दि. २०/११/२०११
मित्रों, यह सारी शक्तियां हैं. और यह शक्तियां गुजरात का भाग्य है, गुजरात का भविष्य है, भाईयों. और आज जब सदभावना मिशन में आपके बीच आया हूँ तब, सुदामापुरी में आया हूँ तब, पूज्य बापू की इस पुण्य भूमी में आया हूँ तब भाईयों-बहनों, देश और दुनिया को डंके की चोट पर मुझे कहना है कि आपकी जो भी गणित हो, आपकी जो भी गिनती हो, आपके जो भी हिडन अजेन्डा हो, आपने दस-दस साल से आपकी बुद्धि, शक्ति, सामर्थ्य सब कुछ खपा दिया लेकिन अब आप स्वीकार कर लो कि आप गुजरात की विकास यात्रा को रोक नहीं सकते. आपके लाख अवरोध भी इस विकास की चेतना को कभी भी बुझा नहीं सकते. आप सर पटक पटक कर थक जाओगे, लेकिन फिर भी यह छ: करोड गुजराती, उन्हों ने जो निश्चय किया है वह करके ही रुकने वाले हैं यह जरा लिख लेने की ज़रूरत है. भाईयों-बहनों, गुजरात... आज जब भी विकास की बात होती है, कहीं भी विकास की बात होती है तो तुरंत ही याद गुजरात ही आता है, पहचान गुजरात की ही होती है. किसी को गुजरात प्यारा लगता हो तो वो गुजरात की बात करता है और जिस को गुजरात पसंद न हो उसे भी बात तो गुजरात की ही करनी पडती है. भाईयों-बहनों, आप विकास बोलो तो सामने वाला गुजरात बोलता है और आप गुजरात बोलो तो सामने वाला विकास बोलता है. विकास और गुजरात जैसे कि समानार्थक शब्द बन गये हैं, एकार्थक भाव बन गये हैं. और यह बात निश्चित है भाईयों, सारी समस्याओं का समाधान, सारे दुखों का समाधान, सारी तकलीफों से मुक्ति का साधन अगर कोई हो तो वह सिर्फ़ विकास है. सब दुखों की एक दवा अगर कोई हो तो वह विकास है. एकमात्र अनमोल जड़ी-बूटी ऐसी है जो समाज जीवन के सारे दुख दूर कर सके और वह जड़ी-बूटी है विकास. ये कैमरा के मित्रों का सब ठीक हो गया हो तो बैठ जाओ न, पीछे उन लोगों को भी मजा आए, दीवार बन गई है... वाह! पोरबंदर में बहुत से अच्छे लोग रहते हैं, थोड़े बहुत तो होते ही हैं न... भाईयों-बहनों, विकास..! आज पूरे देश में चर्चा हो रही है कि गुजरात ने अद्भुत विकास किया है. हमने कभी सोचा, भाई? यह माहीगिरी का काम क्या मोदी के आने के बाद शुरु किया होगा? पूर्वजों से चलता आ रहा है. लेकिन आज गुजरात में से हीरों का एक्स्पॉर्ट होता है, उस से ज्यादा मछली का एक्स्पॉर्ट होता है. क्यों, पहले नहीं सूझा आपको? यह समुद्र मेरे आने के बाद आया है भाई पोरबंदर में? आप जरा ज़ोर से बोलो न, पहले भी था न? पहले भी मछुआरे थे न? लेकिन उनको कुछ पडी है? आप सोचो, मनमोहन सिंहजी की दिल्ली में सरकार बनने के बाद, साड़े चार हजार जितने मेरे मछुआरे भाईयों को ये पाकिस्तान के लोग अनुचित रूप से फंसा कर घसीट कर ले जाते हैं और उनकी जेलों में सड़ते हैं. अभी परसों, बाईस बोट उठा ले गए, अनेक लोगों को जेल की सलाखों के पीछे धकेल दिये और मुझे यह समाचार दिये मेरे अधिकारीओं ने. मेरे सदभावना मिशन जारी थे फिर भी कल मैंने प्रधानमंत्री को झिड़क कर एक पत्र लिखा है. यह क्या लगा रखा है आपने? हफ़्ते में तीन बार हमारे लोगों को वो उठा जाए? और अभी आप पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से मिले, तो पीठ थपथपा कर बोले कि ये प्रधानमंत्री तो शांति के दूत हैं. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शांति के दूत हैं..! मेरे मछुआरे भाईयों, कहो न आप, ये आपके बेटे को, पति को या भाई को उठा ले गये हैं वे क्या शांति के दूत हैं, भाई? जरा ज़ोर से बोलो ना... अरे, मनमोहन सिंहजी को सुनाई दे ऐसे बोलो... प्रमाणपत्र देते फिरते हो! मैं अभी चीन गया था तो गुजरात के लड़कों को वहाँ बन्द किया है तो उनसे आँख से आँख मिलाकर बात करके आया और आप? पीठ थपथपा कर शांति के दूत हैं, शांति के दूत हैं..! और यहाँ आप एक और पीठ थपथपा रहे थे और मेरी बाईस बोट उठाकर ले गये वे लोग. यह खेल चल रहा है. मैंने भारत के प्रधानमंत्री से कई बार कहा है. श्रीलंका के साथ भारत का एक करार है. वह करार ऐसा है कि इस देश की बोट उस तरफ चली गई हो, उस देश की बोट इस तरफ आई हो तो पन्द्रह दिनों में बैठ कर निर्णय लेनेका कि भाई मछली पकडने के अलावा कोई धोखाधड़ी करने तो नहीं आये थे न, तो फिर छोड देनेके. इस तरफ वाले उनको सौंप दें, वो वाले इनको दे दें, पन्द्रह दिनों में. मैंने कहा कि पाकिस्तान के साथ करार क्यों नहीं कर सकते? हर पन्द्रह दिनों में तय हो जाए कि भाई, इतने तुम्हारे आये थे, लो ले जाओ, इतने हमारे हैं, ले गये... नहीं करते हैं! जब तक अटलजी की सरकार थी, पाकिस्तान की सरकार हमारे मछुआरों की बोटों को हाथ नहीं लगा सकी थी, आज साड़े पाँच सौ जितनी, लाखों-करोडों रुपये की कीमत की बोटों पर कब्जा करके बैठ गया है पाकिस्तान. और उन बोटों का कैसे दुष्कर्मों के लिए उपयोग होता है? देश की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा हो उस प्रकार से बोटों का उपयोग हो रहा है. और उनकी सरकार को कहने के लिए इनको फुर्सत नहीं है. गुजरात का १६०० कि.मी. का समुद्र किनारा, सागर-खेडू योजना के द्वारा उनके विकास के लिए हमारी ज़हमत, सागर-खेडू विस्तार में पीने का मीठा पानी मिले इसके लिए सरकार की करोडों रुपये की योजनाएँ... लेकिन हमारा सागर-खेडू भाई मछली पकडने जाए और पाकिस्तान हिसाब चुकता करने के लिए उनको उठा कर ले जाए और दिल्ली की सरकार संख्या की गिनती करने के अलावा कुछ ना करे..! पहले तो यहाँ तक छोड़ जाते थे, अब कहाँ रख देते हैं? अमृतसर के पास, अब उसके पास जेब में एक रुपया भी न हो, उसको बेचारे को यहाँ तक आने का हो, वेरावल या पोरबंदर तक तो रास्ते में मूँगफली-चने खाने की भी तकलीफ़ हो ऐसे धोखेबाज़ी चलती है. और इस प्रकार का व्यवहार करके यहाँ के लोगों को दुखी करने वाले ये लोग... क्या इस भारत के विकास में मेरे मछुआरों का योगदान नहीं है? अरे, विदेशी मुद्रा यह मेरा मछुआरा एकत्रित करता है, कमा कर लाता है. आपके सोफ्टवेर इंजीनियरों जितनी कमाई करा देते हैं न, उतनी ही कमाई, विदेशी मुद्रा यह मेरा मछुआरा भाई लाता है उसका मुझे गर्व है. आपको नहीं पडी है अभी भी. और इसलिए मन में आक्रोश होता है, भाईयों. और फिर भी कुछ असर ही नही..!
यह महंगाई इतनी है, बोलो, दिल्ली वालों को कुछ असर है, नाम भी लेते हैं? कुछ बोलने का ही नहीं..! अभी एक मीटिंग में गया था. मैंने कहा सर, ऐसा क्यों? लोग इतना चिल्लाते हैं, घर में चूल्हा न जले, गरीब को तकलीफ़ पडे, आप क्यों ऐसे मुँह पर ताला लगाकर बैठ गये हैं, महंगाई का कुछ बोलते ही नहीं हो. सोनियाबहन ना बोलें, कोई ना बोले, महंगाई का तो बोले ही नहीं..! महंगाई की समस्या है कि नहीं, भाई? बहनों जरा जोर से बोलो, भीषण महंगाई है न? उन्हों ने वचन दिया था कि हम सौ दिन में महंगाई कम कर देंगे, लेकिन रोज़ बढ़ती है, रोज़. रोज़ बढ़ाते हैं..! लिहाजा मैंने उनसे पूछा, मैंने कहा कि चलो घटाओ तो नहीं लेकिन आप दुख तो व्यक्त करो, बोलो कि भाई प्रजा को तकलीफ़ पडती है उसका हमें दुख होता है, हम कुछ रास्ता ढूँढ निकालेंगे... ऐसा तो बोलो, नहीं बोलते हैं! मैंने कारण ढूँढ निकाला है वह बोलते क्यों नहीं है इसका. जब वे वोट लेने आए थे न तब उन्हों ने एक सूत्र लिखा था, आपको याद है? उन्हों ने सूत्र लिखा था, ‘आम आदमी के लिए वोट दें’. अब, महंगाई की समस्या सबसे ज़्यादा किसे? औरतों को. आम आदमी के लिए वोट मांगे थे इसलिए आम औरत की तकलीफ़ की उनको परवाह ही नहीं है, चिंता ही नहीं है और उसके कारण एक भी शब्द बोलते नहीं हैं.
भाईयों-बहनों, आज जब पोरबंदर की धरती पर आया हूँ तब, विकास की बात जब करता हूँ तब और आपने इतना सारा उत्साह और इतना सारा प्रेम बरसाया है तब २८१ करोड रुपयों के नये काम आज पोरबंदर की धरती के चरणों में जाएंगे. पोरबंदर में जो श्रमजीवी गरीब भाईयों हैं, उनका ख़्वाब होता है कि अपना खुद का एक घर हो तो अच्छा. इस सरकार ने तय किया है कि लगभग ८१ करोड से ज़्यादा रकम से २५०० जितने गरीबों के लिए मकान बना कर इन गरीबों को पोरबंदर में आवास देंगे. पोरबंदर शहर में पीने का पानी पहुँचे इसके लिए राज्य सरकार ने २६.३१ करोड रुपये देने का निर्धारित किया है लिहाजा पोरबंदर को पीने का पानी मिले. पोरबंदर-नरसिंह टेकरी नैशनल हाईवे के पास फ्लाई-ओवर ब्रिज के लिए ६२ करोड रुपये देने का निश्चित किया है. कुतियाणा के ६०० से ज़्यादा गरीबों के लिए आवास बनाने के लिए १२ करोड रुपये का आवंटन करने का तय किया है, लिहाजा झोंपडे की जिंदगी जीने वाले आदमी को कुछ आसरा मिल जाए, उसे आवास मिल जाए. पोरबंदर-अडवाणा २५ करोड रुपयों की लागत पर आधुनिक रास्ता बनाने का निश्चित किया है. मैं अडवाणा गया था और जिस दिन अडवाणा गया और मैंने सड़क देखी उसी दिन मैं तय कर के गया था कि पहले अडवाणा जो हिलता है वो जरा बन्द हो जाए तो फिर रोड बना दें. आज अडवाणा के भाईयों आए थे उन्हों ने मुझे कहा कि साहब, आपका वज्र जैसे कदम पडे कि अडवाणा में नीचे का कंपन बंद हो गया है, नीचे हिलना बंद हो गया है और अब उस अडवाणा को पक्का अच्छा सा रोड मिले इसके लिए २५ करोड रुपए की योजना घोषित की है. धेड विस्तार में १७ जितने अलग अलग रास्तों के सुधार के लिए ३२ करोड रुपये का आवंटन करने का निर्णय किया है. वाडी विस्तार में आयी कालोनियों और उसके मुख्य मार्गों को जोड़ने के लिए ८ करोड रुपयों की योजना की है जिसके कारण वाडी विस्तार में रहने वाले लोगों को भी सुविधा हो. प्रसिद्ध तीर्थक्षेत्र हरसिद्ध माता, देश भर के लोग एक श्रद्धा के लिए जैसे द्वारका आते हैं, वैसे ही हरसिद्ध माता की सेवा को भी आते होते हैं. उस स्थानक पर नैशनल हाईवे के लिए ५ करोड रुपए हरसिद्ध पीठ के आधुनिकीकरण के लिए खर्च करने का निर्धारित किया है. सागर-खेडु क्षेत्र में गरीब बस्ती में बिजली की सुविधा, पोरबंदर होस्पिटल के अन्दर ट्रॉमा सेन्टर, फिशनरी टर्मिनल के आधुनिकीकरण के लिए, किसानों के दूसरे पानी केन्द्रों बनाने के लिए, कुल २० करोड रुपयों का आयोजन किया है. भाईयों-बहनों, २८१ करोड रुपए राणावाव-कुतियाणा तालुका को जोड़ने वाले बहुत महत्व का भादर नदी के उपर का पुल बनाने के लिए, मेराणा-छत्राला के बीच रुपया ८ करोड की लागत से भादर नदी के उपर नया पुल बनाने का भी इस सरकार ने निश्चय किया है. राणावाव, कुतियाणा और पोरबंदर मिला कर १५ गाँवों की बस्ती को बारहमासी परिवहन की सुविधा मिले इसके बारे में आयोजन किया है. और इन गाँवों की जनता को मुख्य धोरी मार्ग पर १५ कि.मी. जितना लम्बा अंतर काटना पड़ता था, इस एक ही पुल से उनको ये जो चक्कर लगा कर जाना पडता था वो अब कल की बात हो जाएगी. भाईयों-बहनों, २८१ करोड रुपयों का यह नज़राना है. इस सदभावना मिशन के साथ आपने जैसे प्रेम दर्शाया है, तो हम भी हमारी ज़िम्मेदारी निभाते रहते हैं और इनको बढ़ाकर आगे बढ़ते रहते हैं.
ईयों-बहनों, गुजरात का जो विकास हुआ है उस विकास के जड़ में कई लोगों के मन में प्रश्न उठते हैं, कई लोग इसका अलग अलग तरीके से मूल्यांकन करते होते हैं, कुछ तो इस विकास को स्वीकार करने को ही तैयार नहीं हैं. अभी अभी वजुभाई कहते थे न कि भारत सरकार ने आंकड़े प्रसिद्ध किए हैं, पूरे देश में कितने लोगों को रोजगार मिला उसके आंकड़े भारत सरकार ने प्रसिद्ध किए हैं. और भारत सरकार किसकी बैठी है वह आपको मालूम है. उसमें ऐसा कहा है कि पूरे देश में जो रोजगार मिले, उसमें से ७१ प्रतिशत अकेले गुजरात में, २९ प्रतिशत में सारा हिंदुस्तान. आप विचार करो, एक ओर राम और एक ओर गाँव. यह रोजगार मिलता है किस कारण से? विकास के कारण संभव हुआ है. रूपालाजी ने कहा कि २५ लाख बोरी कपास होती थी, आज १ करोड २५ लाख बोरी कपास हुई. इस विकास का लाभ किसको मिला? किसान को मिला. भाईयों-बहनों, इस विकास का लाभ सब को मिलता है. शिक्षण में विकास हुआ है, कौशल्य वर्धन में विकास हुआ है, कृषि क्षेत्र ने नई ऊँचाइयाँ पार की है, माहीगिरी का उद्योग विकसित होता जा रहा है, जिंगा संवर्धन के काम चल रहे हैं, नवसारी के मछुआरे सीप में मोती पकाने के उद्योग की ओर मुडे हैं, वह पूरे १६०० कि.मी. के समुद्र किनारे पर मेरा मछवारा मोती पकाता हो जाए उस दिशा में मुझे ले जाना है. मोती का बाड़ा आपको पता होगा. और ये सब संभव है.
लेकिन यह विकास किस कारण से? कोई कहे कि मुख्यमंत्री अच्छे हैं इसलिए, कोई कहे कि सरकार अच्छी है इसलिए, कोई कहे कि नीतियाँ अच्छी है इसलिए. अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीके से इस विकास की तारीफ कर रहे हैं, स्वागत कर रहे हैं. कोई ऐसा कहे कि दिल्ली सरकार की वजह से, ऐसे भी होते हैं न कुछ..! ये सब है उनकी वजह से, आपके कारण. दिल्ली में तो करो, यहाँ तक रेला आयेगा तब आयेगी. वहाँ नहीं कर सकते हैं. भाईयों-बहनों, इस विकास के लिए हर किसी को अलग-अलग कारण दिखते होंगे, लेकिन सही कारण आज मैं कहना चाहता हूँ. इस विकास के पीछे का सच्चा कारण जो है वह दुनिया समझे इसके लिए मैंने यह सदभावना मिशन उठाया है. गुजरात प्रगति कर रहा है वह बात समझाने के लिए, उसका मूल कारण समझाने के लिए मैंने यह सदभावना उपवास आरम्भ किए हैं. गुजरात में बेटीयाँ रात को १२ बजे भी सोने के गहने पहन कर घर से निकल सकते हैं, इस माहौल के पीछे कौन सी ताकत पडी है वह समझाने के लिए मैंने इस सदभावना मिशन का आरम्भ किया है. यहाँ के बच्चे विद्यालय नहीं जाते थे, आज सौ के सौ प्रतिशत विद्यालय जाने लगे हैं. इसके पीछे कौन सी ताकत पडी है, उस ताकत का मूल क्या है वह बताने के लिए, दुनिया को डंके की चोट पर बताने के लिए मैंने इस सदभावना मिशन के उपवास का आरम्भ किया है. वह ताकत क्या है? आपको भी शायद अंदाजा नहीं होगा कि वह ताकत कौन सी है. आपके ध्यान में भी नहीं होगा. बेटा शाम को घर वापस आए और विद्यालय से आया हो तब उसके लिए माँ गरमा-गरम खाना बनाया हो, नाश्ता बनाया हो, बेटे को अंदाजा नहीं होता है कि इसके पीछे माँ ने क्या क्या, कितनी तकलीफ़ें उठाई हैं. बाप कमा कर महिने पर तनख़्वाह हाथ में रखता है और बेटा कहे कि मुझे साइकिल लानी है, स्कूटर लाना है और रुपये ले, तब बेटे को पता नहीं होता कि इसके पीछे कौन सा तप पडा है, कौन सा परिश्रम पडा है इसका उसे अंदाजा न हो तब यह बात करनी पडती होती है.
भाईयों-बहनों, गुजरात का यह जो विकास हुआ है, सारी दुनिया में डंके की चोट पर यह बात स्वीकृत हुई है इस के मूल में क्या है? इसके मूल में है गुजरात के छ: करोड भाईयों और बहनों, आप सब. यह विकास मेरे कारण नहीं है, यह विकास आपके कारण है. आपकी मेहनत के कारण हुआ है. और इसमें भी आपने जो किया है वह मुझे दुनिया को कहना है. गुजरात ने जो एकता रखी है, गुजरात ने जो भाईचारा रखा है, गुजरात ने जो शांति की है उसके कारण इस विकास की ऊँचाइयाँ पार हुई है. और हिंदुस्तान के कोने कोने में मुझे कहना है कि आप यदि विकास चाहते हैं तो आप भी इस ज़हर बोना बंद करो और विकास के मंत्र को स्वीकार करो. आपका राज्य भी पीछे नहीं रहेगा और गुजरात से भी आगे निकल जायेगा. मैं सब को निमंत्रण देता हूँ कि आओ, गुजरात के छ: करोड नागरिकों ने जो एकता, शांति, भाईचारा दिखाया है उसमें से सबक सिखो और आप भी प्रगति मे मार्ग पर आगे आओ.
भाईयों-बहनों, साठ साल का इतिहास क्या कहता है? भाई-भाई को लड़ाओ, कौम-कौम को लड़ाओ, एक गाँव को दूसरे गाँव से लड़ाओ, एक राज्य को दूसरे राज्य से लड़ाओ, पानी के मुद्दे पे लड़ाओ... बोलो, आपको आश्चर्य होगा, हिंदुस्तान के १४ से ज़्यादा राज्य ऐसे हैं कि जहाँ सिर्फ़ यह पानी कौन और कितना उपयोग करे इसका झगड़ा ५० साल से चलता है, सुप्रीम कोर्ट तक इसके केस चल रहे हैं, लड़ाईयाँ बंद होने का नाम नहीं लेती हैं. इस गुजरात की सदभावना देखो, इस नर्मदा का पानी राजस्थान को दिया. कोई टंटा नहीं, कोई विवाद नहीं, कोई फसाद नहीं. राजस्थान के हिस्से का जितना था उतना पानी बिना बवंडर को दे दिया गया और आज राजस्थान का भाई सुखी हुआ है, सदभावना इसका नाम होता है. मुझे उस वक्त भैरोंसिंह शेखावत मिले थे, भारत के उप-राष्ट्रपति थे. जसवंतसिंगजी भी थे. भैरोंसिंहजी ने मुझे खास उनके घर पर खाने पर बुलाया. मैंने कहा कि इतना आग्रह क्यों कि मेरा काम छोड कर आऊं? मुझे बोले कि कुछ भी हो, आपको आना ही पडेगा. मैं गया, मैंने कारन पूछा तो बोले कि कारन और कुछ नहीं है, हमारी राजस्थान की प्यासी भूमि को जिस तरह से नर्मदा का पानी दे दिया है न उसके लिए हमारा उत्साह प्रकट करने के लिए आज गुजरात के प्रतिनिधि के रूप में आपको बुलाया है, इसे सदभावना कहते हैं. परंतु अगर इस देश को एक रखना हो, इस देश में भाईचारा करना हो, यह भाषा-भाषी के, पानी के सारे झगड़ों में से बहार आना हो तो इस सदभावना के मंत्र को हिंदुस्तान के कोने-कोने में पहुँचाना पडेगा और गुजरात इसकी प्रयोग-भूमि है, गुजरात ने इसे सिद्ध किया है.
भाईयों-बहनों, एक ज़माना था कि गाँव के अंदर ऐसे गरीब बच्चे थे कि जिनको माँ का दूध पीने के बाद कभी ज़िंदगी में दूध देखने को नहीं मिला था. माँ के दूध के अलावा और कोई दूध उन्हों ने चखा नहीं था. मैंने एक बार गाँव के लोगों को विनती की कि भाई, आपके वहाँ डेरी चलती है, आप रोज़ सुबह डेरी में दूध भरने जाते हो, आपके गाँव में पन्द्रह-बीस-पच्चीस गरीब बालक हैं, छोटे-छोटे बच्चे हैं, जिन्हों ने कभी जीवन में दूध देखा नहीं है, क्या आप मेरी एक बात मानोगे? गाँव वालों ने कहा कि हाँ, मानेंगे. मैंने उनसे कहा कि एक काम करो, डेरी में जब दूध भरने आए, तो वहाँ पर आगे एक खाली कैन रखो और उसके उपर लिखो ‘भगवान का भाग’. और जो भी दूध भरने आए, किसी को ५० ग्राम देना हो तो वह ५० ग्राम दे, किसी को १०० ग्राम दान करना हो तो वह १०० ग्राम का दान करे, किसी को ५०० ग्राम दान देना हो तो ५०० ग्राम का करे और यह ‘भगवान का भाग’ का जो दूध जमा हो, लीटर, २ लीटर, ५ लीटर वो इस गाँव के गरीब परिवार के जो पन्द्रह बच्चे हैं जिन्हों ने दूध कभी चखा नहीं है, उन्हें रोज़ बुलाओ और दूध पिलाओ. भाईयों, आज गुजरात में हजारों गाँव ऐसे हैं कि जहाँ ‘भगवान का भाग’ लोग निकालते हैं और गरीब बच्चों को पिलाते हैं, इसका नाम सदभावना होता है. यह सदभावना जो चल रही है इसे मुझे आज दुनिया को दिखाना है. और इसलिए यह प्रजा जिस शकित से काम कर रही है उसमें मैं जो शब्द-साधना करता हूँ तो उसमें अब मैंने उपवास का यज्ञ शुरु करके उसके अंदर एक नई ऊर्जा पैदा करने का प्रयास किया है और उसे मैं जन-जन तक पहुँचाना चाहता हूँ.
एक ज़माना था कि आपके वहाँ पोरबंदर से किसी सगे-संबंधी बीमार हो और अहमदाबाद दाखिल किया हो, बेचारे की तबीयत खराब हो, अहमदाबाद उसकी तबीयत देखने जाना हो तो हमें फोन करके पता लगाना पडे कि भाई, अहमदाबाद जाना है लेकिन वह जो विस्तार में जाना है वहाँ कर्फ्यू-बर्फ्यू तो लगा नहीं है न? एक समय ऐसा था कि अहमदाबाद जाना हो तो आपको टेन्शन रहे कि शहर में कर्फ्यू तो नहीं होगा न? बच्चा अहमदाबाद में पढ़ता हो तो माँ-बाप को फिक्र हो कि कहीं इस लड़के की ज़िंदगी न चली जाए... यह गुजरात में रोज़ का था. कोई भी ऐसा अवसर न हो, जगन्नाथजी की रथयात्रा निकलने वाली हो तो लोग शादी के हॉल बुक किए हों तो कैन्सल कर दें कि ठहरो भाई, ये रथयात्रा निकल जाए तब फिर शांति हो तो शादी करेंगे वरना मेल नहीं पडेगा..! यह गुजरात की स्थिति थी. १२ महिनों में १५ बार कर्फ्यू होता था, चाकू चलते थे, रिक्शाएं जलती थीं, गल्ले जलते थे, दुकानें जलती थीं, बसें जलती थीं... अखबार भर भर के आते थे, पुलिस ऐसे डंडे मारती हों और गोलीयाँ चलाती हों ऐसे फोटो आते थे, टीअर ग़ैस के सेल छोड रहे हों ऐसे फोटो आते थे... भाईयों-बहनों, आज गुजरात के अंदर नामोनिशान तक मिट गया है. उसमें भी पुलिस सताये नहीं, पुलिस का त्रास नहीं, डंडेबाजी नहीं, कहीं टीअर गैस नहीं, कहीं गोलीबारी नहीं... कहीं किसी के घर नहीं जलते, दुकानें नहीं जलती, गल्ले नहीं जलते, रिक्शाएं नहीं जलती, कर्फ्यू का त्रास नहीं है..! एक समय ऐसा था कि बच्चा पैदा हो तो उसे मम्मी बोलना न आए, पापा बोलना न आए, लेकिन कर्फ्यू बोलना आए. अपने जन्म से उसे कर्फ्यू किसे कहते हैं वो पता हो. वो अपने चाचा को न पहचाने, लेकिन पुलिस अंकल को पहचानता हो. बारहों मास यही चले..! आज गुजरात से इस कर्फ्यू का निर्वासन हो गया है इसका कारण? एकता, शांति, भाईचारा जिसके कारण गुजरात ने एक नई ताकत प्राप्त की है. अन्यथा देश आज़ाद हुआ तब से बारबार यही सब चलता था. भाईयों-बहनों, गुजरात इसमें से बाहर आया है और विकास के एक नये मंत्र को लेकर आये हैं.
ये हमारे मित्रों, अक्सर गांधीजी का नाम लेते हैं. आज तक गांधी को जितना इस्तेमाल हो सके किया उन्हों ने लेकिन गांधीजी ने चाहा था ऐसा कोई काम करने का उनको सुझा नहीं. महात्मा गांधी ने जीवन भर ऐसी इच्छा व्यक्त की थी, इस देश में गौहत्या बंद होनी चाहिये वह महात्मा गांधी का जीवन पर्यंत एक सपना था. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश किया है, फिर भी गौहत्या बंद करने का कानून लाने की दिल्ली की सरकार में हैसियत नहीं है. आज इतने सारे भुवाआता आएं, इतने सारे हमारे मालधारी समाज के भाईयों आएं... आज मुझे गर्व से कहना है कि यह गुजरात सरकार है जिसने गौवंश रक्षा के लिए सख्त से सख्त कानून बनाये. एक माहौल बनाया है और इसकी असर भी है. अभी वडोदरा जिले में मुस्लिम समाज के लोग आगे आए हैं, गौशाला चलाने के लिए. यह सदभावना है, दोस्तों..! क्यों न बदले? लेकिन नहीं, आपको तो बदलना ही नहीं है, आपको तो मत पेटी भरने के अलावा कोई और कार्यक्रम ही नहीं है. सच्ची बात कहने की आप में हिम्मत नहीं है, हम में है और हम डंके की चोट पर कहते हैं कि हमारे मन यह छ: करोड लोग हमारे हाथ, पैर और दिल है, वे हमारे लिए कोई मत का परचा नहीं है. वो जीता जागता जन समाज है जो ईश्वर का रूप होता है और उसके चरणों में हमने सिर रखा हुआ है. इस भूमि के वास्ते हम काम करने वाले लोग हैं.
भाईयों-बहनों, इस समाज पुरुष के चरणों में, इस समाज देवता के चरणों में सदभावना कैसी शक्ति पैदा करती है इसका आज गुजरात ने अनुभव किया है. वाद-विवाद, हंगामा, वोट बैंक की राजनीति, जातियों के झगडे... आप विचार करो, जातियों के झगडे कितने थे हमारे वहाँ? कोई कौम बाकी थी? हर एक को दूसरी के साथ लड़ाइ उठी ही हो, कोई बाकी नहीं, साहब. समय समय पर उनकी राजकीय रोटी पकाने के लिए कौम कौम को लड़ाते थे, मैं उनका नाम नहीं लेना चाहता... कोई कौम ऐसी नहीं होगी कि जिनको अन्य कौमों के साथ लड़ाइ न हुई हो. और पूरे देश में ऐसा हुआ है. जातिवाद का ज़हर ऐसा फैलाया है... पटेलों को दरबारों के साथ लड़ाये और दरबारों को पटेलों के साथ लड़ाये, और भी सब जातियां... होस्टेल में लड़के पढ़ने जाए तो वहाँ भी दो पलड़े करवा दिये हों, अस्पताल हो तो उसमें कमरे अलग-अलग करवा दें कि भाई, आपके २० बिस्तर इस तरफ रखो और हमारे २० उस ओर ले जाओ, वरना यहाँ पर भिड़न्त हो जायेगी. क्यों, ये ज़हर फैलाने के काम करने के हैं? आपके मत भरने के लिए, मत पेटीयाँ भरने के लिए समाज को खत्म कर डालने का है? भाईयों-बहनों, सदभावना मिशन के साथ मुझे हिंदुस्तान के लोगों को कहना है कि भाईयों-बहनों, यह जातिवाद का ज़हर किसी का भला करने वाला नहीं है, हमें ही नष्ट करने वाला है और गुजरात उसमें से बाहर आ गया है. जातिवाद के ज़हर से बाहर आया है इसके कारण आज गुजरात प्रगति कर रहा है. सारे गरीब समान हो भाई, सारे पीड़ित समान हो, उसमें भला जाति का रंग कैसा? गरीब वो गरीब है, पीड़ित वो पीड़ित है, विकलांग वो विकलांग है, सुरदास वो सुरदास है, वे सारे मानवी के अंग हैं, उन सब की चिंता समान रूप से करने का विचार ही सदभावना का संदेश है.
भाईयों-बहनों, ये लोग गांधीजी का नाम लेते रहते हैं. मुझे एक घटना याद आ रही है. एक बार कोई गया गांधीजी के पास क्योंकि गांधीजी कुष्ठरोगीयों की सेवा करते थे. गांधीजी हर गुरुवार को सारे काम छोड कर जो कोष्ठरोगी हो उनकी सेवा करते थे. और हमारे पोरबंदर जिले में भी कुष्ठरोगीयों की सेवा के काम चलते हैं. गांधीजी कुष्ठरोगीयों की सेवा करते थे. जीवनपर्यंत कुष्ठरोगीयों की सेवा की. एक बार एक कुष्ठरोगीयों की अस्पताल का उद्घाटन होने वाला था. उस अस्पताल के कर्ताहर्ता लोग गांधीजी के पास गये और उनको विनती की कि वे अस्पताल का उद्घाटन करने आए. तो गांधीजी का जवाब था कि मैं कुष्ठरोग की अस्पताल का उद्घाटन करने नहीं आऊंगा, जिस दिन आप उसको ताला लगाने के लिए मुझे बुलाओगे, तब मैं उसको ताला देने आऊंगा..! पहली नजर में तो किसी को ऐसा लगे कि गांधीजी ऐसा अहंकार करते थे? लेकिन गांधीजी के दिल में था कि कुष्ठरोग समाप्त हो, तब मुझे अस्पताल को ताला लगाने आना है. भाईयों-बहनों, गांधीजी को अपने जीवन के दौरान कुष्ठरोग की अस्पताल को ताला देने का अवसर नहीं मिला था, लेकिन मैं भाग्यवान हूँ, मुझे अस्पताल को ताला लगाने का अवसर मिला. पूरे देश में कुष्ठरोग नाबूदी में, आज गुजरात ने उत्तम सेवा करके, गुजरात ने इसके सारे परैमिटरों में से उसे बहार निकाल दिया है. और आप अब्दूल कलाम, भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति, यदि इन्टर्नेट पर जाएंगे और उनका कोई भी भाषण आप पढ़ेंगे तो उन्हों ने गुजरात पर कुष्ठरोग निवारण के उपर एक पैराग्राफ तो ज़रूर लिखा हो, लिखा हो और लिखा ही हो. वे दुनिया में जहाँ भी जाए, वहाँ कहते थे कि गुजरात ने कुष्ठरोग निवारण के लिए कितना काम किया है. यह महात्मा गांधी का सपना था, वह सपना हमने साकार किया है, भाईयों.
महात्मा गांधी कहते थे ट्रस्टीशिप का सिद्धांत, लोगों के भरोसे छोडो. हमने आज गुजरात के विद्यालयों में एक अभियान चलाया है. विद्यालयों के अन्दर एक छोटी सी दुकान करवाते हैं. हमारे शिक्षक मित्रों बच्चों के संस्कार करते हैं. वह दुकान ऐसी होती है कि जिसमें बच्चों को चाहिए ऐसी तमाम चीज़ें होती हैं. नोटबुक हो, पेंसिल हो, रबर हो, पुस्तकें हों, सारी चीज़ें हों और वहाँ लिखा हुआ हो और एक डिब्बा पडा हो. वहाँ कोई भी आदमी हाजिर न हो, बच्चों को स्वयं चीज़ें लेने की और हिसाब करके पैसे चुकाने के. कोई लेने वाला नहीं, कोई देने वाला नहीं, सब खुले-खुला स्वयं ही करने का. भाईयों-बहनों, पूरे गुजरात के अन्दर यह कार्यक्रम विद्यालयों में चलता है लेकिन कहीं भी एक भी बालक ने एक भी वस्तु की चोरी नहीं की है, एक भी पैसे की चोरी नहीं की है और पूरे पैसे चुकाये हैं. ये ट्रस्टीशिप के संस्कार विद्यालय में देने का काम हमारी सरकार करती है. महात्मा गांधी ने उनसे कहा था लेकिन उसका अमल कराके, बच्चों में संस्कार आए इसके लिए हमने अभियान उठाया है. गुजरात के अन्दर भूकम्प हूआ, भूकम्प में विद्यालयों के लिए कमरे बनाने थे. विद्यालय के कमरे बनाने थे तो इस कच्छ के अंदर इतने सारे कमरे कि यदि सरकारी तंत्र बनाने जाए तो कब बने? हमने एक विचार किया कि गाँव के अन्दर लोगों को इकठ्ठा करते हैं. भूकम्प पीड़ित थे, उनके अपने घर गिर गये थे, परिवार में कोई न कोई मरा था... गाँव के लोगों को मैंने कहा कि पहला काम हमें विद्यालयों के लिए कमरे करने हैं, यह नकशा है, हम आपको नकशा देते हैं. आप काम पूरा करो, हम आपको पैसे देते हैं. सीमेंट-बैंक में से सीमेंट ले आओ, लोहा-बैंक में से लोहा ले आओ, पतरा-बैंक में से पतरे ले आओ और इस डिज़ाइन के अनुसार आप काम पूरा करो. गाँव की कमिटीयां बनीं, रुपये मैंने उनको दे दिये, गाँव के लोगों ने मिल कर तय किया कि दो कमरे हों तो हम तीन बनायें, तीन हों तो पाँच बनायें, छोटे हों तो बड़े बनायें, जमीन दान में देनी पडे तो जमीन दें लेकिन अच्छा विद्यालय बनाएं..! भाईयों-बहनों, इस भूकम्प ग्रस्त विस्तार के अन्दर जहां जहां विद्यालय बने, हमने पैसे दिये थे लोगों को. ये भूकम्प पीड़ित लोग थे, वे सीमेंट अपने घर ले जा सकते थे, वे लोहा अपने घर ले जा सकते थे, वे पतरे अपने घर ले जा सकते थे, उनको विद्यालय बनाने में दो-पाँच रुपये निकालने होते तो निकाल सकते थे लेकिन मुझे गर्व के साथ कहना है कि इस ट्रस्टीशिप के सिद्धांत के कारण, उन पर भरोसा रखने के कारण, काम पूरा होने के बाद इन गाँव के लोगों ने बाकी बचे पैसे सरकार में वापस जमा कराये और वह रक़म लगभग तीन करोड रुपये थी. यह ट्रस्टीशिप का सिद्धांत है. महात्मा गांधी का सपना हम कैसे साकार करते हैं वह मैं आपको दिखाना चाहता हूँ.
महात्मा गांधी कहते थे, ‘ग्राम राज्य से राम राज्य’. पूज्य बापू को श्रद्धांजलि देनी हो तो कैसे दें? सबसे उत्तम श्रद्धांजलि कौन सी? मैं तो हमेशा कहता हूँ कि पूज्य बापू को एक चीज़ सबसे प्रिय थी और वो प्रिय चीज़ थी स्वच्छता. महात्मा गांधी स्वच्छता के विषय में बहुत आग्रही थे, स्वच्छता के बारे में कोई भी समाधान नहीं करते थे. भाईयों-बहनों, इस राज्य सरकार ने इसका एक अभियान उठाया और गाँव-गाँव शौचालय बनाने का अभियान उठाया. विद्यालय थे, बेटीयों के लिए अलग शौचालय नहीं थे. शौचालय बनाने का अभियान मैंने उठाया और यह काम जब करता था तब हर पल मुझे महात्मा गांधी की बात याद आती थी. आज गुजरात के अन्दर पिछले पचास वर्ष में जितने शौचालय बने होंगे उससे ज़्यादा शौचालय इस दस साल में बनाये हैं जिसकी वजह से माँ-बहन को शर्मिन्दा न होना पडे, उन्हें खुले में हाजत न जाना पडे, माँ-बहनों का स्वास्थ्य न बिगड़े इसकी चिंता करने का काम इस सरकार ने किया है और महात्मा गांधी के सपने को साकार करने की बात की है.
महात्मा गांधी कहते थे कि हिंदुस्तान गाँवों का देश है, गाँव समृद्ध होगा तो देश समृद्ध होगा. और गाँव के अन्दर बहनों को काम देने का काम हमने शुरु किया. हस्तकला करे, कारीगरी करे, छोटे मोटे उद्यम के काम बहनें करें. गरीबी की रेखा के नीचे इस ‘मिशन मंगलम’ अंतर्गत गुजरात के अन्दर अढ़ाई लाख जितने छोटे छोटे सखी मंडल बने हैं, अढ़ाई लाख जितने सखी मंडल. पचीस लाख से ज्यादा बहनें इन सखी मंडलों की मेम्बर बनी हैं. गरीब परिवार की बहनें हैं, कोई रोज़ का एक रुपया बचाती है, कोई रोज़ का पाँच रुपया बचाती है, वे बहनें पूँजी जमा करती है. छ: महीने तक उनका कारोबार व्यवस्थित रूप से चले तो सरकार उसमें थोडी रक़म जोड़ती है और फिर बैंकों से पैसे दिलाती है. मुझे गर्व के साथ यह कहना है कि गुजरात के गाँव की गरीब बहन गुजरात के आर्थिक विकास में भागीदार बने इसके लिए, वह आर्थिक प्रवृत्ति में जुड़े, आत्मसम्मान से ज़िंदगी जीये इसके लिए अभियान उठाया है और इसके कारण आज गुजरात के गाँवों की गरीब बहनों के पास, सखी मंडल की बहनों के पास चौदह सौ करोड रुपये जितनी भारी रक़म है, चौदह सौ करोड रुपये. एक हजार चार सौ करोड और एक फूटी कौड़ी भी इधर उधर नहीं हुई है. और मेरा सपना है, माताओं-बहनों, आनेवाले दो-तीन सालों में यह आँकड़ा मुझे पाँच हजार करोड पर पहुँचाना है. पाँच हजार करोड रुपये गुजरात की गरीब परिवारों की माँ-बहनों के हाथ में हो, और कोई न कोई छोटी प्रवृत्ति करती हो, खाखरा बनाती हो, पापड बनाती हो, सिलाई काम करती हो... यहाँ मैं गया, बहनों ने मोती के छोटे-मोटे काम किये थे. मैंने पूछा कि क्या काम किया है? तो बोले कि हमारा पचास हजार रुपये का काम होता है और हम सारी बहनों को हर महीने बारह सौ – पन्द्रह सौ रुपये मिल जाते हैं, हमारे घर की आय में पूरक बनते हैं. यह आत्मनिर्भरता निर्माण करने का काम इस राज्य सरकार ने गांधीजी के सपने को साकार करने के लिए किया है.
महात्मा गांधी कहते थे कि लोकसभा का चुनाव हो, विधानसभा का चुनाव हो, लेकिन जब गाँवों में चुनाव होते हैं तब पूरा गाँव दो हिस्सों में बँट जाता है. गाँवों में चुनाव के कारण बेटीयाँ ससुराल से वापस आती हैं. इतने सारे दंगे होते हैं, माहौल बिगड जाए. महात्मा गांधी, विनोबाजी कहते रहते थे कि गाँव में चुनाव सर्वसम्मति से होना चाहिये, गांव में विखवाद नहीं होने चाहिये, गाँव एक रहना चाहिये. महात्मा गांधीजी के विचारों को विनोबाजी ने व्यक्त किया थे. हम समरस योजना लाएँ और आज गुजरात में पचास प्रतिशत से ज्यादा गाँव ऐसे हैं कि जहाँ गाँव के लोग मिलझुल कर अपनी बॉडी बनाते हैं. कोई चुनाव नहीं होता है, सब मिलझुल कर काम करते हैं और प्रगति करते हैं. ये समरस गाँव को आगे बढ़ाने के लिए अभी तो मैंने तीन लाख और पाँच लाख रुपये ज्यादा देने की घोषणा की है जिससे गाँव में एकता रहे. यही हमारी सदभावना है. मुझे एकता के माहौल को ज्यादा मजबूत करना है, बैर-झैर से लोगों को मुक्त कराना है. गाँव में से बैर-झैर जाना चाहिए, शहर में से बैर-झैर जाना चाहिए, राज्य में से बैर-झैर जाना चाहिए, राज्य-राज्य के बीच का बैर-झैर जाना चाहिए, देश भर में से बैर-झैर जाना चाहिए इसके लिए यह सदभावना मिशन का काम उठाया है.
भईयों-बहनों, यह एक पवित्र काम है. किसीका विरोध करने में मैं अपना टाइम नहीं बिगाडता. जिनको जो कहना हो वो कहे, जितना कहना हो उतना कहे, डिक्शनेरी में से जितनी गालीयों का प्रयोग करना है करें, जितने झूठे आरोप लगाने हों लगाते रहें... मेरा मंत्र एक ही है – छ : करोड मेरे गुजराती, छ : करोड मेरे गुजराती, छ : करोड मेरे गुजराती... उनका विकास, उनका विकास, उनका विकास... ये एक ही काम मुझे करना है, मुझे उस झंझट में नहीं पडना है, टाइम बिगाडना नहीं है लेकिन जो लोग हरदम कीचड उछालते हैं, अक्सर दोषारोपण करते हैं, गंदी बातें करते हैं, उनसे मुझे इतना ही कहना है कि आप जितना कीचड ज़्यादा उछालोगे उतना ही कमल ज़्यादा खिलने वाला है. कीचड जितना ज़्यादा उछालोगे उतना ही कमल ज़्यादा खिलने वाला है और इसलिए ये दिल्ली में बैठे आपके बादशाहों को खुश करने के लिए तुम लोगों ने जो दुष्टता शुरु की है न उसे गुजरात की जनता कभी भी स्वीकारने वाली नहीं है. भाईयों-बहनों, आज सुबह से ही यह काफिला लगा था. मुझे पानी पिने तक का वक्त नहीं मिलता था, बैठने का समय नहीं मिलता था. ऐसा दृश्य मित्रों, शायद ही कभी देखने को मिलता है, कभी कभार ही देखने को मिले. इस सदभावना मिशन में मैं जहाँ गया हूँ वहाँ यही उमंग, यही उत्साह... लेकिन अखबार में या टी.वी. पर देखो तो कुछ अलग ही हो और आपको ऐसा लगे कि हम वहाँ इतना सारा जो देखकर आये हैं और अखबार में तो कुछ और ही आया..! तो आपको लगता होगा कि ये पत्रकार भाईयों बैठे हैं, ये टी.वी. वालों ने पूरे दिन बैठे बैठे किया क्या? मेरी आपसे विनती है कि आप इनके उपर कोई आरोप मत लगाना. कल आपको कोई फोटो न दिखे तो इन फोटोग्राफरों पर गुस्सा मत करना. कल अगर आपको कुछ अच्छा पढ़ने को न मिले तो, ये सभी सुबह से भूखे बैठे हैं, उनके उपर गुस्सा मत करना, उनका कोई दोष नहीं है. वे तो बेचारे सुबह से तत्पर बैठे हैं, मेहनत कर रहे हैं. अभी बेचारे अच्छा सा रिपोर्ट तैयार करेंगे, पन्ने भर भर के तैयार करेंगे, चौखटे बनायेंगे, अच्छे अच्छे वाक्य लेंगे, फोटो इकट्ठा करेंगे, सारी मेहनत करेंगे... लेकिन दिल्ली से फोन आयेगा, उनके सेठ पर आयेगा. टी.वी. पर फोन जायेगा कि खबरदार, मोदी का तो छापना ही नहीं. पचास हजार हो तो पाँच हजार ही लिखना, चार हजार उपवास पर बैठे हों तो चार सौ ही लिखना... और अगर गलती से भी उलटा करोगे तो फिर अच्छा नहीं होगा, ऐसे रोज़ सेठीयों को फोन करे. यहाँ पोरबंदर में तो एक दिन पहले ही फोन किया, बोलो. पोरबंदर में खास स्पेशल कार्यक्रम किया. वैसे शाम को तो फोन करते ही हैं, लेकिन यहाँ पोरबंदर में तो कल भी किए कि भाई, इज्जत का सवाल है, हाँ. यहाँ जो भी हो, लेकिन अखबार में तो आप अलग ही छापना. ये सब होगा... सेठीयों को धमकी देते हैं कि अगर आप हमारी बात नहीं छापेंगे और मोदी की छापेंगे न तो आपका कागज का कोटा कैन्सल कर देंगे, तुमने टी.वी. पर अगर मोदी को ठीक से दिखाया तो तुम्हारी टी.वी. चैनलें बंद करवा देंगे... ऐसी धमकीयां देते हैं! भाईयों-बहनों, ये दिल्ली के बादशाहों की धमकी की वजह से शायद अखबार में सच्ची बात न भी आये, टी.वी. में शायद सच्ची बात न भी आये, लेकिन मुझे भरोसा है भाईयों, ये दिल्ली के लोग लिख लें कि अखबार में भले ही आपको जगह मिलती हो, टी.वी. में भले ही आप दिखते हों लेकिन जनता जनार्दन के दिलों में तो हमें ही जगह मिली है और वही हमारी शक्ति है और उसीके भरोसे दस दस सालों से साहब, कल्पना बाहर की गंदगी उड़ती है लेकिन जरा भी विचलित हुए बगैर सिर्फ़ और सिर्फ़ यही मेरे परमात्मा हैं, यही मेरे ईश्वर हैं, ये मेरी जनता जनार्दन ही मेरा भगवान है, उनकी सेवा में लग गया हूँ.
आज पोरबंदर की धरती पर सदभावना मिशन के साथ इस उपवास के यज्ञ में आपके साथ बैठे हुए चार हजार से ज़्यादा भाईयों, इसमें जुडे और पचास हजार से ज़्यादा लोगों का जनसमूह... मैं दस साल में पोरबंदर सैकड़ों बार आया हूँ. मैंने पोरबंदर की धरती पर ऐसा एक भी कार्यक्रम देखा नहीं है. मैंने पोरबंदर की धरती पर मेरा एक भी कार्यक्रम ऐसा देखा नहीं है ऐसा कार्यक्रम आज समाज के सब लोगों ने आकर किया. आपको जितने अभिनंदन दूँ उतने कम हैं. आप सब बहुत बहुत अभिनंदन के अधिकारी हैं. प्रशासन ने जो सुंदर आयोजन किया इसके लिए वे भी अभिनंदन के अधिकारी हैं. सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजकीय कार्यकर्ताओं, समाज के अग्रणीयों, शैक्षणिक क्षेत्र के अग्रणीयों, शिक्षकों, आचार्यों... सब लोगों को मैं देखता था कि कितने उत्साह से इस कार्य को आगे बढ़ाया है, ये सारे लोग अभिनंदन के अधिकारी हैं. हम इस सदभावना के मंत्र को गाँव गाँव पहुंचाए, घर-घर पहुंचाए, गाँव में छोटे-बड़े विवाद हों तो आज निश्चित करें कि साथ मिल कर उसे भी खत्म कर देना है. म्ंदिर का कोई झगडा हो तो खत्म कर देना है, कोई परिवार के साथ अनबन हुई हो तो खत्म कर देनी है और एकता के साथ, भाईचारे के साथ, सदभावना की बात ले कर, सिर्फ़ और सिर्फ़ विकास, सिर्फ़ और सिर्फ़ विकास, सिर्फ़ और सिर्फ़ विकास, सिर्फ़ और सिर्फ़ विकास... इस मंत्र को लेकर आगे बढ़ें उतनी ही अपेक्षा.
जय जय गरवी गुजरात..!!
भारत माता की जय..!!











