राष्ट्रपति के रूप में उनका मार्गदर्शन और इस सबके साथ-साथ उनका मेरे प्रति विशेष स्नेह, उनकी आत्मीयता, ये मेरी बहुत बड़ी पूंजी रही है। मैंने उनके जीवन को जितना समझा है, उनकी कार्यक्षमताओं को जितना जाना है, मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूं कि श्री रामनाथ कोविंद जी की ऑटो-बायोग्राफ़ी अपने आप में भारतीय लोकतंत्र और भारतीय समाज के लिए एक धरोहर बनेगी। कोविंद जी की जीवन यात्रा, समाज और राष्ट्र के लिए उनका योगदान, ऐसा कितना कुछ है जिसके बारे में मैं विस्तार से बात कर सकता हूं, लेकिन बुक रिलीज़ में केवल ‘कर्टन रेज़र’ ही होना चाहिए। आप सब किताब का पूरा लाभ पढ़कर ही लें, तो ही ज्यादा अच्छा है।

साथियों,

कोविंद जी की जीवन यात्रा को आप उनके शब्दों में जानें, उनकी लेखनी को, उनके अनुभवों को देश की नई पीढ़ी पढ़े, इससे हर किसी को काफी कुछ सीखने को मिलेगा। मैं रामनाथ कोविंद जी को इस आत्मकथा के लिए बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

साथियों,

कोविंद जी ने अपनी इस पुस्तक को बहुत ही सटीक नाम दिया है- “Triumph of the Indian Republic: My Life, My Struggles” कहने का भाव ये कि जीवन और जीवन के संघर्ष उनके व्यक्तिगत हैं, लेकिन उन संघर्षों के परिणामस्वरूप मिली जीत, भारत के गणतंत्र की है, भारत के लोकतंत्र की है।

साथियों,

हम सब अक्सर अनुभव करते हैं कि इंसान का एक स्वभाव होता है, लोग अपनी सफलता का श्रेय खुद को देते हैं और जीवन की मुश्किलों के लिए, कठिनाइयों के लिए समाज को जिम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन, जब हृदय उदार हो, भारतीय संस्कार हों, तब व्यक्ति समाज की कमियाँ निकालने में समय नहीं गँवाता, वो उसके सकारात्मक पक्ष पर फोकस करता है, वो अपनी सफलता में समाज को बराबर का भागीदार मानता है। कोविंद जी की आत्मकथा और उसका शीर्षक इसके उदाहरण हैं। आप उनका जीवन देखिए, एक बेहद सामान्य परिवार में, कानपुर देहात में उनका जन्म हुआ। कोविंद जी ने अभी भी कुछ वर्णन किया और अपनी किताब में भी लिखा है, कैसे गर्मी के मौसम में एक दिन उनके घर में आग लग गई, उनकी माँ अपनी चिंता छोड़कर घर की चीजों को बचा रही थीं। आखिर, एक सामान्य परिवार में, माँ के लिए एक-एक चीज बच्चों के पालन-पोषण का जरिया होती है। उसी कोशिश में, आग में फंसकर उनकी माता जी की मृत्यु हो गई। आप कल्पना कर सकते हैं, छोटी सी उम्र में इस तरह की घटना, माँ को इस तरह खो देना, ये कितना दर्दनाक रहा होगा। मैं तो भाग्यशाली रहा हूं, मेरी मां 100 साल से भी अधिक जीवित रही और मुझे आशीर्वाद देती रही। उसके बावजूद भी, आज भी मैं मां की कमी महसूस करता हूं।

साथियों,

उनके जीवन का एक ऐसा दर्दनाक ये घटनाक्रम था, कोई भी इससे टूट सकता था, लेकिन कोविंद जी को उन मुश्किलों ने मजबूत किया। पड़ोस की एक माता जी ने उनके पालन-पोषण में मदद की। इससे उन्होंने समाज की एकता और सौहार्द की ताकत को समझा। इस घटना के बाद कोविंद जी के जीवन में उनके पिता की भूमिका और बड़ी हो गई और जिस तरह से उन्होंने अपने परिवार को संभाला, बच्चों को संस्कार दिये, इसीलिए, कोविंद जी अपने पिता को अपना हीरो मानते हैं।

साथियों,

बचपन के इन संघर्षों के बीच, कोविंद जी ने शिक्षा को, अपने सामर्थ्य को बढ़ाने का मार्ग बनाया। उन्होंने मेहनत की, उन्होंने संसाधनों की कमी को कमजोरी नहीं बनने दिया। और, एक ऐसे मुकाम तक पहुंचे, जिसकी कल्पना भी तब लोगों ने नहीं की थी। वो भारत जैसे विशाल देश के राष्ट्रपति बने।

साथियों,

इतने बड़े पद पर पहुंचने के बाद भी कोविंद जी का विनम्र व्यक्तित्व, उनकी सादगी ऐसे ही कायम रही। मुझे याद है प्रधानमंत्री के तौर पर मैं राष्ट्रपति भवन में उनसे मिलने जाता था। प्रोटोकॉल के हिसाब से जो बातें नहीं हो सकती हैं, वो बातें वो करते थे। वो प्रधानमंत्री को छोड़ने के लिए गाड़ी के दरवाजे तक आते थे। मैं शुरू में उनको प्रार्थना करता रहता था, प्लीज आप ऐसा मत कीजिए, लेकिन उन्होंने जीवन के आखिर तक अपनी उस विनम्रता को कभी छोड़ा नहीं। राष्ट्रपति बनने के बाद जब वे अपने गांव परौंख गए, तो उन्होंने वहाँ अपने गुरुओं के पैर छूकर उन्हें प्रणाम किया। गाँव की मिट्टी को नमन करके उन्होंने गाँव के सामान्य लोगों का धन्यवाद किया। पूरे देश ने वो भावुक दृश्य देखा था। उनके इस आचरण ने दुनिया के सामने भारत के संस्कारों की ऐसी तस्वीर सामने रखी, जिस पर हर भारतवासी गर्व करता है।

साथियों,

गुलामी के सैकड़ों साल में हमारे देश ने आर्थिक और सामाजिक रूप से बहुत कुछ खोया था। हमारे पूर्वजों ने सदियों तक संघर्ष किया। महात्मा गांधी, बाबा साहब अंबेडकर, ज्योतिबा फुले, सावित्रबाई फुले, ऐसी कितनी ही महान विभूतियों ने भारत के नवनिर्माण का सपना देखा था। एक ऐसा भारत जहां गरीब से गरीब, वंचित से वंचित को शिखर तक पहुँचने का अवसर मिल सके। कोविंद जी जैसे व्यक्तित्वों ने अपने श्रम और काबिलियत से केवल खुद का जीवन ही बदला, इतना नहीं है, उन्होंने सदियों के उस स्वप्न को, उस विज़न को भी साकार करने में अपनी अहम भूमिका निभाई है। और इस दिशा में हम सबके प्रयास अभी भी जारी हैं। हमें भविष्य में कोविंद जी जैसे अनेकों युवा चाहिए, जो परेशानियों से परास्त न हों, जो मुश्किलों के सामने मायूस न हों, बल्कि अपनी मेहनत से हर मंजिल को आसान बनाने का हौसला रखें। इसी बदलाव से सशक्त भारत के निर्माण का संकल्प पूरा होगा। यहीं से आत्मनिर्भर और विकसित भारत का रास्ता बनेगा।

साथियों,

ऐसे युवाशक्ति के निर्माण के लिए जो प्रेरणा चाहिए, कोविंद जी की ऑटोबायोग्राफ़ी उसका अहम स्रोत बन सकती है।

साथियों,

कोविंद जी ने अपनी जीवनी में मोरारजी भाई देसाई के साथ अनुभवों के बारे में भी इसमें विस्तार से बताया है। कोविंद जी के भीतर देशसेवा की जो भावना थी, मोरारजी भाई के साथ काम करके उन्हें जो सीखने को मिला, जो रास्ता मिला। कोविंद जी ने राजनीति और समाजसेवा को अपना मार्ग बनाया। वो अपने कर्तव्यों के लिए समर्पित रहे। सेवा को उन्होंने अपना लक्ष्य बनाकर काम किया। संसद में उनका कार्यकाल गवाह है। राज्यपाल के रूप में भी उन्होंने एक उदाहरण प्रस्तुत किया। राष्ट्रपति के रूप में भी हमें उनकी यही कर्तव्यनिष्ठा दिखाई देती रही। यहाँ तक कि राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद से सेवामुक्त होने के बाद भी उन्होंने विश्राम नहीं लिया है। वो अभी भी ‘एक देश, एक चुनाव’ One Nation, One Election जैसे महत्वपूर्ण विषय पर काम कर रहे हैं। देश को जगा रहे हैं। ये एक ऐसा विषय है, जिसका समाधान देश के लोकतंत्र का नया अध्याय शुरू कर सकता है। मैं मानता हूँ, कोविंद जी की इस कर्तव्यनिष्ठा और सेवाभाव से देश के लोग बहुत कुछ सीख सकते हैं।

साथियों,

सामाजिक जीवन में सक्रिय रहते हुये ऑटोबायोग्राफ़ी के लिए समय निकाल पाना बहुत मुश्किल होता है। कोविंद जी ने ये काम हम सबके लिए किया है, क्योंकि उनके जीवन में ऐसा कितना कुछ है, जिसमें गरीब वंचित तबके से आए तमाम लोग अपने जीवन की परछाई देख सकते हैं। कैसे एक साधारण परिवार मुश्किल हालातों में भी जीवन की शुचिता और ईमानदारी से समझौता नहीं करता, कैसे वही आदर्श आगे चलकर हमारे जीवन का आधार बनते हैं, हमारे कठिन समय के मूल्य किस तरह जीवनभर हमें रोशनी देते हैं, कैसे इस पवित्रता से हमें राष्ट्र सेवा की शक्ति मिलती है। अलग-अलग पदों का दायित्व निभाते हुए, कोविंद जी ने समाज को निरंतर इसकी प्रेरणा दी है।

साथियों,

मुझे विश्वास है, कोविंद जी की ऑटोबायोग्राफ़ी, इसमें उनके जीवन की ही नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र की भी अहम स्मृतियाँ सुरक्षित होंगी। मैं एक बार फिर उन्हें उनकी आत्मकथा के लिए शुभकामनाएं देता हूं। और मैं खास करके युवा पीढ़ी से आग्रह करूंगा, रील का जमाना है, सोशल मीडिया में इनफ्लुएंसर आपको खींच के कहीं-कहीं ले जाते हैं। इस शॉर्टकट के युग में भी एक बात हम जरूर याद रखें, रेलवे स्टेशन पर लिखा हुआ होता है, कुछ लोगों को पटरी पर कूद कर के जाने की आदत होती है, ब्रिज पर नहीं जाते। तो वहां लिखा होता है, शॉर्टकट विल कट यू शॉर्ट। और अगर शॉर्टकट के रास्ते से भी कहीं बाहर निकलना है, तो मैं नौजवानों को कहूंगा आपको जिसका भी पसंद हो ऑटोबायोग्राफी जरूर पढ़ें। ऑटोबायोग्राफी उस कालखंड की इतिहास की घटनाओं को अलग तरीके से समझने का अवसर देती है। इतिहास से काफी निकट होता है वो कालखंड बायोग्राफी का और इसलिए मैं जरूर चाहूंगा कि कोविंद जी की जो मेहनत है, वो आने वाली पीढ़ियों को काम आए, युवा पीढ़ी को विशेष रूप से काम आए। बहुत-बहुत शुभकामनाएं। बहुत-बहुत धन्यवाद।