प्रधानमंत्री मोदी ने रांची में आयुष्मान भारत - प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की शुरुआत की समाज की
आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति को, गरीब से भी गरीब को इलाज मिले, स्वास्थ्य की बेहतर सुविधा मिले, इस विजन के साथ प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की शुरुआत की गई है: पीएम मोदी
देश के 50 करोड़ से ज्यादा भाई-बहनों को 5 लाख रुपए तक का हेल्थ-एश्योरेंस देने वाली ये योजना दुनिया की सबसे बड़ी योजना है, पूरी दुनिया में सरकारी पैसे से इतनी बड़ी योजना किसी और देश में नहीं चल रही है: प्रधानमंत्री
अगर आप अमेरिका, कनाडा और मैक्सिको, इन तीनों देशों की आबादी को भी जोड़ दें, तो उनकी कुल संख्या इस योजना के लाभार्थियों की संख्या के करीब ही होगी: प्रधानमंत्री मोदी
आयुष्मान भारत योजना से 2 महापुरुषों का नाता जुड़ा है, अप्रैल में जब योजना के पहले चरण शुरु हुआ था तो उस दिन बाबा साहेब अंबेडकर का जन्मदिन था, अब इसी कड़ी में, प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, दीन दयाल उपाध्याय जी के जन्मदिवस से 2 दिन पहले शुरु हुई है: पीएम मोदी
कैंसर, दिल की बीमारी, किडनी और लीवर की बीमारी, डायबटीज समेत 1300 से अधिक बीमारियों का इलाज इस योजना में शामिल है, इन गंभीर बीमारियों का इलाज सरकारी ही नहीं बल्कि अनेक प्राइवेट अस्पतालों में भी किया जा सकेगा: प्रधानमंत्री
5 लाख तक का जो खर्च है उसमें अस्पताल में भर्ती होने के अलावा जरुरी जांच, दवाई, भर्ती से पहले का खर्च और इलाज पूरा होने तक का खर्च भी शामिल है, अगर किसी को पहले से कोई बीमारी है तो उस बीमारी का भी खर्च इस योजना द्वारा उठाया जाएगा: प्रधानमंत्री मोदी
जो राज्य आयुष्मान भारत योजना से जुड़े हैं, उनमें रहने वाले व्यक्ति किसी भी राज्य में जाएं, उन्हें इस योजना का लाभ मिलता रहेगा, अभी तक देशभर के 13,000 से अधिक अस्पताल इससे जुड़ चुके हैं: पीएम मोदी
झारखंड में करीब 40 वेलनेस-सेंटर्स काम कर रहे हैं और देशभर में इनकी संख्या 2300 तक पहुंच चुकी है, अगले 4 वर्षों में देशभर में ऐसे 1.5 लाख सेंटर्स तैयार करने का लक्ष्य है: प्रधानमंत्री
सरकार देश के स्वास्थ्य क्षेत्र को सुधारने के लिए Holistic तरीके से कार्य कर रही है, एक तरफ सरकार Affordable Healthcare पर ध्यान दे रही है, तो साथ ही Preventive Healthcare पर भी जोर दिया जा रहा है: प्रधानमंत्री मोदी
मैं आश्वस्त हूं कि इस योजना से जुड़े हर व्यक्ति के प्रयासों से, आरोग्य मित्रों और आशा-एनएम बहनों के सहयोग से, हर डॉक्टर, हर नर्स, हर कर्मचारी, हर सर्विस प्रोवाइडर की समर्पित भावना से, हम इस योजना को सफल बना पाएंगे, एक स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण कर पाएंगे: पीएम मोदी

झारखंड के राज्‍यपाल श्रीमती द्रोपदी मुरमु जी, राज्‍य के ऊर्जावान लोकप्रिय मुख्‍यमंत्री श्रीमान रघुवर दास, केंद्र में मंत्रिपरिषद के मेरे साथी श्रीमान जगत प्रसाद नड्डा जी, केंद्र में मंत्रिपरिषद के मेरे साथी और इसी धरती की संतान श्रीमान सुदर्शन भगत जी, केंद्र में हमारे साथी जयंत सिन्‍हा जी, नीति आयोग के सदस्‍य डॉक्‍टर वी.के.पॉल, राज्‍य सरकार के मंत्री रामचंद्र चंद्रमुंशी, संसद में मेरे साथी श्रीमान रामटहल चौधरी जी, विधायक श्रीमान रामकुमार पाहण जी, यहां उपस्थित सभी महानुभाव और विशाल संख्‍या में पधारे हुए झारखंड के मेरे प्‍यारे भाइयो और बहनों।

सा‍थियो, आज हम सभी आज उस विशेष अवसर के साक्षी बन रहे हैं जिसका आकलन भविष्‍य में मानवता की बहुत बड़ी सेवा के रूप में होना तय है। आज मैं यहां सिर्फ झारखंड के विकास को गति देने के लिए नहीं, लेकिन पूरे भारत में जो सपना हमारे ऋषियों-मुनियों ने देखा था, जो सपना हर परिवार का होता है, और हमारे ऋषियों-मुनियों ने सपना देखा था ‘सर्वे भवन्‍तु सुखिन:, सर्वे सन्‍तु निरामय:’। हमारे इस सदियों पुराने संकल्‍प को इसी शताब्‍दी में हमें पूरा करना है और उसका आज एक बहुमूल्‍य आरंभ हो रहा है।

समाज की आखिरी पंक्ति में जो इंसान खड़ा है। गरीब से गरीब को इलाज मिले, स्‍वास्‍थ्‍य की बेहतर सुविधा मिले। आज इस सपने को साकार करने का एक बहुत बड़ा अहम कदम इस विरसामुंडा की धरती से उठाया जा रहा है।

आज पूरे हिन्‍दुस्‍तान का ध्‍यान रांची की धरती पर है। देश के 400 से अधिक जिलों में ऐसा ही बड़ा समारोह चल रहा है और वहां से सब लोग इस रांची के भव्‍य समारोह को देख रहे हैं और वे भी इसके बाद वहां इसी कार्यक्रम को आगे बढ़ाने वाले हैं।

आज यहां मुझे दो मेडिकल कॉलेज प्रारंभ करने का भी अवसर मिला। हमारे मुख्‍यमंत्री जी बता रहे थे कि आजादी के 70 साल में तीन मेडिकल कॉलेज, साढ़े तीन सौ विद्यार्थी और चार साल में आठ मेडिकल कॉलेज, 1200 विद्यार्थी। काम कैसे होता है, कितने व्‍यापक प्रमाण में होता है, कितनी तेज गति से होता है, इसका मैं नहीं मानता है कि इसको बड़ा उदाहरण अब और कोई ढूंढने के लिए किसी को जाने की जरूरत है।

भाइयो-बहनों, आज आयुष्‍मान भारत के संकल्‍प के साथ प्रधानमंत्री जन-आरोग्‍य योजना PMJAY आज से लागू हो रही है। इस योजना को हर कोई अपनी-अपनी कल्‍पना के अनुसार नाम दे रहा है। कोई इसे मोदी केयर कह रहा है, कोई कह रहा है गरीबों के लिए योजना है। अलग-अलग नामों से लोग पुकार रहे हैं, लेकिन मेरे लिए तो ये हमारे देश के दरिद्रनारायण की सेवा का एक महामुला अवसर है। गरीब की सेवा करने का मैं समझता हूं इससे बड़ा कोई कार्यक्रम नहीं हो सकता है, अभियान नहीं हो सकता है, योजना नहीं हो सकती है।

देश के 50 करोड़ से ज्‍यादा भाई-बहनों को पांच लाख रुपये तक का health assurance देने वाली ये दुनिया की अपनी तरह की सबसे बड़ी योजना है। पूरी दुनिया में सरकारी पैसे से इतनी बड़ी योजना किसी भी देश में दुनिया में नहीं चल रही है।

इस योजना के लाभार्थियों की संख्‍या, जब हम यहां बैठते हैं तो कल्‍पना नहीं आती है। पूरा यूरो‍पीयन यूनियन, 27-28 देश, पूरा यूरोपीयन यूनियन, उसकी जितनी आबादी है, उतने लोगों को भारत में ये आयुष्‍मान भारत योजना का लाभ मिलने वाला है।

पूरे अमेरिका की जनसंख्‍या, पूरे कनाडा की जनसंख्‍या, पूरे मैक्सिको की जनसंख्‍या, इन तीनों देशों की जनसंख्‍या मिला लें, और जितनी संख्‍या होती है उससे भी ज्‍यादा लोगों का आयुष्‍मान भारत योजना से देश के लोगों की आरोग्‍य की चिंता होने वाली है।

और इसलिए अभी हमारे आरोग्‍य मंत्री नड्डा जी बता रहे थे कि आरोग्‍य जगत का दुनिया का जो सबसे मान्‍यता प्राप्‍त मैगजीन है, वो भी बढ़-चढ़ करके बढ़ाई कर रहा है कि हिन्‍दुसतान ने एक game changer, एक बहुत बड़ी महत्‍वाकांक्षी योजना को आगे बढ़ाने का फैसला किया है।

और मुझे विश्‍वास है, और मुझे पूरा भरोसा है कि आने वाले दिनों में दुनिया में मेडिकल क्षेत्र में काम करने वाले लोग आरोग्‍य के संबंध में भिन्‍न-भिन्‍न योजनाओं के संबंध में सोचने वाले लोग, आरोग्‍य और अर्थशास्त्र की चर्चा करने वाले लोग, आरोग्‍य और आधुनिक संसाधनों की चर्चा करने वाले लोग, आरोग्‍य और सामान्‍य मानवी की जिंदगी के बदलाव से समाज जीवन पर होने वाले प्रभावों की चर्चा करने वाले लोग, चाहे वो social scientist हों, चाहे वो मेडिकल साइंस की दुनिया के लोग हों, चाहे वो अर्थशास्‍त्र के लोग हों; दुनिया के हर किसी को भारत की इस आयुष्‍मान भारत की योजना का अध्‍ययन करना पड़ेगा, सोचना पड़ेगा और इसके आधार पर दुनिया के लिए कौन सा मॉडल बन सकता है, उसके लिए कभी न कभी सोचकर योजनाएं बनानी पड़ेंगी।

मैं इस योजना को मूर्तरूप देने में जिस टीम ने काम किया है, मेरे सारे सा‍थियों ने जो काम किया है, ये काम छोटा नहीं है। छह महीने के भीतर-भीतर दुनिया की इतनी बड़ी योजना, जिसकी कल्‍पना से ले करके करिश्‍मा करके दिखाने तक की यात्रा सिर्फ छह महीने में। कभी good governance की जो लोग चर्चा करते होंगे ना, एक टीम बन करके, एक vision के साथ, एक road map ले करके, समयबद्ध उसकी पूर्ति करते हुए और 50 करोड़ लोगों को जोड़ करके, 13 हजार अस्‍पतालों को जोड़ करके, छह महीने के भीतर-भीतर इतनी बड़ी योजना आज धरती पर ले आना, ये अपने-आप में एक बहुत बड़ा अजूबा है।

और मैं इसलिए मेरी पूरी टीम को आज सार्वजनिक रूप से सवा सौ करोड़ देशवासियों के सामने जी-भर करके बधाई देता हूं, जी-जान से बधाई देता हूं। और मुझे विश्‍वास है कि ये टीम अब और ताकत से, और अधिक समर्पण से काम करेगी क्‍योंकि अब तक तो प्रधानमंत्री उनके पीछे लगे रहते थे, लेकिन अब 50 करोड़ों गरीबों के आशीर्वाद उनके साथ हैं। और जब 50 करोड़ गरीबों के आशीर्वाद इस टीम के साथ हों, गांव में बैठी आशा वर्कर भी जीजान से इस काम को पूरा करने में लग जाएंगे, इसको यशस्‍वी बना करके रहेंगे, ये मेरा पूरा विश्‍वास है।

साथियो, गरीबों को आरोग्‍य का ये जो सुरक्षा कवच प्राप्‍त हो रहा है, उसे समर्पित करते हुए मैं प्रभु से भी प्रार्थना करता हूं, योजना तो अच्‍छी है, हर किसी के लिए है, लेकिन क्‍या कोई अस्‍पताल का उद्घाटन करने जाएं और ऐसा कह सकता है कि आपका अस्‍पताल भरी रहे? कोई नहीं कह सकता। मैं तो अस्‍पताल का उद्घाटन करने जाऊंगा तो कहूंगा कि आपका अस्‍पताल हमेशा खाली रहे।

आज आयुष्‍मान भारत योजना का आरंभ करते समय भी मैं भगवान से यही प्रार्थना करूंगा कि मेरे देश के किसी गरीब को उसके परिवार में ऐसी कोई मुसीबत न आए ताकि उसको इस योजना के लिए अस्‍पताल के दरवाजे पर जाने की मजबूरी आ जाए। किसी की जिंदगी में ऐसी बुरी अवस्‍था नहीं आनी चाहिए। और इसके लिए भी, उत्तम स्‍वास्‍थ्‍य के लिए भी हम परमात्‍मा से प्रार्थना करते हैं। और अगर कहीं मुसीबत आई तो आयुष्‍मान भारत आपके चरणों में हाजिर है।

अगर दुर्भाग्‍य से आपके जीवन में बीमारी का दुष्‍चक्र आया तो आपको भी देश के धनी आदमी जिस प्रकार से आरोग्‍य की सेवा प्राप्‍त कर सकते हैं, अब मेरे देश के गरीब को भी वही सेवाएं उपलब्‍ध होनी चाहिए। मेरे देश के गरीब को भी वो सारी सुविधाएं उपलब्‍ध होनी चाहिए जो देश के किसी धनी को मिलती हैं।

भाइयो और बहनों, ये योजना आज से लागू हुई है लेकिन क्‍योंकि इतनी बड़ी योजना थी तो trial करना भी जरूरी था। Technology काम करेगी या नहीं करेगी, जो आरोग्‍य मित्र बनाए हैं वो ठीक से काम कर पाएंगे कि नहीं कर पाएंगे, अस्‍पताल जो पहले काम करते थे, उसे बदल करके ठीक करें कि नहीं। और इसलिए पिछले कुछ दिनों से देश के अलग-अलग जिलों में इसका trial चल रहा था। और मुझे विश्‍वास है कि देश को सही मायने में स्‍वास्‍थ्‍य का अधिकार देने का ये अभियान अपने हर उद्देश्‍य में सफल रहेगा। स्‍वास्‍थ्‍य सेवा के क्षेत्र को और मजबूत करेगा।

साथियों, आयुष्‍मान भारत योजना से एक विशेष अवसर भी जुड़ा हुआ है। जब 14 अप्रैल को छत्‍तीसगढ़ के बस्‍तर के जंगलों से मैंने इसका प्रथम चरण प्रारंभ किया था, wellness centre का काम आरंभ किया था, वो बाबा साहेब अंबेडकर की जयंती थी। आज जब दूसरा महत्‍वपूर्ण चरण आगे बढ़ रहा है तो आज पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय जी की जन्‍म-जयंती 25 सितम्‍बर को ध्‍यान में रख करके दो दिन पूर्व आज इस कार्यक्रम को प्रारंभ किया जा रहा है। आज संडे था, मुझे भी सुविधा थी और इसलिए हमने दो दिन इसको पहले किया। लेकिन आज एक और भी महत्‍वपूर्ण अवसर है। आज जिस धरती, जिस नाम को ले करके ऊर्जा की अनुभूति करती है, चेतनमंत बन जाती है, जिसके हर शब्‍द में जगाने का सामर्थ्‍य रहा है, ऐसे राष्‍ट्रकवि दिनकर भी जयंती है।

और इसलिए उन महापुरुषों के आशीर्वाद के साथ समाज के हर प्रकार के भेदभाव को खत्‍म करने के लिए, और जिन्‍होंने जीवनभर गरीबों के लिए सोचा, गरीबों के लिए जिए, गरीबों की गरिमा के लिए अपने-आपको खपा दिया, ऐसे महापुरुषों का स्‍मरण करते हुए आज देश को ये योजना हम दे रहे हैं।

 

देश में बेहतर इलाज कुछ लोगों तक सीमित न हो। सभी को उत्तम इलाज मिले। इसी भावना के साथ आज ये योजना देश को समर्पित की जा रही है।

भाइयो और बहनों, हमारे देश के health sector की जब भी बात होती है तो कहा जाता है कि भारत में अगर किसी के इलाज पर 100 रुपये खर्च हो रहे हैं तो उसमें 60 रुपये से ज्‍यादा बोझ उस परिवार और उस व्‍यक्ति पर आता है। उसने जो बचा-बचाया है, वो सारा बीमारी में बह जाता है। कमाई का ज्‍यादातर हिस्‍सा ऐसे ही खर्च होने के कारण हर साल लाखों लोग गरीबी से बाहर निकलने की कगार पर होते हैं लेकिन एक बीमारी फिर एक बार उनको गरीबी में वापिस ले जाती है। इसी हालत को बदलने के लिए हमने ये बीड़ा उठाया है।

भाइयो-बहनों, गरीबी हटाओ के नारे, देश आजाद हुआ तबसे हम सुनते आए हैं। गरीबों की आंख में धूल झोंकने वाले, गरीबों के नाम की मालाएं जपते रहने वाले लोग अगर आज से 30-40-50 साल पहले गरीबों के नाम पर राजनीति करने के बजाय गरीबों के सशक्तिकरण पर बल देते तो देश, आज जो हिन्‍दुस्‍तान देख रहा है वैसा नहीं होता। उन्‍होंने गरीबों के संबंध में सोचने में गलती की। ये मूलभूत गलती ने देश को आज भुगतना पड़ रहा है। उन्‍होंने ये नहीं सोचा कि गरीब कुछ न कुछ मांगता है। गरीब को कुछ मुफ्त में दे दो, उसको चाहिए, यही उनकी सबसे बड़ी गलत सोच थी। गरी‍ब जितना स्‍वाभिमानी होता है, शायद उस स्‍वाभिमानी को नापने की आपके पास कोई तराजू नहीं है।

मैंने गरीबी को जिया है, मैं गरीबी से पल-बढ़के निकला हूं। मैंने गरीबों के भीतर के स्‍वाभिमान को जी भरके जिया है। वो ही स्‍वाभिमान है जो गरीबी से जूझने की ताकत भी देता है। गरीबी की हालत में भी जीने की ताकत भी देता है। लेकिन न कभी गरीब के स्‍वाभिमान को समझने का प्रयास किया, न गरीब के सपनों को साकार करने के लिए उसके इरादों को समझने की कोशिश की। और इसलिए हर चुनाव में टुकड़े फेंको, अपना राजनीतिक उल्‍लू सीधा कर लो, यही खेल चलता रहा।

हमने बीमारी की जड़ को पकड़ा है। देश गरीबी से मुक्ति की ओर तेज गति से आगे बढ़ रहा है। पिछले दिनों एक अंतर्राष्‍ट्रीय संस्‍था ने कहा- दो-तीन साल के भीतर-भीतर देश में पांच करोड़ परिवार अति गरीबी से बाहर आ गए हैं।

भाइयो-बहनों, ये इसलिए संभव हुआ है क्‍योंकि हमने गरीबों का सशक्तिकरण empowerment of poor, इस पर बल दिया है। और इसलिए गरीब को अगर घर मिलता है तो उसके जीवन की सोच बदलती है। अगर गरीब मां को गैस का कनेक्‍शन मिलता है तो वो मां जिंदगी में आत्‍मविश्‍वास के साथ दूसरे की बराबरी में खड़ी रहती है।

जब गरीब का बैंक में खाता खुलता है तो वो भी आत्‍मसम्‍मान की अनुभूति करता है। पैसे बचाने का इरादा तय कर लेता है। जब गरीब का टीकाकरण होता है, पोषण मिशन का लाभ मिलता है तो गरीब भी सशक्तिकरण की ओर आगे बढ़ता है।

आपने देखा होगा, अभी एशियन गेम्‍स हुए, एशियन गेम्‍स में अवार्ड लाने वाले कौन थे? गोल्‍ड मैडल लाने वाले कौन थे? भारत को नई-नई सम्‍मानजनक स्थिति दिलाने वाले कौन थे? ज्‍यादातर बच्‍चे, बेटा हो या बेटी, छोटे गांव में पैदा हुए, गरीब के घर में पैदा हुए, कुपोषण की जिंदगी से गुजारा करते हुए पले-बढ़े, लेकिन मौका मिला तो हिन्‍दुस्‍तान का नाम रोशन करके आ गए।

गरीब में भी वो ताकत पड़ी है, उसे पहचानना जरूरी है। और इसलिए हमारी सारी योजनाएं गरीबों का सशक्तिकरण है। देश में एक बहुत बड़ा दूसरा बदलाव आया है। देश में सारी नीतियां सिर्फ और सिर्फ वोट बैंक की राजनीति को आधार बना करके की गई हैं। किस जाति को फायदा मिलेगा, जिस जाति से चुनाव जीतने की गारंटी मिलेगी। किस संप्रदाय के लोगों को फायदा मिलेगा, जिस संपद्राय के लोगों से वोट बटोरने की संभावना बढ़ेगी। किस इलाके को लाभ मिलेगा, जिस इलाके से चुनाव जीतने की संभावना बनेगी। चाहे क्षेत्रीय विकास का मानदंड हो, चाहे सामाजिक बदलाव का मानदंड हो, चाहे साम्‍प्रदायिक तनावों से मुक्ति का रास्‍ता हो; पहले सरकारों ने सिर्फ और सिर्फ वोट बैंक की राजनीति के तहत समाज की ताकत बढ़ाने के बजाय राजनीतिक दलों की ताकत बढ़ाने के लिए सरकारी खजानों का उपयोग किया। और सरकारी खजानो को बेतहाशा लूटा गया।

हमने वो रास्‍ता छोड़ दिया है। हम चाहते हैं देश कभी भी उस रास्‍ते पर वापिस न लौटे। हमारा मंत्र रहा है ‘सबका साथ-सबका विकास।‘ सम्‍प्रदाय के आधार पर आयुष्‍मान भारत योजना नहीं होगी। जाति के आधार पर आयुष्‍मान भारत नहीं होगी। ऊंच-नीच के भेदभाव के आधार पर आयुष्‍मान भारत नहीं होगा। ‘सबका साथ-सबका विकास’ किसी भी जाति से हो, किसी भी बिरादरी से हो, किसी भी इलाके से हो, किसी भी सम्‍प्रदाय से हो, ईश्‍वर को मानता हो-न मानता हो, मंदिर में जाता हो, मस्जिद में जाता हो, गुरूद्वारे में जाता हो, चर्च में जाता हो, कोई भेदभाव नहीं। हर किसी को आयुष्‍मान भारत योजना का लाभ मिलेगा यही है ‘सबका साथ-सबका विकास’।

सा‍थियो, ये योजना कितनी व्‍यापक है- इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि कैंसर, दिल की बीमारी, किडनी और लीवर की बीमारी, डायबिटीज समेत 1300 से अधिक बीमारियों को, उनके इलाज को इस योजना में शामिल किया गया है। एक हजार तीन सौ- इन गंभीर बीमारियों का इलाज सरकारी नहीं बल्कि देश के प्राइवेट अस्‍पतालों में भी सुलभ होगा।

पांच लाख तक का जो खर्च है उसमें अस्‍पताल में भर्ती होने के अलावा जरूरी जांच, दवाई, भर्ती से पहले का खर्च और इलाज पूरा होने तक का खर्च, उसमें शामिल है। अगर किसी को पहले से कोई बीमारी है तो उस बीमारी का भी खर्च इस योजना द्वारा उठाया जाएगा।

इतना ही नहीं, देशभर के हर लाभार्थी को सही से इसका लाभ पहंचा पाएं, उसका भी प्रभावी इंतजाम किया गया है। आपको इलाज के लिए भटकना न पड़े, इसको ध्‍यान में रखते हुए व्‍यवस्‍थाएं खड़ी की गई हैं। सब कुछ technology के माध्‍यम से सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है। कोई जरूरतमंद छूट न जाए इसकी समीक्षा निरंतर चल रही है।

आपको इस योजना में किसी तरह के रजिस्‍ट्रेशन की जरूरत नहीं है। आपको जो ई-कार्ड मिल रहा है, वही आपके लिए काफी है। ई-कार्ड में आपसे जुड़ी सारी जानकारियां होंगी। इसके लिए आपको तमाम कागजी कार्रवाईयों के फेरे में भी अब पड़ने की जरूरत नहीं है।

इसके अलावा एक टेलीफोन नम्‍बर और मैं मानता हूं इसको याद रखना चाहिए आप लोगों ने। मेरे सब गरीब परिवारों से खास आग्रह करता हूं, इस नम्‍बर का जरूर याद रखिए-14555, one four triple five, ये नंबर पर आप जानकारी ले सकते हैं कि आपका इस योजना में नाम है कि नहीं है। आपके परिवार का नाम है कि नहीं है। आपको क्‍या मुसीबत है, क्‍या लाभ मिल सकता है, ये सारी चीजें, या फिर आपके नजदीक में जो common service centre है, आज देश में तीन लाख common service centre हैं, उन तीन लाख सेंटर किसी को भी दो-तीन किलोमीटर से दूर जाना नहीं पड़ेगा। वो जा करके भी वहां से अपनी जानकारियां ले सकते हैं।

सा‍थियों, इन व्‍यवस्‍थाओं के साथ ही दो और बड़े सहायक आसपास होंगे। एक-आपके गांव की आशा और एएनएम बहनें, और दूसरा- हर अस्‍पताल में आपकी मदद के लिए तैनात रहने वाले प्रधानमंत्री आरोग्‍य मित्र। ये प्रधानमंत्री आरोग्‍य मित्र अस्‍पताल में भर्ती होने के पहले से ले करके इलाज के बाद तक आपको योजना का लाभ प्राप्‍त कराने में आपका पूरा सहयोग देंगे। देश को आयुष्‍मान बनाने में जुटे हमारे ये समर्पित साथी हर सही जानकारी आप तक पहुंचाएंगे।

साथियो, आयुष्‍मान भारत का ये मिशन सही मायने में एक भारत, सभी को एक तरह के उपचार की भावना को मजबूत करता है। जो राज्‍य इस योजना से जुड़े हैं, उनमें रहने वाले व्‍यक्ति अगर उस राज्‍य के बाहर कहीं जा रहे हैं और वहां अचानक जरूरत पड़ गई तो भी इस योजना का लाभ वो दूसरे राज्‍य में भी ले सकते हैं।

अभी तक इस योजना से देशभर के 13 हजार से अधिक अस्‍पताल भी इस योजना में हमारे साथी बन चुके हैं। आने वाले समय में और भी अस्‍पताल इस मिशन का हिस्‍सा होने वाले हैं। इतना ही नहीं, जो अस्‍पताल अच्‍छी सेवाएं देंगे, विशेष तौर पर गांव के अस्‍पताल, तो उन्‍हें सरकार द्वारा मदद भी दी जाएगी।

भाइयो और बहनों, आयुष्‍मान भारत योजना का लक्ष्‍य आर्थिक सुविधा देने का तो है ही, साथ में ऐसी व्‍यवस्‍था भी खड़ी की जा रही है जिससे कि आपको घर के पास ही इलाज की उत्तम सुविधा मिल जाए।

सा‍‍थियों, आज यहां पर 10 wellness centers का भी शुभारंभ किया गया है। अब झारखंड में करीब 40 ऐसे सेंटर्स काम कर रहे हैं और देशभर में ये करीब दो-ढाई हजार तक पहुंच चुके हैं। अगले चार वर्ष में देशभर में ऐसे डेढ़ लाख wellness centers तैयार करने का लक्ष्‍य है।

भाइयो और बहनों, ये Health और wellness centers आयुष्‍मान भारत का बहुत अहम हिस्‍सा हैं। इन सेंटर्स में छोटी बीमारियों का इलाज, उनके इलाज के लिए दवाइयां तो उपलब्‍ध होंगी ही, साथ में यहां नि:शुल्‍क अनेक टेस्‍ट भी कराए जाने की व्‍यवस्‍था की जा रही है। इससे गंभीर बीमारियों के लक्षणों की पहचान पहले ही करने में मदद मिलेगी।

साथियों, सरकार देश के स्‍वास्‍थ्‍य क्षेत्र को सुधारने के लिए टुकड़ों-टुकड़ों में नहीं बल्कि सम्‍पूर्णता के साथ एक holistic तरीके से कार्य कर रही है। हर फैसला, हर नीति एक-दूसरे के साथ जुड़ी हुई है। एक तरफ सरकार affordable health care पर ध्‍यान दे रही है तो साथ ही preventive health care पर भी जोर दिया जा रहा है। योग हो, स्‍वच्‍छ भारत अभियान हो, open defecation free गांव बनाने का अभियान हो, ये सारे जरिए उन वजहों को दूर करने का प्रयास किया जा रहा है जिनसे गंभीर बीमारियां होती हैं। आपने हाल में पढ़ा होगा कि स्‍वच्‍छ भारत मिशन की वजह से तीन लाख बच्‍चों का जीवन बचने की संभावना पैदा हुई है। नवजात बच्‍चों का जीवन बचाने से जुड़े आंकड़ें हों या फिर प्रसूता माताओं के, देश बहुत तेजी के साथ आज स्‍वस्‍थ भारत बनने की दिशा में कदम उठा रहा है।

सरकार ने राष्‍ट्रीय पोषण मिशन जैसे अभियान भी शुरू किए हैं ताकि शुरूआती दिनों से ही शरीर को कुपोषित होने से रोका जा सके। वहीं मेडिकल फील्‍ड के human resource को बढ़ाने पर भी निरंतर कार्य किया जा रहा है। अनुमान है कि आयुष्‍मान भारत की वजह से आने वाले तीन वर्षों में देश में लगभग ढाई हजार नए अच्‍छी क्‍वालिटी के आधुनिक अस्‍पताल बनेंगे। इनमें से ज्‍यादातर टायर-2, टायर-3, छोटे-छोटे कस्‍बों में बनेंगे। और उसके कारण मध्‍यम वर्गीय परिवारों को एक नया व्‍यवसाय का क्षेत्र खुलने वाला है। रोजगार के नए अवसर पैदा होने वाले हैं।

इतना ही नहीं, इस पूरी प्रक्रिया में मेडिकल सेवाओं के साथ-साथ बीमा, तकनीकी कौशल, कॉल सेंटर, प्रबंधन, दवा उत्‍पादन, उपकरण निर्माण जैसे अनेक क्षेत्रों में लाखों-करोड़ों रोजगार की भी संभावनाएं पैदा होने वाली हैं। पैरामेडिकल स्‍टाफ से लेकर प्रशिक्षित डॉक्‍टरों की बहुत बड़ी मांग देश में पैदा होने वाली है। इसके साथ-साथ मेडिकल क्षेत्र से जुड़े start up के लिए भी नए अवसर बनेंगे। लाखों की संख्‍या में डॉक्‍टर, नर्स, हॉस्पिटल मैनेजमेंट से जुड़े लोगों को इन व्‍यवस्‍थाओं को चलाने का, इनसे जुड़ने का अवसर मिलेगा। यानी एक बहुत बड़ा मौका देश के निम्‍न-मध्‍यम वर्ग, मध्‍यम वर्ग के लिए भी है।

देश के गांवों, कस्‍बों, टीयर-1, टीयर-2 शहरों में health infrastructure को मजबूत करने के लिए, उसे आधुनिक बनाने के लिए सरकार निरंतर काम कर रही है। बीते चार वर्षों में देश में 14 नए एम्‍स की स्‍वीकृति दी गई। प्रधानमंत्री स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा योजना के तहत हर राज्‍य में कम से कम एक एम्‍स को बनाने का काम किया जा रहा है। इसके साथ ही देश में इस समय 82 नए सरकारी मेडिकल कॉलेज आज बनाए जा रहे हैं। सरकार का जोर है देश की तीन संसदीय या चार संसदीय सीटों के बीच में कम से कम एक मेडिकल कॉलेज जरूर हो।

इसी प्रयास के तहत आज यहां भी 600 करोड़ से अधिक की लागत से बनने वाले दो मेडिकल कॉलेज का शिलान्‍यास किया गया है। कोडरमा और चायबासा में बनने वाले इन मेडिकल कॉलेज में करीब 400 बेड की नवीं सुविधा जुड़ने वाली है।

भाइयो और बहनों, बीते चार वर्षों में देशभर में मेडिकल के लगभग 25 हजार अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट नई सीटें जोड़ी गई हैं। सरकार का लक्ष्‍य है कि आने वाले चार-पांच वर्षों के दौरान देश में एक लाख नए डॉक्‍टर तैयार करने की क्षमता विकसित हो। यानी भविष्‍य की आवश्‍यकताओं को देखते हुए infrastructure और human resource, दोनों पर ध्‍यान दिया जा रहा है।

साथियो, दीनदयाल उपाध्‍याय जी कहते थे कि शिक्षा की तरह ही स्‍वास्‍थ्‍य पर होने वाला खर्च, खर्च नहीं वो निवेश होता है। अच्‍छी शिक्षा और कौशल के अभाव में समाज और देश का विकास संभव नहीं है। उसी तरह नागरिक अस्‍वस्‍थ हो, तो सशक्‍त राष्‍ट्र का निर्माण नहीं हो सकता।

साथियो, मैं पूरी तरह आश्‍वस्‍त हूं कि इस योजना से जुड़े हर व्‍यक्ति के प्रयासों से आरोग्‍य मित्र और आशा, एएनएम बहनों के सहयोग से, हर डॉक्‍टर, हर नर्स, हर कर्मचारी, हर सर्विस प्रोवाइडर की समर्पित भावना से हम इस योजना को सफल बना पाएंगे, एक स्‍वस्‍थ राष्‍ट्र का निर्माण कर पाएंगे। न्‍यू इंडिया स्‍वस्‍थ हो, न्‍यू इंडिया सशक्‍त हो, आप सभी आरोग्‍य रहें, आयुष्‍मान रहें।

इसी कामना के साथ मैं प्रधानमंत्री जन-आरोग्‍य योजना आज रांची की धरती से, भगवान बिरसामुंडा की धरती से सवा सौ करोड़ देशवासियों के चरणों में समर्पित करता हूं।

आप सबका बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

भारत माता की – जय

भारत माता की – जय

भारत माता की – जय

मैं बोलूंगा आयुष्‍मान, आप बोलिए भारत।

आयुष्‍मान – भारत

आयुष्‍मान – भारत

आयुष्‍मान – भारत

आयुष्‍मान – भारत

आयुष्‍मान – भारत

बहुत-बहुत धन्‍यवाद।

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वंदेमातरम् ने उस विचार को पुनर्जीवित किया, जो हजारों वर्षों से भारतवर्ष की रग-रग में रचा-बसा था:लोकसभा में पीएम मोदी
December 08, 2025
Vande Mataram energised our freedom movement: PM
It is a matter of pride for all of us that we are witnessing 150 years of Vande Mataram: PM
Vande Mataram is the force that drives us to achieve the dreams our freedom fighters envisioned: PM
Vande Mataram rekindled an idea deeply rooted in India for thousands of years: PM
Vande Mataram also contained the cultural energy of thousands of years, it also had the fervor for freedom and the vision of an independent India: PM
The deep connection of Vande Mataram with the people reflects the journey of our freedom movement: PM
Vande Mataram gave strength and direction to our freedom movement: PM
Vande Mataram was the all-encompassing mantra that inspired freedom, sacrifice, strength, purity, dedication, and resilience: PM

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

मैं आपका और सदन के सभी माननीय सदस्यों का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं कि हमने इस महत्वपूर्ण अवसर पर एक सामूहिक चर्चा का रास्ता चुना है, जिस मंत्र ने, जिस जय घोष ने देश की आजादी के आंदोलन को ऊर्जा दी थी, प्रेरणा दी थी, त्याग और तपस्या का मार्ग दिखाया था, उस वंदे मातरम का पुण्य स्मरण करना, इस सदन में हम सब का यह बहुत बड़ा सौभाग्य है। और हमारे लिए गर्व की बात है कि वंदे मातरम के 150 वर्ष निमित्त, इस ऐतिहासिक अवसर के हम साक्षी बना रहे हैं। एक ऐसा कालखंड, जो हमारे सामने इतिहास के अनगिनत घटनाओं को अपने सामने लेकर के आता है। यह चर्चा सदन की प्रतिबद्धता को तो प्रकट करेगी ही, लेकिन आने वाली पीढियां के लिए भी, दर पीढ़ी के लिए भी यह शिक्षा का कारण बन सकती है, अगर हम सब मिलकर के इसका सदुपयोग करें तो।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

यह एक ऐसा कालखंड है, जब इतिहास के कई प्रेरक अध्याय फिर से हमारे सामने उजागर हुए हैं। अभी-अभी हमने हमारे संविधान के 75 वर्ष गौरवपूर्व मनाए हैं। आज देश सरदार वल्लभ भाई पटेल की और भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती भी मना रहा है और अभी-अभी हमने गुरु तेग बहादुर जी का 350वां बलिदान दिवस भी बनाया है और आज हम वंदे मातरम की 150 वर्ष निमित्त सदन की एक सामूहिक ऊर्जा को, उसकी अनुभूति करने का प्रयास कर रहे हैं। वंदे मातरम 150 वर्ष की यह यात्रा अनेक पड़ावों से गुजरी है।

लेकिन आदरणीय अध्यक्ष जी,

वंदे मातरम को जब 50 वर्ष हुए, तब देश गुलामी में जीने के लिए मजबूर था और वंदे मातरम के 100 साल हुए, तब देश आपातकाल की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। जब वंदे मातरम 100 साल के अत्यंत उत्तम पर्व था, तब भारत के संविधान का गला घोट दिया गया था। जब वंदे मातरम 100 साल का हुआ, तब देशभक्ति के लिए जीने-मरने वाले लोगों को जेल के सलाखों के पीछे बंद कर दिया गया था। जिस वंदे मातरम के गीत ने देश को आजादी की ऊर्जा दी थी, उसके जब 100 साल हुए, तो दुर्भाग्य से एक काला कालखंड हमारे इतिहास में उजागर हो गया। हम लोकतंत्र के (अस्पष्ट) गिरोह में थे।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

150 वर्ष उस महान अध्याय को, उस गौरव को पुनः स्थापित करने का अवसर है और मैं मानता हूं, सदन ने भी और देश ने भी इस अवसर को जाने नहीं देना चाहिए। यही वंदे मातरम है, जिसने 1947 में देश को आजादी दिलाई। स्वतंत्रता संग्राम का भावनात्मक नेतृत्व इस वंदे मातरम के जयघोष में था।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

आपके समक्ष आज जब मैं वंदे मातरम 150 निमित्त चर्चा के लिए आरंभ करने खड़ा हुआ हूं। यहां कोई पक्ष प्रतिपक्ष नहीं है, क्योंकि हम सब यहां जो बैठे हैं, एक्चुअली हमारे लिए ऋण स्वीकार करने का अवसर है कि जिस वंदे मातरम के कारण लक्ष्यावादी लोग आजादी का आंदोलन चला रहे थे और उसी का परिणाम है कि आज हम सब यहां बैठे हैं और इसलिए हम सभी सांसदों के लिए, हम सभी जनप्रतिनिधियों के लिए वंदे मातरम के ऋण स्वीकार करने का यह पावन पर्व है। और इससे हम प्रेरणा लेकर के वंदे मातरम की जिस भावना ने देश की आजादी का जंग लड़ा, उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम पूरा देश एक स्वर से वंदे मातरम बोलकर आगे बढ़ा, फिर से एक बार अवसर है कि आओ, हम सब मिलकर चलें, देश को साथ लेकर चलें, आजादी का दीवानों ने जो सपने देखे थे, उन सपनों को पूरा करने के लिए वंदे मातरम 150 हम सब की प्रेरणा बने, हम सब की ऊर्जा बने और देश आत्मनिर्भर बने, 2047 में विकसित भारत बनाकर के हम रहें, इस संकल्प को दोहराने के लिए यह वंदे मातरम हमारे लिए एक बहुत बड़ा अवसर है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

दादा तबीयत तो ठीक है ना! नहीं कभी-कभी इस उम्र में हो जाता है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

वंदे मातरम की इस यात्रा की शुरुआत बंकिम चंद्र जी ने 1875 में की थी और गीत ऐसे समय लिखा गया था, जब 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेज सल्तनत बौखलाई हुई थी। भारत पर भांति-भांति के दबाव डाल रहे थी, भांति-भांति के ज़ुल्म कर रही थी और भारत के लोगों को मजबूर किया जा रहा था अंग्रेजों के द्वारा और उस समय उनका जो राष्ट्रीय गीत था, God Save The Queen, इसको भारत में घर-घर पहुंचाने का एक षड्यंत्र चल रहा था। ऐसे समय बंकिम दा ने चुनौती दी और ईट का जवाब पत्थर से दिया और उसमें से वंदे मातरम का जन्म हुआ। इसके कुछ वर्ष बाद, 1882 में जब उन्होंने आनंद मठ लिखा, तो उस गीत का उसमें समावेश किया गया।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

वंदे मातरम ने उस विचार को पुनर्जीवित किया था, जो हजारों वर्ष से भारत की रग-रग में रचा-बसा था। उसी भाव को, उसी संस्कारों को, उसी संस्कृति को, उसी परंपरा को उन्होंने बहुत ही उत्तम शब्दों में, उत्तम भाव के साथ, वंदे मातरम के रूप में हम सबको बहुत बड़ी सौगात दी थी। वंदे मातरम, यह सिर्फ केवल राजनीतिक आजादी की लड़ाई का मंत्र नहीं था, सिर्फ हम अंग्रेज जाएं और हम खड़े हो जाएं, अपनी राह पर चलें, इतनी मात्र तक वंदे मातरम प्रेरित नहीं करता था, वो उससे कहीं आगे था। आजादी की लड़ाई इस मातृभूमि को मुक्त कराने का भी जंग था। अपनी मां भारती को उन बेड़ियों से मुक्ति दिलाने का एक पवित्र जंग था और वंदे मातरम की पृष्ठभूमि हम देखें, उसके संस्कार सरिता देखें, तो हमारे यहां वेद काल से एक बात बार-बार हमारे सामने आई है। जब वंदे मातरम कहते हैं, तो वही वेद काल की बात हमें याद आती है। वेद काल से कहा गया है "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" अर्थात यह भूमि मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूं।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

यही वह विचार है, जिसको प्रभु श्री राम ने भी लंका के वैभव को छोड़ते हुए कहा था "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी"। वंदे मातरम, यही महान सांस्कृतिक परंपरा का एक आधुनिक अवतार है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

बंकिम दा ने जब वंदे मातरम की रचना की, तो स्वाभाविक ही वह स्वतंत्रता आंदोलन का स्वर बन गया। पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण वंदे, मातरम हर भारतीय का संकल्प बन गया। इसलिए वंदे मातरम की स्‍तुति में लिखा गया था, “मातृभूमि स्वतंत्रता की वेदिका पर मोदमय, मातृभूमि स्वतंत्रता की वेदिका पर मोदमय, स्वार्थ का बलिदान है, ये शब्द हैं वंदे मातरम, है सजीवन मंत्र भी, यह विश्व विजयी मंत्र भी, शक्ति का आह्वान है, यह शब्द वंदे मातरम। उष्ण शोणित से लिखो, वक्‍तस्‍थलि को चीरकर वीर का अभिमान है, यह शब्द वंदे मातरम।”

आदरणीय अध्यक्ष जी,

कुछ दिन पूर्व, जब वंदे मातरम 150 का आरंभ हो रहा था, तो मैंने उस आयोजन में कहा था, वंदे मातरम हजारों वर्ष की सांस्‍कृतिक ऊर्जा भी थी। उसमें आजादी का जज्बा भी था और आजाद भारत का विजन भी था। अंग्रेजों के उस दौर में एक फैशन हो गई थी, भारत को कमजोर, निकम्मा, आलसी, कर्महीन इस प्रकार भारत को जितना नीचा दिखा सकें, ऐसी एक फैशन बन गई थी और उसमें हमारे यहां भी जिन्होंने तैयार किए थे, वह लोग भी वही भाषा बोलते थे। तब बंकिम दा ने उस हीन भावना को भी झंकझोरने के लिए और सामर्थ्य का परिचय कराने के लिए, वंदे मातरम के भारत के सामर्थ्यशाली रूप को प्रकट करते हुए, आपने लिखा था, त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,कमला कमलदलविहारिणी, वाणी विद्यादायिनी। नमामि त्वां नमामि कमलाम्, अमलाम् अतुलां सुजलां सुफलां मातरम्॥ वन्दे मातरम्॥ अर्थात भारत माता ज्ञान और समृद्धि की देवी भी हैं और दुश्मनों के सामने अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली चंडी भी हैं।

अध्यक्ष जी,

यह शब्द, यह भाव, यह प्रेरणा, गुलामी की हताशा में हम भारतीयों को हौसला देने वाले थे। इन वाक्यों ने तब करोड़ों देशवासियों को यह एहसास कराया की लड़ाई किसी जमीन के टुकड़े के लिए नहीं है, यह लड़ाई सिर्फ सत्ता के सिंहासन को कब्जा करने के लिए नहीं है, यह गुलामी की बेड़ियों को मुक्त कर हजारों साल की महान जो परंपराएं थी, महान संस्कृति, जो गौरवपूर्ण इतिहास था, उसको फिर से पुनर्जन्म कराने का संकल्प इसमें है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

वंदे मातरम, इसका जो जन-जन से जुड़ाव था, यह हमारे स्वतंत्रता संग्राम के एक लंबी गाथा अभिव्यक्त होती है।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

जब भी जैसे किसी नदी की चर्चा होती है, चाहे सिंधु हो, सरस्वती हो, कावेरी हो, गोदावरी हो, गंगा हो, यमुना हो, उस नदी के साथ एक सांस्कृतिक धारा प्रवाह, एक विकास यात्रा का धारा प्रवाह, एक जन-जीवन की यात्रा का प्रवाह, उसके साथ जुड़ जाता है। लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि आजादी जंग के हर पड़ाव, वो पूरी यात्रा वंदे मातरम की भावनाओं से गुजरता था। उसके तट पर पल्लवित होता था, ऐसा भाव काव्य शायद दुनिया में कभी उपलब्ध नहीं होगा।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

अंग्रेज समझ चुके थे कि 1857 के बाद लंबे समय तक भारत में टिकना उनके लिए मुश्किल लग रहा था और जिस प्रकार से वह अपने सपने लेकर के आए थे, तब उनको लगा कि जब तक, जब तक भारत को बाटेंगे नहीं, जब तक भारत को टुकडों में नहीं बाटेंगे, भारत में ही लोगों को एक-दूसरे से लड़ाएंगे नहीं, तब तक यहां राज करना मुश्किल है और अंग्रेजों ने बाटों और राज करो, इस रास्ते को चुना और उन्होंने बंगाल को इसकी प्रयोगशाला बनाया क्यूंकि अंग्रेज़ भी जानते थे, वह एक वक्त था जब बंगाल का बौद्धिक सामर्थ्‍य देश को दिशा देता था, देश को ताकत देता था, देश को प्रेरणा देता था और इसलिए अंग्रेज भी चाहते थे कि बंगाल का यह जो सामर्थ्‍य है, वह पूरे देश की शक्ति का एक प्रकार से केंद्र बिंदु है। और इसलिए अंग्रेजों ने सबसे पहले बंगाल के टुकड़े करने की दिशा में काम किया। और अंग्रेजों का मानना था कि एक बार बंगाल टूट गया, तो यह देश भी टूट जाएगा और वो यावच चन्द्र-दिवाकरौ राज करते रहेंगे, यह उनकी सोच थी। 1905 में अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया, लेकिन जब अंग्रेजों ने 1905 में यह पाप किया, तो वंदे मातरम चट्टान की तरह खड़ा रहा। बंगाल की एकता के लिए वंदे मातरम गली-गली का नाद बन गया था और वही नारा प्रेरणा देता था। अंग्रेजों ने बंगाल विभाजन के साथ ही भारत को कमजोर करने के बीज और अधिक बोने की दिशा पकड़ ली थी, लेकिन वंदे मातरम एक स्वर, एक सूत्र के रूप में अंग्रेजों के लिए चुनौती बनता गया और देश के लिए चट्टान बनता गया।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

बंगाल का विभाजन तो हुआ, लेकिन एक बहुत बड़ा स्वदेशी आंदोलन खड़ा हुआ और तब वंदे मातरम हर तरफ गूंज रहा था। अंग्रेज समझ गए थे कि बंगाल की धरती से निकला, बंकिम दा का यह भाव सूत्र, बंकित बाबू बोलें अच्छा थैंक यू थैंक यू थैंक यू आपकी भावनाओं का मैं आदर करता हूं। बंकिम बाबू ने, बंकिम बाबू ने थैंक यू दादा थैंक यू, आपको तो दादा कह सकता हूं ना, वरना उसमें भी आपको ऐतराज हो जाएगा। बंकिम बाबू ने यह जो भाव विश्व तैयार किया था, उनके भाव गीत के द्वारा, उन्होंने अंग्रेजों को हिला दिया और अंग्रेजों ने देखिए कितनी कमजोरी होगी और इस गीत की ताकत कितनी होगी, अंग्रेजों ने उसको कानूनी रूप से प्रतिबंध लगाने के लिए मजबूर होना पड़ा था। गाने पर सजा, छापने पर सजा, इतना ही नहीं, वंदे मातरम शब्द बोलने पर भी सजा, इतने कठोर कानून लागू कर दिए गए थे। हमारे देश की आजादी के आंदोलन में सैकड़ों महिलाओं ने नेतृत्व किया, लक्ष्यावधि महिलाओं ने योगदान दिया। एक घटना का मैं जिक्र करना चाहता हूं, बारीसाल, बारीसाल में वंदे मातरम गाने पर सर्वाधिक जुल्म हुए थे। वो बारीसाल आज भारत का हिस्सा नहीं रहा है और उस समय बारीसाल के हमारे माताएं, बहने, बच्चे मैदान उतरे थे, वंदे मातरम के स्वाभिमान के लिए, इस प्रतिबंध के विरोध में लड़ाई के मैदान में उतरी थी और तब बारीसाल कि यह वीरांगना श्रीमती सरोजिनी घोष, जिन्होंने उस जमाने में वहां की भावनाओं को देखिए और उन्होंने कहा था की वंदे मातरम यह जो प्रतिबंध लगा है, जब तक यह प्रतिबंध नहीं हटता है, मैं अपनी चूड़ियां जो पहनती हूं, वो निकाल दूंगी। भारत में वह एक जमाना था, चूड़ी निकालना यानी महिला के जीवन की एक बहुत बड़ी घटना हुआ करती थी, लेकिन उनके लिए वंदे मातरम वह भावना थी, उन्होंने अपनी सोने की चूड़ियां, जब तक वंदे मातरम प्रतिबंध नहीं हटेगा, मैं दोबारा नहीं धारण करूंगी, ऐसा बड़ा व्रत ले लिया था। हमारे देश के बालक भी पीछे नहीं रहे थे, उनको कोड़े की सजा होती थी, छोटी-छोटी उम्र में उनको जेल में बंद कर दिया जाता था और उन दिनों खास करके बंगाल की गलियों में लगातार वंदे मातरम के लिए प्रभात फेरियां निकलती थी। अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया था और उस समय एक गीत गूंजता था बंगाल में जाए जाबे जीवोनो चोले, जाए जाबे जीवोनो चोले, जोगोतो माझे तोमार काँधे वन्दे मातरम बोले (In Bengali) अर्थात हे मां संसार में तुम्हारा काम करते और वंदे मातरम कहते जीवन भी चला जाए, तो वह जीवन भी धन्य है, यह बंगाल की गलियों में बच्चे कह रहे थे। यह गीत उन बच्चों की हिम्मत का स्वर था और उन बच्चों की हिम्मत ने देश को हिम्मत दी थी। बंगाल की गलियों से निकली आवाज देश की आवाज बन गई थी। 1905 में हरितपुर के एक गांव में बहुत छोटी-छोटी उम्र के बच्चे, जब वंदे मातरम के नारे लगा रहे थे, अंग्रेजों ने बेरहमी से उन पर कोड़े मारे थे। हर एक प्रकार से जीवन और मृत्यु के बीच लड़ाई लड़ने के लिए मजबूर कर दिया था। इतना अत्याचार हुआ था। 1906 में नागपुर में नील सिटी हाई स्कूल के उन बच्चों पर भी अंग्रेजों ने ऐसे ही जुल्म किए थे। गुनाह यही था कि वह एक स्वर से वंदे मातरम बोल करके खड़े हो गए थे। उन्होंने वंदे मातरम के लिए, मंत्र का महात्म्य अपनी ताकत से सिद्ध करने का प्रयास किया था। हमारे जांबाज सपूत बिना किसी डर के फांसी के तख्त पर चढ़ते थे और आखिरी सांस तक वंदे मातरम वंदे मातरम वंदे मातरम, यही उनका भाव घोष रहता था। खुदीराम बोस, मदनलाल ढींगरा, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, रोशन सिंह, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, रामकृष्ण विश्वास अनगिनत जिन्होंने वंदे मातरम कहते-कहते फांसी के फंदे को अपने गले पर लगाया था। लेकिन देखिए यह अलग-अलग जेलों में होता था, अलग-अलग इलाकों में होता था। प्रक्रिया करने वाले चेहरे अलग थे, लोग अलग थे। जिन पर जुल्म हो रहा था, उनकी भाषा भी अलग थी, लेकिन एक भारत, श्रेष्ठ भारत, इन सबका मंत्र एक ही था, वंदे मातरम। चटगांव की स्वराज क्रांति जिन युवाओं ने अंग्रेजों को चुनौती दी, वह भी इतिहास के चमकते हुए नाम हैं। हरगोपाल कौल, पुलिन विकाश घोष, त्रिपुर सेन इन सबने देश के लिए अपना बलिदान दिया। मास्टर सूर्य सेन को 1934 में जब फांसी दी गई, तब उन्होंने अपने साथियों को एक पत्र लिखा और पत्र में एक ही शब्द की गूंज थी और वह शब्द था वंदे मातरम।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

हम देशवासियों को गर्व होना चाहिए, दुनिया के इतिहास में कहीं पर भी ऐसा कोई काव्य नहीं हो सकता, ऐसा कोई भाव गीत नहीं हो सकता, जो सदियों तक एक लक्ष्य के लिए कोटि-कोटि जनों को प्रेरित करता हो और जीवन आहूत करने के लिए निकल पड़ते हों, दुनिया में ऐसा कोई भाव गीत नहीं हो सकता, जो वंदे मातरम है। पूरे विश्व को पता होना चाहिए कि गुलामी के कालखंड में भी ऐसे लोग हमारे यहां पैदा होते थे, जो इस प्रकार के भाव गीत की रचना कर सकते थे। यह विश्व के लिए अजूबा है, हमें गर्व से कहना चाहिए, तो दुनिया भी मनाना शुरू करेगी। यह हमारी स्वतंत्रता का मंत्र था, यह बलिदान का मंत्र था, यह ऊर्जा का मंत्र था, यह सात्विकता का मंत्र था, यह समर्पण का मंत्र था, यह त्याग और तपस्या का मंत्र था, संकटों को सहने का सामर्थ्य देने का यह मंत्र था और वह मंत्र वंदे मातरम था। और इसलिए गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने लिखा था, उन्होंने लिखा था, एक कार्ये सोंपियाछि सहस्र जीवन—वन्दे मातरम् (In Bengali) अर्थात एक सूत्र में बंधे हुए सहस्त्र मन, एक ही कार्य में अर्पित सहस्त्र जीवन, वंदे मातरम। यह रविंद्रनाथ टैगोर जी ने लिखा था।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

उसी कालखंड में वंदे मातरम की रिकॉर्डिंग दुनिया के अलग-अलग भागों में पहुंची और लंदन में जो क्रांतिकारियों की एक प्रकार से तीर्थ भूमि बन गया था, वह लंदन का इंडिया हाउस वीर सावरकर जी ने वहां वंदे मातरम गीत गाया और वहां यह गीत बार-बार गूंजता था। देश के लिए जीने-मरने वालों के लिए वह एक बहुत बड़ा प्रेरणा का अवसर रहता था। उसी समय विपिन चंद्र पाल और महर्षि अरविंद घोष, उन्होंने अखबार निकालें, उस अखबार का नाम भी उन्होंने वंदे मातरम रखा। यानी डगर-डगर पर अंग्रेजों के नींद हराम करने के लिए वंदे मातरम काफी हो जाता था और इसलिए उन्होंने इस नाम को रखा। अंग्रेजों ने अखबारों पर रोक लगा दी, तो मैडम भीकाजी कामा ने पेरिस में एक अखबार निकाला और उसका नाम उन्होंने वंदे मातरम रखा!

आदरणीय अध्यक्ष जी,

वंदे मातरम ने भारत को स्वावलंबन का रास्ता भी दिखाया। उस समय माचिस के डिबिया, मैच बॉक्स, वहां से लेकर के बड़े-बड़े शिप उस पर भी वंदे मातरम लिखने की परंपरा बन गई और बाहरी कंपनियों को चुनौती देने का एक माध्यम बन गया, स्वदेशी का एक मंत्र बन गया। आजादी का मंत्र स्वदेशी के मंत्र की तरह विस्तार होता गया।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

मैं एक और घटना का जिक्र भी करना चाहता हूं। 1907 में जब वी ओ चिदंबरम पिल्लई, उन्होंने स्वदेशी कंपनी का जहाज बनाया, तो उस पर भी लिखा था वंदेमातरम। राष्ट्रकवि सुब्रमण्यम भारती ने वंदे मातरम को तमिल में अनुवाद किया, स्तुति गीत लिखे। उनके कई तमिल देशभक्ति गीतों में वंदे मातरम की श्रद्धा साफ-साफ नजर आती है। शायद सभी लोगों को लगता है, तमिलनाडु के लोगों को पता हो, लेकिन सभी लोगों को यह बात का पता ना हो कि भारत का ध्वज गीत वी सुब्रमण्यम भारती ने ही लिखा था। उस ध्वज गीत का वर्णन जिस पर वंदे मातरम लिखा हुआ था, तमिल में इस ध्वज गीत का शीर्षक था। Thayin manikodi pareer, thazhndu panintu Pukazhnthida Vareer! (In Tamil) अर्थात देश प्रेमियों दर्शन कर लो, सविनय अभिनंदन कर लो, मेरी मां की दिव्य ध्वजा का वंदन कर लो।

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

मैं आज इस सदन में वंदे मातरम पर महात्मा गांधी की भावनाएं क्या थी, वह भी रखना चाहता हूं। दक्षिण अफ्रीका से प्रकाशित एक साप्ताहिक पत्रिका निकलती थी, इंडियन ओपिनियन और और इस इंडियन ओपिनियन में महात्मा गांधी ने 2 दिसंबर 1905 जो लिखा था, उसको मैं कोट कर रहा हूं। उन्होंने लिखा था, महात्मा गांधी ने लिखा था, “गीत वंदे मातरम जिसे बंकिम चंद्र ने रचा है, पूरे बंगाल में अत्यंत लोकप्रिय हो गया है, स्वदेशी आंदोलन के दौरान बंगाल में विशाल सभाएं हुईं, जहां लाखों लोग इकट्ठा हुए और बंकिम का यह गीत गाया।” गांधी जी आगे लिखते हैंं, यह बहुत महत्वपूर्ण है, वह लिखते हैं यह 1905 की बात है। उन्होंने लिखा, “यह गीत इतना लोकप्रिय हो गया है, जैसे यह हमारा नेशनल एंथम बन गया है। इसकी भावनाएं महान हैं और यह अन्य राष्ट्रों के गीतों से अधिक मधुर है। इसका एकमात्र उद्देश्य हम में देशभक्ति की भावना जगाना है। यह भारत को मां के रूप में देखता है और उसकी स्तुति करता है।”

अध्यक्ष जी,

जो वंदे मातरम 1905 में महात्मा गांधी को नेशनल एंथम के रूप में दिखता था, देश के हर कोने में, हर व्यक्ति के जीवन में, जो भी देश के लिए जीता-जागता, जिस देश के लिए जागता था, उन सबके लिए वंदे मातरम की ताकत बहुत बड़ी थी। वंदे मातरम इतना महान था, जिसकी भावना इतनी महान थी, तो फिर पिछली सदी में इसके साथ इतना बड़ा अन्याय क्यों हुआ? वंदे मातरम के साथ विश्वासघात क्यों हुआ? यह अन्याय क्यों हुआ? वह कौन सी ताकत थी, जिसकी इच्छा खुद पूज्‍य बापू की भावनाओं पर भी भारी पड़ गई? जिसने वंदे मातरम जैसी पवित्र भावना को भी विवादों में घसीट दिया। मैं समझता हूं कि आज जब हम वंदे मातरम के 150 वर्ष का पर्व बना रहे हैं, यह चर्चा कर रहे हैं, तो हमें उन परिस्थितियों को भी हमारी नई पीडिया को जरूर बताना हमारा दायित्व है। जिसकी वजह से वंदे मातरम के साथ विश्वासघात किया गया। वंदे मातरम के प्रति मुस्लिम लीग की विरोध की राजनीति तेज होती जा रही थी। मोहम्मद अली जिन्ना ने लखनऊ से 15 अक्टूबर 1937 को वंदे मातरम के विरुद्ध का नारा बुलंद किया। फिर कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू को अपना सिंहासन डोलता दिखा। बजाय कि नेहरू जी मुस्लिम लीग के आधारहीन बयानों को तगड़ा जवाब देते, करारा जवाब देते, मुस्लिम लीग के बयानों की निंदा करते और वंदे मातरम के प्रति खुद की भी और कांग्रेस पार्टी की भी निष्ठा को प्रकट करते, लेकिन उल्टा हुआ। वो ऐसा क्यों कर रहे हैं, वह तो पूछा ही नहीं, न जाना, लेकिन उन्होंने वंदे मातरम की ही पड़ताल शुरू कर दी। जिन्ना के विरोध के 5 दिन बाद ही 20 अक्टूबर को नेहरू जी ने नेताजी सुभाष बाबू को चिट्ठी लिखी। उस चिट्ठी में जिन्ना की भावना से नेहरू जी अपनी सहमति जताते हुए कि वंदे मातरम भी यह जो उन्होंने सुभाष बाबू को लिखा है, वंदे मातरम की आनंद मठ वाली पृष्ठभूमि मुसलमानों को इरिटेट कर सकती है। मैं नेहरू जी का क्वोट पढ़ता हूं, नेहरू जी कहते हैं “मैंने वंदे मातरम गीत का बैकग्राउंड पड़ा है।” नेहरू जी फिर लिखते हैं, “मुझे लगता है कि यह जो बैकग्राउंड है, इससे मुस्लिम भड़केंगे।”

साथियों,

इसके बाद कांग्रेस की तरफ से बयान आया कि 26 अक्टूबर से कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक कोलकाता में होगी, जिसमें वंदे मातरम के उपयोग की समीक्षा की जाएगी। बंकिम बाबू का बंगाल, बंकिम बाबू का कोलकाता और उसको चुना गया और वहां पर समीक्षा करना तय किया। पूरा देश हतप्रभ था, पूरा देश हैरान था, पूरे देश में देशभक्तों ने इस प्रस्ताव के विरोध में देश के कोने-कोने में प्रभात फेरियां निकालीं, वंदे मातरम गीत गाया लेकिन देश का दुर्भाग्य कि 26 अक्टूबर को कांग्रेस ने वंदे मातरम पर समझौता कर लिया। वंदे मातरम के टुकड़े करने के फैसले में वंदे मातरम के टुकड़े कर दिए। उस फैसले के पीछे नकाब ये पहना गया, चोला ये पहना गया, यह तो सामाजिक सद्भाव का काम है। लेकिन इतिहास इस बात का गवाह है कि कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के सामने घुटने टेक दिए और मुस्लिम लीग के दबाव में किया और कांग्रेस का यह तुष्टीकरण की राजनीति को साधने का एक तरीका था।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

तुष्टीकरण की राजनीति के दबाव में कांग्रेस वंदे मातरम के बंटवारे के लिए झुकी, इसलिए कांग्रेस को एक दिन भारत के बंटवारे के लिए झुकना पड़ा। मुझे लगता है, कांग्रेस ने आउटसोर्स कर दिया है। दुर्भाग्य से कांग्रेस के नीतियां वैसी की वैसी ही हैं और इतना ही नहीं INC चलते-चलते MMC हो गया है। आज भी कांग्रेस और उसके साथी और जिन-जिन के नाम के साथ कांग्रेस जुड़ा हुआ है सब, वंदे मातरम पर विवाद खड़ा करने की कोशिश करते हैं।

आदरणीय अध्यक्ष महोदय,

किसी भी राष्ट्र का चरित्र उसके जीवटता उसके अच्छे कालखंड से ज्यादा, जब चुनौतियों का कालखंड होता है, जब संकटों का कालखंड होता है, तब प्रकट होती हैं, उजागर होती हैं और सच्‍चे अर्थ में कसौटी से कसी जाती हैं। जब कसौटी का काल आता है, तब ही यह सिद्ध होता है कि हम कितने दृढ़ हैं, कितने सशक्त हैं, कितने सामर्थ्यवान हैं। 1947 में देश आजाद होने के बाद देश की चुनौतियां बदली, देश के प्राथमिकताएं बदली, लेकिन देश का चरित्र, देश की जीवटता, वही रही, वही प्रेरणा मिलती रही। भारत पर जब-जब संकट आए, देश हर बार वंदे मातरम की भावना के साथ आगे बढ़ा। बीच का कालखंड कैसा गया, जाने दो। लेकिन आज भी 15 अगस्त, 26 जनवरी की जब बात आती है, हर घर तिरंगा की बात आती है, चारों तरफ वो भाव दिखता है। तिरंगे झंडे फहरते हैं। एक जमाना था, जब देश में खाद्य का संकट आया, वही वंदे मातरम का भाव था, मेरे देश के किसानों के अन्‍न के भंडार भर दिए और उसके पीछे भाव वही है वंदे मातरम। जब देश की आजादी को कुचलना की कोशिश हुए, संविधान की पीठ पर छुरा घोप दिया गया, आपातकाल थोप दिया गया, यही वंदे मातरम की ताकत थी कि देश खड़ा हुआ और परास्त करके रहा। देश पर जब भी युद्ध थोपे गए, देश को जब भी संघर्ष की नौबत आई, यही वंद मातरम का भाव था, देश का जवान सीमाओं पर अड़ गया और मां भारती का झंडा लहराता रहा, विजय श्री प्राप्त करता रहा। कोरोना जैसा वैश्विक महासंकट आया, यही देश उसी भाव से खड़ा हुआ, उसको भी परास्त करके आगे बढ़ा।

आदरणीय अध्यक्ष जी,

यह राष्ट्र की शक्ति है, यह राष्ट्र को भावनाओं से जोड़ने वाला सामर्थ्‍यवान एक ऊर्जा प्रवाह है। यह चेतना परवाह है, यह संस्कृति की अविरल धारा का प्रतिबिंब है, उसका प्रकटीकरण है। यह वंदे मातरम हमारे लिए सिर्फ स्मरण करने का काल नहीं, एक नई ऊर्जा, नई प्रेरणा का लेने का काल बन जाए और हम उसके प्रति समर्पित होते चलें और मैंने पहले कहा हम लोगों पर तो कर्ज है वंदे मातरम का, वही वंदे मातरम है, जिसने वह रास्ता बनाया, जिस रास्ते से हम यहां पहुंचे हैं और इसलिए हमारा कर्ज बनता है। भारत हर चुनौतियों को पार करने में सामर्थ्‍य है। वंदे मातरम के भाव की वो ताकत है। वंदे मातरम यह सिर्फ गीत या भाव गीत नहीं, यह हमारे लिए प्रेरणा है, राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों के लिए हमें झकझोरने वाला काम है और इसलिए हमें निरंतर इसको करते रहना होगा। हम आत्मनिर्भर भारत का सपना लेकर के चल रहे हैं, उसको पूरा करना है। वंदे मातरम हमारी प्रेरणा है। हम स्वदेशी आंदोलन को ताकत देना चाहते हैं, समय बदला होगा, रूप बदले होंगे, लेकिन पूज्य गांधी ने जो भाव व्यक्त किया था, उस भाव की ताकत आज भी हमें मौजूद है और वंदे मातरम हमें जोड़ता है। देश के महापुरुषों का सपना था स्वतंत्र भारत का, देश की आज की पीढ़ी का सपना है समृद्ध भारत का, आजाद भारत के सपने को सींचा था वंदे भारत की भावना ने, वंदे भारत की भावना ने, समृद्ध भारत के सपने को सींचेगा वंदे मातरम के भवना, उसी भावनाओं को लेकर के हमें आगे चलना है। और हमें आत्मनिर्भर भारत बनाना, 2047 में देश विकसित भारत बन कर रहे। अगर आजादी के 50 साल पहले कोई आजाद भारत का सपना देख सकता था, तो 25 साल पहले हम भी तो समृद्ध भारत का सपना देख सकते हैं, विकसित भारत का सपना देख सकते हैं और इस सपने के लिए अपने आप को खपा भी सकते हैं। इसी मंत्र और इसी संकल्प के साथ वंदे मातरम हमें प्रेरणा देता रहे, वंदे मातरम का हम ऋण स्वीकार करें, वंदे मातरम की भावनाओं को लेकर के चलें, देशवासियों को साथ लेकर के चलें, हम सब मिलकर के चलें, इस सपने को पूरा करें, इस एक भाव के साथ यह चर्चा का आज आरंभ हो रहा है। मुझे पूरा विश्वास है कि दोनों सदनों में देश के अंदर वह भाव भरने वाला कारण बनेगा, देश को प्रेरित करने वाला कारण बनेगा, देश की नई पीढ़ी को ऊर्जा देने का कारण बनेगा, इन्हीं शब्दों के साथ आपने मुझे अवसर दिया, मैं आपका बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं। बहुत-बहुत धन्यवाद!

वंदे मातरम!

वंदे मातरम!

वंदे मातरम!