विशाल संख्या में यहां पधारे हुए, विश्व के कोने-कोने से आए हुए, मेरे प्यारे भाइयों और बहनों,

100 वर्ष पहले, एक प्रवासी भारतीय भारत आए और आज 100 साल के बाद सभी प्रवासी भारतीयों का एक प्रवासी गुजराती स्वागत करता है। भारत के नागरिक विश्व के 200 से ज्यादा अधिक देशों में बसे हैं और मैं विश्वास से कह सकता हूं कि उन 200 देशों में सिर्फ कोई एक भारतीय मूल का व्यक्ति वहाँ बसा है ऐसा नहीं है, वहाँ एक प्रकार से पूरा भारत बसा हुआ है। आप सबके माध्यम से भारत वैश्विक बना हुआ है। 100-150 साल पूर्व, हमारे पूर्वजों ने, साहसिक पूर्वजों ने, विश्व में जहां-जहां संभावनाएं थीं, कुछ नया करने की उमंग थी, गुलाम हिन्दुस्तान में संभावनाएं नहीं थी, उन्होंने साहस जुटाया और साहस जुटाकर दुनिया के अनेक भू-भाग में पहुंचे। सामुद्रिक यात्रा रहती थी, कठिन यात्रा रहती थी, कभी-कभी लक्ष्य तक पहुंच भी नहीं पाते थे। लेकिन उनका प्रयास रहा... कि अंजान जगह पर जाना है और अपने कौशल के द्वारा, अपने सामर्थ्य के द्वारा, अपने संस्कारों के द्वारा वहां पर अपनी जगह बनाने का प्रयास।

कुछ कालखंड ऐसा भी आया कि आज भारत के शिक्षित लोग, Professionals, जीवन में और नई ऊंचाइयों को पाने के लिए, ज्ञान वृद्धि के लिए, Exposure के लिए, विश्व में गए, उन्होंने भारत की एक नई पहचान बनाई। लेकिन वो एक कालखंड था, जब आप अपना प्राण प्रिय देश छोड़कर के, अपने स्वजनों को छोड़कर के, यार-दोस्तों को छोड़कर के, दुनिया के किसी और छोर पर चले जाते थे। कभी साहसिक स्वभाव के कारण, तो कभी संभावनाओं को तलाशने के लिए, तो कभी अवसर खोजने के लिए। वो समय था जब शायद यह जरूरी था।

किंतु मैं आप सबका स्वागत करते हुए आपको विश्वास दिलाता हूं, जब हमारे पूर्वज गए थे- संभावनाओं को तलाशने के लिए। अब भारत की धरती पर संभावनाएं अब आपका इंतजार कर रही हैं। वक्त बहुत तेजी से बदल चुका है। भारत एक नए सामर्थ्य के साथ उठ खड़ा हुआ है। और विश्व, भारत के प्रति बहुत आशा भरी नजरों से देख रहा है। आज गयाना, साइथ अफ्रीका, मॉरिशस - विशेष मेहमान के रूप में हमारे बीच विराजमान हैं। मैं जब मुख्यमंत्री नहीं था, उसके पहले, मुझे इन सभी स्थानों पर जाने का अवसर मिला और गयाना के आदरणीय राष्ट्रपति जी अपनी पार्टी का और उनके Founder पूर्व राष्ट्रपति जी का उल्लेख कर रहे थे. उनके सुपुत्र भरत जगदेव जी जब राष्ट्रपति थे, तब मेरा काफी उनसे सतसंग हुआ था और गयाना के लोग किसी भी समाज के क्यों न हो, किसी भी भाषा को क्यों न बोलते हो, लेकिन जिस किसी को मिलो वे गयाना की आजादी में भारत की प्रेरणा का उल्लेख अवश्य करते हैं।

महात्मा गांधी 100 साल पहले South Africa से चले थे और मातृभूमि की सेवा का सपना लेकर भारत मां को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए मानवतावाद में विश्वास लेकर इस धरती पर आए थे। वो निकले थे South Africa से और आए थे हिंदुस्तान। आज South Africa भी हमारे बीच मौजूद है, जहां से गांधी लौटे थे। और African Congress और African National Congress का जन्म 8 जनवरी को हुआ था। आज 8 जनवरी है। आज ही का दिवस और तब उस समय महात्मा गांधी ने दीर्घदृष्टि से उस समय गांधीजी ने African National Congress के जन्म के समय विश्व पर को जो संदेश दिया था, उस संदेश में एक विश्वास झलकता था। उन्होने कहा था कि ये नवजागरण का, प्रेरणा बिंदू बनकर रहेगा। यह बात, उस समय, महात्मा गांधी ने कही थी।

आज भी मॉरिशस में 2 अक्टूबर मनाई जाती है, कभी हमारे यहां नहीं मनाई जाती होगी, ऐसी दो अक्टूबर आज भी मॉरिशस में मनाई जाती है। और मुझे सबके साथ मॉरिशस में सबके साथ दो अक्टूबर मनाने के लिए जाने का अवसर मिला था। और आज भी उनका जैसा उनके यहां जैसे हमारे महात्मा मंदिर इस प्रकार के कार्यक्रमों का केंद्र बना है, उनके यहां भी महात्मा गांधी के नाम से गांधी सभा गृह उनका सबसे बड़ा केंद्र बिंदु है। यानी कि हम देख सकते हैं कि कितना अपनापन है। आज शायद दुनिया के 70-80 ज्यादा देश होंगे, जहां पर महात्मा गांधी की प्रतिमा लगी हुई है।

कुछ दिन पहले में ऑस्ट्रेलिया गया था, वहां भी मुझे सौभाग्य मिला महात्मा गांधी के प्रतिमा के अनावरण का। कहने का तात्पर्य यह है कि इस "विश्व मानव" की पहचान, इस "युग पुरुष" की पहचान, विश्व को जितनी ज्यादा होगी और समय रहते होगी, कभी-कभी उलझनों में घिरी इस दुनिया को वैचारिक स्वतंत्रता का संदेश देने की क्षमता आज भी गांधी रखते हैं। आज भी गांधी के विचार विश्व को, और खास करके मानवतावाद को केंद्र में रखकर समस्या का समाधान कैसे हो सकता है, विकास की राह कैसे सरल हो सकती है, आखिरी छोर पर बैठे व्यक्ति की जिंदगी में बदलाव कैसे आ सकता है - शायद गांधी से बढ़कर के चिंतन कहीं नहीं है।

और हम सबका गर्व है, हमारे लिए सौभाग्य की बात है कि महात्मा गांधी विदेश की उस सारी दुनिया को अलविदा करके हमारे गांव और गरीब लोगों के लिए खप गए थे। और तभी तो आज इतिहास हर पल उन्हें स्मरण कर रहा है।

हमारे देश के लोग जो बाहर गए – अगर आप गयाना जाएंगे, भाषा बोलना तो कठिन है हमारे लोगों को, लेकिन होली अगर आप देखोगे गयाना की, तो वैसी ही रंगों में रंग जाते हैं जैसे हिंदुस्तान की धरती पर हम रंग जाते हैं। जब दीवाली मनाते हैं तो आप को लगेगा कि क्या दीये जगमगाते हैं, ऐसा लगता है कि हिंदुस्तान में रहने वाले हिन्दुस्तानियों को गुयाना में जलता हुआ दीप हमें प्रेरणा देने की ताक़त रखता है। ये हमारे लोगों ने विरासतें खड़ी की हैं, एक ताक़त कड़ी की है. और इसी ताकत को एक सकारात्मक काम के लिए इस्तेमाल करना, इस सामर्थ्य को विश्व में सार्थक पहचान कराने का वक्त आ चुका है। अब हम बिखरे-बिखरे, एक अकेले, किसी देश के एक कोने में - भले ही एक हिंदुस्तानी वहां अकेला होगा, लेकिन उसके साथ पूरा हिंदुस्तान जिन्दा है।

एक नई ज़िम्मेदारी मिलने के बाद, मुझे विश्व के 50 से अधिक राष्ट्राध्यक्षों से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, बातचीत करने का मौका मिला है और इतने कम समय में इतनी बड़ी मात्रा में, करीब-करीब विश्व के सभी देशों के अध्यक्षों से मिलना और उनके साथ जो बातचीत हुई, खुले मन से बात हुई है। उन बातों से लगता है, दुनिया का समृद्ध से समृद्ध देश हो तब भी और दुनिया का गरीब से गरीब देश हो तब भी.... हर किसी की नजर हिंदुस्तान पर है। हर एक को लगता है कि हम जहां जाना चाहते हैं, शायद भारत के साथ कदम मिलाकर के हम चल सकते हैं। हर कोई अपनी एकाध-एकाध चीज के साथ भारत को जोड़कर के देख रहा है। ऐेसे अवसर बहुत कम आते हैं। अब हम हिंदुस्तान के लोग जो विदेशों में बसे हुए हैं, ये उनका कर्तव्य बनता है कि वे इस अवसर को मानव जाति के कल्याण की दृष्टि से और भारत की उत्कर्षता की दृष्टि हम काम में कैसे लगाएं? और मैं मानता हूं आज हर भारतीय एक शक्ति के रूप में वहां विराजित है। वो अगर संगठित शक्ति बनती है, अगर वे अपने आप में एक Driving force बनती है, तो हम अनेक नए परिणामों को प्राप्त कर सकते हैं।

विश्व में भारतीयों के प्रति जो आदर है, जो लगाव है, उसका कारण वहां रहने वाले भारतीयों के पास विपुल मात्रा में कोई सपंदा है, वो नहीं है। जिन मूल्यों को लेकर के वो जी रहे हैं, जिन सांस्कृतिक विरासत का वो प्रतिनिधित्व कर रहा है। और इसका परिणाम है आज दुनिया में किसी भी देश में वहां के नागरिक को जब पता चले कि हमारे पड़ोस वाले घर में कोई भारतीय परिवार रहने के लिए आने वाला है, तो सबसे ज्यादा खुशी उसको होती है कि “वाह बहुत अच्छा हो गया, हमारे बगल में भारतीय पड़ोसी आ गया है। हमारे बच्चों के विकास में बहुत काम आएगा।“

क्यों? क्योंकि Family values उसमें अपने आप सीख जाएगा। दुनिया के किसी भी देश में भारतीय को ये अनुभव नहीं आता है। नहीं-नहीं भाई हमारे मौहल्ले में नहीं, हमारी गली में नहीं, हमारी सोसायटी में नहीं, ऐसा कभी अनुभव नहीं आता है। ये कौनसी ताकत है? ये अपनापन, लगाव, दुनिया हमें स्वागत करने के लिए बांह फैलाकर के खड़ी रहती है उसका कारण क्या है? ये हमारे मूल्य हैं, हमारी सांस्कृति है, ये हमारे संस्कार हैं, हमारी इस विरासत को हम जी रहे हैं, उसी की वजह तो हो रहा है। और इसलिए हमारी ये जो बदौलत है उस बदौलत को हम कैसे आगे लेकर के जाएं। उस दिशा में हमें प्रयास करना चाहिए।

कभी-कभार लोगों को लगता है कि भई अब हम बाहर रहते हैं, सालों से चले गए, हम क्या कर सकते हैं? मैं समझता हूं ऐसा सोचने की जरूरत नहीं है। कोई एक-दो महीने पहले की घटना है मुझे किसी ने अखबार की एक कटिंग भेजी थी, Xerox भेजी थी उसकी और बड़ा Interesting था। मैं नाम वगैरह तो भूल गया। सूरत जिले में कोई एक NRI अपने गांव आते थे, हर साल आते थे। जब अपने गांव आते थे 15 दिन, महीना-दो महीना जितना दिन भी रुकते थे। वे सुबह झाड़ू लेकर के गांव की सफाई किया करते थे, गांव की गलियों में जाते थे कूड़ा-कचरा साफ किया करते थे और गांव वाले उनकी बड़ी मजाक उड़ाते थे। उनको लगता था इसका Screw ढीला हो गया है। सबको उनके प्रति बड़ी विचित्रता का भाव रहता था। लेकिन इस बार जब वो आए उन्होंने तो ये काम जब शुरू किया, वो तो पहले भी करते थे। अपने गांव में निकल पड़े, आते ही दुसरे दिन सुबह jetlag कुछ नहीं, बस वो ही काम। इस बार उन्होंने देखा पूरा गांव उनके साथ जुड़ गया था। और वो खबर मुझे किसी ने एक Press cutting भेजा था।

एक प्रवासी भारतीय मैं 100 साल पहले गांधी को देखता हूं – दुनिया को कैसे खड़ा कर दिया था। और एक छोटा सा नागरिक जिसका नाम-पहचान कुछ नहीं है लेकिन Commitment के साथ उसने अपने गांव को कैसे बदल दिया। इसका उदाहरण ये कहता हूं मैं ये। ऐसे तो एक हैं, अनेकों होंगे, अनेकों होंगे। जिन्होंने अपनी शक्ति, बुद्धि, समझ को रहते मां भारती की सेवा को लगाने का प्रयास किया होगा। और ये ही तो है हमारी ताकत।

आप देखिए दुनिया भारत को कितना प्यार कर रही है उसका उदाहरण देखिए। मुझे पहली बार UN में जाने का अवसर मिला। वहां मुझे भारत की तरफ से बोलना था तो बोलते-बोलते मैंने एक बात कही कि United Nation अनेक अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाता है। Children day मनाता है, Women day मनाता है, Non-violence day मनाता है। क्यों न विश्व Yoga day मनाएं? अंतरराष्ट्रीय योग दिवस कैसे मनें, ये मैंने वहां प्रस्ताव रखा और United Nation के इतिहास की एक अद्भुत घटना घटी। 193 Countries है UN के Member. Out of 193 Countries 177 Countries ने Co-sponsor के नाते उस प्रस्ताव का समर्थन किया। इतना ही नहीं इस प्रकार के प्रस्तावों में आज तक जितना समर्थन मिला है ये Record breaking है। किसी भी प्रस्ताव को कभी भी इतने सारे देशों ने समर्थन किया ऐसा कभी नहीं हुआ। 40 से अधिक मुस्लिम Countries ने समर्थन किया। सामान्य रूप से इस प्रकार का प्रस्ताव पारित होने में उसकी प्रक्रिया बड़ी विशेष होने के कारण करीब-करीब दो साल लग जाते हैं। इस प्रस्ताव को पारित होने में मुश्किल से 100 दिन लगे। मैं इस चीज को विस्तार से इसलिए कह रहा हूं कि विश्व भारत को किस प्रकार से गले लगाने को तैयार है, ये उसकी एक छोटी सी झलक है।

इससे हम अंदाजा कर सकते हैं कि दुनिया हमें स्वीकार करने के लिए सज्य बैठी है और विश्व हमें स्वीकार करने के लिए सज्य बना है तब ये हमारा दायित्व बनता है कि हम अपने आप को विश्व की अपेक्षा के अनुसार अधिक सजग करें, अधिक सामर्थ्यवान बनाएं। दुनिया को देने के लिए हमारे पास क्या नहीं है? अगर आवश्यकता है, तो हमारे भीतर एक विश्वास की आवश्यकता है, अपने पर भरोसे की आवश्यकता है, और आखिरकार महात्मा गांधी ने आजादी दिलाई तो इसी मंत्र से दिलाई थी कि उन्होंने हर हिंदुस्तानी के दिल में आजादी की आग भर दी थी, आत्मविश्वास भर दिया था और झाड़ू लगाए तो भी आजादी के लिए करता हूं, बच्चों को पढ़ाएं तो भी आजादी के लिेए करता हूं, खादी पहने तो भी आजादी के लिए कर रहा हूं, सेवा का कोई प्रकल्प करें तो भी मैं आजादी के लिए कर रहा हूं। ऐसा एक जनांदोलन खड़ा कर दिया था।

हम भी - इस मानवतावाद की आज सबसे बड़ी ज़रूरत है तब - इन्हीं आदर्शों को लेकर के विश्व के सामने भारत एक आशा की किरण लेकर के बैठा है तब - अपने आप को सज्य करने का प्रयास हमारे लिए बहुत बड़ी आवश्यकता है।

ये प्रवासी भारतीय दिवस, जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे, तब 2003 में प्रारंभ हुआ और निरंतर चल रहा है। लेकिन बीच में थोड़ा-थोड़ा, आप लोगों का आने का मन नहीं करता था, बहुत कम लोग आते थे, कुछ लोग इसलिए आते थे कि आना पड़ता था। कुछ लोग इसलिए आते थे कि आए बिना रह नहीं सकते थे। लेकिन मैं हर बार आता था। और शायद केरल में जब हुआ था एक बार, तब मैं रूबरू तो नहीं जा पाया था तब मैंने Video Conferencing से प्रवासी भारतीय दिवस में हिस्सा लिया था। मैं समय इसलिए देता था, मैं जाने के लिए इसलिए उत्सुक रहता था, कि मैं Conviction से मानता हूं कि विश्व भर में फैला हुआ जो हिंदुस्तानी नागरिक है, वो आज के वैश्विक परिवेश में भारत की बहुत बड़ी ताकत है, भारत की पूंजी है। और इस पर हम जितना ध्यान देंगे, हम आसानी से विश्व फलक पर अपनी जगह बना सकते हैं।

और इसलिए, जिस प्रकार से विश्व में रहने वाले भारतीयों के साथ भारत का नाता महत्वपूर्ण है, उतना ही भारत के लिए, विश्व में रहने वाले भारतीयों के प्रति, नाभि का नाता उतना ही जरूरी है। ये one way नहीं है। ये दो तरफा है। और इस दो तरफा को बल देने का हमारा प्रयास है।

विश्व में रहने वाला हमारा हिंदुस्तानी, एक बात मैंने बराबर देखी है कि भारत में अगर कोई भी पीड़ादायक घटना हुई हो, कोई हादसा हुआ हो - हो सकता हो सालों से हिंदुस्तान छोड़कर गया हो, भाषा भी मालूम न हो, घटना घटी हो, भौगोलिक रूप से वो कहां है, वो भी मालूम न हो लेकिन हिंदुस्तान में हुआ है - इतना कान पर पड़ते ही या टीवी पर आंख से देखते ही दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाले आंख में से आंसू टपकते हैं। उसको उतना ही दर्द होता है, जितना दर्द हिंदुस्तान में जो इस घटना को अनुभव कर रहा है, उसको पीड़ा होती है, उतनी ही मेरे देशवासी जो दुनिया में बसे हैं, उनको पीड़ा होती है।

मुझे याद है जब गुजरात में कच्छ का भूकंप आया था, विश्व का कोई हिंदुस्तानी ऐसा नहीं होगा, जिसने उस समय गुजरात के आंसू पोंछने का प्रयास न किया हो। ये विश्व भर में फैला हुआ हमारा भाई - जिसको हिंदुस्तान के प्रति इस प्रकार का लगाव है, इस प्रकार का नाता है। यहां के दुख के लिए दुखी, यहां के सुख के लिए सुखी। जब मंगलयान की सफलता हुई, Mars orbit पर हम लोग पहुंचे, पहले प्रयास में पहुंचे। सिर्फ हिंदुस्तान नाचा था, नहीं, दुनिया भर में पहुंचा हुआ हिंदुस्तानी भी नाचा था। उसके लिए गर्व की बात थी कि मेरा देश ये प्रगति कर रहा है। इस ताकत को हम कैसे आगे बढ़ाएं, उस दिशा में हम सोच रहे हैं।

मैं जानता हूं जब मैं मुख्यमंत्री भी नहीं था, प्रधानमंत्री भी नहीं था, तब भी मैं विश्व के कई लोगों से मिलता था तो मैं उनकी शिकायतें भी जरा सुनता रहता था। तब मैं देखता था कि भरी शिकायतें रहती थीं। हमने आने के बाद कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की थीं। जब मैं विदेश प्रवास पर था तो चाहे ऑस्ट्रेलिया हूं, चाहे फिजी रहा, चाहे अमेरिका गया। जो बातें मैंने बताई थीं कि हम ये करेंगे। आज मैं गर्व के साथ आपको हिसाब देता हूं कि हमने जो कहा था वो सब पूरा कर दिया है। हमने कहा था कि PIO card holder को आजीवन वीजा दिया जाएगा - वो काम हो चुका है। अब आपको Embassy के चक्कर काटने की जरूरत नहीं पड़ेगी। दूसरी एक समस्या थी - वो क्यों थी वो अभी भी मेरी समझ मैं नहीं आता है - जो PIO card holder थे और भारत में आकर के रहते थे, उनको हर सप्ताह पुलिस स्टेशन जाना पड़ता था। कुछ सिखाने के लिए नहीं - हाजिरी लगानी पड़ती थी। और मैं जब ये सुनता था तो मैं सोचता था कि क्यों ये सब हो रहा है? लेकिन जब ये काम करने की जिम्मेवारी मेरी आई, ये नियम अब समाप्त कर दिया गया है। ये एक स्वाभिमान का विषय है, सम्मान का विषय है, ये सिर्फ कोई Administrative decision के रूप में न देखा जाए। आज सरकार में बैठे हुए लोगों के लिए आपके सम्मान का महत्व क्या है, वो इस निर्णय में दिखाई देता है।

एक मैंने कहा था क्योंकि कईयों ने मुझे कहा था कि ये PIO अलग OCI अलग क्यों - ये हमारे साथ भेद-भाव क्यों? तो मैंने हमारे अफसरों से पूछा, गोलमोल-गोलमोल जवाब आते रहते थे। आगे का मैंने कहा, जो होगा, सो होगा कर दो एक बार। अब हमने घोषणा तो कर दी। जब हम यहां आये तो सारा कानून बदलना था, बड़ी लंबी प्रक्रिया थी। खैर उस प्रक्रिया से भी हम निकल चुके हैं, और आज मैं गर्व के साथ आपको हिसाब दे सकता हूं कि अब PIO और OCI card दोनों व्यवस्थाओं को merge कर दिया गया है और सबको एक ही प्रकार की सुविधाएं मिल पाएंगी।

उसी प्रकार से - Visa on Arrival। आप जानते हैं, आपको क्या-क्या तकलीफें झेलनी पढ़ी हैं भूतकाल में। मैं जानता हूं। और इसलिए अब Visa on Arrival। इसलिए अब Visa on Arrival। आपके लिए ये सुविधा कर दी गई है। करीब दुनिया के 43 Countries को इसका benefit already हमने कर दिया है। उसी प्रकार से Electronic travel authorization - ये व्यवस्था भी कर दी है ताकि Online Correspondence से भी आप ये काम कर सकते हैं। आपका समय सबसे ज्यादा बचे और हमारी Embassy एक प्रकार से आपके लिए सर्वाधिक उपयोगी हो उस दिशा के महत्वपूर्ण कदम इस सरकार ने already उठा लिए हैं।

दिल्ली में एक प्रवासी भारतीय केंद्र, उसकी स्थापना का निर्णय हुआ था। अब उसका भवन तैयार हो गया है। थोड़े ही दिनों में वो भी प्रारंभ हो जाएगा और मैं मानता हूं कि इसका लाभ आने वाले दिनों में सभी प्रवासी भारतीयों को मिलेगा।

कुछ लोगों को लगता है कि प्रवासी भारतीयों के साथ ये जो मेल-मिलाप है कुछ अपेक्षाओं से है। मैं समझता हूं कि ये अपेक्षाओं के लिए नहीं है। अपनों से मिलना, यही अपने आप में एक ताकत होती है। मिल-बैठकर के एक-दूसरे के सुख-दुख बांटना ये भी अपने आप में एक बहुत बड़ा ऊर्जा का केंद्र बन जाता है और इसलिए ये हमारा मेल-मिलाप उसकी अपनी एक विशेषता है - और अब तो युवा पीढ़ी जिनका जन्म ही वहां हुआ Second generation, Third generation है। वे युवक भी इन दिनों बहुत बड़ी मात्रा में शरीख होते हैं कयोंकि उनको भी भारत के लिए कुछ न कुछ करने की उमंग रहती है।

जिनके मन में कुछ करना है उनके लिए बहुत कुछ है। लेकिन हर चीज पाउंड और डॉलर से ही होती है, ये मानने की आवश्यकता नहीं है। मैंने ऐसे लोग देखे हैं, गुजरात में हम जब भूकंप के लिेए काम कर रहे थे, Canada से एक बच्ची आई थी उससे मैं मिला था, मुस्लिम परिवार से थी। उसका जन्म शायद African country में हुआ और बाद में उसका परिवार Canada में Shift हुआ था। उसके पिता ने, उसकी माता ने कभी हिंदुस्तान देखा नहीं था लेकिन कच्छ के भूक्ंप के बाद वो आई, कच्छ में रही और महीनों तक उसने कच्छ में काम किया था। ये ताकत जो है, इसको हमने समझने की आवश्यकता है।

हमारे पास ज्ञान है, हमारे पास अनुभव है, हमारे पास एक विशिष्ट परिस्थिति में काम करने का Exposure है, हम एक अलग प्रकार के Discipline से गुजरे हुए लोग हैं। ये वो चीजें हैं जो हम अपने यहां Inject कर सकते हैं, इसको ला सकते हैं। और यहां रहकर के, कुछ समय अपने लोगों के साथ कुछ समय बिताकर के हम इन चीजों को कर सकते हैं। और ये भी देश की बहुत बड़ी सेवा होती है।

इन दिनों स्वच्छ भारत का एक अभियान चलाया है। लेकिन एक बहुत बड़ा महत्वपूर्ण काम, जो मैं जानता हूं कि आप सब के दिलों में भी वो उतनी ही ताकत रखता है। आप के दिलों को भी छूने के लिए उस बात में उतना ही सामर्थ्य है। और वो है मां गंगा की सफाई। आप इस प्रकार की Technology से परिचित हैं, आप इस तरह के काम से परिचित हैं। एक नमामी गंगे फंड create भी किया गया है कि दुनिया के जो भी लोग गंगा के अंदर अपना योगदान चाहते हैं वो आर्थिक मदद करना चाहते हैं वो दे सकते हैं, जो आकर के समय देना चाहते हैं वो दे सकते हैं। जो ज्ञान परोसना चाहते हैं वो ज्ञान दे सकते हैं, जो Technology लाना चाहते हैं वो Technology ला सकते हैं। एक प्रकार से विश्व भर में फैले हुए समाज जिसके मन में गंगा के प्रति और गंगा की क्या ताकत है।।। पूरे मॉरिशस को कोई एक जगह जोड़ती है, कोई एक जगह आंदोलित करती है तो मॉरिशस का गंगा सागर है। तालाब तो मॉरिशस के लोगों ने खुद बनाया है, तालाब है, लेकिन गंगा जी से लेकर के वहां जाकर जल डाला है। जल तो थोड़ा ही डाला लेकिन उन्होंने उसमें से एक भाव जब पैदा किया कि ये गंगा का प्रतिनिधित्व करती है और आज भी शिवरात्रि का मेले देखो तो पूरे मॉरिशस के मूल भारतीयों को जोड़ने का कोई एक जगह है तो वो गंगा सागर है। हिंदुस्तान से दूर गंगा नाम से बना हुआ एक तालाब भी पूरे मॉरिशस को सांस्कृतिक विरासत को जगाने की प्रेरणा दे सकता है और जब शौकत अली जी को सुनोगे तो आपक पता चलेगा किस प्रकार से उसने वहां के जीवन को बदला है। यो मां गंगा है - ढाई-तीन हजार किलोमीटर लंबी, हिंदुस्तान की 40 प्रतिशत जनसंख्या जिसके साथ सीधी-सीधी जुड़ी हुई है - और मेरे लिए गंगा की सफाई जिस प्रकार से Environment का विषय है, गंगा की सफाई श्रृद्धा का विषय है, गंगा की सफाई सांस्कृतिक विरासत का विषय है, उसी प्रकार से गंगा की सफाई उन 40 प्रतिशत उस भू-भाग में रहने वाले भाईयों-बहनों की आर्थिक उन्नति का बी प्रतीक बन सकता है और इसलिए उस काम को हमें करना है और जिन राज्यों से मां गंगा गुजरती है। वहां पर आर्थिक उन्नति के लिए हम जितना करे उतना कम है। चाहे उत्तर प्रदेश हो, बिहार हो, झारखंड हो, उत्तराखंड हो, पश्चिम बंगाल हो - ये सारा इलाका है, जहां पर आर्थिक उन्नति की बहुत संभावनाएं पड़ी और उन संभावनाओं को तराशने के लिए मां गंगा एक बहुत बड़ा केंद्र बिंदू बन सकती है। गंगा के किनारे पर विकास हो सकता है, 120 से ज्यादा शहर हैं गंगा के किनारे पर, छह हजार से ज्यादा गांव हैं, ढाई हजार किलोमीटर लंबा है और काशी जैसा तीर्थ क्षेत्र हो, हरिद्वार, ऋषिकेश, गंगोत्री, यमुनोत्री हो क्या कुछ नहीं है!

इस विरासत को लेकर कर हम आगे बढ़ना चाहते हैं। मैं आपको निमंत्रण देता हूं। आइए। आपका ज्ञान, बुद्धि, सामर्थ्य जो कुछ भी हो इसके साथ जुडि़ए। जो Environment में विश्वास करते हैं उनके लिए भी वहां भरपूर काम है, जो Inclusive growth में विश्वास करते हैं, उनके लिए वहां भरपूर काम है, जो Rural development में विश्वास करते हैं, उनके लिए वहां भरपूर काम है, जो Adventure चाहते हैं उनके लिए भी भरपूर काम है।

मां गंगा सबको समेटे हुए हैं, मां गंगा से जुडऩे का अवसर मतलब है हजारों साल से पुरानी संस्कृति से जुडने का अवसर। इस अवसर को हम लें, और उसी का उपयोग करें, यह मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। आज भारत विकास यात्रा पर कहां से कहां पहंच रहा है, उसके लिए आपका समय नहीं लेना चाहता। क्योंकि 11 तारीख को मैं एक दुसरे अवसर पर फिरसे इस सभाग्रह में आ रहा हूँ। उस समय काफी विस्तार से बातें करनी होंगी क्योंकि आर्थिक विषयों से जुड़ा हुआ वह कार्यक्रम है लेकिन मैं चाहता हूं कि आपकी शक्ति और सामर्थ्य, हमारे यहां शास्त्रों में एक बहुत ही बढ़िया श्लोक विदेश में रहने वाले लोगों के लिए है, बहुत अच्छा है। मैं उसका ज़िक्र यहाँ करना चाहता हूँ। शास्त्र कहते हैं:

यस्तु संचरते देशान् सेवते यस्तु पण्डितान् | तस्य विस्तारिता बुधिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसि ||

उसका सीधा meaning यह है, कि जो विश्व में भ्रमण करता है, वो इतना ज्ञान और अनुभव अर्जित करता है, और वो ज्ञान-अनुभव इतना पैना होता है, इतना ताकतवर होता है, कि कितना ही गहरा समंदर क्यों न हो, पानी का कितना ही बड़ा सागर क्यों न हो, लेकिन उसपर एक तेल बिंदु पड़े, तो जिस प्रकार से वो उसपर प्रभावी होकर के फैल जाता है – यह विश्व भर में भ्रमण करके पाया हुआ ज्ञान भी उतना ही ताक़तवर होता है, यह मन्त्र कह रहा है। और वो ताक़त के धनी आप हैं। वो ताक़त के धनी आप हैं।

उस ताक़त का उपयोग, माँ भारती की सेवा के लिए कैसे लगे, आने वाले दिनों में, भारत जो विकास की ऊचाइयों को पार कर रहा है, आप भी उसके साथ जुड़िये, इस महान सांस्कृतिक विरासत से विश्व को परिचित कराइए, और जिस मन्त्र को लेकर के, हमारे पूर्वजों ने कल्पना की थी – हम ही तो लोग थे, जिन्होंने पहली बार विशवास से कहा था: “वसुधैव कुतुम्भकम”। The whole world is a family।

पूरे विश्व को जिसने परिवार माना है, वो हमारा DNA है। वो हमारी संस्कृति है। पूरे विश्व को जिसने परिवार माना है, उसका एक दायित्व बनता है कि मानवतावाद के विषय को लेकर के पूरे विश्व में हम एक ताक़त के साथ पहुंचें। फिर एक बार – Guyana के राष्ट्रपतिजी हमारे बीच आये, उनका स्वागत करता हूँ, उनका आभार व्यक्त करता हूँ। South Africa की विदेश मंत्रीजी हमारे बीच आयीं, उनका भी स्वागत करता हूँ, उनका अभिनन्दन करता हूँ। और Mauritius के उप-प्रधान मंत्रीजी हमारे बीच आये, मैं उनका भी आभार व्यक्त करता हूँ।

आज के अवसर पर, राष्ट्र्पिताजी के 100 साल पहले वापिस आने की ख़ुशी में भारत सरकार ने सौ रूपएका और दस रूपए का सिक्का आज हमें दिया है, और उसकी प्रकार से पोस्टल स्टाम्प भी आपके सामने रखा है। पोस्टल स्टाम्प, और ये सिक्के इतिहास की धरोहर बनते हैं। आज भी आपने देखा होगा, पुरातात्त्विक विभाग जो रहता है – Archaeological Department – वो इतिहास की कड़ी जोड़ने के लिए, पुराने coin जो मिलते हैं, वो उसकी सबसे बड़ी ताक़त होते हैं। उसके आधार पर वो तय करते हैं, कि 400 साल पहले कहाँ कौन सी currency थी, और वो currency 2000km दूर, सात समंदर पार, कहाँ-कहाँ पर दिखाई दी – उसके आधार पर 1000 साल पहले कैसा विश्व व्यापार था, किस प्रकार के सांस्कृतिक सम्बन्ध थे, ये सारी कड़ी जोड़ने में यह काम आता है। सिक्कों का महत्त्व आज भी उतना ही है, और विश्व में कई ऐसे लोग हैं, जो इस प्रेरणा को लेकर के चलते हैं।

मेरे मन में एक विचार है। विदेश में रहे हुए हमारे मित्र उस काम को अगर कर सकें तो ज्यादा अच्छा होगा। क्या हम इस प्रवासी भारतीय दिवस पर - विशेष योगदान करने वाले लोगों का तो हमें सम्मान करने का सौभाग्य मिलता है – जिन्होंने अपने-अपने, जो अपनी कर्म भूमि है, वहां भारत का झंडा ऊंचा रखने के लिए कुछ न कुछ योगदान किया होगा। लेकिन क्या भविष्य में, अगर विदेश की जो Young Team है, वो आगे आये तो।।। मैं इस कार्यक्रम को भारत के माध्यम से करना नहीं चाहता – बाहर के लोग करें तो मेरे मनन में विचार है – कि हम आज का जो Information Technology का युग है, Communication की नयी दुनिया है, उसका उपयोग करते हुए, “भारत को जानो” – ऐसी एक प्रति वर्ष एक Quiz Competition कर सकते हैं? Online Quiz Competition।

भारत के सम्बन्ध में ही सवाल हों। और भारत से बाहर रहने वाले लोग उसमें शरीक हों, उसमें हिस्सा लें। और उसमें जिसका नंबर आये, उनका सम्मान प्रवासी भारतीय दिवस में होता रहे, ताकि साल भर हमारी युवा पीढी को online जाकर के, Quiz Competition में जुड़ करके, ज्यादा से ज्यादा marks पाने का प्रयास हो, और पूरे विश्व में, भारत को जानने का एक बहुत बढ़ा आन्दोलन खड़ा हो जाए। उस दिशा में हम प्रयास कर सकते हैं।

मैं फिर एक बार आप सबको प्रवासी भारतीय दिवस पर बहुत बहुत शुभकामनायें देता हूँ। और पूज्य बापू ने, भारत आकर के, भारत को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराया। और इतना ही नहीं, भारत के मानवतावाद का सन्देश था, उसे पूरे विश्व को पहुंचाया, ऐसे युगपुरुष के भारत आगमन का यह शताब्दी का पर्व हम मना रहे हैं। तब हम भी, जहां भी हों – नाभि से नाता जुडा रहे। मिट्टी से नाता जुडा रहे। अपनों के लिए कुछ न कुछ कर गुजरने का हौसला बुलंद बना रहे – इसी अपेक्षा के साथ, सबको बहुत बहुत शुभकामनायें।

धन्यवाद।

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February 06, 2026
सभी की सलाह सुनें, लेकिन अपनी आदतों में तभी बदलाव करें जब आप चाहें: प्रधानमंत्री
प्रधानमंत्री ने शिक्षकों को सलाह दी कि वे छात्रों को पहले से सूचित करें ताकि उनमें जिज्ञासा पैदा हो और उनकी समझ बेहतर हो
लक्ष्य पहुंच के भीतर होने चाहिए, लेकिन आसानी से पहुंच वाले नहीं - लक्ष्य निर्धारित करें और कार्य करें: प्रधानमंत्री
मन को विकसित करें, फिर उसे जोड़ें, और फिर अध्ययन के विषयों को व्यवस्थित करें, इससे आपको सफलता मिलेगी: प्रधानमंत्री
पढ़ाई, कौशल, आराम और शौक में संतुलन ही विकास की कुंजी है: प्रधानमंत्री
किताबें ज्ञान प्रदान करती हैं, लेकिन केवल अभ्यास ही आपको पेशेवर रूप से कुशल बनाता है: प्रधानमंत्री
अतीत पर ध्यान केंद्रित करने में समय बर्बाद न करें, आगे आने वाले जीवन के बारे में सोचें: प्रधानमंत्री
शिक्षा केवल परीक्षाओं के लिए नहीं बल्कि जीवन के लिए है, परीक्षाएं स्वयं की परीक्षा लेने के लिए होती हैं: प्रधानमंत्री
बनने की नहीं, करने की आकांक्षा रखें: प्रधानमंत्री
वर्तमान ईश्वर का सबसे बड़ा 'उपहार' है - यहीं और अभी जीएं: प्रधानमंत्री
आप किसी क्षण में जितना अधिक शामिल होते हैं, उतना ही अधिक समय तक आपको वह याद रहता है: प्रधानमंत्री
सहयोगात्मक शिक्षा सभी को बेहतर बनाने में मदद करती है: प्रधानमंत्री
दोहराएं और बुद्धिमान बनें: प्रधानमंत्री
स्कूल में अपनी नींव मजबूत करें, प्रतियोगी परीक्षाएं समय के साथ आएंगी: प्रधानमंत्री
प्रधानमंत्री ने माता-पिता को सलाह दी कि वे बच्चों को उनकी क्षमता, योग्यता और रुचि के अनुसार विकसित होने दें
अपने शौक को व्यावहारिक उत्पाद बनाएं और उन्हें मुफ्त में साझा करें, फीडबैक से नए विचारों और सफलता को बढ़ावा मिलता है: प्रधानमंत्री
खुद को जानें, जीवन के सभी अनुभवों को जीएं: प्रधानमंत्री
परीक्षाएं त्योहारों की तरह होती हैं, उनका उत्‍सव मनाएं: प्रधानमंत्री
सच्चा आत्मविश्वास आंतरिक सत्य से आता है, अपने असली स्वरूप के प्रति सच्चे रहें: प्रधानमंत्री
आराम से जीवन को आकार नहीं मिलता - आपका जीने का तरीका आकार देता है: प्रधानमंत्री
सपना न देखना एक अपराध है - हमेशा सपना देखें: प्रधानमंत्री
खुद अपना सहारा बनें, अपनी खूबियों का जश्न मनाएं: प्रधानमंत्री
बड़े सपने देखें, कम डरें - आत्मकथाएं पढ़ें: प्रधानमंत्री
स्वच्छता बनाए रखना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता और कर्तव्य है: प्रधानमंत्री
प्रौद्योगिकी एक महान शिक्षक है, इसे अपनाएं, एआई हमारी क्षमताओं को बढ़ाता है: प्रधानमंत्री
एआई का बुद्धिमानी से उपयोग करें, अपनी बुद्धि को बढ़ाएं: प्रधानमंत्री

प्रधानमंत्री- चलिए अब शुरू करते हैं, बताइए!

विद्यार्थी- मैं सानवी आचार्य, आप ही के स्टेट से यानी गुजरात से हूं। मेरा पहला सवाल यह है कि पेरेंट्स भी हमारी चिंता करते हैं, टीचर्स भी हमें सपोर्ट करते हैं। लेकिन मेन इशू तब आ जाता है कि टीचर्स हमें पढ़ाई का एक अलग पैटर्न सजेस्ट करते हैं। पेरेंट्स एक अलग तरह से बोलते हैं कि यह पैटर्न से पढ़ो और स्टूडेंट्स में तो अलग ट्रेंड ही चल रहा होता है, तो उस समय हम कंफ्यूज हो जाते हैं कि कौन सा पैटर्न सही है।

प्रधानमंत्री- देखिए, यह जीवन भर ऐसा रहता है। मैं प्रधानमंत्री बन गया ना, तो भी कोई बताता है, ऐसे करो, कोई कहता है, ऐसे करो। आप घर में खाने पर देखना, खाने पर बैठे होंगे सब भाई-बहन, हर एक के खाने की पैटर्न अलग होगी। कोई सब्जी से शुरू करेगा।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- कोई दाल से शुरू करेगा।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- कोई रोटी, सब्जी, दाल, सब इकट्ठा करके डालेगा। हर एक के पैटर्न अलग-अलग है कि नहीं?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- आप की अपनी क्या, उनकी कॉपी करते हैं आप?

विद्यार्थी- नो सर!

प्रधानमंत्री- आप अपने पैटर्न से खाते हैं, तब मजा आता है ना?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- तो ऐसे कुछ लोग होते हैं कि वह उनको लगता है कि भई रात को ठीक से मैं पढ़ पाता हूं। कुछ लोगों को लगता है, सुबह 4:00 बजे उठकर के पढ़ूंगा। हर एक की अपनी पैटर्न होती है?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- लेकिन कुछ लोगों की बेईमानी होती है। रात को मम्मी को कहते हैं, नहीं कल से मैंने सुबह पढ़ना शुरू किया है। सुबह मम्मी उठाने आती है, तो कहते हैं नहीं मुझे तो, तो यह टालते रहते हैं।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- पहली बात है, आप अपनी जो पैटर्न है, उस पर पूरा भरोसा करो। लेकिन जो पैटर्न के लिए सुझाव देते हैं, उसको ध्यान से सुनो, समझने की कोशिश करो और उसमें आपको लगता है कि यार मेरी पैटर्न तो है, लेकिन यह चीज में अगर जोड़ दूं, तो अच्छा होगा। लेकिन किसी के कहने पर मत जोड़ो, अपने अनुभव से जोड़ो। अब जैसे परीक्षा पर चर्चा मैंने जब शुरू किया, तब एक पैटर्न था। अब धीरे-धीरे मैं उसमें इंप्रूव करता जा रहा हूं।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- बदलता जा रहा हूं। इस बार मैंने अलग-अलग राज्‍यों में भी किया। तो मैंने भी अपनी पैटर्न बदली। लेकिन मूल पैटर्न को छोड़ा नहीं।

विद्यार्थी- यस सर!

विद्यार्थी- उनका नेचर भी बहुत अच्छा था। वह बहुत फ्रेंडली थी। वह हम सब बच्चों के साथ भी एकदम घुल मिल गए थे। प्रधानमंत्री जी ने हमें बताया कि हमें सभी का पैटर्न सुनना है, सभी में से कुछ-कुछ गुण लेने हैं। हमें हमारा पैटर्न में ही फोकस करना है। सबका कुछ अच्छा-अच्छा गुण हमें लेना है और वही पैटर्न हमें धीरे-धीरे आगे बढ़ाना है।

विद्यार्थी- नर्मदे सर!

प्रधानमंत्री- नर्मदे हर!

विद्यार्थी- सर मेरा नाम आयुष तिवारी है। सर तो मेरा प्रश्न यह है कि अक्सर कई बार हम स्कूल या टीचर की स्पीड से मैच नहीं कर पाते और जो छूट जाता है, हम उसे कवर करने के चक्कर में आगे के चैप्टर भी मिस करते जाते हैं और हम पीछे रह जाते हैं, तो इस सिचुएशन में हम कैसे अपने उसको मैनेज करें?

प्रधानमंत्री- तो आपकी टीचर के खिलाफ शिकायत है?

विद्यार्थी- नो सर!

प्रधानमंत्री- लेकिन आपने बड़ी चतुराई से टीचर के खिलाफ अपनी कंप्लेंट बता दी। तो मैं जवाब टीचर के लिए देता हूं।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- टीचर का प्रयास रहना चाहिए कि स्टूडेंट की यह स्पीड है। एक कदम ज्यादा स्पीड मेरी रहेगी, ज्यादा नहीं। हमारा लक्ष्य ऐसा होना चाहिए, जो पहुंच में हो, लेकिन पकड़ में ना हो।

विद्यार्थी- यस सर!

विद्यार्थी- सर एग्जाम वॉरियर में लिखा है, मंत्र 26, goal should be within reach but not easily achievable.

प्रधानमंत्री- वाह! सब याद रखते हैं आप लोग?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- देखिए, 50 कदम आधा आगे चला जाएगा, तो स्टूडेंट कहेगा, भाई यह तो चला गया, मेरा काम नहीं है। जैसे किसान खेत को जोतता है ना, स्टूडेंट के मन को जोतना चाहिए। इसका तरीका क्या है? मान लीजिए, जनवरी के तीसरे सप्ताह में वह हिस्ट्री का यह पाठ पढ़ने वाले हैं, तो जनवरी 1 तारीख को बता दें कि भाई पहले वीक में हिस्ट्री का यह पाठ पढ़ाऊंगा, दूसरे वीक में हिस्ट्री का यह पाठ पढ़ाऊंगा, तीसरे वीक में हिस्ट्री का यह पाठ पढ़ाऊंगा। तो आपको पता है कि आने वाले 3 सप्ताह में यह-यह तीन विषय आने वाले हैं। फिर वह कहेगा कि ऐसा करो, आप मैं पढ़ाऊं, उसके पहले पढ़ना शुरू कर दो। पढ़ करके आओ, किसी को पूछ के आओ।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- गूगल पर जाकर के कुछ करना है, तो वहां करके आ जाओ।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- और उसके बाद एक्चुअली जब पाठ पढ़ाएंगे, तो क्या होगा?

विद्यार्थी- सर क्यूरियोसिटी आएगी हमारे में।

विद्यार्थी- सर हमें क्यूरियोसिटी होएगी। हमें ज्यादा समझ आएगा क्योंकि हमने पहले से पढ़ा होगा।

विद्यार्थी- फोकस भी और अच्छा रहेगा।

प्रधानमंत्री- मानसी!

विद्यार्थी- सर अगर कोई चैप्टर हमें बहुत ज्‍यादा इंटरेस्टिंग लगता है, तो हमें उसको और समझने की, और जानने की इच्छा होगी, जिससे हमें और अच्छे से रिवाइज हो जाएगा वह चैप्टर।

प्रधानमंत्री- बताइए, सिंपल सा काम है ना?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- फिर आपको उस टीचर की स्पीड का प्रॉब्लम आएगा?

विद्यार्थी- नो सर!

प्रधानमंत्री- नहीं आएगा। आप पीछे रह गए ऐसा भाव आएगा?

विद्यार्थी- नो सर!

प्रधानमंत्री- क्यों? क्योंकि आप टीचर से एक कदम आगे चले गए।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- मन को जोतो, फिर मन को जोड़ो और फिर आपको पढ़ाई के जो विषय रखने हैं, रखो। तो आप स्टूडेंट को हमेशा सफल पाओगे।

विद्यार्थी- हर किसी को यह अवसर नहीं मिल पाता कि पीएम माननीय प्रधानमंत्री, जी से स्वयं आमने-सामने बैठकर उनसे सवाल पूछ कर, उनसे अपने बातचीत शेयर कर पाएं। उन्होंने बताया कि हम टीचर से दो कदम पीछे होने के बजाए दो कदम उनसे आगे रहें, तो हम उनसे पीछे रह ही नहीं सकते।

विद्यार्थी- नमस्ते सर!

प्रधानमंत्री- हां, नमस्ते!

विद्यार्थी- मैं श्रेया प्रधान हूं, सिक्किम से। सर सो एक सेल्फ कंपोज्‍ड सॉन्ग है। सो यह 3 लैंग्वेजेज़ में लिखा हुआ है।

प्रधानमंत्री- अरे वाह!

विद्यार्थी- हिंदी, नेपाली और बंगाली में। सो यह देशभक्ति का वैसा वाला सॉन्ग है।

प्रधानमंत्री- हां सुनाइए!

विद्यार्थी- इसका टाइटल मैंने रखा है, हमारा भारत भूमि।

प्रधानमंत्री- तो आपको कविता लिखने का शौक है?

विद्यार्थी- यस सर! सर कविता सर मैं नेचर के बारे में लिखती हूं ज्यादातर।

प्रधानमंत्री- अच्छा नेचर के विषय में!

विद्यार्थी- मानव जाति के लिए भी लिखा था, एक-दो बार। यस सर!

प्रधानमंत्री- चलिए सुनाइए!

विद्यार्थी- हमारा भारत भूमि है, ऋषियों का यह देश है। हमारा भारत भूमि है, ऋषियों का यह देश है। अनेकता में एकता, शांति का परिवेश है। अनेकता में एकता, शांति का परिवेश है। देवी-देवता को प्रियवासियों मानवता मौला एको थानियो।

प्रधानमंत्री- शाबाश! बहुत सुंदर! बहुत सुंदर! देश की एकता की बात बताई। एक भारत, श्रेष्ठ भारत। मानसी तुम्हें तो होगा बेटा कुछ गाना?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- कौन सा गाओगी, बताओ?

विद्यार्थी- सर मैं एक गाना सुनाना चाहती हूं।

प्रधानमंत्री- हां, सुनाओ!

विद्यार्थी- सर यह गाना मेरी मदर ने लिखा है और यह गाना जो है, यह स्टूडेंट्स को डेडीकेटेड है।

प्रधानमंत्री- अच्छा, सुनाओ!

विद्यार्थी- बढ़ता चल, तू बढ़ता चल। करता चल, कुछ करता चल। सारी दुनिया तेरे पीछे, मुश्किलों से लड़ता चल।

प्रधानमंत्री- वाह!

विद्यार्थी- सारी दुनिया तेरे पीछे, मुश्किलों से लड़ता चल। बढ़ता चल, तू आगे बढ़ता चल।

प्रधानमंत्री- वाह! शानदार! आपकी माता जी को मेरी बधाई दे देना।

विद्यार्थी- सर थैंक यू सर!

प्रधानमंत्री- बहुत ही इंस्पायरिंग लिखा है मां ने!

विद्यार्थी- सर मेरा यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज और इंस्टाग्राम भी है।

प्रधानमंत्री- अच्छा!

विद्यार्थी- यस सर! मेरे फेसबुक पेज में फॉलोअर्स हैं डेढ़ लाख।

प्रधानमंत्री- डेढ़ लाख!

विद्यार्थी- बहुत ज्यादा मजा आया और मेरे लिए यह बहुत ज्यादा बड़ी और गर्व की बात है कि मैं उनसे मिली।

प्रधानमंत्री- आइए सब लोग, बैठ जाइए! अच्छा मैंने आज आपका स्वागत आपका किया, यह असमी वो गमोछा कहते हैं। यह सबसे बड़ी चीज है, यह मेरी सबसे प्रिय चीज है। उसकी रचना बहुत अच्छी लगती हैं। दूसरा है, यह असम का और खासकर के नॉर्थ ईस्ट की वूमेन एंपावरमेंट का सिंबल है। यह घर में बनाते हैं और सचमुच में वहां की मातृशक्ति, नारीशक्ति कैसे काम करती है, तो एक प्रकार से मन को बड़ा आदर होता है, सम्मान होता है। तो मेरा मन कर गया कहा इन बच्चों को मैं आज असम का गमोछा दूंगा।

विद्यार्थी- थैंक यू सर! थैंक यू सर!

विद्यार्थी- मेरा नाम सबावत वेंकटेश है।

प्रधानमंत्री- हां वेंकटेश गारू, बताइए!

विद्यार्थी- तो सर अभी मुझे है ना टेक्नोलॉजी और रोबोटिक्‍स में बहुत इंटरेस्ट है, तो आजकल कई बार आपने भी बोला था कि स्किल ज्यादा जरूरी है और बाहर भी लोग बोलते हैं, मार्क्स ज्यादा जरूरी है। स्किल जरूरी है, मार्क्स ज्यादा जरूरी है, ऐसा ही सोच-सोच के हमारे अंदर एक डर बैठ जाता है, तो आप बताइए कि स्किल ज्यादा जरूरी है या फिर मार्क्स ज्यादा जरूरी है?

प्रधानमंत्री- यह जो मन में रहता है ना कि इसका महत्व है कि उसका महत्व है, खाने का महत्व है कि सोने का महत्व है, पढ़ने का महत्व है कि खेलने का महत्व है, उसका एक कॉमन जवाब होता है, हर चीज में संतुलन होना चाहिए, बैलेंस होना चाहिए। एक तरफ झुकोगे, तो गिरोगे कि नहीं गिरोगे?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- और सही बैलेंस करके रहोगे तो गिरोगे क्या कभी?

विद्यार्थी- नो सर!

प्रधानमंत्री- तो यह सिंपल सी बात है। अब दूसरी बात है, स्किल में भी दो प्रकार के स्‍किल है। एक है, लाइफ स्किल। दूसरा है, प्रोफेशनल स्किल। उसमें भी कोई मुझे पूछेगा कि साहब लाइफ स्किल में ध्यान देना चाहिए कि प्रोफेशनल में? मैं कहूंगा दोनों में देना चाहिए। अब मुझे बताइए, बिना अध्ययन किए, बिना ऑब्जरवेशन किए, बिना ज्ञान प्रयुक्त किए, कोई भी स्किल आ सकता है क्या?

विद्यार्थी- नो सर!

प्रधानमंत्री- तो स्‍किल की शुरुआत तो ज्ञान से ही होती है।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- तो उसका महत्व कम नहीं है। मान लीजिए, हम बहुत बढ़िया पढ़ लिए हैं, लेकिन एक बार अचानक मां-बाप को बाहर जाना हुआ। अब हम भूखे मर रहे हैं, किचन में सब पड़ा है, लेकिन पता ही नहीं, कैसे करूं, क्या करूं, किस डब्बे में क्या है, कैसे निकालूं, क्यों? हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया। जो इसलिए लाइफ स्किल जीवन की रोजमर्रा की जिंदगी है, इसमें हमारी लाइफ स्किल अच्छे से अच्छी कैसे हो। मेरा सुबह उठने का समय क्या है, सोने का समय क्या है, मैं व्यायाम करता हूं, तो मेरी उम्र के हिसाब से मैं व्यायाम करता हूं, मुझे नया व्यायाम में सिखता हूं कि नहीं सिखाता हूं, मैं किसी को मिलने जाता हूं, तो मुझे बातचीत करना कॉन्फिडेंस से आता है कि नहीं आता है, मुझे रेलवे स्टेशन पर गया और मुझे मालूम ही नहीं है कि भाई टिकट कहां से लेना, फिर मैं 10 लोगों को पूछता हूं कि भाई टिकट कहां से लेता हूं? तो लाइफ स्‍किल जो हैं, वह हमने आत्मसात करनी ही करनी चाहिए। अब दूसरा विषय प्रोफेशनल स्किल, आप मानो डॉक्टर बनने वाले हैं, तो डाक्टरी की स्किल आपकी एकदम से अपडेट होनी चाहिए। ऐसा नहीं कि भई मैं नंबर वन हो गया था यूनिवर्सिटी में और इसलिए मैं ऑपरेशन करूं या ना करूं चल जाएगा, ऐसा नहीं है। आपको अगर हार्ट स्पेशलिस्ट बना है, तो किताबें आपको हार्ट स्पेशलिस्ट बनने में मदद कर सकती हैं, हार्ट स्पेशलिस्ट नहीं बना सकती। हार्ट स्पेशलिस्ट तो आप तब बनेंगे, जब एक्चुअली आप पेशेंट के साथ, उसके हर स्टेजेस के साथ जुड़कर के अपना स्‍किल डेवलप करोगे। अगर आपको वकील बनना है, आपको कॉन्स्टिट्यूशन की सारी धाराएं पता हैं, इस धारा में इतनी सजा होती है, इस धारा से ऐसे बेल मिलता है, सब मालूम है। लेकिन अगर आपको अदालत में जाकर के एक वकील के रूप में तैयार होना है, तो किसी वकील का जूनियर बनना पड़ता है।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- प्रोफेशनल स्किल सीखनी पड़ती है। उसमें से आपको आगे आना होता है और इसलिए लाइफ स्किल उसमें कोई कंप्रोमाइज नहीं है। 100% वह तो अचीव करना ही चाहिए। प्रोफेशनल स्किल जिस प्रोफेशन में इंटरेस्ट है, इसमें लगातार नया करते जाना। अब उसमें भी पहले हार्ट के पेशेंट को इतनी टेक्नोलॉजी नहीं थी, आज टेक्नोलॉजी आ गई, तो आपकी उम्र भले ही 40 साल हो गई होगी, लेकिन आपको टेक्नोलॉजी पढ़नी पड़ेगी। तो शिक्षा और स्‍किल एक-दूसरे के जुड़वा भाई-बहन हैं। वह दो अलग नहीं है, लेकिन स्‍किल जीवन में बहुत अनिवार्य है।

विद्यार्थी- मैं एक बहुत गरीब फैमिली से बिलॉन्ग करता हूं। फैमिली भी प्राउड फील कर रही है कि मेरा बेटा गया है। वह एक्साइटमेंट बढ़ गई थी, उनसे बात करने के लिए, तो हमें ऐसा चांस मिला कि हम बात कर सकते हैं उनसे।

विद्यार्थी- जय हिंद सर! सर मेरा नाम है इमोता के श्याम है। मैं सैनिक स्कूल, इंफाल मणिपुर से आई हूं। सर आप बचपन से मेरे एक बहुत बड़े इंस्पिरेशन रहे हैं और मेरा जन्मदिन भी आपके साथ ही आता है।

प्रधानमंत्री- अच्छा! मुझे अभी एक नेता ने फोन किया था। मेरे जन्मदिन पर 17 सितंबर को, तो उसने मुझे कहा कि आपका 75 हो गए बोले। अभी 25 बाकी हैं मैंने कहा। तो मैं जो बीता है, उसको गिनता नहीं हूं, जो बचा है उसको गिनता हूं और इसलिए जीवन में मैं आपको भी कहता हूं। बीता है, उसकी गिनती में समय बर्बाद मत कीजिए। जो बचा है, उसको जीने के लिए सोचिए। अच्छा बताइए!

विद्यार्थी- सर मेरा आपसे यह प्रश्न है कि सर हम बोर्ड्स एग्जाम या फिर कोई स्कूल के एग्जाम के प्रिपरेशन करते समय पिछले कुछ सालों के क्वेश्चंस देखते हैं और हम यह अपने आप तय कर लेते हैं कि कौन सा टॉपिक ज्यादा सही रहेगा, कौन सा जरूरी है और कुछ हम सोचते हैं कि मार्क्स काम है, एग्जामिनर का यहां पर फोकस नहीं होगा, तो हम छोड़ देते हैं। क्या ऐसा करना सही है?

प्रधानमंत्री- कभी-कभी आपने देखा होगा, अखबार में हैडलाइन आ जाती है कि इस बार पेपर बहुत भारी था।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- बच्चों को बहुत तकलीफ हुई। यह क्‍यों क्या होता है? सिलेबस के बाहर का होता है क्या?

विद्यार्थी- नो सर!

प्रधानमंत्री- लेकिन आपको भारी क्यों लगता है क्योंकि आपने वह 10 साल के पैटर्न के जो तीन चार पांच साल एक-एक विषय के सवाल हैं, उसी पर ध्यान केंद्रित किया।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- पहले आता था श्‍योर सजेशंस, फिर आने लगा इंर्पोटेंट क्वेश्चंस, फिर आने लगा 10 साल के पेपर आप कर लीजिए, वही पैटर्न चलेगा।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- यह बीमारी जब मैं पढ़ता था, तब भी थी और यह बीमारी फैलाने का काम कुछ टीचर भी करते हैं। टीचर को क्या लगता है कि मेरे स्कूल का नंबर अच्छा हो, मेरे क्लास का नंबर अच्छा हो, इसलिए वह क्या करते हैं, जिससे नंबर मिले, वही पढ़ाते हैं।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- अच्छे टीचर आपने देखा होगा सर्वांगीण विकास के लिए एक पूरा सिलेबस पढ़वाते हैं। पूरे सिलेबस पर मेहनत करवाते हैं। उस सिलेबस का आपकी जिंदगी में क्या उपयोग है, वह समझते हैं। अब आप देखिए, कोई खिलाड़ी है, अगर मान लीजिए, उसको बॉलिंग करनी है, तो क्या वह अपने कंधे के मसल्स ही मजबूत करता रहेगा, तो एक अच्छा बॉलर बनेगा क्‍या?

विद्यार्थी- नो सर!

प्रधानमंत्री- उसको और क्या-क्या करना पड़ेगा?

विद्यार्थी- एक्सरसाइज करनी पड़ेगी, योगा करना पड़ेगा।

प्रधानमंत्री- एक्सरसाइज करनी पड़ेगी, पूरे शरीर को मजबूत करना पड़ेगा। उसको मन को भी मजबूत करना पड़ेगा।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- उसको अपने खाने के पद्धति को भी उसके अनुकूल बनाना पड़ेगा।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- उसको नींद भी उस प्रकार से लेनी पड़ेगी। करता क्या है, बोल फैंकता है, लेकिन पूरे शरीर को वह तैयार करता है कि नहीं करता है?

विद्यार्थी- यस सर

प्रधानमंत्री- शरीर का एक अंग भी वीक रह गया, बॉलिंग अच्छी करता है, कंधा बहुत अच्छा है, स्पीड सब अच्छी है, लेकिन पैर ठीक नहीं काम कर रहा है, तो बॉलिंग कर पाएगा क्या?

विद्यार्थी- नो सर!

प्रधानमंत्री- जैसे एक प्लेयर को अपने गोल को पाने के लिए और खेल में मास्टरी पानी है, तो भी उसको संपूर्ण शरीर के चिंता करनी पड़ती है। वैसे ही हम जिंदगी परीक्षा के लिए नहीं है, हमारे जीवन को बनाने के लिए शिक्षा एक माध्यम है और हम शिक्षा सही करते हैं, गलत करते हैं, तो बार-बार हम अपने एग्जाम करते हैं। तो यह जो एग्जाम है, वह हमें अपने आप को एग्जामिन करने के लिए एग्जाम है। अल्टीमेट गोल एग्जाम के नंबर नहीं हो सकते हैं। अल्टीमेट गोल संपूर्ण जीवन के विकास का होना चाहिए और इसलिए यह जो पैटर्न हम 10 क्वेश्चन कर लें, यह कर लें, हमने अपने आप को सीमित नहीं करना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि यह भी नहीं करना, यह भी करना चाहिए, लेकिन उसको अगर 10% देते हैं, तो 90% और करना चाहिए। तो मेरा तो सभी विद्यार्थियों से आग्रह है कि आप जिंदगी सबसे ज्यादा उत्तम बने, जीवन अपना श्रेष्ठ बने, अपना पूरा जीवन शानदार रहे, उसके लिए जीवन को तैयार करना है और शिक्षा एक माध्‍यम है, उस माध्यम के रूप में उसको करना चाहिए। ठीक है।

विद्यार्थी- यस सर!

विद्यार्थी- सर मैं आपसे यह क्वेश्चन पूछना चाहती हूं कि जिस सब्जेक्ट में मुझे ज्यादा मेहनत करने की जरूरत है, उसको फोकस ना करके प्रिबोर्ड में कैसे बेहतर परफॉर्म करने के लिए, उसका भी प्रेशर होता है। हम कैसे अपनी पढ़ाई में संतुलन बनाए?

प्रधानमंत्री- यह, यह सबके लिए चिंता का विषय है। पहले क्वार्टर में कुछ विषयों में अच्छा करते हैं। दूसरे क्वार्टर में कुछ विषयों में अच्छा करते हैं और फिर हमको लगता है कि अब क्या करूं मैं, यह करूं कि वह करूं? हमें भीतर के विद्यार्थी को हमेशा चैतन्य युक्त रखना चाहिए। शिक्षा यह मजबूरी नहीं होनी चाहिए। शिक्षा यह बोझ नहीं होना चाहिए। हमारा टोटल इंवॉल्वमेंट चाहिए, टोटल इंवॉल्वमेंट। अगर टोटल इंवॉल्वमेंट नहीं है, तो फिर आधी-अधूरी शिक्षा, वह जीवन को कहीं सफल नहीं बनाने देती। यह जो बीमारी आ गई है, मार्क्स मार्क्स मार्क्स। मुझे बता दीजिए, जो पिछले साल बोर्ड में एक से दस नंबर जो लाए हैं, आपको किसी को नाम याद है क्या! बहुत मुश्किल से याद होगा जी, इतना ही नहीं आप एक महीने के बाद पूछोगे कि भैई यह अखबार में इनकी फोटो छपी थी, इनके नाम आए थे, वाह-वाही हुई थी। फिर भी हम उतना उनको भी याद नहीं रखते। उस स्कूल के बच्चों को भी पता होगा कि उनके स्कूल में इतना नंबर आए थे?

विद्यार्थी- नहीं सर!

प्रधानमंत्री- इसका मतलब इन सब चीजों का कितना महत्व है भई।

विद्यार्थी- कुछ समय के लिए ही याद रहता है।

प्रधानमंत्री- कुछ समय के लिए होता है।

विद्यार्थी- यस सर! यस सर!

प्रधानमंत्री- उससे ज्यादा तो होता नहीं है और इसलिए हम अपने मन को नंबर, मार्क्स उससे जोड़ने के बजाय, मेरा जीवन कहां पहुंचा और उसके लिए लगातार अपने आप को कसते रहना चाहिए, कसौटी करते रहें खुद की, क्लास रूम में नहीं, एग्जामिनेशन रूम में नहीं, खुद को कसते रहना चाहिए।

विद्यार्थी- मेरा आपसे यह प्रश्न है कि जैसे हम पढ़ाई करते हैं, उस समय पर हमें इधर-उधर के बहुत सारे ख्याल आते हैं, तो हम फोकस नहीं कर पाते, तो उस समय पर अपने आप को शांत कैसे रखें? क्योंकि हम पढ़ तो लेते हैं, लेकिन बहुत जल्दी भूल जाते हैं।

प्रधानमंत्री- अब जैसे आज यहां आप आए हैं। आज से 25 साल के बाद कोई आपको आज के इस कार्यक्रम के विषय में आपको पूछेगा, तो क्या होगा, भूल जाएंगे कि याद रहेगा?

विद्यार्थी- याद रहेगा, सर ये बहुत यादगार रहेगा।

विद्यार्थी- सर ये बहुत स्पेशल मोमेंट है, जो हम आपसे मिल रहे हैं।

प्रधानमंत्री- नहीं स्पेशल ऐसा नहीं है। आप स्वयं इंवॉल्व हैं क्योंकि हम घर से जब निकले होंगे ना, तब दिमाग में दिल्ली, पीएम, पीएम के घर यानी घर में भी फोन कल भी किया होगा, तो ये नहीं क्या होगा ठंड कितनी है, अरे कल जा रहा हूं, सुबह जाना है। इसका मतलब आप पूरी तरह इसमें इन्वॉल्व हैं कि नहीं हैं?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- इसी के कारण आपको 20 साल, 25 साल के बाद भी यहां की हर चीज याद रहेगी।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- दूसरा याद तब रहता है, जब आप मौका देख करके दोस्तों से शेयर करते हो। आप अपने क्लास में अपने से जो कम होशियार जो स्टूडेंट हैं, ऐसे एक-दो को दोस्त बनाएं और फिर उसको कहो कि मैं तुम्हें सिखाता हूं। अपने से ऊपर का जो स्टूडेंट है, हमसे ज्यादा होशियार है। उसको कहो कि भई 5-10 मिनट मेरे साथ बैठो। मुझे बताओ मैं ये सोच रहा हूं, ठीक है क्या? तुम करेक्ट करो। तो हमें डबल फायदा होगा।

विद्यार्थी- यस सर!

विद्यार्थी- जब हम उनका भी ओपिनियन लेते हैं, फिर हमें और थॉट्स आते हैं कि इसमें और क्या हो सकता है?

प्रधानमंत्री- तो इससे फायदा होता है?

विद्यार्थी- जी सर!

प्रधानमंत्री- नए-नए आईडिया आ जाते हैं।

विद्यार्थी- जी सर!

प्रधानमंत्री- तो आपका मन एकदम खुल जाता।

विद्यार्थी- जब मैंने उनसे क्वेश्चन पूछा, मैंने डायरेक्ट इंटरेक्ट किया उनसे और उन्होंने मुझे सैटिस्फैक्टरी आंसर दिया, तब ऐसा लग रहा था कि वी आर लिविंग आवर ड्रीम क्योंकि यहां आना सबके उसमें नहीं रहता, सबकी किस्मत में नहीं रहता। So I am feeling that I am very fortunate.

विद्यार्थी- सर सत श्री अकाल!

प्रधानमंत्री- सत श्री अकाल!

विद्यार्थी- मेरा नाम एकम कौर है। मैं पंजाब से आई हूं। और मेरा आपसे यह प्रश्न है कि जो 12वीं कक्षा के स्टूडेंट्स होते हैं, वो अपने बोर्ड्स के एग्जाम के साथ जो कंपटीशन एग्जाम्स होते हैं, उसकी भी तैयारी करते हैं। क्या ये सही है? क्योंकि उन दोनों एग्जाम्स के जो एग्जामिनेशन पैटर्न होता है, वो बहुत अलग होता है और वो एग्जाम्स आते भी सेम टाइम पर हैं?

प्रधानमंत्री- यह चिंता आपकी सही है। एक ही समय दो-दो मान लीजिए एक क्रिकेट का खेल खेल रहा है, उसी समय उसको फुटबॉल का भी मैच में जाना है, हैं तो उसको लगता है कि मैं क्रिकेट के लिए मेहनत करूं कि फुटबॉल के लिए?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- मेरा आग्रह रहेगा, तो आपको पहली प्रायोरिटी 12th को देनी पड़ेगी। लेकिन अगर हमने एक विद्यार्थी के रूप में जो मेरे उम्र से, मेरे क्लास से जुड़े हुए सिलेबस को आत्मसात किया है, तो कॉम्पिटिटिव एग्जाम उसके लिए अलग मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- यह बाय प्रोडक्ट होगा। कुछ मां-बाप को क्या रहता है, इस उम्र से पहले यह हो जाना चाहिए।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- तो मैं मां-बाप से कहूंगा, उनकी क्षमता, योग्यता, रुचि के अनुसार कि बच्चों को खिलने दो।

विद्यार्थी- सर मेरा एक आपसे एक क्वेश्चन था।

प्रधानमंत्री- हां।

विद्यार्थी- मुझे सर गेमिंग में बहुत इंटरेस्ट है। लेकिन मेरी सोसाइटी बोलती है कि सब गेमिंग वगैरह छोड़ो और पढ़ाई में ध्यान दो। लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि मैं फ्यूचर मेरा फ्यूचर गेमिंग में करूं। जो मुझे कैसे पता चलेगा सर कि मैं सही रास्ते से जा रहा हूं या गलत?

प्रधानमंत्री- मां-बाप का नेचर कैसा होता है? पहले डांटते रहते हैं, मत करो, मत करो, मत करो।

विद्यार्थी- यस सर!

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- लेकिन फिर भी आप चुपचाप करते रहते थे और मान लीजिए आपने मेडल ले लिया, तो क्या करेंगे?

विद्यार्थी- खुश हो जाएंगे!

प्रधानमंत्री- वो पूरे मोहल्ले में जाएंगे। देखिए, मेरे बेटे ने यह किया, मेरे बेटे ने यह किया, मेरे बेटे ने यह किया, तो आपका सक्सेस उनका सम्मान बन जाता है।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- फिर वो आपके साथ जुड़ जाते हैं।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- भारत के अंदर इतनी कथा-कहानियां, आप कभी सोचे हैं कि पंचतंत्र पर मैं एक गेम बनाऊं, मैं गेम क्रिएटर बनूं और जैसा मानसी का अपना एक पेज है। आप भी अपना एक सोशल मीडिया प्रोफाइल बनाइए और आप एक या दो गेम खुद तैयार कीजिए और इन गेम को आप ऐसे लॉन्च कीजिए। तो आपके घर के लोगों को लगेगा, अरे देखो इतना छोटा है, 10,000 इसके फॉलोअर खेलते हैं। 20,000 खेलते हैं, तो घर के लोग फिर आईडिया देना शुरू करेंगे। देखो, यह हनुमान जी वाली वो कथा है ना, तो उस पर गेम बनाओ। देखो कैसे, फिर कहेंगे अभिमन्यु वाली वो घटना है, गेम बनाओ, कैसे अभिमन्यु बाहर निकलेगा? तो आपको नए-नए आइडियाज आएंगे और इसलिए गेमिंग में आपकी रुचि है, अच्छी चीज है। आप कभी भी संकोच मत कीजिए। लेकिन टाइम पास और डाटा सस्ता है भारत में, टेक्नोलॉजी बहुत महंगी नहीं है, तो बस लगे रहो, ऐसे ही मस्ती के लिए खेलना ऐसा नहीं, जो जुआ चलता है ना या वो वो हमें देश में होने नहीं देना है। मैंने अभी कानून बनाया कि जो जुआ खेलते हैं गेम में, पैसे लगाते हैं, वो बर्बादी है।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- उसको नहीं होने देना, लेकिन गेमिंग एक स्किल है और उसमें स्पीड भी होती है, बहुत स्पीड होती है।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- आपकी इतनी अलर्टनेस एक प्रकार से स्वयं के डेवलपमेंट के लिए भी वो एक अच्छा प्रकार है। लेकिन बेस्ट क्वालिटी की गेम ढूंढ करके अपनी एक्सपर्टाइज पाने का प्रयास करना चाहिए। करेंगे?

विद्यार्थी- यस सर!

विद्यार्थी- पीएम के रेजिडेंस पे आके तो बहुत एक्साइटिंग चीज थी मेरे लिए। फ्रेंडली बात कर रहे थे, वो हमसे अच्छे से क्वेश्चन जान के ले रहे थे और हमारे का आज अच्छा वाला आंसर दे रहे थे।

विद्यार्थी- नमस्ते सर!

प्रधानमंत्री- नमस्ते!

विद्यार्थी- सर हमें ना पहले एग्जाम से स्ट्रेस होता था, बहुत चिंता होती थी और यह बुक पढ़ के हमने हमारी चिंता को भगा दिया है, इसी के लिए हमने सबने कोट लिखे हैं। I used to be scared of exams but now it is my friend मैत्री इन गुजराती।

विद्यार्थी- मतलब पहले जो था ना हमें बाकी को देखने में डर लगता था कि भाई वो कैसे पढ़ रहा है, वो कैसे पढ़ रहा है, लेकिन एग्जाम वॉरियर पढ़ने के बाद याद आया कि मेरा टेक्निक जो है वो सबसे डिफरेंट है और मेरा टेक्निक मुझ में ही काम करेगा। सर I used to be scared of dissected but now I don’t have any fear.

विद्यार्थी- सर मैंने लिखा है, I used to be scared to be of time management but it is my friend now. सर मैं बचपन से मतलब मुझे हमेशा घर वाले, स्कूल वाले, दोस्त मतलब मैंने हमेशा टाइम मैनेजमेंट में ही स्ट्रगल किया है। मुझे हर कोई बोलता है, हर काम जल्दी कर, जल्दी कर, तू टैलेंटेड है, तुझे आइडियाज आते हैं, बट तू टाइम पे नहीं करती है। वही तेरा सबसे बड़ा प्रॉब्लम है। तो सब मैंने एग्जाम बैरियर से सीखा है। मैं रोज सुबह जल्दी उठूंगी।

प्रधानमंत्री- अच्‍छा मैं एक सिंपल और एक रास्ता बताता हूं। रात को आप जब सो जाए ना, उसके पहले डायरी में लिखो कि कल मुझे जो बिल्कुल करने ही करने हैं, ऐसे कौन से काम और दूसरा फिर आज जो लिखा है, वह दूसरे दिन टैली करो, हुआ कि नहीं हुआ और टिक मार्क करो कि कल मैंने लिखा था कि मैं आज पांच काम करूं, लेकिन तीन ही किया, तो टिक मार्क करो, दो रह गए, फिर सोचो यह दो क्‍यों रह गए? मैंने यह दोस्तों के साथ फोन पर ज्यादा बात कर ली, एक टीवी सीरियल था, तो मैं 30 मिनट उसी में लगा दिया। तो आपको खुद को लगेगा, हां यह मैं समय बचा सकता हूं। कभी-कभी क्या होता है, हमें पता ही नहीं होता है कि हम समय कैसे बर्बाद करते हैं। जीवन में अगर टाइम मैनेजमेंट सीख लिए और समय का प्रोडक्टिव यूज़ सीख लिया, तो आप देखिए आप कभी भी प्रेशर नहीं लगेगा, थकान नहीं लगेगी। अब जैसे मैं हूं, इतने सारे काम होते हैं, लेकिन मुझे टेंशन नहीं है क्योंकि मुझे बहुत पहले से ही एक प्रकार से समय का सही उपयोग करने की आदत बन गई।

विद्यार्थी- I used to think the maths, maths is the ghost but now I am the ghost. मैंने बचपन में maths को देखकर इतना डरा कि वो जैसे भूत, पर अब मैं इतना नजदीक आ गया हूं कि अब maths को छोड़कर नहीं रह पाता।

प्रधानमंत्री- अच्छा! इतना बड़ा चेंज आया। आपने वैदिक मैथमेटिक्स देखा है?

विद्यार्थी- नहीं।

प्रधानमंत्री- ऑनलाइन वैदिक मैथमेटिक्स के क्लास चलते हैं क्योंकि वो जादू के खेल की तरह है। अगर थोड़ा उसमें रुचि लेंगे, तो आपको बहुत मजा आएगा और अपने दोस्तों को भी maths के उस प्रकार के गेम दिखा सकते हो, तो आपकी रुचि और बढ़ जाएगी।

विद्यार्थी- सर I used to be scared of exams but it is my friend now. एग्जाम जब डेटशीट आए तो बहुत डर लगता था कि अब एग्जाम में क्या होगा या फिर एग्जाम वॉरियर बुक का आपकी इसका पहला मंत्र यह है कि परीक्षा को हमें उत्साह या उमंग की तरह लेना चाहिए, उत्सव की तरह लेना चाहिए। आपकी पढ़ के उससे मेरे को काफी मोटिवेशन मिला।

प्रधानमंत्री- कभी-कभी आपको जो समस्याएं आती है ना वो घर में से ही आती है। तो जो चीज इसमें से आपको काम आई है, वो चीजें उनके काम भी आएगी। कम से कम आपके परिवार के जो बड़े लोग हैं ना, उनके साथ परीक्षा पर चर्चा पढ़ने के लिए कहिए। उसकी चर्चा कीजिए।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- और कोई मंत्र है, तो खास लाइन करके बताइए। देखिए, यह पीएम ने यह कहा है, तुम पढ़ो।

विद्यार्थी- सर मेरी मम्मी ने सारे मंत्र पढ़े और मम्मी बहुत खुश हुई।

प्रधानमंत्री- देखिए आपकी ताकत बढ़ गई।

विद्यार्थी- I used to be scared of low marks but now it is my friend. सर पहले ऐसा था कि मतलब हमें लगता था कि मार्क्स ही सब कुछ है। एग्जाम्स के बाद हमारे मार्क्स कम आते थे, तो ऐसा लगता था कि अभी मतलब सब कुछ एंड हो गया। पर जब लाइक हमने बुक पढ़ा तो मतलब आपने जैसे लिखा था, एग्जाम सिर्फ एक लाइफ का प्रिपरेशन है और आपने हमें डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का एग्जांपल दिया।

प्रधानमंत्री- हां, याद है आपको?

विद्यार्थी- मतलब उन्होंने फेलियर किया, पर अगर वो फिर अगर ट्राई नहीं करते, तो हम लोगों को मतलब मिसाइल मैन ऑफ इंडिया नहीं मिलता। तो उसके बाद मुझे सीख मिला है कि एग्जाम के मार्क्स कुछ नहीं हैं। मतलब अगर हम लोग फिर ट्राई करेंगे तो और अच्छा और बेहतर कर सके।

प्रधानमंत्री- अच्छा अभी तुम्हारा टेंशन कम हो गया, तब कोई नई चीज सीखने का मन करता है?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- गाना सीखूं, बजाना सीखूं, ऐसा कुछ नया विचार आता है, पेंटिंग सीखूं।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- ऐसा समय मिला तो कर रही हो?

विद्यार्थी- हां सर! वो ही मतलब पोयम लिखना स्टार्ट किया है।

प्रधानमंत्री- पोयम लिखना, अच्छा!

विद्यार्थी- I used to be scared of presentations but now it’s one of my friend. जैसे आपकी तरफ है, देखा है कि आप कितना जैसे वो कॉन्फिडेंस है और यह बुक भी मैं पढ़ता हूं। अभी मैं कॉन्फिडेंस में हूं और ये पर्सिस्टेंस कि जब मैं फेल करूंगा, तो मैं क्विट नहीं करूंगा, मैं फिर से तैयार करूंगा, तो मैं अभी जैसे आगे में मैं ये प्रेजेंटेशन कर सकता हूं।

प्रधानमंत्री- तो अभी हिम्मत आ गया।

विद्यार्थी- हां, इसलिए सर!

प्रधानमंत्री- मान लीजिए, फुटपाथ पर गरीब महिलाएं सामान बेच रही हैं और इतने में कोई झगड़ा हो गया, तो वो गरीब महिला, जिसने कभी टीवी को जवाब नहीं दिया, आपने देखा होगा वो कितना बढ़िया इंटरव्यू देती है। कैसे हुआ? क्या हुआ? कैसे हुआ? कारण क्या है, जो चीज उसने अपने अनुभव में, आंखों के सामने देखा, लाग लपेट नहीं, झूठ बोलना नहीं है, तो एकदम से सरलता से वो बता देती है। यह कॉन्फिडेंस कहां से आया? सच्चाई के कारण आया। आपका भी कॉन्फिडेंस कैसे आया? उस सच्चाई से आया कि जो मैं कर रहा हूं, मैंने जो किया है, मैं जो कह रहा हूं, मैं सही कर रहा हूं।

विद्यार्थी- मैं डरती थी कि पेपर देते टाइम मैं घबरा ना जाऊं, स्पेशली लिटरेचर में। देखती थी, इतना लेंदी है, उसी में घबरा जाती थी बुक पढ़ने के बाद। अब मुझे लगा, नाउ आई कैन, अब मैं नहीं घबराऊंगी। अब मुझे प्रैक्टिस करना है, लिख-लिख के और प्रैक्टिस करूंगी, ताकि मैं घबराऊं ना इतना लेंदी पेपर और मैं ज्यादा स्पीड से और तेजी से लिखने की कोशिश करूंगी। मैं अपना हैंडराइटिंग सब कुछ इंप्रूव करूंगी।

प्रधानमंत्री- वो एकदम कॉन्फिडेंस आ गया। अभी देखती हो, बाद में तो गलती नहीं पकड़ में आती।

विद्यार्थी- बिल्कुल नहीं! क्योंकि मुझे पता चल गया ना कि मुझे क्या प्रॉब्लम है। मैं घबरा जाती थी एक्चुअली पेपर देख के, लेकिन अब नहीं।

प्रधानमंत्री- देखिए यह सही चीज पकड़ा है, सचमुच में हम वीक नहीं है। हम हड़बड़ी में सब गलती कर देते हैं।

विद्यार्थी- यस सर।

प्रधानमंत्री- कुछ टेक्निक काम आती है। मान लीजिए, ऐसा पेपर है ना, चुपचाप 30 सेकंड ऐसे ही बैठिए और एकदम गहरी सांस लीजिए। सांस ऐसे लीजिए, एकदम सीना फूल जाए इतना, जितना भर सकते हैं, भरिए और फिर धीरे से उसके सांस को निकालिए, आपका मन एकदम से अलग हो जाएगा, फिर उसकी ओर देखिए, तो आपको नई चीज हाथ लग जाएगी, सही चीज हाथ लग जाएगी। नहीं आता है, इसलिए गलती होना अलग बात है, लेकिन आता है और गलती होगा ऐसा कभी नहीं होगा।

विद्यार्थी- नमस्कार सर! जय गुरु शंकर!

प्रधानमंत्री- नमस्कार!

विद्यार्थी- मेरा नाम निडुमल बर्मन है। सो सर मेरा क्वेश्चन यह है कि छोटे घर, शोर और कामकाज के बीच मतलब पढ़ना अक्सर थोड़ा मुश्किल हो जाता है और अगर माता-पिता हमारे सपनों को उतना सपोर्ट नहीं करते, उतना गंभीरता से नहीं लेते, तो अब हम क्या कर सकते हैं?

प्रधानमंत्री- देखिए मैं बताता हूं। मैंने एक वीडियो देखा था सोशल मीडिया पर, जो मेरे मन को छू गया था। एक पिताजी बैलगाड़ी में अपना जो रोजी-रोटी कमाने के लिए कुछ सामान लेकर के जा रहे थे, और उनका बच्चा उस बैलगाड़ी में सामान भरा पड़ा था, ऊपर कहीं सामान के ऊपर बैठा हुआ था, लेकिन क्या कर रहा था? वो अपनी किताब पढ़ रहा है यानी वो कंफर्ट की चिंता नहीं कर रहा।

विद्यार्थी- यस सर।

प्रधानमंत्री- कुछ लोग होते हैं कि भई नींद नहीं आती। क्यों नहीं आती? कमरा ऐसा है। अगर उसको फाइव स्टार होटल में रखोगे ना, तो भी नींद नहीं आएगी। तो यह जो सोच है कि सुविधा होगी तो क्षमता आएगी, ऐसा नहीं है। हमारे देश में बोर्ड के एग्जाम में जो नंबर लाते हैं, वो बच्चे कौन है? छोटे-छोटे गांव के हैं। पहले क्या होता था? बड़े परिवार के बड़ी स्कूल के बच्चे ही, अब ऐसा नहीं है। छोटे-छोटे परिवार के थे। अब वहां तो कोई कंफर्ट नहीं है। देखिए अभी मैं ब्लाइंड क्रिकेट टीम से बच्चियों को मिला और वो जीत करके आई थीं। जब मैंने उनको सुना, तो अपनी आंख में आंसू आ जाए, ऐसी बातें थी। घर नहीं है और ब्लाइंड है, खेलना सीखा, दिव्यांग होने के बावजूद भी वो यहां तक पहुंच गईं। तो उसको कहां पैदा हुई, कहां रहती थी, यह सब मैटर नहीं करता था। तो हम कंफर्ट जोन ही जीवन बनाता है। यह भ्रम में नहीं रहना चाहिए। जीवन बनता है जिंदगी जीने के तरीके से।

विद्यार्थी- माननीय प्रधानमंत्री जी को देखा, तो मुझे तो अपने आप पर विश्वास नहीं हो रहा कि वो आ रहे हैं। लीडर हैं इंडिया के तो मुझे लगा कि वो बहुत सीरियस रहते होंगे, लेकिन जब उनसे बातें की ना, बातें करके अपने-अपने लगे। उन्होंने जो एडवाइज दी थी उसको सुनकर ऐसा लगा कि हां मैं तो यह कर सकता हूं। अब मैं वो फॉलो करूंगा और अपने जीवन में उसको उन एडवाइज को फॉलो करने की कोशिश करूंगा।

विद्यार्थी- वणक्कम सर!

प्रधानमंत्री- वणक्कम!

विद्यार्थी- सर मेरा नाम निखिल है सर! मैं लैंड ऑफ टेंपल्स तमिलनाडु से आया हूं। सर तो एग्जाम्स के वक्त कभी-कभी हमारे घर में गेस्ट्स आते हैं सर, सर और वो हमारे प्रिपरेशन के बारे में पूछते हैं। कुछ चीजें हम मतलब हम अपने माइंड से निकाल के रख देते हैं, भूलना चाहते हैं, उसी के बारे में वापस पूछते हैं और हमें उसके बारे में याद दिला देते हैं। सर और इसके बारे में हमारे मम्मी-पापा भी कुछ कर नहीं पाते। सर तो मैं आपसे यह पूछना चाहता हूं, ऐसे सिचुएशनंस को हम कैसे हैंडल कर सकते हैं सर?

प्रधानमंत्री- मैं एक चालाकी बताता हूं, क्या करना चाहिए? जैसे आया ना, बोले अंकल जी आप बहुत सफल व्यक्ति हैं। मैंने सुना है, मुझे आप बताइए ना, बचपन में आप कैसे पढ़ते थे? क्या आपको कभी गुस्सा आता था क्या? आपको कभी टीचर मारते थे क्या? आप कैसे करते थे? वो पूछे उसके पहले आप पूछो। आप देखिए पूरा टेबल टर्न हो जाएगा।

विद्यार्थी- हां सर।

प्रधानमंत्री- जब वो आए मैं टोटली सरप्राइज था। जिन्हें अभी तक टीवी में देखा है। उन्हें रियल लाइफ में सीधा देखने को मिल रहा है और उन्होंने मतलब बहुत क्रिएटिव आंसर दिया। मैंने एक्सपेक्ट नहीं किया था। उन्होंने बोला कि सीधा टेबल पलट देने के लिए। हमें उनसे जाके पूछना चाहिए कि आपने कैसे किया? लाइफ में आपने इस स्टेज में इस पड़ाव को आपने कैसे पार किया?

विद्यार्थी- जुलेय सर! मेरा नाम पद्मा है। मैं लद्दाख से हूं। तो मेरा यह प्रश्न है कि हमारे जैसे हमारे उम्र के बच्चे को बड़े सपने देखने चाहिए? और उन्हें पूरा करने की शुरुआत कहां से करना चाहिए सर?

प्रधानमंत्री- सपने ना देखना, वो तो क्राइम है। सपने देखने ही चाहिए, लेकिन सपनों को गुनगुनाते रहना यह कभी काम नहीं आता है और इसलिए जीवन में कर्म को प्रधान देना चाहिए। मैं जहां हूं, वहां मुझे सफल होना है, तभी मैं आगे जाऊंगा। मैं देखता रहूं और मुझे अगर पेड़ पर चढ़ना ही है, तो आम देखता रहूं, आम देखता रहूं, तो आम नहीं पकड़ सकता। अब जैसे मान लीजिए, हमारा मन कर गया कि मुझे एस्ट्रोनॉट होना है और मुझे चंद्रमा पे जाना है, तो फिर मुझे पढ़ना चाहिए कि भई एस्ट्रोनॉट कौन हुए, उनकी बायोग्राफी क्या थी? यह स्पेस होता क्या है? धीरे-धीरे-धीरे-धीरे उसमें रुचि हमारी बढ़ानी चाहिए। फिर टीवी पर कोई कार्यक्रम है, तो उसको खास देखना चाहिए, तो आपको खाद पानी मिलता रहेगा। आपको फर्टिलाइजर जिसको कहे वह मिलता रहेगा, तो वो विचार आपका पनपेगा। औरों को बताने से फायदा नहीं होगा। कभी-कभी हम बता देंगे भई मजाक उड़ाएगा। यह तो एस्ट्रोनॉट बनने वाला है। तो हमारे मन के सपने पब्लिक नहीं करने चाहिए, लेकिन लिख करके रखना है।

विद्यार्थी- मैं बहुत नर्वस थी क्योंकि मुझे मेरा यह लाइफ का पहला एक्सपीरियंस था परीक्षा पे चर्चा पर, बट जैसे ही प्राइम मिनिस्टर मेरे सामने आते ही मेरा पूरा नर्वसनेस एक्साइटमेंट में बदल गया था।

विद्यार्थी- Sir, I have a question कि हम जो बड़े सपने देखते हैं, उन्हें हमें पूरा करने के लिए रोजाना कौन सी एक छोटी सी हैबिट या कौन सी एक आदत अपनानी चाहिए, जिससे हम अपने सपने के नजदीक पहुंचते जाएं?

प्रधानमंत्री- एक तो मुझे लगता है कि हमने बायोग्राफी पढ़नी चाहिए, बड़े जो भी सब है उसके विषय में, कभी-कभी क्या होता है, हमारे सामने वह बड़े बने वही पता चलता है, लेकिन वो भी तो कभी छोटे थे। आज पीएम आपको मिला होगा, वो पीएम कभी तो छोटा होगा ना, तो हम जब बायोग्राफी पढ़ते हैं, तो लगता है नहीं भाई यह बड़ा तो था, लेकिन पहले तो यहां था। फिर उसमें से आप को-रिलेट करोगे कि साहब मैं भी ऐसा ही हूं, यह तो मैं भी करता हूं। वही करते हैं, ऐसा नहीं है। फिर आपका विश्वास बढ़ेगा। हां-हां यहां से शुरू कर सकते हैं। यह पहला कदम है। उन्होंने ऐसा किया था, यह दूसरा कदम है। उसने ऐसा किया था, यह तीसरा कदम है। तो आप अपने आप अपना रास्ता मजबूती से आगे बढ़ा सकते हैं।

विद्यार्थी- उनकी एडवाइस सुनके मुझे ऐसा लगा कि जो मेरा आइडियल है। मैं उसके देखूं और उसकी मतलब पूरी जानकारी निकालूं और देखूं कि वो किस बैकग्राउंड से बिलोंग करते थे। उनके सामने क्या परेशानियां थी? उन्होंने क्या-क्या फेस किया? तो उन उनको जान के मैं क्या एक छोटा सा स्टेप ले सकती हूं और उस पर काम कर सकती हूं और वो जब पहला वाला स्टेप कंप्लीट हो जाए, तब हम दूसरे स्टेप पर जा सकते हैं।

विद्यार्थी- सर मुझे आपको एक कविता सुनानी है।

प्रधानमंत्री- कविता सुनानी है। सुनाओ।

विद्यार्थी- हम सबके अरमान हैं आप। भारत के अभिमान हैं आप। भारतवर्ष के केवट हैं आप। मानवता के सेवक हैं आप। मैं बड़ी दूर से आई हूं। कुछ प्रश्नों को अपने साथ भी लाई हूं। परीक्षा पे चर्चा की सौगात उठाए हैं। फिर हम सब ने यह मौका पाए हैं। आप ममता की परछाई हैं। वंचितों के हमराही है। देश को आगे रखते हैं। भारत मां की जय कहते हैं। तो लो मैं भी यह कहती हूं, मन की बात रखती हूं। आप साधना पुरुष और योगी हो। भारत के सपनों के मोदी हो। यह कहकर मैंने वाणी को विराम दिया। फिर से आपको प्रणाम किया।

प्रधानमंत्री- वाह! वाह! बढ़िया कविता बनाती हो।

विद्यार्थी- जब वो मेरे से मिले, जब मैं पोयम सुना रही थी और जब वो मेरे से बात कर रहे थे और जैसे-जैसे पास आ रहे थे, ऐसा लग रहा था, अब मेरे को चक्कर आएंगे और अब मैं यहीं गिर जाऊंगी।

प्रधानमंत्री- यह अच्छा हुआ। आप लोगों ने सब अपनी-अपनी बातें लिखी।

विद्यार्थी- धन्यवाद सर!

प्रधानमंत्री- आइए!

प्रधानमंत्री- अच्छा भाई मैं आपसे कुछ सवाल पूछना चाहता हूं। आपने मुझे बहुत सवाल पूछे। यह जो हिंदुस्तान में जो मैं विकसित भारत की बात करता हूं। कौन सी साल बताता हूं, मैं विकसित भारत के लिए?

विद्यार्थी- 2047

प्रधानमंत्री- 2047

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- क्यों बताता हूं?

विद्यार्थी- क्योंकि ये 100 साल की एक सेंचुरी का गोल है।

प्रधानमंत्री- आजादी को 100 साल हों। जब भारत की आजादी के 100 साल होंगे, तब आपकी ऐज कितनी होगी?

विद्यार्थी- 39

विद्यार्थी- 40

प्रधानमंत्री- यह 39-40-35-45, यह जो ऐज होगी, वो कितनी महत्वपूर्ण उम्र होगी आपकी, कितनी सारी चीजें आपके सामने तैयार होगी? तो यह सब मेहनत किसके लिए कर रहा हूं?

विद्यार्थी- हमारे लिए!

प्रधानमंत्री- अब हम सबने करनी चाहिए कि नहीं करनी चाहिए?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- अब देखिए महात्मा गांधी जी ने 1915 में वो वापस आए अफ्रीका से और आजादी का आंदोलन चलाया, तो 1915 से 1947 तक आजादी-आजादी लगे रहे कि नहीं लगे रहे?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- आजादी आई कि नहीं आई?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- भगत सिंह जी, फांसी के तख्त पर चढ़ गए।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- छोटी आयु में चढ़ गए, लेकिन आजादी का सपना बो करके गए कि नहीं गए?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- हर दिलों में हर नौजवान को आजादी के लिए जीने के लिए सिखाया कि नहीं सिखाया?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- अगर आजादी के 25 साल पहले, आजादी के 30 साल पहले जो सपना देखा गया, उन सपनों के लिए जो उन्होंने कष्ट सहन किए, त्याग किया, बलिदान किया, आजादी मिली कि नहीं मिली?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- अगर इतनी बड़ी आजादी मिल सकती है, तो क्या हम सबके प्रयत्नों से विकसित भारत बन सकता है कि नहीं बन सकता है?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- आपको विश्वास है?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- और इसलिए कभी भी भूलना नहीं चाहिए। यह सपना हमेशा आपको भी घर में जाके लिखना चाहिए। विकसित भारत के लिए मुझे यह करना है। अब कौन सी ऐसी पांच चीजें हैं, जिसको मैं करूं विकसित भारत के लिए?

विद्यार्थी- सर अपने अंदर स्किल्स डेवलप करेंगे।

विद्यार्थी- सर हम खुद पर विश्वास कर कर आगे बढ़ेंगे।

प्रधानमंत्री- खुद पर विश्वास करेंगे।

विद्यार्थी- स्वदेशी चीजों का ज्यादा उपयोग करेंगे।

प्रधानमंत्री- अब यह स्वदेशी करेंगे तो करेंगे कैसे? तो पहले हमें मन को तैयार करना पड़ेगा।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- स्वदेशी चीज तो बाद की बात है।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- हम जो गुलामी की मानसिकता में जीते हैं। स्कूल में स्कूल में कोई दोस्त विदेशी जैकेट पहन के आया और कहेगा, यह तो फलाने देश का है, तो हमारा ध्यान कैसा रहता है? अच्छा-अच्छा, होता है कि नहीं होता है?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- सर एक काम आप लोग करेंगे।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- सुबह ब्रश करने से लेकर के दूसरे दिन सुबह ब्रश करने तक, हम जिन-जिन चीजों का उपयोग करते हैं, उसका लिस्ट बनाइए। आपको पता भी नहीं होगा, कंघी भी विदेशी होगी। आपको पता ही नहीं होगा। जूते भी विदेशी होंगे, आपको पता नहीं होगा। एक बार आपको लिख करके देखना चाहिए। चलो भाई, इस महीने में यह 10 चीजें पुरानी हो जाएगी, अब नई इंडियन लाएंगे। अगले महीने यह 10 पूरी हो जाएगी, इंडियन लाएंगे। तो एक साल के भीतर-भीतर सब विदेशी चीजें निकल जाएगी, इंडियन चीजें घर में आ जाएगी। तो हमें तय करना चाहिए, जैसा भी होगा, मेरे शरीर पर, मेरे परिवार में, मेरे जीवन में, मेरी कोशिश होगी कि मैं पहले देखूंगा कि बताओ पहले इंडियन है कि नहीं है, तो करेंगे?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- अगर हम ही हमारे देश की चीजों का गौरव नहीं करेंगे, तो दुनिया करेगी क्या?

विद्यार्थी- नो सर!

प्रधानमंत्री- अब जैसे हम लोग लेट हो जाते हैं, तो क्या बोलते हैं? हम बोलते हैं, यह तो इंडियन टाइम है। बोलते हैं कि नहीं बोलते?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- मतलब हम लेट हम हुए। कार्यक्रम हमने देर से शुरू किया और गाली किसको दी?

विद्यार्थी- इंडिया को।

प्रधानमंत्री- इंडिया को। दूसरा है कर्तव्य का पालन। पहले अपना जीने के तरीका बदलो। पहले शुरुआत करो स्वच्छता से, हम गंदगी नहीं करेंगे। हम दुनिया में कहीं देश का चित्र देखते हैं, तो साफ-सुथरा दिखता है।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- यह साफ-सुथरा क्यों है? सफाई करने वाले के कारण साफ-सुथरा है कि लोगों ने गंदगी नहीं की इसलिए साफ सुथरा है।

विद्यार्थी- लोगों ने गंदगी नहीं की इसलिए!

प्रधानमंत्री- तो हमें अगर विकसित भारत बनाना है, तो हम तय करें, हम गंदगी नहीं करेंगे और हम स्वच्छता के विषय में, परिवार में, बाहर, मोहल्ले में, सब जगह पर जरा भी कॉम्प्रोमाइज नहीं करेंगे। किसी ने फेंक दिया, तो उसके साथ झगड़ा नहीं करेंगे, उठाकर ले लेंगे हम और हम उस कूड़े का, तो वह देखेगा, वो शर्मिंदगी महसूस करेगा।

विद्यार्थी- यस सर!

विद्यार्थी- कि मेरा कचरा इसने उठाया।

प्रधानमंत्री- और इसलिए हमने जो नागरिक का कर्तव्य है, उसका पालन करना चाहिए। हमारा हेल्दी रहना भी एक प्रकार से कर्तव्य है।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- तो हमें अपने कर्तव्यों का पालन अगर इतना भी कर लें, तो दुनिया की कोई ताकत भारत को विकसित भारत बनाने से रोक नहीं सकती है और आप जब 35-40 साल के होंगे, उसका सबसे ज्यादा मजा लेने का मौका आपको मिलेगा।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- अब मुझे बताइए जिसका फल आपको मिलने वाला है, वो काम आपको करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- ज्यादा से ज्यादा आपको करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए?

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- चलिए और मैं एक सवाल पूछता हूं। आप उस पीढ़ी में हैं, आपके पास इतना खुला आसमान है। इतना बड़ा कैनवास है। आपको ध्यान में आता है कि ऐसी कौन सी चीजें आज हम कर सकते हैं।

विद्यार्थी- यह आजकल सारा जमाना ही जैसे एआई का है। काफी चीजें एआई में होते हैं।

प्रधानमंत्री- देखिए आप लोग भाग्यशाली हैं। आपको इतना टेक्नोलॉजी का अपॉर्चुनिटी मिला है, जो मेरे जमाने में नहीं था। उसका सही उपयोग करना, यह विवेक बुद्धि हमको विकसित करनी होगी। एआई आपकी ताकत को बढ़ाने वाली होनी चाहिए। एआई का उपयोग कैसे करें? एक तो होता है कि मैं एआई को यह कहूं कि फलानी बायोग्राफी है। उसका मुझे मेन पॉइंट बता दो, तो एआई बता देगी 10 पॉइंट और मुझे लगा मुझे बहुत ज्ञान हो गया। गाड़ी चल जाएगी। दोस्तों से कहता हूं अभी गप्पे मारने हैं, तो बड़े ठहाके से आपने एआई का उपयोग किया। लेकिन इससे आपका लाभ हुआ क्या? नहीं हुआ। लेकिन अगर मैं एआई को पूछूं कि मेरी ये उम्र है, मेरी इन विषयों में रुचि है, आप मुझे बताइए कि कौन सी 10 अच्छी बायोग्राफी है, जो मैं पढूं। तो एआई आपको ढूंढ करके 10 बायोग्राफी दिखाएगा, फिर बाजार में जाइए और उसमें से किताब खरीदिए। तो एआई आपको काम आई।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- आपका डेवलपमेंट हुआ।

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- आपको लाभ हुआ।

विद्यार्थी- यस सर!

विद्यार्थी- मेरा फेवरेट पार्ट था कि उन्होंने जो एआई को लेकर बोला कि एआई तुम यूज़ करो। एआई की एक हेल्प है। बट वो हमें आगे भी हमें यूज़ कर सकते हैं। बट वो सीधा हमें हमारे जो हमारा गोल है, वहां तक नहीं पहुंचा सकता। मैं भी ऐसे यूज करती हूं, टेक्नोलॉजी से रिलेटेड ऐप बनाना ऐसे, तो मुझे अच्छा लगा कि उन्होंने बोला कि एआई का इस तरीके से यूज करो, ताकि हम सबके लिए अच्छे से यूज़फुल हुए।

विद्यार्थी- सर मुझे बांसुरी सुनाना है आपको। मैं कर्नाटक शास्त्रीय संगीत अभ्यास कर रहा हूं बांसुरी, तो आज मैं एक संस्कृत का कंपोजिशन बजा रहा हूं।

प्रधानमंत्री- हां सुनाओ-सुनाओ!

प्रधानमंत्री- वाह! चलिए, बहुत-बहुत धन्यवाद आप लोगों का!

विद्यार्थी- सर मैंने ना एक आपका स्केच बनाया है। मैं आपको दिखा सकती हूं प्लीज?

प्रधानमंत्री- अच्छा! कहां है?

विद्यार्थी- सर यह मैंने आपके लिए बनाया है।

प्रधानमंत्री- क्या बनाया बेटा?

विद्यार्थी- सर हैंडमेड बुके बनाया है।

प्रधानमंत्री- अच्छा!

विद्यार्थी- यह पहाड़ में ट्रेडिशनल उत्तराखंड का है यह, यह टोकरी है, जैसे बसंत पंचमी आती है, तो इसमें हम सुबह उठते हैं और फूल तोड़ते हैं, फिर लोगों के घर-घर पर डालते हैं।

विद्यार्थी- त्रिपुरा का फेमस!

प्रधानमंत्री- त्रिपुरा सुंदरी!

विद्यार्थी- It was made by face coconut shell.

विद्यार्थी- and sir this is tea from

प्रधानमंत्री- वाह चाय वाले को चाय!

विद्यार्थी- Sir it’s organic tea.

प्रधानमंत्री- ऑर्गेनिक टी, तुम बहुत अच्छी कविता लिखती हो] लगातार लिखती रहो!

विद्यार्थी- यस सर!

प्रधानमंत्री- अच्छा आसाम का गमोछा। शाबाश! चलिए, बहुत-बहुत धन्यवाद सबका! बहुत शुभकामनाएं!

विद्यार्थी- थैंक यू सर! बाय सर! बाय!

प्रधानमंत्री- धन्यवाद सबका!

विद्यार्थी- थैंक यू सर!

प्रधानमंत्री- बहुत सारे स्टूडेंट्स ने मुझे यह सजेशन भेजा था कि देश के अलग-अलग हिस्सों में भी परीक्षा पे चर्चा होनी चाहिए। इस स्पेशल एपिसोड में आप यही देखने जा रहे हैं। अगर परिवार में भी किसी एक की अच्छाई की बात होती है, तो हमने उस भाई या उस बहन से उसकी अच्छाइयों को सीखने का प्रयास करना चाहिए। जो व्यक्ति बहुत बड़ा बन गया है, वो बड़ा बनने की इच्छा होना बुरा नहीं है। लेकिन वो बड़ा बना है, कहीं से अपने को जोड़ो मत। शिक्षा की जीवन में भी जरूरत है, समाज जीवन में भी जरूरत है। लेकिन जिंदगी में खेल होना चाहिए, यह भी बहुत जरूरी है। तो आप में से अगर कोई कुछ बातें करना चाहते हो, अपनी बात बताना चाहते हो और मुझे सुनना है। कौन शुरू करेगा?