एक टूटे हुए दिल की आवाज कहां तक जा सकती है?
दिल अगर हनीमून के दौरान टूट जाए तो फिर इसकी कराह दूर-दूर तक जाती है। इस प्रकार के सदमे की सिसकियां देश भर में सुनाई पड़ सकती हैं। हनीमून में ट्रैजडी का होना निश्चित रूप से बहुत जल्दी है, लेकिन यह सिर्फ और सिर्फ तभी होती है जब शादी का आधार ही दहेज रहा हो और दहेज में महंगे से महंगे सामान की लगातार मांग हो रही हो। लालच हमेशा क्षणिक होता है।
शनिवार को बेंगलुरु से निकली जो सिसकियां लोगों ने देखीं और सुनीं, उनमें गहरा दर्द था। कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी अपनी पार्टी के एक कार्यक्रम में आए तो थे लोगों की बधाइयां लेने, लेकिन यहां दर्द के मारे उनके आंसू छलक आए। उन्होंने कहा, "मैं अपने दर्द को निगल रहा हूं, जो जहर से ज्यादा कुछ नहीं है।"
यह जहर कांग्रेस के साथ उनका गठबंधन था, जिसने उन्हें कुर्सी तो दी थी लेकिन उनकी गरिमा को छीन लिया था। वह एक तथाकथित सहयोगी के हाथों अपने अपमान के बारे में बता रहे थे। जहर सांप से जुड़ा होता है और यहां के उदाहरण में वह अंधेरे के छिद्र से निकलकर काटने वाला है। दूसरी कई और बातों के साथ ही कांग्रेस नए मुख्यमंत्री को यह संदेश दे-देकर भी परेशान कर रही थी: ‘’कुमारस्वामी मेरा मुख्यमंत्री नहीं है।‘’ तकनीकी रूप से इस शादी में भले ही अब तक तलाक न हुआ हो लेकिन यह साफ हो चुका है कि शादी टूट चुकी है और वो भी हनीमून के दौरान ही। कुमारस्वामी ने कहा, "मैं कितने दिन मुख्यमंत्री के रूप में रहूंगा, भगवान इसका निर्णय करेंगे।" जब एक गठबंधन का मुख्यमंत्री भगवान को अपना रेफरी बनाता है तो इसका मतलब है कि संकट आपसी समाधान के दायरे से बाहर निकल चुका है। सवाल है कि इतनी जल्दी इस तरह की विकट स्थिति क्यों बनी?
कांग्रेस अब खुद के लिए असीमित शक्ति चाहती है। इसमें कांग्रेस का लालच भी है और इसे वह अपना अधिकार भी मानती है।
कर्नाटक का यह गठबंधन चरमराने का पहला कारण यह था कि यह कभी सही नहीं था। कांग्रेस ने अपने से कहीं छोटी पार्टी के प्रमुख कुमारस्वामी को इसलिए नहीं मुख्यमंत्री बनाया क्योंकि उसे राज्य में अच्छा शासन चाहिए था। इसके पीछे उसका एकमात्र उद्देश्य भाजपा को सत्ता से दूर रखना था। अपनी उस कोशिश में सफल रहने के बाद कांग्रेस अब खुद के लिए असीमित शक्ति चाहती है। इसमें कांग्रेस का लालच भी है और बड़ी पार्टी होने के नाते इसे वह अपना अधिकार भी मानती है। इसके भूखे नेता मुख्यमंत्री की ओर से मिलने वाले लाभार्थियों के प्रीमियम पर अपना जोर नहीं चला सकते। यह स्थिति इन्हें तकलीफ देती है।
ऐसी भी क्या जल्दी है? इसका जवाब है कि लालच में संतोष और धैर्य नाम की चीज नहीं होती। हर दिन कांग्रेस दफ्तरों के लोग शायद यही जोड़ने में लगे हैं कि अपने हाथ से अवसर निकलने से वे कितनी रकम गंवाते जा रहे हैं। इस दर्द को तो समझना ही पड़ेगा।
देवेगौड़ा एक प्रधानमंत्री के तौर पर उतने बुरे नहीं थे, जितना उन्हें बताया गया, लेकिन कांग्रेस की अगुआई में बड़े ही निर्दयी तरीके से उनका उपहास किया जाता रहा। इससे आने वाली स्थिति का पूर्वानुमान हो चुका था।
इसके पीछे का उद्देश्य क्या है? इसका उद्देश्य कुमारस्वामी के नेतृत्व को अस्थिर कर उनकी विश्वसनीयता को तार-तार करना है। इतना ही नहीं उन्हें उस स्थिति तक ले जाना है जहां उनका पतन हो जाए।
किस हद तक? इतना तो निश्चित है कि एक और चुनाव तक तो नहीं। एक और चुनाव का मतलब हार को निमंत्रण देना होगा। कांग्रेस एक और गठबंधन बनाना चाहती है लेकिन अपने नेतृत्व में। एक बार कुमारस्वामी को हटाने के बाद कांग्रेस उनके विधायकों को तोड़ने के लिए आकर्षक ऑफर देगी।
इस तरह की उठापटक में कांग्रेस को महारत हासिल है। यह बिल्कुल उसी तरह है, जैसा 22 वर्ष पहले राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस ने कुमारस्वामी के पिता एचडी देवेगौड़ा के साथ किया था। पुराने रिकॉर्ड को यदि खंगाला जाए तो साफ हो जाएगा कि उस वक्त भी यही सब हुआ था। तब भी यही कहा गया था कि भाजपा को किसी भी कीमत पर केंद्र की सत्ता से दूर रखना पड़ेगा। तब देवेगौड़ा को अचानक लाया गया था और अप्रत्याशित रूप से देश के प्रधानमंत्री के तौर पर पेश कर दिया गया था। गौड़ा ने उस समय ज्योतिष और अपने बुलंद सितारों को इसका श्रेय दिया था, यानि खुद उन्हें भी सपने में भी इसकी उम्मीद नहीं थी। हद तो तब हो गई जब आलोचकों ने देवेगौड़ा की निजी कमियों के लिए उन पर व्यंग्य किए तो उन पर हंसने वालों में कांग्रेस सबसे आगे थी। देवेगौड़ा एक प्रधानमंत्री के तौर पर उतने बुरे नहीं थे, जितना उन्हें बताया गया, लेकिन कांग्रेस की अगुआई में बड़े ही निर्दयी तरीके से उनका उपहास किया जाता रहा। ऐसे में आगे जाकर जो स्थिति बनी, उसका पूर्वानुमान भी कर लिया गया था।
एक अंतर यह है कि 1996 में देवेगौड़ा को प्रधानमंत्री बनाने वाली कांग्रेस इकलौती पार्टी नहीं थी। क्षेत्रीय पार्टियों का पूरा कुनबा कांग्रेस पार्टी के साथ था, लेकिन देवेगौड़ा की सरकार के लिए कांग्रेस का समर्थन बहुत जरूरी था। जब कांग्रेस ने 11 महीने बाद देवेगौड़ा सरकार से समर्थन वापस ले लिया तो फिर बदलाव अनिवार्य हो गया। कर्नाटक में कांग्रेस पार्टी अकेली है इसलिए यहां वो अपनी सहूलियत और रणनीति के हिसाब से खेल खेलेगी।
कर्नाटक की सत्ता में अभी चेन में बंधे भालू पर हमले का मुहावरा चरितार्थ हो रहा है। मुहावरे के हिसाब से कांग्रेस इस विश्वास के साथ हमला करती रहेगी कि एक जख्मी और बंधा हुआ भालू कुछ नहीं कर सकता है।
ऐसे टूटे हुए दिल की आवाज आपको ना सिर्फ किसी भौगोलिक सीमा में, बल्कि इतिहास में भी खूब सुनने को मिल सकती है।
(विदेश राज्यमंत्री मोबाशर जावेद "एमजे" अकबर मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद हैं।)
ऊपर व्यक्त की गई राय लेखक की अपनी राय है। यह आवश्यक नहीं है कि नरेन्द्र मोदी वेबसाइट एवं नरेंद्र मोदी ऐप इससे सहमत हो।)


